DK Shivakumar-Adani meeting: कर्नाटक में अदाणी-शिवकुमार की मुलाकात को लेकर सियासी घमासान! BJP ने कांग्रेस पर दोहरे मापदंड को लेकर साधा निशाना

DK Shivakumar-Adani meeting: दिग्गज उद्योगपति गौतम अदाणी ने रविवार 24 अगस्त को कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात की। दोनों के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुख्यमंत्री शिवकुमार ने इस मुलाकात को एक शिष्टाचार भेंट बताया। अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी के साथ मुलाकात को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की प्रदेश इकाई ने सत्तारूढ़ कांग्रेस पर ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा।

सूत्रों के अनुसार, अदाणी ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ गए थे। एयरपोर्ट लौटते समय सदाशिवनगर स्थित मुख्यमंत्री आवास पर शिवकुमार से मिले। मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) ने भी इसे एक शिष्टाचार भेंट बताया। यह मुलाकात हेब्बाल से सिल्क बोर्ड तक प्रस्तावित सुरंग सड़क परियोजना के बीच हुई है। सूत्रों के मुताबिक, इस परियोजना के लिए अदाणी एंटरप्राइजेज सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी के रूप में उभरी है। हालांकि, टेंडर को अभी आधिकारिक रूप से अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

यह तत्काल पता नहीं चल सका कि शिवकुमार और अदाणी के बीच बातचीत में सुरंग सड़क परियोजना का मुद्दा उठा या मुलाकात केवल औपचारिक शिष्टाचार तक सीमित रही। शिवकुमार ने बेंगलुरु में पत्रकारों से बातचीत में कहा, “मुख्यमंत्री बनने के बाद यह पहली बार था जब वह (अदाणी) यहां मुझसे मिलने आना चाहते थे। वे यहां कई कारोबार कर रहे हैं। वह शिष्टाचारवश मुझसे मिलने आए थे।”

BJP हुई हमलावर

इस बीच, BJP के वरिष्ठ नेता आर अशोक ने इस मुलाकात की आलोचना करते हुए सवाल किया कि क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शिवकुमार को अदाणी से मिलने की अनुमति दी थी। कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अशोक ने कहा, “कांग्रेस दिल्ली में अदाणी का विरोध करती है, जबकि कर्नाटक में उसके पक्ष में है। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है?” उन्होंने कहा कि कर्नाटक सरकार ने अदाणी के लिए ‘लाल कालीन बिछा दी’ है।

अशोक ने शिवकुमार से राहुल गांधी को यह बताने को कहा कि अदाणी एक कारोबारी हैं। वह केवल कारोबार कर रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर तंज कसते हुए अशोक ने उनसे बेंगलुरु आने और लालबाग या सैंकी टैंक में किसी पेड़ को गले लगाने को कहा जो प्रस्तावित सुरंग सड़क परियोजना से प्रभावित होंगे। BJP सुरंग सड़क परियोजना का विरोध कर रही है। भगवा पार्टी के युवा सांसद तेजस्वी सूर्या ने भी इस मुद्दे को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट का रुख किया है।

प्रियांक खड़गे की आई सफाई

कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने सीएम डीके शिवकुमार की गौतम अदाणी के साथ हुई मीटिंग का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह उद्योगपति राज्य सरकार के लिए सिर्फ एक कॉन्ट्रैक्टर है। टेंडर प्रोसेस पर कोई असर नहीं डाला गया है। खड़गे ने पत्रकारों से कहा, “हमारे लिए अदाणी एक कॉन्ट्रैक्टर हैं। वे कुछ प्रोजेक्ट्स में सबसे कम बोली लगाने वाले हैं। ये कर्नाटक सरकार के लिए अहम प्रोजेक्ट्स हैं। हमने टेंडर प्रोसेस को प्रभावित नहीं किया है। कोई भी L1 बन सकता है।”

BJP से पूछा सवाल

उन्होंने कहा कि अदाणी ग्रुप पर कांग्रेस का राजनीतिक रुख नहीं बदला है। लेकिन साथ ही कहा कि राजनीतिक मतभेदों से यह तय नहीं हो सकता कि सरकारी टेंडर की प्रक्रिया कैसे होगी। खड़गे ने कहा, “अगर अदाणी कानूनी तरीके से टेंडर हासिल करते हैं, तो ठीक है।” उन्होंने टनल रोड प्रोजेक्ट पर बीजेपी के रुख पर भी सवाल उठाया। साथ ही पूछा कि क्या विपक्ष अब भी इसका विरोध करेगा, जब अदाणी ग्रुप की एक कंपनी सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनकर उभरी है।

राज्य सरकार द्वारा बताई गई बोली की जानकारी के अनुसार, अदाणी एंटरप्राइजेज ने 16.75 किलोमीटर लंबे टनल रोड प्रोजेक्ट के लिए 22,267 करोड़ रुपये की बोली लगाई। यह बोली सरकार की शुरुआती अनुमानित प्रोजेक्ट लागत 17,698 करोड़ रुपये से ज्यादा है।

वहीं, शिवकुमार की अदाणी से मुलाकात पर कांग्रेस सांसद और प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, “हमने साफ तौर पर कहा है कि हम एकाधिकार के खिलाफ हैं। हम किसी उद्योगपति के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन हम हमेशा कहते हैं कि अगर किसी एक उद्योगपति का एकाधिकार हो जाए, तो यह देश के लिए अच्छा नहीं है।”

