भारत के तकनीकी क्षेत्र में नौकरी पाना इन दिनों कई युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इसी बीच रेडिट पर एक नौकरी तलाश रहे शख्स की पोस्ट ने लोगों का ध्यान खींचा है। करीब दो साल के अनुभव वाले इस व्यक्ति ने दावा किया कि वह सैकड़ों नौकरियों के लिए आवेदन कर चुका है, लेकिन उसे बहुत कम जगहों से जवाब मिला। शख्स ने बताया कि करीब 500-600 आवेदन भेजने के बावजूद उसकी स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। इसके उलट, सोशल मीडिया और रेडिट पर उसे लगातार ऐसी कहानियां दिखाई दे रही थीं, जिनमें लोगों को नौकरी से निकाले जाने के कुछ ही महीनों बाद बड़ी तकनीकी कंपनियों से नए प्रस्ताव मिल रहे थे।
किसी को अमेजन के बाद गूगल, तो किसी को मेटा के बाद कई ऑफर
रेडिट उपयोगकर्ता ने कुछ ऐसी पोस्ट का जिक्र किया, जिन्हें देखकर वह खुद को दूसरों से बिल्कुल अलग स्थिति में महसूस करने लगा। एक व्यक्ति ने दावा किया कि अमेजन से नौकरी जाने के करीब पांच महीने बाद उसे गूगल में नौकरी मिल गई। एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि नौकरी जाने के सिर्फ तीन महीने के भीतर उसे 25 प्रतिशत अधिक वेतन वाली नई नौकरी मिल गई। इतना ही नहीं, नौकरी की तलाश के दौरान वह विदेश यात्रा पर भी गया।
सबसे ज्यादा हैरानी एक अन्य दावे से हुई, जिसमें एक व्यक्ति ने बताया कि मेटा से नौकरी जाने के बाद उसने गूगल, एप्पल और ओपनएआई में साक्षात्कार दिए और तीनों जगह से उसे नौकरी के प्रस्ताव मिले। आखिर में उसने गूगल को चुना।
दूसरी तरफ 500-600 आवेदन के बाद भी इंतजार
इन कहानियों की तुलना करते हुए मूल पोस्ट लिखने वाले शख्स ने सवाल किया कि क्या वह किसी अलग ही दुनिया में रह रहा है। उसके मुताबिक, जहां कुछ लोग बड़ी तकनीकी कंपनियों के प्रस्ताव आसानी से हासिल कर रहे हैं, वहीं उसे सैकड़ों आवेदन भेजने के बाद भी मुश्किल से कोई प्रतिक्रिया मिल रही है। उसने बताया कि अब तक उसका सबसे अच्छा नतीजा एक अस्थायी छह महीने की नौकरी के लिए बातचीत तक पहुंचना रहा है।
क्या बड़ी कंपनियों का अनुभव ही सबसे बड़ा फर्क है?
पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए एक उपयोगकर्ता ने सवाल उठाया कि क्या नौकरी तलाश रहे व्यक्ति का दो साल का अनुभव भी मेटा या अमेजन जैसी कंपनियों में रहा है। उसका तर्क था कि बड़ी तकनीकी कंपनियों में पहले से काम कर चुके लोगों के लिए नई नौकरी पाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, क्योंकि ऐसी कंपनियों में चयन अपने आप में कठिन माना जाता है। एक अन्य व्यक्ति ने इसी चर्चा के बीच नौकरी के लिए मदद और संदर्भ की मांग भी कर दी।
कुछ लोगों ने सोशल मीडिया की सफलता की कहानियों पर उठाए सवाल
हर किसी ने इन सफलता की कहानियों को सच नहीं माना। कुछ रेडिट उपयोगकर्ताओं ने कहा कि इंटरनेट पर दिखाई जाने वाली ऐसी पोस्ट पूरी तस्वीर नहीं दिखातीं। एक टिप्पणी में इन्हें प्रभावशाली लोगों द्वारा लोगों को झूठी उम्मीद देने वाला प्रचार तक बताया गया। यानी ऑनलाइन कुछ लोगों की तेज सफलता देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर तकनीकी पेशेवर के लिए नौकरी का बाजार एक जैसा है।
एक जवाब ने कहा- समस्या औसत होने की भी हो सकती है
चर्चा में एक टिप्पणी ने सबसे सीधा जवाब दिया। उपयोगकर्ता ने तर्क दिया कि अत्यधिक कुशल लोग अक्सर कई कंपनियों के लिए आकर्षक उम्मीदवार होते हैं। ऐसे लोग कम समय में जटिल समस्याओं को हल करने की क्षमता रखते हैं, इसलिए उन्हें नौकरी के ज्यादा अवसर मिल सकते हैं। हालांकि, उस टिप्पणी में यह भी कहा गया कि औसत होना कोई बुरी बात नहीं है। कौशल को लगातार मेहनत और सीखने के जरिए बेहतर बनाया जा सकता है। यही वजह है कि इस पूरी चर्चा ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है क्या तकनीकी क्षेत्र में नौकरी पाने के लिए सिर्फ अनुभव काफी है, या सही कौशल और क्षमता भी उतनी ही जरूरी है?
दिल्ली मेट्रो में जब भारत के पूर्व तेज गेंदबाज जवागल श्रीनाथ खड़े दिखे तो उन्हें मैट्रो में सफर करते देश कई लोग आशचर्यचकित हो गए। 90 के दशक में भारत के प्रमुख गेंदबाज एक सूटकेस लेकर कहीं जा रहे थे। उनका यह फोटो सोशल मीडिया पर खासा वायरल हुआ।
जवागल श्रीनाथ जब 90 के दशक में टीम इंडिया से जुड़े तो भारतीय टीम में तेज तर्रार गेंदबाज की कमी थी।उनकी तेज गेंदो के कारण उनको मैसूर एक्सप्रेस कहा जाने लगा। उनका गेंदबाजी एक्शन एक दम किताबी था। कर्नाटक के गेंदबाज श्रीनाथ ने 4 विश्वकप खेले।
Meet Javagal Srinath
He is the only Indian fast bowler to capture over 300 wickets in One Day Internationals (finishing with 315 ODI wickets).
