दशहरा 2026 वाहन पूजा मुहूर्त: कार और बाइक पूजा का सबसे शुभ समय, नोट कर लें सही विधि

आज 20 अक्टूबर को देश भर में दशहरा यानी विजयादशमी मनाई जा रही है। आज के दिन भगवान राम ने रावण पर जीत हासिल की थी। दशहरे पर नई गाड़ी खरीदना और अपनी कार-बाइक की पूजा करना बहुत शुभ माना जाता है। कहते हैं इससे सफर सुरक्षित रहता है। अगर आप भी आज अपनी गाड़ी की पूजा करने वाले हैं तो शुभ मुहूर्त और पूजा की विधि यहाँ जान लें।

कार या बाइक की पूजा इस तरह करें

पंचांग के अनुसार आज पूजा के लिए ये समय शुभ है:

  • विजय मुहूर्त: दोपहर 1:59 से 2:45 बजे तक
  • अपराह्न मुहूर्त: दोपहर 1:14 से 3:30 बजे तक
  • दशमी तिथि: 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 से 21 अक्टूबर दोपहर 2:11 बजे तक

ध्यान दें, हर शहर के पंचांग में समय थोड़ा अलग हो सकता है, इसलिए अपने शहर का समय जरूर देख लें।

पूजा के लिए रखें ये सामग्री

पूजा के लिए ये सामान पहले से तैयार रख लें।

  • रोली, कुमकुम, हल्दी
  • अक्षत यानी साबुत चावल
  • फूल और गेंदे की माला
  • धूप और घी का दीया
  • मौली या कलावा
  • नारियल, नींबू
  • फल या मिठाई का प्रसाद

कार-बाइक की पूजा कैसे करें?

  1.  सबसे पहले अपनी गाड़ी को अच्छे से धोकर साफ करें।
  2.  गाड़ी को साफ और खुली जगह पर खड़ा करें।
  3.  भगवान गणेश को याद करके पूजा शुरू करें।
  4.  गाड़ी के आगे रोली से स्वस्तिक बनाएं और टायरों पर तिलक लगाएं।
  5.  गाड़ी पर फूल-अक्षत चढ़ाएं और माला लगाएं। चाबी या हैंडल पर मौली बांध दें।
  6.  धूप-दीया जलाकर आरती करें और प्रसाद चढ़ाएं।

कुछ लोग नजर उतारने के लिए नींबू का भी इस्तेमाल करते हैं, पर ये जरूरी नहीं है।

दशहरे पर गाड़ी की पूजा क्यों करते हैं?

दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार है। इसलिए इस दिन नई चीजों की शुरुआत शुभ मानी जाती है। इसी वजह से लोग इस दिन गाड़ी और अपने काम के औजारों की पूजा करते हैं।

रावण दहन का समय

आज शाम रावण दहन का शुभ समय 5:47 से 8:21 बजे तक है। इसमें 5:47 से 6:12 बजे तक का समय सबसे अच्छा माना गया है। आपके शहर में रावण दहन का समय स्थानीय आयोजन के हिसाब से अलग हो सकता है।

सरकार का बड़ा फैसला: गन्ने के रस और चीनी से एथेनॉल बनाने पर रोक, समझिए वजह

Sugarcane Ethanol Ban: केंद्र सरकार ने एथेनॉल खरीदने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब सरकारी तेल कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, शुगर सिरप और बी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल की खरीद नहीं कर सकेंगी। सरकार ने एथेनॉल बनाने के लिए चीनी के इस्तेमाल को शून्य करने का निर्देश दिया है। यह नियम 1 नवंबर 2026 से शुरू होने वाले नए सप्लाई वर्ष में लागू होगा।

सरकार का मकसद देश में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना है। साथ ही, चीनी की कीमतों पर दबाव कम करना भी इस फैसले की वजह है। इसके लिए सरकारी तेल कंपनियों ने करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने का टेंडर जारी किया है।

1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदेंगी तेल कंपनियां

इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, मैंगलोर रिफाइनरी और नुमालीगढ़ रिफाइनरी ने मिलकर यह टेंडर जारी किया है। इसके तहत 1 नवंबर 2026 से 31 अक्टूबर 2027 तक एथेनॉल की सप्लाई होनी है।

नए नियमों के मुताबिक, कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, शुगर सिरप और बी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल के लिए बोली नहीं मांगेंगी। हालांकि, दूसरे कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद जारी रहेगी।

मक्का और चावल से बने एथेनॉल की कीमत कितनी?

सरकार ने अलग-अलग कच्चे माल से बने एथेनॉल की बेस कीमत भी तय की है। मक्का से बने एथेनॉल की कीमत ₹66.07 प्रति लीटर रखी गई है। इसके अलावा ₹2.79 प्रति लीटर का अतिरिक्त प्रोत्साहन भी मिलेगा।

खराब खाद्यान्न से बने एथेनॉल की बेस कीमत ₹64 प्रति लीटर तय की गई है। भारतीय खाद्य निगम (FCI) से मिलने वाले अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल के लिए ₹60.32 प्रति लीटर की दर रखी गई है। वहीं, सी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल की कीमत ₹57.97 प्रति लीटर होगी।

इन दरों में GST और परिवहन का खर्च शामिल नहीं है। ये खर्च अलग से देना होगा। राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत मंजूर दूसरे कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद टेंडर में लागू सबसे कम दर पर होगी।

