Bhauma Pradosh Vrat 2026 Date: सावन के दूसरे और अंतिम प्रदोष व्रत पर त्रिपुष्कर योग का संयोग, जानें कब होगा भौम प्रदोष व्रत और पूजा का मुहूर्त

Bhauma Pradosh Vrat 2026 Date: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का अहम स्थान है। यह तिथि भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। माना जाता है कि भगवान शिव इस दिन कैलाश पर्वत पर प्रदोष काल में प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। और इस समय भगवान की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। प्रदोष व्रत हिंदू कैलेंडर के हर माह की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत में प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद पूजा का विधान है। प्रदोष व्रत का नाम उस दिन से तय होता है, जब यह तिथि पड़ रही हो। जैसे सोमवार को त्रयोदशी तिथि लगने पर सोम प्रदोष व्रत किया जाता है।

सावन माह का अंतिम प्रदोष व्रत मंगलवार के पड़ रहा है। सावन शुक्ल त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ने की वजह से यह भौम प्रदोष व्रत होगा। यह व्रत उन श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से फलदायी होता है जिनकी कुंडली में मंगल दोष होता है। संतान की प्राप्ति के लिए भी प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस दिन मंगला गौरी व्रत का भी सुंदर संयोग बनेगा। इस व्रत के दिन शिव पूजा के लिए करीब सवा दो घंटे का मुहूर्त है। सावन के भौम प्रदोष व्रत के दिन त्रिपुष्कर योग बन रहा है, जो तीन गुना फल प्रदान करने वाला माना जाता है।

भौम प्रदोष व्रत 2026 तारीख

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 25 अगस्त को सुबह 6 बजकर 20 मिनट पर प्रारंभ होगी। इस तिथि की समाप्ति 26 अगस्त को सुबह में 7 बजकर 59 मिनट पर होगी। उदयातिथि के आधार पर त्रयोदशी तिथि 26 अगस्त को है, लेकिन सावन का अंतिम प्रदोष यानि भौम प्रदोष व्रत 25 अगस्त दिन मंगलवार को रखा जाएगा। क्योंकि प्रदोष काल का पूजा मुहूर्त 25 अगस्त को मिल रहा है।

भौम प्रदोष व्रत 2026 मुहूर्त

इस बार भौम प्रदोष व्रत की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम को 6 बजकर 51 मिनट से है, जो रात 9 बजकर 4 मिनट तक रहेगा। शिव पूजा के लिए भक्तों को 2 घंटे 13 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा। इसके अलावा प्रदोष के दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रात:काल 04:27 ए एम से 05:11 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त दिन में 11 बजकर 57 मिनट से दोपहर 12 बजकर 49 मिनट तक रहेगा। उस दिन का निशिता मुहूर्त देर रात 12:01 ए एम से लेकर 26 अगस्त को 12:45 ए एम तक है।

भौम प्रदोष व्रत में त्रिपुष्कर योग का संयोग

सावन का यह भौम प्रदोष व्रत त्रिपुष्कर योग में किया जाएगा। त्रिपुष्कर योग सुबह 5 बजकर 55 मिनट से सुबह 6 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। इस योग में किए गए शुभ कार्यों के तीन गुने फल प्राप्त होते हैं। प्रदोष के दिन रवि योग भी बन रहा है, जो रात में 10 बजकर 51 मिनट से 26 अगस्त को सुबह 5 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। रवि योग भी एक शुभ योग होता है। उस दिन सुबह में आयुष्मान् योग 07 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। इस योग में आयु लंबी होती है, उत्तम सेहत का आशीर्वाद मिलता है। सुबह 7:41 बजे से सौभाग्य योग बनेगा, जो रात तक रहेगा। त्रयोदशी व्रत पर उत्तराषाढा नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 10:51 पी एम तक रहेगा, फिर श्रवण नक्षत्र का प्रारंभ होगा।

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Kamika Ekadashi 2026 Katha: आज द्विपुष्कर योग में कामिका एकादशी का व्रत आज, पूजा में जरूर सुनें ये व्रत कथा और जानें आज पूजा का मुहूर्त

Kamika Ekadashi 2026 Katha: कामिका एकादशी व्रत भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद पहला एकादशी व्रत होता है। यह उपवास सावन में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से ब्रह्म हत्या की दोष से मुक्ति मिलती है, पाप मिटते हैं और श्री हरि की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत की पूजा में भक्तों को कामिका एकादशी की व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए।

