Gen Z के अकेलेपन का इलाज! 32 साल की कृष्णा ने बनाया ऐसा ऐप, जुटाई ₹33.5 करोड़ की फंडिंग

आज के दौर में सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ना बेहद आसान है, लेकिन आमने-सामने दोस्त बनाना और प्रोफेशनल नेटवर्क तैयार करना कई युवाओं के लिए मुश्किल होता जा रहा है। इसी समस्या को 32 वर्षीय उद्यमी कृष्णा दोसापति एक नए तरीके से हल करने की कोशिश कर रही हैं। उनका मानना है कि Gen Z के अकेलेपन का जवाब शायद ज्यादा सोशल मीडिया नहीं, बल्कि लोगों को असल जिंदगी में मिलवाना हो सकता है।

उन्होंने ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जिसका मकसद युवाओं को उनके आसपास रहने वाले समान रुचियों और प्रोफेशन वाले लोगों से जोड़ना है।

₹33 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग, बढ़ी उम्मीदें

कृष्णा दोसापति Clockout की फाउंडर और CEO हैं। उनकी कंपनी ने हाल ही में $3.5 मिलियन यानी करीब ₹33.5 करोड़ की फंडिंग जुटाई है। इस फंडिंग राउंड की अगुवाई 114 Ventures ने की, जबकि Evite Ventures, Allied Ventures, Sher Ventures, Gaingels और BMPB VC ने भी इसमें हिस्सा लिया। अक्टूबर 2024 में लॉन्च हुआ Clockout खुद को LinkedIn और Meetup के बीच का मिश्रण बताता है। इसका मकसद सिर्फ ऑनलाइन कनेक्शन बनाना नहीं, बल्कि उन कनेक्शनों को वास्तविक मुलाकातों और कम्युनिटी में बदलना है।

आइडिया की शुरुआत खुद कृष्णा की परेशानी से हुई

इस स्टार्टअप के पीछे कोई काल्पनिक समस्या नहीं, बल्कि कृष्णा का अपना अनुभव है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने न्यूयॉर्क में काम शुरू किया, तो उन्हें महसूस हुआ कि इतने बड़े शहर में रहने के बावजूद नए प्रोफेशनल लोगों से मिलना आसान नहीं था। यहीं से उनके मन में सवाल आया कि अगर उन्हें नई कम्युनिटी बनाने में परेशानी हो रही है, तो युवा प्रोफेशनल्स के लिए यह समस्या कितनी बड़ी होगी? इसी सोच ने Clockout का रास्ता तैयार किया।

ऐप सिर्फ प्रोफाइल नहीं, असली मुलाकात पर देता है जोर

Clockout पर यूजर्स अपनी रुचियों, इंडस्ट्री और साझा कनेक्शन के आधार पर दूसरे प्रोफेशनल्स को खोज सकते हैं। इसके बाद प्लेटफॉर्म का लक्ष्य उन्हें डिजिटल बातचीत से निकालकर क्लब, इवेंट और आमने-सामने मुलाकातों तक पहुंचाना है। यानी यहां सिर्फ किसी को ‘कनेक्ट’ करना ही मंजिल नहीं है, बल्कि उस कनेक्शन को असल जिंदगी की दोस्ती या प्रोफेशनल कम्युनिटी में बदलना अहम है।

10 महीने में 6 लाख से ज्यादा डाउनलोड

Clockout के मुताबिक, लॉन्च के बाद प्लेटफॉर्म को 6 लाख से ज्यादा डाउनलोड मिल चुके हैं। कंपनी का दावा है कि पेड फीचर्स शुरू करने के सिर्फ 10 महीनों में उसका वार्षिक आवर्ती राजस्व (ARR) $1.1 मिलियन तक पहुंच गया। 2025 में यूजर्स ने करीब 4 लाख इनवाइट्स भी भेजे।

क्या डिजिटल दौर में असली लोगों की जरूरत बढ़ रही है?

Clockout का मॉडल इस बड़े सवाल के बीच आया है कि ऑनलाइन कनेक्शन बढ़ने के बावजूद युवा पेशेवर अकेलापन क्यों महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट्स में Gallup के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2025 में 35 साल से कम उम्र के करीब 22% कर्मचारियों ने अकेलापन महसूस किया। फिलहाल Clockout फ्रीमियम मॉडल पर काम करता है। अतिरिक्त फीचर्स और क्लबों व इवेंट्स तक अनलिमिटेड पहुंच के लिए सालाना $99 की सदस्यता उपलब्ध है।

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5 AM क्लब Vs Night Owl: IITian फाउंडर इशान 11:30 पर जगते हैं और रात 9 के बाद चलता है असल दिमाग! ये है क्रिएटिविटी का सीक्रेट

