न्यूज़रूम से वड़ा पाव के ठेले तक | Journalist Couple VadaPav Business | Patrakar Couple VadaPav Wale

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12 साल तक मीडिया में काम किया, लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब जसवीर सिंह जस्सी और पत्नी सुधा शाह की नौकरियाँ चली गईं। आर्थिक तंगी आई, लोगों ने ताने मारे और कई बार लगा कि अब आगे कोई रास्ता नहीं है।
फिर मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर गए और वहाँ पर खाए एक वड़ा पाव ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
आज यही कपल नोएडा सेक्टर 19 में अपना वड़ा पाव स्टॉल चलाता है और मेहनत से अपनी नई पहचान बना रहा है।
उनकी कहानी याद दिलाती है कि कोई काम छोटा नहीं होता, अगर आप उसे ईमानदारी और हौसले से करते हैं।
आपके लिए सफलता का असली मतलब क्या है?
@patrakarcouple

न्यूज़रूम से वड़ा पाव के ठेले तक | Journalist Couple Vada Pav Business | Patrakar Couple Vada Pav Wale | Noida

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90 लाख की नौकरी छोड़ी, माइक्रोग्रीन्स की खेती शुरू की, आज खड़ा कर दिया 1.44 करोड़ का बिजनेस

हर महीने लाखों रुपये की सैलरी, शानदार कॉर्पोरेट करियर और सुरक्षित नौकरी छोड़कर खेती की राह चुनना आसान नहीं होता। लेकिन चंडीगढ़ के मोहित निजहावन ने इसी चुनौती को स्वीकार किया। करीब 90 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने माइक्रोग्रीन्स की खेती को अपना नया करियर बनाया। खास बात यह है कि उन्होंने इस बिजनेस की शुरुआत किसी बड़े निवेश या बड़ी जमीन से नहीं की थी। महज 30,000 रुपये और करीब 100 वर्ग फुट की जगह से शुरू हुआ उनका प्रयोग धीरे-धीरे एक कारोबार में बदल गया। मोहित ने इंडोर फार्मिंग के जरिए माइक्रोग्रीन्स उगाए और समय के साथ ग्राहकों, उत्पादन और बिक्री को समझते हुए अपने काम को आगे बढ़ाया।

आज सार्वजनिक रूप से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, उनके कारोबार का सालाना रेवेन्यू करीब 1.44 करोड़ रुपये बताया जाता है। उनकी यह कहानी नौकरी से बिजनेस तक के अनोखे सफर और जोखिम उठाने की मिसाल बन गई है।

B.Tech के बाद शुरू हुआ कॉर्पोरेट सफर

मोहित निजहावन कंप्यूटर साइंस में B.Tech ग्रेजुएट हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में शानदार करियर बनाया और अच्छी खासी सैलरी वाली नौकरी हासिल की।

हालांकि, दिसंबर 2020 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना, जो उनकी पुरानी कॉर्पोरेट जिंदगी से बिल्कुल अलग था।

सिर्फ 30 हजार रुपये से शुरू किया काम

माइक्रोग्रीन्स की खेती का आइडिया मोहित के लिए शुरुआत में एक प्रयोग जैसा था। उन्होंने बड़े निवेश के बजाय सिर्फ 30,000 रुपये से अपना काम दोबारा शुरू किया।

इसके लिए चंडीगढ़ में करीब 100 वर्ग फुट की छोटी-सी जगह ली गई। इसी सीमित जगह में उन्होंने इंडोर माइक्रोग्रीन्स उगाना शुरू किया और धीरे-धीरे खेती के साथ-साथ मार्केटिंग और ग्राहकों की जरूरतों को समझना शुरू किया।

छोटे कमरे से बना Greenu Microgreens

शुरुआती प्रयोग धीरे-धीरे एक बिजनेस मॉडल में बदल गया। मोहित ने उत्पादन बढ़ाने, ग्राहकों तक पहुंच बनाने और माइक्रोग्रीन्स की बिक्री को बेहतर तरीके से मैनेज करने पर काम किया।

इसी सफर से Greenu Microgreens का कारोबार खड़ा हुआ। छोटी जगह और कम पूंजी से शुरू हुआ यह वेंचर आज काफी बड़ा बिजनेस बन चुका है।

हर महीने 12 लाख रुपये का रेवेन्यू!

सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए आंकड़ों के मुताबिक, Greenu Microgreens का कारोबार अब करीब 12 लाख रुपये प्रति महीने का रेवेन्यू जेनरेट करता है। यानी सालाना कारोबार लगभग 1.44 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

रिपोर्ट्स में कंपनी का सालाना मुनाफा करीब 60 लाख रुपये बताया गया है। हालांकि, बिजनेस का रेवेन्यू और किसी व्यक्ति की नौकरी की सैलरी अलग-अलग चीजें हैं, इसलिए दोनों की सीधी तुलना करना सही नहीं होगा।

सिर्फ अपना बिजनेस नहीं, दूसरों को भी दे रहे ट्रेनिंग

मोहित की कहानी सिर्फ अपना फार्म चलाने तक सीमित नहीं है। Greenu Microgreens के जरिए वह किसानों और उन लोगों को भी माइक्रोग्रीन्स फार्मिंग की ट्रेनिंग देते हैं, जो इसे बिजनेस के तौर पर शुरू करना चाहते हैं। इस तरह उनका लक्ष्य केवल माइक्रोग्रीन्स उगाना ही नहीं, बल्कि दूसरे लोगों को भी इस क्षेत्र में अवसर तलाशने में मदद करना है।

90 लाख की नौकरी से 30 हजार की खेती तक का सफर

मोहित की कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने करीब 90 लाख रुपये सालाना की नौकरी छोड़कर सिर्फ 30,000 रुपये से अपना नया सफर शुरू किया। एक तरफ कॉर्पोरेट नौकरी की बड़ी सैलरी थी, तो दूसरी तरफ छोटी जगह में खेती का अनिश्चित रास्ता। इसके बावजूद उन्होंने अपने नए आइडिया पर भरोसा किया और धीरे-धीरे इसे बिजनेस में बदल दिया।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

मोहित की कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों के बीच अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे नौकरी से अलग रास्ता चुनने और अपने दम पर बिजनेस खड़ा करने की प्रेरणादायक कहानी बताया। वहीं, कुछ यूजर्स ने 90 लाख रुपये की सैलरी और 1.44 करोड़ रुपये के बिजनेस रेवेन्यू की तुलना पर सवाल उठाए। एक यूजर ने इसे भ्रामक तुलना बताते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की सालाना सैलरी और बिजनेस का टर्नओवर एक जैसी चीजें नहीं हैं।

दूसरी ओर, कुछ लोगों ने मोहित के फैसले को जिंदगी और सफलता को अलग नजरिए से देखने वाली कहानी बताया। एक यूजर ने इसे “वास्तव में प्रेरणादायक सफर” कहा, जबकि दूसरे ने उनकी यात्रा की तारीफ की।

क्या सीख देती है मोहित की कहानी?

मोहित की कहानी दिखाती है कि सफलता का रास्ता हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता। बड़ी नौकरी और अच्छी सैलरी के बावजूद कोई व्यक्ति अपना अलग रास्ता चुन सकता है। हालांकि, किसी भी बिजनेस की सफलता को समझने के लिए सिर्फ रेवेन्यू नहीं, बल्कि निवेश, खर्च, मुनाफा और कारोबार की स्थिरता जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

12 साल की कॉरपोरेट नौकरी और फिर बड़ा फैसला, गुरजोत ने बताया क्यों छोड़ दी लाखों की सैलरी वाली जॉब

मुंबई में शख्स ने लाखों की सैलरी छोड़ किया 1.5 करोड़ का इन्वेस्टमेंट’, रेस्टोरेंट और निवेश से हो रही 4 लाख की कमाई

एक व्यक्ति, जिसने ऐसा रास्ता चुना जिसे कई लोग जोखिम भरा मानते थे, अब आर्थिक आजादी और काम और निजी जिंदगी के बीच बेहतर संतुलन का आनंद ले रहा है। सोशल मीडिया पर अंकित पांडे द्वारा साझा की गई उनकी कहानी ने ऑनलाइन कई लोगों को प्रेरित किया है।

