Sugar Stocks: शुगर स्टॉक्स में भारी गिरावट, गन्ने-चीनी से एथेनॉल बनाने पर सरकारी रोक का दिखा असर

Sugar Stocks: चीनी कंपनियों के शेयरों में 19 अक्टूबर को भारी बिकवाली दिखी। कई शेयर 7% तक टूट गए। इसकी वजह एथेनॉल की खरीद से जुड़ा सरकार का फैसला है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने नए टेंडर से चीनी से बनने वाले एथेनॉल की खरीद को बाहर कर दिया है। इससे चीनी कंपनियों की कमाई पर असर पड़ सकता है।

इन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट

Bajaj Hindusthan Sugar का शेयर 5.59% गिरकर ₹20.08 पर आ गया। Shree Renuka Sugars में 7% की गिरावट रही। वहीं, Balrampur Chini Mills का शेयर 3.33% और EID Parry का शेयर 3.22% टूट गया। Triveni Engineering and Industries में 1.54% की गिरावट रही। Dhampur Sugar का शेयर भी 4% से ज्यादा गिरा।

सरकार ने क्या फैसला लिया?

सरकारी तेल कंपनियों ने नवंबर 2026 से अक्टूबर 2027 तक के लिए एथेनॉल खरीद का नया टेंडर जारी किया है। BPCL ने 16 अक्टूबर को यह टेंडर निकाला था। इसमें गन्ने के रस, चीनी के सिरप और बी-हैवी मोलासेस से बने एथेनॉल की खरीद शामिल नहीं है।

इसके अलावा, मक्का से बनने वाले एथेनॉल की खरीद कीमत भी घटा दी गई है। इसे ₹71.86 से कम करके ₹68.86 प्रति लीटर कर दिया गया है। टेंडर में करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने के लिए बोलियां मांगी गई हैं।

चीनी कंपनियों को क्यों होगा नुकसान?

चीनी कंपनियां गन्ने से चीनी के साथ एथेनॉल भी बनाती हैं। इससे उन्हें कमाई का एक और रास्ता मिलता है। कई कंपनियों ने एथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़ाने में पैसा भी लगाया है।

अब चीनी से बनने वाले एथेनॉल की सरकारी खरीद टेंडर में शामिल नहीं होने से कंपनियों की मुश्किल बढ़ सकती है। उनकी उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल करना चुनौती बन सकता है। इससे मुनाफे पर भी दबाव पड़ने की आशंका है।

सरकार ने यह फैसला क्यों लिया?

सरकार चाहती है कि घरेलू बाजार में चीनी की कमी न हो और कीमतें काबू में रहें। त्योहारी सीजन में चीनी की कीमतें 10% से ज्यादा बढ़ चुकी हैं। वहीं, प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में कमजोर बारिश से उत्पादन घटने की आशंका है।

भारत पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखता है। अब इस जरूरत को पूरा करने के लिए मक्का और दूसरे अनाज से बनने वाले एथेनॉल की भूमिका बढ़ सकती है।

एथेनॉल ब्लेंडिंग पर क्या असर होगा?

ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के चेयरमैन प्रफुल्ल विठलानी का कहना है कि सरकार ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन इस सीजन इसे पूरा करना मुश्किल हो सकता है। चीनी से बनने वाले एथेनॉल का उत्पादन घटने के साथ मक्के की कमी भी इसकी बड़ी वजह है।

प्रफुल्ल विठलानी के मुताबिक, पिछले सीजन में एथेनॉल सप्लाई में चीनी की हिस्सेदारी 25% थी। अब यह घटकर सिर्फ 2% के आसपास रह सकती है।

क्या चीनी की कीमतें बढ़ेंगी?

