EPF Scheme 2026: 1 साल के अंदर छोड़ दी नौकरी तो क्या निकाल सकते हैं PF का पूरा पैसा? समझिए एलिजिबल मेंबर बैलेंस और टैक्स का पूरा नियम

EPF Scheme 2026: केंद्र सरकार ने नई कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योजना, 2026 को नोटिफाई कर दिया है। इसके तहत ईपीएफ खातों से आंशिक निकासी को लेकर एक आसान और नया फ्रेमवर्क पेश किया गया है। आपको बता दें कि सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 के तहत नोटिफाई की गई यह नई स्कीम छह दशक पुरानी ईपीएफ योजना, 1952 की जगह लागू हुई है।

नए नियमों में पीएफ सदस्यों को अपनी अलग-अलग जरूरतों के लिए अपने एलिजिबल बैलेंस का 100 प्रतिशत तक हिस्सा निकालने की इजाजत है। इसके अलावा एक नया नियम भी जोड़ा गया है। इस नियम के तहत अब हर सदस्य को अपने ईपीएफ खाते में एक न्यूनतम बैलेंस बनाए रखना अनिवार्य होगा।

क्या बदल रहा है निकासी का नियम?

नए नियमों के तहत ईपीएफ सदस्य आंशिक निकासी के लिए डेजिगनेटेड पोर्टल से ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। यहां जानना जरूरी है कि ये विड्रॉल एक जरूरी शर्त के अधीन होगा। योजना के नियमों के मुताबिक कमिश्नर निर्दिष्ट पोर्टल पर किसी सदस्य के आवेदन पर आंशिक निकासी को मंजूरी दे सकता है, जो कि सदस्य के खाते में न्यूनतम बैलेंस बनाए रखने की आवश्यकता के अधीन होगा। नई योजना में इस मिनिमम बैलेंस को पहली बार परिभाषित किया गया है।

क्या होता है Eligible Member Balance और Minimum Balance?

नोटिफिकेशन के मुताबिक मिनिमम बैलेंस का गणित कुछ इस तरह तय किया गया है। न्यूनतम बैलेंस का मतलब उस राशि से है जो सदस्य के खाते में जमा कुल योगदान (जिसमें कर्मचारी और कंपनी दोनों का हिस्सा और उस पर मिलने वाला ब्याज शामिल है) के 25 प्रतिशत के बराबर हो। किसी भी आंशिक निकासी का लाभ देने के बाद यह राशि सदस्य के खाते में अनिवार्य रूप से बची रहनी चाहिए। आसान शब्दों में कहें तो आपकी अब तक की कुल ईपीएफ बचत (आपका योगदान + कंपनी का योगदान + ब्याज) का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा विड्रॉल के बाद भी आपके खाते में ब्लॉक रहेगा।

इस अनिवार्य 25 प्रतिशत मिनिमम बैलेंस को घटाने के बाद जो रकम बचती है उसे एलिजिबल मेंबर बैलेंस कहा जाता है। कोई भी कर्मचारी सिर्फ इसी एलिजिबल मेंबर बैलेंस को ही खाते से निकाल सकता है।

1 साल के अंदर नौकरी छोड़ने पर क्या हैं नियम?

यह योजना उन कर्मचारियों को बड़ी राहत देती है जो अपनी नौकरी शुरू करने के 12 महीने पूरे होने से पहले ही काम छोड़ देते हैं। नए नियमों के मुताबिक कोई सदस्य 1 साल के अंदर भी नौकरी छोड़ देता है तो भी वह अपने पीएफ के पार्शियल विड्रॉल का हकदार होगा। हालांकि ऐसा सदस्य सिर्फ विड्रॉल की तारीख तक उपलब्ध अपने एलिजिबल मेंबर बैलेंस की सीमा तक ही पैसा निकाल सकेगा।

कब और किन जरूरतों के लिए निकाल सकते हैं 100% एलिजिबल बैलेंस?

ईपीएफ की कुल 12 महीने की सदस्यता पूरी करने के बाद, सदस्य अपनी अलग अलग व्यक्तिगत और पारिवारिक जरूरतों के लिए अपने एलिजिबल मेंबर बैलेंस का 100 प्रतिशत तक हिस्सा निकाल सकते हैं। इन जरूरतों में नीचे दी गई बातें शामिल हैं-

खुद या परिवार का इलाज

खुद या परिवार में शिक्षा

खुद या परिवार में शादी

घर या फ्लैट खरीदना

घर बनाने के लिए जमीन खरीदना

घर का निर्माण करना

होम लोन चुकाना

मौजूदा घर का रेनोवेशन/सुधार करना

इसके अलावा विशेष परिस्थितियों में भी 12 महीने की सदस्यता पूरी होने के बाद 100% एलिजिबल मेंबर बैलेंस निकालने की अनुमति दी जा सकती है।

कितनी बार निकाला जा सकता है पैसा?

नई योजना में इस बात की भी सीमा तय की गई है कि कोई सदस्य अपनी पूरी सदस्यता के दौरान अलग-अलग उद्देश्यों के लिए कितनी बार पैसा निकाल सकता है-

शिक्षा के लिए: पूरी सदस्यता के दौरान अधिकतम 10 बार विड्रॉल

शादी के लिए: पूरी सदस्यता के दौरान अधिकतम 5 बार विड्रॉल

घर/आवास संबंधी काम के लिए: अधिकतम 5 बार विड्रॉल।

विशेष परिस्थितियों में: एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 2 बार विड्रॉल।

क्यों जरूरी है मिनिमम बैलेंस का यह नया नियम?