चार चरणों में होगी एथेनॉल की सप्लाई

एथेनॉल की सप्लाई को चार हिस्सों में बांटा गया है। पहला चरण नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक होगा। दूसरा फरवरी से अप्रैल 2027, तीसरा मई से जुलाई 2027 और चौथा अगस्त से अक्टूबर 2027 तक चलेगा।

हालांकि, चौथे चरण में FCI से मिलने वाले अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल की सप्लाई के लिए दिए गए प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

कोर्ट के फैसले के हिसाब से बदल सकता है आवंटन

टेंडर में एथेनॉल के आवंटन को लेकर एक शर्त भी रखी गई है। पहली तिमाही में होने वाला आवंटन कुछ लंबित कानूनी मामलों के फैसले पर निर्भर करेगा। ये मामले तेल कंपनियों के बीच एथेनॉल बांटने के तरीके से जुड़े हैं।

कंपनियों ने कहा है कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक आवंटन में बदलाव किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर आवंटन घटाया जा सकता है या पूरी तरह रद्द भी किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में कंपनियां सप्लायर को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं होंगी।

दूसरी कंपनी से खरीदकर एथेनॉल नहीं बेच सकेंगे सप्लायर

टेंडर में सप्लायर के लिए भी नियम तय किए गए हैं। उन्हें मंजूर कच्चे माल से एथेनॉल अपनी ही रजिस्टर्ड या स्वीकृत डिस्टिलरी में बनाना होगा।

कोई सप्लायर किसी तीसरे पक्ष से एथेनॉल खरीदकर सरकारी तेल कंपनियों को नहीं बेच सकेगा। ये सभी नियम 2026-27 के सप्लाई वर्ष के लिए जारी टेंडर पर लागू होंगे। नया सप्लाई वर्ष 1 नवंबर 2026 से शुरू होगा।

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Amitabh Bachchan: दिल्ली HC ने अमिताभ बच्चन के पर्सनैलिटी राइट्स मामले में दिया बड़ा निर्देश, कहा- व्यक्तिगत रूप से पेश हों एक्टर

Amitabh Bachchan: अमिताभ बच्चन के पर्सनैलिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकारों) से जुड़े मामले में एक नया मोड़ आया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बिग बी से कहा है कि अगर वह इस केस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें खुद कोर्ट में पेश होना होगा। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव की बेंच ने अमिताभ बच्चन और दूसरे पक्षों को 16 नवंबर तक अपना समझौता फाइनल करने का समय दिया है।

यह निर्देश तब दिया गया जब उन्होंने कोर्ट को बताया कि वे कुछ प्रतिवादियों (डिफेंडेंट्स) के साथ किसी समझौते पर पहुंच गए हैं। 2022 में कोर्ट ने एक ‘एक्स-पार्टे’ (एकतरफा) आदेश के जरिए अमिताभ बच्चन के पर्सनैलिटी राइट्स की सुरक्षा की थी। उनके वकील ने जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए और समय मांगा था, लेकिन अब कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अगर समझौता फाइनल नहीं होता है और अमिताभ बच्चन केस को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो उन्हें खुद कोर्ट में पेश होना होगा।

HT की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने अपने आदेश में कहा- “समय दे दिया गया है। मामले को 16.11.2026 को लिस्ट किया जाए। अगर समझौता नहीं होता है या समझौता अधूरा रहता है और वादी किसी भी दावे या मुद्दे पर मुकदमा आगे बढ़ाना चाहता है तो उसे सुनवाई की अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहना होगा। इससे कोर्ट को ‘कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1908’ के ‘ऑर्डर X नियम 2’ और ‘ऑर्डर V नियम 3’, तथा ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023’ की धारा 168 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने में मदद मिलेगी।”

बिग बी के पर्सनैलिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकारों) के मामले के बारे में

2022 में, मशहूर वकील हरीश साल्वे ने बच्चन की ओर से हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया था, जिसमें उन्होंने अपने नाम, तस्वीर, आवाज़ और व्यक्तित्व से जुड़ी विशेषताओं की सुरक्षा की मांग की थी। जस्टिस नवीन चावला ने कहा, “वादी को अपूरणीय नुकसान और क्षति होने की संभावना है। कुछ गतिविधियां उन्हें बदनाम भी कर सकती हैं। इन बातों को ध्यान में रखते हुए एकतरफा अंतरिम आदेश (ex parte ad interim order) पारित किया जाता है।”

जस्टिस चावला ने आगे कहा-“इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वादी (बच्चन) एक मशहूर हस्ती हैं और कई विज्ञापनों में भी दिखाई देते हैं। वादी इस बात से नाराज हैं कि प्रतिवादी उनकी अनुमति या अधिकार के बिना अपने सामान और सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए उनकी सेलिब्रिटी हैसियत का इस्तेमाल कर रहे हैं। शिकायत पर विचार करने के बाद मेरी राय है कि प्रथम दृष्टया (prima facie) मामला बनता है और सुविधा का संतुलन भी उनके पक्ष में है।”

मुकदमे में कहा गया था कि मोबाइल एप्लिकेशन डेवलपर्स अमिताभ बच्चन के नाम का इस्तेमाल गैर-कानूनी तरीके से लॉटरी चलाने के लिए कर रहे थे, जबकि अन्य लोग उनकी तस्वीर वाली टी-शर्ट बेच रहे हैं।