कौन 16 करोड़ रुपये में खरीद ले गया गांधीजी की चिट्ठी-चरखा, 688 हैंडरिटेन विचार और ये सारी विरासतें? अब मिली ये जानकारी

National Gandhi Museum: महात्मा गांधी से जुड़े पत्रों, हस्तलिखित दस्तावेजों और उनके निजी इस्तेमाल की वस्तुओं की हालिया नीलामी को लेकर नेशनल गांधी म्यूजियम ने चिंता जताई है। म्यूजियम के डायरेक्टर ए. अन्नामलाई ने कहा है कि गांधी के ऐसे दस्तावेज और व्यक्तिगत सामान केवल किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि भारत की साझा ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं। उन्होंने इन दुर्लभ सामग्रियों के मालिकों से इन्हें नीलाम करने के बजाय राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय को सौंपने की अपील की है, ताकि इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।

19 अगस्त को हुई एक नीलामी में गांधी से जुड़े 86 दुर्लभ आइटम शामिल थे। इनमें उनके करीबी सहयोगी और स्वतंत्रता सेनानी आनंद टी. हिंगोरानी को लिखी गई गांधी की 688 हस्तलिखित टिप्पणियों का संग्रह भी था। करीब दो सालों में लिखे गए इस संग्रह का शीर्षक ‘A Thought for the Day’ था। यह संग्रह 16.20 करोड़ रुपये में बिका और किसी भारतीय ऐतिहासिक दस्तावेज के नीलामी में बिकने का विश्व रिकॉर्ड बना।

‘यह खबर बेहद दुखद और पीड़ादायक’

नेशनल गांधी म्यूजियम के डायरेक्टर ए. अन्नामलाई ने शनिवार को जारी बयान में इस नीलामी पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले महात्मा गांधी द्वारा लिखे गए लेटर और उनके इस्तेमाल की गई कुछ वस्तुओं को अंतरराष्ट्रीय नीलामी में रखा गया। रिपोर्टों के मुताबिक, इन वस्तुओं की बिक्री से मालिक को 16 करोड़ रुपये से अधिक मिले।

अन्नामलाई ने इसे ‘बेहद दुखद और पीड़ादायक खबर’ बताया। उन्होंने कहा कि गांधी के कई पत्र भले ही किताबों में प्रकाशित हो चुके हैं। लेकिन मूल पत्रों और उनके हाथ से लिखी पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना देश की ऐतिहासिक जिम्मेदारी है।

तीसरी-चौथी पीढ़ी के पास पहुंच चुके हैं कई दस्तावेज

म्यूजियम डायरेक्टर के मुताबिक, गांधी से जुड़े कई पत्र और वस्तुएं अब उन लोगों के पास हैं जो मूल मालिकों की तीसरी या चौथी पीढ़ी से आते हैं। संभव है कि उन्हें इन सामग्रियों के ऐतिहासिक महत्व की पूरी जानकारी न हो या वे यह न जानते हों कि इन्हें किस तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

ऐसे में कुछ लोग इन दुर्लभ वस्तुओं को नीलामी के जरिए बेचने का रास्ता अपना रहे हैं। अन्नामलाई ने कहा कि गांधी के पत्र, पांडुलिपियां और उनके निजी इस्तेमाल की वस्तुएं सिर्फ निजी संग्रह की चीजें नहीं हैं, बल्कि भारत के साझा इतिहास का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि इन सामग्रियों को इस तरह संरक्षित किया जाना चाहिए कि भारत ही नहीं। बल्कि दुनियाभर के लोग इन्हें देख सकें, उनका अध्ययन कर सकें और महात्मा गांधी के विचारों को समझ सकें।

राष्ट्रीय गांधी म्यूजियम ने की खास अपील

अन्नामलाई ने उन सभी लोगों से अपील की, जिनके पास गांधी के पत्र, उनके हाथ से लिखी पांडुलिपियां या उनके द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तुएं हैं। उन्होंने कहा कि इन्हें बेचने या नीलाम करने के बजाय राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, दिल्ली को सौंपा जाए। उनका कहना है कि म्यूजियम इन दुर्लभ और मूल्यवान सामग्रियों को सुरक्षित तरीके से संरक्षित कर सकता है। उन्हें वर्तमान तथा भविष्य की पीढ़ियों के लिए उपयोगी बना सकता है।

नीलामी में क्या-क्या बिका?

‘Gandhi: From the Collection of Anand T Hingorani’ नाम से आयोजित नीलामी में गांधी से जुड़े कुल 86 लॉट शामिल थे। इनमें पत्र, पांडुलिपियां, तस्वीरें और व्यक्तिगत वस्तुएं शामिल थीं। सबसे अधिक कीमत गांधी की 688 हस्तलिखित टिप्पणियों के संग्रह को मिली। इसमें सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, निर्भयता, धार्मिक समानता, अस्पृश्यता उन्मूलन, प्रार्थना, रामनाम, सेवा, श्रम, भूख, कर्तव्य, स्वराज, नैतिक जिम्मेदारी, मौन, अंतरात्मा, अनासक्ति, आत्मबोध और ईश्वर की खोज जैसे विषयों पर उनके विचार दर्ज थे। यह संग्रह 16.20 करोड़ रुपये में बिका।

