राष्ट्रपति भवन के पास ‘आप’ ने निकाला ‘तिरंगा मार्च’

कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के शुक्रवार शाम को कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में प्रस्तावित ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च से पहले आम आदमी पार्टी (आप) ने राष्ट्रपति भवन के पास तिरंगा मार्च निकाला और कहा कि यह तय करना केंद्र सरकार का काम नहीं है कि जनता राष्ट्रीय ध्वज कहां फहराए।

‘आप’ की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने हाथों में तिरंगा लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस की मौजूदगी में नॉर्थ एवेन्यू में मार्च निकाला।

भारद्वाज ने ‘पीटीआई-वीडियो’ से कहा सरकार और पुलिस यह तय नहीं कर सकती कि नागरिक राष्ट्रीय ध्वज कहां फहराएं? यह उनका काम नहीं है। हमने यहां ध्वज फहराया। हम शाम को कॉजपा के मार्च में भी शामिल होंगे… जहां भी तिरंगा फहरा सकते हैं, लोगों को वहां फहराना चाहिए।

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कॉजपा के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बृहस्पतिवार को लोगों से कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने की अपील की थी।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कथित चुनावी अनियमितताओं को लेकर प्रदर्शन करने के मुद्दे पर दिल्ली पुलिस के साथ गतिरोध के बीच उन्होंने यह अपील की थी।

हालांकि, नयी दिल्ली नगरपालिका परिषद (एनडीएमसी) ने ‘‘प्रशासनिक कारणों’’ से शुक्रवार और शनिवार को सेंट्रल पार्क आम लोगों के लिए बंद रखने की घोषणा की है। वहीं, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि वह किसी उपयुक्त स्थान पर चुनिंदा लोगों के समूह को राष्ट्रीय ध्वज फहराने और राष्ट्रगान गाने की अनुमति देने की व्यवस्था कर सकती है।

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बाजार का टेक्सचर अब पूरी तरह बदला, जब तक निफ्टी 10 और 20 DEMA के ऊपर है “गिरावट में खरीदारी” की रणनीति करेगी काम

Trading Plan : कल की तूफानी तेजी के बाद मार्केट में आज भी मोमेंटम देखने को मिल रहा है। निफ्टी 23100 के ऊपर कारोबार कर रहा है। स्मॉलकैप स्पेस में भी एक्शन वापस लौटा है। लेकिन बैंक निफ्टी और मिडकैप का अंडरपरफॉमेंस देखने को मिल रहा है। बाजार को IT, मेटल और ऑटो का सपोर्ट है। लेकिन FMCG और एनर्जी में सुस्ती है। मार्केट रेगुलेटर सेबी ने क्लोजिंग ऑक्शन सेशन में बड़े बदलाव किए हैं। एक्सपायरी के दिन CAS के बजाए पुराने VWAP सिस्टम से सेटलमेंट होगा। CAS की टाइमिंग भी बदली गई है। ये फैसले 7 दिसंबर से लागू होंगे। हालांकि कैपिटल मार्केट थीम में CAS पर बड़े बदलाव के बाद सेल ऑन न्यूज का रुझान देखने को मिल रहा है।

बाजार में तेजी की कमान IT के हाथ में नजर आ रही है। 4 दिनों में IT इंडेक्स करीब 10 फीसदी चला है। टेक महिंद्रा और विप्रो की जोरदार जुगलबंदी देखने को मिल रही है। अच्छे नतीजों के बाद दोनों शेयर 7 फीसदी तक भागे हैं। इधर दिग्गज इंफोसिस और TCS में भी अच्छी खरीदारी आई है। वहीं बड़े गैप-डाउन के बाद परिस्टेंट में रिकवरी की कोशिश हो रही है।

त्योहार और छुट्टियों के दौरान एयरफेयर बढ़ाने के मामले में जल्द नए नियम जारी किए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने कहा है कि अगले दो हफ्ते के अंदर नए रूल्स जारी किए जाएं। इस खबर के बाद इंडिगो का शेयर दबाव के साथ ट्रेड कर रहा है।

जानें अब कैसी रह सकती है बाजार की चाल

मार्केट ट्रेंड पर बात करते हुए सीएनबीसी-आवाज़ के मैनेजिंग एडिटर अनुज सिंघल ने कहा कि निफ्टी ट्रेडर्स के लिए एक और शानदार दिन देखने को मिला है। निफ्टी बिल्कुल पहले सपोर्ट लेवल से घूमा है। गिरावट में खरीदारी की रणनीति कारगर रही। एक बार फिर निफ्टी IT ने कमान संभाली है। मल्टी डे निफ्टी IT की हमारी कॉल सटीक पड़ी है। बैंक निफ्टी और मिडकैप आज थोड़े ढीले दिख रहे हैं। हालांकि स्मॉल कैप में एक्शन लौटा है। विप्रो और टेक महिंद्रा आज के हीरो बने हैं। दोनों सुबह आज के दांव में टॉप पिक्स थे। इसके अलावा टाटा एलेक्सी और KPIT TECH पर भी पैसा बना है। कैपिटल मार्केट शेयरों में मुनाफावसूली दिखी है। इंटरग्लोब में गिरावट है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि त्योहारों में फेयर रेगुलेशन का प्रस्ताव है।

बाजार:अब क्या?

