8 साल की IPS सेवा के बाद कॉर्पोरेट की दुनिया में कदम, राजन सिंह ने ऐसे रची सफलता की नई कहानी!

एक नौकरी से शुरू हुआ सफर, जिसने राजन सिंह को पहुंचाया अलग-अलग करियर तक

राजन सिंह का करियर किसी एक तय रास्ते पर नहीं चला। IIT कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने सिविल सर्विस का रास्ता चुना और IPS में शामिल हुए। करीब आठ साल पुलिस सेवा में रहने के बाद उन्होंने MBA के लिए अमेरिका का रुख किया। इसके बाद कंसल्टिंग, प्राइवेट इक्विटी और फिर अपना बिजनेस शुरू करने तक उनका सफर पहुंचा। इस दौरान उन्होंने कई बार अपना करियर बदला और हर नए पड़ाव पर एक अलग तरह का अनुभव हासिल किया।

IIT के बाद चुनी पुलिस की राह

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजन सिंह ने सामान्य इंजीनियरिंग करियर में जाने के बजाय सिविल सेवा परीक्षा दी। सितंबर 1997 में उन्होंने IPS जॉइन किया और केरल के करुणागप्पल्ली में ASP के तौर पर पहली पोस्टिंग मिली। कुछ ही सालों में उनकी जिम्मेदारियां बढ़ीं और 2001 तक वह तिरुवनंतपुरम के पुलिस कमिश्नर बन गए। उस समय वह इस पद पर पहुंचने वाले कम उम्र के अधिकारियों में शामिल थे।

पुलिस सेवा छोड़कर पहुंचे Wharton

2004 में पुलिस कमिश्नर रहते हुए उनके करियर ने एक नया मोड़ लिया। एक पुलिस ऑपरेशन के दौरान उन्हें अपने साथी IPS अधिकारी के Wharton MBA में एडमिशन की जानकारी मिली। इस घटना ने उन्हें अपने आगे के करियर के बारे में सोचने पर मजबूर किया। करीब आठ साल पुलिस सेवा में बिताने के बाद उन्होंने जुलाई 2005 में IPS छोड़ दिया और Wharton के MBA प्रोग्राम में दाखिला लिया। 2007 में MBA पूरा करने के बाद उन्होंने न्यूयॉर्क में McKinsey & Company के साथ कंसल्टेंट के तौर पर काम शुरू किया।

कंसल्टिंग के बाद इन्वेस्टमेंट की दुनिया

McKinsey में काम करते हुए राजन ने इंश्योरेंस, फार्मा, बायोटेक्नोलॉजी और बैंकिंग जैसे अलग-अलग सेक्टर की कंपनियों के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने प्राइवेट इक्विटी फर्म New Silk Route का रुख किया। यहां उन्हें कंपनियों और कारोबार को एक इन्वेस्टर की नजर से समझने का मौका मिला। इसी दौरान उन्होंने यह भी करीब से देखा कि कोई व्यक्ति सुरक्षित प्रोफेशनल करियर चुनने के बजाय अपना नया बिजनेस शुरू करने का जोखिम क्यों लेता है।

पहला स्टार्टअप नहीं चला, फिर भी नहीं रुके

2012 में राजन ने Course Brew नाम से ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू किया। यह उनका एंटरप्रेन्योर के तौर पर शुरुआती बड़ा प्रयोग था, लेकिन यह बिजनेस ज्यादा समय तक नहीं चल पाया। इसके बाद उन्होंने दोबारा कोशिश की और ConceptOwl शुरू किया। इसका मकसद छोटे शहरों के छात्रों को अच्छी साइंस और मैथ्स की पढ़ाई उनके अपने शहरों के करीब उपलब्ध कराना था। कंपनी ने ऑनलाइन पढ़ाई के साथ क्लासरूम प्रोग्राम पर भी काम किया। एक समय शिक्षकों की कमी हुई तो राजन ने खुद फिजिक्स पढ़ाना शुरू कर दिया। कंपनी ने आगे चलकर निवेश भी जुटाया और एजुकेशन सेक्टर में अपना मॉडल आगे बढ़ाया।

ConceptOwl से HabitStrong तक पहुंचा सफर

कोरोना महामारी के दौरान राजन और उनकी टीम ने रूटीन, आदतों और प्रोडक्टिविटी से जुड़े कार्यक्रमों पर काम करना शुरू किया। इसी प्रयोग से HabitStrong का आइडिया सामने आया। शुरुआत सुबह जल्दी उठने वाले एक साधारण YouTube प्रोग्राम से हुई, जिसे करीब 100 दिनों तक आजमाया गया। लोगों से मिले अनुभवों के बाद इसे एक स्ट्रक्चर्ड प्रोग्राम का रूप दिया गया। 2020 में शुरू हुए HabitStrong का फोकस बेहतर रूटीन बनाने, कंसंट्रेशन बढ़ाने और डिजिटल डिस्ट्रक्शन कम करने जैसी चीजों पर रहा। इस तरह उनका सफर शिक्षा से आगे बढ़कर हैबिट्स और प्रोडक्टिविटी के क्षेत्र तक पहुंच गया।

