चीन के अमीर अरबपतियों पर कस रहा टैक्स का शिकंजा, जानिए यहां के रईसों की कैसे बढ़ने वाली हैं मुश्किलें

चीनी कारोबारी अपनी कमाई पर कर बचाने के लिए ग्लोबल एक्सचेंज पर बिजनेस लिस्ट करने और अपने अरबों डॉलर ऑफशोर रखने का तरीका अपनाते रहे हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता है, क्योंकि टैक्स अधिकारियों ने जुलाई में कहा कि वे स्थानीय करदाताओं के लिए विदेशी ट्रस्ट से होने वाले मुनाफे पर 20% टैक्स लगाना शुरू करेंगे। इन लोगों के पास अब 22 अक्टूबर तक बिना किसी पेनल्टी के अपनी देनदारियों को टैली करने, रिपोर्ट करने और चुकाने का समय है।

ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के अनुसार, इस कदम से दुनिया के 500 सबसे अमीर लोगों में से आठ और उनके लाभार्थी सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग के मुताबिक इन टाइकून्स के ऑफशोर ट्रस्ट के जरिए चीन में बड़े ऑपरेशन वाले बिजनेस में लिस्टेड स्टेक हैं। चीनी सरकार ने किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक तौर से अलग नहीं किया है। यह साफ़ नहीं है कि इनमें से किसी अरबपति को अपने विदेशी ट्रस्ट से हुए मुनाफे पर टैक्स देना होगा या उनसे ऐसा करने के लिए कहा गया है। ब्लूमबर्ग के रेगुलेटरी फाइलिंग के आधार पर की गई गणना के मुताबिक, शुक्रवार तक उनकी होल्डिंग्स कुल मिलाकर लगभग $140.2 बिलियन थीं।

चीन की कुछ सबसे जानी-मानी कंपनियों की स्थापना करने वाले आठ अरबपतियों ने अपने ट्रस्ट ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड्स और केमैन आइलैंड्स जैसे टैक्स हेवन में खोले हैं। वीडियो गेम डेवलपर NetEase Inc. चलाने वाले विलियम डिंग इनमें शामिल हैं। विदेशों में उनके लगभग $37 बिलियन रखे हैं, और कॉलिन हुआंग, जिन्होंने ई-कॉमर्स की बड़ी कंपनी PDD Holdings Inc. लॉन्च की और चीन के बाहर उनके पास $29 बिलियन हैं।

एल्युमिनियम बनाने वाली कंपनी चाइना होंगकियाओ ग्रुप लिमिटेड के एक स्पोक्सपर्सन ने कहा कि उसके फाउंडर झांग बो और कंपनी की लीडरशिप को टैक्स पॉलिसी में बदलाव से जोड़ना “बेबुनियाद और गुमराह करने वाला है।” बाकी सात कंपनियों के प्रतिनिधियों ने टिप्पणी के अनुरोध का जवाब नहीं दिया। विदेशों में ज्यादातर पैसा उन निवेशों से जमा हुआ था जो कंपनियों ने अमेरिका या हांगकांग में इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग पूरी करने से पहले किए थे। उनमें से कुछ कारोबार, जैसे PDD और पॉप मार्ट, ने ट्रेडिंग शुरू करने के बाद से वैल्यू में बहुत बढ़ोतरी की है, जिससे उनके संस्थापकों को कागज पर अरबों डॉलर मिले हैं।

लॉ फर्म इंस एंड कंपनी हांगकांग के पार्टनर केविन वू ने कहा कि टैक्स में हड़पने से पुराने मनी ट्रस्ट पर ज्यादा असर पड़ता है। उन्होंने कहा, “कंपनी के पब्लिक होने के बाद मूल्य बहुत बढ़ जाता है।” जिन होने वाले क्लाइंट्स ने बहुत पहले अपनी कंपनियों को लिस्ट किया था, वे “ऐसे इनवेंटिव वकीलों की मांग कर रहे हैं जो सिर्फ नियम बताने के बजाय ट्रस्ट को रीस्ट्रक्चर कर सकें।” उन्होंने ब्लूमबर्ग द्वारा पहचाने गए आठ अरबपतियों के बजाय अपनी बातचीत का जिक्र करते हुए कहा।

टैक्स कलेक्शन का यह अभियान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के “आम खुशहाली” के अभियान का ही एक हिस्सा है, जिसमें घरेलू टेक्नोलॉजी की बड़ी कंपनियों पर कार्रवाई और बैंकरों की सैलरी में कटौती शामिल थी। भले ही पिछले कुछ सालों में इनमें से कुछ पाबंदियां कम हुई हैं, लेकिन लंबे समय से चल रही प्रॉपर्टी की मंदी ने स्थानीय सरकारों के फाइनेंस को भी गहरा झटका दिया है, जिससे रेवेन्यू के दूसरे सोर्स खोजने पड़े हैं।

यूनियन बैंकेयर प्रिवी में एशिया के सीनियर इकोनॉमिस्ट कार्लोस कैसानोवा ने कहा, “उन्हें स्थानीय और केंद्र सरकार के लेवल पर रेवेन्यू के सोर्स को बेहतर बनाने की जरूरत है और वे एक चैनल के तौर पर ऑफशोर वेल्थ की तलाश कर रहे हैं।”

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छत पर सोलर पैनल लगते ही जीरो हुआ बिजली बिल! जानिए बिहार की उमा और रीना की पूरी स्टोरी

बिजली बिल डराने के बजाय राहत देने लगे, तो इससे बेहतर क्या होगा! बिहार में सौर ऊर्जा की बढ़ती पहुंच के बीच समस्तीपुर की उमा कुमारी और पूर्णिया की रीना कुमारी की कहानी कुछ ऐसी ही है। दोनों ने अपने घरों की छत पर सोलर पैनल लगवाए और अब बिजली बिल में बड़ी राहत का लाभ उठा रही हैं। उमा को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं से आर्थिक मदद मिली, तो रीना का कहना है कि सोलर प्लांट लगने के बाद उनका दो हजार रुपये तक पहुंचने वाला बिजली बिल अब शून्य आ रहा है।

छत पर सोलर, घर में बचत की रोशनी

बिजली की बढ़ती जरूरतों के बीच रूफटॉप सोलर आम परिवारों के लिए बचत का एक ऑप्शन बनकर उभर रहा है। केंद्र सरकार की पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना का उद्देश्य घरों की छतों पर सोलर प्लांट लगाकर परिवारों को बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बनाना है। इस योजना के तहत पात्र परिवारों को हर महीने 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली का लाभ मिल सकता है। वहीं, सोलर प्लांट लगवाने के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार सरकारी सब्सिडी भी दी जाती है।