हालांकि कई स्टार्टअप फाउंडर सुबह 5 बजे अलार्म लगाने और सुबह के बिज़ी रूटीन को बहुत ज़रूरी मानते हैं, लेकिन IIT दिल्ली के पूर्व छात्र ईशान जिंदल को ऐसा शेड्यूल पसंद है जो देर से शुरू होता है और देर रात तक चलता है। 30 साल के इस एंटरप्रेन्योर का कहना है कि उनके काम के सबसे प्रोडक्टिव घंटे रात 9 बजे के बाद शुरू होते हैं, जब ज़्यादातर कर्मचारी जा चुके होते हैं और ऑफिस में काफी शांति हो जाती है।

जिंदल ने मनीकंट्रोल को बताया, “तभी मैं सबसे ज़्यादा क्रिएटिव होता हूँ।” उन्होंने बताया कि उन्हें सुबह जल्दी उठने के बजाय देर तक काम करना क्यों पसंद है। इस साल की शुरुआत में ‘शार्क टैंक इंडिया’ में आने और Shaadi.com के फाउंडर अनुपम मित्तल से 50 लाख रुपये की डील हासिल करने के बाद चर्चा में आए इस फाउंडर ने बताया कि वे आम तौर पर सुबह 11:30 बजे के आसपास उठते हैं। कई फाउंडर जो सूरज उगने के साथ अपना दिन शुरू करते हैं, उनसे अलग जिंदल ने कहा कि उनका ऑफिस रूटीन आम तौर पर दोपहर 12:30 या 1 बजे के आसपास शुरू होता है। फिर भी, ऑफिस पहुंचने से पहले ही कॉल और दूसरे कामों के ज़रिए काम अक्सर शुरू हो जाता है।

उन्होंने कहा, “मेरा शेड्यूल थोड़ा अलग है। मैं असल में अपना काम दोपहर 12:30 या 1 बजे के आसपास शुरू करता हूं।”IIT दिल्ली के ग्रेजुएट ने कहा कि उनके ऑफिस का समय आम तौर पर रात 9 बजे, 10 बजे या 10:30 बजे तक चलता है, जो काम के बोझ पर निर्भर करता है। लेकिन काम का दिन शायद ही कभी वहीं खत्म होता है।

IIT दिल्ली में बनी आदत

जिंदल अपनी देर रात तक जागने की आदत को IIT दिल्ली में अपने स्टूडेंट दिनों से जोड़कर देखते हैं। उन्होंने मनीकंट्रोल को बताया, “मेरे पहले साल में, इंटरनेट रात 1 बजे बंद हो जाता था।” तब भी, इंटरनेट बंद होने से पहले छात्र अक्सर देर रात तक काम करते थे।

जब बाद में ये पाबंदियां हटा दी गईं, तो देर रात तक काम करने का समय और बढ़ गया। समय के साथ, जिंदल ने पाया कि आधी रात के बाद के शांत समय में कुछ ऐसा मिलता था जो दिन के समय नहीं मिल पाता था: बिना किसी रुकावट के पूरा ध्यान लगाकर काम करना।

उन्होंने कहा, “अगर हमें रात में दो-तीन घंटे का वह शानदार समय मिल जाए, तो हम बहुत सारे दूसरे काम भी कर सकते हैं जिन पर हम काम कर रहे हैं।” जिंदल के लिए, सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि ध्यान भटकाने वाली चीज़ें नहीं होतीं।

उन्होंने कहा, “यह एक ऐसा समय है जब आप बस अपने काम पर ध्यान दे सकते हैं क्योंकि आस-पास कम लोग होते हैं।” “इसका मतलब है कि यह पूरी तरह से आपका अपना समय होता है और आप जिस चीज़ पर चाहें, उस पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।”

नींद सबसे ज़रूरी है

अक्सर देर रात तक काम करने के बावजूद, जिंदल का कहना है कि वे नींद से समझौता करने में यकीन नहीं रखते। उन्होंने कहा, “मैं अपनी नींद से कोई समझौता नहीं करता।” हर दिन एक तय समय पर जागने के लिए खुद पर ज़बरदस्ती करने के बजाय, वे अपनी सुबह की शुरुआत इस आधार पर करते हैं कि वे पिछली रात कितने बजे सोए थे। ज़्यादातर रातें वे सुबह 2 बजे से 4 बजे के बीच सोते हैं, हालांकि कभी-कभी काम की वजह से उन्हें और भी देर हो जाती है।

घड़ी देखने के बजाय परफॉर्मेंस पर ध्यान

कंपनी के फाउंडर अपनी कंपनी में भी यही सोच अपनाते हैं। कर्मचारियों के आने या जाने के समय से उन्हें आंकने के बजाय, जिंदल नतीजों पर ध्यान देना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “हमारी कंपनी में हर टीम मेंबर के साथ, हम यह कोशिश करते हैं कि काम किसी खास व्यक्ति की मौजूदगी पर निर्भर न हो।” उन्होंने आगे कहा कि उनका मकसद ऐसे सिस्टम बनाना है जहाँ लोगों का मूल्यांकन उनके काम के नतीजों और लक्ष्यों के आधार पर हो, न कि इस आधार पर कि वे डेस्क पर कितने घंटे बिताते हैं।