इससे पहले लागू ईपीएफ निकासी के नियम अलग-अलग उद्देश्यों और अलग-अलग शर्तों से जुड़े होते थे जिसके कारण कई मामलों में सदस्य अपने खाते का अधिकांश बैलेंस निकाल लेते थे। नया फ्रेमवर्क एलिजिबल मेंबर बैलेंस की एक समान अवधारणा को लागू करके पूरे विड्रॉल प्रोसेस निकासी प्रक्रिया को स्टैंडराइज करता है। इसके साथ ही यह नियम यह भी सुनिश्चित करता है कि कर्मचारियों की रिटायरमेंट बचत का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा हमेशा इन्वेस्टेड रहे ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रहे।

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Totapuri Mango Price Crash: तोतापरी आम के दामों में भारी गिरावट की टेंशन! अब इसके लिए हाई लेवल कमेटी का ऐलान

आंध्र प्रदेश में तोतापरी आम की कीमतों में आई भारी गिरावट और इसके कारण किसानों के बीच पैदा हुए संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने इस समस्या के अध्ययन के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में आंध्र प्रदेश का दौरा किया था। इस दौरे के दौरान किसानों ने उनके सामने पिछले कुछ महीनों में तोतापरी आम की कीमतों में आई भारी गिरावट का मुद्दा उठाया था। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक किसानों ने बताया कि मुख्य रूप से प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के लिए उगाए जाने वाले इस आम के दाम गिरने से उनकी इनकम पर बहुत बुरा असर पड़ा है। किसानों की इसी चिंता को देखते हुए कृषि मंत्री ने कमेटी गठन करने का आदेश जारी किया।

वैल्यू चेन की पूरी समीक्षा करेगी वैज्ञानिकों की कमेटी

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के मुताबिक वैज्ञानिकों और संबंधित संस्थानों के प्रतिनिधियों को मिलाकर बनाई गई यह कमेटी तोतापरी आम की पूरी वैल्यू चेन की विस्तृत समीक्षा करेगी। इस समीक्षा के दायरे में नीचे दिए गए विषय शामिल होंगे-

तोतापरी आम की खेती

  • प्रोसेसिंग
  • मार्केटिंग
  • घरेलू व्यापार
  • निर्यात

इसके साथ ही यह पैनल किसानों की कमाई में सुधार करने और इस पूरे सेक्टर को एक टिकाऊ व मजबूत स्थिति में लाने के लिए जरूरी उपायों के सुझाव भी देगा।

डॉ टी दामोदरन संभालेंगे कमेटी की कमान

लखनऊ स्थित ICAR-केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान से जारी आदेश के मुताबिक इस उच्च स्तरीय समिति की कमान डॉ टी दामोदरन (निदेशक, ICAR-CISH) को सौंपी गई है। वही इसके अध्यक्ष होंगे। कमेटी में इनके अलावा डॉ. एम शंकरण, प्रमुख, फल फसल प्रभाग, ICAR-IIHR, बेंगलुरु, डॉ. एच एस सिंह, प्रधान वैज्ञानिक, ICAR-CISH, डॉ. डी श्रीनिवास रेड्डी, प्रोफेसर, कॉलेज ऑफ हॉर्टिकल्चर (अनंतराजुपेटा), डॉ. वाईएसआर हॉर्टिकल्चरल यूनिवर्सिटी, आंध्र प्रदेश के बागवानी निदेशक या उनके द्वारा नामित प्रतिनिधि शामिल होंगे।

10 दिनों के भीतर ग्राउंड जीरो पर जाएगी कमेटी

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कमेटी को निर्देश दिया है कि वे अगले 10 दिनों के भीतर आंध्र प्रदेश के प्रमुख तोतापरी उत्पादक क्षेत्रों का दौरा करें। ग्राउंड लेवल की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए कमेटी को किसानों, प्रोसेसर्स, निर्यातकों, राज्य के बागवानी अधिकारियों और किसान उत्पादक संगठनों के साथ सीधा परामर्श करने के लिए कहा गया है।

सरकार को सौंपी जाएगी विस्तृत रिपोर्ट

अपने फील्ड स्टडी और सभी पक्षों के साथ किए गए विचार-विमर्श के आधार पर यह कमेटी कृषि मंत्रालय को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपेगी। इस रिपोर्ट में कीमतों को स्थिर करने, वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देने, प्रोसेसिंग व एक्सपोर्ट क्षमता को मजबूत करने के लिए अहम सिफारिशें शामिल होंगी। इसके अलावा केंद्र और राज्य सरकार द्वारा मिलकर की जाने वाली संयुक्त कार्रवाई के लिए FPOs, प्रोसेसर्स और निर्यातकों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने का रोडमैप भी सुझाया जाएगा।

केंद्रीय मंत्री चौहान ने साफ तौर पर कहा है कि तोतापरी उत्पादकों की आय और उनकी आजीविका की रक्षा करना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। कमेटी की रिपोर्ट और निष्कर्षों के आधार पर किसानों की मदद करने, वैल्यू एडिशन को बढ़ाने और इस सेक्टर में निर्यात व निवेश के अवसरों का विस्तार करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे। आपको बता दें कि आंध्र प्रदेश में इस समय तेलुगु देशम पार्टी (TDP) की सरकार है। टीडीपी केंद्र और राज्य दोनों ही जगहों पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की एक बेहद महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टी है।

Ram Mandir: राम मंदिर दान विवाद के बीच ट्रस्ट के इस बैठक पर टिकी सबकी नजर, जानें पूरा समीकरण

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र अयोध्या का राम मंदिर चढ़ावे को लेकर उठे सवालों ने देश की राजनीति और धार्मिक जगत में हलचल मचा दी है। आरोप हैं कि राम मंदिर के दानपात्र में चढ़ाए गए करोड़ों रुपये के चंदे में गड़बड़ी हुई। अयोध्या में राम मंदिर के लिए मिले दान के इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों के बीच 6 जुलाई को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक होने जा रही है। इस बैठक को काफी अहम माना जा रहा है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद छोड़ने की पेशकश की है। माना जा रहा है कि इस बैठक में ट्रस्ट के आगे के कामकाज और भविष्य को लेकर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। क्योंकि ट्रस्ट की व्यवस्था ऐसी है कि कुछ स्थायी ट्रस्टियों के पास ही फैसले लेने का सबसे ज्यादा अधिकार होता है।

ट्रस्ट की शुरुआत कैसे हुई?