माना जाता है कि ऐसा करने वाले श्रद्धालुओं को वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है। इस साल कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त रविवार को है। इस दिन द्विपुष्कर योग बन रहा है। इस योग में व्रत, पूजा पाठ, जप, तप और शुभ काम करने का आपको दोगुना फल प्राप्त होगा। आइए जानें कामिका एकादशी की व्रत कथा, मुहूर्त और पारण समय के बारे में।

कामिका एकादशी 2026 मुहूर्त और पारण समय

सावन कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ : 8 अगस्त, दोपहर 1:59 बजे से

सावन कृष्ण एकादशी तिथि का समापन : 9 अगस्त, 11:04 एम पर

कामिका एकादशी पूजा मुहूर्त : सुबह 07:27 बजे से दोपहर 12:26 बजे तक

लाभ-उन्नति मुहूर्त : सुबह 09:07 बजे से 10:47 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : सुबह 10:47 बजे से दोपहर 12:26 बजे तक

द्विपुष्कर योग : 11:04 ए एम से दोपहर 02:43 बजे तक

व्रत पारण समय : 10 अगस्त, सोमवार, सुबह 5:47 बजे से 8 बजे

द्वादशी तिथि का समापन : 10 अगस्त, सुबह 08:00 बजे

कामिका एकादशी व्रत कथा

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताने का निवेदन किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि एक बार ब्रह्मदेव ने नारद जी को एक कथा सुनाई थी, वही कथा मैं आपको सुनाता हूं-

ब्रह्माजी ने नारद मुनि को बताया कि श्रावण कृष्ण एकादशी को कामिका एकादशी भी कहा जाता है। जो लोग यह व्रत रखते हैं, उनको सुदर्शन चक्र धारण करने वाले भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत की कथा के अनुसार, एक गांव में एक ठाकुर रहता था। वह बड़ा ही क्रोधी था। एक दिन वो अपने घर से किसी काम के लिए निकला, तो उसका गांव के ही एक ब्राह्मण से किसी बात को लेकर वाद विवाद हो गया।

देखते ही देखते बात इतनी बिगड़ गई कि उसने क्रोध में आकर उस ब्राह्मण की हत्या कर दी। जब उसका गुस्सा शांत हुआ तो उसे अपने किए गए पाप का एहसास हुआ। उस अपराध बोध से मुक्ति के लिए उसने उस ब्राह्मण का अंतिम संस्कार करना चाहा, लेकिन गांव के अन्य ब्राह्मणों ने उसे इसकी अनुमति नहीं दी।

उस ठाकुर पर ब्रह्म हत्या का दोष था। समय व्यतीत होने के साथ-साथ उसके मन पर ब्रह्म हत्या के दोष और आत्म ग्लानि का भार बढ़ने लगा। एक दिन उसकी मुलाकात एक ऋषि से हुई। उसने ब्रह्म हत्या की घटना बताई और उससे मुक्ति का उपाय पूछा। तब उस ऋषि मुनि ने उससे कहा कि ब्रह्म हत्या से मुक्ति के लिए तुमको सावन कृष्ण एकादशी यानि कामिका एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करना चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा से ही तुम ब्रह्म हत्या दोष से मुक्ति पा सकते हो। इससे तुम्हारे अन्य पाप भी मिट जाएंगे।

जब श्रावण कृष्ण एकादशी आई तो उस ठाकुर ने विधिपूर्वक कामिका एकादशी व्रत किया और भगवान विष्णु की पूजा की। रात्रि जागरण के समय वह भगवान विष्णु की मूर्ति के पास सो गया। स्वप्न में भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और उनकी कृपा से वह ब्रह्म हत्या दोष से मुक्त हो गया।

Som Pradosh Vrat 2026 Date: वज्र योग और आर्द्रा नक्षत्र में इस दिन किया जाएगा सावन का पहला प्रदोष व्रत, पूजा के लिए मिलेगा 2 घंटे का समय

Som Pradosh Vrat 2026 Date: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष स्थान है। यह व्रत हिंदू कैलेंडर के हर माह में कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। यह तिथि भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। इसमें प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के पूजा करने का विधान है। हर माह में दो बार आने वाले इस व्रत का नाम उस दिन से तय होता है, जिस दिन त्रयोदशी तिथि पड़ती है। जैसे सोमवार को त्रयोदशी तिथि पड़ने पर इस व्रत का नाम सोम प्रदोष व्रत होता है और शनिवार को त्रयोदशी तिथि पड़ने पर इसे शनि प्रदोष व्रत कहते हैं।