अनुज सिंघल की राय है कि बाजार का टेक्सचर अब पूरी तरह बदल चुका है। जब तक निफ्टी 10 और 20 DEMA के ऊपर है “गिरावट में खरीदारी” की रणनीति काम करेगी। अगर ये लेवल टूटते हैं तो शॉर्ट के बारे में सोचें। IT में लॉन्ग रहें और गिरावट पर खरीदारी करें। अर्निंग सीजन की शुरुआत तो बढ़िया हुई है। अगर ऐसे ही नंबर आते रहे तो बाजार के लिए राहत की बात होगी। बस रिस्क है कच्चे तेल और FIIs की बिकवाली का।

निफ्टी-बैंक निफ्टी पर रणनीति

निफ्टी के लिए 23,050-23,100 पर सपोर्ट और 23,200-23,250 पर रेजिस्टेंस है। वहीं, बैंक निफ्टी के लिए 55,500-55,700 पर सपोर्ट और 56,000-56,200 पर रेजिस्टेंस है।

 

 

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सरकारी कर्मचारियों के लिए 30 दिन के एड-हॉक बोनस का ऐलान, जानिए कौन है एलिजिबल और खाते में आएंगे कितने रुपये

केंद्र सरकार ने अपने एलिजिबल एंप्लॉयीज के लिए 30 दिन के एड-हॉक बोनस के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह अकाउंटिंग ईयर 2025-26 के लिए होगा। यह जानकारी 15 अक्टूबर को डिपार्टमेंट ऑफ एक्सपेंडिचर की तरफ से जारी ऑफिस मेमोरंडम पर आधारित है।

इस बोनस के दायरे में ग्रुप सी और नॉन-गजेटेड ग्रुप बी के एंप्लॉयीज आएंगे जो किसी प्रोडक्टिविटी-लिंक्ड बोनस स्कीम के तहत नहीं आते हैं। सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज और आर्म्ड फोर्सेज के एलिजिबिल एंप्लॉयीज भी इस बोनस के हकदार होंगे। इनके अलावा केंद्र शासित प्रदेशों के ऐसे एंप्लॉयीज भी इस बोनस के हकदार होंगे जो केंद्र सरकार के पे स्ट्रक्चर को फॉलो करते हैं।

बोनस के कैलकुलेशन के लिए 7,000 रुपये के मथली एमॉलुमेंट्स की सीमा तय की गई है। अगर किसी एंप्लॉयी का एवरेज मंथली एमॉलुमेंट्स इस सीमा से ज्यादा है तो बोनस के कैलकुलेशन के लिए 7000 रुपये का इस्तेमाल बेस के रूप में होगा। पहले से तय फॉर्मूला के आधार पर 30 दिन का बोनस करीब 6,908 रुपये बनेगा।

अगर किसी एंप्लॉयी का एवरेज मंथली एमॉलुमेंट्स लिमिट से नीचे है या एंप्लॉयी साल के सिर्फ कुछ हिस्से के लिए बोनस का हकदार है तो बोनस का एक्चुअल अमाउंट कम हो सकता है। यह ध्यान में रखना जरूरी है कि बोनस के दायरे में आने के लिए एंप्लॉयी का 31 मार्च, 2026 को नौकरी में होना जरूरी है और 2025-26 में उसकी कंटिन्यूअस सर्विस कम से कम 6 महीने पूरी होनी चाहिए।

ऐसे एंप्लॉयीज जिन्होंने छह महीने और पूरे साल के बीच नौकरी की है, उन्हें प्रो-राटा बेसिस (काम की अवधि के अनुपात में) बोनस मिलेगा। एलिबिजिल सर्विस पीरियड का कैलकुलेशन महीनों में होगा। मेमोरंडम में कैजु्अल लेबरर्स के लिए अलग एलिजिबिलिटी शर्तों के बारे में बताया गया है।

कैजुअल लेबरर्स के मामले में अगर व्यक्ति ऐसे ऑफिस में काम करता है, जिसमें हफ्ते में छह दिन काम का नियम है तो उसे पहले के तीन सालों में से प्रत्येक में काम के कम से कम 240 दिन पूरा होना जरूरी है। जिन ऑफिसेज में हफ्ते में काम के 5 दिन लागू हैं उनमें पहले के तीन सालों में से प्रत्येक में काम के 206 दिन पूरे होने चाहिए।

बोनस के कैलकुलेशन के लिए एक फॉर्मूला का इस्तेमाल होगा। फॉर्मूला के तहत एवरेज मंथली एमॉलुमेंट्स में 30 से गुणा करने के बाद उसमें 30.4 से भाग दिया जाएगा। इसे एक उदाहरण की मदद से समझ सकते हैं। अगर किसी एंप्लॉयी का एवरेज मंथली एमॉलुमेंट्स 7000 रुपये है तो इसमें 30 से गुना करना होगा। फिर जो नंबर आएगा, उसे 30.4 से डिवाइड करना होगा।

₹7,000 × 30 ÷ 30.4 = ₹6,907.89, राउंड फीगर में ₹6,908.

ऐसे एंप्लॉयीज जिन्होंने एलिजिबिल सर्विस से 12 महीने से कम पूरी की है, उन्हें उसी अनुपात में बोनस मिलेगा। बोनस का पैसा संबंधित मंत्रालयों के सैंक्शंड बजट प्रोविजन से खर्च होगा।

सचाई झुठलाने की सरकारी कोशिश

क्या दिल्ली में 10 अक्टूबर को मेट्रो की सेवा नहीं बंद थी? क्या मेडिकल में दाखिले के लिए होने वाली नीट की परीक्षा के पेपर लीक नहीं हुए थे? क्या नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जिन परीक्षाओं का आयोजन कराती है उनमें से पिछले नौ साल में किसी परीक्षा के पेपर लीक नहीं हुए हैं? राजधानी दिल्ली में या दूसरे भी किसी शहर में किसी भी नागरिक से ये सवाल पूछेंगे तो उसका जवाब यही होगा कि मेट्रो बंद थी और पेपर लीक हुए हैं। दिल्ली और एनसीआर में रहने वाला हर व्यक्ति निजी अनुभव से जानता है कि मेट्रो की सेवा बंद थी। जहां तक इंटरनेट सेवा की बात है तो उस पर तो एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट गुरुवार, 15 अक्टूबर को ही छपी है, जिसके मुताबिक पूरी दुनिया में इंटरनेट बंद होने के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है। पहले स्थान पर सैनिक तानाशाही वाला देश म्यांमार है। सो, मेट्रो बंद थी और इंटरनेट भी बंद थे।

