14 साल तक पहनी एयरफोर्स की वर्दी, अब देहरादून में चलाती है बुटिक! वजह सुन आप भी करेंगे सलाम

14 साल तक भारतीय वायु सेना में नौकरी करने के बाद एक पूर्व महिला अधिकारी ने अपनी रोज की जिंदगी को बदलने का फैसला किया। उन्होंने नौकरी छोड़ी और देहरादून वापस आकर कपड़ों की दुकान शुरू कर ली। उनका यह कदम किसी बड़े सपने को पूरा करने के लिए नहीं था, बल्कि एक खास वजह से लिया गया भावनात्मक फैसला था।

आखिर क्या है इस फैसले की वजह?

इस महिला का इंस्टाग्राम पर @thefaujifounder नाम से एक अकाउंट है, जहां उन्होंने एक वीडियो में अपनी कहानी बताई। उन्होंने कहा कि उनकी दुकान पर आने वाले लोग उनसे पूछते हैं कि आखिर वायु सेना की अधिकारी से वह कपड़ों की दुकान चलाने वाली कैसे बन गईं। उन्होंने बताया कि उन्होंने शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी के तौर पर 14 साल तक सेवा की, लेकिन नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें लगा कि अब परिवार के साथ रहना ज्यादा जरूरी है। उनके बच्चे बड़े हो रहे थे और माता-पिता भी बुजुर्ग हो रहे थे।

इसके बाद वह देहरादून लौट आईं। उनका घर उनकी दुकान से सिर्फ 100 मीटर दूर है। उन्हें कपड़ों और क्रिएटिव काम में इंटरेस्ट थी, इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यों न ऐसा काम किया जाए, जिससे परिवार के पास रहने को भी मिल सके। इसी सोच के साथ उन्होंने कपड़ों की दुकान शुरू कर दी।

सोशल मीडिया पर पसंद आई उनकी यह कहानी

वह कहती है कि उनका यह फैसला किसी बड़े मुकाम तक पहुंचने के लिए नहीं था। वह बस अपने बच्चों के साथ रहकर जिंदगी को मजे से जीना चाहती थीं। उनकी कहानी सोशल मीडिया पर भी लोगों को पसंद आई। कई लोगों ने कहा – परिवार के साथ समय बिताना बहुत कीमती और यादगार पल होता है।

ये कहानी इसलिए लोगों के दिल को छू रही है क्योंकि इसमें कोई मोटिवेशनल ज्ञान नहीं है। एक मां का सिंपल फैसला है – करियर से ज्यादा जरूरी है परिवार के साथ रहना।

सोशल मीडिया पर लोग कमेंट कर रहे हैं – आपने वर्दी उतारी है, जज्बा नहीं।

8 साल की IPS सेवा के बाद कॉर्पोरेट की दुनिया में कदम, राजन सिंह ने ऐसे रची सफलता की नई कहानी!

एक नौकरी से शुरू हुआ सफर, जिसने राजन सिंह को पहुंचाया अलग-अलग करियर तक

राजन सिंह का करियर किसी एक तय रास्ते पर नहीं चला। IIT कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने सिविल सर्विस का रास्ता चुना और IPS में शामिल हुए। करीब आठ साल पुलिस सेवा में रहने के बाद उन्होंने MBA के लिए अमेरिका का रुख किया। इसके बाद कंसल्टिंग, प्राइवेट इक्विटी और फिर अपना बिजनेस शुरू करने तक उनका सफर पहुंचा। इस दौरान उन्होंने कई बार अपना करियर बदला और हर नए पड़ाव पर एक अलग तरह का अनुभव हासिल किया।

IIT के बाद चुनी पुलिस की राह

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजन सिंह ने सामान्य इंजीनियरिंग करियर में जाने के बजाय सिविल सेवा परीक्षा दी। सितंबर 1997 में उन्होंने IPS जॉइन किया और केरल के करुणागप्पल्ली में ASP के तौर पर पहली पोस्टिंग मिली। कुछ ही सालों में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ीं और 2001 तक वह तिरुवनंतपुरम के पुलिस कमिश्नर बन गए। उस समय वह इस पद पर पहुंचने वाले कम उम्र के अधिकारियों में शामिल थे।