यूं तो पूरा सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है, लेकिन सावन के प्रदोष व्रत का विशेष स्थान है। सावन माह में हर दिन शिव पूजा के लिए अच्छा होता है, लेकिन सावन में प्रदोष व्रत विशेष फलदायी होता है। पंचांग के अनुसार, सावन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि सोमवार के दिन पड़ रही है, इसलिए इसे सोम प्रदोष व्रत कहा जा रहा है। सावन के पहले प्रदोष व्रत के लिए पूजा का शुभ मुहूर्त 2 घंटे तक है। इस समय में जलाभिषेक और पूजा विधि विधान से करना शुभ फलदायी होगा।

सावन प्रदोष व्रत 2026 तारीख

पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 10 अगस्त को सुबह 08:00 बजे से शुरू होगी। इस तिथि का समापन 11 अगस्त को प्रात: 04 बजकर 54 मिनट पर होगा। ऐसे में सावन का पहला प्रदोष व्रत या सोम प्रदोष व्रत 10 अगस्त को किया जाएगा।

सोम प्रदोष व्रत 2026 मुहूर्त

सोम प्रदोष व्रत के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त दो घंटे का है, शाम को 07 बजकर 05 मिनट से है और यह रात 09 बजकर 14 मिनट तक। इस समय में पूजा करना शुभ फलदायी होता है।

ब्रह्म मुहूर्त : प्रात:काल 04:22 बजे से प्रात: 05:05 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 12:53 बजे तक

राहुकाल : सुबह 07:27 बजे से सुबह 09:07 बजे तक

वज्र योग और आर्द्रा नक्षत्र में सोम प्रदोष

सावन के पहले प्रदोष व्रत यानी सोम प्रदोष व्रत के दिन वज्र योग और आर्द्रा नक्षत्र लग रहा है। प्रदोष पर वज्र योग प्रात:काल से लेकर रात 10 बजकर 27 मिनट तक रहेगा, उसके बाद से सिद्धि योग बनेगा, जो अगले दिन सुबह तक रहेगा। वहीं, उस दिन आर्द्रा नक्षत्र सुबह से लेकर दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक है, उसके बाद से पुनर्वसु नक्षत्र है।

त्रयोदशी तिथि के बाद भद्रा

त्रयोदशी तिथि के समापन के बाद यानि 11 अगस्त को प्रात: 04 बजकर 54 मिनट भद्रा का प्रारंभ होगा, जो प्रात: 05 बजकर 48 मिनट तक रहेगी। इस भद्रा का वास धरती पर है, इस वजह से भद्रा में कोई शुभ काम न करें।

सोम प्रदोष व्रत का महत्व

सोम प्रदोष व्रत में शिव पूजा करने से सुख, समृद्धि, मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। कुंडली का चंद्र दोष भी दूर होता है। वैवाहिक जीवन सुखमय होता है, सेहत ठीक रहती है।

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Janmashtami Date 2026: जन्माष्टमी का पर्व हिंदू धर्म के कई प्रमुख व्रत और त्योहारों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण ने वासुदेव और देवकी के पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इस दिन को पूरी दुनिया में मौजूद कृष्ण भक्त बहुत धूमधाम से मनाते हैं। कृष्ण भक्त बेसब्री से इस पर्व के आने का इंतजार करते हैं। इस दिन देशभर में खास उत्साह देखने को मिलता है। जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा-अर्चना होती है और 56 भोग लगाए जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, लड्डू गोपाल की पूजा और व्रत करने से साधक के जीवन में खुशियों का आगमन होता है। साथ ही सुख-सृमद्धि में वृद्धि होती है। इस अवसर पर घरों और मंदिरो में लड्डू गोपाल की झांकियां निकाली जाती हैं और भजन-कीर्तन किया जाता है। आइए जानें इस साल कृष्ण जन्माष्टमी पर्व की सही तारीख क्या है और इस दिन निशिथ काल पूजा मूहूर्त क्या है?