Test Record: He was the second Indian pace bowler (after Kapil Dev) to reach 200 Test wickets, concluding his Test career with 236… pic.twitter.com/rQqu1SMim8
पोलॉक ने वेस्टइंडीज के पूर्व तेज गेंदबाज माइकल होल्डिंग और इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्रॉड के साथ एक कार्यक्रम पर कहा था, ‘मुझे लगता है कि भारत के जवागल श्रीनाथ को वह श्रेय नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।’
पोलॉक की बात से कई लोग इत्तेफाक रखते हैं। हालांकि इसका एक कारण प्रतियोगिता भी हो सकता है। श्रीनाथ के दौर में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में तेज गेंदबाजों की शानदार जोड़िया थी। पाकिस्तान के वसीम अकरम और वकार यूनुस, वेस्टइंडीज के लिए कर्टली एम्ब्रोस और कर्टनी वाल्श, ऑस्ट्रेलिया के ग्लेन मैक्ग्रा और ब्रेट ली शामिल थे। न्यूजीलैंड की ओर से डियोन नैश और क्रिस क्रेन्स की जोड़ी थी। दक्षिण अफ्रीका टीम में खुद शॉन पॉलोक और एलेन डॉनाल्ड बहुत घातक थे।
इस कारण जवगल श्रीनाथ भारतीय फैंस के बीच तुलना के शिकार हो गए। उनकी वेंकटेश प्रसाद के साथ जोड़ी थी, इस जोड़ी ने भारत को बीच बीच में सफलता तो दिलाई लेकिन विदेशी गेंदबाजों जितनी प्रभावी यह जोड़ी नहीं थी।
ऐसा रहा करियर
जवागल श्रीनाथ 90 के दशक में भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण के अगुवा रहे। श्रीनाथ ने 1991 से 2003 के बीच 67 टेस्ट और 229 एकदिवसीय खेले है, जिसमें उन्होंने क्रमशः 236 और 315 विकेट लिए हैं।
भारत में अक्सर युवाओं को बताया जाता है कि IIT की पढ़ाई, FAANG जैसी बड़ी टेक कंपनियों में नौकरी या Data Structures and Algorithms (DSA) में महारत हासिल करना अच्छी कमाई का सबसे आसान रास्ता है। लेकिन टेक और AI कमेंटेटर साक्षी ने सोशल मीडिया पर एक मजेदार लिस्ट शेयर कर इस सोच को ही उलट दिया। उन्होंने भारत में इस समय सबसे ज्यादा कमाई करने वाले लोगों की एक मजाकिया रैंकिंग साझा की, जिसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर टॉप पर नहीं, बल्कि काफी पीछे नजर आए। इस लिस्ट में PG मालिक, मकान मालिक, पानी के टैंकर वाले और चाय-सिगरेट की दुकान चलाने वाले शामिल हैं।
नंबर-1 पर PG मालिक, एक कमरे से लाखों की कमाई
साक्षी की इस मजेदार रैंकिंग में सबसे ऊपर PG मालिक को रखा गया। उन्होंने बताया कि शहरों में बढ़ती नौकरी और किराए की मांग का फायदा PG के मालिकों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, एक कमरे में तीन लोगों को रखा जाता है और हर व्यक्ति से करीब ₹10,000 से ₹15,000 तक किराया लिया जाता है। इस हिसाब से कुछ PG मालिक किराया और दूसरे खर्च निकालने के बाद भी ₹1 लाख से ₹1.5 लाख महीने तक कमा सकते हैं। यही वजह है कि पोस्ट में PG बिजनेस को आज के दौर के सबसे कमाई वाले कामों में से एक बताया गया।
बेंगलुरु के मकान मालिक भी पीछे नहीं
लिस्ट में तीसरे नंबर पर बेंगलुरु के मकान मालिक का जिक्र किया गया। टेक सिटी में किराए की बढ़ती मांग को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चाएं होती रहती हैं। पोस्ट में मजाकिया अंदाज में बताया गया कि दो बेडरूम का फ्लैट खरीदकर उसे करीब ₹50,000 महीने के किराए पर देना, हर साल किराया बढ़ाना और WhatsApp पर सिर्फ ‘last price’ लिखकर बातचीत खत्म करना भी कमाई का शानदार तरीका बन गया है।
पानी के टैंकर वाले भी बने ‘बिजनेस किंग’
बेंगलुरु में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। इसी को लेकर साक्षी ने पानी के टैंकर संचालकों को भी अपनी लिस्ट में जगह दी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा कि ये लोग बेंगलुरु का ही पानी वापस बेंगलुरु के लोगों को बेचते हैं। पानी की कमी के समय टैंकरों की मांग बढ़ने से इस कारोबार की कमाई भी बढ़ जाती है।
ब्रोकरों की कमाई का भी किया जिक्र
रैंकिंग में प्रॉपर्टी ब्रोकर भी शामिल हैं। पोस्ट के मुताबिक, कुछ ब्रोकर किरायेदारों को कई ऐसे घर दिखाते हैं जो उनकी जरूरत के मुताबिक नहीं होते और आखिर में डील होने पर किरायेदार और मकान मालिक, दोनों से करीब एक महीने के किराए के बराबर कमीशन ले लेते हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों में लगातार घर बदलने वाले किरायेदारों की बड़ी संख्या के कारण यह काम भी अच्छी कमाई वाला बताया गया।
टेक पार्क के बाहर चाय-सिगरेट वाला भी हिट
इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर जिस शख्स को रखा गया, वह शायद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम है टेक पार्क के बाहर चाय, सिगरेट और स्नैक्स बेचने वाला दुकानदार। साक्षी ने उसे टेक इंडस्ट्री का ‘अनसंग हीरो’ बताया। उनके अनुसार, हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोजाना चाय, सिगरेट और स्नैक्स के लिए ऐसी दुकानों पर निर्भर रहते हैं। पोस्ट में अनुमान लगाया गया कि अच्छी लोकेशन वाली ऐसी दुकान से कुछ दुकानदार ₹30,000 से ₹50,000 महीने तक कमा सकते हैं।
न MBA, न फंडिंग, फिर भी कमाई!