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन फरवरी 2020 में किया गया था। यह ट्रस्ट अयोध्या जमीन विवाद पर नवंबर 2019 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनाया गया। अदालत ने केंद्र सरकार को राम मंदिर के निर्माण और उसके संचालन के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया था। नई दिल्ली में हुई पहली बैठक में महंत नृत्य गोपाल दास को ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया गया। विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष चंपत राय को महासचिव और गोविंद गिरि महाराज को कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रधान सचिव और पूर्व आईएएस अधिकारी नृपेंद्र मिश्र को मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

ट्रस्ट में कौन-कौन सदस्य हैं?

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में कुल 10 स्थायी ट्रस्टी हैं। हालांकि, ट्रस्टी विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद एक पद अभी खाली है।

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  • महंत नृत्य गोपाल दास: वे ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और राम जन्मभूमि आंदोलन के सबसे वरिष्ठ संतों में गिने जाते हैं। उनकी तबीयत ठीक नहीं है और वे अस्पताल में भर्ती हैं। ऐसे में संभावना है कि 6 जुलाई की बैठक में वे शामिल नहीं हो पाएंगे।
  • चंपत राय: वे विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष और ट्रस्ट के महासचिव हैं। अगस्त 2020 में मंदिर निर्माण शुरू होने के बाद से ट्रस्ट के रोज़मर्रा के कामकाज और कई अहम फैसलों में उनकी प्रमुख भूमिका रही है।
  • डॉ. अनिल मिश्र: अयोध्या के होम्योपैथी डॉक्टर और ट्रस्ट के शुरुआती सदस्यों में से एक हैं। वे मंदिर से जुड़े प्रशासनिक कामकाज की जिम्मेदारी संभालते हैं।
  • गोविंद गिरि महाराज: पुणे के प्रसिद्ध संत हैं। वे ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष हैं और ट्रस्ट के आर्थिक व वित्तीय मामलों की देखरेख करते हैं।
  • स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती: प्रयागराज स्थित ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य हैं। वे ट्रस्ट से जुड़े प्रमुख धार्मिक नेताओं में शामिल हैं।
  • स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ जी महाराज: कर्नाटक के उडुपी स्थित पेजावर मठ के प्रमुख हैं और मध्व परंपरा के प्रमुख संतों में गिने जाते हैं।
  • युगपुरुष परमानंद गिरि महाराज: हरिद्वार के संत और आध्यात्मिक गुरु हैं। वे भी ट्रस्ट के महत्वपूर्ण सदस्यों में शामिल हैं।
  • महंत दिनेंद्र दास: वे अयोध्या के निर्मोही अखाड़े के वरिष्ठ संत हैं। राम जन्मभूमि विवाद के दौरान वे इस मामले के प्रमुख पक्षकारों में शामिल रहे थे।
  • कृष्ण मोहन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े कार्यकर्ता हैं। उन्हें ट्रस्ट में कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद सदस्य बनाया गया। कामेश्वर चौपाल उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने 1989 में प्रस्तावित राम मंदिर की पहली ईंट रखी थी।
  • खाली पद: अयोध्या के पूर्व शाही परिवार से जुड़े ट्रस्टी विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद ट्रस्ट में उनका पद अभी तक खाली है।

किसे वोट देने का अधिकार है और किसे नहीं?

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सिर्फ स्थायी ट्रस्टियों को ही वोट देने का अधिकार है। सरकारी प्रतिनिधियों सहित पांच पदेन सदस्य बैठकों में शामिल तो होते हैं, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं है। इसलिए वे मतदान के जरिए किसी फैसले को बदल या प्रभावित नहीं कर सकते। यही वजह है कि ट्रस्ट के बड़े फैसलों का अधिकार स्थायी ट्रस्टियों के पास ही होता है। नए ट्रस्टी को शामिल करना हो या ट्रस्ट के कामकाज में कोई बड़ा बदलाव करना हो, इसके लिए स्थायी ट्रस्टियों के बहुमत की मंजूरी जरूरी होती है।

क्या चंपत राय और अनिल मिश्र पद छोड़ने के बाद भी ट्रस्ट में रह सकते हैं?

हां, ऐसा हो सकता है। ट्रस्ट से जुड़े लोगों के अनुसार, स्थायी ट्रस्टी को हटाने का कोई नियम नहीं है। अगर चंपत राय महासचिव का पद छोड़ देते हैं और अनिल मिश्र अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियां छोड़ देते हैं, तब भी वे ट्रस्ट के स्थायी सदस्य बने रहेंगे। वे तभी ट्रस्ट से बाहर होंगे, जब खुद अपना इस्तीफा देंगे। इसी वजह से 6 जुलाई की बैठक को काफी अहम माना जा रहा है। ट्रस्ट में एक स्थायी पद पहले से खाली है और अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास की तबीयत खराब होने के कारण उनके बैठक में शामिल होने की संभावना भी कम है। ऐसे में बैठक में वोट देने वाले सक्रिय सदस्यों की संख्या सीमित रह सकती है।

आमंत्रित सदस्य कौन हैं और उनकी क्या भूमिका होती है?

