Highest Paying Jobs: सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं, ये लोग कमा रहे लाखों! PG मालिक से चायवाले तक की लिस्ट वायरल

भारत में अक्सर युवाओं को बताया जाता है कि IIT की पढ़ाई, FAANG जैसी बड़ी टेक कंपनियों में नौकरी या Data Structures and Algorithms (DSA) में महारत हासिल करना अच्छी कमाई का सबसे आसान रास्ता है। लेकिन टेक और AI कमेंटेटर साक्षी ने सोशल मीडिया पर एक मजेदार लिस्ट शेयर कर इस सोच को ही उलट दिया। उन्होंने भारत में इस समय सबसे ज्यादा कमाई करने वाले लोगों की एक मजाकिया रैंकिंग साझा की, जिसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर टॉप पर नहीं, बल्कि काफी पीछे नजर आए। इस लिस्ट में PG मालिक, मकान मालिक, पानी के टैंकर वाले और चाय-सिगरेट की दुकान चलाने वाले शामिल हैं।

नंबर-1 पर PG मालिक, एक कमरे से लाखों की कमाई

साक्षी की इस मजेदार रैंकिंग में सबसे ऊपर PG मालिक को रखा गया। उन्होंने बताया कि शहरों में बढ़ती नौकरी और किराए की मांग का फायदा PG के मालिकों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, एक कमरे में तीन लोगों को रखा जाता है और हर व्यक्ति से करीब ₹10,000 से ₹15,000 तक किराया लिया जाता है। इस हिसाब से कुछ PG मालिक किराया और दूसरे खर्च निकालने के बाद भी ₹1 लाख से ₹1.5 लाख महीने तक कमा सकते हैं। यही वजह है कि पोस्ट में PG बिजनेस को आज के दौर के सबसे कमाई वाले कामों में से एक बताया गया।

बेंगलुरु के मकान मालिक भी पीछे नहीं

लिस्ट में तीसरे नंबर पर बेंगलुरु के मकान मालिक का जिक्र किया गया। टेक सिटी में किराए की बढ़ती मांग को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चाएं होती रहती हैं। पोस्ट में मजाकिया अंदाज में बताया गया कि दो बेडरूम का फ्लैट खरीदकर उसे करीब ₹50,000 महीने के किराए पर देना, हर साल किराया बढ़ाना और WhatsApp पर सिर्फ ‘last price’ लिखकर बातचीत खत्म करना भी कमाई का शानदार तरीका बन गया है।

पानी के टैंकर वाले भी बने ‘बिजनेस किंग’

बेंगलुरु में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। इसी को लेकर साक्षी ने पानी के टैंकर संचालकों को भी अपनी लिस्ट में जगह दी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा कि ये लोग बेंगलुरु का ही पानी वापस बेंगलुरु के लोगों को बेचते हैं। पानी की कमी के समय टैंकरों की मांग बढ़ने से इस कारोबार की कमाई भी बढ़ जाती है।

ब्रोकरों की कमाई का भी किया जिक्र

रैंकिंग में प्रॉपर्टी ब्रोकर भी शामिल हैं। पोस्ट के मुताबिक, कुछ ब्रोकर किरायेदारों को कई ऐसे घर दिखाते हैं जो उनकी जरूरत के मुताबिक नहीं होते और आखिर में डील होने पर किरायेदार और मकान मालिक, दोनों से करीब एक महीने के किराए के बराबर कमीशन ले लेते हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों में लगातार घर बदलने वाले किरायेदारों की बड़ी संख्या के कारण यह काम भी अच्छी कमाई वाला बताया गया।

टेक पार्क के बाहर चाय-सिगरेट वाला भी हिट

इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर जिस शख्स को रखा गया, वह शायद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम है टेक पार्क के बाहर चाय, सिगरेट और स्नैक्स बेचने वाला दुकानदार। साक्षी ने उसे टेक इंडस्ट्री का ‘अनसंग हीरो’ बताया। उनके अनुसार, हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोजाना चाय, सिगरेट और स्नैक्स के लिए ऐसी दुकानों पर निर्भर रहते हैं। पोस्ट में अनुमान लगाया गया कि अच्छी लोकेशन वाली ऐसी दुकान से कुछ दुकानदार ₹30,000 से ₹50,000 महीने तक कमा सकते हैं।

न MBA, न फंडिंग, फिर भी कमाई!