पुलिस सेवा छोड़कर पहुंचे Wharton

2004 में पुलिस कमिश्नर रहते हुए उनके करियर ने एक नया मोड़ लिया। एक पुलिस ऑपरेशन के दौरान उन्हें अपने साथी IPS अधिकारी के Wharton MBA में एडमिशन की जानकारी मिली। इस घटना ने उन्हें अपने आगे के करियर के बारे में सोचने पर मजबूर किया। करीब आठ साल पुलिस सेवा में बिताने के बाद उन्होंने जुलाई 2005 में IPS छोड़ दिया और Wharton के MBA प्रोग्राम में दाखिला लिया। 2007 में MBA पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में McKinsey & Company के साथ कंसल्टेंट के तौर पर काम शुरू किया।

कंसल्टिंग के बाद इन्वेस्टमेंट की दुनिया

McKinsey में काम करते हुए राजन ने इंश्योरेंस, फार्मा, बायोटेक्नोलॉजी और बैंकिंग जैसे अलग-अलग सेक्टर की कंपनियों के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने प्राइवेट इक्विटी फर्म New Silk Route का रुख किया। यहां उन्हें कंपनियों और कारोबार को एक इन्वेस्टर की नजर से समझने का मौका मिला। इसी दौरान उन्होंने यह भी करीब से देखा कि कोई व्यक्ति सुरक्षित प्रोफेशनल करियर चुनने के बजाय अपना नया बिजनेस शुरू करने का जोखिम क्यों लेता है।

पहला स्टार्टअप नहीं चला, फिर भी नहीं रुके

2012 में राजन ने Course Brew नाम से ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू किया। यह उनका एंटरप्रेन्योर के तौर पर शुरुआती बड़ा प्रयोग था, लेकिन यह बिजनेस ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। इसके बाद उन्होंने दोबारा कोशिश की और ConceptOwl शुरू किया। इसका मकसद छोटे शहरों के छात्रों को अच्छी साइंस और मैथ्स की पढ़ाई उनके अपने शहरों के करीब उपलब्ध कराना था। कंपनी ने ऑनलाइन पढ़ाई के साथ क्लासरूम प्रोग्राम पर भी काम किया। एक समय शिक्षकों की कमी हुई तो राजन ने खुद फिजिक्स पढ़ाना शुरू कर दिया। कंपनी ने आगे चलकर निवेश भी जुटाया और एजुकेशन सेक्टर में अपना मॉडल आगे बढ़ाया।

ConceptOwl से HabitStrong तक पहुंचा सफर

कोरोना महामारी के दौरान राजन और उनकी टीम ने रूटीन, आदतों और प्रोडक्टिविटी से जुड़े कार्यक्रमों पर काम करना शुरू किया। इसी प्रयोग से HabitStrong का आइडिया सामने आया। शुरुआत सुबह जल्दी उठने वाले एक साधारण YouTube प्रोग्राम से हुई, जिसे करीब 100 दिनों तक आजमाया गया। लोगों से मिले अनुभवों के बाद इसे एक स्ट्रक्चर्ड प्रोग्राम का रूप दिया गया। 2020 में शुरू हुए HabitStrong का फोकस बेहतर रूटीन बनाने, कंसंट्रेशन बढ़ाने और डिजिटल डिस्ट्रक्शन कम करने जैसी चीजों पर रहा। इस तरह उनका सफर शिक्षा से आगे बढ़कर हैबिट्स और प्रोडक्टिविटी के क्षेत्र तक पहुंच गया।

राजन सिंह की कहानी की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया, बल्कि यह है कि हर बदलाव के बाद उन्होंने खुद को नए काम के लिए तैयार किया। इंजीनियरिंग से पुलिस सेवा, फिर MBA, कंसल्टिंग, निवेश और आखिर में स्टार्टअप तक का यह सफर दिखाता है कि करियर हमेशा एक ही दिशा में आगे बढ़े, यह जरूरी नहीं। कई बार अलग-अलग अनुभव मिलकर आगे के काम के लिए नई सोच और नए मौके तैयार करते हैं।

59 की उम्र में करियर ने लिया यू-टर्न! नौकरी छूटने के बाद ये महिला पहुंचीं अंटार्कटिका