बेंगलुरु के इस कैफे में लैपटॉप खोलकर बैठना पड़ेगा महंगा! 99 रुपये प्रति घंटे लगेगा वर्कस्पेस चार्ज

बेंगलुरु के एक कैफे का नोटिस इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। कैफे में लगे नोटिस में लिखा है कि कि अगर कोई कस्टमर्स उस जगह को ऑफिस या वर्कस्पेस की तरह इस्तेमाल करता है, तो उससे 99 रुपये प्रति घंटे का शुल्क लिया जाएगा। इस फैसले को लेकर लिंक्डइन पर लोगों की अलग-अलग राय सामने आई है। कुछ लोग कैफे के फैसले को सही बता रहे हैं, वहीं कई लोगों के मुताबिक इससे असली समस्या का समाधान नहीं होगा। सोशल मीडिया पर ये पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है।

बेंगलुरु के कार्तिक सुरोजू ने इंदिरानगर के एक कैफे में लगे नोटिस की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर की। नोटिस में लिखा था, “वर्कस्पेस रेंटल चार्ज: 99 रुपये प्रति घंटा।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सुरोजू ने कहा कि ये नियम उन ग्राहकों को ही दूर कर सकता है, जिनके लिए ऐसी जगहें अक्सर आकर्षण का केंद्र होती हैं।

कैफे ने किया चॉर्ज

अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा, “वहां कोई भी बैठकर काम नहीं कर रहा था। एक भी व्यक्ति नहीं था।” उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि यह साइन उस समस्या का समाधान करने की कोशिश कर रहा है, जो असली समस्या ही नहीं है। यह सही है कि कैफे में कोई एक कॉफी लेकर पांच घंटे तक नहीं बैठ सकता, लेकिन इस तरह के चार्ज वाला बोर्ड लगाने से ग्राहक आने के बजाय दूर हो सकते हैं।”

कैफे के रिव्यू है अच्छे

इस पोस्ट के सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई यूजर्स का मानना था कि कैफे ने ये नियम इसलिए बनाया जिससे कस्टमर लंबे समय तक एक ही टेबल पर बैठकर उसे ऑफिस की तरह इस्तेमाल न करें और दूसरे ग्राहकों के लिए भी जगह उपलब्ध रहे। एक यूजर ने कमेंट किया, “हो सकता है कैफे यही चाहता हो। शायद वे नहीं चाहते कि लोग 150 रुपये की एक कॉफी लेकर घंटों तक टेबल घेरकर बैठे रहें।” इस पर कार्तिक सुरोजू ने जवाब देते हुए कहा, “हो सकता है।” उन्होंने ये भी बताया कि कैफे के रिव्यू अच्छे हैं और वहां का खाना-पीना भी पसंद किया जाता है। साथ ही उन्होंने कहा कि वह दोबारा कैफे जाकर मालिक से इस नियम के पीछे की वजह जानने की कोशिश करेंगे।

2-3 घंटे तक करते हैं काम

वहीं कई लोगों ने कैफे के इस फैसले का खुलकर सपोर्ट भी किया। एक यूजर ने लिखा, “मैं इस कैफे के फैसले के पूरी तरह समर्थन में हूं। मेरे पसंदीदा कैफे में कई बार ऐसा हुआ कि कुछ लोगों ने पूरी टेबल को अपना वर्कस्टेशन बना लिया, जिसकी वजह से खाना खाने आए ग्राहकों के लिए बहुत कम सीटें बचती हैं।” कार्तिक सुरोजू ने कहा कि कैफे में बैठकर काम करने वाले सभी लोग परेशानी नहीं बनते। उन्होंने लिखा, “ज्यादातर लोग 2-3 घंटे तक काम करते हैं और इस दौरान इतना ऑर्डर भी करते हैं कि उनका वहां बैठना उचित लगता है। असली दिक्कत उन लोगों से होती है, जो पूरे दिन सिर्फ एक कॉफी लेकर बैठे रहते हैं।” उनके मुताबिक, कई छोटे कैफे ऐसे ग्राहकों को कुछ कहने से भी बचते हैं, क्योंकि उन्हें खराब रिव्यू या अपनी छवि पर असर पड़ने का डर रहता है।

कुछ यूजर्स के मुताबिक, इस समस्या का समाधान प्रति घंटे शुल्क लेने के बजाय साफ नियम बनाकर किया जा सकता है। एक यूजर ने लिखा, “अगर असली परेशानी यह है कि कुछ लोग कम ऑर्डर देकर घंटों तक टेबल घेरकर बैठे रहते हैं, जिससे नए ग्राहकों को जगह नहीं मिलती, तो नोटिस में सीधे उसी व्यवहार का जिक्र होना चाहिए।”