इस पूरी पोस्ट का सबसे मजेदार हिस्सा यही था। चाय-सिगरेट की दुकान के लिए न किसी MBA की जरूरत है, न pitch deck की और न ही startup funding की। साक्षी ने इसी अंदाज में टेक इंडस्ट्री पर तंज कसते हुए बताया कि जहां इंजीनियर नौकरी और प्रमोशन के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहीं कुछ छोटे कारोबारी रोजमर्रा की जरूरतों के दम पर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

सॉफ्टवेयर इंजीनियरों पर आया सबसे बड़ा तंज

पोस्ट के अंत में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को लेकर सबसे मजेदार टिप्पणी की गई। साक्षी ने लिखा कि जब बाकी लोग अलग-अलग तरीकों से कमाई कर रहे हैं, तब सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात 2 बजे तक DSA के सवाल हल कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि अगली salary hike अच्छी होगी।

सोशल मीडिया यूजर्स ने भी लिए मजे

साक्षी की पोस्ट को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और इसे खबर लिखने तक 1.5 लाख से ज्यादा व्यूज मिले। यूजर्स ने भी अपने-अपने अंदाज में इस रैंकिंग पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने मजाक करते हुए कहा कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कमाई का सबसे मुश्किल रास्ता चुना है और उन्हें DSA की तैयारी के बजाय पानी का टैंकर खरीद लेना चाहिए था। एक अन्य यूजर ने बेंगलुरु का असली ‘product-market fit’ AI या सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि चाय, प्रॉपर्टी और मेट्रो से दूरी का गणित बताया। एक यूजर ने टैक्स को लेकर भी तंज कसा और कहा कि इन कामों में कमाई करने वालों में शायद सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही ऐसा व्यक्ति है जो नियमित रूप से इनकम टैक्स और ITR जैसी चीजों से जूझता है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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राइजिंग भारत समिट में बोले प्रियांक खड़गे- कर्नाटक में विजिलेंटिज्म पर जीरो टॉलरेंस, कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं

Priyank Kharge news: कर्नाटक के गृह, आईटी और बीटी मंत्री प्रियांक खड़गे ने कहा है कि राज्य सरकार विजिलेंटिज्म के खिलाफ जीरो-टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश में कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है और कानूनी प्रावधान हर किसी पर समान रूप से लागू होते हैं। न्यूज 18 के राइजिंग भारत समिट के दौरान मनीकंट्रोल के मैनेजिंग एडिटर नलिन मेहता के साथ आयोजित ‘फायरसाइड चैट – हाउ कर्नाटक इज बिल्डिंग द इनोवेशन इकोनॉमी ऑफ भारत? में बोलते हुए खड़गे ने कहा कि राज्य में किसी भी तरह के विजिलेंटिज्म की इजाजत नहीं है। उन्होंने आगे जोड़ा कि कोई भी कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता। कानून सबके लिए एक बराबर है।

पुलिसिंग और प्रशासन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल

कर्नाटक में गवर्नेंस और कानून-व्यवस्था के क्रियान्वयन पर बात करते हुए खड़गे ने बताया कि राज्य ने पुलिसिंग और सार्वजनिक प्रशासन में तकनीक को तेजी से इंटिग्रेट किया है। ट्रैफिक मैनेजमेंट, साइबर सिक्योरिटी और पुलिसिंग के क्षेत्रों में डिजिटल टूल्स का काफी इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रियांक खड़गे ने कहा कि हम ट्रैफिक, साइबर सुरक्षा और पुलिसिंग आदि में तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। गवर्नेंस में तकनीक के उपयोग के हमारे प्रयासों की केंद्र सरकार ने भी सराहना की है।