परंतु दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर कहा है कि मेट्रो सेवा बंद नहीं थी। उसने कहा है कि सिर्फ 45 मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद किया गया था। यानी मेट्रो की सेवा सीमित की गई थी। सोचें, कितना आसान है सरकार के लिए यह कह देना! 45 मेट्रो स्टेशनों पर लोग अंदर नहीं जा सकते थे और न बाहर निकल सकते थे। फिर यह सेवा सीमित करना कैसे हुआ? जिन लोगों को इन 45 मेट्रो स्टेशनों पर ट्रेन पकड़नी थी या इन स्टेशनों पर उतरना था उनके लिए तो मेट्रो बंद ही हुई न! सो, लाखों लोगों के लिए मेट्रो की सेवा बंद थी। सरकार एक तकनीकी टर्म का इस्तेमाल करके अदालत को बता रही है कि उसने अदालत की अवमानना नहीं की है। वास्तव में 10 और 11 अक्टूबर को कई इलाकों में मेट्रो बंद थी और ऐसा नहीं था कि मेट्रो ने स्टेशनों पर एंट्री और एग्जिट बंद की तो यात्रियों के लिए कोई और बंदोबस्त किया। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचाने के लिए कोई फीडर बस सेवा नहीं चलाई गई थी। इसलिए यह कहना सरासर गलत है कि मेट्रो सेवा बंद नहीं थी। यह हलफनामा देकर झूठ बोलना है।

ऐसे ही एक रिपोर्ट आई है कि नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए ने शिक्षा मामलों की संसदीय समिति के सामने कहा है कि 2017 में एनटीए के गठन के बाद से आज तक कोई पेपर लीक नहीं हुआ है। यह झूठ नहीं, बल्कि सफेद झूठ है। कांग्रेस सांसद मुकुल वासनिक की अध्यक्षता वाली कमेटी के सामने एनटीए ने कहा कि कुछ अनियमितता का शिकायत हुई है लेकिन पेपर लीक नहीं हुआ है। सवाल है कि तीन मई 2026 को हुई नीट की परीक्षा को क्यों रद्द किया गया? सात मई को पेपर लीक होने की खबर आई और 12 मई को एनटीए ने परीक्षा रद्द दी, जिसका आयोजन 21 जून को किया गया। एनटीए और शिक्षा मंत्रालय दोनों की ओर से कई बार कहा गया कि पेपर लीक होने के कारण परीक्षा रद्द हुई है। इस बार तो किसी और धांधली या अनियमितता की खबर भी नहीं थी। इसी तरह 2024 के नीट की परीक्षा पेपर लीक और धांधली दोनों कारणों से प्रभावित हुई थी और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कई जगह परीक्षा रद्द की गई। उसके बाद पेपर लीक रोकने का एक कानून बना। जिस रिपोर्ट के आधार पर केंद्र सरकार ने कानून बनाया उसमें अनियमितता को ‘पेपर लीक केस’ के तौर पर दर्ज किया गया। सोचें, नीट परीक्षा को लेकर 356 केस दर्ज हैं, जेईई मेन्स के 31, यूजीसी नेट के 26 और सीयूईटी यूजी के 14 केस दर्ज हैं। पर एनटीए कह रहा है कि सब कुछ ठीक है!

दिल्ली में ट्रेड फेयर अब 13 से ही शुरू होगा

दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले का आयोजन 1980 से हो रहा है। दिल्ली के प्रगति मैदान में हर साल 14 नवंबर को मेला शुरू होता है और 27 नवंबर तक चलता है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों के लिए यह सालाना आयोजन एक बड़े आकर्षण वाला आयोजन होता है। युवा बड़ी संख्या में इसमें जाते हैं। पिछले कुछ समय से यह एक बड़े व्यापारिक आयोजन में बदल गया है। देश भर के व्यापारी अपने उत्पादों के प्रचार के लिए इस मेले में पहुंचते हैं। राज्यों के पैवेलियन अलग होते हैं, जहां राज्यों की संस्कृति, धर्म, कला, व्यापार आदि की जानकारी दी जाती है।

इस साल भी मेले का आय़ोजन होगा लेकिन इस साल यह मेला 13 नवंबर से ही शुरू होगा। आयोजन शुरू होने के 46 साल के बाद और केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के 12 साल बाद तारीख बदली गई है। ध्यान रहे 14 नवंबर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है। हालांकि इस बात का बहुत प्रचार नहीं किया जाता है कि नेहरू के जन्मदिन के मौके पर व्यापार मेला शुरू होता है। फिर भी इसकी तारीख बदल दी गई। नेहरू मेमोरियल एंड म्यूजियम सहित कई चीजों के नाम पहले बदले जा चुके हैं। केंद्र सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन की तीन योजनाओं से इंदिरा गांधी का नाम हटाया है।

राहुल के मार्च से सुप्रीम कोर्ट नाराज

नई दिल्ली। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करके अदालत को नाराज कर दिया है। अदालत ने राहुल सहित सभी नेताओं को नोटिस जारी किया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी भी की है। विपक्ष के नेताओं की ओर से 12 अक्टूबर को दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए गुरुवार को चीफ जस्टिस ने कहा कि कोई भी कोर्ट को डरा धमकाकर दबाव में नहीं ला सकता। ऐसी कोशिशें बेकार हैं। इन पर कोई ध्यान नहीं देता।

चीफ जस्टिस इतने पर नहीं रूके। उन्होंने आगे कहा, ‘हमें पता कि कोर्ट के बाहर क्या कहा जा रहा है और कोर्ट के अंदर क्या कहा जा रहा है। हम किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं जी रहे हैं। हमें हर बात की जानकारी है’। चीफ जस्टिस ने किसी नेता का नाम नहीं लिया लेकिन जब उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण पर सवाल करेंगे और उसे सफाई देनी होगी तो उनका इशारा राहुल गांधी की ओर ही था।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर को अदालत परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है। वहीं, SIR प्रक्रिया और चुनाव आयोग के फैसलों के खिलाफ इन नेताओं की याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा। 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट परिसर में विपक्षी नेताओं और उनके समर्थकों के जुटने से जुड़े मामले में राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य 14 नेताओं को नोटिस जारी किया है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले विपक्ष के प्रति सद्भाव दिखाया था। जब विपक्ष की ओर से उनसे मिलने का समय मांगा गया तो उन्होंने कई कारण बताते हुए मिलने से इनकार कर दिया था। लेकिन यह कहा था कि अगर विपक्षी नेता याचिका दायर करते हैं तो उस पर जल्दी सुनवाई की जाएगी। लेकिन उस समय उनको आइडिया नहीं था कि उनके इनकार के बाद विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करेंगे और खुद परिसर में आकर याचिका दायर करेंगे। उनके इनकार के बाद विपक्षी नेता कनॉट प्लेस से मार्च करते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे और वहां याचिका दायर की थी। हालांकि याचिका में कई कमियां थीं, जिन्हें बाद में दुरुस्त किया गया और उस पर गुरुवार को सुनवाई हुई।