अमिताभ बच्चन के बारे में और जानकारी

अमिताभ बच्चन ने 1969 में ‘सात हिंदुस्तानी’ फिल्म से एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा, जिसमें उन्होंने कवि अनवर अली की भूमिका निभाई थी। इसके बाद के वर्षों में वे ‘रेशमा और शेरा’, ‘परवाना’, ‘संयोग’ और ‘बंसी बिरजू’ जैसी फिल्मों में नजर आए, जिनमें से कई व्यावसायिक रूप से असफल रहीं। ‘आनंद’ (1971) और ‘बॉम्बे टू गोवा’ (1972) में उनके अभिनय ने उन्हें एक ऐसे अभिनेता के रूप में स्थापित किया जिन पर नजर रखी जानी चाहिए।

Business Idea: बिना दुकान खोले घर से शुरू करें कैटरिंग का बिजनेस! एक्सपर्ट से समझिए सिर्फ 50000 के बजट से कैसे होगी कमाई

Business Idea: बहुत से लोगों को लगता है कि खाना बनाने जैसे बेसिक काम से बड़ा व्यवसाय शुरू नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह काम जरूरत या शौक से आगे बढ़कर एक फायदेमंद बिजनेस भी बन सकता है। केटरिंग एक ऐसा बिजनेस है, जिसे छोटे स्तर पर छोटे से ऑर्डर के साथ शुरू किया जा सकता है। केटरिंग के काम को शुरू करने के लिए किसी बड़े रेस्तरां या फैंसी सेटअप की जरूरत नहीं होती। कस्टमर और ऑर्डर बढ़ने के साथ कारोबार रफ्तार पकड़ लेता है। दिल्ली के शेफ अजय भल्ला लंबे समय से केटरिंग बिजनेस में काम कर रहे हैं। उनके अनुसार, केटरिंग बिजनेस शुरू करते समय सबसे जरूरी बात यह है कि खर्चों और ऑर्डर का हिसाब-किताब पहले से समझ लें।

शुरुआत में पैसा कहां लगेगा

कैटरिंग शुरू करने पर आपका पैसा मुख्य रूप से किचन के सामान, गैस, बर्तन, कच्चे माल, पैकेजिंग और जरूरी स्टाफ पर लगेगा। लेकिन शुरुआत में हर सामान खरीदने की बजाय कुछ बर्तन और सर्विंग का सामान किराये पर भी लिया जा सकता है। यह फैसला बड़ी रकम लगाने से बचाता है और आगे के लिए रास्ता भी बनाता है। मान लीजिए शुरुआत में आपको 30-50 लोगों का छोटा ऑर्डर मिलता है। यह ऑर्डर महंगे इक्विपमेंट खरीदे बिना जरूरी सामान से काम शुरू किया जा सकता है। जैसे-जैसे ऑर्डर बढ़ें, वैसे-वैसे किचन और सर्विंग का सेटअप बढ़ाया जा सकता है। तो अगर आप घर से या छोटे किचन सेटअप से 30-50 लोगों के ऑर्डर लेकर शुरुआत करते हैं, तो करीब ₹50,000 से ₹1 लाख का शुरुआती बजट मानकर चल सकते हैं।

सबसे बड़ा खर्च कच्चे माल का

केटरिंग बिजनेस में असली हिसाब सिर्फ यह नहीं है कि एक प्लेट कितने में बिकती है। सबसे पहले उस प्लेट को बनाने की लागत पर ध्यान देना जरूरी है। सब्ज़ियां, दालें, चावल, आटा, मसाले, तेल, दूध, दही, चीज, मीट, या दूसरी चीजों की लागत इन सभी को जोड़ना होगा। इसके अलावा, पैकेजिंग, गैस, डिलीवरी, स्टाफ, बर्तनों, या परोसने के बर्तनों की लागत को भी ध्यान में रखना होगा। उसके बाद ही आपको हर प्लेट का रेट तय करना चाहिए। नहीं तो, आपको ऑर्डर तो मिलेंगे, लेकिन लागत निकालने के बाद मुनाफा बहुत कम हो सकता है।

शुरुआत में मेन्यू छोटा रखें

अजय भल्ला ने बताया कि नए बिजनेस में 20-30 अलग-अलग आइटम रखने की जरूरत नहीं है। शुरू में, एक छोटा मेन्यू रखें जिसमें कुछ ऐसे आइटम हों जिन्हें आप अच्छी क्वालिटी के साथ ज्यादा क्वांटिटी में बना सकें। इससे रॉ मटेरियल खरीदना आसान हो जाएगा और खाने की बर्बादी कम होगी। एक छोटे ऑर्डर में दो सब्जियां, दाल, चावल, रोटी और एक डेजर्ट जैसे सीमित विकल्प हो सकते हैं। बाद में, ग्राहक की मांग के हिसाब से स्टार्टर्स, चाट या लाइव काउंटर जैसे आइटम जोड़े जा सकते हैं।