इस पूरी पोस्ट का सबसे मजेदार हिस्सा यही था। चाय-सिगरेट की दुकान के लिए न किसी MBA की जरूरत है, न pitch deck की और न ही startup funding की। साक्षी ने इसी अंदाज में टेक इंडस्ट्री पर तंज कसते हुए बताया कि जहां इंजीनियर नौकरी और प्रमोशन के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहीं कुछ छोटे कारोबारी रोजमर्रा की जरूरतों के दम पर अच्छी कमाई कर रहे हैं।
सॉफ्टवेयर इंजीनियरों पर आया सबसे बड़ा तंज
पोस्ट के अंत में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को लेकर सबसे मजेदार टिप्पणी की गई। साक्षी ने लिखा कि जब बाकी लोग अलग-अलग तरीकों से कमाई कर रहे हैं, तब सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात 2 बजे तक DSA के सवाल हल कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि अगली salary hike अच्छी होगी।
सोशल मीडिया यूजर्स ने भी लिए मजे
साक्षी की पोस्ट को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और इसे खबर लिखने तक 1.5 लाख से ज्यादा व्यूज मिले। यूजर्स ने भी अपने-अपने अंदाज में इस रैंकिंग पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने मजाक करते हुए कहा कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कमाई का सबसे मुश्किल रास्ता चुना है और उन्हें DSA की तैयारी के बजाय पानी का टैंकर खरीद लेना चाहिए था। एक अन्य यूजर ने बेंगलुरु का असली ‘product-market fit’ AI या सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि चाय, प्रॉपर्टी और मेट्रो से दूरी का गणित बताया। एक यूजर ने टैक्स को लेकर भी तंज कसा और कहा कि इन कामों में कमाई करने वालों में शायद सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही ऐसा व्यक्ति है जो नियमित रूप से इनकम टैक्स और ITR जैसी चीजों से जूझता है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।
Max Verstappen has signed a multi-year contract extension with Red Bull Racing, ending long-standing speculation about his future in Formula 1. The four-time F1 world champion’s current contract already ran until 2028, albeit with performance-related clauses. The new deal will see him stay with Red Bull Racing until at least the end of the 2030 season.
“I am really pleased with the contract extension. We have the best people and I’m excited to keep working together with everyone to get back to the top again. This remains the ultimate goal that all of us have been working towards and will continue to pursue,” Verstappen said.
Verstappen extends Red Bull contract by two years
Dutchman has won 4 F1 drivers’ titles and 71 races with the team so far
The Verstappen-Red Bull partnership has been one of the most successful in F1 history. Verstappen first joined the team back in 2026, following a mid-season promotion from the sister Toro Rosso team. Since then, he’s won four drivers’ titles and 71 races with Red Bull Racing.
However, Verstappen has been a vocal critic of the new power unit regulations. Red Bull has also had its fair share of reliability and balance concerns this season, and the team’s management has changed significantly in the recent months. All of this has further fuelled speculation linking Verstappen to a potential switch to Mercedes or McLaren. But he’s put that speculation to rest on the eve of his home race at Zandvoort.
“I have always said it: The team [Red Bull Racing] is like a second family for me and I feel very at home. I came to the team hoping to be able to win races. What we went on to achieve together has been simply lovely and we have shared many incredible moments and won four World Championships. To continue this journey with the same team that I have been with my whole career is really special and something I have always wanted to do,” Verstappen stated.
“Getting to work with Laurent now for over a year has also been great, I see a clear vision he has for the team. Everyone in Milton Keynes believes in what we are building and I am looking forward to the next chapter, fighting for more victories and competing for championships as we continue to shape the future of this Team. To make this announcement during the last Grand Prix at Zandvoort is a great moment for me as well. Hopefully we can give the fans a special send-off for the final race.”
Red Bull Racing F1 team principal Laurent Mekies added, “Having Max continue with us and retaining the best driver on the grid is fantastic news for everyone at Red Bull, Oracle Red Bull Racing, as well as F1 and motorsport as a whole.”
कई लोग नौकरी के इंटरव्यू की तैयारी करते समय अपने रिज्यूमे, अनुभव और संभावित सवालों पर पूरा ध्यान देते हैं। वहीं, इंटरव्यू के अंत में जब उम्मीदवार से पूछा जाता है कि “क्या आपके मन में कोई सवाल है?”, तो अधिकतर लोग इसे सिर्फ एक औपचारिकता मानते हैं। ऐसे में वे सैलरी, छुट्टियों, प्रमोशन या ऑफिस की सुविधाओं से जुड़े सामान्य सवाल पूछकर इंटरव्यू खत्म कर देते हैं। हालांकि, करियर विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरव्यू का यह आखिरी हिस्सा आपकी सोच, काम के प्रति नजरिया और प्रोफेशनल एटीट्यूड दिखाने का बेहतरीन मौका होता है।
सही सवाल न केवल इंटरव्यूअर पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, बल्कि ये भी दिखाता है कि आप केवल नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि कंपनी की जरूरतों और अपनी भूमिका को समझने में भी रुचि रखते हैं। कई बार एक अच्छा सवाल आपकी छवि को अन्य उम्मीदवारों से अलग बना सकता है और चयन की संभावनाएं भी बढ़ा सकता है।
10 साल का भर्ती का अनुभव
फराह शारगी ने पिछले एक दशक में Google, Uber और The New York Times जैसी बड़ी कंपनियों में भर्ती की है। उनका कहना है कि इंटरव्यू के अंतिम मिनटों में उम्मीदवारों के सवाल ये बताते हैं कि वो सिर्फ नौकरी चाहते हैं या वास्तव में कंपनी की जरूरत को भी समझना चाहते हैं। उनके मुताबिक, इंटरव्यू के अंत तक रिक्रूटर उम्मीदवार की तकनीकी क्षमता का काफी हद तक आकलन कर चुका होता है। इसके बाद वह उम्मीदवार की सोच और काम करने के नजरिए को समझना चाहता है।
वह एक सवाल जो बना सकता है आपको सबसे अलग
फराह शारगी के अनुसार, सबसे प्रभावशाली सवाल यह है:
“इस समय सबसे बड़ी समस्या क्या है, जिसे हल करने के लिए आप इस पद पर किसी को नियुक्त करना चाहते हैं?” उनका कहना है कि कंपनियां सिर्फ पद भरने के लिए भर्ती नहीं करतीं। हर नई भर्ती के पीछे कोई न कोई समस्या होती है, जिसे कंपनी हल करना चाहती है। जो उम्मीदवार इस नजरिए से सवाल पूछता है, वह दिखाता है कि वो पहले से ही खुद को उस भूमिका में सोच रहा है।
क्यों पसंद आता है यह सवाल?
शारगी के मुताबिक, जब उम्मीदवार इस तरह का सवाल ईमानदारी से पूछता है, तो वह भीड़ से अलग नजर आता है। इससे रिक्रूटर को लगता है कि यह व्यक्ति सिर्फ नौकरी पाने के लिए नहीं, बल्कि कंपनी की समस्या सुलझाने के लिए भी तैयार है।
ये 3 सवाल भी छोड़ते हैं अच्छा प्रभाव
फराह शारगी ने इंटरव्यू के दौरान पूछे जाने वाले तीन और उपयोगी सवाल बताए हैं:
एक साल बाद आपको कैसे लगेगा कि इस पद के लिए सही व्यक्ति चुना गया?