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 तारीख और शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद अष्टमी तिथि का प्रारंभ 4 सितंबर 2026, मध्यरात्रि 02:25 बजे से होगा। वहीं, अष्टमी तिथि का समापन 5 सितंबर 2026, रात 12:13 बजे होगा। उदयातिथि के अनुसार, इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।

रोहिणी नक्षत्र समय

रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ : 4 सितंबर 2026, रात 12:29 बजे

रोहिणी नक्षत्र समाप्त : 4 सितंबर 2026, रात 11:04 बजे

जन्माष्टमी का निशिथ काल शुभ मुहूर्त

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मध्यरात्रि में मनाया जाता है :

निशिथ काल मुहूर्त : 4 सितंबर 2026, रात 11:57 बजे से 5 सितंबर 2026, रात 12:43 बजे तक

पूजा अवधि : 45 मिनट

मध्यरात्रि का मुख्य क्षण : रात 12:20 बजे (5 सितंबर)

व्रत पारण का समय

शास्त्रानुसार पारण : 5 सितंबर 2026, सुबह 06:01 बजे के बाद

तत्काल/जन्मोत्सव के बाद पारण : 5 सितंबर 2026, मध्यरात्रि 12:43 बजे के बाद (पूजा संपन्न होने पर)

जन्माष्टमी व्रत के नियम

  • व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  • दिनभर फलाहार अथवा निर्जल व्रत रखें, जैसा भक्त की शक्ति एवं परंपरा हो।
  • दिनभर भगवान श्रीकृष्ण के भजन-कीर्तन, मंत्र जाप एवं श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करें।
  • निशिता काल में विधिवत पूजा करने के पश्चात ही व्रत का पारण करें।
  • व्रत के दौरान क्रोध, वाद-विवाद और तामसिक विचारों से दूर रहें, तथा मन को सात्विक बनाए रखें।

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Hariyali Teej 2026: मनचाहा वर पाने के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस दिन करेंगी हरियाली तीज, जानें इस व्रत की सही तारीख, मुहूर्त और महत्व

Hariyali Teej 2026: हिंदू धर्म में हरियाली तीज का पर्व पूरे साल में आने वाली प्रमुख तीज पर्व में से एक माना जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत विशेष स्थान रखता है। माना जाता है कि हरियाली तीज का व्रत करने से भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है। हरियाली तीज का व्रत सिर्फ विवाहित महिलाएं ही नहीं करती हैं, बल्कि कुंवारी कन्याएं भी सुयोग्य वर की कामना से यह व्रत करती हैं।

हरियाली तीज का व्रत श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए 108 वर्षों की कठोर तपस्या थी। माता पार्वती की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह व्रत सावन के महीने में किया जाता है, जब प्रकृति चारों तरफ हरी-भरी हो जाती है। इसलिए इस व्रत में हरे रंग का विशेष महत्व है। इस व्रत में महिलाएं हरे रंग के कपड़े पहनती हैं, हरी चूड़ियां, मेहंदी और सोलह श्रंगार करती हैं।

हरियाली तीज 2026 तिथि और मुहूर्त

तृतीया तिथि प्रारंभ : 14 अगस्त 2026 को शाम 06:46 बजे

तृतीया तिथि समाप्त : 15 अगस्त 2026 को शाम 05:28 बजे

उदयातिथि के अनुसार व्रत की तारीख : 15 अगस्त 2026 (शनिवार)

प्रदोष काल पूजा मुहूर्त : शाम 06:38 बजे से रात 08:51 बजे तक

हरियाली तीज पूजा का शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 4:50 बजे से सुबह 5:35 बजे तक

अभिजित मुहूर्त : दोपहर 12:17 बजे से दोपहर 1:08 बजे तक

विजय मुहूर्त : दोपहर 2:51 बजे से दोपहर 3:42 बजे तक

गोधूलि मुहूर्त : शाम 7:06 बजे से शाम 7:29 बजे तक

अमृत काल : रात 8:18 बजे से रात 9:53 बजे तक

हरियाली तीज धार्मिक व पौराणिक महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता पार्वती की 108 वर्षों की कठोर तपस्या और साधना के बाद भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला या निराहार व्रत रखती हैं। कुंवारी कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से यह व्रत रखती हैं।

तीज की मुख्य परंपराएं और रीति-रिवाज

सोलह श्रृंगार : इस दिन हरे रंग का विशेष महत्व होता है। महिलाएं हरे रंग की साड़ी या सूट पहनती हैं, हाथों में हरी चूड़ियां और मेहंदी लगाती हैं।