ग्राहक कैसे मिलेंगे

सबसे बड़ी चुनौती है शुरू में ग्राहक का मिलना। आज सोशल मीडिया का दौर है, यह ग्राहक लाने में मददगार हो सकता है। अपनी सोसाइटी, आस-पास के ऑफिस और जान-पहचान वालों से छोटे ऑर्डर ले सकते हैं। आपका पहला मकसद शादी के बड़े ऑर्डर पाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसे क्लाइंट बनाना होना चाहिए जो आपके खाने और सर्विस से खुश हों और दोबारा ऑर्डर करें। केटरिंग में साख बहुत जरूरी है। समय पर खाना पहुंचाना, सही क्वांटिटी में खाना रखना और साफ-सफाई बनाए रखना, आने वाले ऑर्डर के लिए उतना ही जरूरी है जितना कि खाने को स्वादिष्ट बनाना।

दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट

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El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

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Ranchi JCI Expo: रांची में मर्सिडीज से लेकर फ्लैट तक की बुकिंग! 1 अक्टूबर से लगने जा रहा है झारखंड का सबसे बड़ा मेला, फुल डिटेल

Ranchi JCI Expo: झारखंड की राजधानी रांची में एक अक्टूबर से लेकर 7 अक्टूबर तक जेसीआई का एक्सपो लगने वाला है। दरअसल, यह झारखंड का सबसे बड़ा एक्सपो होता है जो हर साल अक्टूबर के महीने में लगता है। यहां की खास बात ये है कि यहां पर आपको एक छत के नीचे सुई से लेकर मर्सिडीज तक मिलेगा। यहां पर 400 स्टॉल लगने वाले हैं।

पिंक हैंगर आकर्षण का केंद्र रहेगा

जेसीआई के अधिकारी प्रतीक जैन ने बताया कि यहां महिला उद्यमी को ध्यान में रखते हुए पिंक हैंगर आकर्षण का केंद्र रहेगा। इस पिंक हैंगर में सिर्फ महिला उद्यमियों के ऐसे प्रोडक्ट्स दिखाए जाएंगे जिनसे उन्होंने अपनी पहचान बनाई है। एक तरह से कहें तो महिला उद्यमी को बढ़ावा देने के लिए यह स्पेशल हैंगर तैयार किया जा रहा है।

पूरे भारत से आएंगे उद्यमी

प्रतीक जैन बताते हैं कि पूरे भारत से चुनिंदा लोग यहां पर अपने यूनिक प्रोडक्ट का स्टॉल लगाएंगे। यहां पर आपको कई सारी वैरायटी एक छत के नीचे देखने को मिलेगी। अलग से फूड कोर्ट भी होगा। जहां पर राजस्थानी दाल बाटी चूरमा से लेकर कश्मीर का राजमा चावल भी होगा। यानी शॉपिंग के साथ-साथ खाने का भी मजा।

सेल्फी जोन और कई सारी प्रतियोगिता हर दिन

यहां पर एक स्पेशल सेल्फी जोन भी होगा। इसके अलावा किड जोन होगा जहां पर बच्चों के खेलने के लिए 360 डिग्री जंपिंग जपाक जैसे कई तरह के झूले होंगे। हर दिन डॉग शो, छोटे बच्चों के रैंप वॉक और महिलाओं के लिए प्रतियोगिता होगी। इसमें विनर को स्पेशल प्राइज भी दिए जाएंगे।

यहां पर फ्लैट तक की कर सकते हैं बुकिंग

यहां पर सिर्फ आप दुर्गा पूजा के लिए कपड़े मिठाइयां और अन्य चीजों की ही शॉपिंग नहीं करेंगे बल्कि आप फ्लैट तक की बुकिंग करेंगे। यहां पर रियल स्टेट कंपनी के कई सारे स्टॉल देखने को मिलेंगे। जहां पर आप रियल एस्टेट में इन्वेस्ट करना चाहते हैं या अपने सपनों का आशियाना तलाश रहे हैं तो आपको कई सारे रियल स्टेट इन्वेस्टर के ढेरों प्रोजेक्ट एक साथ देखने को मिलेंगे। यहीं से आप उनकी बुकिंग भी करा पाएंगे।

(रांची से शिखा श्रेया की रिपोर्ट)

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विपक्ष की राजनीतिक दिशा ही ठीक नहीं है

वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका समय आ गया है। ऐसा लगने में कोई बुराई नहीं है। जो विपक्ष में है उसे लगना चाहिए कि उसका समय आ गया है या आ रहा है। लेकिन सिर्फ लगने से कुछ नहीं होता है। कांग्रेस के बारे में अक्सर यह बात कही जाती है कि वह सत्ता में रहती है या सत्ता के इंतजार में रहती है। अभी राहुल गांधी सत्ता का इंतजार कर रहे हैं। इंतजार जैसे जैसे लंबा होता जा रहा है वैसे वैसे उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही है। तभी हर छोटी बड़ी घटना पर वे यह मानने लगते हैं कि अब सरकार कमजोर हो गई है और उनका समय आ गया है, वे चुनाव जीत सकते हैं। तभी चुनाव आयोग को लेकर अंग्रेजी के एक अखबार ने एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की तो राहुल गांधी को लगा कि यह मौका है। सिर्फ उन्हीं को नहीं, बल्कि दूसरी विपक्षी पार्टियों को भी लगा कि यह एक बड़ा मौका है। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी लगा कि यह बहुत बड़ा अवसर है और इस बहाने अपने को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