आपकी टीम में ऐसा कौन-सा कर्मचारी है, जिसकी तरह आप एक और व्यक्ति चाहते हैं?
इस नौकरी का कौन-सा हिस्सा है, जिसे लोग अक्सर कम आंकते हैं?
इन सवालों से क्या फायदा होगा?
इन सवालों के जरिए उम्मीदवार यह समझ सकता है कि:
कंपनी सफलता को कैसे मापती है।
टीम में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले लोगों की क्या खासियत होती है।
इस भूमिका में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं।
इंटरव्यू को सिर्फ परीक्षा नहीं, सीखने का मौका समझें
फराह शारगी का कहना है कि इंटरव्यू केवल खुद को साबित करने का मंच नहीं है। इसे कंपनी की जरूरतों और उस समस्या को समझने का अवसर भी मानना चाहिए, जिसे हल करने के लिए आपको नियुक्त किया जा सकता है। यही सोच उम्मीदवार को दूसरों से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाती है।
फेंगशुई (Feng Shui) एक प्राचीन चीनी पद्धति है, जिसे घर और ऑफिस (Office) में सकारात्मक ऊर्जा (positive energy) बनाए रखने के लिए अपनाया जाता है। इसमें धातु को पांच प्रमुख तत्वों में से एक माना गया है, जो प्रोग्रेस, डिसिप्लिन और सुख-समृद्धि का प्रतीक है। मान्यता है कि सही जगह पर धातु की कलाकृतियां (metal artifacts) रखने से घर का माहौल पॉजिटिव बना रहता है। आइए जानते हैं फेंगशुई में धातु की कलाकृतियों का क्या महत्व है और इन्हें किस तरह इस्तेमाल करना शुभ (auspicious) माना जाता है:
घर का माहौल बदल सकती है ये छोटी-सी चीज
फेंगशुई (Feng Shui) के अनुसार धातु की कलाकृतियां (Feng Shui) घर या ऑफिस में एनर्जी के फ्लो को बैलेंस करने में मदद करती हैं। खासतौर पर पीतल, तांबा, स्टील या कांस्य से बनी डेकोरेटिव आइटम नकारात्मक ऊर्जा (negative energy) को कम कर सकारात्मक माहौल बनाने का प्रतीक मानी जाती हैं। इन्हें ऐसी जगह रखना बेहतर माना जाता है, जहां लोग सबसे ज्यादा समय बिताते हैं।
सफलता से जुड़ा है इसका खास कनेक्शन
धातु तत्व (metal element) को फोकस, डिसिप्लिन और डिसीजन लेने की एबिलिटी से जोड़ा जाता है। इसलिए ऑफिस (offices), स्टडी रूम (study room) या वर्कप्लेस (workplace) में धातु की कलाकृतियां (metal artifact) रखने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि इससे काम के प्रति एकाग्रता बढ़ती है और करियर (career) या व्यवसाय (business) में नई संभावनाओं का माहौल बनता है।
खुशहाली का छिपा हुआ राज
फेंगशुई में धातु के सिक्के (metal coin), धातु का जहाज (metal ship model), सुनहरे रंग की कलाकृतियां (gold-colored artifact) या धातु से बने शुभ प्रतीकों (metal symbol) को धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इन्हें घर के उत्तर-पश्चिम या पश्चिम दिशा में रखने की सलाह दी जाती है, ताकि पॉजिटिव एनर्जी का बैलेंस बना रहे।
सजावट के साथ मिलेगा डबल फायदा
धातु की कलाकृतियां (Metal artifact) केवल फेंगशुई के लिहाज से ही नहीं, बल्कि इंटीरियर डेकोरेशन में भी खास भूमिका निभाती हैं। मॉडर्न डिजाइन वाली मेटल वॉल आर्ट, मूर्तियां या हैंगिंग पीस घर को स्टाइलिश और एलिगेंट लुक देते हैं। इससे घर का माहौल भी ज्यादा ऑर्गेनाइज्ड और अट्रैक्टिव दिखाई देता है।
मन को सुकून देने वाला आसान तरीका
फेंगशुई के अनुसार धातु तत्व मेंटल क्लैरिटी और इमोशनल बैलेंस का प्रतीक है। शांत और सुंदर धातु की कलाकृतियां (metal artifact) देखने से मन को सुकून महसूस हो सकता है और घर में सकारात्मक वातावरण का एहसास बढ़ सकता है। हालांकि इसे व्यक्तिगत आस्था के रूप में देखा जाता है।
एक छोटी-सी गलती बिगाड़ सकती है असर
फेंगशुई में धातु तत्व के लिए पश्चिम (West) और उत्तर-पश्चिम दिशा (Northwest direction) को शुभ माना जाता है। इसलिए धातु की कलाकृतियों को इन दिशाओं में रखना बेहतर माना जाता है। साथ ही इन्हें हमेशा साफ और अच्छी कंडीशन में रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि टूटी या जंग लगी वस्तुएं शुभ नहीं मानी जातीं।
इसे अपनाते समय भूलकर भी न करें ये काम
फेंगशुई में किसी भी एलिमेंट का बैलेंस सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए पूरे घर में केवल धातु की डेकोरेटिव आइटम (decorative item) रखने के बजाय लकड़ी, पौधे, पानी और मिट्टी जैसे अन्य तत्वों के साथ बैलेंस बनाकर डेकोरेट करने की सलाह दी जाती है। इससे घर का वातावरण बैलेंस्ड और खूबसूरत बना रहता है।
अच्छी सैलरी और बड़ी कंपनी में नौकरी हर किसी का सपना होती है। वहीं 31 वर्षीय सान्या देशमुख ने इससे बिल्कुल अलग रास्ता चुना। सान्या देशमुख ने कई साल तक बड़ी टेक कंपनियों में काम करते हुए अपना सफल करियर बनाया। 31 वर्षीय सान्या डिजिटल मार्केटिंग के क्षेत्र में बाइटडांस, इनमोबी और अमेजन जैसी नामी कंपनियों से जुड़ी रहीं। अमेजन में काम करते हुए उनकी सालाना सैलरी करीब 30 से 35 लाख रुपये थी। वहीं उनके पति की भी लगभग इतनी ही कमाई थी, जिससे दोनों की कुल सालाना आय 60 से 65 लाख रुपये के आसपास पहुंच गई थी।
लेकिन सान्या देशमुख के पास अच्छी नौकरी के बाद भी उन्हें धीरे-धीरे महसूस होने लगा कि मुंबई की भागदौड़ भरी जिंदगी उनके लिए सही नहीं है। इसके बाद उन्होंने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ने का फैसला किया। अब वह नासिक में रहकर अपने बिजनेस पार्टनर के साथ डिजिटल मार्केटिंग का काम करती हैं।
कई जगहों पर किया काम
