Aja Ekadashi 2026 Date: भादों की पहली एकादशी होगी अजा एकादशी, इस दिन बन रहे दुर्लभ संयोग में पूजा और व्रत का मिलेगा राजसुख

Aja Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। यह व्रत हर हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से सभी कष्टों का निवारण होता है। ऐसा ही एक व्रत है अजा एकादशी का भी। यह व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। यह भादों माह की पहली एकादशी होती है। यह भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत है। सनातन धर्म में इस एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। आइए जानें इस साल ये व्रत कब किया जाएगा, किस दुर्लभ योग में पूजा और व्रत करने से मिलेगा राजसुख और इसका महत्व क्या है?

अजा एकादशी 2026 तारीख

भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 6 सितंबर को शाम 07:29 बजे शुरू होगी और 7 सितंबर को शाम 5 बजकर 3 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर दिन सोमवार को रखा जाएगा। इस व्रत का पारण 8 सितंबर मंगलवार को सुबह में 6 बजकर 2 मिनट से सुबह 8 बजकर 33 मिनट के बीच कर सकते हैं।

सर्वार्थ सिद्धि योग में अजा एकादशी

इस बार की अजा एकादशी पर सर्वार्थ सिद्धि योग शाम को 06 बजकर 14 मिनट पर बनेगा और यह अगले दिन 8 सितंबर को सुबह 06 बजकर 02 मिनट तक रहेगा। व्रत वाले दिन प्रात:काल से लेकर सुबह 06:41 ए एम तक व्यतीपात योग है, उसके बाद से वरीयान् योग बनेगा, जो 8 सितंबर को तड़के 03:38 ए एम तक है, फिर परिघ योग होगा।

अजा एकादशी 2026 मुहूर्त

यदि आपको अजा एकादशी का व्रत रखना है तो पूजा का मुहूर्त सुबह में 06:02 ए एम से 07:36 ए एम तक है, उसके बाद सुबह में 09:10 ए एम से 10:45 ए एम तक है। इस समय में आप भगवान विष्णु की पूजा कर सकते हैं। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त 04:31 ए एम से 05:16 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:54 ए एम से दोपहर 12:44 पी एम तक है।

अजा एकादशी महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने अपने खोए हुए राज्य, परिवार और सम्मान को वापस पाने के लिए महर्षि गौतम के सुझाव पर अजा एकादशी का व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें उनका सब कुछ पुनः प्राप्त हो गया था। माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से अजा एकादशी का व्रत रखता है और भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसके समस्त पाप और पूर्व जन्म के बुरे कर्म नष्ट हो जाते हैं। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

पूजा विधि

  • एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, फल, धूप और दीप अर्पित करें।
  • अजा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें और अंत में भगवान विष्णु की आरती करें।
  • इस दिन गरीबों या जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या तिल का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है।

Putrada Ekadashi 2026: आज सावन पुत्रदा एकादशी पर 3 बेहद शुभ योगों का दुर्लभ संयोग, 5 राशियों के जातक धन और करियर में पाएंगे बड़ा लाभ

Putrada Ekadashi 2026: हिंदू धर्म पुत्रदा एकादशी का विशेष स्थान है। यह व्रत साल में दो बार सावन और पौष माह में किया जाता है। आज सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत है। यह व्रत सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति, संतान के सुख-समृद्धि और उसकी दीर्घायु की कामना के लिए रखा जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जो दंपत्ति निसंतान हैं या जिन्हें संतान सुख प्राप्त करने में बाधाएं आ रही हैं, वे यदि इस व्रत को विधि-विधान से रखते हैं, तो उन्हें योग्य संतान की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान विष्णु और उनके कृष्ण रूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस बार पुत्रदा एकादशी पर सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग का संयोग बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन शुभ योगों में पूजा-पाठ और धार्मिक कार्य करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। सर्वार्थ सिद्धि योग को कार्यों में सफलता और मनोकामना पूर्ति के लिए विशेष शुभ माना जाता है।

इन 5 राशियों के लिए शुभ रह सकता है समय

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार पुत्रदा एकादशी पर बनने वाले शुभ योगों का असर कुछ राशियों के लिए सकारात्मक रह सकता है। इस दौरान धन, करियर और कारोबार में अच्छे अवसर मिलने के योग बन सकते हैं।

