फिल्म ‘प्रहार’ में ललित प्रभाकर निभा रहे हैं यह अहम किरदार | Lalit Prabhakar

फिल्म ‘प्रहार’ में ललित प्रभाकर निभा रहे हैं यह अहम किरदार | Lalit Prabhakar

एक वक्त था, जब पिता को रेलवे स्टेशन पर सोना पड़ता था और पूरा परिवार एक छोटे-से वन रूम किचन में रहता था!
अभिनेता ललित प्रभाकर की सफलता के पीछे उनके माता-पिता का संघर्ष, त्याग और एक-दूसरे का साथ है।
‘जुळून येती रेशीमगाठी’ में आदित्य के किरदार से लेकर फिल्म ‘प्रहार’ में अजमल कसाब की चुनौतीपूर्ण भूमिका तक… ललित का यह सफर कई सीख देता है।

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दादी की एक रेसिपी ने बदल दी किस्मत! 5 लाख लगाकर दो बहनों ने खड़ा किया 10 करोड़ का बिजनेस

कहते हैं कि सफलता की सबसे खास कहानियां अक्सर घर की रसोई से शुरू होती हैं। बेंगलुरु की दो बहनों, राम्या रवि और श्वेता रवि ने इस बात को सच कर दिखाया है। बचपन में दादी के हाथों की पारंपरिक बिरयानी का स्वाद चखने वाली इन बहनों ने उसी रेसिपी को अपना बिजनेस आइडिया बनाया। साल 2020 में महज 5 लाख रुपये से शुरू हुआ उनका कारोबार आज करीब 10 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी बताती है कि सही सोच, मेहनत और अपने काम पर भरोसा हो, तो छोटी शुरुआत भी बड़ी कामयाबी में बदल सकती है।

दादी की रेसिपी से आया बिजनेस का आइडिया

राम्या और श्वेता बचपन से ही अपनी दादी के हाथों की कर्नाटक स्टाइल डोन्ने बिरयानी खाती आई थीं। इस बिरयानी का स्वाद उनके लिए सिर्फ एक पसंदीदा डिश नहीं, बल्कि परिवार की यादों और परंपरा का हिस्सा था। बड़े होने के साथ दोनों बहनों को एहसास हुआ कि उनकी दादी की यह खास रेसिपी दूसरे लोगों को भी पसंद आ सकती है। यहीं से उन्होंने पारिवारिक स्वाद को बिजनेस में बदलने का फैसला किया। उनका मकसद बिरयानी के असली स्वाद को बरकरार रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था।

5 लाख रुपये से शुरू किया कारोबार

नवंबर 2020 में कोरोना महामारी के दौरान दोनों बहनों ने RNR Donne Biryani नाम से अपना कारोबार शुरू किया। शुरुआत बेंगलुरु के महज 200 वर्ग फुट के क्लाउड किचन से हुई। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने 5 लाख रुपये लगाए और एक कुक तथा कुछ सहायकों की मदद से काम शुरू किया। छोटी-सी रसोई से शुरू हुआ यह सफर पहले ही महीने में चर्चा में आ गया। द बेटर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में राम्या ने बताया कि कारोबार के पहले महीने में उन्हें 10,000 से ज्यादा ऑर्डर मिले। इस शुरुआती सफलता ने दोनों बहनों को आगे बढ़ने का हौसला दिया।

अनोखी पैकेजिंग ने बनाई अलग पहचान

दोनों बहनों ने शुरुआत में महंगे रेस्टोरेंट खोलने के बजाय डिलीवरी आधारित बिजनेस मॉडल अपनाया। इससे कम लागत में कारोबार शुरू करना और धीरे-धीरे उसका विस्तार करना आसान हुआ। उन्होंने अपने ब्रांड को अलग पहचान देने के लिए पैकेजिंग पर भी ध्यान दिया। उनकी बिरयानी केले के पत्ते में लपेटकर टिन के डिब्बे में रखी जाती है। इस अंदाज ने पारंपरिक स्वाद को खास प्रस्तुति के साथ जोड़ दिया।