ममता बनर्जी तो इतनी उत्साहित हो गईं कि दशकों की दुश्मनी भूल कर सीपीएम के महासचिव एमए बेबी को फोन कर दिया। उनसे आग्रह किया कि वे विपक्षी पार्टियों को एकजुट करें। उन्होंने राहुल गांधी से अपील करते हुए कहा कि वे ‘इंडिया’ ब्ल़ॉक की बैठक बुलाएं। इसी तरह का उत्साह राहुल गांधी में भी दिखा। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें इस अंदाज में बात कर रहे थे, जैसे उनकी सरकार आ गई हो। वे मुख्य चुनाव आयुक्त से कह रहे थे कि वे इस्तीफा कर दें और सरकारी गवाह बन जाएं। इससे ऐसा लगा, जैसे देश में उनकी सरकार हो। लेकिन असल में उनके उत्साह का कोई ठोस आधार नहीं है। चाहे ममता बनर्जी हों या राहुल गांधी दोनों अपने अपने कारणों से मौजूदा हालात का राजनीतिक लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं। ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक अस्तित्व की चिंता है तो राहुल गांधी को लग रहा है कि उनका सत्ता का इंतजार समाप्त होने वाला है। तभी आने वाले दिनों में इसी लाइन पर संपूर्ण विपक्ष की राजनीति देखने को मिलेगी।

परंतु वास्तविकता यह है कि न तो देश में कोई प्रत्यक्ष सत्ता विरोधी लहर है और न विपक्ष भाजपा के साथ जमीनी चुनावी मुकाबले के लिए तैयार है। इस दावे का परीक्षण कई स्तरों पर किया जा सकता है। पहले अगर विपक्ष की तैयारियों की बात करें तो यह दिख रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां जनता के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश कर रही हैं जैसे चुनाव आयोग ही भाजपा को चुनाव जिता रहा हो। यह बात सचाई से कोसों दूर है। चाहे चुनाव आयोग हो या कोई दूसरी एजेंसी वह किसी पार्टी को चुनाव नहीं जिता सकती है। चुनाव जनता के वोट से जीता जाता है। जनभावना जिस पार्टी के साथ होती है वह चुनाव जीतती है। बाकी बातों का कोई खास अर्थ नहीं होता है। मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल का चुनाव देखा जा सकता है। 2021 में पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए बहुत अनुकूल माहौल दिख रहा था। लेकिन जनभावना तृणमूल कांग्रेस के साथ थी तो भाजपा नहीं जीत सकी। इसके उलट 2026 में जनभावना ममता बनर्जी के खिलाफ हुई तो पुलिस और प्रशासन का सारा प्रबंधन होने के बावजूद वे खुद भी हारीं और पार्टी भी हार गई। ऐसी अनके मिसालें दी जा सकती हैं।

ध्यान रहे किसी भी पार्टी के चुनाव जीतने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। पहली, पार्टी का संगठन। दूसरी, एक करिश्माई नेतृत्व और तीसरी चीज है नैरेटिव। जिस पार्टी के पास मजबूत संगठन होगा, करिश्माई नेता होगा और धारणा पर नियंत्रण होगा वही चुनाव जीतेगा। इस समय ये तीनों चीजें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं। इसलिए वह लगातार चुनाव जीत रही है। दूसरी ओर अगर कांग्रेस की बात करें तो उसके पास सबसे बड़ी कमजोरी संगठन की है। उसका संगठन बहुत कमजोर है और राज्यों में भी उसके पास अच्छे नेताओं का अकाल है। प्रदेशों के ज्यादातर बड़े नेताओं ने अपनी प्रादेशिक पार्टी बना ली या कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए। अगर नेतृत्व की बात करें तो पिछले 22 साल से लगातार मेहनत करके राहुल गांधी अपने को नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कामयाबी नहीं मिल पा रही है। नेतृत्व के मामले में विपक्ष में आपसी सहमति भी नहीं है। जहां तक धारणा का सवाल है तो विपक्ष के प्रति आम जनमानस में निगेटिव धारणा है। अगर विपक्ष के पास संगठन, नेता और नैरेटिव ये तीन चीजें नहीं हैं तो फिर वह भाजपा जैसी बड़ी पार्टी और नरेंद्र मोदी जैसे करिश्माई नेता को कैसे चुनौती दे पाएगा?

इसके बावजूद अगर राहुल गांधी हमलावर हैं तो उसका कारण यह है कि वे पूरे घटनाक्रम को गलत नजरिए से पढ़ रहे हैं। वे नेता प्रतिपक्ष हैं और इस नाते सरकार के खिलाफ बोलना या राजनीति करना उनका काम है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन दुर्भाग्य से वे सरकार और भाजपा का विरोध करते करते देश की संवैधानिक संस्थाओं का विरोध करने लगे हैं। अपने अति उत्साह में राहुल गांधी देश की संस्थाओं की साख को कमजोर करने और उनके ऊपर संदेह बढ़ाने वाले काम कर रहे हैं। अंग्रेजी के एक अखबार ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर एक खुलासा किया तो उससे जुड़े मुद्दों पर सवाल करने की बजाय राहुल गांधी ने पूरी संस्था और उसकी साख पर सवाल खड़े कर दिए। वे इसको एक अलग ही दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्होंने मुख्य चुनाव आय़ुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति का विरोध किया था और आपत्ति दर्ज कराई थी। हकीकत यह है कि उन्होंने बाकी दोनों आयुक्तों एसएस संधू और विवेक जोशी की नियुक्ति पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी। जाहिर है वे सेलेक्टिव होकर हमले कर रहे हैं। उनको चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आय़ुक्त रहे एमएस गिल को मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री बनाया था। नवीन चावला का विवाद भी कांग्रेस के राज का है, जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति के शिकायत की थी कि चावला कांग्रेस के आदमी हैं। वास्तविकता यह है कि कांग्रेस की सरकारों ने चुनाव आयोग जैसी संस्था का राजनीतिकरण किया था। यह भी एक तथ्य है कि कांग्रेस के शासन में सीधे सरकार ही चुनाव आयुक्तों को नियुक्त करती थी।