वृषभ राशि : वृषभ राशि वालों के लिए आर्थिक स्थिति मजबूत होने के संकेत हैं। आय के नए स्रोत बन सकते हैं। रुका हुआ धन वापस मिलने की संभावना है.नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी मिल सकती है।

मिथुन राशि : मिथुन राशि वालों के लिए करियर में तरक्की के अवसर बन सकते हैं। नया प्रोजेक्ट या कारोबार से जुड़ी कोई अच्छी डील मिल सकती है। प्रभावशाली लोगों से संपर्क भविष्य में लाभ दिला सकता है।

सिंह राशि : सिंह राशि वालों को भाग्य का साथ मिल सकता है। नौकरी में प्रमोशन या नई जिम्मेदारी मिलने के योग हैं। कारोबारियों को अच्छा मुनाफा मिल सकता है। आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा।

तुला राशि : तुला राशि वालों के लिए यह समय आर्थिक मामलों में शुभ रह सकता है। कारोबार विस्तार की योजना आगे बढ़ सकती है। परिवार की ओर से कोई शुभ समाचार मिल सकता है।

मीन राशि : मीन राशि के जातकों के लिए अटके हुए काम पूरे होने के योग हैं। नौकरी और कारोबार में नए अवसर मिल सकते हैं। आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ मानसिक शांति भी प्राप्त हो सकती है।

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Shravan Putrada Ekadashi Vrat Katha: सावन की अंतिम एकादशी का व्रत आज, इस व्रत में जरूर सुनें महिष्मती पुरी के राजा महीजित की ये कथा

Shravan Putrada Ekadashi Vrat Katha: आज श्रावण मास की अंतिम एकादशी पुत्रदा या पवित्रा एकादशी का व्रत है। यह व्रत हर साल श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। पूरे साल में आज वाले सभी एकादशी व्रतों में इसका विशेष स्थान है, क्योंकि यह व्रत संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन की कामना के लिए किया जाता है। साथ ही, नि:संतान दंपति इसे संतान प्राप्ति की कामना से भी करते हैं। हिंदू धर्म में यह अकेला ऐसा एकादशी व्रत है, जो साल में दो बार किया जाता है। एक बार सावन में और फिर पौष के महीने में। पुत्रदा एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। इस दिन भगवान विष्णु और उनके कृष्ण रूप की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस साल सावन पुत्रदा एकादशी पर मूल नक्षत्र के साथ सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवियोग का संयोग बन रहा है।

एकादशी तिथि रात 3:56 बजे तक

एकादशी की तिथि रात 3:56 बजे तक रहेगी। इस दिन चर-लाभ-अमृत मुहूर्त सुबह 7:03 बजे से 11:52 बजे तक रहेगा। अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:26 बजे से 12:18 बजे तक रहेगा। इसके अलावा शुभ योग मुहूर्त दोपहर 1:28 बजे से 3:04 बजे तक रहेगा।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

द्वापर युग में महिष्मती पुरी के राजा महीजित अत्यंत धर्मात्मा, दानवीर और प्रजापालक थे। उनके राज्य में प्रजा हर तरह से सुख-समृद्धि से परिपूर्ण थी, लेकिन राजा महीजित की कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और उनकी पत्नी अत्यंत दुःखी और चिंतित रहते थे।

जब राजा वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगे, तो उन्होंने राज्य के ऋषि-मुनियों और पंडितों को बुलाकर अपनी इस व्यथा का समाधान मांगा। उन्होंने ऋषियों से कहा, “मैंने जीवन में कभी कोई अधर्म नहीं किया, प्रजा को पुत्र समान माना, फिर भी मुझे संतान सुख क्यों नहीं मिला?”

