ट्रेन में गाने से लेकर Hanuman Ansh तक दृष्टिहीन गायक Suneel Lodhi का शानदार सफर | Maine Tere Hi

ट्रेन में गाने से लेकर Hanuman Ansh तक दृष्टिहीन गायक Suneel Lodhi का शानदार सफर | Maine Tere Hi

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के एक छोटे से गाँव में जन्मे 25 साल के सुनील लोधी जन्म से दृष्टिहीन हैं। लेकिन जो उन्हें आँखों से नहीं मिला, वो उन्हें अपनी आवाज़ में मिल गया।
गाँव की महफ़िलों और धार्मिक कार्यक्रमों से लेकर लोकल ट्रेनों तक, सुनील भजन और बुंदेली लोकगीत गाते रहे।
फिर सोशल मीडिया पर उनके गानों ने लाखों लोगों का दिल जीत लिया। और इसी दौरान फिल्ममेकर Pankaj VRK की नजर उन पर पड़ी।
आज सुनील की आवाज़ ‘हनुमान अंश’ में “Maine Tere Hi Bharose” गाने में सुनाई दे रही है। लोकल ट्रेन से बड़े पर्दे तक का ये सफर सिर्फ एक गायक की कहानी नहीं ये कहानी है उम्मीद, हुनर और कभी हार न मानने की।

@suneel_lodhi.singer

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ट्रेन में गाने से लेकर Hanuman Ansh तक दृष्टिहीन गायक Suneel Lodhi का शानदार सफर | Maine Tere Hi Bharose।

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दो बच्चों की जिम्मेदारी अकेले उठा रही ‘भोपाली ऑटोवाली’ | Rajkumari Bhadauria | Bhopal | Autowali

दो बच्चों की जिम्मेदारी अकेले उठा रही  ‘भोपाली ऑटोवाली’ | Rajkumari Bhadauria | Bhopal | Autowali

पति के निधन के बाद घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए ऑटो चलाना शुरू किया। शुरुआत में लोगों के ताने मिले, लेकिन राजकुमारी भदौरिया रुकी नहींं। आज सोशल मीडिया पर ‘भोपाली ऑटोवाली’ के नाम से पहचानी जाती हैं और कई महिलाओं को भी ऑटो चलाने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

@autowali_didi

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मुश्किलें बड़ी थीं, हौसला उससे भी बड़ा! पैरों से लिखकर रच रही इतिहास 13 साल की बच्ची

13 साल की लक्ष्मी अपनी हिम्मत और मेहनत से लोगों को इंस्पायर कर रही हैं। शरीर से विकलांग होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को रुकने नहीं दिया और अपने स्कूल का काम पूरा करने का रास्ता खुद खोज लिया। वह पैरों से लिखकर अपनी पढ़ाई जारी रख रही हैं और हर दिन यह साबित कर रही हैं कि मुश्किल हालात भी किसी के हौसले को रोक नहीं सकते।

सरकारी स्कूल की चौथी कक्षा में पढ़ने वाली स्टूडेंट का जज्बा उन बच्चों के लिए भी इंस्पिरेशन है, जो किसी न किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। उनके लिए पढ़ाई सिर्फ स्कूल का काम नहीं, बल्कि अपने सपनों की ओर बढ़ने का एक जरिया है। उनकी मेहनत और आत्मविश्वास हमें सिखाता है कि हालात चाहे जैसे हों, कोशिश जारी रखी जाए तो रास्ता जरूर निकाला जा सकता है।

 

1. लक्ष्मी का डेली रूटीन

लक्ष्मी का स्कूल का रोज काम करने का तरीका काफी अलग है। वह अपने स्कूल बैग के पास बैठकर सबसे पहले उसे खोलती हैं और अपने पैरों की मदद से बैग के अंदर रखा सामान बाहर निकालती हैं। वह नोटबुक और पेन को सावधानी से निकालती हैं, फिर कॉपी को अपने सामने सही जगह पर रखती हैं। इसके बाद वह पन्ने पलटकर अपना काम शुरू कर देती हैं। आम बच्चों के लिए ये छोटे-छोटे काम बहुत आसान होते हैं, लेकिन लक्ष्मी को इन्हें करने के लिए ज्यादा मेहनत और ध्यान लगाना पड़ता है। इसके बावजूद वह किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपने काम खुद करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने धीरे-धीरे इस तरीके को अपना डेली रूटीन बना लिया है।

 