योजना के तहत एक किलोवाट क्षमता के सोलर प्लांट पर 30 हजार रुपये, दो किलोवाट पर 60 हजार रुपये और तीन किलोवाट या उससे अधिक क्षमता के प्लांट पर अधिकतम 78 हजार रुपये की केंद्रीय सब्सिडी का प्रावधान है। नेट मीटरिंग की सुविधा से अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में भेजने का विकल्प भी मिल सकता है।

समस्तीपुर की उमा ने लगवाया तीन किलोवाट का सोलर प्लांट

समस्तीपुर के आजाद नगर, मोहनपुर रोड की रहने वाली उमा कुमारी ने अपने घर की छत पर तीन किलोवाट क्षमता का सोलर प्लांट लगवाया है। उन्होंने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में बिजली विभाग से सहयोग मिला और प्लांट भी जल्द स्थापित हो गया। सबसे खास बात यह रही कि उन्हें सोलर प्लांट लगने के करीब 15 दिन बाद ही सब्सिडी की राशि मिल गई।

उमा कुमारी बताती हैं कि सोलर पैनल लगवाने के बाद उन्हें काफी संतुष्टि मिली। सब्सिडी की रकम समय पर खाते में आने से उनका भरोसा भी बढ़ा। उनके लिए यह सिर्फ छत पर सोलर पैनल लगवाने का फैसला नहीं था, बल्कि बिजली खर्च को कम करने की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम था।

बिहार सरकार ने दिया अलग से सब्सिडी

उमा की मानें तो पहले उन्हें बिजली बिल में 240 रुपये का फिक्स चार्ज देना पड़ता था। लेकिन मुख्यमंत्री की ओर से 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा के बाद उनका बिजली बिल शून्य आने लगा। उन्होंने बताया कि इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री बिजली योजना के तहत 20 हजार रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी मिलने की जानकारी मिली और यह राशि भी उन्हें प्राप्त हो गई।

उमा कहती हैं कि सोलर प्लांट पर सब्सिडी मिलने और बिजली बिल शून्य होने से उन्हें काफी खुशी हुई। उनके अनुभव में सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने से घर के बिजली खर्च को लेकर बड़ी राहत मिली है।

पूर्णिया की रीना का भी बिजली बिल शून्य

पूर्णिया की रीना कुमारी की कहानी भी घरेलू बिजली खर्च में राहत की मिसाल है। सोलर पैनल लगवाने से पहले रीना के घर का बिजली बिल हर महीने करीब 1,500 से 2,000 रुपये तक आता था। अब उनके मुताबिक, बिजली बिल शून्य आ रहा है।

रीना बताती हैं कि सोलर प्लांट लगने के बाद उनके घर में सभी बिजली उपकरण चल रहे हैं। उन्हें सोलर प्लांट पर कुल 98 हजार रुपये की सब्सिडी मिली है। उनके लिए यह बदलाव आर्थिक बचत के साथ-साथ बिजली की जरूरतों को पूरा करने में मददगार साबित हुआ है। साथ ही रूफटॉप गार्डन को भी छाया मिल गया।

क्या आपके घर की छत भी बन सकती है बचत का जरिया?

उमा और रीना के अनुभव बताते हैं कि रूफटॉप सोलर सही क्षमता और योजना के तहत लगाया जाए, तो घरेलू बिजली खर्च कम करने में मदद कर सकता है। सोलर पैनल लगवाने की योजना बना रहे परिवारों को आवेदन से पहले आधिकारिक योजना पोर्टल पर पात्रता, सब्सिडी, पंजीकृत विक्रेता और इंस्टॉलेशन से जुड़ी शर्तों की जानकारी लेनी चाहिए। इस तरह आपके घर की छत भी खर्च बचाने का जरिया बन सकता है।

बिहार से सच्चिदानंद की रिपोर्ट

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इंस्टाग्राम, फेसबुक कंटेंट पर मेटा को निर्देश

नई दिल्ली। केंद्र सरकार सोशल मीडिया पर चल रहे सरकारी विरोधी नैरेटिव से परेशान है और उसे रोकना चाहती है। इसके लिए सरकार की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम और फेसबुक की पैरेंट कंपनी मेटा को निर्देश दिया है कि वह इन दोनों प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम की समीक्षा करे। सरकार का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर यूजर्स को एकतरफा नैरेटिव वाला कंटेंट मिल रहा है। सूचना व प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने यह निर्देश 10 अक्टूबर को जारी किया था लेकिन सोमवार को इसकी जानकारी सामने आई।

मंत्रालय की ओर से भेजे गए निर्देश में मेटा से सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने, हिंसा भड़काने या गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली सामग्री पर ज्यादा निगरानी करने को कहा गया है। गौरतलब है कि 10 अक्टूबर को ही कॉकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान किया था। उस दिन दिन भर दिल्ली में अफरातफरी का माहौल रहा था और करीब सात हजार लोगों को हिरासत में लिया गया था।

उसी दिन सरकार की ओर से मेटा से यह भी कहा गया कि विरोध, प्रदर्शनों से जुड़े फोटो, वीडियो, ग्राफिक्स और अन्य कंटेंट के साथ पर्याप्त संदर्भ दिया जाए। कहा गया है कि ऐसे मामलों में संदर्भ देना ज्यादा जरूरी है, जहां यूजर्स कंटेंट की असलियत, तारीख, जगह या परिस्थितियों का आसानी से पता नहीं लगा सकते। मंत्रालय ने उससे यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि यूजर्स को किसी एक या सीमित संख्या वाले नैरेटिव का जरूरत से ज्यादा एक्सपोजर न मिले। यानी एक ही तरह के नैरेटिव सपोर्ट करने वाला कंटेंट ज्यादा न मिले।

EPFO: सैलरी ₹25,000 है तो तुरंत करें यह काम! EPFO के नए नियम से होगा बड़ा फायदा, जानें स्टेप-बाय-स्टेप प्रोसेस

EPFO Wage Limit Hike: केंद्र सरकार ने बीतें दिनों कर्मचारियों की मिनिमम सैलरी को लेकर एक बड़ा ऐलान किया था। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के तहत अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा कवरेज के लिए मासिक वेतन सीमा को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह कर दिया गया। 17 सितंबर से लागू हुए इस फैसले के बाद लगभग 51 लाख से अधिक नए कर्मचारियों को अब प्रोविडेंट फंड, पेंशन और इंश्योरेंस (EDLI) के दायरे में लाया जाएगा।

वैसे सिर्फ ₹25,000 से कम वेतन होना ही पात्रता की एकमात्र गारंटी नहीं है। कर्मचारियों को संबंधित योजनाओं के नियमों और शर्तों को पूरा करना होगा। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस नई लिमिट का आपको कैसे फायदा मिलेगा और आप अपनी पात्रता कैसे चेक कर सकते हैं।

नए नियम के तहत कौन-कौन हो सकता है शामिल?