14 क्लाउड किचन तक पहुंचा कारोबार

रिपोर्ट के मुताबिक, RNR Donne Biryani का विस्तार अब 14 क्लाउड किचन और एक अलग रेस्टोरेंट तक हो चुका है। कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 10 करोड़ रुपये बताया गया है। बिरयानी के अलावा यहां ड्रमस्टिक चिली स्टार्टर, मटन बोन सूप और चिकन घी रोस्ट जैसे व्यंजन भी मिलते हैं। मिठाई में इलनेर पायसम यानी नारियल से बनी खीर भी मेन्यू का हिस्सा है। यहां वेज और चिकन बिरयानी की कीमत 269 से 349 रुपये के बीच है, जबकि मटन बिरयानी 419 रुपये में मिलती है।

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घर के स्वाद से मिली बड़ी सफलता

राम्या और श्वेता की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपने हुनर या पारिवारिक परंपरा को कारोबार में बदलना चाहते हैं। दोनों बहनों ने दादी की रेसिपी को आधुनिक बिजनेस मॉडल से जोड़ा और एक छोटे किचन को बड़े ब्रांड में बदल दिया। उनकी सफलता दिखाती है कि बिजनेस की शुरुआत के लिए हमेशा बड़ी पूंजी जरूरी नहीं होती। कई बार एक खास आइडिया और उसे पूरा करने का जुनून ही सफलता की असली नींव बन जाता है।

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न्यूज़रूम से वड़ा पाव के ठेले तक | Journalist Couple VadaPav Business | Patrakar Couple VadaPav Wale

न्यूज़रूम से वड़ा पाव के ठेले तक | Journalist Couple VadaPav Business | Patrakar Couple VadaPav Wale

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12 साल तक मीडिया में काम किया, लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब जसवीर सिंह जस्सी और पत्नी सुधा शाह की नौकरियाँ चली गईं। आर्थिक तंगी आई, लोगों ने ताने मारे और कई बार लगा कि अब आगे कोई रास्ता नहीं है।
फिर मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर गए और वहाँ पर खाए एक वड़ा पाव ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
आज यही कपल नोएडा सेक्टर 19 में अपना वड़ा पाव स्टॉल चलाता है और मेहनत से अपनी नई पहचान बना रहा है।
उनकी कहानी याद दिलाती है कि कोई काम छोटा नहीं होता, अगर आप उसे ईमानदारी और हौसले से करते हैं।
आपके लिए सफलता का असली मतलब क्या है?
@patrakarcouple

न्यूज़रूम से वड़ा पाव के ठेले तक | Journalist Couple Vada Pav Business | Patrakar Couple Vada Pav Wale | Noida

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Delhi Startup: नौकरी छोड़ शुरू किया ये अनोखा स्टार्टअप, एक हुनर ने बदल दी 50 परिवारों की जिंदगी

Startup Success Story: दिल्ली के नजफगढ़ के रहने वाले लक्ष्य और अंजलि कालिया की कहानी उन लोगों के लिए अनोखी है जो नौकरी करते हुए अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का सपना देखते हैं। इस कपल ने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपना खुद का ब्रांड, लव लाइट शुरू किया। यह ब्रांड कई तरह के प्रोडक्ट बनाता है, जिसमें हाथ से बनी खुशबूदार मोमबत्तियां और क्रोशिया से बुने फूल शामिल हैं।

खास बात यह है कि इस बिजनेस से 50 महिलाओं को काम करने का मौका मिला है। अपना खुद का बिजनेस शुरू करना आसान नहीं है। इसके लिए सही आइडिया, कड़ी मेहनत और मार्केट की जरूरतों की समझ की जरूरत होती है। लक्ष्य और अंजलि ने नौकरी के बजाय अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का फैसला किया। उनका बिजनेस हाथ से बने प्रोडक्ट पर आधारित है जो सुंदरता के साथ कड़ी मेहनत और हुनर को मिलाते हैं।