उत्पादन को लेकर चिंता के बावजूद फिलहाल चीनी की कीमतों में बड़ी हलचल की उम्मीद नहीं है। विठलानी के मुताबिक, सरकार ने कोटा जारी करके बाजार में सप्लाई को संभाला है। त्योहारों की मांग पूरी करने के लिए भी पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

ज्यादातर चीनी मिलों में नवंबर की शुरुआत तक पेराई शुरू होने की उम्मीद है। सरकार के सप्लाई प्रबंधन से अगले दो महीने तक कीमतें स्थिर रह सकती हैं। इसके बाद बाजार की चाल इस बात पर निर्भर करेगी कि चीनी का असल उत्पादन कितना रहता है और फसल की स्थिति कैसी रहती है।

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सरकार का बड़ा फैसला: गन्ने के रस और चीनी से एथेनॉल बनाने पर रोक, समझिए वजह

Sugarcane Ethanol Ban: केंद्र सरकार ने एथेनॉल खरीदने के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब सरकारी तेल कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, शुगर सिरप और बी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल की खरीद नहीं कर सकेंगी। सरकार ने एथेनॉल बनाने के लिए चीनी के इस्तेमाल को शून्य करने का निर्देश दिया है। यह नियम 1 नवंबर 2026 से शुरू होने वाले नए सप्लाई वर्ष में लागू होगा।

सरकार का मकसद देश में चीनी की उपलब्धता बनाए रखना है। साथ ही, चीनी की कीमतों पर दबाव कम करना भी इस फैसले की वजह है। इसके लिए सरकारी तेल कंपनियों ने करीब 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने का टेंडर जारी किया है।

1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदेंगी तेल कंपनियां

इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, मैंगलोर रिफाइनरी और नुमालीगढ़ रिफाइनरी ने मिलकर यह टेंडर जारी किया है। इसके तहत 1 नवंबर 2026 से 31 अक्टूबर 2027 तक एथेनॉल की सप्लाई होनी है।

नए नियमों के मुताबिक, कंपनियां गन्ने के रस, चीनी, शुगर सिरप और बी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल के लिए बोली नहीं मांगेंगी। हालांकि, दूसरे कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद जारी रहेगी।

मक्का और चावल से बने एथेनॉल की कीमत कितनी?

सरकार ने अलग-अलग कच्चे माल से बने एथेनॉल की बेस कीमत भी तय की है। मक्का से बने एथेनॉल की कीमत ₹66.07 प्रति लीटर रखी गई है। इसके अलावा ₹2.79 प्रति लीटर का अतिरिक्त प्रोत्साहन भी मिलेगा।

खराब खाद्यान्न से बने एथेनॉल की बेस कीमत ₹64 प्रति लीटर तय की गई है। भारतीय खाद्य निगम (FCI) से मिलने वाले अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल के लिए ₹60.32 प्रति लीटर की दर रखी गई है। वहीं, सी-हैवी शीरे से बने एथेनॉल की कीमत ₹57.97 प्रति लीटर होगी।

इन दरों में GST और परिवहन का खर्च शामिल नहीं है। ये खर्च अलग से देना होगा। राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत मंजूर दूसरे कच्चे माल से बने एथेनॉल की खरीद टेंडर में लागू सबसे कम दर पर होगी।

चार चरणों में होगी एथेनॉल की सप्लाई

एथेनॉल की सप्लाई को चार हिस्सों में बांटा गया है। पहला चरण नवंबर 2026 से जनवरी 2027 तक होगा। दूसरा फरवरी से अप्रैल 2027, तीसरा मई से जुलाई 2027 और चौथा अगस्त से अक्टूबर 2027 तक चलेगा।

हालांकि, चौथे चरण में FCI से मिलने वाले अतिरिक्त चावल से बने एथेनॉल की सप्लाई के लिए दिए गए प्रस्ताव स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

कोर्ट के फैसले के हिसाब से बदल सकता है आवंटन

टेंडर में एथेनॉल के आवंटन को लेकर एक शर्त भी रखी गई है। पहली तिमाही में होने वाला आवंटन कुछ लंबित कानूनी मामलों के फैसले पर निर्भर करेगा। ये मामले तेल कंपनियों के बीच एथेनॉल बांटने के तरीके से जुड़े हैं।

कंपनियों ने कहा है कि कोर्ट के आदेश के मुताबिक आवंटन में बदलाव किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर आवंटन घटाया जा सकता है या पूरी तरह रद्द भी किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में कंपनियां सप्लायर को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं होंगी।

दूसरी कंपनी से खरीदकर एथेनॉल नहीं बेच सकेंगे सप्लायर

टेंडर में सप्लायर के लिए भी नियम तय किए गए हैं। उन्हें मंजूर कच्चे माल से एथेनॉल अपनी ही रजिस्टर्ड या स्वीकृत डिस्टिलरी में बनाना होगा।