बहरहाल, बड़ा सवाल यह है कि देश में एसआईआर जरूरी है या नहीं? इसका स्पष्ट जवाब है कि एसआईआर जरूरी है। मतदाता सूची में करोड़ों ऐसे लोगों के नाम हैं, जिनकी मृत्यु हो गई है। लाखों ऐसे नाम हैं, जो डुप्लीकेट हैं। ऐसे नामों को हटा कर मतदाता सूची की पवित्रता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी चुनावी आयोग की होती है। उसने अपने संवैधानिक उत्तरदायित्व के तहत यह काम किया है। अगर उसमें कहीं कोई त्रुटि है और नेता विपक्ष उसकी ओर ध्यान दिलाएं तो बात समझ में आती है। लेकिन यह दावा करना कि एसआईआर के कारण भाजपा जीत रही है या चुनाव आयोग के कारण ही प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी नहीं होती है, एक बचकानी बात है। कोई भी एजेंसी या संस्था किसी सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बैंसी को खत्म नहीं कर सकती है और न चुनाव जिता सकती है। ध्यान रहे एसआईआर की प्रक्रिया पिछले साल जून में शुरू हुई और कांग्रेस के हारने का सिलसिला उससे बहुत पुराना है। इसी साल एसआईआर के बीच पांच राज्यों में चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस केरल में जीती है और एक नई बनी पार्टी तमिलनाडु में जीत गई। इसलिए किसी भी घटना को एक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता होती है। हर चीज चुनावी राजनीति के लिए नहीं होती है।

असल में राहुल गांधी ढाई साल पहले ही अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इसके लिए वे पार्टी संगठन को मजबूत करते या जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर काम करते नहीं दिख रहे हैं। वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनावी माहौल बना रहे हैं। वे चुनावी लाभ के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नेता प्रतिपक्ष अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आदि को देश को नष्ट करने वाला बता रहे हैं। वे सम्मानित उद्योगपतियों, राष्ट्रवादी संगठन से जुड़े लोगों और मीडिया की हस्तियों को भी देश विरोधियों की सूची में शामिल कर रहे हैं। इस तरह का एक्सट्रीम नैरेटिव पता नहीं उनको कितना चुनावी लाभ पहुंचाएगा लेकिन देश को निश्चित रूप से इसका नुकसान होगा। देश विरोधी शक्तियों को इन बातों से भारत विरोधी की गतिविधियां तेज करने का अवसर मिलता है। नेता प्रतिपक्ष के नाते उनको एक जिम्मेदार व्यक्ति के तौर पर बरताव करना चाहिए। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

रांची में जल्द शुरू होगा नाइट मार्केट, झारखंड की संस्कृति की मिलेगी झलक

रांची के लोगों के लिए अच्छी खबर है। सिटी में नाइट मार्केट बनने जा रहा है। एक तरफ इससे रांची के लोगों को शॉपिंग का नया एक्सपीरियंस मिलेगा तो दूसरी तरफ रोजगार के बड़े मौके बनेंगे। नाइट मार्केट के लिए जमीन की पहचान कर ली गई है। आइए इस नाइट मार्केट की खास बातें जानते हैं।

ग्रामीण महिलाओं को एलॉट होंगे आउटलेट

रांची में प्रस्तावित नाइट मार्केट की खास बात यह है कि इसमें ग्रामीण महिलाओं को प्राथमिकता के साथ फूड आउटलेट एलॉट किया जाएगा। इतना ही नहीं आउटलेट शुरू करने के लिए उन्हें सब्सिडी भी दी जाएगी। इस मार्केट के लिए करमटोली चौक के करीब स्थित करमटोली तालाब के पास 51 डिसमिल जमीन की पहचान कर ली गई है। इस जमीन की बाउंड्री भी हो गई है।

शॉपिंग के साथ लजीज व्यंजन का उठा सकेंगे लुत्फ

रांची के नगर आयुक्त सुशांत गौरव ने कहा, “ग्रामीण महिलाओं से आउटलेट का कोई रेंट नहीं लिया जाएगा। अपने घर खाना बनाने वाली महिलाओं को आउटलेट मिलेगा। उनके आउटलेट को प्रमोट किया जाएगा और उनको पलाश ब्रैंड से भी जोड़ा जाएगा। नाइट मार्केट को ऐसे प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित करने का प्लान है, जहां शहर के लोग शॉपिंग के नए एक्सपीरियंस के साथ ही लजीज व्यंजन का लुफ्त उठा सकेंगे।