क्या है लव लाइट ब्रांड का बिजनेस

लव लाइट हाथ से बनी खुशबूदार मोमबत्तियां और क्रोशिया प्रोडक्ट बनाती है। खुशबूदार मोमबत्तियां खुशबूदार मोम होती हैं। क्रोशिया एक कला है जिसमें धागे का इस्तेमाल करके फूल और दूसरी सजावटी चीजें बनाई जाती हैं। ये हाथ से बने प्रोडक्ट आजकल घर की सजावट और गिफ्ट देने के लिए पॉपुलर हैं। इन प्रोडक्ट की खासियत यह है कि ये मशीन से बने होने के बजाय हाथ से बने होते हैं। इस काम के लिए स्किल और सटीकता की जरूरत होती है। लव लाइट का बिजनेस भी ऐसे ही प्रोडक्ट पर आधारित है।

50 महिलाओं को मिला रोजगार

लक्ष्य और अंजलि के बिजनेस की सबसे खास बात यह है कि इससे 50 महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। दोनों ने अपने कारोबार को इस तरह आगे बढ़ाया कि इसमें दूसरी महिलाओं के लिए भी काम करने और कमाई करने का अवसर बना। हैंडमेड प्रोडक्ट्स बनाने के काम में हुनर की अहम भूमिका होती है। क्रोशिया से फूल और दूसरी चीजें तैयार करने के लिए धैर्य और बारीकी से काम करना पड़ता है। ऐसे में महिलाओं को इस तरह के काम से जोड़ना उनके हुनर को रोजगार में बदलने का एक तरीका भी है।

क्या-क्या बनाते हैं लक्ष्य और अंजलि

लव लाइट ब्रांड के तहत खुशबूदार मोमबत्तियां यानी सेंटेड कैंडल्स तैयार की जाती हैं। इनका इस्तेमाल घर की सजावट और गिफ्ट देने के लिए किया जाता है। इसके अलावा, क्रोशिया से बने फूल और दूसरी चीजें भी इस ब्रांड का हिस्सा हैं। हाथ से बने होने के कारण इनकी डिजाइन और कारीगरी इन्हें अलग पहचान देती है।

हैंडमेड प्रोडक्ट्स के बिजनेस में कितना हो सकता है मुनाफा

लक्ष्य और अंजलि के Love Light बिजनेस में कमाई हैंडमेड प्रोडक्ट्स की बिक्री और खर्च पर निर्भर करती है। उदाहरण के तौर पर, ₹1 लाख की मासिक बिक्री पर 15–25% मुनाफे के हिसाब से ₹15,000–₹25,000 बच सकते हैं। कपल ने बताया कि भले ही हमें 25% का ही मुनाफा हो रहा हो, लेकिन हमें खुशी है कि यह हमारा अपना पैसा है और हमारे पास वापस आ रहा है। हमें किसी का गुलाम बनने या किसी के लिए काम करने की जरूरत नहीं है।

रिपोर्ट- शुभांगी तिवारी

IIT रुड़की के हरकिरत सिंह की अनोखी करियर जर्नी, पहले फ्रीलांसिंग से ₹80 लाख कमाए, अब ₹4 करोड़ का पैकेज

हर कोई लाखों के पैकेज वाली नौकरी पाने का सपना देखता है, लेकिन IIT रुड़की के हरकिरत सिंह ने नौकरी मिलने के बाद ही अपना रास्ता बदलने का फैसला किया। Goldman Sachs जैसी बड़ी कंपनी छोड़कर उन्होंने फ्रीलांसिंग में हाथ आजमाया और रिपोर्ट्स के मुताबिक, सालाना 80 लाख रुपये तक कमाए। अब Gather में उनकी रिमोट सॉफ्टवेयर डेवलपर की नौकरी का पैकेज करीब 4 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। उनकी कहानी सिर्फ मोटी सैलरी तक पहुंचने की नहीं, बल्कि करियर में अलग रास्ता चुनने के फैसले की भी है। हालांकि, इतनी बड़ी कमाई की खबर के बीच यह समझना भी जरूरी है कि हर किसी के लिए ऐसा सफर एक जैसा नहीं होता।