59 साल की उम्र में जब मे ली अंटार्कटिका पहुंचीं, तो उनकी नई नौकरी में टेक्नोलॉजी या ऑफिस का काम नहीं, बल्कि फोर्कलिफ्ट, कार्गो और जमा देने वाली ठंड उनका इंतजार कर रही थी। मैकमर्डो रिसर्च स्टेशन पर उन्होंने सामान संभालने का काम शुरू किया। खास बात यह है कि इससे पहले ली ने करीब 30 साल ह्यूलेट-पैकार्ड (HP) जैसी टेक्नोलॉजी कंपनी में काम किया था और उन्हें उम्मीद थी कि वह इसी कंपनी से रिटायर होंगी। उनकी आगे की कहानी बताती है ली के अंटार्कटिका पहुंचने के बाद के अनुभव, वहां के काम और बेहद ठंडे माहौल में जिंदगी कैसे बदली, इसकी कई दिलचस्प बातें भी सामने आती हैं।

लेकिन अचानक नौकरी जाने के बाद उनकी जिंदगी ने नया मोड़ ले लिया। लंबे कॉर्पोरेट करियर के बाद उन्हें नई नौकरी की तलाश करनी पड़ी और इसी दौरान उन्हें अंटार्कटिका में काम करने का मौका मिला। बिल्कुल अलग माहौल में काम करना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इस बदलाव को स्वीकार किया और एक नई तरह की जिंदगी का अनुभव किया। उनकी यह कहानी बताती है कि करियर में बदलाव के लिए उम्र हमेशा रुकावट नहीं बनती।

नौकरी जाने के बाद बदली सोच

HP में करीब 30 साल काम करने के बाद जब 59 साल की उम्र में ली की नौकरी चली गई, तो उन्होंने फिर से टेक्नोलॉजी कंपनी में नौकरी तलाशना शुरू किया। उन्होंने दूसरी कंपनियों में आवेदन किया और अपने पुराने प्रोफेशनल संपर्कों से भी मदद ली, लेकिन अनुभव और रेफरल होने के बावजूद उन्हें जल्दी नौकरी नहीं मिली। करीब एक महीने की कोशिश के बाद एक दोस्त ने उन्हें सलाह दी कि सिर्फ अच्छी सैलरी वाली नौकरी तलाशने के बजाय ऐसा काम क्यों न किया जाए, जिसमें उन्हें सच में दिलचस्पी हो।

अंटार्कटिका से पहले ही था खास लगाव

ली के लिए अंटार्कटिका बिल्कुल अनजान जगह नहीं थी। वह पर्यटक के तौर पर पहले ही दो बार वहां जा चुकी थीं और इस जगह को लेकर उनकी दिलचस्पी बढ़ गई थी। दोस्त की सलाह के बाद उन्होंने सोचना शुरू किया कि अगर अंटार्कटिका उन्हें इतना पसंद है, तो क्यों न वहां घूमने के बजाय काम करने का मौका तलाशा जाए। इसके बाद उन्होंने रिसर्च स्टेशनों पर मिलने वाली नौकरियों के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की।

सप्लाई टेक्नीशियन की मिली नौकरी

रिसर्च करने के दौरान ली को Amentum में काम करने का मौका मिला। यह कंपनी अमेरिकी अंटार्कटिक कार्यक्रम को कई तरह की सेवाएं देती है। ली ने यहां सप्लाई टेक्नीशियन की नौकरी के लिए आवेदन किया। इसके लिए आवेदन प्रक्रिया के साथ बैकग्राउंड चेक और शारीरिक जांच से भी गुजरना पड़ा। आखिरकार उनका चयन हो गया। इस नौकरी में सैलरी उनकी पिछली नौकरी के मुकाबले काफी कम थी, लेकिन उनके पास बचत थी और घर का लोन भी पहले ही चुका चुकी थीं, इसलिए उन्हें तुरंत ज्यादा सैलरी वाली नौकरी की जरूरत नहीं थी।

2025 में पहुंचीं मैकमर्डो स्टेशन

ली 2025 में अंटार्कटिका पहुंचीं। उनकी यात्रा ऑकलैंड और क्राइस्टचर्च से होते हुए आगे बढ़ी और फिर उन्होंने बोइंग C-17 ग्लोबमास्टर III विमान से अंटार्कटिका की यात्रा की। मैकमर्डो स्टेशन पहुंचने के बाद उन्होंने IT और कम्युनिकेशन्स वेयरहाउस में काम शुरू किया। यहां उनका काम सामान और सप्लाई से जुड़ा था, जो उनके पुराने कॉर्पोरेट काम से काफी अलग अनुभव था।