नाइट मार्केट में मिलेगी झारखंड की संस्कृति की झलक 

नाइट मार्केट के जरिए न सिर्फ झारखंड के व्यंजन को पहचान मिलेगी बल्कि बल्कि लोगों को हेल्दी फूड भी उपलब्ध होगा। खासतौर पर यहां मिलेट प्रोडक्ट्स यह उपलब्ध होंगे। इनमें मड़वा, बाजरा, मकई, घोड़ा चावल, मडवा के बने लड्डू, मकई लड्डू व बिस्किट, बांस के अचार शामिल हैं। यहां पर सिटी के लोगों को झारखंड के सोहराय पेंटिंग की खूबसूरत कलाकृति भी देखने को मिलेगी। नाइट मार्केट की साज-सज्जा का खास ध्यान रखने का प्लान है।

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शहर के लोगों में नाइट मार्केट को लेकर उत्साह

गौरव ने कहा कि यह सिर्फ नाइट मार्केट नहीं होगा बल्कि यहां आप झारखंड की संस्कृति और आदिवासियों की जिंदगी के बारे में जान सकेंगे। लोग नाइट पार्क में झारखंड के खानपान, यहां के कपड़े, यहां की पेंटिंग को एक्सप्लोर कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि खासकर राज्य के बाहर के लोगों को नाइट मार्केट में पूरे झारखंड को करीब से देखने का मौका मिलेगा। सिटी के लोगों में नाइट मार्केट को लेकर काफी उत्साह है।

(रांची से शिखा श्रेया की रिपोर्ट)

Shah Rukh Khan Net Worth: एक साल में 2490 करोड़ कम हुई शाहरुख खान की नेटवर्थ, हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 में ये एक्टर्स के नाम भी शामिल

Shah Rukh Khan Net Worth: बॉलीवुड एक्टर शाहरुख खान भारत के सबसे अमीर एक्टर्स की लिस्ट में नंबर 1 पर हैं। लेकिन पिछले साल से उनकी अनुमानित संपत्ति में काफी कमी आई है। हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2026 के अनुसार एक्टर की संपत्ति ₹10,000 करोड़ है, जिससे वे अमिताभ बच्चन, सलमान खान और ऋतिक रोशन से आगे हैं।

शाहरुख खान की संपत्ति में गिरावट

यह नया आंकड़ा 2025 की हुरुन इंडिया रिच लिस्ट में शाहरुख की 12,490 करोड़ की नेट वर्थ से कम है। यानी एक साल में एक्टर की नेटवर्थ में 2,490 करोड़ का अंतर आया है। एक्टर की संपत्ति सिर्फ फिल्मों से हुई कमाई तक सीमित नहीं है। इसमें उनके बिजनेस भी शामिल हैं, खासकर रेड चिलीज एंटरटेनमेंट और नाइट राइडर्स स्पोर्ट्स के जरिए कोलकाता नाइट राइडर्स के साथ पार्टनरशिप।

हालांकि ये आंकड़े अनुमानित हैं और प्राइवेट कंपनियों, निवेश और अन्य एसेट्स की वैल्यू के आधार पर बदल सकते हैं। इस साल की शुरुआत में जारी हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट में शाहरुख की संपत्ति का अनुमान ₹10,800 करोड़ लगाया गया था।

अमिताभ बच्चन दूसरे स्थान पर

अमिताभ बच्चन 2026 की लिस्ट में ₹4,000 करोड़ की अनुमानित संपत्ति के साथ दूसरे सबसे अमीर एक्टर हैं। 2025 की लिस्ट में बताई गई ₹1,630 करोड़ की नेट वर्थ की तुलना में उनकी नेट वर्थ में काफी बढ़ोतरी हुई है। दिग्गज एक्टर की संपत्ति न केवल उनके दशकों लंबे फिल्मी करियर से जुड़ी है, बल्कि निवेश, रियल एस्टेट और उनके फैमिली ऑफिस के जरिए मैनेज की जाने वाली एसेट्स से भी जुड़ी है। उनकी लेटेस्ट वैल्यूएशन उन्हें टॉप नामों में शामिल अन्य एक्टर्स से काफी आगे रखती है।

सलमान खान-ऋतिक रोशन

भाईजान भी ₹3,000 करोड़ की अनुमानित संपत्ति के साथ लिस्ट में शामिल हुए हैं। ऋतिक रोशन ₹2,500 करोड़ के साथ उनके बाद हैं, जो 2025 में बताई गई उनकी ₹2,160 करोड़ की नेट वर्थ से अधिक है। उनका फिटनेस और लाइफस्टाइल ब्रांड HRX उनके बिजनेस का एक अहम हिस्सा बना हुआ है।

जूही चावला और करण जौहर लिस्ट से बाहर

पिछले साल की रैंकिंग में कुछ खास बदलाव भी हुए हैं। जूही चावला और करण जौहर, जो दोनों 2025 की हुरुन इंडिया रिच लिस्ट में शामिल थे, 2026 की लिस्ट में नहीं हैं। 2025 में जूही की अनुमानित नेट वर्थ ₹7790 करोड़ थी, जबकि करण जौहर की नेट वर्थ ₹1880 करोड़ थी।

इस लिस्ट में फिल्म इंडस्ट्री के बिज़नेस से जुड़े लोग भी शामिल हैं। ‘रामायण’ के प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ​​के पिता नरेश मल्होत्रा ​​की अनुमानित संपत्ति ₹16,000 करोड़ है। भूषण कुमार, रॉनी स्क्रूवाला और कलानिधि मारन जैसे फिल्म प्रोड्यूसर भी इस लिस्ट में शामिल हैं।