राजन सिंह की कहानी की खास बात सिर्फ यह नहीं है कि उन्होंने कई अलग-अलग क्षेत्रों में काम किया, बल्कि यह है कि हर बदलाव के बाद उन्होंने खुद को नए काम के लिए तैयार किया। इंजीनियरिंग से पुलिस सेवा, फिर MBA, कंसल्टिंग, निवेश और आखिर में स्टार्टअप तक का यह सफर दिखाता है कि करियर हमेशा एक ही दिशा में आगे बढ़े, यह जरूरी नहीं। कई बार अलग-अलग अनुभव मिलकर आगे के काम के लिए नई सोच और नए मौके तैयार करते हैं।

Viral Post: ‘कभी खाने को थे मोहताज…’ एक फैसले ने बदल दी जिंदगी, अब शख्स बना रहा अपने ‘सपनों का महल’

सोशल मीडिया पर एक युवक के प्रेरणादायक सफर को लेकर किया गया पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस पोस्ट में व्यक्ति ने बताया कि 900 रुपये का स्कूल टूर भी न कर पाने वाला एक छात्र आज केंद्र सरकार में नौकरी कर रहा है। व्यक्ति के पुराने क्लासमेट अंकित पांडे ने सोशल मीडिया पर उनकी कहानी शेयर की है। उन्होंने बताया कि कभी उसके परिवार के लिए स्कूल का खर्च उठाना भी काफी मुश्किल था। लेकिन उन्होंने इस मुश्किल हालात के बावजूद पढ़ाई नहीं छोड़ी और एसएससी सीजीएल परीक्षा पास करके अपनी जिंदगी बदल दी। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

नहीं थे स्कूल टूर के लिए पैसे

एक्स पर एक पोस्ट में यूजर अंकित पांडे ने लिखा, “एक समय मेरे स्कूल के क्लासमेट के पास स्कूल टूर के लिए 900 रुपये भी नहीं थे।” उन्होंने आगे बताया, “हम सभी अपने लंच बॉक्स में अलग-अलग तरह का खाना लाते थे, लेकिन वह ज्यादातर अचार और रोटी लाता था। उसके पास पुरानी किताबें थीं, नया बैग भी नहीं था और वह हमेशा क्लास में सबसे शांत रहने वाला लड़का था।” पांडे के मुताबिक, उसके माता-पिता अपने बेटे की पढ़ाई जारी रखने के लिए मजदूरी करते थे।

पिता करते थे मजदूरी

पांडे ने लिखा, “उसके माता-पिता सिर्फ 4,000 रुपये की मासिक स्कूल फीस भरने के लिए मजदूरी करते थे। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने मुश्किल हालात का सामना किया, अपनी पढ़ाई जारी रखी और वो काम किया, जिसे कभी उनके लिए नामुमकिन माना जाता था। आखिरकार, उन्होंने एसएससी सीजीएल परीक्षा पास कर ली। आज वह केंद्र सरकार में नौकरी कर रहे हैं और अपना घर बना रहे हैं।” सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

पांडे ने कहा, “मैंने उसका सफर करीब से देखा है। स्कूल के लंच बॉक्स में अचार-रोटी लाने से लेकर आज अपना घर बनाने तक। जिंदगी ने उसे शुरुआत में बहुत कम दिया, लेकिन उसने आगे बढ़ने के लिए मेहनत करना कभी नहीं छोड़ा। कभी-कभी मेहनत सच में इंसान की पूरी जिंदगी बदल सकती है।”

लोगों ने किया कमेंट

एक यूजर ने कमेंट किया, “बहुत खूबसूरत कहानी है, अंकित। यह दिखाती है कि जब आपकी इच्छाशक्ति बाकी हर चीज से मजबूत होती है, तो आप किसी भी मुश्किल को पार कर सकते हैं और जिंदगी में कुछ भी हासिल कर सकते हैं।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “मेहनत सब कुछ बदल सकती है।” वहीं, तीसरे यूजर ने कहा, “ये सफलता की ऐसी कहानी है, जो दिल को छू जाती है। अचार-रोटी से लेकर अपना घर बनाने तक का सफर वाकई खास है।”

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

घर से भटक कर 1200km दूर चला गया बुजुर्ग, युवक ने AI पर लगाई ऐसी तरकीब और ढूंढ निकाला सही पता

Single Father ने सिखाया कि प्यार किसी Gender का मोहताज नहीं | Father raised her daughter alone

Single Father ने सिखाया कि प्यार किसी Gender का मोहताज नहीं | Father raised her daughter alone

“तुम अकेले बेटी नहीं पाल पाओगे”
ये बात विराज़ ने कई बार सुनी।
लेकिन उन्होंने जवाब शब्दों से नहीं दिया।
हर रात कुछ नया सीखा।
हर सुबह एक बेहतर पिता बनने की कोशिश की।
आज उनकी 6 साल की बेटी स्कूल से लौटकर सबसे पहले अपने पापा को ही ढूँढती है, क्योंकि उसके लिए वही उसकी सबसे सुरक्षित जगह हैं।

कुछ कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि प्यार किसी रिश्ते का नाम नहीं, निभाने का नाम है।

क्या आपको लगता है कि Parenting किसी एक Gender की ज़िम्मेदारी है? कमेंट में बताइए।

@v_cube
@elvworld

Single Father Raising Daughter, Parenting Story By Single Father, Single Parent Success Story

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BMW i5 LWB review: The 5 goes electric

BMW i5 LWB review: The 5 goes electric
BMW i5 LWB front quarter tracking

In the first half of 2026, BMW sold nearly 2,400 EVs in India, with the entry-level iX1 and flagship i7 accounting for the bulk of those volumes. Now, BMW has introduced an all-new electric long-wheelbase sedan to bridge the sizable gap between the two. Meet the BMW i5 eDrive35L, the electric counterpart to the 5 Series sedan.