काम के साथ मिली नई तरह की जिंदगी

अंटार्कटिका में ली को सिर्फ नई नौकरी ही नहीं, बल्कि बिल्कुल अलग तरह की जिंदगी भी मिली। उन्होंने बताया कि वहां लोग फोन में व्यस्त रहने के बजाय खाने के समय साथ बैठकर बातचीत करते हैं। काम के अलावा उन्होंने आर्ट शो, लाइन डांसिंग, मैराथन और बिंगो जैसी गतिविधियों में हिस्सा लिया। उन्होंने DJ के तौर पर भी वॉलंटियर किया और 1980 के दशक के संगीत पर साप्ताहिक शो होस्ट किया। स्टेशन पहुंचने के करीब एक हफ्ते के अंदर ही उन्हें महसूस होने लगा कि वह इस नई जिंदगी में खुद को सहज महसूस कर रही हैं और यहीं रहना चाहती हैं।

अंटार्कटिका में बिताए समय ने ली के लिए सिर्फ करियर का रास्ता नहीं बदला, बल्कि जिंदगी को देखने का उनका नजरिया भी बदल दिया। लंबे समय तक कॉर्पोरेट दुनिया में काम करने के बाद उन्हें वहां ऐसा माहौल मिला, जहां लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं और साथ मिलकर रहते हैं। इस अनुभव से उन्हें समझ आया कि जिंदगी हमेशा हमारी सोची हुई योजना के मुताबिक नहीं चलती, लेकिन बदलाव आने पर उसके साथ आगे बढ़ना सीखा जा सकता है। ली की कहानी बताती है कि नौकरी छूटना या करियर में बदलाव आना किसी नई शुरुआत का रास्ता भी बन सकता है। उम्र या पुराना करियर किसी को खुद के लिए नई राह चुनने से नहीं रोकता। कभी-कभी जिंदगी में आया अचानक बदलाव ही इंसान को ऐसा अनुभव दे जाता है, जिसकी उसने पहले कभी कल्पना भी नहीं की होती।

कोडिंग छोड़कर जंगलों में रहकर, जानवरों से सीखा बिजनेस और खड़ा कर दिया करोड़ों का स्टार्टअप!

13 साल तक टेक्नोलॉजी की दुनिया में काम करने के बाद हैदराबाद के एक इंजीनियर ने अपना करियर बदलने का फैसला किया। उन्होंने IT की नौकरी छोड़कर वाइल्डलाइफ के अपने पुराने शौक को ही बिजनेस का रूप दे दिया। इस तरह ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ की शुरुआत हुई, जो जानवरों और नेचर से मिलने वाली सीख को कॉर्पोरेट ट्रेनिंग से जोड़ती है। बिना किसी बाहरी फंडिंग के शुरू हुई इस कंपनी ने पहले ही साल करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया।

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टेक से वाइल्डलाइफ तक

2010 में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने हैदराबाद, चेन्नई और मुंबई में काम किया। इसके बाद 2014 में डेटा साइंस में मास्टर्स करने के लिए अमेरिका चले गए। IT में काम करते हुए भी उनका नेचर और जानवरों से प्यार कम नहीं हुआ। वीकेंड पर वह DSLR कैमरा लेकर जंगल और नेशनल पार्क घूमने निकल जाते थे। धीरे-धीरे भारत, अमेरिका और अफ्रीका के कई नेशनल पार्कों में ट्रैवल ने उनकी इस दिलचस्पी को और बढ़ा दिया।

 

 

फोटोग्राफी से मिला नया बिजनेस विजन

शुरुआत में वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी उनके लिए जानवरों की फोटो लेने का एक शौक था। लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि जंगल सिर्फ खूबसूरत तस्वीरों के लिए नहीं, बल्कि जानवरों का व्यवहार, उनका एक-दूसरे के साथ जुड़ाव और मुश्किल कंडीशन में उनका सर्वाइव करना इंसानों को भी बहुत कुछ सिखा सकता है। इसी सोच ने आगे चलकर उनके बिजनेस आइडिया की नींव रखी।

 

 

जंगली जानवरों ने सिखाया कॉर्पोरेट मैनेजमेंट

‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ में जंगल और जानवरों के उदाहरणों के जरिए कॉर्पोरेट टीमों को कई जरूरी बातें सिखाई जाती हैं। जैसे, शेरों से टीमवर्क, चींटियों से काम बांटने यानी डेलिगेशन और मधुमक्खियों से खतरे के समय मिलकर काम करने की सीख ली जाती है। इन उदाहरणों को लीडरशिप, टीमवर्क, मुश्किल समय में मजबूती से टिके रहने और माइंडफुलनेस जैसे सब्जेक्ट से जोड़ा जाता है।