इसके अलावा गांधी के ईश्वर और भगवद्गीता से जुड़े विचारों पर आधारित तीन पांडुलिपियों और पत्रों का सेट ‘Message on God’ नाम से पेश किया गया, जिसे 1.68 करोड़ रुपये में बेचा गया। गांधी का ‘पेटी चरखा’ (बॉक्स स्पिनिंग व्हील) भी नीलामी में शामिल था। इसके साथ कताई के आध्यात्मिक अनुशासन पर लिखे दो पत्र थे। इसकी अनुमानित कीमत 50 से 70 लाख रुपये थी, लेकिन यह 1.02 करोड़ रुपये में बिका।

इसके अलावा गांधी की हस्ताक्षरित एक तस्वीर (जिसमें वह लिखते हुए दिखाई दे रहे हैं) 78 लाख रुपये में बिकी। आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़े गांधी के पत्रों, टेलीग्राम और पोस्टकार्ड का एक सेट 57.60 लाख रुपये में बेचा गया।

हिंगोरानी परिवार ने पीढ़ियों तक संभालकर रखा था संग्रह

नीलाम की गई सामग्री को हिंगोरानी परिवार ने कई पीढ़ियों से संभालकर रखा था। यह संग्रह गांधी और आनंद टी. हिंगोरानी के लंबे और करीबी संबंधों के माध्यम से गांधी के व्यक्तित्व और विचारों की एक निजी झलक प्रस्तुत करता है। नीलामी में खरीदार की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई। हालांकि नीलामी कराने वाली संस्था ने बताया कि खरीदार भारत का ही है और यह महत्वपूर्ण पांडुलिपि देश में ही रहेगी।

राष्ट्रीय गांधी म्यूजियम की अपील के बाद अब यह सवाल भी उठ रहा है कि महात्मा गांधी जैसी ऐतिहासिक शख्सियत से जुड़े मूल दस्तावेजों और निजी वस्तुओं को निजी संपत्ति मानकर बाजार में बेचा जाना चाहिए या उन्हें राष्ट्रीय विरासत के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए।

नीलामी से जुड़ी मुख्य बातें

कुल बिक्री: सैफरनआर्ट (Saffronart) नीलामी घर द्वारा ‘गांधी: फ्रॉम द कलेक्शन ऑफ आनंद टी. हिंगोरानी’ शीर्षक से 86 वस्तुओं की नीलामी की गई।

सबसे महंगी वस्तु: गांधीजी द्वारा अपने निकट सहयोगी आनंद टी. हिंगोरानी को दो वर्षों में लिखे गए 688 हस्तलिखित विचारों का संग्रह ‘अ थॉट फॉर द डे’ 16.20 करोड़ रुपये में बिका। यह किसी भारतीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ के लिए एक विश्व रिकॉर्ड है।

अन्य प्रमुख वस्तुएं

‘मेसेज ऑन गॉड’ (ईश्वर और भगवद गीता पर विचार): 1.68 करोड़ रुपये

गांधीजी का पेटी चरखा (दो पत्रों के साथ): 1.02 करोड़ रुपये

लिखने के दौरान की हस्ताक्षरित तस्वीर: 78 लाख रुपये

आर्थिक स्वतंत्रता पर पत्र, टेलीग्राम और पोस्टकार्ड: 57.60 लाख रुपये

कौन है खरीददार?

नीलामी घर ने पुष्टि की है कि खरीदार भारत का ही निवासी है, इसलिए ये दस्तावेज देश में ही रहेंगे। हालांकि खरीददार के नाम का खुलासा नहीं हुआ है।

संग्रहालय का पक्ष और अपील

संरक्षण पर चिंता: गांधी म्यूजियम के निदेशक ए. अन्नामलाई ने कहा कि मूल मालिकों की तीसरी या चौथी पीढ़ी के पास ये वस्तुएं हैं, जो अक्सर इनके ऐतिहासिक महत्व या सही संरक्षण तकनीकों को समझे बिना इन्हें बेच देते हैं।

राष्ट्रीय धरोहर: उन्होंने जोर देकर कहा कि गांधीजी के पत्र, पांडुलिपियाँ और वस्तुएं साझा राष्ट्रीय संपत्ति हैं, जिन्हें आम जनता के अध्ययन और सीखने के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

सार्वजनिक अपील: अन्नामलाई ने निजी संग्रहकर्ताओं और वंशजों से अपील की है कि वे इन ऐतिहासिक वस्तुओं को नीलाम करने के बजाय नई दिल्ली स्थित ‘राष्ट्रीय गांधी म्यूजियम’ को सौंपें ताकि इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।

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Gautam Adani meets DK Shivakumar: अडानी ग्रुप के चेयरमैन और दिग्गज उद्योगपति गौतम अडानी ने रविवार 23 अगस्त को राजधानी बेंगलुरु में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात की। शिवकुमार के सदाशिवनगर स्थित आवास पर यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (AEL) बेंगलुरु के 16.75 किलोमीटर लंबे टनल रोड प्रोजेक्ट के दोनों पैकेजों के लिए सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी (L1) बनकर उभरी है।

हालांकि, मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और अडानी ग्रुप की ओर से इस मुलाकात को लेकर अब तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। सामने आए वीडियो में शिवकुमार को गौतम अडानी को विदा करते हुए देखा गया। सूत्रों के मुताबिक, अडानी आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर की यात्रा के बाद एयरपोर्ट जाते समय मुख्यमंत्री के आवास पहुंचे थे।

टनल रोड प्रोजेक्ट से जुड़ी है मुलाकात?