2. पढ़ाई के प्रति लगन

लक्ष्मी की पढ़ाई के प्रति लगन उनकी सबसे खास बात है। वह अपने पैरों से पेन पकड़कर कॉपी में लिखती हैं और इसी तरह अपना स्कूल का काम पूरा करती हैं। वीडियो में वह बिना किसी जल्दबाजी के पूरे ध्यान से लिखती हुई दिखाई देती हैं। उनके लिए लिखना और कॉपी संभालना आसान नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लिया है। जिस काम के लिए दूसरे बच्चों को हाथों का सहारा मिलता है, उसके लिए लक्ष्मी अपने पैरों का इस्तेमाल करती हैं। इसके लिए उन्हें रोज अभ्यास और मेहनत करनी पड़ती होगी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी पढ़ाई के बीच रुकावट नहीं बनने दिया। उनका शांत तरीके से अपने काम पर ध्यान देना दिखाता है कि वह अपनी पढ़ाई को लेकर कितनी गंभीर हैं।

 

3. बनी आम जनता की प्रेरणा

लक्ष्मी की लोगों ने उनकी मेहनत और हिम्मत की जमकर तारीफ की। कई लोगों को उनकी एकाग्रता और पढ़ाई के प्रति लगन काफी पसंद आई। लोगों ने उनके लिए अच्छे भविष्य, खुशी और सफलता की कामना करते हुए रियेक्ट किया। किसी ने उनकी तारीफ करते हुए उन्हें बहुत हिम्मती बताया, तो किसी ने उनके जज्बे को देखकर इंस्पिरेशन मिलने की बात कही। यही कारण है कि उनकी छोटी सी कोशिश कई लोगों के लिए इंस्पिरेशन बन गयी।

 

4. आगे बढ़ने का तरीका

लक्ष्मी की कहानी सिर्फ उनके स्कूल का काम करने या पैरों से लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों को आगे बढ़ने का मौका देने की जरूरत भी दिखाती है। दिव्यांग बच्चों के लिए ऐसा माहौल होना जरूरी है, जहां वे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर सकें और बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सकें। उनकी कहानी हमें यह समझाती है कि हर बच्चे के सीखने और आगे बढ़ने का तरीका अलग हो सकता है।

13 साल की लक्ष्मी की यह कहानी पढ़ाई के प्रति लगन को दिखाती है। पैरों से लिखकर स्कूल का काम पूरा करना उनके लिए आसान नहीं है, फिर भी उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को पढ़ाई के रास्ते में रुकावट नहीं बनने दिया। जो हमें सिखाती है कि सही मौका, सहयोग और मजबूत इरादे मिलें तो मुश्किल रास्ते भी आसान किए जा सकते हैं।

पति ने छोड़ा, डॉक्टरों ने जवाब दिया,फिर भी इस माँ ने अकेले जीती ज़िंदगी| Single Mother Inspirational

बेटे के जन्म के सिर्फ़ 2 दिन बाद, पति मुझे छोड़कर चले गए।

डॉक्टरों ने कहा- ‘शायद अब तुम कभी चल नहीं पाओगी।’
5 सर्जरी, दोबारा चलना सीखना, काम पर लौटना, दोबारा काम शुरू किया। और अपनी ज़िंदगी, एक-एक कदम जोड़कर फिर से बनाई।
आज मैं अपने बेटे को अकेले पाल रही हूँ।
उसे सिर्फ़ अच्छी ज़िंदगी नहीं, अच्छी सोच भी देना चाहती हूँ।
क्योंकि उसके पिता ने एक औरत को उसकी सबसे मुश्किल घड़ी में छोड़ दिया था।
लेकिन मैं ऐसा बेटा बड़ा कर रही हूँ, जो हर औरत का सम्मान करेगा, उसका साथ देगा और कभी उसे अकेला महसूस नहीं होने देगा। -मेघा पटेल

@mizzel_79
@winning_mumma
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पति ने छोड़ा, डॉक्टरों ने जवाब दिया,फिर भी इस माँ ने अकेले जीती ज़िंदगी | Single Mother Inspirational Story

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अपनी Pocket Money से बेजुबानों का पेट भरता है ये 10वीं का छात्र | Young Boy feeding birds