राजा की व्यथा सुनकर सभी ऋषि-मुनि जंगल में लोमश ऋषि के आश्रम पहुंचे। लोमश ऋषि परम ज्ञानी और त्रिकालदर्शी थे। ऋषियों के निवेदन पर लोमश ऋषि ने ध्यान लगाकर राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत देखा और बताया कि राजा महीजित पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य थे। एक बार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को वे दो दिनों से भूखे-प्यासे भटक रहे थे।

रास्ते में एक जलाशय देखकर वे पानी पीने पहुंचे। उसी समय एक प्यासी गाय भी वहां पानी पीने आई। वैश्य ने उस गाय को हटाकर स्वयं पहले पानी पी लिया। अनजाने में एकादशी के दिन प्यासी गाय को जल से वंचित करने के कारण उन्हें इस जन्म में राजा बनने का सुख तो मिला, परंतु संतानहीन रहने का श्राप भी मिला।

ऋषि लोमश ने इस पाप के निवारण का उपाय बताते हुए कहा कि यदि राजा और उनकी प्रजा श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिवत व्रत रखें और उसका पुण्य फल राजा को अर्पित करें, तो उन्हें निश्चित ही संतान की प्राप्ति होगी।

राजा महीजित, उनकी पत्नी और समस्त प्रजाजनों ने ऋषियों के बताए अनुसार श्रावण पुत्रदा एकादशी का निष्ठापूर्वक व्रत रखा और उसका संपूर्ण पुण्य राजा को दे दिया। इस व्रत के प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं और समय आने पर उन्होंने एक सुंदर, तेजस्वी तथा योग्य पुत्र को जन्म दिया। तभी से इस एकादशी का नाम ‘पुत्रदा एकादशी’ पड़ा।

Putrada Ekadashi 2026: कल किया जाएगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत, जानें साल में 2 बार क्यों किया जाता है पुत्रदा एकादशी व्रत

Putrada Ekadashi 2026: कल किया जाएगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत, जानें साल में 2 बार क्यों किया जाता है पुत्रदा एकादशी व्रत

Putrada Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में पुत्रदा एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। यह व्रत संतान की सुख-समृद्धि, खुशहाली और अच्छी सेहत के लिए किया जाता है। पूरे साल में आने वाली सभी एकादशी व्रतों में यह अकेला उपवास है, जो साल में दो बार किया जाता है। एक बार श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि और फिर पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नि:संतान दंपति इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना से कर सकते हैं। इस एकादशी में भगवान विष्णु की बाल रूप में या श्री कृष्ण की पूजा जाती है।

पुत्रदा एकादशी 2026 में कब?

साल में दो बार पौष और सावन माह में पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। दोनों ही व्रत संतान प्राप्ति या संतान की सुख-शांति के उद्देश्य से रखा जाता है। इस साल श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त 2026 को रखा जाएगा।

श्रावण पुत्रदा एकादशी का धार्मिक महत्व

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। कई हिस्सों में इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे पापों का नाश करने वाली और पुण्य प्रदान करने वाली एकादशी बताया जाता है। श्रावण मास में इस एकादशी का महत्व इसलिए भी और बढ़ जाता है क्योंकि इस महीने में भगवान शिव की भी पूजा होती है। ऐसे में भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को खास लाभ मिलता है।

साल में 2 बार पुत्रदा एकादशी क्यों?

साल में दो बार पुत्रदा एकादशी व्रत होने का मुख्य कारण यह है कि, विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में दोनों ही खास तिथियों का फल संतान प्राप्ति और संतान की सुरक्षा के लिए बताया गया है। दोनों ही एकादशियों का उद्देश्य और फल की समानता होने के कारण ही दोनों को पुत्रदा एकादशी (संतान प्रदान करने वाली) कहा जाता है।

दोनों एकादशियों का अलग-अलग महत्व

श्रावण एकादशी : यह विशेष रूप से संतान के स्वास्थ्य, दीर्घायु और संकटों से रक्षा के लिए रखी जाती है।

पौष एकादशी : यह मुख्य रूप से योग्य, ज्ञानी और तेजस्वी संतान की प्राप्ति तथा उसकी उन्नति के लिए मानी जाती है।

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Sawan Purnima 2026 Date: 27 या 28 अगस्त, कब किया जाएगा श्रावण पूर्णिमा का व्रत? जानें सही तारीख, मुहूर्त और पूजा विधि

Sawan Purnima 2026 Date: सावन पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। यह दिन धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन ही रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र यानी राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, और भाई उनकी रक्षा का वचन देते हैं।