पोस्ट के अनुसार, उस व्यक्ति ने मुंबई में अपनी 1.5 लाख रुपये प्रति महीने की नौकरी छोड़ दी, जबकि लोगों ने उससे कहा कि वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है। उसने अपना फ्लैट लगभग 3 करोड़ रुपये में बेच दिया और कोई दूसरा महंगा अपार्टमेंट खरीदने के बजाय अपने होमटाउन वापस चला गया।

उसने लगभग 20 लाख रुपये में जमीन खरीदी, 50 लाख रुपये में घर बनवाया और दो रेस्टोरेंट खोलने के लिए लगभग 50 लाख रुपये का निवेश किया। आज, दोनों रेस्टोरेंट जोमैटो और स्विगी पर लिस्टेड हैं और कर्मचारी उन्हें मैनेज करते हैं। बताया जाता है कि इन बिजनेस से उसे इतना मुनाफा होता है कि वह हर महीने लगभग 3 लाख रुपये बचा लेता है।

उसने फिक्स्ड डिपॉजिट में भी 1.5 करोड़ रुपये का निवेश किया, जिससे उसे ब्याज के तौर पर हर महीने लगभग 1 लाख रुपये मिलते हैं। कुल मिलाकर, उसकी मासिक आय लगभग 4 लाख रुपये बताई जाती है। यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है।

एक यूजर ने लिखा, “बिना किसी विरासत, बिना किसी असली सोशल सर्कल और शहर से बिना किसी सच्चे लगाव के, मेट्रो शहर में सिर्फ एक औसत सैलरी पर गुज़ारा करना, एक दुखद जीवन जैसा लगता है।”एक दूसरे व्यक्ति ने कहा, “भले ही यह सच्ची कहानी हो, लेकिन जब वह होमटाउन गया तो उसके पास 3 करोड़ रुपये की पूंजी और पहले की बचत थी, जिससे बिजनेस और नई ज़िंदगी शुरू की जा सकती थी। हर किसी के पास, जो मेट्रो से होमटाउन जाता है, ऐसी सुविधा नहीं होती। अच्छी कहानी है, लेकिन ज़्यादातर लोगों के लिए आदर्श या उनसे जुड़ी हुई नहीं है।”

एक तीसरे व्यक्ति ने कहा, “यह इतना आसान नहीं है! रेस्टोरेंट का बिजनेस ही जोखिम भरा होता है! इतने सारे लाइसेंस और रिश्वत, लेबर की समस्याएं, सफाई के सर्टिफिकेट वगैरह, जिन्हें कॉम्पिटिटर निशाना बना सकते हैं! मैं रोज़ रेस्टोरेंट बंद होते देखता हूं!”

₹65 की नौकरी से ₹20000 करोड़ की कंपनी तक, गणित में फेल स्टूडेंट ने ऐसे खड़ा किया आइसक्रीस साम्राज्य

RG Chandramogan Success Story: आरजी चंद्रमोगन के पास न तो कॉलेज की डिग्री थी और न ही कोई बड़ी विरासत। लेकिन उनके पास एक चीज थी, कुछ बड़ा करने का जज्बा। 65 रुपये महीने की नौकरी से शुरुआत करने वाले इस शख्स ने बाद में आइसक्रीम बेचनी शुरू की।

उसी कारोबार को आगे बढ़ाकर Hatsun Agro Products जैसी कंपनी खड़ी कर दी। आज यह भारत की सबसे बड़ी निजी डेयरी कंपनियों में शामिल है, जिसकी बाजार में वैल्यू करीब 20,000 करोड़ रुपये है।

एक असफल बिजनेस ने बदली सोच

चंद्रमोगन तमिलनाडु के साधारण परिवार में पैदा हुए। बचपन में देखा कि गांव का सबसे सम्मानित व्यक्ति एक कारोबारी था। तभी से उन्होंने भी बिजनेस करने का सपना देख लिया।

साल 1956 में उनके पिता चेन्नई आ गए और सेंट्रल स्टेशन के पास एक किराना दुकान खोली। लेकिन 1968 तक कारोबार पूरी तरह ठप हो गया। परिवार को खाली हाथ गांव लौटना पड़ा। यहीं से चंद्रमोगन ने पहली बार समझा कि बिजनेस में सफलता जितनी बड़ी होती है, जोखिम भी उतना ही बड़ा होता है।