कोई सप्लायर किसी तीसरे पक्ष से एथेनॉल खरीदकर सरकारी तेल कंपनियों को नहीं बेच सकेगा। ये सभी नियम 2026-27 के सप्लाई वर्ष के लिए जारी टेंडर पर लागू होंगे। नया सप्लाई वर्ष 1 नवंबर 2026 से शुरू होगा।

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यूपी की एक्सपोर्ट चेन को मिली रफ्तार, 127.8 लाख डॉलर तक पहुंचा आबकारी निर्यात, खेत से विदेशी बाजार तक जुड़ी कड़ी

यूपी की एक्सपोर्ट चेन को मिली रफ्तार, 127.8 लाख डॉलर तक पहुंचा आबकारी निर्यात, खेत से विदेशी बाजार तक जुड़ी कड़ी

Yogi adityanath

उत्तरप्रदेश में योगी सरकार की त्रिवर्षीय आबकारी निर्यात नीति 2026-29 का असर अब प्रदेश की पूरी एक्सपोर्ट चेन में दिखाई दे रहा है। खेतों में तैयार होने वाले गन्ने, शीरे और अनाज से लेकर फैक्ट्री, पैकेजिंग, भंडारण और परिवहन तक आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिल रही है। वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही यानी अप्रैल-जून में यूपी के आबकारी निर्यात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 45.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस दौरान राष्ट्रीय वृद्धि 18.3 प्रतिशत रही।

 

नई इकाइयों और पुराने प्लांट को मिला संबल

 

निर्यात की संभावनाओं के साथ प्रदेश में नई औद्योगिक गतिविधियां भी बढ़ी हैं। उन्नाव में यूनाइटेड ब्रुअरीज और हरदोई में माउंट एवरेस्ट ब्रुअरीज नई इकाइयां स्थापित कर रही हैं। फर्रुखाबाद में वुडपेकर ग्रीनएग्री न्यूट्रिएंट्स ने इकाई स्थापित की है। वहीं एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स ने मुरादाबाद की बंद इकाई को दोबारा शुरू किया है। गोरखपुर की कियान डिस्टिलरी ने एथेनॉल उत्पादन के साथ पेय आसवनी और ब्रुअरी के लिए आवेदन किया है। रैडिको खेतान भी अन्य राज्यों से सीतापुर और रामपुर संयंत्रों में निर्यात उत्पादन स्थानांतरित कर रही है।

 

10.2 से बढ़कर 12.6 प्रतिशत हो गई हिस्सेदारी

 

अप्रैल-जून 2026 में देश से करीब 10.17 करोड़ अमेरिकी डॉलर का आबकारी निर्यात हुआ। इसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 127.8 लाख डॉलर रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 87.9 लाख डॉलर थी। इस तरह प्रदेश ने करीब 39.9 लाख डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि हासिल की। राष्ट्रीय निर्यात में यूपी की हिस्सेदारी भी 10.2 प्रतिशत से बढ़कर 12.6 प्रतिशत हो गई। प्रदेश इस अवधि में महाराष्ट्र और पंजाब के बाद तीसरे स्थान पर रहा।

 

बस्ती का शीरा पहुंचा वैश्विक बाजार

 

आबकारी मंत्री नितिन अग्रवाल ने बताया कि यूपी की बढ़ती एक्सपोर्ट चेन में कृषि आधारित उत्पाद भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। बस्ती से 25 हजार कुंतल शीरे का विदेश निर्यात किया गया, जिससे करीब पांच लाख अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। शीरा अलग शुल्क वर्गीकरण में आता है, इसलिए यह राशि उपरोक्त आंकड़ों से अतिरिक्त है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रदेश के कृषि उत्पाद प्रसंस्करण के बाद वैश्विक बाजार की आपूर्ति श्रृंखला में शामिल हो रहे हैं।

 

बोतलों की सप्लाई में भी आया बड़ा उछाल

 

अप्रैल-जुलाई 2026 के बीच यूपी की इकाइयों ने अन्य राज्यों को पिछले वर्ष की समान अवधि से 1.64 करोड़ अधिक बोतलें भेजीं। यह करीब 45.7 प्रतिशत की वृद्धि है। आबकारी आयुक्त डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि निर्यात बढ़ने का असर गन्ना, शीरा और अनाज से लेकर कांच की बोतल, पैकेजिंग, ढक्कन, लेबलिंग, भंडारण और परिवहन तक पड़ता है। इस तरह त्रिवर्षीय आबकारी निर्यात नीति ने प्रदेश में खेत से फैक्ट्री और फैक्ट्री से विदेशी बाजार तक जुड़ी व्यापक एक्सपोर्ट चेन को गति दी है।