यह श्रावण माह का अंतिम दिन होता है। इस पूरे महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष विधान होता है, जो पूर्णिमा के दिन जलाभिषेक और विशेष पूजा के साथ पूर्ण होता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन जनेऊ धारण करने वाले (द्विज) गंगा या पवित्र नदियों में स्नान करके पुराना यज्ञोपवीत (जनेऊ) बदलते हैं और नया जनेऊ धारण करते हैं। इसे ‘श्रावणी’ या ‘उपाकर्म’ कहा जाता है। साथ ही, अमरनाथ में पवित्र छड़ी मुबारक की रस्म भी श्रावण पूर्णिमा के दिन ही अमरनाथ गुफा पहुंचती है और वार्षिक यात्रा का समापन होता है।

श्रावण पूर्णिमा 2026: सही तारीख

दृक पंचांग के मुताबिक श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 को सुबह करीब 9:08 बजे आरंभ होगी। यह तिथि अगले दिन यानी 28 अगस्त को सुबह लगभग 9:48 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर श्रावण पूर्णिमा 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मानी जाएगी।

स्नान और दान की सही तिथि

सावन पूर्णिमा तिथि 28 अगस्त की सुबह तक रहने के कारण स्नान और दान जैसे कार्य इस दिन सूर्योदय के बाद किए जाएंगे। व्रत और पूजा की तारीख स्थानीय पंचांग तथा क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।

पूर्णिमा तिथि का समय

पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ : 27 अगस्त 2026 को सुबह 09:08 बजे से

पूर्णिमा तिथि का समापन : 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:48 बजे तक

स्नान-दान और पूजन के शुभ मुहूर्त

ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 04:28 बजे से सुबह 05:12 बजे तक

प्रातःकाल स्नान-दान मुहूर्त : सूर्योदय से लेकर सुबह 09:48 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 11:56 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक

चंद्र ग्रहण व भद्रा का प्रभाव

चंद्र ग्रहण : 28 अगस्त 2026 को आंशिक चंद्र ग्रहण लग रहा है, परंतु यह ग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं रहेगा। इसलिए इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा, जिससे आप बिना किसी रुकावट के पूजा, स्नान, दान व रक्षाबंधन का त्योहार मना सकते हैं।

भद्रा काल : 27 अगस्त की रात में ही भद्रा समाप्त हो जाएगी, इसलिए 28 अगस्त को पूरे दिन रक्षाबंधन एवं धार्मिक कार्यों के लिए भद्रा दोष नहीं रहेगा।

सावन पूर्णि 2026: पूजा विधि

स्नान व दान : इस दिन गंगा या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने तथा दान-पुण्य करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

सत्यनारायण कथा : पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए श्री सत्यनारायण भगवान की कथा और पूजन करना अत्यंत शुभ माना जाता है।

चंद्र देव की पूजा : रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक शांति और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

Putrada Ekadashi 2026: सावन की पुत्रदा एकादशी पर इन 5 बातों का रखें खास ध्यान, वर्ना नहीं मिलेगा व्रत और पूजा का पूरा फल

Putrada Ekadashi 2026: सावन की पुत्रदा एकादशी पर इन 5 बातों का रखें खास ध्यान, वर्ना नहीं मिलेगा व्रत और पूजा का पूरा फल

Putrada Ekadashi 2026: सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का सभी व्रत और पर्व में विशेष स्थान है। यह व्रत माताएं और अभिभावक अपनी संतान की सुख-समृद्धि, अच्छी सेहत और खुशहाली के लिए करते हैं। कुछ दंपति संतान की प्राप्ति की कामना से भी यह व्रत करते हैं। पुत्रदा एकादशी व्रत सावन के अलावा पौष माह में भी किया जाता है। सावन माह के शुल्क पक्ष की एकादशी तिथि को सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत होता है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है, लेकिन सावन का महीना होने की वजह से इस दिन भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन व्रत और पूजा करते समय कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। आइए जानें इनके बारे में

कब है सावन पुत्रदा एकादशी 2026

पंचांग के अनुसार, सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 23 अगस्त 2026 को रात 2 बजे से शुरू होकर 24 अगस्त सुबह 4:18 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 23 अगस्त को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा। लेकिन सावन पुत्रदा एकादशी व्रत पारण के दिन हरिवासर सूर्योदय के बाद तक रहने की वजह से 24 अगस्त को भी पुत्रदा एकादशी व्रत होगा।