The i5 nameplate isn’t new to India. BMW launched the imported, performance-focused i5 M60 here back in 2024. However, that was a niche offering. This new version is expected to appeal to a much wider audience. Being locally assembled, the i5 eDrive35L is priced at Rs 79.60 lakh, commanding a premium of Rs 3 lakh over its petrol-powered sibling. In this review, we find out what it’s like to live with.

BMW i5 LWB Exterior Design and Engineering – 8/10

An ‘i’ badge on the grille along with its green number plate differentiate it from its petrol sibling

Compared to the international version, this i5’s wheelbase has been stretched by 110mm to 3,105mm, while overall length now stands at 5,175mm. Interestingly, the 5 Series is larger than its chief rival, the Mercedes-Benz E-Class, in every dimension.

As for styling, this generation of the 5 Series has been around since 2024 and much like most modern BMW designs, it’s something that grows on you with time. That said, there’s no denying that it’s a polarising design. The numerous cuts, heavy surfacing and intricate detailing make it look busy and excessive to some eyes.

Gets large 20-inch alloys which look far more proportionate than the 18-inch wheels initially available with the 530Li.

Differentiating the i5 from its petrol-powered counterpart are an ‘i’ logo on the grille and larger 20-inch alloy wheels. The latter look far more proportionate than the 18-inch wheels initially offered on the 530Li. At the rear, the only distinguishing elements are the i5 and eDrive35L badges, apart from the obvious giveaway – the green number plate.

BMW i5 LWB Interior Space and Comfort – 9/10

Dash is dominated by BMW’s twin curved screens, a flat-bottomed steering wheel and generous ambient lighting. 

Step inside and the dashboard is dominated by BMW’s twin curved-screen setup, complemented by a flat-bottomed steering wheel, generous ambient lighting, and a tasteful mix of open-pore wood trim and silver inlays. The crystalline drive selector, rotary infotainment controller and volume roller on the centre console add a welcome sense of occasion.

Those familiar with older 5 Series models will quickly notice the absence of the manually adjustable thigh support for the front seats. That aside, the seats themselves are exceptionally comfortable and supportive, and they also feature ventilation.

The seats are exceptionally comfortable and supportive, and they also feature ventilation.

Being the long-wheelbase version, the i5 benefits from an additional 4.3 inches of wheelbase compared to the international model, resulting in noticeably more rear legroom. Sure, the floor sits higher than in the ICE version, but this remains a very comfortable place to be for chauffeur-driven buyers. The rear bench is well contoured and, with just two occupants, delivers a genuinely luxurious experience. Some may find the pillows a little excessive, and they aren’t quite as comfortable as the integrated units in the E-Class. Speaking of which, unlike the Mercedes, the i5’s rear seat doesn’t recline, and there are arguably too few indulgent touches to truly cater to chauffeur-driven buyers.

A bit knees-up, but the rear seat feels luxurious; however, there are too few amenities for chauffeur-driven buyers.

The middle seat is considerably less accommodating. The raised seat base compromises headroom, the backrest is firm, and the tall central tunnel further detracts from comfort for a third passenger.

Boot space is rated at 500 litres, which is broadly similar to the ICE 5 Series. However, while the spare wheel is neatly tucked beneath the boot floor in the petrol version, it sits on the boot floor in the i5, significantly compromising usable luggage space.

The spare wheel sits on the boot floor, significantly compromising usable luggage space.

BMW i5 LWB Features and Safety – 8/10

The i5 eDrive35L comes generously equipped. Highlights include 20-inch alloy wheels, adaptive LED headlamps, powered and ventilated front seats, four-zone climate control, wireless charging pads for both front and rear occupants, a panoramic fixed glass roof, ambient lighting and a powered boot lid.

Audiophiles will particularly appreciate the superb 17-speaker, 655W Bowers & Wilkins audio system.

The curved touchscreen and digital instrument cluster look suitably futuristic, although the user experience isn’t the most intuitive due to the number of menus and sub-menus. On the plus side, the 360-degree camera offers excellent clarity. Audiophiles will particularly appreciate the superb 17-speaker, 655W Bowers & Wilkins audio system.

The i5 also gets a comprehensive suite of driver assistance features, including adaptive cruise control, lane-keeping assist and autonomous emergency braking.

Its fixed panoramic glass roof has unique embedded LED lighting.

However, there are a few omissions that chauffeur-driven buyers may find difficult to overlook. A head-up display is absent, while smaller but genuinely useful features such as rear window sunshades, reclining rear seats, soft-close doors, a boss mode for the front passenger seat and rear-seat audio controls are all missing.

BMW i5 LWB Performance and Refinement – 8/10

The rear-wheel-drive i5 eDrive35L uses a single electric motor producing 272hp and 410Nm, figures that are remarkably similar to the mild-hybrid 530Li. However, the way it delivers its performance is entirely different. With peak torque available instantly, responses are smooth, effortless and distinctly EV-like. There are multiple drive modes on offer, each altering throttle response. Sport sharpens reactions noticeably, while Efficient is the most relaxed and efficiency-focused setting.

Retains a 50:50 weight distribution and RWD layout, but it has lost the sharpness and precision of earlier generations of the 5 Series.