सिंधारा परंपरा : हरियाली तीज पर मायके (माता-पिता के घर) से शादीशुदा बेटियों के लिए उपहार भेजे जाते हैं, जिसे ‘सिंधारा’ कहा जाता है। इसमें घेवर, सुहाग सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी), वस्त्र और मिठाइयां शामिल होती हैं।

झूला झूलना : सावन के मौसम में बगीचों और आंगन में झूले डाले जाते हैं। महिलाएं और बालिकाएं एक साथ मिलकर झूला झूलती हैं और पारंपरिक लोकगीत (कजरी व तीज गीत) गाती हैं।

मिट्टी से बनाई जाती है भगवान की प्रतिमा : इस दिन शाम को (प्रदोष काल में) बालू या मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश जी की प्रतिमा बनाई जाती है। माता पार्वती को सुहाग की 16 सामग्रियां अर्पित की जाती हैं और तीज व्रत कथा सुनी जाती है।

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Sawan Shivratri 2026: सावन में कब मनाई जाएगी शिवरात्रि? जानिए सही तारीख, पूजा और जलाभिषेक का शुभ मुहूर्त

Sawan Shivratri 2026: सावन का महीना शुरू हो चुका है। भगवान शिव को समर्पित इस माह में कई प्रमुख व्रत और पर्व मनाए जाते हैं। इनमें से एक है शिवरात्रि का पर्व। यूं तो शिवरात्रि हिंदू कैलेंडर के हर माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आती है, लेकिन सावन के महीने में आने वाले शिवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन श्रद्धालु कांवड़ में जल भरकर लाते हैं और अपने आराध्य भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

सावन शिवरात्रि, भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण पर्व मानी जाती है। यह श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन श्रद्धालु जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, व्रत और शिव पूजन करते हैं। इस दिन पूजा, व्रत और रुद्राभिषेक का फल कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से कई ग्रह दोष भी शांत होते हैं। आइए जानें इस साल सावन शिवरात्रि कब है और पूजा का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा।

सावन शिवरात्रि 2026 की तिथि व शुभ मुहूर्त

शिवरात्रि का पर्व सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। इस साल चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ 11 अगस्त 2026, सुबह 04:54 बजे से हो रहा है। सावन कृष्ण चतुर्दशी तिथि का समापन 12 अगस्त 2026, रात 01:52 बजे होगा। उदयातिथि के अनुसार, शिवरात्रि का पर्व 11 अगस्त 2026, मंगलवार को मनाया जाएगा।

निशिता काल पूजा मुहूर्त : 11 अगस्त की रात 12:05 बजे से 12:48 बजे तक

जलाभिषेक का समय : 11 अगस्त सुबह 04:54 बजे से लेकर 12 अगस्त रात 01:52 बजे तक

चार प्रहर की पूजा का समय

रात्रि में भगवान शिव की चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है:

प्रथम प्रहर : शाम 07:04 बजे से रात 09:45 बजे तक

द्वितीय प्रहर : रात 09:45 बजे से रात 12:26 बजे तक

तृतीय प्रहर : रात 12:26 बजे से सुबह 03:07 बजे तक (12 अगस्त)

चतुर्थ प्रहर : सुबह 03:07 बजे से सुबह 05:49 बजे तक (12 अगस्त)

सावन 2026 शिवरात्रि पूजा सामग्री

जल, कच्चा दूध, दही, शहद, गंगाजल, बेलपत्र, भांग, धतूरा, शमी के पत्ते, सफेद फूल, फल और भस्म।

सावन 2026 शिवरात्रि पूजा विधि

  • प्रातः काल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  • शिवलिंग का जल और पंचामृत से अभिषेक करें।
  • बेलपत्र, धतूरा और फल-फूल चढ़ाकर “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर जाप करें।
  • शिव आरती करें व प्रसाद वितरित करें।
  • शिवलिंग पर तुलसी पत्र, केतकी का फूल, सिंदूर या हल्दी अर्पित न करें।

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Pradosh Vrat July 2026: आषाढ़ के पहले प्रदोष व्रत पर मासिक शिवरात्रि और रविवार का सुंदर संयोग, जानें पूजा मुहूर्त और प्रदोष काल का समय

