मुश्किलें बड़ी थीं, हौसला उससे भी बड़ा! पैरों से लिखकर रच रही इतिहास 13 साल की बच्ची

13 साल की लक्ष्मी अपनी हिम्मत और मेहनत से लोगों को इंस्पायर कर रही हैं। शरीर से विकलांग होने के बावजूद उन्होंने पढ़ाई को रुकने नहीं दिया और अपने स्कूल का काम पूरा करने का रास्ता खुद खोज लिया। वह पैरों से लिखकर अपनी पढ़ाई जारी रख रही हैं और हर दिन यह साबित कर रही हैं कि मुश्किल हालात भी किसी के हौसले को रोक नहीं सकते।

सरकारी स्कूल की चौथी कक्षा में पढ़ने वाली स्टूडेंट का जज्बा उन बच्चों के लिए भी इंस्पिरेशन है, जो किसी न किसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। उनके लिए पढ़ाई सिर्फ स्कूल का काम नहीं, बल्कि अपने सपनों की ओर बढ़ने का एक जरिया है। उनकी मेहनत और आत्मविश्वास हमें सिखाता है कि हालात चाहे जैसे हों, कोशिश जारी रखी जाए तो रास्ता जरूर निकाला जा सकता है।

 

1. लक्ष्मी का डेली रूटीन

लक्ष्मी का स्कूल का रोज काम करने का तरीका काफी अलग है। वह अपने स्कूल बैग के पास बैठकर सबसे पहले उसे खोलती हैं और अपने पैरों की मदद से बैग के अंदर रखा सामान बाहर निकालती हैं। वह नोटबुक और पेन को सावधानी से निकालती हैं, फिर कॉपी को अपने सामने सही जगह पर रखती हैं। इसके बाद वह पन्ने पलटकर अपना काम शुरू कर देती हैं। आम बच्चों के लिए ये छोटे-छोटे काम बहुत आसान होते हैं, लेकिन लक्ष्मी को इन्हें करने के लिए ज्यादा मेहनत और ध्यान लगाना पड़ता है। इसके बावजूद वह किसी पर निर्भर रहने के बजाय अपने काम खुद करने की कोशिश करती हैं। उन्होंने धीरे-धीरे इस तरीके को अपना डेली रूटीन बना लिया है।

 

2. पढ़ाई के प्रति लगन

लक्ष्मी की पढ़ाई के प्रति लगन उनकी सबसे खास बात है। वह अपने पैरों से पेन पकड़कर कॉपी में लिखती हैं और इसी तरह अपना स्कूल का काम पूरा करती हैं। वीडियो में वह बिना किसी जल्दबाजी के पूरे ध्यान से लिखती हुई दिखाई देती हैं। उनके लिए लिखना और कॉपी संभालना आसान नहीं है, लेकिन उन्होंने अपनी परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लिया है। जिस काम के लिए दूसरे बच्चों को हाथों का सहारा मिलता है, उसके लिए लक्ष्मी अपने पैरों का इस्तेमाल करती हैं। इसके लिए उन्हें रोज अभ्यास और मेहनत करनी पड़ती होगी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी पढ़ाई के बीच रुकावट नहीं बनने दिया। उनका शांत तरीके से अपने काम पर ध्यान देना दिखाता है कि वह अपनी पढ़ाई को लेकर कितनी गंभीर हैं।

 

3. बनी आम जनता की प्रेरणा

लक्ष्मी की लोगों ने उनकी मेहनत और हिम्मत की जमकर तारीफ की। कई लोगों को उनकी एकाग्रता और पढ़ाई के प्रति लगन काफी पसंद आई। लोगों ने उनके लिए अच्छे भविष्य, खुशी और सफलता की कामना करते हुए रियेक्ट किया। किसी ने उनकी तारीफ करते हुए उन्हें बहुत हिम्मती बताया, तो किसी ने उनके जज्बे को देखकर इंस्पिरेशन मिलने की बात कही। यही कारण है कि उनकी छोटी सी कोशिश कई लोगों के लिए इंस्पिरेशन बन गयी।