यह बदलाव मुख्य रूप से उन कर्मचारियों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है, जो पहले सिर्फ इसलिए EPF कवरेज से बाहर थे क्योंकि उनका मूल वेतन (Basic Salary + DA) ₹15,000 प्रति माह से अधिक था।

श्रम मंत्रालय के अनुसार, जिन कर्मचारियों का वेतन ₹15,000 से ₹25,000 के बीच है और वे संबंधित शर्तों को पूरा करते हैं, उन्हें अब EPF के तहत नामांकित किया जा सकता है। जो कर्मचारी पहले से ही EPF के सदस्य हैं, उनका योगदान उनके लागू वेज बेस और सदस्यता की स्थिति पर निर्भर करेगा।

EPF, EPS और EDLI में कैसे कराएं अपना नामांकन?

कर्मचारी व्यक्तिगत रूप से किसी अलग सार्वजनिक फॉर्म के जरिए तीनों योजनाओं में सीधे रजिस्ट्रेशन नहीं कर सकते। इसके लिए नियोक्ता को ही प्रक्रिया पूरी करनी होती है:

एलिजिबिलिटी चेक करें: सबसे पहले यह पक्का करें कि आपका मासिक वेतन ₹25,000 से अधिक नहीं है और आप योजना की अन्य शर्तों को पूरा करते हैं।

HR या पेरोल टीम से संपर्क करें: अपने नियोक्ता की HR या अकाउंट्स टीम से संपर्क करें ताकि वे आपकी पात्रता सत्यापित कर आपका एनरोलमेंट शुरू कर सकें।

जरूरी दस्तावेज दें: अपनी पहचान, रोजगार विवरण, आधार विवरण और बैंक खाते की जानकारी नियोक्ता को सौंपें।

कंट्रिब्यूशन वेरिफाई करें: नामांकन पूरा होने के बाद अपनी सैलरी स्लिप और EPFO पासबुक चेक करें ताकि यह पक्का हो सके कि पीएफ कटौती और योगदान सही से दर्ज हो रहा है।

EPF, EPS और EDLI से आपको क्या-क्या फायदे मिलेंगे?

योजना का नाम मुख्य लाभ
कर्मचारी भविष्य निधि (EPF)कर्मचारी और नियोक्ता के योगदान और उस पर मिलने वाले ब्याज के जरिए रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड बनता है।
कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) अर्हता सेवा और पेंशन नियमों के आधार पर पात्र सदस्यों को आजीवन पेंशन मिलती है।
कर्मचारी जमा सम्बद्ध बीमा (EDLI) EPF सदस्यता से जुड़ा मुफ्त जीवन बीमा कवर, जिसके तहत अनहोनी की स्थिति में नॉमिनी को क्लेम की राशि मिलती है।

क्या अब आपकी PF कटौती बढ़ जाएगी?

नई वेज सीलिंग लागू होने से पात्र कर्मचारियों के योगदान की गणना के लिए वेतन आधार बढ़ सकता है। नए ढांचे के तहत, अंशदान के लिए अधिकतम वेतन सीमा ₹25,000 या कर्मचारी का वास्तविक वेतन जो भी कम हो वो मानी जाएगी।

इस गणित को ऐसे समझिए, अगर आपके ₹25,000 के पूरे वेतन आधार पर 12% पीएफ कटता है, तो कर्मचारी का मासिक योगदान ₹3,000 होगा। नियोक्ता का 12% योगदान नियमानुसार EPF और EPS में बंटेगा, जबकि EDLI का प्रीमियम अलग से पूरी तरह नियोक्ता द्वारा दिया जाएगा।

कनाडा से अलग होने पर आज अल्बर्टा में वोटिंग:70% लोग साथ रहने के पक्ष में, तेल की कमाई को लेकर 50 साल पुराना झगड़ा

कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह हो रहा है। इसमें लोग तय करेंगे कि प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं। इप्सोस-ग्लोबल न्यूज के सर्वे में अल्बर्टा के करीब 70% लोग कनाडा के साथ बने रहने के पक्ष में हैं। इसके बावजूद अलग देश बनाने की मांग करने वाले लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अल्बर्टा में अलग देश बनाने की मांग कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तेल से होने वाली कमाई और केंद्र सरकार के साथ पैसों के बंटवारे को लेकर नाराजगी है। अल्बर्टा में तेल का चौथा सबसे बड़ा भंडार अल्बर्टा में दुनिया के प्रमाणित तेल भंडार के मामले में चौथा सबसे बड़ा भंडार है। यहां का तेल उद्योग, रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है। अलग देश बनाने के समर्थकों का कहना है कि अल्बर्टा केंद्र सरकार को बहुत पैसा देता है, लेकिन उसे बदले में उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि प्रांत की कमाई का इस्तेमाल कनाडा के दूसरे हिस्सों की मदद के लिए किया जाता है। वर्ष 2015 में जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह विवाद फिर बढ़ा। उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स और प्रदूषण घटाने के लिए कई नियम लागू किए। अल्बर्टा के तेल उद्योग से जुड़े लोगों ने इनका विरोध किया। उनका मानना था कि इन नियमों से तेल का कारोबार प्रभावित होगा। क्या वोटिंग के बाद अल्बर्टा अलग देश बन जाएगा? नहीं। इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे यह फैसला नहीं कराया जा रहा कि अल्बर्टा तुरंत अलग देश बने या नहीं। उनसे पूछा जा रहा है कि क्या अलग होने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। लोगों के सामने दो विकल्प हैं- 1. कनाडा का हिस्सा बने रहना 2. भविष्य में अलग होने पर फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करना अगर लोग दूसरे विकल्प के पक्ष में वोट देते हैं, तब भी अल्बर्टा तुरंत अलग देश नहीं बन जाएगा। इसके लिए कनाडा की केंद्र सरकार, दूसरे प्रांतों और वहां रहने वाले मूल निवासी समुदायों के साथ बातचीत करनी होगी। अलग होने की स्थिति में कई सवालों पर फैसला लेना होगा। इनमें संसाधनों का बंटवारा, अधिकार और कनाडा के साथ भविष्य के रिश्ते शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्नी अल्बर्टा के हैं, अलग के पक्ष में नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं। वे भी मानते हैं कि प्रांत के लोगों में नाराजगी है। हालांकि, वे अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि वे अलग होने के पक्ष में वोट न करें। ऐसा फैसला देश में लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान और अनिश्चितता पैदा कर सकता है। कार्नी ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण अल्बर्टा के कई लोगों को ऐसा लगता है, जैसे उनके अपने संसाधन भी उनके नहीं हैं। हालांकि सरकार अल्बर्टा के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अलग होने के खिलाफ फिर जनमत संग्रह क्यों करा रहीं? अल्बर्टा के मुख्यमंत्री डेनियल स्मिथ ने पिछले साल जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया आसान कर दी थी। इसके बाद आजादी का मुद्दा राज्य की राजनीति में और चर्चा में आ गया। हालांकि, स्मिथ खुद अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अलग होने के खिलाफ वोट दे रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस जनमत संग्रह के पीछे स्मिथ की अपनी पार्टी की राजनीति भी है। उनकी पार्टी में कई लोग अल्बर्टा को अलग देश बनाने के पक्ष में हैं। स्मिथ जनमत संग्रह के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और समर्थकों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना चाहती हैं। जनमत संग्रह के अलावा 9 और सवाल पूछे जा रहे अल्बर्टा में सिर्फ आजादी के मुद्दे पर ही वोटिंग नहीं हो रही है। लोगों से कुल 10 सवालों पर राय मांगी जा रही है। 1. अल्बर्टा की आजादी: क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर स्वतंत्र देश बन जाना चाहिए? 2. प्रवासियों की संख्या: क्या अल्बर्टा सरकार को प्रांत में आने वाले प्रवासियों की संख्या सीमित करने का अधिकार मिलना चाहिए? 3. स्थानीय लोगों को प्राथमिकता: क्या नौकरियों में अल्बर्टा के लोगों को बाहर से आने वाले लोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जानी चाहिए? 4. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग नियम: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए? 5. शिक्षा की सुविधाएं: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बच्चों को सरकारी शिक्षा देने पर कुछ पाबंदियां लगाई जानी चाहिए? 6. सरकारी आर्थिक मदद: क्या सरकारी आर्थिक सहायता और दूसरी सुविधाएं पाने के लिए लोगों के लिए अल्बर्टा में कम से कम 12 महीने रहना जरूरी होना चाहिए? 7. वोट देने के लिए पहचान पत्र: क्या प्रांतीय चुनाव में वोट देने वालों के लिए नागरिकता का सबूत दिखाना जरूरी होना चाहिए? 8. प्रांतों को जज चुनने का अधिकार: क्या अल्बर्टा और दूसरे प्रांतों को अपनी अदालतों के जज चुनने का अधिकार मिलना चाहिए? 9. कनाडा की सीनेट खत्म करना: क्या देश की संसद के ऊपरी सदन सीनेट को खत्म कर देना चाहिए? 10. प्रांतों को ज्यादा अधिकार: क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मामलों में प्रांतीय सरकारों को केंद्र सरकार के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए? मुख्यमंत्री स्मिथ ने पहले प्रस्ताव के खिलाफ और बाकी नौ प्रस्तावों का समर्थन करने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अल्बर्टा को ज्यादा ताकत मिलेगी। ट्रम्प सरकार पर अलगाववादियों को बढ़ावा देने का आरोप ट्रम्प सरकार पर अलग देश की मांग कर रहे लोगों को बढ़ावा देने का आरोप है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारी अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं। कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसेंट ने भी इसी साल जनवरी में ऐसा संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि अल्बर्टा के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्टा के लोग स्वतंत्र सोच वाले हैं और ऐसी चर्चा है कि वहां के लोग कनाडा में बने रहने या अलग होने पर जनमत संग्रह करा सकते हैं।

कनाडा से अलग होने पर आज अल्बर्टा में वोटिंग:70% लोग साथ रहने के पक्ष में, तेल की कमाई को लेकर 50 साल पुराना झगड़ा