गौतम अडानी और सीएम डीके शिवकुमार की मुलाकात का समय इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि दिसंबर 2025 में अडानी एंटरप्राइजेज ने सेंट्रल सिल्क बोर्ड से हेब्बाल तक प्रस्तावित 16.75 किलोमीटर टनल रोड प्रोजेक्ट के दोनों पैकेजों के लिए सबसे कम बोली लगाई थी। बेंगलुरु स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (B-SMILE) की ओर से दिसंबर 2025 में खोली गई फाइनेंशियल बिड्स से पता चलता है कि AEL ने दोनों पैकेजों में L1 रही थी यानी सबसे कम बोली लगाई थी।

राज्य सरकार ने पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 17,698 करोड़ रुपये रखी थी। वहीं, अडानी एंटरप्राइजेज ने करीब 22,267 करोड़ रुपये की बोली लगाई। यानी कंपनी की बोली सरकारी अनुमान से लगभग 4,600 करोड़ रुपये ज्यादा है। सूत्रों ने बताया कि प्रोजेक्ट को पूरा करने वाली स्पेशल पर्पस व्हीकल (SPV) B-SMILE ने 29 मई को राज्य सरकार को फाइल भेजी थी। उसी दिन राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा औपचारिक रूप से स्वीकार किया था।

अभी नहीं मिला है ठेका

हालांकि, अडानी एंटरप्राइजेज के सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनी बनने के बावजूद अभी तक उसे आधिकारिक तौर पर प्रोजेक्ट का ठेका नहीं दिया गया है। सूत्रों ने हमारे सहयोगी ‘मनीकंट्रोल’ को बताया कि इस प्रोजेक्ट को लागू करने वाली विशेष उद्देश्य कंपनी (SPV) B-SMILE ने 29 मई को संबंधित फाइल राज्य सरकार को भेजी थी। अधिकारियों के मुताबिक, अडानी की बोली परियोजना के स्वीकृत अनुमान से निर्धारित सीमा से अधिक होने के कारण अब कैबिनेट की मंजूरी जरूरी हो गई है।

शिवकुमार के लिए अहम है ये प्रोजेक्ट

बेंगलुरु का यह टनल रोड प्रोजेक्ट डीके शिवकुमार की प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में शामिल माना जाता है। बेंगलुरु विकास मंत्री रहते हुए भी उन्होंने इस प्रोजेक्ट का लगातार समर्थन किया था। हालांकि, प्रोजेक्ट को लेकर नागरिक संगठनों और शहरी परिवहन विशेषज्ञों की ओर से विरोध भी सामने आया है। आलोचकों ने इसकी लागत, ट्रैफिक पर प्रभाव और बेंगलुरु की परिवहन व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए हैं।

30 साल तक निजी कंपनी को मिलेगा संचालन अधिकार

प्रस्तावित टनल रोड को संशोधित Build, Own, Operate and Transfer (BOOT) मॉडल के तहत विकसित किया जाना है। इस मॉडल के तहत कर्नाटक सरकार प्रोजेक्ट को आर्थिक रूप से मुमकिन बनाने के लिए ‘वायबिलिटी गैप फंडिंग (Viability Gap Funding)’ देगी। सरकार प्रोजेक्ट की लागत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा उठाएगी। जबकि प्राइवेट कंपनी लगभग 30 साल की अवधि में कंसेशन व्यवस्था के जरिए अपना निवेश वसूल करेगी।

अडानी ग्रुप की कर्नाटक में मौजूदगी

अडानी ग्रुप की कर्नाटक में पहले से ही मजूत बिजनेस मौजूदगी है। ग्रुप की कंपनियों ने राज्य में रिन्यूएबल एनर्जी, सीमेंट मैन्युफैक्चरिंग और फ़ूड प्रोसेसिंग जैसे सेक्टर में निवेश किया है। इसके अलावा, अडानी ग्रुप उडुपी थर्मल पावर प्लांट और मंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट का संचालन भी करता है।

राहुल गांधी के बयानों से बढ़ी नजर

अडानी की शिवकुमार से मुलाकात राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बन गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार अडानी ग्रुप को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। सरकार पर उद्योग समूह को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाते रहे हैं। राहुल गांधी कई अडानी से जुड़े प्रोजेक्टों, जिनमें ग्रेट निकोबार परियोजना भी शामिल है, लेकिन आपत्ति जता चुके हैं। हालांकि, केंद्र सरकार और अडानी ग्रुप दोनों ने इन आरोपों को खारिज किया है।

ऐसे में अडानी की मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात और बेंगलुरु टनल रोड प्रोजेक्ट में उनकी कंपनी के L1 bidder बनने का घटनाक्रम अब राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर खासा ध्यान खींच रहा है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि बैठक में टनल रोड प्रोजेक्ट पर कोई चर्चा हुई या नहीं।

गुजरात में जैन मंदिर पहुंचे थे अडानी

इस मुलाकात से पहले गौतम अडानी गुजरात के गांधीनगर जिले स्थित प्रसिद्ध महुडी जैन तीर्थ पहुंचे थे। उनके साथ उनकी पत्नी प्रीति अडानी, बड़े बेटे करण अडानी और बहू परिधि अडानी भी थीं। अडानी ने मंदिर में पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया।

अडानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी यात्रा की जानकारी शेयर करते हुए कहा था कि उन्हें महुडी जैन तीर्थ के दर्शन का सौभाग्य मिला। उन्होंने जैन धर्म के अहिंसा, आत्म-अनुशासन और करुणा के संदेश का उल्लेख करते हुए सभी के शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना की। यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब जैन समुदाय पर्युषण महापर्व की तैयारियों में जुटा है। इस वर्ष पर्युषण महापर्व 8 सितंबर से शुरू होगा।

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‘डीके, सावधान रहना…’ PM मोदी ने डीके शिवकुमार से क्यों कही ये बात, बेंगलुरु को लेकर किया ये खुलासा

News18 Rising Bharat Summit: बेंगलुरु में आयोजित न्यूज 18 राइजिंग भारत समिट में कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने शिरकत की। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से राज्य के लिए ज्यादा आर्थिक मदद देने की मांग की है। उनका कहना है कि कर्नाटक देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है, इसलिए उसे केंद्र से भी बेहतर आर्थिक सहयोग मिलना चाहिए। ‘राइजिंग भारत’ समिट में डी.के. शिवकुमार ने बताया कि हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात हुई थी। इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया भर के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) बेंगलुरु पर नजर बनाए हुए हैं।

जब पीएम मोदी ने सीएम शिवकुमार से कही ये बात

सीएम शिवकुमार ने कहा, “जब भी मेरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात होती है, मैं उनसे कहता हूं कि हम देश की तरक्की में पूरा सहयोग दे रहे हैं, इसलिए केंद्र को भी हमारी मदद करनी चाहिए। हमारे हिस्से के पैसे को दूसरे राज्यों में ज्यादा न बांटा जाए।” उन्होंने कहा कि कर्नाटक समेत दक्षिण भारत के कई राज्यों की लंबे समय से मांग रही है कि उन्हें केंद्रीय संसाधनों में उचित हिस्सा मिले।

डी.के. शिवकुमार ने आगे कहा कि यह केंद्र सरकार की नीति से जुड़ा मामला है और वह इस पर ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहते। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हाल ही में हुई मुलाकात का भी जिक्र किया। शिवकुमार के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने उनसे कहा, “डी.के., सावधान रहिए। दुनिया भर के सभी ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) बेंगलुरु पर नजर रखे हुए हैं।”

बेंगलुरु के आर्थिक विकास पर फोकस 

बेंगलुरु की आर्थिक अहमियत पर बात करते हुए डी.के. शिवकुमार ने कहा कि यह शहर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) से लेकर एयरोस्पेस जैसे क्षेत्रों तक बेंगलुरु का बड़ा योगदान है और इसी वजह से दुनिया भर के निवेशक यहां निवेश करना चाहते हैं। उन्होंने माना कि बेंगलुरु शुरू से योजनाबद्ध तरीके से नहीं बसाया गया था, लेकिन समय-समय पर अलग-अलग सरकारों ने शहर के बुनियादी ढांचे और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। शिवकुमार ने कहा, “जब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री थे, तब मैं बेंगलुरु के शहरी विकास मंत्री के रूप में काम कर रहा था। उस दौरान हमने शहर के विकास और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई योजनाएं तैयार की थीं। मैं मानता हूं कि बेंगलुरु पूरी तरह योजनाबद्ध शहर नहीं है, लेकिन अब हमें इसे उसी तरह विकसित करना होगा, क्योंकि यह आईटी से लेकर एयरोस्पेस तक कई क्षेत्रों के जरिए देश की अर्थव्यवस्था को बड़ी ताकत देता है।”

कर्नाटक को निवेश के लिए सबसे बेहतर राज्यों में से एक बताते हुए डी.के. शिवकुमार ने कहा कि राज्य कई क्षेत्रों में देश की अगुवाई कर रहा है। उन्होंने बताया कि खेती, डेयरी, रेशम उत्पादन और हरित ऊर्जा (ग्रीन एनर्जी) जैसे क्षेत्रों में कर्नाटक लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। शिवकुमार ने बेंगलुरु की खासियतों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यहां का सुहावना मौसम, बेहतर जीवनशैली और लोकप्रिय पब संस्कृति लोगों को आकर्षित करती है। इसके साथ ही राज्य सरकार कारोबार शुरू करने और चलाने की प्रक्रिया को आसान बनाने पर भी लगातार काम कर रही है, ताकि देश-विदेश के निवेशकों का भरोसा और मजबूत हो सके।

अब देश को मिलेगी पहली सरकारी AI यूनिवर्सिटी! जानिए इसे लेकर क्या हुआ ऐलान, कैसी है तैयारी

AI university in India: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में भारत एक नया इतिहास रचने जा रहा है। देश को जल्द ही अपनी पहली सरकारी एआई यूनिवर्सिटी मिलने वाली है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मंगलवार (14 जुलाई) को यह बड़ा ऐलान किया कि राज्य देश की पहली सरकारी स्तर की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यूनिवर्सिटी स्थापित करेगा।

मुख्यमंत्री ने यह महत्वपूर्ण घोषणा बेंगलुरु में आयोजित Google I/O Connect India 2026 के उद्घाटन के दौरान की। इस कार्यक्रम में देश और दुनिया भर से टेक्नोलॉजी लीडर्स, इनोवेटर्स, एंटरप्रेन्योर्स, डेवलपर्स, रिसर्चर्स और पॉलिसी मेकर्स हिस्सा ले रहे हैं।