पुणे से कंप्यूटर इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद सान्या देशमुख ने पारंपरिक इंजीनियरिंग की नौकरी करने के बजाय डिजिटल मार्केटिंग को अपना करियर बनाया। शुरुआत में उन्होंने फूड से जुड़ा एक सोशल मीडिया प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसकी लोकप्रियता ने उन्हें एक बड़ी डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी में नौकरी दिलाने में मदद की। इसके बाद उन्होंने लगातार अपने करियर में तरक्की की और कई बड़ी कंपनियों में काम किया। सान्या पहले बाइटडांस से जुड़ीं, फिर भारत में बाइटडांस का कारोबार बंद होने के बाद उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद वह इनमोबी पहुंचीं और बाद में अमेजन के विज्ञापन कारोबार से जुड़े विभाग में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
करियर में आगे बढ़ते हुए सान्या ने शुरुआती पद से शुरुआत की और धीरे-धीरे टीम लीडर की जिम्मेदारी तक पहुंचीं। अमेजन में सान्या देशमुख को अपना काम पसंद था, लेकिन कॉर्पोरेट लाइफ की भागदौड़ धीरे-धीरे उनके लिए थकाऊ होती गई। उनके माता-पिता औरंगाबाद में और पति नासिक में रहते थे।
काफी त्योहार मिस किए
सान्या देशमुख ने मनीकंट्रोल से कहा, “अब मुझे सोमवार आने से पहले रविवार वाली घबराहट या तनाव महसूस नहीं होता।” सान्या देशमुख ने बताया, “शुरुआत में हमें हफ्ते में दो दिन ऑफिस आना होता था। बाद में यह तीन दिन और फिर पूरे पांच दिन हो गया। मैं हर रविवार शाम मुंबई के लिए निकलती थी, ऑफिस से काम करती थी और फिर वापस घर लौट आती थी।” उन्होंने बताया कि शादी के बाद लगातार शहरों के बीच सफर करना और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाना उनके लिए धीरे-धीरे काफी मुश्किल और थकाने वाला हो गया था।
सान्या देशमुख ने कहा, “परिवार के कार्यक्रमों, त्योहारों और दूसरे खास मौकों पर शामिल होने के लिए हमें अक्सर छुट्टी लेनी पड़ती थी। ऐसे में कई बार हमें अपनों के साथ समय बिताने और भविष्य की यात्रा के लिए अपनी छुट्टियां बचाकर रखने के बीच चुनाव करना पड़ता था। हम परिवार के कई कार्यक्रम और त्योहार मिस कर रहे थे।”
किराए के लगते थे 65 हजार
सान्या देशमुख ने बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर भी पति-पत्नी के बीच गंभीर बातचीत होने लगी थी। ऑफिस आने-जाने का समय बचाने के लिए दोनों ने मुंबई में ऑफिस के पास एक बेडरूम का फ्लैट किराए पर लिया था, जिसका किराया करीब 65 हजार रुपये प्रति माह था। वे ये खर्च उठा सकते थे, लेकिन उन्हें लगने लगा कि लंबे समय तक ये व्यवस्था सही नहीं है। उन्होंने कहा, “हम अपनी कमाई, किराए, रोजमर्रा के खर्च और आखिर में कितनी बचत हो रही है, इन सभी बातों पर ध्यान देने लगे थे।”
मुंबई में बढ़ते खर्चों और बच्चों की परवरिश को लेकर सोचने के बाद सान्या और उनके पति ने नासिक में परिवार के साथ रहने का फैसला किया। यहां उन्हें किराया नहीं देना पड़ता, जिससे घर के खर्च में काफी कमी आई और उनकी बचत भी बढ़ गई।
पैसों को लेकर काफी कुछ सीखा
सान्या ने कहा कि, आय पहले से कम होने के बावजूद अब उनकी बचत पहले के मुकाबले ज्यादा हो रही है। सान्या देशमुख ने कहा, “जब हम मुंबई में रह रहे थे, तब मैं ठीक तरह से निवेश भी नहीं कर पा रही थी।” उन्होंने बताया कि उस समय उनकी ज्यादातर बचत PPF, कभी-कभी यात्रा और सोना खरीदने जैसे खर्चों में चली जाती थी। लेकिन अब उन्होंने SIP शुरू की, PPF में निवेश जारी रखा और पैसों के बेहतर प्रबंधन के लिए कई फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स भी किए। उन्होंने कहा, “मैंने निवेश और पैसों को मैनेज करने के बारे में काफी कुछ सीखा। इससे मेरा पूरा नजरिया बदल गया।”
नासिक आने के बाद सान्या की जिंदगी बदल गई। अब वह अपनी सेहत पर पूरा ध्यान देती हैं, नियमित जिम जाती हैं, खेलती हैं और पर्याप्त नींद व आराम भी करती हैं। सान्या देशमुख ने कहा, “अब काम का तनाव पहले के मुकाबले काफी कम हो गया है।”
किसी बड़े प्लान के लिए नहीं छोड़ी नौकरी
उन्होंने कहा, “ऐसे भी दिन आए जब बढ़ते दबाव की वजह से मैं ऑफिस के वॉशरूम में जाकर खुद को बंद कर लेती थी और रोने लगती थी।” सान्या ने पहले से तय किसी बड़े प्लान के तहत नौकरी नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी तय समय-सीमा से करीब एक साल पहले ही इस्तीफा देने का फैसला कर लिया। नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ समय का ब्रेक लिया और फिर एक प्रोफेशनल साथी के साथ मिलकर डिजिटल मार्केटिंग का अपना कारोबार शुरू किया। धीरे-धीरे उन्हें क्लाइंट मिलने लगे और अब उनका यह बिजनेस पिछले आठ महीनों से सफलतापूर्वक चल रहा है।
फैसले पर कोई अफसोस नहीं
सान्या ने कहा कि, नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें सबसे बड़ी खुशी अपना समय वापस मिलने की है। अब वह परिवार के साथ ज्यादा समय बिताती हैं। सान्या देशमुख ने कहा, “कमाई भले ही पहले से कम हो गई हो, लेकिन मुझे लगता है कि यह फैसला सही था। मौके हमेशा मिलते रहते हैं। लोगों को सबसे ज्यादा डर हर महीने मिलने वाली सैलरी छोड़ने का होता है। लेकिन जब आपके आर्थिक लक्ष्य साफ होते हैं, तो आप अपनी जिंदगी के लिए अलग फैसले लेने की हिम्मत जुटा लेते हैं।”
पीवी सिंधु के लिए भी ऐसा ही हुआ। दो साल से ज्यादा समय तक ट्रॉफी का इंतजार, लगातार चोटें, पेरिस ओलंपिक में निराशा और आलोचनाओं के बीच सिंधु एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई थीं, जहां उन्हें सिर्फ एक सलाह नहीं, बल्कि एक नई सोच की जरूरत थी। यह नई दिशा उन्हें भारतीय क्रिकेट के दिग्गज विराट कोहली से मिली।