BMW claims a 0-100kph time of 6.7 seconds, although our best run yielded 6.99 seconds. Interestingly, the 530Li is marginally quicker, recording 6.45 seconds for the same sprint, and it is also slightly faster in our 20-80kph and 40-100kph acceleration tests. 

The i5’s top speed is rated at 195kph, although acceleration begins to taper off noticeably beyond 100kph. In short, acceleration isn’t neck-snappingly quick, but there’s more than enough performance to keep things entertaining within legal limits.

Boost function unlocks the motor’s full potential for 10 seconds. If your’re already in Sport mode, it barely makes any difference.

The i5 also offers multiple regenerative braking settings, including Adaptive, High, Mid and Low. Of these, Adaptive stands out for its excellent calibration, intelligently varying regeneration and coasting based on traffic and road conditions. There’s also a dedicated one-pedal ‘B’ mode, selectable via the drive selector. It delivers regeneration comparable to the High setting but, unlike it, can bring the car to a complete stop without requiring any brake pedal input.

Braking performance itself is strong, although keen drivers may wish for a little more feel from the pedal. The transition between regenerative and mechanical braking leaves it feeling somewhat numb.

BMW i5 LWB Range and Efficiency – 6/10

BMW claims the i5’s 81.6kWh battery (net capacity is 76.3kWh) can deliver a range of up to 669km, a figure that appears rather optimistic. In our real-world range tests, the i5 eDrive35L returned an average efficiency of 5.06km/kWh, translating to an estimated range of 386km. It’s worth noting that the car was driven in its most efficiency-focused ‘Efficient’ mode throughout the test, with regenerative braking set to Adaptive.

We also connected the battery to a 60kW DC fast charger, where it took 47 minutes to charge from 20-80 percent state of charge. BMW additionally supplies a complimentary AC wallbox charger along with installation.

BMW i5 LWB Ride Comfort and Handling – 8/10

Ground clearance has been increased by 18mm compared to the international version; hence, it clears most speedbreakers easily.

With every successive generation, the 5 Series has become softer and more comfort-focused, and the i5 is arguably the most luxurious iteration yet. Despite riding on larger 20-inch wheels with lower-profile tyres than the petrol-powered 530Li, ride quality is seriously impressive. The i5 feels plush and remarkably absorbent over typical urban roads. Notably, it also benefits from rear air suspension, a feature absent on the 530Li.

In addition to the extended wheelbase, BMW has increased ground clearance by 18mm compared to the global standard-wheelbase model. The result is a luxury sedan that’s far better suited to Indian conditions. Even with four occupants on board, the i5 clears most speed breakers without drama. As a luxury car, then, it unquestionably gets the fundamentals right.

With a plush ride and increased ground clearance, the i5 is far better suited to Indian conditions.

However, the softer suspension setup and increased ground clearance have diluted some of the driver-focused character that defined earlier generations of the 5 Series. While it retains a near-perfect 50:50 weight distribution and rear-wheel-drive layout, there’s no escaping the fact that, in prioritising comfort and practicality, BMW has sacrificed a measure of the sharpness and precision that once made the 5 Series a benchmark for driving enthusiasts.

BMW i5 LWB Price and Verdict – 8/10

At Rs 79.60 lakh, the locally assembled i5 LWB has all the ingredients to become BMW India’s next EV success story alongside the iX1. With the i5 eDrive35L, BMW continues its successful long-wheelbase formula, maximising cabin space while building upon the strengths of the petrol-powered 5 Series, with which it shares much of its cabin, equipment and overall character. Buyers can also opt for extended warranty and prepaid maintenance packages of up to 10 years, in addition to the standard eight-year battery warranty.

Generous cabin space, comfy seats, a plush ride, and effortless performance make the i5 eDrive35L a compelling electric luxury sedan

That said, much like its petrol-powered sibling, some of the traditional 5 Series driving feel has been diluted. It also misses a few feel-good features, particularly those aimed at rear-seat occupants. More importantly, the spare wheel’s placement on the boot floor significantly compromises luggage-carrying ability.

So, is it worth paying the Rs 3 lakh premium over the petrol-powered 5 Series? The answer largely depends on your usage. The i5 eDrive35L makes sense for buyers registering it under a company name, thanks to the higher depreciation benefits available for EVs. It also suits those who cover significant distances and can take advantage of lower running costs. Generous cabin space, comfortable seats, a plush ride, respectable range and effortless performance make the i5 eDrive35L a compelling electric luxury sedan for buyers shopping in this segment.

12th Fail से भारत के Top Content Creator तक | Khushaal Pawaar Story | Mumbai| The Better India Hindi

12th Fail से भारत के Top Content Creator तक | Khushaal Pawaar Story | Mumbai| The Better India Hindi

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12th में दो बार फेल हुए, Theatre किया, Radio में काम किया, 8 साल Casting में बिताए फिर Bajrangi Bhaijaan फ़िल्म में अभिनय करने का मौका मिला… लेकिन उसके बाद भी अच्छे किरदार नहीं मिले।
Lockdown में इंतज़ार करने के बजाय Kushal Pawar ने खुद किरदार बनाने शुरू कर दिए,आज उनके बनाए किरदारों को लाखों लोग देखते हैं और उनमें खुद को पहचानते हैं। क्योंकि कभी-कभी मौका मिलने का इंतज़ार करने से बेहतर होता है खुद अपना मौका बनाना।
@khushaal_pawaar