 

4. आगे बढ़ने का तरीका

लक्ष्मी की कहानी सिर्फ उनके स्कूल का काम करने या पैरों से लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों को आगे बढ़ने का मौका देने की जरूरत भी दिखाती है। दिव्यांग बच्चों के लिए ऐसा माहौल होना जरूरी है, जहां वे अपनी क्षमता के अनुसार पढ़ाई कर सकें और बिना किसी झिझक के अपनी बात रख सकें। उनकी कहानी हमें यह समझाती है कि हर बच्चे के सीखने और आगे बढ़ने का तरीका अलग हो सकता है।

13 साल की लक्ष्मी की यह कहानी पढ़ाई के प्रति लगन को दिखाती है। पैरों से लिखकर स्कूल का काम पूरा करना उनके लिए आसान नहीं है, फिर भी उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को पढ़ाई के रास्ते में रुकावट नहीं बनने दिया। जो हमें सिखाती है कि सही मौका, सहयोग और मजबूत इरादे मिलें तो मुश्किल रास्ते भी आसान किए जा सकते हैं।

दोस्त से उधार लिया पोल और तोड़ डाला नेशनल रिकॉर्ड! मृत पिता की पासपोर्ट साइज फोटो हाथों में ले सिंधुश्री ने सुनाई रुला देने वाली कहानी

खेलों की दुनिया से अक्सर ऐसी कहानियां सामने आती हैं जो न सिर्फ आपको हैरान करती हैं बल्कि आपकी आंखों में आंसू भी ले आती हैं। ऐसा ही एक भावुक कर देने वाली सफलता पाई है कर्नाटक की 25 वर्षीय एथलीट जी सिंधुश्री ने। राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय चैंपियनशिप में सिंधुश्री ने न केवल महिलाओं के पोल वॉल्ट में एक नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम किया बल्कि गोल्ड मेडल जीतकर एशियाई खेलों का टिकट भी पक्का कर लिया है। इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे छिपी है बेहद तंगहाली, संघर्ष और एक बेटी के आंसुओं की वह कहानी जिसने वहां मौजूद हर शख्स को रुला दिया।

दोस्त से उधार लिया पोल और रच दिया इतिहास

सिंधुश्री के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह प्रतियोगिता के लिए एक सही पोल खरीद सकें। वित्तीय संकट के कारण वह अब तक छोटे पोल के साथ प्रतिस्पर्धा करने को मजबूर थीं। उन्होंने छोटे पोल के साथ ही अभ्यास किया और अपनी तकनीक सीखी, जिसके कारण फेडरेशन कप जैसे पिछले टूर्नामेंटों में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था क्योंकि ये पोल ढीले हो चुके थे। राष्ट्रीय अंतर-राज्यीय चैंपियनशिप से ठीक दो हफ्ते पहले सिंधुश्री को उनके एक दोस्त से उधार में बड़ा पोल मिला। दोस्त से उधार मिले इसी पोल के सहारे कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले के भद्रावती की रहने वाली इस अनजान खिलाड़ी ने वह कर दिखाया जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी।

सिंधुश्री ने 4.25 मीटर की ऊंचाई पार कर तमिलनाडु की एथलीट बारनिका इलांगोवन के एक महीने पुराने 4.20 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ दिया और इतिहास रच दिया। उन्होंने चेन्नई में मई के महीने में ‘इंडियन एथलेटिक्स सीरीज 6’ के दौरान बनाए गए अपने पिछले व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन (4 मीटर) में पूरे 25 सेंटीमीटर का सुधार किया।