जापान ओपन 2026 का खिताब जीतने के बाद सिंधु ने खुलासा किया कि उनके करियर के सबसे मुश्किल दौर में विराट कोहली से हुई एक मुलाकात ने उन्हें फिर से अपने खेल से प्यार करना सिखाया।
PV Sindhu said, “I reached out to Virat bhai at one of the lowest points of my career. Injuries were piling up, the results weren’t coming, and I just needed someone who understood. I met Virat the very next day, what we spoke about will always stay between us. But I’ll always be… pic.twitter.com/EwNhzlUVYa
लगातार चोटों और खराब प्रदर्शन से जूझ रहीं सिंधु मानसिक रूप से बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही थीं। स्ट्रेस फ्रैक्चर के बाद वापसी आसान नहीं थी। पेरिस ओलंपिक में शुरुआती हार ने आत्मविश्वास को और झटका दिया। ऐसे समय में उन्होंने विराट कोहली को संदेश भेजा।
सिंधु ने बताया कि विराट ने कुछ ही मिनटों में जवाब दिया और अगले ही दिन बेंगलुरु में उनसे मुलाकात की। उनके साथ पति वेंकट दत्ता साई भी मौजूद थे, जिन्होंने पूरे कमबैक के दौरान उनका साथ दिया और नई सपोर्ट टीम तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।
सिंधु ने कहा कि उस बातचीत की बातें वह कभी सार्वजनिक नहीं करेंगी, लेकिन विराट के हर शब्द ने उनकी सोच बदल दी।
विराट की सलाह: ट्रॉफी नहीं, खेल से प्यार करो
सिंधु को लगा था कि शायद उन्हें तकनीक, फिटनेस या रणनीति पर सलाह मिलेगी, लेकिन विराट कोहली ने बिल्कुल अलग बात कही। उन्होंने सिंधु से कहा कि ट्रॉफी के पीछे भागना छोड़ो और उस खुशी को दोबारा खोजो, जिसकी वजह से तुमने बैडमिंटन खेलना शुरू किया था। यही बात सिंधु के दिल को छू गई।
उन्होंने कहा कि अब वह सुबह 5:30 बजे सिर्फ मेडल या ट्रॉफी के लिए नहीं उठतीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें फिर से अपने खेल से प्यार हो गया है।
सिर्फ मानसिक नहीं, खेल में भी आया बड़ा बदलाव
सिंधु की वापसी सिर्फ सोच बदलने तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने खेल पर भी पूरी तरह काम किया।
कोच इरवांश्या, स्ट्रेंथ ट्रेनर वेन लोम्बार्ड और अपनी टीम के साथ उन्होंने फिटनेस पर मेहनत की। करीब 3.5 किलो वजन कम किया, नेट गेम बेहतर बनाया, लंबी रैलियों में धैर्य सीखा और सिर्फ स्मैश पर निर्भर रहने की बजाय ड्रॉप, हाफ स्मैश और क्लियर जैसे शॉट्स को हथियार बनाया।
अब उनकी तैयारी में डेटा एनालिटिक्स और एआई आधारित मॉनिटरिंग भी शामिल है, जिससे शरीर पर पड़ने वाले दबाव, रिकवरी और मूवमेंट का लगातार विश्लेषण किया जाता है।
जापान ओपन में इतिहास, सूखा भी खत्म
नई सोच और नई तैयारी का असर जापान ओपन के फाइनल में साफ दिखाई दिया।
सिंधु ने मेजबान जापान की स्टार खिलाड़ी अकाने यामागुची को 21-17, 21-17 से हराकर पहली बार जापान ओपन का खिताब अपने नाम किया।
इसके साथ ही वह:
जापान ओपन जीतने वाली पहली भारतीय शटलर बनीं।
BWF सुपर 750 खिताब जीतने वाली सबसे उम्रदराज महिला खिलाड़ी बनीं।
दो साल से ज्यादा समय से चला आ रहा उनका टाइटल सूखा भी खत्म हुआ।
फाइनल में कई बार यामागुची ने वापसी की कोशिश की, लेकिन इस बार सिंधु घबराईं नहीं। उन्होंने धैर्य और आत्मविश्वास के साथ मुकाबला खत्म किया
'अब जवाब देने की जरूरत नहीं, खुद पर भरोसा काफी है'
सिंधु ने कहा कि इस पूरे दौर में उन्होंने कभी खुद से यह नहीं पूछा कि उनका करियर खत्म हो गया है या नहीं। हालांकि चोटों के दौरान कई बार मन में सवाल जरूर आते थे कि क्या वह पहले जैसी वापसी कर पाएंगी।
लेकिन अब उनका विश्वास पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है।
उनके शब्दों में, यह खिताब सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि इस बात का सबूत है कि उनकी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
जीत सिर्फ जापान ओपन की नहीं, खुद पर भरोसे की भी थी
पीवी सिंधु की यह वापसी सिर्फ एक बैडमिंटन खिलाड़ी की सफलता नहीं है। यह उस जज्बे की कहानी है, जिसमें चोटें थीं, आलोचनाएं थीं, निराशा थी, लेकिन हार मानने का विकल्प नहीं था।
विराट कोहली की एक साधारण-सी सलाह—“खेल में फिर से खुशी ढूंढो”—ने सिंधु को ट्रॉफी से पहले खुद से दोबारा मिलाया।
और शायद यही वजह है कि जापान ओपन की ट्रॉफी उनके हाथों में आने से पहले उनकी सबसे बड़ी जीत उनके भीतर हो चुकी थी।
We left London at quarter past two on a Monday afternoon, and for the next four hours, the Bentley Bentayga did what most cars can only pretend to do on the M40 and M6. It made the motorway disappear. Settle into the driver’s seat of this Speed variant, and the first thing you notice is how little there is to notice – and yet how much there is to appreciate. The cabin is hushed to the point of unease, wind and road noise simply refusing to show up, leaving you enveloped in a space that celebrates analogue tactile pleasure in an increasingly digital world. Front and centre on the dashboard sits a Breitling analogue clock, anchoring the cabin with old-world authority. Below it, the knurled metal organ stop levers for the air vents operate with a satisfying mechanical resistance that no touchscreen has ever replicated.