गन्ने के खेत से विदेशी बाजार तक पहुंची यूपी की एक्सपोर्ट चेन, निर्यात नीति ने बदली तस्वीर

गन्ने के खेत से विदेशी बाजार तक पहुंची यूपी की एक्सपोर्ट चेन, निर्यात नीति ने बदली तस्वीर

Yogi Farmer

उत्तर प्रदेश में निर्यात की बढ़ती रफ्तार अब केवल विदेशी बाजारों तक पहुंचने वाली बोतलों और उत्पादों की कहानी नहीं रह गई है। इसकी शुरुआत गन्ने के खेत, शीरा और अनाज से होकर उद्योगों तक पहुंच रही है और वहां से पैकेजिंग, भंडारण व परिवहन के रास्ते विदेशी बाजार तक जा रही है। योगी सरकार की त्रिवर्षीय आबकारी निर्यात नीति 2026-29 ने इस पूरी एक्सपोर्ट चेन को नई गति दी है।

 

वित्तीय वर्ष 2026-27 की प्रथम तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में प्रदेश के आबकारी निर्यात में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 45.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि इसी अवधि में राष्ट्रीय वृद्धि 18.3 प्रतिशत रही – इस तरह प्रदेश की वृद्धि राष्ट्रीय औसत की दोगुनी से भी अधिक रही। वहीं मात्रा की दृष्टि से प्रदेश का निर्यात 163 प्रतिशत बढ़ा। सबसे अहम उपलब्धि यह रही कि यूपी ने करीब 39.9 लाख डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज की।

बस्ती के शीरे से विदेशी बाजार तक पहुंची कमाई

निर्यात की इस बढ़ती श्रृंखला में कृषि उत्पादों की भूमिका भी अहम है। बस्ती से 25 हजार क्विंटल शीरे का विदेश निर्यात किया गया, जिससे करीब पांच लाख अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। शीरा भिन्न शुल्क वर्गीकरण में आता है, इसलिए यह अर्जन उपरोक्त आंकड़ों से अतिरिक्त है। यानी खेतों में तैयार होने वाले कृषि उत्पाद अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रसंस्करण के बाद सीधे वैश्विक बाजार का हिस्सा बन रहे हैं। निर्यात बढ़ने के साथ अप्रैल-जुलाई 2026 के मध्य यूपी की इकाइयों ने अन्य राज्यों को भी पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 1.64 करोड़ अधिक बोतलें भेजीं, जो करीब 45.7 प्रतिशत की वृद्धि है।

नई इकाइयों से बढ़ा निवेश, बंद प्लांट भी हुए सक्रिय

निर्यात की बढ़ती संभावनाओं ने प्रदेश में नए निवेश के साथ पुरानी औद्योगिक क्षमता को भी सक्रिय किया है। उन्नाव में यूनाइटेड ब्रुअरीज और हरदोई में माउंट एवरेस्ट ब्रुअरीज नई इकाइयां स्थापित कर रही हैं। फर्रुखाबाद में वुडपेकर ग्रीनएग्री न्यूट्रिएंट्स ने इकाई स्थापित की है। वहीं एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स ने मुरादाबाद की बंद पड़ी इकाई को दोबारा शुरू किया है। गोरखपुर की कियान डिस्टिलरी ने एथेनॉल उत्पादन के साथ पेय आसवनी और ब्रुअरी के लिए भी आवेदन किया है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार, रैडिको खेतान भी अन्य राज्यों से अपने सीतापुर और रामपुर संयंत्रों में निर्यात उत्पादन स्थानांतरित कर रही है।