राजस्थान के भीलवाड़ा के हिमांशु अपनी पॉकेट मनी से हर दिन पक्षियों के लिए दाना, फल और पानी की व्यवस्था करते हैं। 30 दिनों के एक छोटे से चैलेंज से शुरू हुई उनकी पहल आज 100 दिनों के सफ़र में बदल चुकी है। शुरुआत में लोगों ने उनका विरोध किया, लेकिन आज उनकी कहानी कई लोगों को बेजुबान पक्षियों की मदद करने के लिए प्रेरित कर रही है।
अगर आपको भी यह कहानी पसंद आए, तो अपने घर की छत या बालकनी में पक्षियों के लिए थोड़ा-सा दाना और एक कटोरी पानी ज़रूर रखें।

@himanshu_sahu_7773

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‘काम नहीं छोड़ेंगे हम बिहारी ऐसे ही होते हैं…’, महीने की 80,000 कमाई…दिल का दौरा पड़ने के बाद भी 12 घंटे Uber चला रहा शख्स

सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक पोस्ट ने दिल्ली के एक उबर ड्राइवर की ओर लोगों का ध्यान खींचा है, जिन्होंने आराम के बजाय अपने काम को चुना। हालांकि उन्हें किराए से हर महीने ₹80,000 की कमाई होती है, फिर भी हार्ट अटैक से उबरने के बाद भी वे घंटों तक गाड़ी चलाते हैं। वे यह साबित करने के लिए ऐसा करते हैं कि सेहत से जुड़ी इस मुश्किल ने उन्हें “बेकार” नहीं बना दिया है।

इस कहानी को कंटेंट क्रिएटर आस्था सेठ ने इंस्टाग्राम पर शेयर किया। उन्होंने बताया कि राइड के दौरान हुई एक आम बातचीत उनके लिए सबसे यादगार मुलाकातों में से एक बन गई। सेठ के अनुसार, ड्राइवर बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है और पहले दिल्ली में अपने एक रिश्तेदार की फ़ैक्ट्री में काम करता था। हालाँकि, पिछले साल हार्ट अटैक आने के बाद उसकी ज़िंदगी ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। उन्होंने बताया कि उसके रिश्तेदार का मानना ​​था कि वह अब शारीरिक रूप से मेहनत वाले काम करने में सक्षम नहीं है, इसलिए उन्होंने उसे फ़ैक्ट्री छोड़ने के लिए कह दिया।

उस बातचीत को याद करते हुए सेठ ने लिखा, “यह व्यक्ति बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला है। पहले वह दिल्ली में अपने एक रिश्तेदार की फैक्ट्री में काम करता था और अच्छी कमाई करता था, लेकिन पिछले साल उसे दिल का दौरा पड़ा। इसके बाद उसके रिश्तेदार ने उससे कहा कि अब वह किसी काम का नहीं रहा क्योंकि वह ताकत वाला कोई काम नहीं कर सकता, और उसे फैक्ट्री से निकाल दिया। लेकिन वह व्यक्ति यहीं नहीं रुका।”

उन्होंने आगे बताया कि ड्राइवर के पास नोएडा इलेक्ट्रॉनिक सिटी के पास एक रेजिडेंशियल सोसाइटी में दो फ्लैट हैं, जिनकी कुल कीमत लगभग ₹80 लाख है और जिनसे हर महीने लगभग ₹80,000 का किराया मिलता है। पास काम छोड़कर आराम करने और घर पर रहने का विकल्प था और अब भी है। लेकिन उन्होंने उबर ड्राइवर के तौर पर काम करना चुना है।”

पैसिव इनकम का एक पक्का ज़रिया होने के बावजूद, ड्राइवर सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक काम करते हैं और हर महीने अतिरिक्त 50,000 कमाते हैं। सेठ के अनुसार, उनके काम करने की वजह सिर्फ़ पैसों की ज़रूरत से कहीं ज़्यादा है। ये सिर्फ़ उन लोगों को यह दिखाने के लिए कि हार्ट अटैक की वजह से वे बेकार या किसी काम के नहीं हो गए हैं। उनकी 2 बेटियां हैं, जिनके लिए उन्होंने ये 2 फ्लैट बचाकर रखे हैं। बिहार में उनकी पुश्तैनी संपत्ति भी है। लेकिन फिर भी वे काम कर रहे हैं।”

36 हजार रुपये कमाता है पर हर महीने 15 हजार गरीबों को खाना खिलाने में कर देता है खर्च! दिल्ली के डिलीवरी बॉय आकाश की कहानी गजब