कनाडा के अल्बर्टा प्रांत में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह हो रहा है। इसमें लोग तय करेंगे कि प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या नहीं। इप्सोस-ग्लोबल न्यूज के सर्वे में अल्बर्टा के करीब 70% लोग कनाडा के साथ बने रहने के पक्ष में हैं। इसके बावजूद अलग देश बनाने की मांग करने वाले लोग पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अल्बर्टा में अलग देश बनाने की मांग कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह तेल से होने वाली कमाई और केंद्र सरकार के साथ पैसों के बंटवारे को लेकर नाराजगी है। अल्बर्टा में तेल का चौथा सबसे बड़ा भंडार अल्बर्टा में दुनिया के प्रमाणित तेल भंडार के मामले में चौथा सबसे बड़ा भंडार है। यहां का तेल उद्योग, रोजगार और कमाई का बड़ा जरिया है। अलग देश बनाने के समर्थकों का कहना है कि अल्बर्टा केंद्र सरकार को बहुत पैसा देता है, लेकिन उसे बदले में उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि प्रांत की कमाई का इस्तेमाल कनाडा के दूसरे हिस्सों की मदद के लिए किया जाता है। वर्ष 2015 में जस्टिन ट्रूडो के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह विवाद फिर बढ़ा। उनकी सरकार ने कार्बन टैक्स और प्रदूषण घटाने के लिए कई नियम लागू किए। अल्बर्टा के तेल उद्योग से जुड़े लोगों ने इनका विरोध किया। उनका मानना था कि इन नियमों से तेल का कारोबार प्रभावित होगा। क्या वोटिंग के बाद अल्बर्टा अलग देश बन जाएगा? नहीं। इस जनमत संग्रह में लोगों से सीधे यह फैसला नहीं कराया जा रहा कि अल्बर्टा तुरंत अलग देश बने या नहीं। उनसे पूछा जा रहा है कि क्या अलग होने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। लोगों के सामने दो विकल्प हैं- 1. कनाडा का हिस्सा बने रहना 2. भविष्य में अलग होने पर फैसला लेने के लिए जनमत संग्रह की प्रक्रिया शुरू करना अगर लोग दूसरे विकल्प के पक्ष में वोट देते हैं, तब भी अल्बर्टा तुरंत अलग देश नहीं बन जाएगा। इसके लिए कनाडा की केंद्र सरकार, दूसरे प्रांतों और वहां रहने वाले मूल निवासी समुदायों के साथ बातचीत करनी होगी। अलग होने की स्थिति में कई सवालों पर फैसला लेना होगा। इनमें संसाधनों का बंटवारा, अधिकार और कनाडा के साथ भविष्य के रिश्ते शामिल हैं। प्रधानमंत्री कार्नी अल्बर्टा के हैं, अलग के पक्ष में नहीं कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी खुद अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं। वे भी मानते हैं कि प्रांत के लोगों में नाराजगी है। हालांकि, वे अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने लोगों को आगाह किया है कि वे अलग होने के पक्ष में वोट न करें। ऐसा फैसला देश में लंबे समय तक राजनीतिक खींचतान और अनिश्चितता पैदा कर सकता है। कार्नी ने कहा कि केंद्र सरकार की नीतियों के कारण अल्बर्टा के कई लोगों को ऐसा लगता है, जैसे उनके अपने संसाधन भी उनके नहीं हैं। हालांकि सरकार अल्बर्टा के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है। मुख्यमंत्री अलग होने के खिलाफ फिर जनमत संग्रह क्यों करा रहीं? अल्बर्टा के मुख्यमंत्री डेनियल स्मिथ ने पिछले साल जनमत संग्रह कराने की प्रक्रिया आसान कर दी थी। इसके बाद आजादी का मुद्दा राज्य की राजनीति में और चर्चा में आ गया। हालांकि, स्मिथ खुद अल्बर्टा को कनाडा से अलग करने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे अलग होने के खिलाफ वोट दे रही हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस जनमत संग्रह के पीछे स्मिथ की अपनी पार्टी की राजनीति भी है। उनकी पार्टी में कई लोग अल्बर्टा को अलग देश बनाने के पक्ष में हैं। स्मिथ जनमत संग्रह के जरिए अपनी ही पार्टी के नेताओं और समर्थकों के बीच चल रहे मतभेदों को सुलझाना चाहती हैं। जनमत संग्रह के अलावा 9 और सवाल पूछे जा रहे अल्बर्टा में सिर्फ आजादी के मुद्दे पर ही वोटिंग नहीं हो रही है। लोगों से कुल 10 सवालों पर राय मांगी जा रही है। 1. अल्बर्टा की आजादी: क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर स्वतंत्र देश बन जाना चाहिए? 2. प्रवासियों की संख्या: क्या अल्बर्टा सरकार को प्रांत में आने वाले प्रवासियों की संख्या सीमित करने का अधिकार मिलना चाहिए? 3. स्थानीय लोगों को प्राथमिकता: क्या नौकरियों में अल्बर्टा के लोगों को बाहर से आने वाले लोगों के मुकाबले प्राथमिकता दी जानी चाहिए? 4. स्वास्थ्य सेवाओं पर अलग नियम: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों को सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए अलग नियम बनाए जाने चाहिए? 5. शिक्षा की सुविधाएं: क्या अस्थायी रूप से रहने वाले लोगों के बच्चों को सरकारी शिक्षा देने पर कुछ पाबंदियां लगाई जानी चाहिए? 6. सरकारी आर्थिक मदद: क्या सरकारी आर्थिक सहायता और दूसरी सुविधाएं पाने के लिए लोगों के लिए अल्बर्टा में कम से कम 12 महीने रहना जरूरी होना चाहिए? 7. वोट देने के लिए पहचान पत्र: क्या प्रांतीय चुनाव में वोट देने वालों के लिए नागरिकता का सबूत दिखाना जरूरी होना चाहिए? 8. प्रांतों को जज चुनने का अधिकार: क्या अल्बर्टा और दूसरे प्रांतों को अपनी अदालतों के जज चुनने का अधिकार मिलना चाहिए? 9. कनाडा की सीनेट खत्म करना: क्या देश की संसद के ऊपरी सदन सीनेट को खत्म कर देना चाहिए? 10. प्रांतों को ज्यादा अधिकार: क्या स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मामलों में प्रांतीय सरकारों को केंद्र सरकार के मुकाबले ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए? मुख्यमंत्री स्मिथ ने पहले प्रस्ताव के खिलाफ और बाकी नौ प्रस्तावों का समर्थन करने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे केंद्र सरकार के साथ बातचीत में अल्बर्टा को ज्यादा ताकत मिलेगी। ट्रम्प सरकार पर अलगाववादियों को बढ़ावा देने का आरोप ट्रम्प सरकार पर अलग देश की मांग कर रहे लोगों को बढ़ावा देने का आरोप है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारी अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिलते हैं और उनकी मदद करते हैं। CNN की एक रिपोर्ट के मुताबिक ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं। कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बैसेंट ने भी इसी साल जनवरी में ऐसा संकेत दिया था। उन्होंने कहा था कि अल्बर्टा के पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन हैं और वह अमेरिका का स्वाभाविक साझेदार है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्बर्टा के लोग स्वतंत्र सोच वाले हैं और ऐसी चर्चा है कि वहां के लोग कनाडा में बने रहने या अलग होने पर जनमत संग्रह करा सकते हैं।

जगन मोहन रेड्डी को 2023 के चुनाव आयोग के कानून पर क्यों है पछतावा? NDA को दे दी टेंशन!