IIT रुड़की से पढ़ाई, Google के प्रोग्राम में भी लिया हिस्सा

हरकिरत सिंह ने 2018 में IIT रुड़की से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया था। उनकी प्रोफेशनल यात्रा में Google Summer of Code में दो बार हिस्सा लेना भी शामिल रहा। इसके अलावा, उन्होंने FAANG कंपनियों, फाइनेंस सेक्टर और स्टार्टअप्स के साथ काम करके अपना अनुभव बढ़ाया। इस तरह उनका करियर सिर्फ एक कंपनी या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा।

Goldman Sachs छोड़ी, फ्रीलांसिंग को बनाया कमाई का जरिया

आमतौर पर बड़ी वित्तीय कंपनी में नौकरी मिलना युवाओं के लिए बड़ी उपलब्धि माना जाता है। लेकिन हरकिरत ने महामारी से ठीक पहले इस नौकरी को छोड़कर दूसरे अवसर तलाशने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने फ्रीलांसिंग के जरिए काम करना शुरू किया।

बताया जाता है कि इस दौरान उनकी सालाना कमाई करीब 80 लाख रुपये तक पहुंच गई। अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम करने और तकनीकी कौशल का इस्तेमाल करने से उन्हें वैश्विक बाजार में अवसर तलाशने का मौका मिला।

अब ₹4 करोड़ के रिमोट पैकेज की चर्चा

हरकिरत सिंह को लेकर साझा की जा रही जानकारी के मुताबिक, उन्हें Gather में रिमोट सॉफ्टवेयर डेवलपर की भूमिका मिली, जिसके लिए सालाना पैकेज करीब 4 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। हालांकि, इस रकम और नौकरी की शर्तों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।

सोशल मीडिया पर छिड़ी नौकरी को लेकर बहस

उनकी कहानी पर कुछ यूजर्स ने तकनीकी कौशल और लगातार सीखते रहने की अहमियत बताई। वहीं, एक यूजर ने कहा कि फ्रेशर्स और जूनियर कर्मचारियों के लिए रिमोट नौकरी पाना आज भी मुश्किल है, जबकि अनुभवी लोगों को अपेक्षाकृत ज्यादा अवसर मिलते हैं।

हरकिरत की यात्रा यही दिखाती है कि करियर में नए रास्ते तलाशना फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसके लिए कौशल, अनुभव और जोखिम उठाने की तैयारी भी जरूरी है।

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2 Miscarriages, 2 Failed IVF के बाद 42 की उम्र में बनीं माँ | Pregnancy after 42 | Motherhood

2 Miscarriages, 2 Failed IVF के बाद 42 की उम्र में बनीं माँ | Pregnancy after 42 | Motherhood

माँ बनना हर महिला का अपना फैसला होना चाहिए, समाज की बनाई कोई तय उम्र नहीं।
डॉ. रुपाली गुप्ता की कहानी देखिए –
कैसे सालों के दर्द, तानों और सवालों के बावजूद उन्होंने माँ बनने का अपना सपना नहीं छोड़ा।
दो Miscarriages, Failed IVF Cycles और 12 साल के लंबे इंतज़ार के बाद Dr. Rupalli Gupta ने 42 की उम्र में बेटी नंदिका को जन्म दिया। उनकी कहानी बताती है कि Motherhood की कोई तय Timeline नहीं होती।
@sanikka.gupta

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14 साल तक पहनी एयरफोर्स की वर्दी, अब देहरादून में चलाती है बुटिक! वजह सुन आप भी करेंगे सलाम

14 साल तक भारतीय वायु सेना में नौकरी करने के बाद एक पूर्व महिला अधिकारी ने अपनी रोज की जिंदगी को बदलने का फैसला किया। उन्होंने नौकरी छोड़ी और देहरादून वापस आकर कपड़ों की दुकान शुरू कर ली। उनका यह कदम किसी बड़े सपने को पूरा करने के लिए नहीं था, बल्कि एक खास वजह से लिया गया भावनात्मक फैसला था।

आखिर क्या है इस फैसले की वजह?