एआई यूनिवर्सिटी और AI Hub की होगी स्थापना

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सीएम डीके शिवकुमार ने बताया कि राज्य सरकार जिम्मेदार एआई इनोवेशन के मामले में कर्नाटक को एक वैश्विक लीडर बनाना चाहती है। इसके लिए दो बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। पहला सरकारी एआई यूनिवर्सिटी बनाई जाएगी। यह प्रस्तावित यूनिवर्सिटी विश्व स्तरीय एआई टैलेंट तैयार करने, रिसर्च को आगे बढ़ाने और अकादमिक जगत, इंडस्ट्री एवं सरकार के बीच सहयोग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

दूसरा AI Hub भी स्थापित होगा जो स्टार्टअप्स, कंपनियों और अन्य संस्थानों द्वारा एआई के क्षेत्र में रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए एक इनक्यूबेशन सेंटर के रूप में काम करेगा। सीएम ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तुलना भाप के इंजन, बिजली, इंटरनेट और मोबाइल टेक्नोलॉजी से करते हुए कहा कि यह इस पीढ़ी की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति है।

आईटी सेक्टर में कर्नाटक की मजबूत हिस्सेदारी

बेंगलुरु और कर्नाटक के मौजूदा तकनीकी दबदबे को बताते हुए सीएम डीके शिवकुमार ने कुछ बेहद महत्वपूर्ण आंकड़े भी साझा किए। उन्होंने बताया कि भारत के कुल सॉफ्टवेयर निर्यात में अकेले कर्नाटक की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत है। बेंगलुरु वर्तमान में 17000 से अधिक स्टार्टअप्स और हजारों ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का घर है जो वैश्विक बाजार के लिए प्रोडक्ट्स डिजाइन और इंजीनियर करते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य राज्य को एक AI-native राज्य बनाना है। ऐसा राज्य जहां एआई केवल एक तकनीकी नारा बनकर न रहे बल्कि इसका इस्तेमाल सुशासन और लोगों के रोजमर्रा के जीवन को बेहतर बनाने के लिए जिम्मेदारी से किया जाए।

इन 5 क्षेत्रों में गूगल के साथ साझेदारी का न्योता

मुख्यमंत्री शिवकुमार ने कर्नाटक के साथ दो दशकों से अधिक समय की गूगल की साझेदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि सर्च, एंड्रॉयड, यूट्यूब, मैप्स, क्रोम, जीमेल और गूगल पे जैसे गूगल के प्रोडक्ट्स ने भारतीयों के ज्ञान प्राप्त करने, व्यापार करने और सरकारी सेवाओं के साथ जुड़ने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है।

मुख्यमंत्री ने गूगल को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, जलवायु अनुकूलन, अर्बन मोबिलिटी और सुशासन के लिए एआई समाधान बनाने में सहयोग करने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने सहयोग के लिए 5 प्रमुख क्षेत्रों का खाका पेश किया:-

1- एआई टूल्स का विकास: शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, कृषि और छोटे व्यवसायों के लिए विशेष एआई टूल्स विकसित करना।

2- भारतीय स्टार्टअप्स को सपोर्ट: बड़े पैमाने पर भारतीय चुनौतियों का समाधान खोजने वाले स्टार्टअप्स को सहायता देना।

3- एआई लर्निंग का विस्तार: पूरे कर्नाटक में छात्रों के लिए एआई सीखने के अवसरों को बढ़ाना।

4- ग्लोबल लैबोरेटरी बनाना: कर्नाटक को जिम्मेदार टेक्नोलॉजी के लिए एक वैश्विक प्रयोगशाला के रूप में स्थापित करना।

5- लॉन्ग-टर्म पार्टनरशिप: इकोसिस्टम पार्टनर के रूप में गूगल की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को और गहरा करना।

भविष्य के लिए डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की तैयारी

कर्नाटक सरकार देश के इस तकनीकी हब के रूप में अपनी स्थिति को और मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए राज्य सरकार डेटा सेंटर्स सहित अपने डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार जारी रखेगी ताकि एआई इनोवेशन, क्लाउड कंप्यूटिंग और अगली पीढ़ी की डिजिटल सेवाओं को जरूरी सपोर्ट मिल सके।

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समारोह के अंत में डेवलपर्स और युवाओं को प्रोत्साहित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि तकनीकी क्रांतियां हमेशा जिज्ञासा और ‘क्या हम इसे अलग तरीके से कर सकते हैं?’ पूछने की इच्छा से शुरू होती हैं। उन्होंने डेवलपर्स को निडर होकर निर्माण करने, उद्यमियों को बड़े सपने देखने और शोधकर्ताओं को नवाचार जारी रखने का आग्रह किया।

कर्नाटक का हर नया CM घर की तलाश में क्यों जुट जाता है? डीके शिवकुमार ने 160 साल पुराना जो बंगला चुना वो बेहद खास!