Pradosh Vrat July 2026: आज जुलाई का पहला प्रदोष व्रत है। प्रदोष व्रत हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। आज आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रवि प्रदोष व्रत किया जा रहा है। रविवार को त्रयोदशी तिथि होने की वजह से यह रवि प्रदोष व्रत है। इस माह प्रदोष व्रत के दिन मासिक शिवरात्रि और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र और रविवार का शुभ संयोग होने के कारण इसे रोहिणी प्रदोष और रवि प्रदोष व्रत माना जाता है। आज प्रदोष व्रत, रविवार और मासिक शिवरात्रि का तीन गुना पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। ये तीनों ही व्रत 2 शुभ योग में किए जाएंगे। आज वृद्धि योग प्रात:काल से लेकर रात 08:06 बजे तक रहेगा, उसके बाद से ध्रुव योग होगा। वृद्धि योग में किए गए कार्यों में बढ़ोत्तरी होगी, वहीं ध्रुव योग में स्थिर या स्थायी कार्य करने चाहिए।

रवि प्रदोष पर आषाढ़ मासिक शिवरात्रि का संयोग

12 जुलाई रविवार को रवि प्रदोष व्रत और आषाढ़ मासिक शिवरात्रि एक साथ हैं। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी तिथि 12 जुलाई को मध्यरात्रि 02:04 बजे से लेकर रात 10:29 बजे तक है, उसके बाद से आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी तिथि शुरू होगी और अगले दिन 13 जुलाई सोमवार को शाम 6:49 बजे तक है।

उदयातिथि और प्रदोष काल के आधार पर प्रदोष रविवार को है, वहीं शिवरात्रि के लिए निशिता मुहूर्त की गणना करते हैं, इस आधार पर आषाढ़ कृष्ण चतुर्दशी तिथि में निशिता मुहूर्त 12 जुलाई को ही प्राप्त हो रहा है। इसलिए 12 जुलाई को रवि प्रदोष और आषाढ़ शिवरात्रि का व्रत एक साथ रखा जाएगा।

रवि प्रदोष व्रत पूजा विधि

  • प्रात:काल स्नान आदि से निवृत हो जाएं और साफ कपड़े पहनें।
  • उसके बाद सबसे पहले व्रत और पूजा का संकल्प करें।
  • फिर सूर्योदय के समय भगवान सूर्य की पूजा करें और उनको जल से अर्घ्य दें।
  • सूर्य मंत्र का जाप करें।
  • शिव मंदिर जाएं या घर पर ही शिवजी को जलाभिषेक करें।
  • बेलपत्र, भांग, धतूरा, अक्षत्, चंदन, शहद, फूल, माला आदि से शिवरात्रि पूजन करें।
  • शाम को सूर्यास्त के बाद प्रदोष व्रत की पूजा करें। इसमें भी महादेव की पूजा विधिपूर्वक करें।

रवि प्रदोष और आषाढ़ शिवरात्रि का मुहूर्त

प्रदोष व्रत की पूजा हमेशा शाम के समय ही करते हैं, लेकिन शिवरात्रि व्रत में ऐसा नहीं है। आप जब चाहें तब शिव पूजा कर लें। आइए जानें प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त और शिवरात्रि पूजा मुहूर्त

प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त : आज, शाम 7:22 बजे से रात 9:24 बजे तक

शिवरात्रि पूजा मुहूर्त : सुबह 07:15 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक

12 जुलाई के अन्य शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त : प्रात:काल 04:10 बजे से 04:51 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त : दिन में 11:59 बजे से दोपहर 12:54 बजे तक

लाभ-उन्नति मुहूर्त : सुबह 08:59 बजे से 10:43 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : सुबह 10:43 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक

शुभ-उत्तम मुहूर्त : शाम 07:22 बजे से 08:38 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : रात 08:38 बजे से 09:54 बजे तक

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Ashadh Pradosh Vrat 2026 upay: आषाढ़ माह का पहला प्रदोष व्रत होगा कब, इस दिन खास उपाय करने वालों के घर जल्द बजेगी शादी की शहनाई

Ashadh Pradosh Vrat 2026 upay: हिंदी माह के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि भगवान शिश को समर्पित है। इस दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में विराजमान होते हैं। इस समय विधि-विधान से की गई भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना विशेष फल प्रदान करती है।

भगवान शिव और माता पार्वती के भक्त दिनभर उपवास रखकर प्रदोष काल में शिव परिवार की पूजा कर व्रत का पारण करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली विवाहित महिलाओं के जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य बढ़ता है। वहीं जो अविवाहित लोग सच्चे मन से यह व्रत रखते हैं, उनके विवाह के योग जल्दी बनने लगते हैं। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, प्रदोष व्रत पर किए गए विशेष उपाय शादी में आ रही बाधाओं को दूर कर सकते हैं। आइए जानें आषाढ़ माह का पहला प्रदोष व्रत किस दिन किया जाएगा और इस दिन कौन से उपाय कर सकते हैं।