इस महिला का इंस्टाग्राम पर @thefaujifounder नाम से एक अकाउंट है, जहां उन्होंने एक वीडियो में अपनी कहानी बताई। उन्होंने कहा कि उनकी दुकान पर आने वाले लोग उनसे पूछते हैं कि आखिर वायु सेना की अधिकारी से वह कपड़ों की दुकान चलाने वाली कैसे बन गईं। उन्होंने बताया कि उन्होंने शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी के तौर पर 14 साल तक सेवा की, लेकिन नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें लगा कि अब परिवार के साथ रहना ज्यादा जरूरी है। उनके बच्चे बड़े हो रहे थे और माता-पिता भी बुजुर्ग हो रहे थे।

इसके बाद वह देहरादून लौट आईं। उनका घर उनकी दुकान से सिर्फ 100 मीटर दूर है। उन्हें कपड़ों और क्रिएटिव काम में इंटरेस्ट थी, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न ऐसा काम किया जाए, जिससे परिवार के पास रहने को भी मिल सके। इसी सोच के साथ उन्होंने कपड़ों की दुकान शुरू कर दी।

सोशल मीडिया पर पसंद आई उनकी यह कहानी

वह कहती है कि उनका यह फैसला किसी बड़े मुकाम तक पहुंचने के लिए नहीं था। वह बस अपने बच्चों के साथ रहकर जिंदगी को मजे से जीना चाहती थीं। उनकी कहानी सोशल मीडिया पर भी लोगों को पसंद आई। कई लोगों ने कहा – परिवार के साथ समय बिताना बहुत कीमती और यादगार पल होता है।

ये कहानी इसलिए लोगों के दिल को छू रही है क्योंकि इसमें कोई मोटिवेशनल ज्ञान नहीं है। एक मां का सिंपल फैसला है – करियर से ज्यादा जरूरी है परिवार के साथ रहना।

सोशल मीडिया पर लोग कमेंट कर रहे हैं – आपने वर्दी उतारी है, जज्बा नहीं।

लेदर थ्रेड से मिलेट्स बिस्किट तक… 20 देशों में पहुंचे कानपुर की महिला कारोबारियों के उत्पाद, खड़ा किया करोड़ों का बिजनेस!

Kanpur Women Entrepreneurs Success Story: जब भी हमारे जुबान पर इंडस्ट्री का नाम आता है तो इसको हम पुरुष प्रधान क्षेत्र समझते हैं वही कानपुर को लंबे समय से देश के बड़े औद्योगिक शहरों में गिना जाता है। यहां कारखानों और कारोबार की बात होती थी तो ज्यादातर पुरुष कारोबारी ही सामने आते थे। अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। शहर की महिलाएं भी उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान बना रही हैं।

जिन महिलाओं को पहले हम घर संभालते हुए देखे थे अब वह बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां और इंडस्ट्रीज या संभाल रही है ,बीते पांच साल में कानपुर में महिला कारोबारियों और उद्यमियों की संख्या में करीब 15 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। खास बात यह है कि महिलाएं अब सिर्फ छोटे कारोबार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खुद औद्योगिक इकाइयां चला रही हैं और दूसरे लोगों को रोजगार भी दे रही हैं।

लेदर, कपड़ा, पैकेजिंग और फूड प्रोसेसिंग जैसे सेक्टर में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। कई महिला उद्यमियों के उत्पाद देश के अलग-अलग शहरों में पहुंच रहे हैं, जबकि कुछ का माल विदेशों तक भी सप्लाई हो रहा है। यानी कानपुर की आधी आबादी अब कारोबार में सिर्फ हिस्सेदारी नहीं बढ़ा रही, बल्कि खुद कारोबार की कमान संभाल रही है।