Yes Bank News: यस बैंक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तोड़ी चुप्पी, शेयर 14% क्रैश होने के बाद कही ये बात

Yes Bank News: प्राइवेट सेक्टर के यस बैंक के शेयरों में गुरुवार, 15 अक्टूबर को भारी गिरावट आई। कारोबार के दौरान स्टॉक करीब 14% तक टूट गया। मामला 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन बॉन्ड को राइट ऑफ करने का फैसला रद्द कर दिया है। इसके बाद बैंक ने कहा कि वह कोर्ट के फैसले और उसके असर की जांच कर रहा है।

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) ने भी शेयर में गिरावट को लेकर बैंक से जवाब मांगा था। इसके बाद यस बैंक ने कहा कि वह फैसले की पूरी कॉपी हासिल कर रहा है। उसे पढ़ने और उसके असर को समझने के बाद बैंक जरूरत के मुताबिक आगे जानकारी देगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर को यस बैंक के 8,415 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड राइट ऑफ करने के फैसले को खारिज कर दिया। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 2023 के फैसले को बरकरार रखा। यस बैंक और दूसरे पक्षों की अपील भी खारिज कर दी गई।

कोर्ट के मुताबिक, बैंक के पुनर्गठन की अंतिम योजना में इन बॉन्ड को राइट ऑफ करने का साफ प्रावधान नहीं था। इसलिए बैंक के एडमिनिस्ट्रेशन को ऐसा करने का अधिकार नहीं था।

AT-1 बॉन्ड क्या होते हैं?

AT-1 बॉन्ड बैंकों के लिए पूंजी जुटाने का एक तरीका हैं। बैंक इनसे निवेशकों से पैसा जुटाते हैं और बदले में ब्याज देते हैं। लेकिन इनमें जोखिम भी ज्यादा होता है। बैंक की वित्तीय हालत बहुत खराब होने पर नियमों और शर्तों के तहत इन बॉन्ड की रकम घटाई या पूरी तरह खत्म की जा सकती है।

यस बैंक ने दिसंबर 2016 में 3,000 करोड़ रुपये के AT-1 बॉन्ड जारी किए थे। इसके बाद अक्टूबर 2017 में 5,415 करोड़ रुपये के और बॉन्ड जारी किए गए। इस तरह कुल रकम 8,415 करोड़ रुपये थी।

2020 में क्या हुआ था?

मार्च 2020 में यस बैंक गंभीर वित्तीय संकट में फंस गया था। उस समय केंद्र सरकार ने बैंक पर करीब एक महीने के लिए मोरेटोरियम लगाया था। यानी बैंक से पैसे निकालने पर कुछ समय के लिए पाबंदियां लगाई गई थीं। इसके बाद बैंक के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई।

इसी दौरान नियुक्त एडमिनिस्ट्रेशन ने AT-1 बॉन्ड को राइट ऑफ कर दिया। इसका मतलब था कि बॉन्डधारकों की निवेश रकम खत्म कर दी गई। बॉन्डधारकों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी।

बॉन्डधारक कोर्ट क्यों पहुंचे?

मई 2020 में Axis Trustee Services ने बॉन्डधारकों की ओर से बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की। इसमें बॉन्ड राइट ऑफ करने के फैसले को चुनौती दी गई। वहां बॉन्डधारकों के पक्ष में फैसला आया। मार्च 2023 में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यस बैंक इसके कानूनी और वित्तीय असर की समीक्षा कर रहा है। बैंक ने कहा है कि फैसले के अलावा उसके पास ऐसी कोई दूसरी जानकारी नहीं है, जिसका खुलासा करना जरूरी हो।

यस बैंक का स्टॉक 14% क्रैश

यस बैंक का शेयर 14.53% गिरकर 18.12 रुपये पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान यह 20% के लोअर सर्किट के साथ 16.96 रुपये तक फिसला था। हालांकि, बाद में थोड़ी रिकवरी हुई।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

सत्ता बदलती है, पर व्यवस्था वही रहती है!

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन को देखे। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?वह अभी भी वादा है। … आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम।

श्रीलंका में 2022 का आर्थिक संकट केवल महंगाई या विदेशी मुद्रा की कमी का संकट नहीं था। वह उस शासन व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे के टूटने का क्षण था। महंगाई लगभग सत्तर प्रतिशत तक पहुंच गई थी। श्रीलंकाई मुद्रा का मूल्य करीब आधा रह गया था। आम आदमी के लिए ईंधन, भोजन और रोजमर्रा की जरूरतें जुटाना कठिन हो गया था।

इसी संकट से अरगलया आंदोलन पैदा हुआ। सिंहली भाषा में अरगलया का अर्थ है संघर्ष। मगर आंदोलन केवल राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे को हटाने के लिए नहीं था। उसका नारा था, व्यवस्था बदलो। पुराने चेहरों और पुरानी राजनीति से मुक्ति पाओ। सड़क पर जनता उतरी। राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। गोटबाया राजपक्षे देश छोड़कर भागे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

आंदोलन जीत गया। मगर उसके बाद क्या हुआ?

राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार उसी पुरानी संसद के पास था जिसके राजनीतिक ढांचे के खिलाफ जनता उठी थी। संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुन लिया। वे श्रीलंका की उसी पुरानी राजनीति के अनुभवी नेता थे जिसे आंदोलनकारियों ने अस्वीकार किया था। जनता ने राष्ट्रपति को हटाया था। मगर नए राष्ट्रपति का चुनाव पुरानी व्यवस्था ने किया।

यही जनक्रांति का पहला विरोधाभास है। सड़क सत्ता को खाली करा सकती है। मगर खाली हुई सत्ता पर अधिकार किसका होगा, यह उस समय मौजूद संगठित राजनीतिक शक्तियां तय करती हैं।

श्रीलंका में आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को चुनावी रास्ता मिलने में दो वर्ष लग गए। सितंबर 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। वे नेशनल पीपुल्स पावर के नेता थे। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे। पांच वर्ष बाद वे लगभग 42 प्रतिशत वोट लेकर राष्ट्रपति बने। उसके बाद उनकी पार्टी को संसद में दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत मिला।

तब जाकर आंदोलन की व्यवस्था परिवर्तन की मांग को एक राजनीतिक माध्यम मिला।

मगर यहां भी विरोधाभास समाप्त नहीं हुआ। जिस आर्थिक व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शर्तों के खिलाफ जनता में असंतोष था, नई सरकार ने उसी आईएमएफ कार्यक्रम को जारी रखा।

तो आंदोलन ने क्या बदला?

उसने पहले दौर में राष्ट्रपति को हटाया। दूसरे दौर में, दो वर्ष बाद, मतदाताओं ने सत्ता के नए दावेदार को चुना। मगर आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों की निरंतरता बनी रही। इसका अर्थ यह नहीं कि आंदोलन व्यर्थ था। बल्कि यह कि सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन की गति अलग-अलग होती है।

जनता एक दिन में राष्ट्रपति को हटा सकती है। मगर राज्य की आर्थिक निर्भरताओं, प्रशासनिक संस्थाओं और शासन की आदतों को एक दिन में नहीं बदल सकती।

अब बांग्लादेश को देखिए।

अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना की सत्ता समाप्त कर दी। वर्षों से जमा असंतोष, राजनीतिक दमन और चुनावी विश्वसनीयता के संकट के बीच छात्रों का आंदोलन देशव्यापी विद्रोह बन गया।

हसीना चली गईं। मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फिर संवैधानिक सुधारों का एक दस्तावेज तैयार हुआ जिसे जुलाई चार्टर कहा गया। इसमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा, दो सदनों वाली संसद और आनुपातिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण सुधार शामिल थे।

यानी बांग्लादेश में आंदोलन केवल प्रधानमंत्री को हटाकर नहीं रुका। उसने नई राजनीतिक व्यवस्था का खाका भी तैयार किया। फरवरी 2026 में चुनाव हुए। कार्नेगी के विश्लेषक अविनाश पालीवाल ने इन्हें लगभग दो दशकों में बांग्लादेश का पहला विश्वसनीय चुनाव बताया।

परिणाम में तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, यानी बीएनपी, ने संसद की 300 में से 209 सीटें जीतीं। जमात-ए-इस्लामी को 68 सीटें मिलीं। जबकि छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी को केवल छह सीटें मिलीं।

जरा इस परिणाम का अर्थ समझिए।

जिन छात्रों ने आंदोलन खड़ा किया, जिनके संघर्ष से पुरानी सत्ता गिरी, जिनकी नैतिक शक्ति पर राजनीतिक परिवर्तन संभव हुआ, चुनाव में उन्हें केवल छह सीटें मिलीं। आंदोलन की नैतिक विजय और चुनावी राजनीति की शक्ति एक जैसी नहीं होती। जनता किसी आंदोलन का समर्थन कर सकती है, मगर चुनाव में किसी दूसरी पार्टी को सत्ता सौंप सकती है।

बांग्लादेश में यही हुआ।

फिर भी छात्रों के आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव के दिन ही मतदाताओं ने जुलाई चार्टर को भी लगभग दो-तिहाई समर्थन से मंजूरी दी। इसका अर्थ था कि मतदाता नई सरकार चाहते थे, मगर संवैधानिक सुधार भी चाहते थे।

अब असली परीक्षा शुरू हुई।

अविनाश पालीवाल के अनुसार बीएनपी ने चुनाव से पहले ही जुलाई चार्टर के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई थी। विशेषकर ऊपरी सदन की संरचना और कार्यवाहक सरकार के प्रमुख के चयन की प्रक्रिया पर। सत्ता में आने के बाद उसने सर्वोच्च न्यायालय के लिए अलग सचिवालय बनाने का प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में डाल दिया, जबकि पहले उसका समर्थन किया था।

यानी जनता ने जिस सुधार दस्तावेज को मंजूरी दी, उसे लागू करने वाली सरकार के अपने राजनीतिक हित थे। वह कुछ प्रावधानों को बदलना या कमजोर करना चाहती थी।

बांग्लादेश आज उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहां भारत का सूचना अधिकार आंदोलन 2004 में पहुंचा था। मसौदा तैयार है। जनसमर्थन मौजूद है। राजनीतिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मगर कानून को अंतिम रूप देने और लागू करने का अधिकार उन लोगों के पास है जिनके लिए उसके कुछ प्रावधान असुविधाजनक हो सकते हैं।

आंदोलन के सामने अब प्रश्न है कि वह इस प्रक्रिया पर कितना दबाव बनाए रख सकता है। क्योंकि संविधान में सुधार लिख देना और सत्ता को उन सुधारों के अनुसार चलने के लिए बाध्य करना दो अलग काम हैं।

बांग्लादेश के छात्रों ने प्रधानमंत्री को हटा दिया। मगर वे उस पुरानी राजनीति को समाप्त नहीं कर सके जिसने चुनाव जीतकर फिर सत्ता संभाल ली। सड़क पर जनविद्रोह का नेतृत्व करने वाले चुनाव में सत्ता के स्वाभाविक उत्तराधिकारी नहीं बन जाते।

तीसरा उदाहरण नेपाल का है।

सितंबर 2025 में नेपाल सरकार ने 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया। इसके विरोध में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक राजनीतिक विद्रोह में बदल गया। रॉयटर्स के अनुसार दो दिनों की हिंसा में 76 लोग मारे गए। पहले ही दिन पुलिस की गोलीबारी में कम से कम 19 प्रदर्शनकारियों की मौत हुई। 9 सितंबर को प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