आषाढ़ का पहला प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 12 जुलाई 2026 को सुबह 02 बजकर 04 मिनट पर शुरू होगी और रात्रि 10 बजकर 29 मिनट के लगभग तक रहेगी। इसलिए आषाढ़ का पहला प्रदोष व्रत 12 जुलाई रविवार को रखा जाएगा। रविवार के दिन पड़ने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा मुहूर्त शाम 07 बजकर 22 मिनट से रात्रि 09 बजकर 24 मिनट तक रहेगा।

रवि प्रदोष व्रत का महत्व

रवि प्रदोष व्रत भगवान शिव और सूर्यदेव की उपासना का अत्यंत शुभ अवसर माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने पर करियर और कारोबार में तरक्की के योग बनते हैं।

जल्द विवाह के लिए करें ये उपाय

विवाह में बार-बार रुकावटें आ रही हों, तो प्रदोष व्रत के दिन स्नान के बाद लाल वस्त्र पहनकर भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धापूर्वक पूजा करें। पूजा के दौरान माता को सिंदूर अर्पित करें और उसी सिंदूर को माथे पर लगाकर शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें, इससे विवाह संबंधी बाधाएं दूर होने की मान्यता है।

विवाह में बार-बार अड़चनें आने का कारण कमजोर शुक्र ग्रह माना जाता है। प्रदोष व्रत पर भगवान शिव का शहद और सुगंधित जल से अभिषेक करें। इस उपाय से शुक्र ग्रह मजबूत होता है।

विवाह में बार-बार आ रही बाधाएं दूर करने के लिए प्रदोष व्रत पर भगवान शिव का विशेष अभिषेक करें। स्नान के बाद गंगाजल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर अर्पित करें। मान्यता है कि इससे ग्रह दोष शांत होते हैं और शीघ्र विवाह के शुभ योग बनने लगते हैं।

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Guru Purnima 2026: गुरु को समर्पित होती है साल की ये पूर्णिमा तिथि, जानें गुरु पूर्णिमा की सही तारीख, मुहूर्त और महत्व

Guru Purnima 2026: हिंदी कैलेंडर में पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथियां आती हैं। पूर्णिमा तिथि माता लक्ष्मी को समर्पित है, लेकिन इस दिन भगवान सत्यनारायण और चंद्र देव की भी पूजा की जाती है। पूरे साल में आने वाली सभी पूर्णिमा तिथियों में आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि गुरु को समर्पित की गई है। इस दिन अपने आराध्य के साथ-साथ गुरु का भी सम्मान करने की प्राचीन परंपरा है। यह दिन पूरे देश में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, गुरु पूर्णिमा आषाढ़ महीने की पूर्णिमा को मनाई जाती है, जो आमतौर पर जून और जुलाई के बीच आती है। यह त्योहार भारत, नेपाल और भूटान में हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के लोग मनाते हैं। हिंदू अपने गुरुओं की पूजा करते हैं, बौद्ध इसे भगवान बुद्ध को समर्पित करते हैं। वहीं, जैन धर्म के अनुयायी अपने आध्यात्मिक गुरुओं का सम्मान करते हैं।

गुरु पूर्णिमा 2026 कब है?

गुरु पूर्णिमा बुधवार, 29 जुलाई, 2026 को है

पूर्णिमा तिथि शुरू – 28 जुलाई, 2026 को शाम 06:18 बजे

पूर्णिमा तिथि खत्म – 29 जुलाई, 2026 को रात 08:05 बजे

गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यह महाभारत के रचयिता और वेदों को इकट्ठा करने वाले महर्षि वेद व्यास की जयंती है। इससे इस मौके का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और बढ़ जाता है।

गुरु पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है?