Kushal Pawar Bajrangi Bhaijaan, 12th fail actor success, lockdown content creator success story, Indian content creator inspirational story

12th Fail से भारत के Top Content Creator तक | Khushaal Pawaar Story | Mumbai

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चाय की दुकान से Olympic सपने तक पहुंची ये खिलाड़ी बेटी | From Village Fields to the Olympic Dream

चाय की दुकान से Olympic सपने तक पहुंची ये खिलाड़ी बेटी  | From Village Fields to the Olympic Dream

हर खिलाड़ी की कहानी सिर्फ़ Medal से नहीं, उस सफर से बनती है जो उसे Medal तक पहुंचाता है। मौमिता मंडल का सफर भी कुछ ऐसा ही है, बिना सुविधाओं, नंगे पैर और सीमित संसाधनों के बीच अपने सपने को जिंदा रखा। सुबह 3 बजे उठना, घर का काम करना और 2 घंटे ट्रेन से Practice के लिए जाना उनकी रोज़ की मेहनत थी।
आज उनके नाम कई National Medals हैं, Indian Railways में नौकरी है और पिता को चाय की दुकान पर बैठने की जरूरत नहीं पड़ती।
लेकिन सपना अभी बाकी है—2028 Olympics में भारत के लिए Medal जीतना।
क्योंकि खिलाड़ी की असली ताकत उसकी जीत नहीं, हार के बाद भी मैदान में लौटने का हौसला होता है।

@itsmoumita___

चाय की दुकान से Olympic सपने तक पहुंची ये खिलाड़ी बेटी | From Village Fields to the Olympic Dream | Runner Moumita Mondal

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15 बार रिजेक्ट होने के बाद भी नहीं मानी हार…फिर ऐसे मिली 1.1 करोड़ की जॉब, वायरल हो रही सफलता की कहानी

सोशल मीडिया पर कभी ना हार मानने वाली एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है। लगातार 15 बार रिजेक्शन मिलने के बावजूद एक युवक ने अमेजन में नौकरी पाने की कोशिश नहीं छोड़ी। लगातार 15 बार रिजेक्शन मिलने के बावजूद एक युवक ने अमेजन में नौकरी पाने की कोशिश नहीं छोड़ी। भोपाल के लक्ष्मी नारायण कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने वाले इस युवक ने कंपनी में नौकरी के लिए बार-बार आवेदन किया। आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई और उसे अमेजन जर्मनी में काम करने का मौका मिल गया। कंपनी ने उसे करीब 1.1 करोड़ रुपये का सालाना पैकेज ऑफर किया है। उनकी यह कहानी अब सोशल मीडिया पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा पोस्ट

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर गंतव्य मालवीय की कहानी तेजी से वायरल हो रही है। पोस्ट के मुताबिक, गंतव्य मालवीय ने कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई नहीं की थी, लेकिन इंजीनियरिंग के दौरान ही उन्होंने टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में करियर बनाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने प्रोग्रामिंग और डेटा स्ट्रक्चर-एल्गोरिदम जैसी जरूरी स्किल्स सीखीं। इसके साथ ही उन्होंने मशीन लर्निंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट पर भी काम किया। अपनी जानकारी को मजबूत करने के लिए उन्होंने अलग-अलग प्रोजेक्ट और इंटर्नशिप के जरिए प्रैक्टिकल अनुभव हासिल किया।

लगातार करते रहे प्रयास

गंतव्य मालवीय अमेजन की नौकरी पाने के लिए लगातार कंपनी के करियर पेज पर नजर रखते थे और अपनी योग्यता के मुताबिक अलग-अलग पदों के लिए आवेदन करते रहे। शुरुआत में उन्हें 15 बार निराशा हाथ लगी, लेकिन उन्होंने कोशिश जारी रखी। आखिरकार उन्हें अमेजन जर्मनी में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इंजीनियर के पद के लिए चुना गया। LNCT के अनुसार, उन्हें करीब 1.10 करोड़ रुपये का पैकेज मिला। मालवीय अगस्त 2023 से अमेजन वेब सर्विसेज (AWS) में सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे हैं। उनके लिए यह नौकरी करियर की एक नई शुरुआत साबित हुई।

नई नौकरी की ज्वांइन

X पर हाल ही में एक पोस्ट में मालवीय ने बताया कि वह Amazon छोड़कर Taxfix में शामिल होने जा रहे हैं। उन्होंने इसे अपने करियर का अगला कदम बताया। मालवीय ने पोस्ट के साथ एक तस्वीर भी शेयर की, जिसमें वह कंपनी के लोगो वाला सिपर पकड़े नजर आए। तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा, “नई शुरुआत।”गंतव्य मालवीय की कहानी कई युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है। नौकरी के लिए कई बार असफल होने के बावजूद उन्होंने अपनी कोशिश जारी रखी और आखिरकार जर्मनी में टेक सेक्टर में अच्छा अवसर हासिल किया। उनकी कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों ने उनके जज्बे और लगातार मेहनत करने की तारीफ की। यूजर्स का कहना है कि सफलता देर से मिले, लेकिन अगर कोशिश जारी रहे तो लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

लोगों ने किया रिएक्ट

एक यूजर ने मालवीय की कहानी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “₹1.1 करोड़ का पैकेज शानदार है, लेकिन इससे भी बड़ी सीख उनकी पूरी प्रक्रिया से मिलती है। उन्होंने समय रहते तैयारी शुरू की, जरूरी स्किल्स पर काम किया, इंटर्नशिप की और अलग-अलग जगहों पर लगातार आवेदन करते रहे। 15 बार रिजेक्शन मिलने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरकार उन्हें मौका मिल गया।” वहीं, एक अन्य यूजर ने मजाकिया अंदाज में लिखा, “15 रिजेक्शन के बाद आखिरकार उनकी मेहनत रंग लाई।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “15 बार रिजेक्शन के बाद भी Amazon Germany में अपनी जगह बनाना वाकई उनकी लगन को दिखाता है।”

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

3 लाख की नौकरी, रिजेक्शन और ताना… 5 साल में इस लड़के ने कैसे हासिल किया 29 लाख का पैकेज?