पुलिस की उपस्थिति और निगरानी में सुधार के लिए सरकार ने एक नया एप्लिकेशन पेश किया है। खड़गे ने कहा कि अब पुलिस की मौजूदगी पर नजर रखने के लिए ऐप का इस्तेमाल किया जा रहा है।

ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर कड़ा एक्शन: ₹2700 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना

राज्य में सड़क सुरक्षा और प्रवर्तन उपायों को उजागर करते हुए खड़गे ने ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के खिलाफ की गई बड़े पैमाने की कार्रवाई के आंकड़े साझा किए। पूरे राज्य में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के 7.7 करोड़ से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। नियमों का उल्लंघन करने वालों से राज्य भर में ₹2700 करोड़ से अधिक का जुर्माना लिया गया है।

क्विक कॉमर्स और गिग वर्कर्स पर क्या बोले मंत्री?

तेजी से बढ़ती ऐप-बेस्ड डिलीवरी सर्विस पर बात करते हुए खड़गे ने माना कि क्विक कॉमर्स के आने से ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन बढ़ा है लेकिन उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस कार्रवाई में सिर्फ डिलीवरी कर्मचारियों को गलत तरीके से निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। खड़गे ने कहा कि 10 मिनट की डिलीवरी के इस दौर में कई तरह के उल्लंघन हो रहे हैं। हम अब उन्हें चार घंटे के लेक्चर दे रहे हैं। ट्रैफिक अपराधों को एक गंभीर मुद्दा बताते हुए उन्होंने कहा कि लेकिन हम सिर्फ गिग वर्कर्स को दोष नहीं दे सकते।

बेंगलुरु के ट्रैफिक को सुचारू बनाने के लिए ‘अर्बन मोबिलिटी मिशन’

प्रियांक खड़गे ने बेंगलुरु में ट्रैफिक जाम को कम करने के प्रयासों पर भी बात की। उन्होंने बेंगलुरु को भारत का इनोवेशन हब होने के साथ-साथ इसकी ट्रैफिक कैपिटल के रूप में भी परिभाषित किया। उन्होंने बताया कि भीड़भाड़ की समस्या से निपटने और परिवहन योजना में सुधार के लिए राज्य सरकार ने एक अर्बन मोबिलिटी मिशन की स्थापना की है।

खड़गे ने कहा कि, ‘हम अधिक से अधिक लोगों को मास ट्रांजिट सिस्टम का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। हम ई-कॉमर्स कंपनियों, फ्लीट मैनेजर्स, ट्रैफिक पुलिस, जीबीए (GBA) और दूसरे स्टेकहोल्डर्स के साथ मिलकर एक मिशन मोड कमेटी बना रहे हैं।’

शहर के परिवहन परिदृश्य पर विश्वास व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ महीनों में ट्रैफिक जाम से राहत मिलेगी। गवर्नेंस, पुलिसिंग और शहरी बुनियादी ढांचे पर हुई इस व्यापक चर्चा के दौरान प्रियांक खड़गे ने जोर देकर दोहराया कि कर्नाटक की सरकार इस सिद्धांत पर चल रही है कि कानून सबके लिए समान है।

बेंगलुरु के इस कैफे में लैपटॉप खोलकर बैठना पड़ेगा महंगा! 99 रुपये प्रति घंटे लगेगा वर्कस्पेस चार्ज

बेंगलुरु के एक कैफे का नोटिस इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कैफे में लगे नोटिस में लिखा है कि कि अगर कोई कस्टमर्स उस जगह को ऑफिस या वर्कस्पेस की तरह इस्तेमाल करता है, तो उससे 99 रुपये प्रति घंटे का शुल्क लिया जाएगा। इस फैसले को लेकर लिंक्डइन पर लोगों की अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ लोग कैफे के फैसले को सही बता रहे हैं, वहीं कई लोगों के मुताबिक इससे असली समस्या का समाधान नहीं होगा। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