जब बात दूसरों की मदद करने की आती है तो अक्सर लोग अपनी जेब और बैंक बैलेंस देखने लगते हैं। बहुत से लोग अपनी पूरी सैलरी खुद के घर के खर्चों और बचत में ही लगा देते हैं। लेकिन दिल्ली में रहने वाले एक डिलीवरी राइडर ने इंसानियत की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है जिसे जानकर हर कोई हैरान है। यह कहानी है आकाश सरोज की जो पेशे से एक फूड डिलीवरी बॉय हैं। वह अपनी मेहनत की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन अजनबी और बेघर लोगों के पेट भरने में लगा देते हैं जो सड़कों पर भूखे सोते हैं। वह हर दिन पूरी शिद्दत से अपने इस मिशन को निभा रहे हैं।

डिलीवरी के बाद शुरू होती है असली ड्यूटी

आकाश सरोज पिछले छह सालों से दिल्ली की सड़कों पर एक डिलीवरी एग्जीक्यूटिव के रूप में काम कर रहे हैं। दिनभर अपनी बाइक दौड़ाकर लोगों के घरों तक खाना पहुंचाने वाले आकाश की असली ड्यूटी तब शुरू होती है जब उनके काम की शिफ्ट खत्म होती है। काम खत्म होने के बाद वह घर जाकर आराम करने के बजाय खुद अपने हाथों से गर्म भोजन तैयार करते हैं। इसके बाद वह दिल्ली के उन इलाकों का रुख करते हैं जहां बेघर और जरूरतमंद लोग रहते हैं ताकि कोई भी इंसान भूखा न सोए।

दिल्ली के इन इलाकों में बांटते हैं खाना

आकाश मुख्य रूप से दिल्ली के इन चार बड़े इलाकों में सक्रिय रहते हैं और घूम-घूम कर भूखों को भोजन कराते हैं। इसमें पीतमपुरा, रोहिणी, जहांगीरपुरी और जीटीबी नगर शामिल हैं।

अपनी कमाई का 40% से ज्यादा हिस्सा करते हैं खर्च, नहीं लेते कोई डोनेशन

आकाश के इस नेक काम के पीछे कोई बड़ा स्पॉन्सर, एनजीओ या बाहरी डोनेशन नहीं है। वह इस पूरे अभियान का खर्च अपनी खुद की जेब से उठाते हैं। आकाश डिलीवरी के काम से प्रतिदिन औसतन करीब ₹1200 कमाते हैं। यानी उनकी मंथली इनकम करीब ₹36000 होती है। इस कमाई में से वह हर दिन लगभग 500 रुपये जरूरतमंदों के लिए भोजन तैयार करने और उनकी मदद करने में खर्च कर देते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि आकाश अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई का 40 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा उन अनजान लोगों के लिए गर्म खाना बनाने में लगा देते हैं जिनसे उनका कोई खून का रिश्ता तक नहीं है।

सोशल मीडिया से नहीं मिलता ₹1 भी

आकाश अपनी इस फूड ड्राइव के वीडियो रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर भी शेयर करते हैं। इन वीडियोज में सिर्फ खाना बांटना ही नहीं बल्कि बेघर लोगों के चेहरे की मुस्कान और उनके साथ की गई खूबसूरत बातचीत भी कैद होती है। हालांकि इंटरनेट पर अपनी बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद आकाश ने स्पष्ट किया कि मैं इंस्टाग्राम से जीरो रुपये कमाता हूं, मेरी फूड ड्राइव का 100% खर्च मेरी डिलीवरी की कमाई से ही आता है।

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स्वर्गीय पिता के संस्कार और सीख है सबसे बड़ी प्रेरणा

जब आकाश से हिंदुस्तान टाइम्स ने पूछा कि इतनी मामूली इनकम के बावजूद उन्हें हर दिन इस काम को करने की प्रेरणा कहां से मिलती है, तो उनका जवाब बेहद भावुक करने वाला था। आकाश ने कहा कि ये मेरे पिता के मूल्य और संस्कार। मैं बस यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि कोई भी इंसान भूखा न सोए।

आकाश का यह काम दिखने में जितना आसान लगता है असल जिंदगी में इसे रोज करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। एक फुल-टाइम डिलीवरी जॉब के साथ रोज भोजन तैयार करना और उसे बांटना बेहद थका देने वाला होता है। पैसे कमाने से लेकर, खर्चों की प्लानिंग करना, खुद खाना बनाना और फिर सही समय पर उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने की पूरी जिम्मेदारी अकेले आकाश के कंधों पर होती है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट अन्य मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट पर आधारित है। इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।

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