127.8 लाख अमेरिकी डॉलर तक पहुंचा यूपी का निर्यात 

अप्रैल-जून 2026 में देश से करीब 10.17 करोड़ अमेरिकी डॉलर का आबकारी निर्यात हुआ। इसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 127.8 लाख डॉलर रही, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 87.9 लाख डॉलर था। यानी महज एक साल में प्रदेश ने करीब 39.9 लाख डॉलर की अतिरिक्त वृद्धि हासिल की। राष्ट्रीय निर्यात में यूपी की हिस्सेदारी भी 10.2 प्रतिशत से बढ़कर 12.6 प्रतिशत हो गई और प्रदेश महाराष्ट्र एवं पंजाब के बाद देश में तीसरे स्थान पर है। प्रदेश ने तिमाही के प्रत्येक माह में वृद्धि दर्ज की।

कृषि से पैकेजिंग तक दिख रहा असर

आबकारी आयुक्त डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि निर्यात में वृद्धि का असर केवल आबकारी इकाइयों तक सीमित नहीं है। उद्योग की पिछली कड़ी गन्ना, शीरा और अनाज जैसे कृषि उत्पादों से जुड़ी है, जबकि आगे कांच की बोतल, पैकेजिंग, ढक्कन, लेबलिंग, भंडारण और परिवहन जैसे अनेक क्षेत्र जुड़े हैं। उत्पादन और निर्यात बढ़ने के साथ इन सभी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं। इस तरह निर्यात नीति ने खेत से लेकर फैक्ट्री और फैक्ट्री से विदेशी बाजार तक यूपी की एक व्यापक एक्सपोर्ट चेन को गति देने का काम किया है।

 

Sugar Price: अगले 7 दिनों में चीनी की बढ़ती कीमतें क्या करवट लेंगी? ISMA ने पैनिक बाइंग को लेकर ये जानकारी दी

Sugar Price in India: देश में चीनी की बढ़ती कीमतें लोगों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। त्योहारों का मौसम होने की वजह से लोग पहले ही खर्चों से घिरे हैं और ऊपर से ये कीमतें उन्हें और परेशान कर रही हैं। इस बीच चीनी उद्योग की सर्वोच्च संस्था इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) का बड़ा बयान सामने आया है। इसमा ने स्पष्ट किया है कि भारत में चीनी की कोई कमी नहीं है और घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता सामान्य है। संस्था का अनुमान है कि सरकार द्वारा बिना शुल्क आयात की अनुमति देने और व्यापारियों व थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक होल्डिंग लिमिट लागू करने के फैसलों के बाद अगले कुछ दिनों में चीनी के खुदरा दामों में गिरावट देखने को मिलेगी।

खुदरा कीमतों का मौजूदा गणित और बाजार का हाल

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर में चीनी की औसत खुदरा कीमत 63.05 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई। ये एक महीने पहले 48.73 रुपये किलोग्राम थी। यानी एक महीने में चीनी की कीमतों में करीब 29 फीसदी इजाफा देखा गया है। सोमवार को चीनी का अधिकतम खुदरा मूल्य 75 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया जबकि इसका मॉडल प्राइस 65 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बना हुआ है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक इसमा अध्यक्ष नीरज शिरगावकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि कीमतों में आई यह तेजी किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई कारणों के एक साथ आने से हुई है। इसमें व्यापारियों और थोक खरीदारों द्वारा की गई सट्टा खरीदारी (पैनिक बाइंग) और अनुमान से कम उत्पादन मुख्य वजहें हैं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारत के पास चीनी की कोई कमी नहीं है और देश में उत्पादन और स्टॉक की स्थिति बुनियादी रूप से बेहद मजबूत है।

सट्टा खरीदारी और पैनिक बाइंग ने बनाई आर्टिफिशियल कमी

इसमा अध्यक्ष ने बताया कि कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह सट्टा खरीदारी रही। कारोबारियों के एक वर्ग ने बाजार में चीनी की सप्लाई की किल्लत का भ्रामक माहौल पैदा किया। इसके जवाब में बड़े थोक खरीदारों ने डेढ़ दो महीने का अडवांस स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया।

नीरज शिरगावकर ने कहा कि इस सट्टा खरीदारी की वजह से चीनी बाजार में सर्कुलेशन से बाहर होकर गोदामों में बंद हो गई। इसी वजह से बाजार में एक आर्टिफिशियल तंगी की स्थिति पैदा हो गई। उन्होंने यह भी कहा कि उद्योग पर ex-mill कीमतें बढ़ाने या कृत्रिम किल्लत पैदा करने का आरोप लगाना गलत है। हालांकि कुछ मिलों द्वारा स्टॉक रोके जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसकी जांच सरकार कर रही है।