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर अब YSR कांग्रेस पार्टी ने अपने पुराने रुख पर सवाल उठाए हैं। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी प्रमुख वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने रविवार को माना कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े बिल पर NDA सरकार का समर्थन करना उनकी पार्टी की गलती थी। उन्होंने कहा कि पार्टी को अब अपने उस फैसले पर अफसोस है।

उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हमें अब इस बात का पछतावा है… हमें एहसास हुआ है कि ऐसी चयन प्रक्रिया को मंजूरी देना हमारी गलती थी, जिसमें चुनाव आयुक्त का चुनाव तीन सदस्यीय पैनल द्वारा किया जाता है। इस पैनल में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए एक मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।” उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा व्यवस्था ने चुनाव आयोग (EC) के ढांचे को असंतुलित कर दिया है।

इस दौरान जगन ने कानून में संशोधन की भी मांग की, ताकि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को फिर से शामिल किया जा सके। उन्होंने कहा, “अभी की प्रक्रिया इतनी एकतरफा है, जैसे कि छात्र खुद ही अपना परीक्षक चुन रहे हों। ऐसा नहीं होना चाहिए।”

बता दें कि यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि 2023 के कानून का YSRCP ने लोकसभा और राज्यसभा, दोनों जगह समर्थन किया था, जबकि विपक्ष ने इसमें से CJI को हटाए जाने पर आपत्ति जताई थी।

‘सोच बदल गई है’

यह पहली बार नहीं है जब जगन मोहन रेड्डी ने चुनाव आयोग (EC) के कामकाज को लेकर चिंता जताई है। सितंबर में, चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की जांच पर प्रतिक्रिया देते हुए, उन्होंने ‘X’ पर लिखा कि “लोकतंत्र तभी कायम रह सकता है जब लोगों को चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं पर पूरा भरोसा हो”।

रिपोर्ट में मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) से जुड़े फैसलों पर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा जताई गई आपत्तियों का जिक्र किया गया था।

इस पर जगन ने लिखा था, “आरोप-प्रत्यारोप लगाने के बजाय, जनता को यह स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए कि क्या आपत्तियां दर्ज की गईं, उन पर क्या कार्रवाई हुई, और मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी तरीके से पूरी की गई।”

उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में जनता का भरोसा बहाल करने, नागरिकों के मतदान के अधिकारों की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने की मांग की कि लोग बिना किसी डर के अपने इन अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें।

YSRCP के एक नेता ने कहा, “हमने हमेशा कहा है कि (NDA) सरकार को हमारा समर्थन मुद्दों पर आधारित होगा। इस मामले में, हमें लगता है कि जनता को सरकार से और अधिक आश्वासन मिलने की जरूरत है।”

NDA को संसदीय समर्थन

कुछ विधायी मामलों में NDA को पार्टी का समर्थन मिलने का मतलब यह नहीं था कि BJP के साथ कोई औपचारिक गठबंधन हो गया है। हालांकि, संसद में पार्टी के रुख ने अक्सर सरकार को अपने गठबंधन के दायरे से बाहर भी समर्थन जुटाने में मदद की, जिससे जगन का बदला हुआ रुख राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

YSRCP ने संसद में लगातार NDA का समर्थन किया है। 2020 में, पार्टी ने केंद्र सरकार को उन विवादास्पद कृषि कानूनों पर समर्थन दिया था, जिन्हें बाद में रद्द कर दिया गया। 2023 में, जब विपक्षी दलों ने नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का बहिष्कार किया था, तब भी YSRCP के विधायक उस कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

साल 2019 से 2024 के बीच, जब आंध्र प्रदेश में YSRCP सत्ता में थी, तब पार्टी ने नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) और अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के मुद्दों पर NDA का समर्थन किया था।

जानकारी के मुताबिक, 2024 के चुनावों के बाद, जब YSRCP के केवल चार लोकसभा सांसद ही जीत पाए और आंध्र प्रदेश में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई, तब भी उसने स्पीकर पद के लिए NDA की पसंद का समर्थन किया था। इसके अलावा, 2025 में पार्टी ने सत्ताधारी गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन का भी समर्थन किया, और इस साल की शुरुआत में उसने परिसीमन विधेयक (डिलिमिटेशन बिल) पैकेज को अपना समर्थन देने की घोषणा की।

वाम दलों के साथ तालमेल

जगन के करीबी सूत्रों ने बताया कि YSRCP वाम दलों (जिसमें CPI(M) और CPI शामिल हैं) के साथ बातचीत कर रही है। यह बातचीत आंध्र प्रदेश में मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर सूची से हटाए जाने के मुद्दे पर हो रही है।

एक सूत्र ने कहा, “आंध्र प्रदेश में विपक्ष की एक पार्टी होने के नाते, हमारा मानना ​​है कि हमें उन लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए जो उन मतदाताओं के हितों का समर्थन कर रहे हैं, जिनके नाम अवैध रूप से हटा दिए गए हैं। TDP के नेतृत्व वाली आंध्र प्रदेश सरकार, राज्य चुनाव आयोग (EC) का पक्ष ले रही है और अपनी बात मानने वाले इस आयोग का फायदा उठा रही है।”

गौरतलब है कि जगन मोहन रेड्डी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब YSRCP और सत्ताधारी TDP के नेतृत्व वाले गठबंधन (जिसमें BJP और जन सेना पार्टी भी शामिल हैं) के बीच राजनीतिक टकराव जारी है।

YSRCP ने सत्ताधारी गठबंधन पर अपने लोकसभा फ्लोर लीडर, पी.वी. मिथुन रेड्डी की हत्या की कोशिश करने का भी आरोप लगाया है। वहीं, TDP ने आरोप लगाया है कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने के दौरान, मिथुन ने भीड़ को आगजनी के लिए उकसाया था।

राज्य में TDP के नेतृत्व वाला गठबंधन पूरी तरह से सत्ता में है। ऐसे में, YSRCP मतदाता सूची में बदलाव और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज जैसे मुद्दों पर विपक्ष का समर्थन एकजुट करने की कोशिश कर रही है।

क्या एक व्यापक विपक्षी मोर्चा बनेगा?