केस 1: नौकरी छोड़ी, ट्रेडिंग से शुरू किया सफर, अब 20 देशों तक पहुंचा कारोबार

फजलगंज इंडस्ट्रियल एरिया में लेदर उद्योग से जुड़ी प्रेरणा वर्मा की कहानी इसकी बड़ी मिसाल है। प्रेरणा पहले एक प्राइवेट नौकरी करती थीं। नौकरी में मन नहीं लगा तो खुद का कारोबार शुरू करने का फैसला किया। शुरुआत में उन्होंने लेदर उत्पादों की ट्रेडिंग की। कारोबार बढ़ा तो अपनी फैक्ट्री लगाने का सपना देखा और उसे भी पूरा कर लिया।

केस 1: नौकरी छोड़ी, ट्रेडिंग से शुरू किया सफर, अब 20 देशों तक पहुंचा कारोबार

आज उनकी फैक्ट्री में लेदर थ्रेड, बैग और कस्टमाइज लेदर आइटम तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों की मांग देश के साथ विदेशों में भी है। उनके उत्पाद करीब 20 देशों तक पहुंच रहे हैं। फैक्ट्री में 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जिसमें बड़ी संख्या महिलाओं की है।

केस 1: नौकरी छोड़ी, ट्रेडिंग से शुरू किया सफर, अब 20 देशों तक पहुंचा कारोबार

केस 2: मोटे अनाज से बनाए बिस्किट और नमकीन, विदेश तक पहुंचा कारोबार

बर्रा-2 निवासी संगीता सिंह ने वर्ष 2023 में अपना कारोबार शुरू किया। उन्होंने मोटे अनाज से अलग तरह के बिस्किट और नमकीन तैयार किए। शुरुआत में कारोबार छोटा था, लेकिन लोगों को उत्पाद पसंद आए तो धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ने लगी। पहले उत्पाद देश के अलग-अलग शहरों तक पहुंचे और इसके बाद विदेशों में भी इनकी मांग बनने लगी।

केस 2: मोटे अनाज से बनाए बिस्किट और नमकीन, विदेश तक पहुंचा कारोबार

आज संगीता का कारोबार करोड़ों रुपये सालाना तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी बताती है कि सही उत्पाद और मेहनत के दम पर महिलाएं भी बड़े कारोबार खड़े कर सकती हैं।

उद्योग से रोजगार तक, महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी

कानपुर में महिला उद्यमिता का बढ़ता दायरा सिर्फ कारोबार तक सीमित नहीं है। इन उद्योगों के जरिए महिलाओं को रोजगार भी मिल रहा है। कई महिला कारोबारी अपने साथ दूसरी महिलाओं को भी काम से जोड़ रही हैं। इससे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का रास्ता खुल रहा है।

कभी जिन महिलाओं को उद्योग की दुनिया से दूर माना जाता था, वही अब मशीनों के बीच खड़े होकर प्रोडक्शन की कमान संभाल रही हैं। लेदर से लेकर फूड प्रोसेसिंग तक अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाएं कारोबार को नई दिशा दे रही हैं। इनके उत्पाद अब कानपुर और देश के बाजार से निकलकर विदेशों तक पहुंच रहे हैं।

महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए IIA में बनी महिला विंग

कानपुर में महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन यानी IIA में महिला विंग भी बनाई गई है। इसका मकसद शहर की महिला उद्यमियों को एक मंच देना, उन्हें उद्योग से जुड़ी जानकारी और नए अवसरों से जोड़ना और कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद करना है। महिला उद्यमियों के बीच नेटवर्किंग बढ़ाने के साथ उन्हें बाजार, तकनीक और कारोबार से जुड़ी संभावनाओं की जानकारी देने पर भी जोर दिया जा रहा है।

कानपुर की औद्योगिक तस्वीर में अब आधी आबादी की यह बढ़ती हिस्सेदारी साफ दिखाई दे रही है। महिलाएं खुद उद्योग चला रही हैं, लोगों को रोजगार दे रही हैं और अपने उत्पादों को देश ही नहीं, विदेशों के बाजार तक पहुंचा रही हैं। ऐसे में शहर की इंडस्ट्रियल पहचान में महिलाओं की यह बढ़ती भूमिका आने वाले समय में और बड़ी दिखाई दे सकती है।