ट्रस्ट में कुछ आमंत्रित सदस्य भी हैं। ये लोग बैठकों में शामिल होते हैं और अपनी राय रखते हैं, लेकिन उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं होता। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारी सुरेश ‘भैयाजी’ जोशी और विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी दिनेश चंद्र शामिल हैं। इसके अलावा कर्नाटक से विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी गोपाल नागरकट्टे भी आमंत्रित सदस्य हैं। वे जनवरी 2021 से राम मंदिर के निर्माण और दूसरे सिविल कार्यों की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि, आमंत्रित सदस्य चर्चा में हिस्सा ले सकते हैं और अपने सुझाव दे सकते हैं, लेकिन ट्रस्ट के किसी भी फैसले पर वोट नहीं दे सकते।

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग के सामने रखी जाएंगी ये 5 बड़ी शर्तें, नए पे स्केल के इंतजार में बैठे कर्मचारियों के लिए आया अपडेट

8th Pay Commission: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन, पेंशन और सेवा से जुड़े सुधारों को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। भारत सरकार का आठवां केंद्रीय वेतन आयोग देशव्यापी दौरों और हितधारकों से बातचीत के अपने अजेंडे के तहत 6 और 7 जुलाई को ओडिशा का दौरा करने जा रहा है। वित्त मंत्रालय की एक ऑफिशियल नोटिस के मुताबिक आयोग ने उन सभी केंद्र सरकार के संगठनों, संस्थानों, एसोसिएशनों और यूनियनों को ऑनलाइन अपॉइंटमेंट लेने के लिए आमंत्रित किया है जो भुवनेश्वर दौरे के दौरान इस पैनल से बातचीत करने में रुचि रखते हैं। इस बीच कॉन्फेडरेशन ऑफ सेंट्रल गवर्नमेंट एम्प्लाइज एंड वर्कर् के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में 8वें वेतन आयोग से मुलाकात की और केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए 69000 रुपये सैलरी की मांग करते हुए एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है।

क्या है फिटमेंट फैक्टर का पूरा गणित?

यूनियन ने नए पे स्केल के तहत 3.83 फिटमेंट फैक्टर को लागू करने की जोरदार मांग की है। फिटमेंट फैक्टर वह मल्टीप्लायर है जिसका इस्तेमाल नया वेतन आयोग लागू होने पर कर्मचारियों के मूल वेतन को संशोधित करने के लिए किया जाता है। यूनियन के इस प्रस्ताव के तहत अगर 3.83 का फिटमेंट फैक्टर मंजूर हो जाता है तो वर्तमान न्यूनतम मूल वेतन 18000 से बढ़कर सीधे लगभग 69000 रुपये हो जाएगा।

वेतन आयोग के सामने रखी गईं ये 5 बड़ी शर्तें

कर्मचारी संगठन ने वेतन आयोग के सामने न्यूनतम वेतन और फिटमेंट फैक्टर के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण शर्तें और मांगें रखी हैं-

1- ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की बहाली

प्रतिनिधित्व कर रहे कर्मचारी संगठन ने वर्तमान व्यवस्था को हटाकर पुरानी पेंशन योजना को फिर से बहाल करने की बड़ी मांग सामने रखी है।

2- हाउस रेंट अलाउंस (HRA) में भारी बढ़ोतरी

शहरों की कैटिगरी के आधार पर हाउस रेंट अलाउंस की दरों को बढ़ाकर 40%, 35% और 30% करने की मांग की गई है। इसके साथ ही हाउस बिल्डिंग एडवांस और कंप्यूटर लोन जैसे कल्याणकारी एडवांस को भी दोबारा शुरू करने की बात कही गई है।

3- वेतन विसंगतियों को दूर करना और फाइनेंशियल अपग्रेडेशन

वेतन विसंगतियों को दूर करने के लिए पे लेवल्स का रेशनलाइजेशन किया जाए। इसके अलावा कर्मचारियों के पूरे सर्विस पीरियडके दौरान पांच फाइनेंशियल अपग्रेडेशन दिए जाएं।

4- स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से CGHS और ECHS के तहत व्यापक स्वास्थ्य देखभाल कवरेज के विस्तार की मांग रखी गई है।

5- संविदा और आकस्मिक कर्मचारियों के लिए नीतियां

सामाजिक सुरक्षा को और व्यापक बनाने के साथ-साथ संविदात्मक और आकस्मिक श्रमिकों के लिए नियमितीकरण नीतियों को लागू करने की मांग की गई है।

1 करोड़ से अधिक कर्मचारियों-पेंशनभोगियों पर पड़ेगा असर

8वां वेतन आयोग वर्तमान में देश भर के हितधारकों से लगातार फीडबैक और सुझाव जुटा रहा है। इस पैनल द्वारा दी जाने वाली सिफारिशों का सीधा असर देश के लगभग 50 लाख केंद्र सरकार के कर्मचारियों और करीब 65 लाख पेंशनभोगियों के भविष्य पर पड़ेगा।

JEE-NEET Exam: बदलने वाला है जेईई-नीट में दाखिले का तरीका, 12वीं के नंबरों को मिल सकता है 50% वेटेज

JEE-NEET Exam: जेईई और नीट परीक्षा के लिए तैयारी करने वाले छात्रों को सरकार के इस फैसले से काफी राहत मिल सकती है। सरकार देश में मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की तैयारी कर रही है। इसके तहत आने वाले समय में जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षा की मेरिट लिस्ट में 12वीं कक्षा के नंबरों की निर्णायक भूमिका हो सकती है। बोर्ड के नंबरों को मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए 50% वेटेज दिया जा सकता है। समझा जा रहा है, इस कदम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों पर प्रदर्शन का दबाव कम होगा और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो सकेगी।