बेंगलुरु के कार्तिक सुरोजू ने इंदिरानगर के एक कैफे में लगे नोटिस की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की। नोटिस में लिखा था, “वर्कस्पेस रेंटल चार्ज: 99 रुपये प्रति घंटा।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सुरोजू ने कहा कि ये नियम उन ग्राहकों को ही दूर कर सकता है, जिनके लिए ऐसी जगहें अक्सर आकर्षण का केंद्र होती हैं।

कैफे ने किया चॉर्ज

अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा, “वहां कोई भी बैठकर काम नहीं कर रहा था। एक भी व्यक्ति नहीं था।” उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि यह साइन उस समस्या का समाधान करने की कोशिश कर रहा है, जो असली समस्या ही नहीं है। यह सही है कि कैफे में कोई एक कॉफी लेकर पांच घंटे तक नहीं बैठ सकता, लेकिन इस तरह के चार्ज वाला बोर्ड लगाने से ग्राहक आने के बजाय दूर हो सकते हैं।”

कैफे के रिव्यू है अच्छे

इस पोस्ट के सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई यूजर्स का मानना था कि कैफे ने ये नियम इसलिए बनाया जिससे कस्टमर लंबे समय तक एक ही टेबल पर बैठकर उसे ऑफिस की तरह इस्तेमाल न करें और दूसरे ग्राहकों के लिए भी जगह उपलब्ध रहे। एक यूजर ने कमेंट किया, “हो सकता है कैफे यही चाहता हो। शायद वे नहीं चाहते कि लोग 150 रुपये की एक कॉफी लेकर घंटों तक टेबल घेरकर बैठे रहें।” इस पर कार्तिक सुरोजू ने जवाब देते हुए कहा, “हो सकता है।” उन्होंने ये भी बताया कि कैफे के रिव्यू अच्छे हैं और वहां का खाना-पीना भी पसंद किया जाता है। साथ ही उन्होंने कहा कि वह दोबारा कैफे जाकर मालिक से इस नियम के पीछे की वजह जानने की कोशिश करेंगे।

2-3 घंटे तक करते हैं काम

वहीं कई लोगों ने कैफे के इस फैसले का खुलकर सपोर्ट भी किया। एक यूजर ने लिखा, “मैं इस कैफे के फैसले के पूरी तरह समर्थन में हूं। मेरे पसंदीदा कैफे में कई बार ऐसा हुआ कि कुछ लोगों ने पूरी टेबल को अपना वर्कस्टेशन बना लिया, जिसकी वजह से खाना खाने आए ग्राहकों के लिए बहुत कम सीटें बचती हैं।” कार्तिक सुरोजू ने कहा कि कैफे में बैठकर काम करने वाले सभी लोग परेशानी नहीं बनते। उन्होंने लिखा, “ज्यादातर लोग 2-3 घंटे तक काम करते हैं और इस दौरान इतना ऑर्डर भी करते हैं कि उनका वहां बैठना उचित लगता है। असली दिक्कत उन लोगों से होती है, जो पूरे दिन सिर्फ एक कॉफी लेकर बैठे रहते हैं।” उनके मुताबिक, कई छोटे कैफे ऐसे ग्राहकों को कुछ कहने से भी बचते हैं, क्योंकि उन्हें खराब रिव्यू या अपनी छवि पर असर पड़ने का डर रहता है।

कुछ यूजर्स के मुताबिक, इस समस्या का समाधान प्रति घंटे शुल्क लेने के बजाय साफ नियम बनाकर किया जा सकता है। एक यूजर ने लिखा, “अगर असली परेशानी यह है कि कुछ लोग कम ऑर्डर देकर घंटों तक टेबल घेरकर बैठे रहते हैं, जिससे नए ग्राहकों को जगह नहीं मिलती, तो नोटिस में सीधे उसी व्यवहार का जिक्र होना चाहिए।”

IIT की डिग्री और हाई पैकेज के बाद भी क्यों छोड़ी नौकरी? पत्नी संग पहाड़ों में रहने लगा शख्स