पिछले पांच सालों में महिला उद्यमियों से जुड़े ये है प्रमुख आंकड़े

कुल उद्यम पंजीकरण हुए: 41008

कुल मैन्यूफेक्चरिंग यूनिट लगीं: 12711

कुल इंप्लॉयमेंट जेनरेट हुआ: 75622

कुल सर्विस यूनिट लगीं: 12234

कुल रोजगार मिला: 77071

कुल ट्रेडिंग संबंधी यूनिट लगीं: 16063

कुल रोजगार मिला: 74292

कुल निवेश कानपुर को मिला: 91961.66 लाख रुपये

रिपोर्ट- अखंड प्रताप सिंह

Success Story: कभी स्कूल में पढ़ाती थीं, अब ₹30 की ज्वेलरी से खड़ा किया विशाल कारोबार, 15 साल से हुनर को बना रहीं कमाई का जरिया

Success Story: हर किसी को भगवान कोई न कोई हुनर जरूर देता है। लेकिन हर किसी के लिए उसे कमाई का जरिया बनाना आसान नहीं होता। कोलकाता के दुर्गापुर की रहने वाली पापिया नट्टा ने अपने हुनर ​​को एक बिजनेस में बदल दिया। कभी स्कूल टीचर रहीं पापिया पिछले लगभग 15 सालों से हाथ से बनी ज्वेलरी बना और बेच रही हैं। 2009 में शुरू हुआ उनका यह सफर आज भी ‘पापिया आर्ट एंड क्राफ्ट’ के नाम से जारी है।

शौक से शुरू हुआ काम, धीरे-धीरे बन गया कारोबार

पापिया बताती हैं कि उन्हें शुरू से ही हाथ से चीजें बनाने में बहुत दिलचस्पी थी। उन्होंने कई तरह की हस्तकलाएं सीखीं। बाद में उन हुनर ​​का इस्तेमाल करके गहने बनाना शुरू किया। उस समय, उन्होंने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनका यह शौक आगे चलकर एक बिजनेस बन जाएगा।

उनके लिए यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। वह पहले एक स्कूल टीचर थीं। जब उन्होंने इस काम पर ध्यान देने के लिए अपनी नौकरी छोड़ी, तो कई लोगों ने उनके फैसले पर सवाल उठाए। यहां तक कि उनके टीचर ने भी पूछा कि वह आखिर क्या कर रही हैं। किसी से बहस करने के बजाय, पपिया ने अपने काम को ही अपनी पहचान बनाने का फैसला किया।

मिट्टी, कपड़े और पीतल से बनती हैं ज्वेलरी

पापिया की ज्वेलरी की एक खास बात यह है कि यह पूरी तरह से हाथ से बनाई जाती है। इसे बनाने में कपड़ा, मिट्टी, पीतल और दूसरी धातुओं का इस्तेमाल होता है। मिट्टी की ज्वेलरी के लिए वह उसी तरह की मिट्टी का इस्तेमाल करती हैं, जिससे आमतौर पर देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती हैं। उनका काम सिर्फ नेकलेस या इयररिंग्स तक ही सीमित नहीं है। बल्कि वह पूरे शरीर के लिए कई तरह की ज्वेलरी बनाती हैं, जिसमें बालों की एक्सेसरीज से लेकर पैरों की ज्वेलरी तक शामिल है। उनके कलेक्शन में कई तरह के डिजाइन हैं। इनमें अंगूठियों और बालों की सजावट से लेकर हाथों और पैरों की ज्वेलरी तक शामिल है।

₹30 से ₹800 तक है कीमत

पापिया ₹30 से ₹800 की कीमत वाली कई तरह की ज्वेलरी बेचती हैं, जिनमें अलग-अलग स्टाइल शामिल हैं। जिन गहनों को बनाने में ज्यादा बारीकी या मेहनत लगती है, उनकी कीमत अधिक होती है। पापिया ने ‘मनीकंट्रोल‘ से बातचीत में बताया कि उनके पास अलग-अलग तरह के ग्राहक आते हैं। कुछ ग्राहक महंगी चीजें नहीं खरीदना चाहते या उनका बजट कम होता है। इसलिए उन्होंने कीमतें इस तरह तय की हैं कि हर कोई आसानी से उनकी ज्वेलरी खरीद सके।

कितना होता है मुनाफा?