कभी नौकरी के लिए दर-दर भटकने वाला एक इंजीनियर आज लाखों रुपये के पैकेज पर काम कर रहा है। 2019 में B.Tech करने के बाद इस युवक के पास न अच्छी नौकरी थी और न ही करियर को लेकर कोई स्पष्ट दिशा। कई बार रिजेक्शन और मुश्किलों का सामना करने के बावजूद उसने कोशिश जारी रखी। Reddit के r/Indian_flex पर शेयर की गई उसकी कहानी बताती है कि करियर की शुरुआत भले ही कमजोर हो, लेकिन आगे की राह बदली जा सकती है।

इंजीनियरिंग के बाद भी नहीं थी नौकरी की तैयारी

युवक ने बताया कि कॉलेज के दौरान उसका पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगता था। इंजीनियरिंग उसके लिए पसंद का करियर नहीं था। वह गेमिंग में काफी दिलचस्पी रखता था और दोस्तों के साथ वक्त बिताने में ज्यादा सहज महसूस करता था।

2019 में B.Tech पूरी करने के बाद उसका प्लेसमेंट नहीं हुआ। परिवार की उम्मीदें अलग थीं। पिता चाहते थे कि वह IT सेक्टर में अच्छी नौकरी हासिल करे। नौकरी नहीं मिलने की वजह से घर में तनाव बढ़ने लगा और युवक ने बेंगलुरु जाने का फैसला किया।

बेंगलुरु में भी नहीं बदली तस्वीर

नौकरी की तलाश में बेंगलुरु पहुंचने के बाद भी उसके सामने सबसे बड़ी परेशानी स्किल की कमी थी। कुछ दोस्तों के साथ रहते हुए शुरुआती दिन किसी नए कॉलेज लाइफ जैसे ही गुजरते रहे। इसी बीच एक रेफरेंस के जरिए उसे यूरोप बेस्ड स्टार्टअप में करीब ₹12,000 महीने की नौकरी मिली। लेकिन काम में जरूरी तकनीकी पकड़ नहीं होने के कारण वह वहां ज्यादा समय नहीं टिक पाया। करीब 20 दिन बाद उसकी नौकरी चली गई।

कोविड ने और बढ़ाई परेशानी

नौकरी जाने के कुछ ही समय बाद कोरोना महामारी आ गई। लॉकडाउन के कारण हालात और मुश्किल हो गए। आखिरकार जून 2020 में वह घर लौट आया। उस समय परिवार को लगता था कि वह नौकरी कर रहा है, जबकि वह कई महीनों से बेरोजगार था। माता-पिता के सवालों से बचने के लिए उसे अपनी नौकरी और सैलरी को लेकर झूठ तक बोलना पड़ा। करीब नौ महीने बाद आखिरकार उसे एक सर्विस बेस्ड कंपनी में नौकरी मिल गई। पैकेज था सिर्फ ₹3.37 LPA, लेकिन उसके लिए यह नौकरी किसी बड़ी राहत से कम नहीं थी।

यहीं से लौटा आत्मविश्वास

कम सैलरी के बावजूद इस नौकरी ने उसके अंदर एक बड़ा बदलाव किया। प्रोजेक्ट में उसका प्रदर्शन अच्छा रहा और वह टीम के प्रमुख परफॉर्मर्स में शामिल होने लगा। यहीं उसे महसूस हुआ कि शायद उसमें उतनी कमी नहीं है, जितना वह खुद समझता था। इसके बाद उसने बेहतर अवसरों के लिए इंटरव्यू देना शुरू किया।

कई बार ऑफर मिला, लेकिन किस्मत ने रोका

2022 में उसने ₹7.72 LPA के एक अवसर के लिए इंटरव्यू के सभी जरूरी राउंड पार कर लिए, लेकिन HR राउंड में कुल अनुभव से जुड़ी शर्त के कारण चयन नहीं हो पाया।

बाद में उसे Big4 कंपनी में ₹8.75 LPA का ऑफर मिला। नौकरी शुरू करने के कुछ ही समय बाद उसने ₹16.5 LPA का इंटरव्यू भी क्लियर किया, लेकिन करियर के शुरुआती गैप की वजह से HR राउंड में फिर रिजेक्शन हो गया।

यह उसके लिए बेहद निराशाजनक दौर था, क्योंकि तकनीकी और इंटरव्यू प्रक्रिया पार करने के बावजूद अंतिम चरण में मौका हाथ से निकल गया।