 

 

जंगल बना ट्रेनिंग क्लासरूम

यह बिजनेस सिर्फ ऑफिस में बैठकर होने वाली सामान्य ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। कंपनी कॉर्पोरेट वर्कशॉप के साथ-साथ कई दिनों तक चलने वाले जंगल के एक्सपीरियंस भी कराती है। इन प्रोग्राम्स में टीम के लोगों को नेचर के पास ले जाकर ऐसी एक्टिविटी कराई जाती हैं, जिनसे वे लीडरशिप और मुश्किल हालात में सही फैसला लेने जैसी चीजें सीख सकें। इस तरह जंगल एक तरह से उनका अलग और अनोखा ट्रेनिंग क्लासरूम बन जाता है।

 

लाखों के आइडिया का हिट फॉर्मूला

इस अनोखे बिजनेस आइडिया को कॉर्पोरेट कंपनियों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना इन्वेस्टमेंट के शुरू हुई ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ ने अपने पहले साल में करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया। कंपनी ने परफेटी वैन मेले और सीमेंस डिजिटल जैसी कंपनियों के साथ काम किया है। इस बिजनेस में टेक्नोलॉजी और कॉर्पोरेट एक्सपेरिएंस को नेचर और वाइल्डलाइफ के जुनून के साथ जोड़कर एक बिल्कुल अलग तरह का मॉडल तैयार किया गया है।

 

यह कहानी बताती है कि करियर शिफ्ट करने के साथ अपने जुनून पर भरोसा करना भी जरूरी है। सही सोच और मेहनत के साथ पसंद के काम को भी एक सफल बिजनेस बनाया जा सकता है। नेचर से सीख लेकर शुरू किया गया यह अनोखा सफर दूसरों को भी अपनी स्किल और इंटरेस्ट को नए तरीके से देखने के लिए इंस्पिरेशन देता है।

मुश्किलें बड़ी थीं, हौसला उससे भी बड़ा! पैरों से लिखकर रच रही इतिहास 13 साल की बच्ची

13 साल की लक्ष्मी अपनी हिम्मत और मेहनत से लोगों को इंस्पायर कर रही हैं। शरीर से विकलांग होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को रुकने नहीं दिया और अपने स्कूल का काम पूरा करने का रास्ता खुद खोज लिया। वह पैरों से लिखकर अपनी पढ़ाई जारी रख रही हैं और हर दिन यह साबित कर रही हैं कि मुश्किल हालात भी किसी के हौसले को रोक नहीं सकते।

सरकारी स्कूल की चौथी कक्षा में पढ़ने वाली स्टूडेंट का जज्बा उन बच्चों के लिए भी इंस्पिरेशन है, जो किसी न किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। उनके लिए पढ़ाई सिर्फ स्कूल का काम नहीं, बल्कि अपने सपनों की ओर बढ़ने का एक जरिया है। उनकी मेहनत और आत्मविश्वास हमें सिखाता है कि हालात चाहे जैसे हों, कोशिश जारी रखी जाए तो रास्ता जरूर निकाला जा सकता है।

 

1. लक्ष्मी का डेली रूटीन

लक्ष्मी का स्कूल का रोज काम करने का तरीका काफी अलग है। वह अपने स्कूल बैग के पास बैठकर सबसे पहले उसे खोलती हैं और अपने पैरों की मदद से बैग के अंदर रखा सामान बाहर निकालती हैं। वह नोटबुक और पेन को सावधानी से निकालती हैं, फिर कॉपी को अपने सामने सही जगह पर रखती हैं। इसके बाद वह पन्ने पलटकर अपना काम शुरू कर देती हैं। आम बच्चों के लिए ये छोटे-छोटे काम बहुत आसान होते हैं, लेकिन लक्ष्मी को इन्हें करने के लिए ज्यादा मेहनत और ध्यान लगाना पड़ता है। इसके बावजूद वह किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपने काम खुद करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने धीरे-धीरे इस तरीके को अपना डेली रूटीन बना लिया है।

 