78 वर्ष के हुये महेश भट्ट

बॉलीवुड के जाने-माने फिल्मकार महेश भट्ट आज 78 वर्ष के हो गये।महेश भट्ट का जन्म 20 सितंबर 1948 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता नानाभाई भट्ट फिल्म इंडस्ट्री के जाने माने फिल्मकार थे। घर में फिल्मी माहौल के कारण उनका रुझान भी फिल्मों की ओर हो गया और वह निर्देशक बनने का सपना देखने लगे। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह निर्माता- निर्देशक राज खोसला के सहायक के तौर पर काम करने लगे।महेश भट्ट ने अपने सिने करियर की शुरुआत वर्ष 1970 में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘संकट’ से की। इसके बाद उन्होंने बतौर निर्देशक ‘मंजिले और भी हैं’, ‘विश्वासघात’, ‘लहू के दो रंग’, ‘नया दौर’ और ‘अभिमन्यु’ जैसी कई फिल्में निर्देशित की लेकिन इन फिल्मों से उन्हें कोई खास फायदा नहीं पहुंचा।

वर्ष 1982 में महेश भट्ट को फिल्म ‘अर्थ’ निर्देशित करने का अवसर मिला। फिल्म में स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और कुलभूषण खरबंदा ने मुख्य भूमिका निभाई थी। माना जाता है कि इस फिल्म के जरिये महेश भट्ट ने अभिनेत्री परवीन बॉबी के साथ अपने रिश्ते को दर्शाया था। फिल्म टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। वर्ष 1984 में प्रदर्शित फिल्म ‘सारांश’ महेश भट्ट के निर्देशन में बनी सुपरहिट फिल्म साबित हुई। फिल्म में अनुपम खेर और रोहिणी हथगड़ी और सोनी राजदान ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म में अपनी बेहतरीन पटकथा के लिए महेश भट्ट मॉस्को फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार से सम्मानित भी किये गए।

वर्ष 1986 में प्रदर्शित फिल्म ‘नाम’ महेश भट्ट निर्देशित अहम फिल्मों में शुमार की जाती है। राजेन्द्र कुमार निर्मित इस फिल्म में संजय दत्त और कुमार गौरव ने अहम भूमिका निभाई थी। यूं तो इस फिल्म के लगभग सभी गीत सुपरहिट साबित हुए लेकिन पंकज उधास की मखमली आवाज में ‘चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है’ गीत आज भी श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है।वर्ष 1986 से वर्ष 1989 महेश भट्ट के सिने करियर का बुरा वक्त साबित हुआ। इस दौरान उनकी ‘आज’, ‘काश’, ‘ठिकाना’, ‘कब्जा’ जैसी फिल्में प्रदर्शित हुईं लेकिन ये सभी फिल्में टिकट खिड़की पर बुरी तरह से नकार दी गयी। वर्ष 1989 में महेश भट्ट ने अपने भाई मुकेश भट्ट के साथ मिलकर फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया और विशेष फिल्मस के बैनर तले ‘डैडी’ का निर्माण किया।

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वर्ष 1991 में ही महेश भट्ट निर्देशित एक और सुपरहिट फिल्म ‘दिल है कि मानता नहीं’ प्रदर्शित हुई। आमिर खान और पूजा भट्ट की मुख्य भूमिका वाली इस फिल्म की कहानी हॉलीवुड फिल्म ‘इट हैपेंड वन नाईट’ पर आधारित थी। फिल्म में पूजा भट्ट और आमिर खान ने अपने चुलबुले अंदाज से दर्शकों का दिल जीतकर फिल्म को सुपरहिट बना दिया। वर्ष 1993 में महेश भट्ट को एक बार फिर से अभिनेता आमिर खान के साथ फिल्म ‘हम है राही प्यार के’ में काम करने का अवसर मिला जो उनके सिने करियर की एक और सुपरहिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म में आमिर खान और जूही चावला की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसदं किया था।

वर्ष 1995 में महेश भट्ट ने छोटे पर्दे की ओर भी रुख कर लिया और शोभा डे की कहानी ‘स्वाभिमान’ को निर्देशित किया। यह धारावाहिक दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। वर्ष 1998 में प्रदर्शित फिल्म ‘तमन्ना’ महेश भट्ट के निर्देशन में बनी महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। वर्ष 1998 में महेश भट्ट की एक और सुपरहिट फिल्म ‘जख्म’ प्रदर्शित हुई। इस फिल्म के जरिये महेश भट्ट ने अयोध्या में हुए बावरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में हुए दंगे में एक परिवार को त्रास्दी को रूपहले पर्दे पर पेश किया था। फिल्म में अपने बेहतरीन अभिनय के लिए अजय देवगन जहां सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया वहीं महेश भट्ट को सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार का सम्मान प्राप्त हुआ।

वर्ष 1999 में प्रदर्शित फिल्म ‘कारतूस’ की टिकट खिड़की की असफलता के बाद महेश भट्ट ने फिल्म निर्देशन के क्षेत्र से किनारा कर लिया। हालांकि उन्होंने फिल्मों की कहानी और स्क्रीनप्ले लिखना जारी रखा।महेश भट्ट अपने सिने करियर में तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किये गए। उन्होंने अपने चार दशक लंबे सिने करियर में लगभग 50 फिल्मों का निर्देशन किया है।

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