शादी से पहले बदली कमाई की तस्वीर

कुछ समय बाद उसकी शादी तय हुई। शादी से करीब 20 दिन पहले उसे एक नई कंपनी से ऑफर मिला और पैकेज बढ़कर ₹15.8 LPA हो गया। इसके बाद भी उसने ग्रोथ की तलाश जारी रखी। करीब एक साल बाद उसने फिर स्विच करने का फैसला किया और एक Big4 कंपनी से शुरुआत में ₹25.3 LPA का ऑफर मिला।

My Career Journey from Unemployed to Good Pay with heartbreaks

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नेगोशिएशन के बाद पहुंचा ₹29.05 LPA

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। दूसरी तरफ से काउंटर ऑफर मिलने के बाद पैकेज में और बदलाव हुआ। बातचीत के बाद Big4 कंपनी का ऑफर बढ़कर ₹29.05 LPA हो गया, जिसमें वैरिएबल और जॉइनिंग बोनस शामिल था। यानी जिस शख्स ने अपने करियर की शुरुआत ₹12 हजार महीने की नौकरी और फिर ₹3.37 LPA के पैकेज से की थी, वह कुछ वर्षों में करीब 29 लाख रुपये के पैकेज तक पहुंच गया।

‘मैं एक्सपर्ट नहीं, लेकिन कोशिश करता हूं’

युवक ने अपनी कहानी में खुद को प्रोग्रामिंग का बहुत बड़ा एक्सपर्ट नहीं बताया। उसका कहना है कि वह चीजों को समझने, काम पूरा करने और लगातार प्रयास करने पर भरोसा करता है। उसकी कहानी की खास बात यही है कि करियर में कई बार दरवाजे बंद हुए, लेकिन उसने कोशिश करना नहीं छोड़ा। नौकरी छूटने से लेकर रिजेक्शन और कम पैकेज तक, हर मुश्किल के बाद उसने अगला मौका तलाशा।

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कोडिंग छोड़कर जंगलों में रहकर, जानवरों से सीखा बिजनेस और खड़ा कर दिया करोड़ों का स्टार्टअप!

13 साल तक टेक्नोलॉजी की दुनिया में काम करने के बाद हैदराबाद के एक इंजीनियर ने अपना करियर बदलने का फैसला किया। उन्होंने IT की नौकरी छोड़कर वाइल्डलाइफ के अपने पुराने शौक को ही बिजनेस का रूप दे दिया। इस तरह ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ की शुरुआत हुई, जो जानवरों और नेचर से मिलने वाली सीख को कॉर्पोरेट ट्रेनिंग से जोड़ती है। बिना किसी बाहरी फंडिंग के शुरू हुई इस कंपनी ने पहले ही साल करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया।

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टेक से वाइल्डलाइफ तक

2010 में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने हैदराबाद, चेन्नई और मुंबई में काम किया। इसके बाद 2014 में डेटा साइंस में मास्टर्स करने के लिए अमेरिका चले गए। IT में काम करते हुए भी उनका नेचर और जानवरों से प्यार कम नहीं हुआ। वीकेंड पर वह DSLR कैमरा लेकर जंगल और नेशनल पार्क घूमने निकल जाते थे। धीरे-धीरे भारत, अमेरिका और अफ्रीका के कई नेशनल पार्कों में ट्रैवल ने उनकी इस दिलचस्पी को और बढ़ा दिया।

 

 

फोटोग्राफी से मिला नया बिजनेस विजन

शुरुआत में वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी उनके लिए जानवरों की फोटो लेने का एक शौक था। लेकिन बाद में उन्हें समझ आया कि जंगल सिर्फ खूबसूरत तस्वीरों के लिए नहीं, बल्कि जानवरों का व्यवहार, उनका एक-दूसरे के साथ जुड़ाव और मुश्किल कंडीशन में उनका सर्वाइव करना इंसानों को भी बहुत कुछ सिखा सकता है। इसी सोच ने आगे चलकर उनके बिजनेस आइडिया की नींव रखी।

 

 

जंगली जानवरों ने सिखाया कॉर्पोरेट मैनेजमेंट

‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ में जंगल और जानवरों के उदाहरणों के जरिए कॉर्पोरेट टीमों को कई जरूरी बातें सिखाई जाती हैं। जैसे, शेरों से टीमवर्क, चींटियों से काम बांटने यानी डेलिगेशन और मधुमक्खियों से खतरे के समय मिलकर काम करने की सीख ली जाती है। इन उदाहरणों को लीडरशिप, टीमवर्क, मुश्किल समय में मजबूती से टिके रहने और माइंडफुलनेस जैसे सब्जेक्ट से जोड़ा जाता है।

 

 

जंगल बना ट्रेनिंग क्लासरूम

यह बिजनेस सिर्फ ऑफिस में बैठकर होने वाली सामान्य ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है। कंपनी कॉर्पोरेट वर्कशॉप के साथ-साथ कई दिनों तक चलने वाले जंगल के एक्सपीरियंस भी कराती है। इन प्रोग्राम्स में टीम के लोगों को नेचर के पास ले जाकर ऐसी एक्टिविटी कराई जाती हैं, जिनसे वे लीडरशिप और मुश्किल हालात में सही फैसला लेने जैसी चीजें सीख सकें। इस तरह जंगल एक तरह से उनका अलग और अनोखा ट्रेनिंग क्लासरूम बन जाता है।

 