सरकार गिर गई।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। संसद भंग हुई और 5 मार्च 2026 को चुनाव हुए। इन चुनावों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को अधिकांश सीटें मिलीं। 27 मार्च को बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बने। नेपाल ने तीनों पड़ोसी देशों में सबसे तेजी से सड़क के आंदोलन को राष्ट्रीय चुनाव में बदला।

श्रीलंका में लगभग 26 महीने लगे। बांग्लादेश में करीब अठारह महीने। नेपाल में लगभग छह महीने। मगर जवाबदेही की गति यहां भी धीमी रही। 28 मार्च को पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री ओली और उनके गृह मंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई उस जांच आयोग की सिफारिश पर हुई जिसने पहले दिन प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी रोकने में विफल रहने के लिए ओली को जिम्मेदार माना था।

8 सितंबर को अल जजीरा की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के खिलाफ जांच जारी थी और औपचारिक आरोप तय नहीं हुए थे। हालांकि दूसरी रिपोर्टों में आपराधिक लापरवाही के आरोपों का उल्लेख था। यानी सरकार गिर गई। चुनाव हो गए। नया प्रधानमंत्री आ गया। मगर जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया, उनके लिए न्याय की प्रक्रिया अभी चल रही थी।

सत्ता परिवर्तन की घड़ी तेज चलती है। न्याय की घड़ी धीमी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल के इन तीन अनुभवों में कुछ समानताएं हैं। मगर इनके कारण और परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

पहली समानता यह कि सत्ता का खाली स्थान अधिक देर खाली नहीं रहता। उसे वही राजनीतिक शक्ति भरती है जो पहले से संगठित है या जल्दी संगठन खड़ा कर सकती है।

श्रीलंका में पुरानी राजनीतिक परंपरा वाली पार्टी ने आंदोलन की मांग को चुनावी रास्ता दिया। बांग्लादेश में स्थापित बीएनपी ने सत्ता हासिल की। नेपाल में अपेक्षाकृत नई पार्टी चुनाव जीतकर सरकार में आई। तीनों में सड़क का आंदोलन स्वयं सरकार नहीं बना।

आंदोलन की स्थायी शक्ति इस बात में थी कि वह सत्ता में आने वालों को चुनने और उनसे जवाब मांगने की नागरिक क्षमता पैदा कर सके। दूसरी समानता यह कि किसी दस्तावेज को जनता की मंजूरी मिल जाना उसके लागू होने की गारंटी नहीं है।

बांग्लादेश में मतदाताओं ने संवैधानिक सुधारों का समर्थन किया। मगर उसके बाद संघर्ष कानून के प्रावधानों, उनके कमजोर किए जाने और लागू होने की प्रक्रिया में पहुंच गया।

भारत में सूचना अधिकार आंदोलन को भी यही लड़ाई लड़नी पड़ी थी। तीसरी समानता यह कि समझौता, न्याय और जवाबदेही की घड़ियां अलग-अलग चलती हैं।

सोशल मीडिया के सहारे लाखों लोग कुछ घंटों में जुट सकते हैं। सरकार को कुछ दिनों में गिराया जा सकता है। मगर समझौते के लिए ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो आंदोलन की ओर से निर्णय ले सकें। और न्याय के लिए संस्थाएं चाहिए जो अपने निर्णयों को लागू भी कर सकें।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे लंबा इंतजार अक्सर उन परिवारों को करना पड़ता है जिन्होंने आंदोलन में अपने लोगों को खोया होता है। मगर क्या इन तीनों देशों में सरकारें इसलिए गिरीं क्योंकि उनके राज्य कमजोर थे? और क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि भारतीय राज्य मजबूत है?

यह तुलना इतनी सरल नहीं है। इन घटनाओं को समझने के लिए चार बातों पर गौर करना होगा।

पहली है आर्थिक स्थिति। श्रीलंका में आर्थिक संकट असाधारण था। देश भुगतान संकट से जूझ रहा था। बांग्लादेश में भी विदेशी मुद्रा भंडार लगभग तीन महीने के आयात के बराबर रह गया था।

दूसरी है सुरक्षा बलों की भूमिका। बांग्लादेश में सेना ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से इनकार किया। नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में पहले ही दिन कम से कम 19 लोग मारे गए।

तीसरी है सरकार की वैधता पर जनता का भरोसा। बांग्लादेश में जनवरी 2024 के विवादास्पद चुनाव के बाद शासन की विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित हुई थी। नेपाल में घातक विरोध प्रदर्शनों के एक दिन के भीतर सरकार गिर गई।

चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात है प्रशासनिक मशीनरी की निरंतरता। यही वह पहलू है जिस पर तोकविल सबसे अधिक ध्यान देते। सरकारें गिर गईं। मगर उनके साथ प्रशासन समाप्त नहीं हुआ। बांग्लादेश के बारे में पालीवाल का निष्कर्ष है कि जिस क्रांति ने नई व्यवस्था स्थापित की, उसके बाद भी पुरानी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा बना रहा। यही राज्य की वास्तविक शक्ति है। राजनीतिक सत्ता बदल सकती है। मगर नौकरशाही, संस्थागत हित, प्रशासनिक नियम और शासन की परंपराएं बनी रह सकती हैं।

भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। मगर अंतर केवल इतना नहीं कि वहां कमजोर राज्य हैं और यहां मजबूत राज्य।

भारत में श्रीलंका जैसा दिवालियापन नहीं है। सुरक्षा बलों की निष्ठा डगमगाने का कोई संकेत नहीं है। न्यायालय, मंत्रालय और संघीय व्यवस्था काम कर रहे हैं। 10 अक्टूबर के आंदोलन की मांग भी इन देशों के आंदोलनों से छोटी है। यहां सरकार गिराने की मांग नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग है।

ऐसी परिस्थिति में सरकार के लिए किसी व्यक्ति का इस्तीफा स्वीकार करना, पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया बदलने की अपेक्षा कहीं आसान हो सकता है। यहीं भारत के लिए तोकविल की चेतावनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