केंद्र सरकार ने पिछले साल शिक्षा मंत्रालय के तहत 9 सदस्यों की एक समिति का गठन किया था। इसे कोचिंग पर लगातार बढ़ती निर्भरता और डमी स्कूलों के चलन पर निगरानी के लिए किया गया था। ये समिति अब जेईई-नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षा के जरिए मेडिकल-इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश की व्यवस्था में संभावित सुधारों की समीक्षा कर रही है। इस समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद केंद्र सरकार अंतिम निर्णय लेगी। उम्मीद है कि आने वाले हफ्तों में यह रिपोर्ट सरकार को सौंप दी जाएगी।

अभी जहां, मेडिकल में प्रवेश लेने वाले स्टूडेंट्स को नीट यूजी परीक्षा देनी होती है। वहीं, इंजीनियरिंग के लिए स्टूडेंट्स जेईई देते हैं। इन एंट्रेंस एग्जाम में मिले स्कोर और कट-ऑफ मार्क्स के आधार पर पाठ्यक्रमों में प्रवेश दिया जाता है। हालांकि, छात्रों को मेडिकल-इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने के लिए मिनिमम क्वालिफाइंग क्राइटेरिया भी पूरा करना होता है।

नीट और जेईई में बड़े बदलाव की तैयारी

यह प्रस्ताव पूरे देश में परीक्षा में गड़बड़ियों को लेकर बार-बार उठ रही चिंताओं के बाद आया है। मूल्यांकन की गलतियों और कथित पेपर लीक ने मौजूदा प्रवेश व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अब ऐसे तरीकों की जांच की जा रही है, जिनसे निष्पक्षता में सुधार हो सके और लोगों का भरोसा मजबूत हो सके। न्यूज एजेंसी पीटीआई को सूत्रों के हवाले से ये जानकारी मिली है। सूत्रों ने बताया, “जिन बदलावों पर विचार किया जा रहा है, उनमें एडमिशन या मेरिट लिस्ट तैयार करने में बोर्ड के नंबरों को 50% वेटेज देना, कोचिंग सेंटरों पर छात्रों की निर्भरता कम करने के लिए प्रवेश परीक्षाओं के सिलेबस को स्कूल के सिलेबस से बेहतर तरीके से जोड़ना, परीक्षा के लिए कई मौके देना और धीरे-धीरे कंप्यूटर आधारित ऑन-डिमांड टेस्ट की तरफ बढ़ना शामिल है।

सूत्रों ने कहा कि प्रस्ताव सिर्फ एक परीक्षा पर निर्भरता कम करने की कोशिश करता है। छात्रों को शैक्षिक प्रदर्शन के आकलन से फायदा हो सकता है। प्रवेश के दौरान बोर्ड परीक्ष के रिजल्ट भी उतने ही महत्वपूर्ण हो सकते हैं। प्रवेश परीक्षा का रोल अहम बना रहेगा, लेकिन उनका ओवरऑल असर तुलना में कम हो सकता है।

अभी क्या है प्रवेश व्यवस्था

अभी, मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रोग्राम में प्रवेश मुख्य रूप से प्रवेश परीक्षा के स्कोर के आधार पर होता है। छात्रों को बोर्ड एग्जाम में क्वालिफाइंग मार्क्स लाने होते हैं। वे बोर्ड मार्क्स अभी फाइनल एडमिशन मेरिट के बजाय एलिजिबिलिटी तय करते हैं। प्रस्तावित बदलाव इस लंबे समय से चले आ रहे एडमिशन फ्रेमवर्क को बदल सकते हैं। अगर इसे लागू किया जाता है, तो एकेडमिक कंसिस्टेंसी और एंट्रेंस परफॉर्मेंस, दोनों ही सिलेक्शन पर असर डालेंगे।

School Holidays: कई राज्यों में मौसम की मार से बच्चों की पढ़ाई पर असर, कहीं बंद करना पड़ रहा स्कूल तो कहीं बदला समय

देश में 80 करोड़ से ज्यादा लोगों को मिलने वाले फ्री राशन का चावल बदल गया, इसे लेकर हो गया फाइनल फैसला

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के तहत मुफ्त राशन पाने वाले देश के 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों के लिए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया है। आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने राशन में दिए जाने वाले चावल की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए एक बड़े सुधार को मंजूरी दे दी है। लगभग तीन दशकों में पहली बार सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत आपूर्ति किए जाने वाले चावल के क्वालिटी स्पेसिफिकेशन्स में संशोधन किया है। इस फैसले के बाद अब लाभार्थियों को उनके मौजूदा कोटे में बिना किसी कटौती के, बहुत कम टूटे हुए दानों वाला बेहतर और उच्च गुणवत्ता का चावल दिया जाएगा।

चावल के नियमों में क्या हुआ बदलाव?

