
everest urine glacier impact: संसार की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) को छूने का सपना हर साल हज़ारों पर्वतारोहियों को नेपाल खींच लाता है। लेकिन इस साहसिक सपने का एक स्याह और खौफनाक पहलू सामने आया है। एक अंतरराष्ट्रीय शोध के अनुसार, एवरेस्ट बेस कैंप पर एकत्रित होने वाले पर्वतारोहियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन की गर्मी और सीधे ग्लेशियर पर किया जाने वाला पेशाब हर साल 2500 टन से अधिक बर्फ और हिम को पिघला रहा है।
वैज्ञानिक पत्रिका ‘रीजनल एनवायरनमेंटल चेंज’ (Regional Environmental Change) में प्रकाशित इस अध्ययन ने खुंबू ग्लेशियर (Khumbu Glacier) पर मानव गतिविधियों के विनाशकारी प्रभावों का खुलासा किया है।

इस ईंधन के जलने से उत्पन्न ऊर्जा और इंसानी पेशाब से निकलने वाली गर्मी को मिलाकर कुल 8,49,174 मेगाजूल थर्मल एनर्जी पैदा हुई। यह ऊर्जा 2,492 टन (लगभग 2,500 टन) बर्फ पिघलाने के लिए काफी है।
तबाही का अंदाजा : पिघली हुई यह बर्फ एक ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल, 83 बड़े टैंकर ट्रकों या लगभग 16,700 मानक बाथटबों को पानी से भरने के लिए पर्याप्त है।

दोगुने तापमान से उबल रहा है बेस कैंप
1991 से 2023 तक के लैंडसैट (Landsat) सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि पूरे खुंबू ग्लेशियर की तुलना में बेस कैंप वाले स्थान का तापमान बहुत तेजी से बढ़ रहा है।
- तापमान वृद्धि दर : बेस कैंप की सतह का तापमान 0.28°C प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। यह दर आसपास के अन्य ग्लेशियर क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुनी है।
- लक्जरी का बोझ : वसंत के समय यह कैंप किसी हाई-टेक गांव की तरह दिखता है— जहां एस्प्रेसो कैफे, बड़ी स्क्रीन वाले टीवी, हाई-स्पीड इंटरनेट, हॉट शावर और गर्म फर्श जैसी सुविधाएं मौजूद होती हैं। इन सुविधाओं से निकलने वाली गर्मी पर्यावरण पर सीधा प्रहार कर रही है।
वास्तविक पैमाना इससे भी कहीं अधिक खौफनाक!
नेपाल के भूमि प्रबंधन विभाग के वरिष्ठ सर्वेक्षक किम लाल गौतम सहित शोध दल ने स्पष्ट किया कि मानव प्रभाव का वास्तविक पैमाना इस आंकड़े से कहीं ज्यादा हो सकता है।
इस अध्ययन में हेलीकॉप्टर उड़ानों से उत्पन्न गर्मी, हजारों पर्वतारोहियों और पोर्टरों के शरीर की गर्मी और सामान ढोने वाले याक (Yaks) से निकलने वाली ऊर्जा शामिल नहीं है।
क्या है समाधान? (वैज्ञानिकों की चेतावनी)
यद्यपि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन (Global Warming) एवरेस्ट के ग्लेशियरों के पिघलने का मुख्य कारण है, लेकिन हर साल एक ही नाजुक बिंदु (Micro-environment) पर हजारों लोगों को केंद्रित करना अब टिकाऊ (Sustainable) नहीं रह गया है।
शोधकर्ताओं और पर्यावरणविदों ने नेपाल सरकार को सुझाव दिया है कि:
- बेस कैंप का स्थानांतरण : दीर्घकालिक रूप से बेस कैंप को खुंबू ग्लेशियर से हटाकर पास के किसी सुरक्षित और स्थिर गैर-ग्लेशियल क्षेत्र में शिफ्ट किया जाए।
- सख्त अपशिष्ट प्रबंधन : ग्लेशियर पर किसी भी तरह के तरल अपशिष्ट या पेशाब के सीधे विसर्जन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और इसे भी नीचे लाने की तकनीकी व्यवस्था की जाए।