पापिया बताती हैं कि उनके बनाए गहनों की कीमत ₹30 से ₹800 के बीच होती है। उन्हें इस काम से लगभग 20% से 30% का मुनाफा होता। अगर कोई गहना ₹500 में बिकता है, तो मुनाफा लगभग ₹100 से ₹150 होता है। जबकि ₹800 वाले गहने पर लगभग ₹160 से 240 रुपये की कमाई होती है। वह कहती हैं कि उनकी कमाई इस बात पर भी डिपेंड करती है कि वह अपने प्रोडक्ट कहां और कैसे बेचती हैं। उन्होंने कहा कि अलग-अलग जगहों पर बिक्री के आंकड़े अलग-अलग होते हैं। वह यह भी बताती हैं कि उन्हें सबसे ज्यादा मुनाफा एग्जीबिशन से होता है।

(दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट)

Success Story: NSFDC की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम ने बदल दी जिंदगी, बांकुरा की शीला मंडल कमाने लगीं महीने का 35000

Success Story: बहुत छोटे स्तर के कारोबारियों के लिए सस्ती और आसान शर्तों पर कर्ज संजीवनी से कम नहीं होता। इससे उनके कारोबार को प्रोत्साहन मिलता है और परिवार का जीवन भी सुधरता है। कुछ इसी तरह की राहत पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले की शीला मंडल ने भी हासिल की है। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (NSFDC) की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम की मदद से शीला ने अपने केबल ऑपरेटर कारोबार को विस्तार दिया है।

एनएसएफडीसी छोटे बिजनेस मालिकों के लिए सस्ता कर्ज उपलब्ध कराता है। इससे उनके काम को बढ़ाने और उनके परिवार की रोजी-रोटी को बेहतर बनाने के मौके मिल सकते हैं। बांकुरा की 39 साल की शीला मंडल का अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि एनएसएफडीसी की छोटी आर्थिक मदद ने उनके मौजूदा कारोबार को बढ़ाने में मदद की।

शीला मंडल बांकुरा जिले के बांकादाहा गांव की रहने वाली हैं। शीला यहां अपने चार लोगों के परिवार के साथ रहती हैं। पहले, वह अपना केबल बिजनेस छोटे स्तर पर चलाती थीं, जिससे उन्हें हर महीने लगभग 15,000-18,000 रुपये मिलते थे। यह आय परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं थी।

उन्हें पश्चिम बंगाल शेड्यूल्ड कास्ट्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (WBSCDC) के ज़िला ऑफिस से NSFDC की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम के बारे में पता चला। शीला ने 2023-24 के दौरान एनएसएफडीसी की माइक्रो क्रेडिट लोन स्कीम के तहत 4.40 लाख रुपये का कर्ज लिया। उन्होंने अपने गांव में अपने केबल ऑपरेटर के बिजनेस को बढ़ाया। इससे उनकी महीने की आय लगभग 15,000-18,000 रुपये से बढ़कर लगभग 35,000 रुपये हो गई। उनके पति भी इसे चलाने में उनकी मदद करते हैं।

बढ़े हुए बिजनेस से, मंडल की महीने की इनकम लगभग 35,000 रुपये हो गई है। इस बढ़ी हुई आय से उनके परिवार को ज्यादा आराम से रहने में मदद मिली है। शीला का कहना है कि एनएसएफडीसी से मिली आर्थिक मदद से उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है और उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। इसके लिए वह एनएसएफडीसी की शुक्रगुजार रहेंगी।