2. पढ़ाई के प्रति लगन

लक्ष्मी की पढ़ाई के प्रति लगन उनकी सबसे खास बात है। वह अपने पैरों से पेन पकड़कर कॉपी में लिखती हैं और इसी तरह अपना स्कूल का काम पूरा करती हैं। वीडियो में वह बिना किसी जल्दबाजी के पूरे ध्यान से लिखती हुई दिखाई देती हैं। उनके लिए लिखना और कॉपी संभालना आसान नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लिया है। जिस काम के लिए दूसरे बच्चों को हाथों का सहारा मिलता है, उसके लिए लक्ष्मी अपने पैरों का इस्तेमाल करती हैं। इसके लिए उन्हें रोज अभ्यास और मेहनत करनी पड़ती होगी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी पढ़ाई के बीच रुकावट नहीं बनने दिया। उनका शांत तरीके से अपने काम पर ध्यान देना दिखाता है कि वह अपनी पढ़ाई को लेकर कितनी गंभीर हैं।

 

3. बनी आम जनता की प्रेरणा

लक्ष्मी की लोगों ने उनकी मेहनत और हिम्मत की जमकर तारीफ की। कई लोगों को उनकी एकाग्रता और पढ़ाई के प्रति लगन काफी पसंद आई। लोगों ने उनके लिए अच्छे भविष्य, खुशी और सफलता की कामना करते हुए रियेक्ट किया। किसी ने उनकी तारीफ करते हुए उन्हें बहुत हिम्मती बताया, तो किसी ने उनके जज्बे को देखकर इंस्पिरेशन मिलने की बात कही। यही कारण है कि उनकी छोटी सी कोशिश कई लोगों के लिए इंस्पिरेशन बन गयी।

 

4. आगे बढ़ने का तरीका

लक्ष्मी की कहानी सिर्फ उनके स्कूल का काम करने या पैरों से लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों को आगे बढ़ने का मौका देने की जरूरत भी दिखाती है। दिव्यांग बच्चों के लिए ऐसा माहौल होना जरूरी है, जहां वे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर सकें और बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सकें। उनकी कहानी हमें यह समझाती है कि हर बच्चे के सीखने और आगे बढ़ने का तरीका अलग हो सकता है।

13 साल की लक्ष्मी की यह कहानी पढ़ाई के प्रति लगन को दिखाती है। पैरों से लिखकर स्कूल का काम पूरा करना उनके लिए आसान नहीं है, फिर भी उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को पढ़ाई के रास्ते में रुकावट नहीं बनने दिया। जो हमें सिखाती है कि सही मौका, सहयोग और मजबूत इरादे मिलें तो मुश्किल रास्ते भी आसान किए जा सकते हैं।

दोस्त से उधार लिया पोल और तोड़ डाला नेशनल रिकॉर्ड! मृत पिता की पासपोर्ट साइज फोटो हाथों में ले सिंधुश्री ने सुनाई रुला देने वाली कहानी

खेलों की दुनिया से अक्सर ऐसी कहानियां सामने आती हैं जो न सिर्फ आपको हैरान करती हैं बल्कि आपकी आंखों में आंसू भी ले आती हैं। ऐसा ही एक भावुक कर देने वाली सफलता पाई है कर्नाटक की 25 वर्षीय एथलीट जी सिंधुश्री ने। राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय चैंपियनशिप में सिंधुश्री ने न केवल महिलाओं के पोल वॉल्ट में एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम किया बल्कि गोल्ड मेडल जीतकर एशियाई खेलों का टिकट भी पक्का कर लिया है। इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे छिपी है बेहद तंगहाली, संघर्ष और एक बेटी के आंसुओं की वह कहानी जिसने वहां मौजूद हर शख्स को रुला दिया।

दोस्त से उधार लिया पोल और रच दिया इतिहास

सिंधुश्री के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह प्रतियोगिता के लिए एक सही पोल खरीद सकें। वित्तीय संकट के कारण वह अब तक छोटे पोल के साथ प्रतिस्पर्धा करने को मजबूर थीं। उन्होंने छोटे पोल के साथ ही अभ्यास किया और अपनी तकनीक सीखी, जिसके कारण फेडरेशन कप जैसे पिछले टूर्नामेंटों में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था क्योंकि ये पोल ढीले हो चुके थे। राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय चैंपियनशिप से ठीक दो हफ्ते पहले सिंधुश्री को उनके एक दोस्त से उधार में बड़ा पोल मिला। दोस्त से उधार मिले इसी पोल के सहारे कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के भद्रावती की रहने वाली इस अनजान खिलाड़ी ने वह कर दिखाया जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