भारत के कुछ ही राज्य ऐसे हैं जहां मुख्यमंत्री के स्थायी निवास के लिए कोई आधिकारिक सरकारी बंगला तय नहीं है और कर्नाटक उन्हीं राज्यों में से एक है। यही वजह है कि राज्य में जब भी सत्ता परिवर्तन होता है या नया नेतृत्व आता है तो उनके लिए घर की तलाश शुरू हो जाती है। बंगलों की ये तलाश कई बार जरूरत से ज्यादा वास्तु के मापदंडों की कसौटी पर भी कसी जाने लगती है। आप एक तरह से कह सकते हैं कि बेंगलुरु में एक घर ढूंढना किसी के लिए आसान नहीं है, यहां तक कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री के लिए भी नहीं। ये मामला इस वक्त चर्चा में इसलिए है क्योंकि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपने रहने और कार्यालय के लिए लगभग 160 साल पुराने कुमार कृपा (Kumara Krupa) बंगले को चुना है। लोक निर्माण विभाग (PWD) इस हेरिटेज प्रॉपर्टी को रिनोवेट करने में जुटा है। यह नौबत इसलिए आई क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कावेरी बंगले में ही रहने का फैसला किया है। यह बंगला आमतौर पर कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों से सबसे करीब से जुड़ा रहा है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि कर्नाटक में हर नए मुख्यमंत्री के सामने आखिर आवास की यह पहेली क्यों खड़ी हो जाती है और इसके पीछे क्या सियासी व ऐतिहासिक कारण हैं।

क्या कर्नाटक में मुख्यमंत्री का कोई आधिकारिक स्थायी निवास है?

इसका जवाब ना में है। कर्नाटक में कभी भी किसी सरकारी बंगले को मुख्यमंत्री के स्थायी निवास के रूप में औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया है। पिछले कई दशकों से अलग-अलग मुख्यमंत्री अपनी सुविधा के अनुसार विभिन्न सरकारी संपत्तियों में रहते आए हैं। वैसे 1980 के दशक से कुमार कृपा रोड पर स्थित दो आस-पास के बंगले कृष्णा और कावेरी सीएम आवास से ज्यादा करीब से जुड़े माने जा सकते हैं। कृष्णा बंगले का इस्तेमाल आधिकारिक बैठकों और प्रशासनिक कार्यों के लिए किया जाता है जबकि कावेरी सीएम आवास के रूप में इस्तेमाल होता है।

कावेरी बंगले का इतिहास और सिद्धारमैया का जुड़ाव

पूर्व मुख्यमंत्री आर गुंडू राव 1980 में कावेरी बंगले में रहने वाले पहले मुख्यमंत्री थे। उनके बाद सिद्धारमैया, बीएस येदियुरप्पा, जगदीश शेट्टार, जेएच पटेल, एस बंगारप्पा और वीरेंद्र पाटिल जैसे कई दिग्गज मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान इस बंगले में रहे। दिलचस्प बात यह है कि कावेरी में रहने वाले मुख्यमंत्रियों में से सिद्धारमैया एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने अपना पांच साल का पूरा कार्यकाल पूरा किया है। चूंकि सिद्धारमैया इस बार भी कावेरी को छोड़ने के मूड में नहीं हैं इसलिए नए नेतृत्व के लिए नया घर ढूंढने का एक टास्क सामने आ गया।

हर नए सीएम के सामने क्यों खड़ी होती है आवास की पहेली?

इसकी सीधी सी वजह यह है कि मुख्यमंत्री पद के लिए कोई भी आवास स्थायी रूप से आरक्षित नहीं है। जब कोई नया मुख्यमंत्री पद संभालता है तो उनका पसंदीदा बंगला पहले से ही किसी पूर्व मुख्यमंत्री या किसी अन्य संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी के पास हो सकता है। कई मामलों में नए रहने वाले के आने से पहले बंगले में बड़े पैमाने पर रिनोवेशन की जरूरत होती है। इसके अलावा कुछ मुख्यमंत्री सरकारी बंगले में जाने के बजाय अपने निजी घरों में ही रहना पसंद करते हैं। परिणाम यह होता है कि हर बार इस बात को लेकर होड़ मचती है कि कौन सी संपत्ति मुख्यमंत्री का आधिकारिक निवास बनेगी।

डीके शिवकुमार ने क्यों चुना 160 साल पुराना कुमार कृपा बंगला?

चूंकि सिद्धारमैया कावेरी में ही रहेंगे, इसलिए शिवकुमार ने ‘कुमार कृपा’ को अपना आधिकारिक निवास और ‘कृष्णा’ को अपना ऑफिस चुना है। कुमार कृपा बंगला 12 कमरों का है और एक सरकारी गेस्ट हाउस के रूप में इस्तेमाल हो रहा था। अब इसका रिनोवेशन किया जा रहा है।

विपक्ष कर रहा आलोचना, जानिए इस बंगले का ऐतिहासिक महत्व

शिवकुमार के इस फैसले की जेडीएस ने कड़ी आलोचना की है। जेडीएस का तर्क है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को उसके मौजूदा स्वरूप में ही संरक्षित किया जाना चाहिए। इस बंगले का एक बड़ा ऐतिहासिक महत्व है। यह बंगला मूल रूप से 1883 से 1901 तक मैसूर के दीवान रहे के शेषाद्रि अय्यर का निवास स्थान था। साल 1927 में बेंगलुरु यात्रा के दौरान महात्मा गांधी भी इसी कुमार कृपा बंगले में रुके थे।

अनुग्रह बंगला: आखिर इसे क्यों माना जाता है अशुभ?