यहां खतरा सरकार के गिर जाने का नहीं, बल्कि आंदोलन को व्यवस्था के भीतर समाहित कर लेने का है। सरकार किसी मांग को स्वीकार कर सकती है। समिति बना सकती है। इस्तीफा ले सकती है। नया कानून घोषित कर सकती है। आंदोलन समाप्त हो सकता है। मगर जिस प्रक्रिया के खिलाफ आंदोलन हुआ था, वह जस की तस बनी रह सकती है।

श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल बताते हैं कि सरकार गिर जाने के बाद क्या होता है।

भारत के अपने आंदोलन बताते हैं कि सरकार के बने रहने और आंदोलन की मांग स्वीकार कर लेने के बाद क्या होता है। और इसका सबसे ताजा उदाहरण स्वयं कॉकरोच जनता पार्टी का पिछला आंदोलन है। 25 जुलाई को जंतर मंतर पर पांच सप्ताह से अधिक चले आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया।

सीजेपी ने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की। संगठन ने कहा कि सरकार ने उसकी सभी मांगें स्वीकार कर ली हैं। इनमें प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेना, कुछ दिनों के भीतर इसकी लिखित गारंटी देना, नीट-यूजी प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना और परीक्षा सुधार के पांच सूत्री मांगपत्र पर विचार करना शामिल था।

सीजेपी ने कहा कि वह सद्भावना के आधार पर आंदोलन वापस ले रही है। उसे भरोसा है कि तय शर्तें तय समयसीमा में पूरी होंगी। मंत्री का इस्तीफा हो गया। समझौता हो गया। आंदोलन समाप्त हो गया।

मगर दो दिन बाद, 27 जुलाई को संगठन लिखित गारंटी का इंतजार कर रहा था। उसने सरकार को मंगलवार तक का समय दिया। 25 अगस्त को सीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धताएं पूरी नहीं की हैं। संगठन के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार से तीन बार एफआईआर की समेकित सूची मांग चुका था।

सीजेपी ने 5 सितंबर को फिर मार्च करने की घोषणा की। फिर 1 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने एफआईआर रद्द कर दीं। सरकार ने अदालत को बताया कि वह तीन महीने के भीतर पूरे देश के लिए मुआवजा नीति तैयार करेगी। इसके बाद सीजेपी ने अपना प्रस्तावित मार्च रद्द कर दिया।

जरा इस घटनाक्रम को देखिए। 25 जुलाई को समझौता हुआ। 1 सितंबर को एफआईआर रद्द करने का न्यायिक आदेश आया। बीच में 38 दिन लगे। लिखित गारंटी का इंतजार हुआ। फिर आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ी। सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार मामला उठा। तब जाकर सरकारी आश्वासन एक लागू होने वाले आदेश में बदला। मगर मुआवजा नीति?

वह अभी भी वादा है। दिसंबर की शुरुआत तक उसे तैयार करने की बात कही गई है। यानी आंदोलन की एक मांग पूरी हुई। दूसरी मांग के लिए नई समयसीमा मिल गई।

और यही पूरी कहानी का सार है।

सरकार के लिए घोषणा करना एक घटना है। नागरिक के लिए उस घोषणा का लागू होना एक लंबी प्रक्रिया। मंत्री के इस्तीफे की खबर तुरंत बनती है। कानून में सजा बढ़ाने की घोषणा सुर्खियां बनती है। अदालत का आदेश खबर बनता है।

मगर उसके बाद फाइल कहां पहुंची, किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस परिवार को कितना मुआवजा मिला और किस छात्र को कब राहत मिली, इसकी खबर कौन रखता है?

यह काम महीनों और अनेक दफ्तरों में बंट जाता है। सरकार को घोषणा करने का श्रेय मिल जाता है। मीडिया को एक बड़ी खबर मिल जाती है। जनता को लगता है कि मामला समाप्त हो गया। जबकि काम अधूरा रहता है।

इसके लिए जरूरी नहीं कि हर अधिकारी की नीयत खराब हो। समस्या व्यवस्था की बनावट में भी है। एक सार्वजनिक घोषणा कहानी को समाप्त कर सकती है, जबकि उसका वास्तविक काम अभी शुरू भी नहीं हुआ होता। फिर जब महीनों बाद वादा पूरा नहीं होता तो उसे पुराने समझौते की अधूरी जिम्मेदारी के बजाय एक नया विवाद मान लिया जाता है।

इस तरह सत्ता की जवाबदेही लगातार टुकड़ों में बंटती रहती है। सीजेपी ने समयसीमाएं तय करके, सरकार के वादों की निगरानी करके और सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस सिलसिले को टूटने नहीं दिया।

मगर यह भी समझना होगा कि हर प्रदर्शनकारी ऐसा नहीं कर सकता। जिस नौजवान की परीक्षा सिर पर है, वह कितने महीने धरने पर बैठेगा? जिस मजदूर को रोज कमाना है, वह कितने दिन अदालत और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएगा?

आंदोलन चलाना एक काम है। आंदोलन की जीत को लागू करवाना उससे भी लंबा काम। और नागरिक के लिए सबसे महंगी चीज वही है जो सरकार के पास सबसे अधिक है। (जारी)

IDBI Bank में स्टेक सेल से विनिवेश के टारगेट से ज्यादा पैसे आएंगे

केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 88,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। इससे FY19 के बाद पहली बार यह पैसा बजट में तय लक्ष्य से ज्यादा होगा। आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। इसमें आईडीबीआई के निजीकरण को बड़ा हाथ होगा।

बजट में 80000 करोड़ जुटाने का टारगेट 

सरकार ने बजट में FY27 में विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का टारगेट तय किया है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि आईडीबीआई बैंक की स्ट्रेटेजिक स्ट्रक्चरिंग से केंद्र सरकार को करीब 26,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। यूनियन कैबिनेट ने बुधवार को आईडीबीआई बैंक की स्ट्रेटेजिक रीस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी दे दी।

सरकार आईडीबीआई बैंक में बेच रही हिस्सेदारी

सरकार और एलआईसी दोनों आईडीबीआई बैंक में कंबाइंड 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं। फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सब्सिडियरी कनाडा इंक यह हिस्सेदारी खरीदेगी। इस डील और शेयर पर्चेज एग्रीमेंट के इस साल दिसंबर तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) के मुताबिक, सरकार आईडीबीआई बैंक में अपनी 30.48 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि LIC अपनी 30.24 हिस्सेदारी बेचेगी।