मंजूर की गई नई नीति के तहत राशन के चावल में टूटे हुए दानों के प्रतिशत को भारी मात्रा में घटा दिया गया है। पीएमजीकेएवाई के तहत मिलने वाले कच्चे चावल में अब टूटे हुए दानों की मात्रा अधिकतम 10% तक ही हो सकेगी। अब तक इसके लिए अधिकतम 25% की सीमा तय थी। उबले हुए चावल में अब टूटे हुए दानों की मात्रा अधिकतम 5% तक ही होगी जबकि पहले इसकी मौजूदा सीमा 16% तक निर्धारित थी।

खरीफ सीजन 2027-28 तक चरणबद्ध तरीके से होगा लागू

बेहतर गुणवत्ता वाले इस चावल की खरीद तुरंत शुरू कर दी जाएगी। सभी धान खरीद वाले राज्यों में इसे खरीफ विपणन सीजन (KMS) 2027-28 तक चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा। इसी तरह लाभार्थियों के बीच इस सुधारे गए चावल का वितरण भी चरणबद्ध तरीके से होगा ताकि सभी राज्यों में यह बदलाव सुचारू रूप से लागू हो सके।

80 करोड़ लाभार्थियों को क्या होगा फायदा?

सरकार का दावा है कि इस फैसले से 80 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को मिलने वाले अनाज की गुणवत्ता में बड़ा सुधार होगा। लाभार्थियों को ऐसा चावल मिलेगा जिसके दाने साबुत और बेहतर होंगे, दिखने में अच्छे होंगे और जिन्हें उपभोक्ता आसानी से पसंद कर सकेंगे। मिलिंग के दौरान निकलने वाले टूटे हुए चावल को अलग कर दिया जाएगा और उसका इस्तेमाल दूसरे उत्पादक और औद्योगिक काम में किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सिर्फ बेस्ट कैटिगरी का खाने योग्य चावल ही गरीबों तक पहुंचे।

सरकार को सालाना 2161 करोड़ की होगी बचत

सरकार के दावे के मुताबिक इस नीतिगत सुधार से राशन प्रबंधन की परिचालन दक्षता बढ़ेगी और सरकार को भारी वित्तीय बचत होगी। टूटे हुए चावल की नीलामी सीधे मिलर्स के परिसरों से की जाएगी। इससे परिवहन, भंडारण, और हैंडलिंग की लागत कम होगी। टूटे चावल को एचडीपीई बैगों में स्टोर किया जाएगा, जिससे जूट के बोरों की आवश्यकता कम होगी। इन सब बदलावों से लॉजिस्टिक्स, स्टोरेज और पैकेजिंग की लागत घटने से सरकार को सालाना लगभग 2161 करोड़ रुपये की बचत होगी। इसके साथ ही टूटे चावल की बिक्री से अतिरिक्त राजस्व भी जेनरेट होगा। इससे खाद्य सब्सिडी का बोझ कम करने में मदद मिलेगी।

कई राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट रहा सफल

कैबिनेट से मंजूरी मिलने से पहले इस योजना को देश के कई राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर परख लिया गया है। हरियाणा, आंध्र प्रदेश, पंजाब, ओडिशा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में इसका सफल क्रियान्वयन किया गया। इससे साबित हुआ कि बड़े पैमाने पर इस बेहतर क्वालिटी के चावल का उत्पादन व्यावहारिक रूप से संभव है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत तैयार किए गए इस बेहतर चावल की आपूर्ति भी अब लाभार्थियों को की जाएगी।

राशन प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाएगा QR-Code

राशन वितरण प्रणाली में किसी भी तरह की गड़बड़ी या लीकेज को रोकने के लिए तकनीक का सहारा लिया जाएगा। चावल के बोरों पर क्यूआर-कोड टैगिंग की जाएगी। इस क्यूआर-कोड की मदद से पूरी सप्लाई चेन में चावल के मूवमेंट को शुरू से अंत तक ट्रैक किया जा सकेगा। इससे सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और इन्वेंट्री मैनेजमेंट को मजबूती मिलेगी। सरकार का कहना है कि उसने हर पात्र परिवार के लिए खाद्य सुरक्षा निश्चित करने के बाद अब गुणवत्ता के साथ खाद्य सुरक्षा हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। दावा किया जा रहा है कि इस ऐतिहासिक फैसले से गरीब परिवारों को सम्मान के साथ बेहतर गुणवत्ता का अनाज मिल सकेगा।

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Stock Market News: जून तिमाही में रिटेल निवेशकों ने इक्विटी में की जोरदार खरीदारी, बाजार में लगाए 35,328 करोड़ रुपये

Stock Market News: कई महीनों तक किनारा बनाए रहने के बाद,रिटेल निवेशक भारतीय इक्विटी मार्केट में वापस लौट रहे हैं। जून तिमाही में इनकी खरीदारी में तेजी देखने को मिली है। यह लंबे समय तक सावधानी बरतने के बाद निवेशकों की सोच में आए बदलाव का संकेत है। NSE के डेटा के मुताबिक रिटेल निवेशकों ने जून में 14,088 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। इसी तरह इनकी तरफ से मई में 3,018 करोड़ रुपये और अप्रैल में 18,222 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे गए। पूरी जून तिमाही की बात करें तो उनकी कुल खरीदारी 35,328 करोड़ रुपये रही। यह दिसंबर 2024 की तिमाही के बाद उनकी सबसे बड़ी तिमाही खरीदारी है। दिसंबर तिमाह में उन्होंने लगभग 56,126 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे थे।

जून तिमाही में विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बावजूद रिटेल निवेशकों की तरफ से जमकर खरीदारी हुई।

2025 की शुरुआत से ही रिटेल निवेशक बाजार से दूरी बनाए हुए थे। उन्होंने 2025 में 25,615 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे। जबकि 2026 के शुरुआती तीन महीनों में उन्होंने सिर्फ 2,750 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे थे।

SMC ग्लोबल सिक्योरिटीज में फंडामेंटल रिसर्च के हेड,सौरभ जैन ने कहा कि यह खरीदारी सट्टेबाजी के लिए गिरावट पर की गई खरीदारी नहीं है,बल्कि यह साइड में पड़ी पूंजी का रणनीतिक और मैक्रो-आधारित निवेश है। ब्रॉडर मार्केट के हालात भी इस नजरिए का सपोर्ट करते हैं।