राजनीतिक गलियारों में अनुग्रह बंगले को जिंक्सड यानी मनहूस या अशुभ माना जाता है। कहते हैं कि जो भी मुख्यमंत्री इस बंगले में रहने गया वो अपना 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। इस बंगले में रहने वाले पूर्व मुख्यमंत्रियों में एचडी देवेगौड़ा, धरम सिंह और डीवी सदानंद गौड़ा शामिल हैं। इन सभी का कार्यकाल समय से पहले खत्म हो गया। पूर्व सीएम एसएम कृष्णा ने भी भी अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ही विधानसभा भंग कर दी थी। पिछले सालों से इस बंगले में कई बार वास्तु बदलाव भी किए गए लेकिन नेताओं के मन से इसका डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

राजनीतिक सलाहकार वेंकटेश थोगरीघट्टा बताते हैं कि यह कहना मुश्किल है कि अनुग्रह खराब वास्तु से पीड़ित है या केवल दुर्भाग्य का शिकार है। लेकिन पिछले तीन दशकों में इस बंगले को चुनने वाले कम से कम चार मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल बहुत छोटा रहा है। यह बात स्वाभाविक रूप से नए मुख्यमंत्रियों के दिमाग में घर चुनते समय असर डालती है। यही कारण है कि कई मुख्यमंत्री ताज वेस्ट एंड के पास स्थित रेस व्यू कॉटेज जैसे अन्य सरकारी आवासों को प्राथमिकता देते रहे हैं।

क्या वास्तु की मान्यताएं निर्णय को प्रभावित करती हैं?

कुछ मुख्यमंत्रियों ने अपने आवासों और कार्यालयों का चयन या उनमें बदलाव करते समय सार्वजनिक रूप से वास्तु पर विचार करने की बात स्वीकार की है। कुछ अन्य मुख्यमंत्रियों ने ऐसी चिंताओं को खारिज करते हुए प्रशासनिक सुविधा को प्राथमिकता दी है। कार्मिक और प्रशासनिक सुधार विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक चूंकि कोई भी बंगला आधिकारिक तौर पर सीएम निवास के रूप में अधिसूचित नहीं है इसलिए मुख्यमंत्री उपलब्ध सरकारी संपत्तियों में से कोई भी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं।

क्या कर्नाटक में एक स्थायी सीएम आवास होना चाहिए?

पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली का मानना है कि राज्य में एक स्थायी मुख्यमंत्री आवास होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के लिए एक निश्चित और नामित आवास होना चाहिए। ऐसा न होने से, हर बार जब कोई नया मुख्यमंत्री आता है तो सरकार एक अलग घर तैयार करने में पैसा खर्च करती है। एक स्थायी आवास होने से बार-बार होने वाले इस रिनोवेशन के खर्च से बचा जा सकता है।

Mallikarjun Kharge: “चुप रहो, बैठ जाओ!” कांग्रेस कार्यक्रम में ‘डीके-डीके’ नारे लगाने पर भड़के खड़गे, कार्यकर्ताओं को लगाई फटकार

Mallikarjun Kharge: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने रविवार को पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान हंगामा करने वाले कार्यकर्ताओं को जमकर फटकार लगाई। दरअसल, कार्यक्रम के बीच कुछ कार्यकर्ता कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के समर्थन में “डीके-डीके” के नारे लगाने लगे, जिससे खड़गे नाराज हो गए। उन्होंने कार्यकर्ताओं को डांटते हुए कहा कि यह कांग्रेस का कार्यक्रम है, किसी एक नेता का नहीं। उन्होंने गुस्से में कहा, “चुप रहो! बैठ जाओ। ऐसा लग रहा है जैसे पूरा देश तुम्हारे हाथ में आ गया हो। बेकार लोग!”

खड़गे ने चिल्लाते हुए कहा, “यह कांग्रेस पार्टी की बैठक है। यह किसी एक व्यक्ति के लिए आयोजित कार्यक्रम नहीं है। हम सभी लोग यहां पार्टी को मजबूत और एकजुट करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। अगर एक व्यक्ति एक नाम का नारा लगाता है और दूसरा किसी और नाम का, तो क्या बाकी लोग यहां सिर्फ कचरा साफ करने आए हैं?”

खड़गे ने कार्यकर्ताओं को दी चेतावनी

राजनीति में अपने 58 साल के लंबे करियर का जिक्र करते हुए, उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि पार्टी ही उनकी पहचान का आधार है और उन्हें चेतावनी दी कि उनके अनुशासनहीन व्यवहार पर कार्रवाई जरूर होगी। उन्होंने कहा, “याद रखिए… पार्टी के लिए अनुशासन हमेशा जरूरी है। जो भी यहां शोर मचा रहा है, उसका फुटेज होगा। फुटेज देखने के बाद मैं अनुशासनात्मक कार्रवाई करूंगा।”

वहीं, मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा कार्यकर्ताओं को फटकार लगाने पर बीजेपी नेता गौरव वल्लभ ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि इस घटना से कांग्रेस के भीतर सत्ता के लिए चल रही खींचतान उजागर हो गई है। वल्लभ ने आरोप लगाया कि खड़गे खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे।

इसके अलावा, बीजेपी नेता ने कांग्रेस के नेतृत्व पर भी तंज कसते हुए कहा कि पार्टी तीन “होल्डिंग कंपनियों” द्वारा नियंत्रित है – सोनिया गांधी के लिए “कांग्रेस M”, प्रियंका गांधी के लिए “कांग्रेस P” और राहुल गांधी के लिए “कांग्रेस R”, जबकि खड़गे वाली “कांग्रेस K” केवल उनकी सहायक कंपनी के रूप में काम करती है।

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