हाथों में मृत पिता की तस्वीर थामे भावुक हो गईं सिंधुश्री

जीत के बाद जब सिंधुश्री मीडिया के सामने आईं, तो उनके हाथों में उनके दिवंगत पिता आर गणेश की एक तस्वीर थी। भावुक सिंधुश्री ने बताया कि ‘साल 2022 में मेरे पिता का हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया था। मैंने आज जो कुछ भी हासिल किया है, वह सब मेरे पिता की बदौलत है। हर सुबह वह मुझे दौड़ने के लिए ले जाते थे और वह चाहते थे कि मैं अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए खेलूं। मैं एशियाई खेलों में हिस्सा लेकर उनके इस सपने को पूरा करने जा रही हूं।’ उन्होंने आगे कहा कि मेरा चयन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स के लिए भी हुआ था, लेकिन तब मेरे पिता मेरा खेल देखने के लिए वहां नहीं थे। यह सब एक सपने जैसा लग रहा है और यह केवल मेरे पिता की वजह से मुमकिन हो पाया है।

परिवार के खिलाफ जाकर पिता ने दिलाया था दाखिला

सिंधुश्री ने बताया कि उनके परिवार में दूर-दूर तक कोई भी खेलों में नहीं था। परिवार के बाकी सदस्य एक लड़की को खेलों में भेजने के बिल्कुल खिलाफ थे। लेकिन उनके पिता ने समाज और परिवार के सभी लोगों से लड़ाई लड़ी और उन्हीं की जिद के कारण साल 2016 में सिंधुश्री बेंगलुरु के साई हॉस्टल में शामिल हो सकीं, जहां से उनके खेल के सफर की शुरुआत हुई।

 

बेहद तंगहाली में जी रहा है परिवार, नौकरी की तलाश

इस एथलीट का जीवन भारी आर्थिक तंगहाली में बीत रहा है। उनके पिता आर गणेश एक इलेक्ट्रिशियन थे और उनकी मां सिलाई का काम करती हैं। चूंकि मां की कमाई छोटी बहन की पढ़ाई में खर्च हो जाती है इसलिए सिंधुश्री के दादाजी उन्हें वित्तीय रूप से थोड़ा बहुत सहयोग कर रहे हैं। सिंधुश्री ने बताया कि मेरे पास कोई स्पॉन्सर नहीं है, कोई नौकरी नहीं है और गुजारा करना बेहद मुश्किल हो रहा है। मैं नौकरी की तलाश कर रही थी, लेकिन प्रदर्शन अच्छा न होने के कारण नौकरी नहीं मिल पा रही थी। मुझे उम्मीद है कि इस रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन के बाद मुझे नौकरी मिल जाएगी ताकि मैं अपने परिवार की मदद कर सकूं।

इससे पहले सिंधुश्री ने घरेलू स्तर पर सिर्फ एक बड़ा पदक जीता था, जब उन्होंने साल 2023 के नेशनल इंटर-स्टेट चैंपियनशिप में इसी मैदान पर 3।80 मीटर के प्रदर्शन के साथ सिल्वर मेडल जीता था।

400 मीटर की रनर से पोल वॉल्टर बनने का सफर

सिंधुश्री ने शुरुआत एक 400 मीटर धावक के रूप में की थी। लेकिन साल 2017 में एक स्थानीय कोच ने उन्हें पोल वॉल्ट में शिफ्ट होने की सलाह दी क्योंकि कोच का मानना था कि वह पोल वॉल्ट में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। सिंधुश्री के कोच विजीश एमएम ने उनकी इस सफलता पर कहा कि धैर्य ही सिंधुश्री की सबसे बड़ी ताकत है। कई सालों तक सही पोल न होने और आर्थिक दिक्कतों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। कोच को पूरा भरोसा है कि सही पोल और सही पोषण मिलने पर वह एशियाई खेलों में 4.30 मीटर से ऊपर कूदकर देश के लिए पदक ला सकती हैं। गौरतलब है कि साल 2022 के एशियाई खेलों में ब्रॉन्ज मेडल का मार्क 4.30 मीटर था।