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अप्रैल-जून तिमाही के दौरान,सेंसेक्स और निफ्टी में 6.3 प्रतिशत और 6.9 प्रतिशत की बढ़त हुई,जो पिछले चार तिमाहियों में उनकी सबसे बड़ी तिमाही बढ़त है। इस दौरान मेन इंडेक्स के मुकाबले ब्रॉडर मार्केट का प्रदर्शन बेहतर रहा। इस अवधि में BSE 150 मिडकैप इंडेक्स 16.7 प्रतिशत बढ़ा,जो जून 2024 के बाद की इसकी सबसे बड़ी तिमाही बढ़त रही।

छोटे-मझोले शेयरों में अच्छी खरीदारी

छोटे-मझोले शेयरों में अच्छी खरीदारी देखने को मिली। इसके चलते BSE 250 स्मॉलकैप इंडेक्स में 24.5% की बढ़त हुई,जो जून 2020 के बाद से इसका सबसे अच्छा तिमाही प्रदर्शन रहा। BSE 250 माइक्रोकैप इंडेक्स भी 30% उछला,जो मार्च 2025 में इंडेक्स के शुरू होने के बाद से इसकी सबसे बड़ी तिमाही बढ़त है। जून तिमाही के दौरान BSE पर लिस्टेड सभी कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइज़ेशन 15% बढ़ा।

जैन ने आगे कहा कि फरवरी के आखिर में शुरू हुई मिडिल-ईस्ट जंग और उसके चलते तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई के डर से निवेशकों का भरोसा शुरू में कमजोर हुआ था,लेकिन जून के मध्य में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते ने एक बड़ी राहत का काम किया। इससे ब्रेंट क्रूड की कीमत चार महीने के निचले स्तर $72 पर आ गई और एनर्जी शॉक प्रीमियम का असर भी कम हुआ।

बाजार को मिला पॉलिसी सपोर्ट

उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया और केंद्र सरकार के 5 जून के बड़े पॉलिसी पैकेज से इस जियोपॉलिटिकल तनाव के असर को कम करने में काफी मदद मिली। इस पैकेज में FPI बॉन्ड निवेश पर लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स और विदहोल्डिंग टैक्स को हटाना,’फुल्ली एक्सेसिबल रूट’का विस्तार करना और लॉन्ग-टर्म FCNR फिक्स्ड डिपॉजिट व NRI इक्विटी निवेश के लिए बेहतर इंसेंटिव देना शामिल है।

उन्होंने आगे कहा कि इस पॉलिसी सपोर्ट ने FII की निकासी को रोका,रुपये को स्थिर किया और मैक्रो रिस्क को कम किया। इससे रिटेल निवेशकों को यह भरोसा मिला कि वे मार्केट में गिरावट(करेक्शन)का इस्तेमाल एंट्री के अच्छे मौकों के तौर पर कर सकते हैं और अपने कैश रिजर्व को व्यवस्थित तरीके से इक्विटी में फिर से लगा सकते हैं।

FIIs रहे नेट सेलर

बाजार जानकारों का कहना है कि इस तिमाही के ज्यादातर हिस्से में FIIs नेट सेलर बने रहे। उनकी बिकवाली मुख्य वजह ग्लोबल मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर रहे। इसमें US बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी,कच्चे तेल की ऊंची कीमतें,जियो-पॉलिटिकल अनिश्चितताएं और ग्लोबल स्तर पर रिस्क-ऑफ का माहौल शामिल है। यह भारत के घरेलू मार्केट के फंडामेंटल्स में किसी खराबी के बजाय ग्लोबल एसेट एलोकेशन में बदलाव को दिखाता है।

विदेशी निवेशकों की निकासी को घरेलू निवेशकों ने किया बेअसर

घरेलू निवेशकों से मिले जबरदस्त सपोर्ट के चलते विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बावजूद,भारतीय बाजार मजबूत बने रहे। म्यूचुअल फंड SIP के जरिए लगातार निवेश,घरेलू संस्थागत निवेशकों की जोरदार खरीदारी और रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी ने FII की बिकवाली से बनी सप्लाई को संभाल लिया। इससे बाजार में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई और बाजार का ओवरऑल तेजी वाला ढांचा कायम रहा।

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हर गिरावट के बाद ज्यादा ट्रेडिंग वॉल्यूम के साथ बाजार में आई मजबूत रिकवरी

चॉइस ब्रोकिंग में टेक्निकल एनालिस्ट आकाश शाह का कहना है कि भले ही बेंचमार्क इंडेक्स में काफी उतार-चढ़ाव रहा, लेकिन कई लार्ज-कैप और अच्छे मिड-कैप शेयरों ने अपने लॉन्ग-टर्म सपोर्ट लेवल (जैसे 100 डे और 200 डे मूविंग एवरेज) को बनाए रखा। हर गिरावट के बाद ज्यादा ट्रेडिंग वॉल्यूम के साथ बाजार में मजबूत रिकवरी आई, जो इस बात का संकेत है कि निवेशक शेयर जमा (accumulate) कर रहे हैं,न कि बड़े पैमाने पर बेच रहे हैं। यह एक ऐसा प्राइस पैटर्न है जिसे आम तौर पर टेक्निकल नज़रिए से अच्छा माना जाता है।

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El Nino को लेकर केंद्र सरकार अलर्ट, PM मोदी ने मंत्रालयों को आपात योजना बनाने के दिए निर्देश