देश में उत्पादन, खपत और ओपनिंग स्टॉक का आंकड़ा भी जानिए

मार्केटिंग वर्ष 2025-26 (अक्टूबर-सितंबर) में एथेनॉल के लिए इस्तेमाल की गई चीनी को घटाने के बाद देश का शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 279 लाख टन रहने का अनुमान है। इस सीजन की शुरुआत में 50 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक मौजूद था। देश में चीनी की वार्षिक घरेलू मांग लगभग 280 से 285 लाख टन है। ये भी जानना जरूरी है कि सरकार द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से पहले देश से 8 लाख टन चीनी का निर्यात किया जा चुका था।

इसमा का अनुमान है कि सितंबर के अंत में देश के पास लगभग 35 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक बचेगा। एथेनॉल में डाइवर्ट की गई चीनी का हिसाब लगाने के बाद भी यह क्लोजिंग स्टॉक सामान्य घरेलू मांग को पूरा करने के लिए एक काफी सेफ बफर है। मौसम के असर, कम पैदावार और महाराष्ट्र में पेराई दर और उत्तर प्रदेश में रेड-रॉट की समस्या की वजह से इस सीजन में ग्रॉस चीनी उत्पादन (एथेनॉल डाइवर्जन से पहले) प्रारंभिक अनुमान 345 लाख टन से घटकर 309 लाख टन रह गया।

कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्चे चीनी (रॉ शुगर) के बिना शुल्क आयात की अनुमति दी है और डीलरों तथा थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक सीमा तय की है। इसमा अध्यक्ष ने कहा कि सरकार का यह कदम बाजार में घबराहट को रोकने और सेंटिमेंट को स्टेबल करने के लिए उठाया गया एक एहतियाती कदम है। इससे ये नहीं समझा जाना चाहिए कि चीनी की किल्लत है। संस्था ने मांग की है कि व्यापारियों के लिए मौजूदा 400 टन की स्टॉक सीमा को घटाकर 200 टन किया जाना चाहिए।

रिपोर्ट के मुताबिक ये फैसले लेने के बाद पिछले कुछ दिनों में चीनी की एक्स मिल कीमतों में गिरावट आई है। दो प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में एक्स मिल कीमतें फिलहाल 55 से 56 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास आ गई हैं। आने वाले दिनों में खुदरा दामों में भी और नरमी आने की पूरी उम्मीद है।

एथेनॉल डाइवर्जन और नए पेराई सीजन की तैयारी

इसमा अध्यक्ष ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया कि एथेनॉल बनाने के लिए चीनी का उपयोग किए जाने की वजह से कीमतें बढ़ी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम खाने योग्य चीनी के साथ कंपीटिशन नहीं कर रहा है और न ही यह कीमत बढ़ने के लिए जिम्मेदार है। इस वर्ष तीसरी तिमाही तक लगभग 29 लाख टन चीनी एथेनॉल के लिए डाइवर्ट की गई है और पूरे सीजन में यह आंकड़ा 30 लाख टन रहने की उम्मीद है। ये ऐतिहासिक रूप से 20 से 40 लाख टन के दायरे में ही है। इसके अलावा 2025-26 में एथेनॉल आपूर्ति में चीनी क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर 25 प्रतिशत रह गई है। इसका बड़ा हिस्सा अनाज क्षेत्र से आ रहा है।

अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले मार्केटिंग वर्ष 2026-27 के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि ISMA और NFCSF पेराई सत्र की शुरुआत को 10 से 15 दिन पहले करने पर काम कर रहे हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक में विशेष पेराई पहले से ही जारी है। नए सीजन की जल्दी शुरुआत और आयातित चीनी के आने से अक्टूबर में चीनी का उत्पादन बढ़कर लगभग 10 लाख टन होने की उम्मीद है (जो सामान्यतः 4 लाख टन रहता है)। इससे त्योहारों के सीजन में मांग के पीक पर रहने के दौरान बाजार में नई आपूर्ति उपलब्ध हो जाएगी। आयातित रॉ शुगर अक्टूबर तक भारत पहुंचने की संभावना है।

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Sugar Import: चीनी के भाव कब कम होंगे? ब्राजील से आने वाली है खेप, सरकार जमाखोरी पर भी सख्त