A cabin that celebrates tactile touch in an age that has forgotten it. Leather-stitched with the patience of people who still care.
The audio system is by Naim – the Wiltshire-based hi-fi company whose amplifiers have been a byword for sonic purity since 1973 – and with Pavarotti filling the cabin at modest volume somewhere past Birmingham, it was immediately clear this was not a system installed merely to tick a specification box. Rear seat passengers, meanwhile, had their own touchscreen for climate and media control – ours showing Pavarotti mid-aria, which felt, in a Bentley, entirely correct. Neither the Bentayga nor Lancashire feel the need to tom-tom their virtues. Both simply get on with it, and trust that the right people will notice. I have driven this route north before in lesser company, and it has never once felt this short.
Every detail in the Bentayga Speed — the Naim audio system, the organ-stop vents, the diamond-quilted dash, the rear-passenger screen, the sill that quietly announces it was hand-crafted in Crewe — speaks of a car assembled by people who considered indulgence a serious responsibility.
We continued north, crossing into Lancashire before finally turning off the motorway. Our destination was Northcote, nestled in the Ribble Valley near the village of Langho. As we made our approach, England changed its mind about what kind of country it wanted to be. The road narrowed and hedges closed in from both sides, threatening the Bentley’s two-metre width. The light was dropping into that long northern evening glow, and at the end of a gravel drive, Northcote appeared looking exactly like the opening shot of a film about an English country weekend. The Bentayga rolled up the approach, announcing its arrival with the polite crunch of low-profile Pirelli tyres on small stones – a suitably understated entrance for a 19th-century manor house that has seen a thing or two pull up outside.
We were here for dinner, bed and breakfast, and Northcote does none lightly. Chef Patron Lisa Goodwin-Allen has been translating this landscape into food since 1996 – three decades of a Michelin star, unbroken, which in the restaurant business is closer to a geological era than a career. Five courses arrived in unhurried succession, featuring asparagus, scallop, sole, local Lake District lamb, and a rich Valrhona chocolate to close – each dish a study in contrast and harmony, every course making the next feel inevitable. After dinner, we retired to one of the garden lodge deluxe suites: a fireplace casting a warm glow across the room, a private terrace looking out toward the dark valley, a deep tub in a bathroom that invited lingering. I went to bed deeply content, waking to a golden Ribble Valley morning that invited long, lazy walks. But the ribbon of tarmac through the Forest of Bowland was waiting, and the Bentayga was beckoning from the car park.
One of England’s best-kept secrets, this area of outstanding beauty is a delight for walkers and driving enthusiasts.
The road out runs through Clitheroe, where a Norman keep sits on a limestone mound with views stretching all the way to Pendle Hill, then climbs into the Forest of Bowland proper – 312 square miles of open moorland, fell, and river valley, largely left alone by the twenty-first century. I flicked the rotary drive selector into Sport early, curious to see what a two-and-a-half tonne SUV would make of roads that seemed written for something small and nimble. The transformation was immediate and theatrical – the car drew a long breath, settled onto its haunches, and changed its personality entirely. The steering weighted up with quiet authority, the throttle sharpened to a hair-trigger, and the Bentley Dynamic Ride system – it uses a 48-volt electrical architecture to split the anti-roll bars and sandwich an electric motor and planetary gear set between the halves, applying up to 1,300Nm of torque to each bar and reacting in as little as 0.06 seconds – kept the big SUV as flat through corners as a saloon car, entirely unbothered by its own considerable mass. The Bentayga had stopped being a grand tourer and become, without any fuss whatsoever, a driver’s car.
The signpost at Newton-in-Bowland offers four directions. For the traveller with time, there is no wrong turn here.
Dunsop Bridge slid past in a matter of seconds – a handful of stone houses, a red telephone box marking the geographic centre of Great Britain, and directly opposite, the Puddleducks Tearooms, where actual ducks were crossing the asphalt in front of us with the unhurried confidence of creatures who know they own the place.
And then came the Inn at Whitewell. It sits on a bend of the River Hodder, a low stone building with the fells rising behind it and the river running just below the terrace, dating to the 14th century when it housed the keeper of the King’s Forest. The manager told me that King Charles III had stayed the night here once, arriving by train to Lancaster and driving up through the valley. We parked the Bentayga in the gravel yard among vintage Land Rovers in active use by local farmers – the Bentley not looking remotely out of place, which says everything about both the car and the inn.
The ducks at Dunsop Bridge crossed the road with unhurried nonchalance. The Bentayga waited indulgently.
We had lunch at the exact spot where Steve Coogan and Rob Brydon filmed the opening episode of The Trip. Head chef Jamie Cadman has been running this kitchen for 29 years, and the scallops, the ribeye cooked medium-rare, and a crème brûlée of memorable creaminess proved that his tenure was very well spent. Afterwards we walked – an hour and a half across stepping stones and up into the moors, dappled afternoon light, the swish of boots in wet grass, sheep in fields arranged for maximum Englishness. We came back with deep-cleaned lungs, finding the Bentayga still flanked by a mud-caked Land Rover and a tractor. Even if it had feelings about its utilitarian neighbours, it kept them, with characteristic British restraint, entirely to itself.
Then came the Trough of Bowland – and the Bentayga’s finest hour. On these sweeping corners and squiggly bends that open into long glorious straights, the V8 deepened into a proper barrel-chested growl, the eight-speed ZF gearbox snapping through ratios with surgical precision. Burying my right foot out of a long right-hander, the 4.0-litre twin-turbo unleashed 850Nm of torque across a broad plateau between 2,250 and 4,500rpm – not a single violent hit but a sustained, relentless wave that simply didn’t stop. 2,440 kilograms of hand-built British engineering launched forward, brutally and joyfully hard, dispatching 0-100kph in 3.6 seconds. Yet at no point did it feel like it was getting away from me. The permanent all-wheel-drive system shuffles power between axles with imperceptible speed, while the all-wheel steering tightens the car into corners at low speed and plants it with absolute authority on high-speed straights. The confidence arrives quickly and stays.