जगन ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेताओं को सार्वजनिक रूप से अपना समर्थन दिया है। बता दें कि CJP के सदस्य सौरव दास और आशुतोष रंका को जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराने के बाद गिरफ्तार किया गया था। इस पर जगन ने एक बार फिर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने एक पोस्ट में कहा, “व्यवस्था में एक खामी है जिसे ठीक करने की जरूरत है। चुनावी प्रक्रिया में लोगों का भरोसा फिर से बहाल होना चाहिए। सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी से कोई समस्या हल नहीं होगी, बल्कि इससे हालात और बिगड़ेंगे।”

उनका यह कदम तब आया है जब पड़ोसी राज्य तेलंगाना की एक क्षेत्रीय पार्टी, ‘भारत राष्ट्र समिति’ (BRS) ने भी CJP का समर्थन किया है। इससे संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय पार्टियों के राजनीतिक हित आपस में मेल खा सकते हैं।

बता दें कि जगन का यह बदला हुआ रुख ऐसे समय में सामने आया है, जब क्षेत्रीय पार्टियों को मिलाकर एक व्यापक विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिशों को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं।

वहीं तमिलनाडु में, इस साल हुए विधानसभा चुनावों के बाद कांग्रेस के विजय की पार्टी ‘TVK’ के साथ हाथ मिलाने से, कांग्रेस और DMK के रिश्तों में खटास आ गई है। DMK ने भी CJP का समर्थन किया है।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, YSRCP के लिए इस तरह का कोई भी गठबंधन मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश में उसकी राजनीतिक लड़ाई से प्रेरित होगा।

एक सूत्र ने बताया, “आंध्र प्रदेश में YSRCP को समर्थन देने वाले गठबंधनों के लिए जगन हमेशा तैयार रहे हैं। फिलहाल, राज्य में TDP के नेतृत्व वाले गठबंधन को रोकने के लिए ‘लेफ्ट फ्रंट’ (वाम मोर्चा) या क्षेत्रीय दलों का गठबंधन काफी लग रहा है।”

हालांकि, कांग्रेस के साथ गठबंधन की संभावना फिलहाल कम ही है, क्योंकि जगन और उनकी बहन YS शर्मिला के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हैं। शर्मिला कांग्रेस की राज्य इकाई की प्रमुख हैं।

एक सूत्र ने कहा, “फिलहाल कांग्रेस के साथ गठबंधन की कोई संभावना नहीं है।”

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सरकार में कितनी बन गई वैकेंसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में लगातार रिक्तियां बढ़ती जा रही हैं। एक के बाद एक मंत्री पद खाली हो रहे हैं और उनकी जगह नई नियुक्ति नहीं हो रही है। लोकसभा की कुल संख्या के 15 फीसदी की सीमा के आधार पर केंद्र सरकार में कुल 81 मंत्री हो सकते हैं। इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित मंत्रियों की कुल संख्या 69 है। इनमें 29 कैबिनेट मंत्री हैं, पांच स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री हैं और 34 राज्यमंत्री हैं। यानी अभी 12 वैकेंसी है। इनकी जगह नए मंत्रियों की शपथ होनी है। वह कब होगी यह किसी को पता नहीं है। लेकिन जैसे जैसे वैकेंसी बढ़ती जा रही है वैसे वैसे मंत्री पद के दावेदारों की संख्या भी बढ़ रही है। भाजपा में भी हर दिन नए दावेदार सामने आ रहे हैं।

बहरहाल, मौजूदा 12 रिक्तियों के अलावा कई और पद खाली होने वाले हैं। उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पंकज चौधरी के बारे में कहा जा रहा है कि किसी भी समय उनका इस्तीफा हो सकता है। वे प्रदेश अध्यक्ष के साथ साथ केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री भी हैं। इसी तरह दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा का भी इस्तीफा होना है। इन दोनों इस्तीफों के बाद 14 पद खाली हो जाएंगे। वैसे तो पीयूष गोयल भी केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष की दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि वे अभी कुछ दिन तक दोनों पदों पर बने रहेंगे।

बहरहाल, दो केंद्रीय मंत्रियों हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा को राज्यसभा की टिकट नहीं मिली है। दोनों का कार्यकाल 25 नवंबर तक है। अगर मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद एल मुरुगन के इस्तीफे से खाली की हुई सीट पुरी को नहीं मिलती है तो इन दो मंत्रियों के इस्तीफे होंगे। इस तरह 16 पदों की वैकेंसी हो जाएगी। सो, अगर अब किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं हो तब भी 16 नए मंत्री बनाए जा सकेंगे। इस लिहाज से अगली फेरबदल बहुत बड़ी होनी है। कहा जा रहा है कि पूरी सरकार का स्वरूप बदल जाएगा।

PM VBRY: पहली नौकरी पर ₹15,000 का तोहफा! जानिए EPFO की इस खास स्कीम के बारे में

PM Viksit Bharat Rozgar Yojana PM VBRY: फॉर्मल सेक्टर में पहली बार नौकरी शुरू करने वाले युवाओं के लिए केंद्र सरकार की ओर से बड़ी खुशखबरी है। प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY) के तहत पहली बार नौकरी जॉइन करने वाले योग्य कर्मचारियों को ₹15,000 तक का इंसेंटिव दिया जा रहा है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के माध्यम से संचालित इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं को फॉर्मल रोजगार से जोड़ना और ईपीएफ (EPF) सिस्टम में उनका स्वागत करना है।

वैसे यह ₹15,000 का इंसेंटिव सभी को एकमुश्त या खुद-ब-खुद नहीं मिलेगा। इसके लिए सरकार और ईपीएफओ ने कुछ जरूरी शर्तें, सैलरी सीमा और सर्विस पीरियड तय किया है।

कब से कब तक की नौकरियों पर मिलेगा फायदा?

यह योजना 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच सर्जित होने वाली नई नौकरियों पर लागू होगी। अगर कर्मचारी का मासिक ईपीएफ वेतन ₹1 लाख प्रति माह तक है, तो वह इस योजना के तहत योग्य माना जाएगा। इंसेंटिव की राशि कर्मचारी के 1 महीने के ईपीएफ वेज के बराबर (अधिकतम ₹15,000 की सीमा तक) होगी।

कौन है ₹15,000 इंसेंटिव के लिए योग्य?

PM-VBRY के ‘पार्ट-ए’ के तहत इंसेंटिव पाने के लिए कर्मचारी को पहली बार ईपीएफ सदस्य बनना अनिवार्य है। पात्रता की मुख्य शर्तें नीचे टेबल में दी गई हैं:

पात्रता की शर्तइसका क्या मतलब है?
पहली बार EPF मेंबरशिपकर्मचारी 1 अगस्त 2025 से पहले कभी भी ईपीएफ का अंशदान करने वाला सदस्य (छूट प्राप्त पीएफ ट्रस्ट समेत) नहीं होना चाहिए।
जॉइनिंग की तारीख नौकरी में कार्यभार संभालने की तिथि 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच होनी चाहिए।
मासिक सैलरी कर्मचारी का मासिक वेतन ₹1 लाख तक होना चाहिए (योजना की परिभाषा के अनुसार)।
सर्विस की अवधिपहली किस्त के लिए 6 महीने और दूसरी किस्त के लिए 12 महीने की निरंतर सेवा आवश्यक है।
एंप्लॉयर कम्प्लायंसजिस कंपनी/संस्था में काम कर रहे हैं, उसने ईपीएफओ में जरूरी रिपोर्टिंग और कंट्रीब्यूशन (ECR) दाखिल किया हो।

 कैसे मिलेगी ₹15,000 की रकम?