Sugar Import: भारत में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच थोड़ी राहत की खबर आई है। नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (NFCSF) के अध्यक्ष प्रकाश नाइकनवरे ने कहा है कि 15 अक्टूबर से पहले ब्राजील से कुछ चीनी की खेप भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकती है। हालांकि उन्होंने माना कि अभी यह बताना मुश्किल है कि तब तक कितनी मात्रा में चीनी आएगी।

फिलहाल ब्राजील ही सबसे बड़ा विकल्प

नाइकनवरे के मुताबिक, इस समय चीनी आयात के लिए ब्राजील ही सबसे व्यावहारिक विकल्प है। थाईलैंड आमतौर पर भारत को चीनी सप्लाई करता है। लेकिन, इस बार वो खुद उत्पादन की कमी से जूझ रहा है।

नाइकनवरे ने बताया कि ब्राजील से भारत तक जहाज आने में 40 से 45 दिन लगते हैं। इसके बाद बंदरगाह से मिलों तक चीनी पहुंचाने में भी कुछ समय लगता है। इसलिए 15 अक्टूबर तक कितनी चीनी पहुंचेगी, इसका सटीक अनुमान लगाना अभी संभव नहीं है।

सरकार समय सीमा में ढील दे सकती है

केंद्र सरकार ने पहले 31 अक्टूबर तक आयातित चीनी के पहुंचने की शर्त रखी थी। लेकिन नाइकनवरे का मानना है कि सरकार इसे सख्ती से लागू नहीं करेगी। अगर कुछ खेप रास्ते में होगी, तो उसके बाद भी उसे मंजूरी मिल सकती है।

किन राज्यों को पहले मिलेगी चीनी?

सबसे पहले बंदरगाह वाले राज्यों को फायदा मिलने की उम्मीद है।

  • महाराष्ट्र
  • कर्नाटक
  • तमिलनाडु
  • गुजरात
  • आंध्र प्रदेश

उत्तर भारत के राज्यों तक भी यही चीनी बाद में सड़क और रेल के जरिए पहुंचाई जाएगी।

सरकार ने क्यों दी आयात की मंजूरी?

20 अगस्त को सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। पिछले एक महीने में चीनी की कीमतें 24% बढ़कर 56-60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थीं। इसी वजह से यह फैसला लिया गया।

उत्पादन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं?

NFCSF ने 2025-26 सीजन के लिए 279 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान बरकरार रखा है। इसमें एथेनॉल के लिए भेजी जाने वाली 24 लाख टन चीनी शामिल नहीं है।

फेडरेशन का अनुमान है कि 1 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले सीजन में शुरुआती स्टॉक 35 लाख टन रहेगा। देश की औसत मासिक खपत करीब 22 लाख टन है। नवंबर तक नई पेराई शुरू होने से सप्लाई और बढ़ने की उम्मीद है। नाइकनवरे ने कहा कि फिलहाल घबराहट जैसी कोई स्थिति नहीं दिख रही।

सरकार की सख्ती के बाद कीमतें घटीं

यह बयान ऐसे समय आया है, जब केंद्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने हाल ही में चीनी उद्योग पर कीमतें बढ़ाने और स्टॉक जमा करने का आरोप लगाया था। इसके बाद सरकार ने कई कदम उठाए।

  • मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन
  • व्यापारियों पर 200 टन की स्टॉक सीमा
  • बड़े खरीदारों के लिए अलग सीमा
  • राज्यों में गोदामों की जांच
  • फ्लाइंग स्क्वॉड की तैनाती

नाइकनवरे ने बताया कि शनिवार को खुले टेंडरों में एक्स-मिल चीनी के दाम करीब ₹5 प्रति किलो गिर गए। उनका मानना है कि अगले हफ्ते भी कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

दुनिया में चीनी सस्ती क्यों हुई?

दिलचस्प बात यह रही कि भारत के आयात के ऐलान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्ची चीनी महंगी होने के बजाय सस्ती हो गई। कीमत पहले 18 सेंट प्रति पाउंड तक गई, लेकिन बाद में गिरकर करीब 17.50 सेंट प्रति पाउंड रह गई।

नाइकनवरे का कहना है कि वैश्विक सप्लाई फिलहाल आरामदायक स्थिति में है। इसी वजह से भारत के 10 लाख टन आयात का अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर बड़ा असर नहीं पड़ा।

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