Lancaster revealed itself in the late afternoon, featuring cobbled streets, a castle that hosted the Pendle Witch Trials of 1612, and a quayside built on 18th-century trading wealth. Our base was Quite Simply French on St George’s Quay, four boutique rooms in a 1750 warehouse with bare stone walls, timber beams, and the River Lune drifting past the windows. The 360-degree camera system made light work of threading the Bentley down the narrow quayside street. Dinner was a proper French feast including lobster, escargots, and a wine list worth lingering over.
Crème brûlée and ribeye at Whitewell, scallops at Northcote, scrambled eggs at Quite Simply French – Lancashire is a foodie’s delight.
Breakfast the next morning was the quiet revelation of the trip: scrambled eggs of extraordinary creaminess, sourdough toast, hand-churned butter, sea salt, genuinely good coffee – a little slice of France transplanted into the heart of Lancashire, courtesy of head chef Luke Johnson, fifteen years in this kitchen and showing no signs of slowing down.
From Lancaster, we pointed toward the coast. Lytham is a handsome Edwardian seaside town of independent shops, a sprawling seafront green, and the wide Ribble Estuary beyond. At its centre stands a solid white 19th-century windmill, which we explored as the weather turned grey and blustery in the way English coastal mornings sometimes insist upon. We spent the night at the Clifton Arms on the seafront – Grade II-listed, dating to 1839, cast-iron balconies and classical columns looking out over the Green. The next morning’s photograph said everything: the Bentayga framed against the stark white of the windmill, hand-assembled British engineering against handmade British stone, both entirely unhurried and at home.
The Bentayga on Lytham seafront, with the town’s 19th-century windmill for company.
The drive back down the M6 was every bit as uneventful as the journey up. This is perhaps the highest compliment a grand tourer of this calibre can be paid. Over three days, the Bentayga had done everything asked of it by devouring a motorway slog in near-total silence, charging through the Trough of Bowland with a soundtrack fit for a film score, threading a medieval quayside without breaking a sweat, and reshaping its chassis, drivetrain, and suspension to whatever the road demanded, all while making every mile feel like it was exactly where it was meant to be.
A burbling brook, a solid oak, and a hand-crafted car from Crewe — together in the Forest of Bowland. This picture quietly states “England”.
Lancashire is a county most tourists simply ignore, and that is precisely its saving grace. A few slow days spent looping through its corners delivered everything the quintessential English road trip ought to be – cosy country inns with roaring fires, smashing food that makes a detour entirely mandatory, and layers of medieval history etched into stone castles. There were long walks across the wet moors that left my boots soaked and my head clear, and scenic roads that begged to be driven. This is the good old English countryside exactly as it should be. It is a landscape that deserves to be savoured in a leisurely manner and preferably from the cockpit of something exactly this magnificent.
कभी बड़े शहरों की भागदौड़ और कॉर्पोरेट करियर का हिस्सा रहे IIT कानपुर के पूर्व छात्र अर्जव मोदी ने अपनी जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया। अच्छी नौकरी, बेहतर कमाई और शहर की सुविधाओं के बीच भी उन्हें एक अलग तरह के संतुलन की तलाश थी। इसी तलाश ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के छोटे से पहाड़ी कस्बे बीर तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अपनी पत्नी सिमरन चौधरी के साथ एक अलग जीवनशैली अपनाई।
यहां की शांत वादियां, धीमी रफ्तार और प्रकृति के करीब रहने का अनुभव उनके लिए किसी बदलाव से कम नहीं रहा। अर्जव और सिमरन की यह कहानी अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां लोग करियर, खुशी और जिंदगी की प्राथमिकताओं को लेकर नए सिरे से सोच रहे हैं।
कम कमाई लेकिन ज्यादा खुशी का एहसास
शहरों में अच्छी कमाई और सुविधाओं के बावजूद अर्जव को महसूस हुआ कि जीवन में संतुष्टि की कमी है। अब वह फ्रीलांस राइटिंग और कंटेंट का काम करते हैं, जबकि उनकी पत्नी रिमोट जॉब जारी रखे हुए हैं। दोनों की संयुक्त आय पहले से आधी से भी कम हो गई है, लेकिन उनका कहना है कि वे अब ज्यादा खुश और संतुष्ट हैं।
95 किलो से 72 किलो तक, बदली सिर्फ जिंदगी नहीं सोच भी
अर्जव ने लिंक्डइन पर अपने सफर को साझा करते हुए बताया कि 2021 में IIT से निकलने के बाद वह बेंगलुरु में तेज-तर्रार कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे थे। उस समय उनका वजन 95 किलो था। 2026 में वह पहाड़ों में सादा जीवन जी रहे हैं, वजन करीब 72 किलो है और कम कमाई के बावजूद खुद को ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं।
पहाड़ों ने सिखाया ‘घर’ का असली मतलब
सिमरन ने बताया कि बीर में रहने के बाद उनकी जीवनशैली पूरी तरह बदल गई है। वे ज्यादातर खाना घर पर बनाते हैं, कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं और प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल लगभग छोड़ चुके हैं। उनके अनुसार, पहाड़ों ने सिखाया कि घर सिर्फ खूबसूरत जगह या महंगे सामान से नहीं बनता, बल्कि उस जगह से जुड़ने और उसमें योगदान देने से बनता है।
शहर की दौड़ बनाम पहाड़ों की शांति
अर्जव ने अपनी पोस्ट में दो तरह की जिंदगी की तुलना की। एक तरफ महानगर में रहने वाला युवा प्रोफेशनल है, जिसकी कमाई ज्यादा है, लेकिन लगातार दूसरों से तुलना, करियर का दबाव और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है।
दूसरी तरफ पहाड़ी इलाके में रहने वाला व्यक्ति है, जिसकी आय कम हो सकती है, लेकिन वह प्रकृति, रिश्तों और रोजमर्रा के छोटे-छोटे पलों का आनंद लेता है।
‘पहाड़ों में चले जाओ’ नहीं, सोच बदलने की बात
अर्जव ने साफ किया कि उनका मकसद सभी को शहर छोड़कर पहाड़ों में बसने की सलाह देना नहीं है। उनका संदेश सिर्फ इतना है कि जिंदगी की खुशी केवल ज्यादा कमाई या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं को समझने और संतुलन बनाने में भी है।