सिंधुश्री ने 4.25 मीटर की ऊंचाई पार कर तमिलनाडु की एथलीट बारनिका इलांगोवन के एक महीने पुराने 4.20 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ दिया और इतिहास रच दिया। उन्होंने चेन्नई में मई के महीने में ‘इंडियन एथलेटिक्स सीरीज 6’ के दौरान बनाए गए अपने पिछले व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (4 मीटर) में पूरे 25 सेंटीमीटर का सुधार किया।

हाथों में मृत पिता की तस्वीर थामे भावुक हो गईं सिंधुश्री

जीत के बाद जब सिंधुश्री मीडिया के सामने आईं, तो उनके हाथों में उनके दिवंगत पिता आर गणेश की एक तस्वीर थी। भावुक सिंधुश्री ने बताया कि ‘साल 2022 में मेरे पिता का हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया था। मैंने आज जो कुछ भी हासिल किया है, वह सब मेरे पिता की बदौलत है। हर सुबह वह मुझे दौड़ने के लिए ले जाते थे और वह चाहते थे कि मैं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए खेलूं। मैं एशियाई खेलों में हिस्सा लेकर उनके इस सपने को पूरा करने जा रही हूं।’ उन्होंने आगे कहा कि मेरा चयन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स के लिए भी हुआ था, लेकिन तब मेरे पिता मेरा खेल देखने के लिए वहां नहीं थे। यह सब एक सपने जैसा लग रहा है और यह केवल मेरे पिता की वजह से मुमकिन हो पाया है।

परिवार के खिलाफ जाकर पिता ने दिलाया था दाखिला

सिंधुश्री ने बताया कि उनके परिवार में दूर-दूर तक कोई भी खेलों में नहीं था। परिवार के बाकी सदस्य एक लड़की को खेलों में भेजने के बिल्कुल खिलाफ थे। लेकिन उनके पिता ने समाज और परिवार के सभी लोगों से लड़ाई लड़ी और उन्हीं की जिद के कारण साल 2016 में सिंधुश्री बेंगलुरु के साई हॉस्टल में शामिल हो सकीं, जहां से उनके खेल के सफर की शुरुआत हुई।

 

बेहद तंगहाली में जी रहा है परिवार, नौकरी की तलाश

इस एथलीट का जीवन भारी आर्थिक तंगहाली में बीत रहा है। उनके पिता आर गणेश एक इलेक्ट्रिशियन थे और उनकी मां सिलाई का काम करती हैं। चूंकि मां की कमाई छोटी बहन की पढ़ाई में खर्च हो जाती है इसलिए सिंधुश्री के दादाजी उन्हें वित्तीय रूप से थोड़ा बहुत सहयोग कर रहे हैं। सिंधुश्री ने बताया कि मेरे पास कोई स्पॉन्सर नहीं है, कोई नौकरी नहीं है और गुजारा करना बेहद मुश्किल हो रहा है। मैं नौकरी की तलाश कर रही थी, लेकिन प्रदर्शन अच्छा न होने के कारण नौकरी नहीं मिल पा रही थी। मुझे उम्मीद है कि इस रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद मुझे नौकरी मिल जाएगी ताकि मैं अपने परिवार की मदद कर सकूं।

इससे पहले सिंधुश्री ने घरेलू स्तर पर सिर्फ एक बड़ा पदक जीता था, जब उन्होंने साल 2023 के नेशनल इंटर-स्टेट चैंपियनशिप में इसी मैदान पर 3।80 मीटर के प्रदर्शन के साथ सिल्वर मेडल जीता था।

400 मीटर की रनर से पोल वॉल्टर बनने का सफर

सिंधुश्री ने शुरुआत एक 400 मीटर धावक के रूप में की थी। लेकिन साल 2017 में एक स्थानीय कोच ने उन्हें पोल वॉल्ट में शिफ्ट होने की सलाह दी क्योंकि कोच का मानना था कि वह पोल वॉल्ट में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। सिंधुश्री के कोच विजीश एमएम ने उनकी इस सफलता पर कहा कि धैर्य ही सिंधुश्री की सबसे बड़ी ताकत है। कई सालों तक सही पोल न होने और आर्थिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कोच को पूरा भरोसा है कि सही पोल और सही पोषण मिलने पर वह एशियाई खेलों में 4.30 मीटर से ऊपर कूदकर देश के लिए पदक ला सकती हैं। गौरतलब है कि साल 2022 के एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज मेडल का मार्क 4.30 मीटर था।