गणित में फेल हुए, कॉलेज छोड़ना पड़ा

पढ़ाई भी उनके लिए आसान नहीं रही। उन्होंने पलायमकोट्टई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में प्री-यूनिवर्सिटी कोर्स में दाखिला लिया, लेकिन गणित में फेल हो गए। इसके बाद पढ़ाई छूट गई।

बेटे के भविष्य की चिंता में उनके पिता ने विलुप्पुरम के एक लकड़ी गोदाम में उनकी नौकरी लगवा दी। वहां उन्हें सिर्फ 65 रुपये महीने की तनख्वाह मिलती थी। करीब एक साल तक उन्होंने वहां ऑर्डर संभाले, सामान उठाया और मेहनत की। लेकिन उन्हें एहसास हो गया कि पूरी जिंदगी 65 रुपये की नौकरी करके नहीं बिताई जा सकती।

पिता ने बेच दी पुश्तैनी जमीन

एक साल बाद चंद्रमोगन चेन्नई लौट आए। इस बार उन्होंने तय कर लिया था कि अब नौकरी नहीं, अपना कारोबार करेंगे।

उनके पिता ने भी बड़ा फैसला लिया। उन्होंने 13,000 रुपये जुटाने के लिए परिवार की पुश्तैनी जमीन बेच दी। यही रकम चंद्रमोगन के पहले बिजनेस की पूंजी बनी।

250 वर्गफुट से शुरू किया कारोबार

साल 1970 में उन्होंने चेन्नई के रायापुरम इलाके में 250 वर्गफुट की छोटी-सी जगह किराए पर ली। एक साधारण आइस बनाने वाली मशीन खरीदी और चार कर्मचारियों के साथ काम शुरू कर दिया। फैक्ट्री में रोज करीब 10,000 आइसक्रीम बन सकती थीं। उन्होंने अपने ब्रांड का नाम ‘Arun’ रखा।

शुरुआत में मुनाफा बहुत कम था। कई बार चंद्रमोगन खुद ठेले पर आइसक्रीम बेचने निकल जाते थे। उस समय उनका मकसद सिर्फ कारोबार को जिंदा रखना था।

आइसक्रीम से डेयरी बिजनेस तक

करीब 10 साल तक उन्होंने सिर्फ आइसक्रीम का कारोबार किया। लेकिन इसी दौरान उन्हें एक बड़ी बात समझ आई। उन्होंने देखा कि आइसक्रीम का कारोबार मौसम पर निर्भर है, जबकि दूध हर घर की रोजमर्रा की जरूरत है। उस समय भारत का डेयरी बाजार काफी बिखरा हुआ था। चंद्रमोगन को इसमें बड़ा मौका नजर आया।

1980 के दशक में उन्होंने दूध प्रोसेसिंग का काम शुरू किया। धीरे-धीरे कंपनी ने दूध, दही, घी और मक्खन जैसे उत्पाद भी बेचने शुरू कर दिए। अब Arun सिर्फ आइसक्रीम का नहीं, बल्कि डेयरी उत्पादों का बड़ा ब्रांड बन चुका था।

उन्होंने जल्दबाजी में विस्तार नहीं किया। पहले किसानों का मजबूत नेटवर्क बनाया, सप्लाई चेन तैयार की और रिटेल नेटवर्क खड़ा किया। यही रणनीति आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

आज 20,000 करोड़ की कंपनी

आज Hatsun Agro Products शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनी है। जुलाई 2026 तक इसका मार्केट कैप 20,000 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच चुका है। Forbes के मुताबिक, आरजी चंद्रमोगन की नेटवर्थ करीब 1.6 अरब डॉलर है। उन्हें 2018 में भारतीय डेयरी उद्योग में योगदान के लिए Indian Dairy Association का प्रतिष्ठित Patronage Award भी दिया गया।

चंद्रमोगन की कहानी सिर्फ एक सफल कारोबारी बनने की नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है, जो गणित में फेल हुआ लेकिन कारोबार के इम्तिहान में अव्वल नंबरों से पास होकर दिखा दिया।

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एक्स ओरेकल बेंगलुरु के एम्प्लोयी को ऐसे मिला MBA डिग्री का फायदा, 25 हजार से सीधा 1 लाख हुई सैलरी