देश के कई हिस्सों में कमजोर मानसून और बारिश की बढ़ती कमी को लेकर चिंता के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी संबंधित मंत्रालयों को ‘अल नीनो’ (El Nino) के संभावित असर से निपटने के लिए आपातकालीन योजनाओं के साथ तैयार रहने का निर्देश दिया है।

सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने हाल ही में भारत पर ‘अल नीनो’ के संभावित असर का आकलन करते हुए यूरोप में बढ़ते तापमान जैसी चरम मौसम की घटनाओं के प्रभावों की समीक्षा की। बता दें कि यह समीक्षा केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान ऐसे समय में की गई है, जब देश के कई इलाकों में बारिश में 40% से अधिक की कमी देखी जा रही है।

सूत्रों ने बताया कि, प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रालयों से कहा है कि वे मानसून की बदलती स्थिति पर बारीकी से नजर रखें और खेती, जल संसाधनों, बिजली आपूर्ति और अन्य अहम क्षेत्रों पर पड़ने वाले किसी भी बुरे असर से निपटने के लिए तैयारी सुनिश्चित करें।

बारिश के पैटर्न में हो सकते हैं बदलाव

वहीं, सरकार का आकलन है कि अल नीनो के कारण बारिश के पैटर्न में बड़े बदलाव हो सकते हैं। कुछ इलाकों में बहुत कम बारिश हो सकती है, जबकि कुछ अन्य इलाकों में बहुत ज्यादा बारिश हो सकती है, जिससे बाढ़ और पानी की कमी का खतरा एक साथ बढ़ सकता है।

फिलहाल, तैयारी को मजबूत करने के लिए, जल शक्ति, कृषि, बिजली, रेलवे और अन्य अहम विभागों सहित कई मंत्रालयों को अपने-अपने सेक्टर के हिसाब से आपातकालीन योजनाएं बनाने का निर्देश दिया गया है।

सूत्रों ने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री मोदी साल की शुरुआत से ही नियमित बैठकों के जरिए देश की ‘अल नीनो’ से निपटने की तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं।

इसके अलावा, बदलते हालात पर लगातार नजर रखने के लिए 10 मंत्रालयों के प्रतिनिधियों वाला एक अंतर-मंत्रालयी समूह भी बनाया गया है। गृह मंत्रालय इस समूह के लिए नोडल मंत्रालय के तौर पर काम करेगा और अलग-अलग विभागों के बीच तैयारी और उससे निपटने के उपायों में तालमेल बिठाएगा।

समीक्षा के दौरान, प्रधानमंत्री ने एक बार फिर कहा कि El Nino से पैदा होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए “पूरी सरकार मिलकर काम करे” और सभी विभाग मिलकर समन्वय में काम करें।

बता दें कि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है कि जुलाई में औसत से कम बारिश होने की संभावना है। यह अनुमान तब आया है जब जून 2026, 1901 के बाद से भारत का पांचवां सबसे सूखा जून रहा। इस दौरान देश में बारिश लंबे समय के औसत से 39% कम दर्ज की गई। इससे पहले मौसम विभाग ने अनुमान लगाया था कि जून में मानसून की बारिश सामान्य औसत से 92% से भी कम रह सकती है।

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WhatsApp के यूजरनेम फीचर पर सरकार सख्त! लॉन्च रोकने का आदेश, मेटा से 3 दिन में मांगा जवाब : सूत्र

भारत में लोकप्रिय सोशल मैसेजिंग ऐप WhatsApp के प्रस्तावित यूजरनेम फीचर को लेकर केंद्र सरकार ने Meta को नोटिस भेजा है। साथ ही साफ निर्देश दिया है कि जब तक इस मामले पर सरकार की सलाह-मशविरा प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को भारत में लॉन्च न किया जाए। सरकारी सूत्रों ने Moneycontrol को यह जानकारी दी है।

तीन दिन में मांगा जवाब

सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने Meta से इस फीचर को लेकर तीन दिनों के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है। कंपनी को बताना होगा कि यह फीचर कैसे काम करेगा। साथ ही, इससे जुड़े सुरक्षा और अन्य पहलुओं को कैसे संभाला जाएगा।

WhatsApp का यूजरनेम फीचर क्या है?

WhatsApp यूजर्स नए फीचर के आने के बाद अपना एक यूनिक यूजरनेम बना सकेंगे। इसके जरिए लोग बिना मोबाइल नंबर साझा किए भी एक-दूसरे से संपर्क कर सकेंगे। WhatsApp ने पहले कहा था कि इस साल फीचर के बड़े रोलआउट से पहले यूजर्स को अपना यूनिक यूजरनेम रिजर्व करने का विकल्प मिलेगा। अभी WhatsApp पर सभी यूजर्स के लिए मोबाइल नंबर साझा करना अनिवार्य रहता है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि Meta को साफ तौर पर कहा गया है कि जब तक सरकार की परामर्श प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फीचर को भारत में लॉन्च नहीं किया जाएगा।

सरकार को किस बात की चिंता?

सरकार इस फीचर के असर की जांच कर रही है। खास तौर पर यह देखा जा रहा है कि यूजरनेम के जरिए लोगों की पहचान की पुष्टि कैसे होगी और प्लेटफॉर्म की सुरक्षा पर इसका क्या असर पड़ेगा।

हाल की रिपोर्टों में भी कहा गया था कि सरकार इस बात की जांच कर रही है कि कहीं इस फीचर का इस्तेमाल फर्जी पहचान बनाकर लोगों को धोखा देने या दूसरे तरह के दुरुपयोग के लिए तो नहीं किया जा सकता।

WhatsApp में आ रहा है ये खास फीचर, अब बिना नंबर के होगी चैट