कभी बड़े शहरों की भागदौड़ और कॉर्पोरेट करियर का हिस्सा रहे IIT कानपुर के पूर्व छात्र अर्जव मोदी ने अपनी जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया। अच्छी नौकरी, बेहतर कमाई और शहर की सुविधाओं के बीच भी उन्हें एक अलग तरह के संतुलन की तलाश थी। इसी तलाश ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के छोटे से पहाड़ी कस्बे बीर तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अपनी पत्नी सिमरन चौधरी के साथ एक अलग जीवनशैली अपनाई।

यहां की शांत वादियां, धीमी रफ्तार और प्रकृति के करीब रहने का अनुभव उनके लिए किसी बदलाव से कम नहीं रहा। अर्जव और सिमरन की यह कहानी अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है, जहां लोग करियर, खुशी और जिंदगी की प्राथमिकताओं को लेकर नए सिरे से सोच रहे हैं।

कम कमाई लेकिन ज्यादा खुशी का एहसास

शहरों में अच्छी कमाई और सुविधाओं के बावजूद अर्जव को महसूस हुआ कि जीवन में संतुष्टि की कमी है। अब वह फ्रीलांस राइटिंग और कंटेंट का काम करते हैं, जबकि उनकी पत्नी रिमोट जॉब जारी रखे हुए हैं। दोनों की संयुक्त आय पहले से आधी से भी कम हो गई है, लेकिन उनका कहना है कि वे अब ज्यादा खुश और संतुष्ट हैं।

95 किलो से 72 किलो तक, बदली सिर्फ जिंदगी नहीं सोच भी

अर्जव ने लिंक्डइन पर अपने सफर को साझा करते हुए बताया कि 2021 में IIT से निकलने के बाद वह बेंगलुरु में तेज-तर्रार कॉर्पोरेट लाइफ जी रहे थे। उस समय उनका वजन 95 किलो था। 2026 में वह पहाड़ों में सादा जीवन जी रहे हैं, वजन करीब 72 किलो है और कम कमाई के बावजूद खुद को ज्यादा बेहतर महसूस करते हैं।

पहाड़ों ने सिखाया ‘घर’ का असली मतलब

सिमरन ने बताया कि बीर में रहने के बाद उनकी जीवनशैली पूरी तरह बदल गई है। वे ज्यादातर खाना घर पर बनाते हैं, कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटते हैं और प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल लगभग छोड़ चुके हैं। उनके अनुसार, पहाड़ों ने सिखाया कि घर सिर्फ खूबसूरत जगह या महंगे सामान से नहीं बनता, बल्कि उस जगह से जुड़ने और उसमें योगदान देने से बनता है।

शहर की दौड़ बनाम पहाड़ों की शांति

अर्जव ने अपनी पोस्ट में दो तरह की जिंदगी की तुलना की। एक तरफ महानगर में रहने वाला युवा प्रोफेशनल है, जिसकी कमाई ज्यादा है, लेकिन लगातार दूसरों से तुलना, करियर का दबाव और अकेलेपन का सामना करना पड़ता है।

दूसरी तरफ पहाड़ी इलाके में रहने वाला व्यक्ति है, जिसकी आय कम हो सकती है, लेकिन वह प्रकृति, रिश्तों और रोजमर्रा के छोटे-छोटे पलों का आनंद लेता है।

पहाड़ों में चले जाओ’ नहीं, सोच बदलने की बात

अर्जव ने साफ किया कि उनका मकसद सभी को शहर छोड़कर पहाड़ों में बसने की सलाह देना नहीं है। उनका संदेश सिर्फ इतना है कि जिंदगी की खुशी केवल ज्यादा कमाई या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि अपनी प्राथमिकताओं को समझने और संतुलन बनाने में भी है।

हर ऑटो ड्राइवर एक जैसा नहीं! बेंगलुरु के इस शख्स का अंदाज देख मुस्कुरा उठेंगे आप