ओरेकल के पूर्व कर्मचारी प्रदीप कन्नन अपने करियर को कॉर्पोरेट भूमिका से एंटरप्रेन्योरशिप की ओर ले जाने का श्रेय अपने MBA को देते हैं। उनका कहना है कि इस डिग्री ने उन्हें ज़रूरी बिजनेस समझ और एक मजबूत आधार दिया, साथ ही उनकी सैलरी को भी ₹25,000 से बढ़ाकर ₹1 लाख प्रति माह कर दिया। आजकल मुफ्त में सीखने के कई आधुनिक साधन मौजूद होने के बावजूद, कन्नन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि MBA का उनकी ज़िंदगी की दिशा और एंटरप्रेन्योरशिप के सफ़र पर एक खास असर रहा है।

क्या एक डिग्री आपके करियर की दिशा पूरी तरह बदल सकती है? ऐसे समय में जब AI, YouTube और पॉडकास्ट की वजह से बिज़नेस से जुड़ी जानकारी पहले से कहीं ज़्यादा आसानी से मिल रही है, कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या MBA में निवेश करना अब भी फ़ायदेमंद है।

Oracle बेंगलुरु के पूर्व कर्मचारी प्रदीप कन्नन के लिए, इसका जवाब उनके अपने अनुभव से मिलता है। X पर शेयर की गई एक पोस्ट में, उन्होंने बताया कि कैसे MBA ने न सिर्फ उनकी महीने की सैलरी 25,000 रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दी, बल्कि उन्हें कॉर्पोरेट जिंदगी छोड़कर एंटरप्रेन्योर बनने का आत्मविश्वास और बिजनेस की समझ भी दी।

उन्होंने लिखा, “अगर मैंने MBA नहीं किया होता, तो मैं एंटरप्रेन्योर नहीं बन पाता। जब मैंने 2010 में MBA शुरू किया था, तब मुझे बिजनेस की कोई समझ नहीं थी। मैं दक्षिण भारत के एक टियर-3 शहर से आया था।”

कन्नन ने बताया कि MBA से उन्हें पहली बार असल में समझ आया कि बिजनेस कैसे काम करते हैं। बिजनेस स्कूल में जाने से पहले, उन्हें एंटरप्रेन्योरशिप या बिजनेस मैनेजमेंट के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। उन्होंने आगे कहा, “MBA मेरे लिए यह समझने का पहला मौका था कि बिजनेस असल में कैसे काम करते हैं। इसने मुझे एक ऐसा आधार दिया जो मैं कहीं और नहीं बना सकता था। मेरी सैलरी ₹25,000 प्रति माह से बढ़कर ₹1 लाख प्रति माह हो गई।”

हालांकि सैलरी में चार गुना बढ़ोतरी एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन कन्नन का कहना है कि असली बदलाव उनकी सोच में आया। उन्होंने 2010 के सीखने के माहौल की तुलना आज उपलब्ध मौकों से भी की।

उन्होंने आगे कहा, “आज, 2026 में, आप लगभग सब कुछ ऑनलाइन सीख सकते हैं। AI आपको स्ट्रेटेजी सिखा सकता है। YouTube आपको फाइनेंस सिखा सकता है। पॉडकास्ट आपको मार्केटिंग सिखा सकते हैं। लेकिन 2010 में, ऐसी दुनिया नहीं थी। कई लोगों के लिए, MBA बस एक और डिग्री थी। मेरे लिए, इसने मेरी जिंदगी की दिशा बदल दी।”

News18 की रिपोर्ट के अनुसार, कन्नन ने कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करना जारी रखा और फिर 2019 में एक अलग रास्ता चुनने का फैसला किया। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और ‘द फालूदा शॉप’ (The Falooda Shop) शुरू किया, जो पारंपरिक भारतीय ड्रिंक्स से प्रेरित एक डेज़र्ट ब्रांड है।

जो एक छोटा सा बिज़नेस शुरू हुआ था, वह अब लगभग ₹9 करोड़ की वैल्यू वाले बिज़नेस में बदल गया है। यह ब्रांड अब भारत और दुबई में 18 से ज्यादा आउटलेट चलाता है, जहां कई तरह के फालूदा, मिल्कशेक और डेजर्ट मिलते हैं।