सरकार पहले ही जुटा चुकी है 62,124 करोड़ रुपये

इस डील के बाद भी IDBI Bank में सरकार और LIC की कंबाइंड 34 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी। इस साल 10 सितंबर तक सरकार ने विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 62,124 करोड़ रुपये जुटा लिए थे। यह इस वित्त वर्ष के लिए तय बजट टारगेट से सिर्फ 17,876 करोड़ रुपये कम था। आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी की बिक्री से यह टारगेट पूरा हो जाएगा।

FY19 के बाद पहली बार टारगेट से ज्यादा पैसे आएंगे

सरकार वित्त वर्ष 2018-19 के बाद पहली बार विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से बजट में तय लक्ष्य से ज्यादा पैसे जुटाएगी। पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 45,306 करोड़ रुपये जुटाए थे, जो 47,000 करोड़ रुपये के तय लक्ष्य का करीब 96 फीसदी था। इसमें से 16,886 करोड़ रुपये विनिवेश से आए थे, जबकि 28,420 करोड़ रुपये एसेट मॉनेटाइजेशन से आए थे।

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जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से बढ़ा विनिवेश पर फोकस

जियोपॉलिटिकल टेंशन बढ़ने की वजह से विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन पर सरकार का फोकस बढ़ा है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका और ईरान की लड़ाई के बाद की स्थितियों ने सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ाया है। क्रूड की कीमतें इस लड़ाई की वजह से काफी बढ़ी हैं। पिछले कुछ हफ्तों से तो ब्रेंट क्रूड लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। इससे सरकार का इंपोर्ट बिल लगातार बढ़ रहा है।

कैबिनेट ने सामाजिक सहायता योजना के लिए 53428 करोड़ रुपये किए मंजूर , विकलांग पेंशन में भी हुई बढ़ोतरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को ‘राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम’ (NSAP) को 2026-27 से 2030-31 तक, यानी पांच साल के लिए जारी रखने की मंजूरी दे दी है। इसके लिए कुल 53,428 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। ग्रामीण विकास विभाग की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव में कार्यक्रम और उसके जुड़ी योजनाओं का नाम बदलना,विकलांग पेंशन के नियमों में बदलाव करना और वृद्धावस्था पेंशन,विधवा पेंशन तथा पारिवारिक लाभ योजनाओं को उनके मौजूदा स्वरूप में जारी रखना शामिल है।

इसकी जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “दुनिया के सबसे व्यापक सोशल सिक्योरिटी नेट में से एक का विस्तार किया गया है और इसे 2031 तक बढ़ा दिया गया है। इस विस्तारित सोशल सिक्योरिटी नेट के लिए कुल 53,428 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा, “विकलांग लोगों के लिए, विकलांगता पेंशन पाने की पिछली पात्रता सीमा 80 प्रतिशत विकलांगता थी। अब इस सीमा को घटाकर आधा यानी 40 प्रतिशत कर दिया गया है, जिसका मतलब है कि 40 प्रतिशत विकलांगता वाले लोग भी विकलांग पेंशन पाने के पात्र होंगे।”

विकलांगता पेंशन में बदलाव

सबसे अहम बदलाव विकलांगता पेंशन के नियमों में हुए हैं। इसके तहत 0 से 79 साल की उम्र के लाभार्थियों को हर महीने 375 रुपये और 80 साल या उससे ज़्यादा उम्र के लोगों को 625 रुपये की मदद मिलेगी।

विकलांगता के लिए पात्रता की सीमा (बेंचमार्क) को मौजूदा 80 प्रतिशत से घटाकर 40 प्रतिशत कर दिया जाएगा। न्यूनतम उम्र की शर्त भी हटा दी जाएगी, जिससे विकलांग लोग जन्म से ही इसके लिए पात्र हो सकेंगे।

वृद्धावस्था पेंशन,विधवा पेंशन और फेमिली बेनिफिट योजनाएं बिना किसी बदलाव के जारी रहेंगी।

कैबिनेट ने कहा कि सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 3.20 करोड़ लाभार्थियों को इसमें शामिल किया जाएगा। विकलांगता पेंशन योजना के तहत संशोधित पात्रता शर्तों, लाभार्थियों की संख्या और सहायता की दर के बारे में विस्तार से बताने वाली गाइडलाइंस तीन महीने के भीतर जारी और लागू की जाएंगी।

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इन योजनाओं के बदलेंगे नाम

नाम बदलने की कवायद के तहत,NSAP अब प्रधानमंत्री सामाजिक सहायता योजना बन जाएगी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री वृद्धावस्था पेंशन योजना कर दिया जाएगा, जबकि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना प्रधानमंत्री विधवा पेंशन योजना बन जाएगी। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विकलांग पेंशन योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री दिव्यांगजन पेंशन योजना कर दिया जाएगा और राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना का नाम प्रधानमंत्री परिवार लाभ योजना हो जाएगा।

बता दें कि NSAP को 15 अगस्त 1995 को गरीब परिवारों को मदद देने के लिए शुरू किया गया था। यह संविधान के अनुच्छेद 41 (जो राज्य की नीति के निर्देशक सिद्धांतों में से एक है) के तहत केंद्र की ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिए किया गया था। इस प्रोग्राम के लिए पूरा पैसा केंद्र सरकार देती है, ताकि पूरे देश में एक जैसी मदद मिल सके।

विकलांग पेंशन में किए गए बदलाव ‘विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016’ के तहत किए गए हैं। यह कानून ‘बेंचमार्क विकलांगता’ को 40 प्रतिशत की सीमा के आधार पर परिभाषित करता है और यह प्रावधान करता है कि विकलांगता से जुड़ी सहायता राशि, अन्य श्रेणियों के लाभार्थियों के लिए समान योजनाओं के तहत मिलने वाली सहायता से कम से कम 25 प्रतिशत अधिक होनी चाहिए।

 

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