यह इंसेंटिव कर्मचारियों को सीधे दो किस्तों में दिया जाएगा:

किस्तजरूरी शर्त  अधिकतम राशि
पहला किस्त निरंतर 6 महीने की योग्य सेवा पूरी होने पर ₹7,500
दूसरी किस्त 12 महीने की सेवा और फाइनेंशियल लिटरेसी प्रोग्राम पूरा करने परबाकी बची राशि (कुल ₹15,000 तक)

ध्यान दें: इंसेंटिव की राशि योग्य सैलरी के आधार पर तय होगी, इसलिए हर किसी को फ्लैट ₹15,000 नहीं मिलेंगे। इसके अलावा, दूसरी किस्त तुरंत कैश में निकालने योग्य नहीं हो सकती है; गाइडलाइंस के मुताबिक इसे किसी उपयुक्त सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट या डिपॉजिट अकाउंट में तय समय के लिए रखा जा सकता है।

फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स क्यों है जरूरी?

दूसरी किस्त पाने के लिए फाइनेंशियल लिटरेसी प्रोग्राम को पूरा करना अनिवार्य बनाया गया है। 6 महीने की नौकरी पूरी होने पर पहली किस्त मिल जाएगी, लेकिन पूरे ₹15,000 पाने के लिए कर्मचारी को 12 महीने की नौकरी के साथ-साथ इस कोर्स को भी पूरा करना होगा।

इसके लिए कर्मचारी PM-VBRY के ऑफिशियल पोर्टल पर जाकर पूरी गाइडेंस ले सकते हैं। पोर्टल पर यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) जनरेट करने और यूएएन-आधार लिंकिंग से जुड़ी जानकारियां भी उपलब्ध हैं।

पैसा बैंक खाते में कैसे आएगा?

सरकार ने साफ किया है कि पार्ट-ए के तहत इंसेंटिव का भुगतान सीधे कर्मचारी के आधार-सीडेड बैंक अकाउंट (DBT) में आधार ब्रिज पेमेंट सिस्टम के जरिए किया जाएगा। इसलिए कर्मचारियों को अपने बैंक खाते और यूएएन को आधार से लिंक रखना जरूरी है।

एंप्लॉयर्स के लिए अलग लाभ

इस योजना में कंपनियों/नियुक्तियों के लिए भी अलग प्रावधान (‘पार्ट-बी’) है, जहां एंप्लॉयर को हर नए योग्य कर्मचारी पर ₹3,000 प्रति माह तक का इंसेंटिव मिल सकता है। इसे कर्मचारियों के ₹15,000 वाले व्यक्तिगत इंसेंटिव से जोड़कर न देखें।

राहुल ने दी केस करने की चुनौती

पणजी। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के जरिए वोट चोरी के आरोपों को दोहराते हुए राहुल गांधी ने केंद्र सरकार को चुनौती दी है कि वह उनके ऊपर मुकदमा करे। राहुल ने कहा है कि वे लगातार वोट चोरी के आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे डंके की चोट पर कहते हैं कि और राज्य में कहते हैं कि प्रधानमंत्री वोट चोरी करते हैं। फिर भी उनके ऊपर कोई मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता है।

गौरतलब है कि गोवा में चार महीने के बाद विधानसभा चुनाव होने वाले हैं उससे पहले राज्य के दौरे पर पहुंचे राहुल गांधी ने कहा, ‘मैं हर राज्य से कहता हूं पीएम वोट चोरी करते हैं। लेकिन मुझ पर कोई केस दर्ज नहीं होता। क्योंकि, ये जानते हैं कि अगर केस हुआ तो मामला लीगल हो जाएगा और ये फंस जाएंगे’। उन्होंने दावा करते हुए कहा, ‘दिल्ली में हम कुछ ही समय में पीएम, गृहमंत्री से निपट लेंगे। काम जारी है। सरकार की एक्सपायरी डेट आने वाली है’। राहुल ने आगे कहा, ‘आपने देखा है कि आजकल पीएम सामने खड़े नहीं हो सकते हैं। क्योंकि ये जानते हैं कि देश का युवा इनके खिलाफ खड़ा हो गया है’।

राहुल गांधी गोवा विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के जनसंपर्क अभियान ‘गोय राखोन यात्रा’ में शामिल होने पहुंचे थे। यहा यात्रा 28 दिन चली थी और इसमें राज्य की सभी 40 विधानसभा सीटों को कवर किया गया। राहुल का पिछले चार सालों में यह पहला गोवा दौरा है।

कांग्रेस की यात्रा के समापन कार्यक्रम में राहुल ने कहा, ‘पूरी दुनिया मानती थी कि इंडिया का एजुकेशन सिस्टम नंबर वन मॉडल का था। लेकिन, आज दिल्ली में स्टूडेंट्स को ही मारा जा रहा है। हर एजुकेशनल सिस्टम में इन्होंने बीजेपी और आरएसएस के लोग बैठे हुए हैं’। उन्होंने दावा किया कि राज्य में बहुत भ्रष्टाचार है और कांग्रेस जीतेगी तो इसे समाप्त करेगी। उन्होंने कहा, ‘हाईटेक करप्शन, जमीन का करप्शन ये यहां करते हैं। जैसे पहले गुजरात में नरेंद्र मोदी का मॉडल था। वैसे ही गोवा में करप्शन का मॉडल है। इसे सिर्फ कांग्रेस ही खत्म कर सकती है’।

राहुल गांधी ने दावा किया कि देश में सबसे ज्यादा बेरोजगारी गोवा में है। उन्होंने कहा, ‘पहले मास्टर प्लान था, मास्टर प्लान को रद्द कर दिया। इनका यही काम है कि पैसा कैसे बनाए। इनका यही काम है। गोवा की जनता को लूटने का, आपकी जमीन छीनकर अरबपतियों को देने का’। उन्होंने कहा कि गोवा देश में सबसे सुंदर जगह है, सबसे अच्छा कल्चर है। लेकिन यहां भी सरकार लोगों की जमीन छीनकर गोवा के जो बाहर के लोगों को करोड़ों में बेचती है।