पिता के हाथ में लगी चोट, तो ऑटो चलाकर बेटियों ने संभाला परिवार  | The Better India Hindi

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जम्मू-कश्मीर के उधमपुर की बंजीत और देविंदर ने पिता के हाथ में चोट लगने के बाद ऑटो चलाकर परिवार की जिम्मेदारी संभाल ली। आज दोनों बहनें ऑटो चलाकर परिवार का खर्च उठाने में पिता का साथ दे रही हैं और अपनी पढ़ाई भी जारी रख रही हैं। लोगों की बातों की परवाह किए बिना ये बहनें दिखा रही हैं कि बेटियां सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी भी उठाती हैं। देखिए इन Jammu Kashmir sisters की inspiring journey.

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जिस Gaitonde पर लोग थूकने वाले थे, वही बना कमलेश की पहचान

जिस Gaitonde पर लोग थूकने वाले थे, वही बना कमलेश की पहचान

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कहते हैं, मुंबई वो नगरी है,जहाँ कई साधारण लोग असाधारण बन जाते हैं। लेकिन इसी शहर में करोड़ों ख़्वाब पहचान मिलने से पहले ही टूट भी जाते हैं। लेकिन कमलेश सावंत का ख़्वाब नहीं टूटा। बस उसे पूरा होने में वक्त बहुत लगा।

Kamlesh Sawant, जिन्हें आज लोग Drishyam के Gaitonde के नाम से जानते हैं।

एक चॉल से निकला लड़का थिएटर से शुरुआत की, मिमिक्री की, और करीब 17 साल के संघर्ष के बाद पहली बार बड़े पर्दे पर अपना हुनर को सबके सामने लाया।
लेकिन उसके बाद क्या? क्या सब कुछ बदल गया? बिल्कुल नहीं। फिल्मों में काम तो मिलने लगा, लेकिन जिस पहचान का ख़्वाब था, वो अभी भी दूर थी। 

और उस पहचान तक पहुँचने में उन्हें करीब 11 साल और लगे। इस बीच उतार-चढ़ाव आए, पैसे अटके, इंतज़ार लंबा होता गया। लेकिन एक चीज़ नहीं बदली,
वो ख़्वाब… एक्टर बनने का।

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Kamlesh Sawant’s inspiring journey from a Mumbai chawl and theatre artist to becoming the iconic Gaitonde in Drishyam, overcoming years of struggle and building his identity in Bollywood.

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मुश्किलें बड़ी थीं, हौसला उससे भी बड़ा! पैरों से लिखकर रच रही इतिहास 13 साल की बच्ची

13 साल की लक्ष्मी अपनी हिम्मत और मेहनत से लोगों को इंस्पायर कर रही हैं। शरीर से विकलांग होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को रुकने नहीं दिया और अपने स्कूल का काम पूरा करने का रास्ता खुद खोज लिया। वह पैरों से लिखकर अपनी पढ़ाई जारी रख रही हैं और हर दिन यह साबित कर रही हैं कि मुश्किल हालात भी किसी के हौसले को रोक नहीं सकते।

सरकारी स्कूल की चौथी कक्षा में पढ़ने वाली स्टूडेंट का जज्बा उन बच्चों के लिए भी इंस्पिरेशन है, जो किसी न किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। उनके लिए पढ़ाई सिर्फ स्कूल का काम नहीं, बल्कि अपने सपनों की ओर बढ़ने का एक जरिया है। उनकी मेहनत और आत्मविश्वास हमें सिखाता है कि हालात चाहे जैसे हों, कोशिश जारी रखी जाए तो रास्ता जरूर निकाला जा सकता है।

 

1. लक्ष्मी का डेली रूटीन

लक्ष्मी का स्कूल का रोज काम करने का तरीका काफी अलग है। वह अपने स्कूल बैग के पास बैठकर सबसे पहले उसे खोलती हैं और अपने पैरों की मदद से बैग के अंदर रखा सामान बाहर निकालती हैं। वह नोटबुक और पेन को सावधानी से निकालती हैं, फिर कॉपी को अपने सामने सही जगह पर रखती हैं। इसके बाद वह पन्ने पलटकर अपना काम शुरू कर देती हैं। आम बच्चों के लिए ये छोटे-छोटे काम बहुत आसान होते हैं, लेकिन लक्ष्मी को इन्हें करने के लिए ज्यादा मेहनत और ध्यान लगाना पड़ता है। इसके बावजूद वह किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपने काम खुद करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने धीरे-धीरे इस तरीके को अपना डेली रूटीन बना लिया है।

 

2. पढ़ाई के प्रति लगन

लक्ष्मी की पढ़ाई के प्रति लगन उनकी सबसे खास बात है। वह अपने पैरों से पेन पकड़कर कॉपी में लिखती हैं और इसी तरह अपना स्कूल का काम पूरा करती हैं। वीडियो में वह बिना किसी जल्दबाजी के पूरे ध्यान से लिखती हुई दिखाई देती हैं। उनके लिए लिखना और कॉपी संभालना आसान नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लिया है। जिस काम के लिए दूसरे बच्चों को हाथों का सहारा मिलता है, उसके लिए लक्ष्मी अपने पैरों का इस्तेमाल करती हैं। इसके लिए उन्हें रोज अभ्यास और मेहनत करनी पड़ती होगी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी पढ़ाई के बीच रुकावट नहीं बनने दिया। उनका शांत तरीके से अपने काम पर ध्यान देना दिखाता है कि वह अपनी पढ़ाई को लेकर कितनी गंभीर हैं।

 

3. बनी आम जनता की प्रेरणा

लक्ष्मी की लोगों ने उनकी मेहनत और हिम्मत की जमकर तारीफ की। कई लोगों को उनकी एकाग्रता और पढ़ाई के प्रति लगन काफी पसंद आई। लोगों ने उनके लिए अच्छे भविष्य, खुशी और सफलता की कामना करते हुए रियेक्ट किया। किसी ने उनकी तारीफ करते हुए उन्हें बहुत हिम्मती बताया, तो किसी ने उनके जज्बे को देखकर इंस्पिरेशन मिलने की बात कही। यही कारण है कि उनकी छोटी सी कोशिश कई लोगों के लिए इंस्पिरेशन बन गयी।

 

4. आगे बढ़ने का तरीका

लक्ष्मी की कहानी सिर्फ उनके स्कूल का काम करने या पैरों से लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों को आगे बढ़ने का मौका देने की जरूरत भी दिखाती है। दिव्यांग बच्चों के लिए ऐसा माहौल होना जरूरी है, जहां वे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर सकें और बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सकें। उनकी कहानी हमें यह समझाती है कि हर बच्चे के सीखने और आगे बढ़ने का तरीका अलग हो सकता है।

13 साल की लक्ष्मी की यह कहानी पढ़ाई के प्रति लगन को दिखाती है। पैरों से लिखकर स्कूल का काम पूरा करना उनके लिए आसान नहीं है, फिर भी उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को पढ़ाई के रास्ते में रुकावट नहीं बनने दिया। जो हमें सिखाती है कि सही मौका, सहयोग और मजबूत इरादे मिलें तो मुश्किल रास्ते भी आसान किए जा सकते हैं।