गुरु पूर्णिमा को बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता है। सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें, स्नान करके साफ कपड़े पहनें, अपने माता-पिता और बड़ों का आशीर्वाद लें और सूर्य भगवान को जल यानी अर्घ्य अर्पित करें। इस दिन भक्त मंदिरों, आश्रमों और मठों में आशीर्वाद लेने जाते हैं। कई लोग व्रत भी रखते हैं और अपने गुरुओं को समर्पित भजन और श्लोक पढ़ते हैं।

गुरु पूर्णिमा पूजा विधि

सबसे पहले भगवान गणेश की पूजा करें, क्योंकि वे ज्ञान और बुद्धि के देवता हैं। अगर, आपने किसी गुरु से दीक्षा ली है, तो गुरु मंत्र का जाप करें। अपने आध्यात्मिक या जीवन के गुरु से मिलकर उनका आशीर्वाद लें।

गणेश मंत्र

ॐ गं गणपतये नमः

ॐ वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा…

गुरु पूर्णिमा का महत्व

हिंदू धर्म में पूर्णिमा का दिन बहुत शुभ माना जाता है, इस दिन लोग भगवान विष्णु और चंद्र देव की पूजा करते हैं। साल में 12 पूर्णिमा आती हैं, लेकिन गुरु पूर्णिमा खास है, क्योंकि यह दिन गुरु के सम्मान के लिए समर्पित होता है।

Yogini Ekadashi 2026 Date: ये होगी आषाढ़ मास की पहली एकादशी, जानें योगिनी एकादशी व्रत की तारीख, पूजा मुहूर्त और विधि

Yogini Ekadashi 2026 Date: ये होगी आषाढ़ मास की पहली एकादशी, जानें योगिनी एकादशी व्रत की तारीख, पूजा मुहूर्त और विधि

Yogini Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित है और इस दिन सच्च मन से श्री हरि की पूजा करने पर साधक को जीवन के कष्टों से छुटकारा मिलता है और सुख-समृद्धि आती है। हर हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु को समर्पित व्रत किया जाता है। इस तरह पूरे साल में 24 एकादशी तिथियां आती हैं। हर एकादशी तिथि का अपना महत्व और स्थान होता है।

योगिनी एकादशी 2026 तारीख

पंचांग के अनुसार, इस साल आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ 10 जुलाई शुक्रवार को सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर हो रहा है। यह 11 जुलाई शनिवार को प्रात: 5 बजकर 22 मिनट तक मान्य रहेगी।

दो दिन होगा योगिनी एकादशी व्रत

11 जुलाई को हरि वासर सुबह 10 बजकर 32 मिनट पर खत्म हो रहा है, इस वजह से योगिनी एकादशी का व्रत दो दिन रखा जाएगा। 10 जुलाई को गृहस्थ लोग योगिनी एकादशी का व्रत रहेंगे, वहीं 11 जुलाई को वैष्णव संप्रदाय के लोग यह व्रत रखेंगे।

योगिनी एकादशी 2026 मुहूर्त

10 जुलाई को योगिनी एकादशी की पूजा सुबह 08:16 बजे से 10 बजकर 42 मिनट तक कर सकते हैं। उस दिन लाभ-उन्नति मुहूर्त 07:15 ए एम से 08:59 ए एम तक है, वहीं अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त 08:59 ए एम से 10:42 ए एम तक रहेगा। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:10 ए एम से 04:50 ए एम है, वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:59 ए एम से दोपहर 12:54 पी एम तक है।

योगिनी एकादशी 2026 शुभ योग

योगिनी एकादशी व्रत पर 10 जुलाई धृति योग सुबह 07:15 ए एम तक है, उसके बाद शूल योग है, जो 11 जुलाई को 03:51 ए एम तक रहेगा। फिर गण्ड योग बनेगा। व्रत के दिन भरणी नक्षत्र दोपहर 01:15 पी एम तक है, उसके बाद से कृत्तिका नक्षत्र है।

योगिनी एकादशी पर रहेगा भद्रा का साया

10 जुलाई को भद्रा काल प्रात:काल में 05:31 बजे से प्रारंभ होगा और सुबह 08:16 ए एम तक रहेगी। यह भद्रा 2 घंटे से अधिक समय तक है, लेकिन इसका वास स्वर्ग में है, ऐसे में इसका कोई अशुभ प्रभाव धरती पर नहीं होगा।

योगिनी एकादशी 2026 पारण समय

यदि आप 10 जुलाई को योगिनी एकादशी व्रत रखते हैं, तो व्रत का पारण 11 जुलाई को दोपहर 01:50 पी एम से शाम 04:36 पी एम के बीच कर सकते हैं। वहीं जो लोग 11 जुलाई को यह व्रत रखेंगे, वे पारण 12 जुलाई को प्रात: 05:32 ए एम से लेकर सुबह 08:18 ए एम के बीच कर सकते हैं।

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