लाखों के आइडिया का हिट फॉर्मूला

इस अनोखे बिजनेस आइडिया को कॉर्पोरेट कंपनियों से अच्छा रिस्पॉन्स मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, बिना इन्वेस्टमेंट के शुरू हुई ‘वाइल्डलाइफ व्हिस्परर्स’ ने अपने पहले साल में करीब 80 लाख रुपये का रेवेन्यू कमाया। कंपनी ने परफेटी वैन मेले और सीमेंस डिजिटल जैसी कंपनियों के साथ काम किया है। इस बिजनेस में टेक्नोलॉजी और कॉर्पोरेट एक्सपेरिएंस को नेचर और वाइल्डलाइफ के जुनून के साथ जोड़कर एक बिल्कुल अलग तरह का मॉडल तैयार किया गया है।

 

यह कहानी बताती है कि करियर शिफ्ट करने के साथ अपने जुनून पर भरोसा करना भी जरूरी है। सही सोच और मेहनत के साथ पसंद के काम को भी एक सफल बिजनेस बनाया जा सकता है। नेचर से सीख लेकर शुरू किया गया यह अनोखा सफर दूसरों को भी अपनी स्किल और इंटरेस्ट को नए तरीके से देखने के लिए इंस्पिरेशन देता है।

एक दांत के इलाज के ₹2.37 लाख! NRI ने जब भारत की फ्लाइट का किराया देखा तो खुद ही रह गया हैरान

अमेरिका में 15 साल से रह रहे भारतीय नितिन मल्होत्रा इन दिनों सोशल मीडिया पर अपने एक अनुभव की वजह से चर्चा में हैं। दांत में दर्द होने पर वह इलाज के लिए डेंटिस्ट के पास पहुंचे थे, लेकिन वहां उन्हें जो खर्च बताया गया, उसने उन्हें हैरान कर दिया। इंश्योरेंस होने के बावजूद करीब 2,500 डॉलर यानी लगभग ₹2.37 लाख अपनी जेब से देने की बात सामने आई। इसके बाद नितिन ने अमेरिका और भारत में डेंटल ट्रीटमेंट की लागत की तुलना करते हुए एक सवाल अपने फॉलोअर्स के सामने रख दिया।

दांत में दर्द हुआ तो पहुंचे डॉक्टर के पास

नितिन ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए वीडियो में बताया कि दांत में तकलीफ होने के बाद वह जांच के लिए डेंटिस्ट के पास गए। क्लिनिक में सबसे पहले उनसे पूछा गया कि उनके पास कौन सा डेंटल इंश्योरेंस है। इंश्योरेंस कार्ड दिखाने के बाद उनके दांत का एक्स-रे किया गया।

नितिन के मुताबिक, सिर्फ एक्स-रे के लिए उनसे 180 डॉलर यानी करीब ₹17 हजार चार्ज किए गए। इसके बाद डॉक्टर ने जांच करके इलाज का अनुमानित खर्च बताया।

इंश्योरेंस के बाद भी देना था ₹2.37 लाख

नितिन का कहना है कि क्लिनिक ने उन्हें बताया कि सामान्य तौर पर इलाज का बिल करीब 8,000 डॉलर यानी लगभग ₹7.60 लाख हो सकता है। हालांकि, इंश्योरेंस के तहत एडजस्टमेंट के बाद उनकी जेब से 2,500 डॉलर देने की बात कही गई। इतनी बड़ी रकम सुनकर नितिन ने भारत में होने वाले डेंटल ट्रीटमेंट की कीमत से इसकी तुलना की। उनका कहना था कि भारत में दांतों की सफाई, रूट कैनाल और दूसरे इलाज अपेक्षाकृत कम खर्च में हो सकते हैं।

इलाज से सस्ती लगी भारत की फ्लाइट

नितिन ने बताया कि उन्होंने अमेरिका से भारत की फ्लाइट का किराया भी चेक किया। उनके मुताबिक, टिकट करीब 1,200 डॉलर यानी लगभग ₹1.14 लाख में मिल रही थी। यहीं से उनके मन में सवाल आया कि अगर भारत की फ्लाइट का खर्च ही करीब 1.14 लाख रुपये है और अमेरिका में सिर्फ डेंटल ट्रीटमेंट के लिए 2.37 लाख रुपये देने पड़ रहे हैं, तो क्यों न भारत जाकर इलाज कराया जाए।

‘क्या मुझे भारत जाकर इलाज कराना चाहिए?’

नितिन ने वीडियो में अपने फॉलोअर्स से पूछा कि ऐसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए। अमेरिका में इलाज कराएं या भारत आकर दांतों का इलाज करवाएं? उन्होंने दावा किया कि भारत में रूट कैनाल, दांतों की सफाई और अन्य डेंटल केयर करीब ₹10 हजार से ₹15 हजार में हो सकती है। हालांकि, इलाज की वास्तविक कीमत डॉक्टर, शहर, प्रक्रिया और मरीज की स्थिति के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।

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सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा?

नितिन के वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स की भी खूब प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने अमेरिका में डेंटल केयर को बेहद महंगा बताया। एक यूजर ने लिखा कि ऐसी स्थिति में भारत की फ्लाइट बुक करना ही बेहतर है। एक अन्य यूजर ने कहा कि अमेरिका में दांतों का इलाज वाकई काफी महंगा पड़ता है। वहीं एक कमेंट में नितिन की तुलना पर सहमति जताते हुए लिखा गया कि यहां तो फ्लाइट का खर्च ही इलाज से कम नजर आ रहा है।

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