इन 5 नियमों को भूल कर भी अनदेखा न करें

काले कपड़े न पहनें : एकादशी व्रत में पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। यह रंग भगवान विष्णु का प्रिय रंग है। पूजा-पाठ के दौरान काले रंग के कपड़े पहनने से बचने की सलाह दी जाती है।

तुलसी की पत्तियां न तोड़ें : इस दिन तुलसी की पत्तियां तोड़ने से बचना चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा में पहले से रखी तुलसी की पत्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

गुस्सा और विवाद न करें : उन्होंने कहा कि इस दिन किसी का अपमान करने, बहस करने या किसी का दिल दुखाने से बचें। शांत मन से भगवान का स्मरण करना शुभ माना जाता है।

चावल खाने से बचें : धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी व्रत के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन सात्विक भोजन और फलाहार को प्राथमिकता दी जाती है।

तामसिक भोजन से दूरी रखें : एकादशी के दिन मांस-मदिरा और अन्य तामसिक चीजों से दूर रहने की सलाह दी जाती है। इससे पूजा और उपवास का पूरा फल नहीं मिलता है।

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Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को चंद्रमा को लगेगा ग्रहण, जानें कैसा होगा रक्षा बंधन का त्योहार और किस समय बांधी जाएगी राखी

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व हमारे देश में मनाए जाने वाले सभी प्रमुख पर्व और त्योहारों में विशेष स्थान रखता है। यह पर्व भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। रक्षा बंधन का पर्व हर साल सावन माह की पूर्णिमा तिथि मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाती हैं, उनकी कलाई पर राखी बांधती हैं और आरती उतार कर मुंह मीठा कराती हैं। माना जाता है कि ऐसा करते हुए वे अपने भाई की सुख-समृद्धि, अच्छी सेहत और खुशहाली की कामना करती हैं। इसके बदले में भाई अपनी बहन की सदैव रक्षा करने का वचन देते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस पर्व का इतिहास पौराणिक काल में भगवान कृष्ण और द्रौपदी से जुड़ा हुआ है।

इस साल भाई बहन का यह पवित्र पर्व रक्षा बंधन 28 अगस्त 2026 को पूरे देश में धूम धाम से मनाया जाएगा। लेकिन इसी दिन एक और दुर्लभ खगोलीय घटना भी घटने जा रही है, जिससे इस दिन का महत्व बढ़ गया है। दरअसल, इसी दिन साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण भी लगने जा रहा है। इस दिन चंद्र ग्रहण लगने से लोगों में इस बात का कंफ्यूजन हो रहा है कि बहनें अपने भाइयों को राखी कैसे बांधेंगीं, सूतक कब से कब तक रहेगा और ग्रहण का क्या समय रहेगा? आइए जानें इन सभी सवालों के जवाब।

रक्षाबंधन 2026

पंचांग के अनुसार, सावन पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 27 अगस्त 2026, गुरुवार को सुबह 9 बजकर 8 मिनट से होगी। इसका समापन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को सुबह 9 बजकर 48 मिनट पर होगा। तिथि के अनुसार, 28 अगस्त 2026 को रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा।

रक्षाबंधन 2026 शुभ मुहूर्त

28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ समय सुबह 5 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगा। इस दिन लाभ-उन्नति मुहूर्त सुबह 7 बजकर 33 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह 9 बजकर 10 मिनट से लेकर सुबह 10 बजकर 46 मिनट तक रहेगा।

रक्षाबंधन पर भद्रा का साया

इस साल 27 अगस्त को भद्रा का प्रभाव सुबह 9 बजकर 8 मिनट से रात 9 बजकर 32 मिनट तक रहेगा। इसलिए 28 अगस्त को बिना किसी बाधा के श्रद्धा और उल्लास के साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकेगा।

चंद्र ग्रहण 2026

28 अगस्त 2026 को राखी के दिन साल का आखिरी चंद्र ग्रहण भी लगेगा। ग्रहण की शुरुआत 28 अगस्त को सुबह 6 बजकर 53 मिनट पर होगी। इसका समापन दोपहर 12 बजकर 31 मिनट पर माना जा रहा है। यह चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए इसका सूतक काल और ग्रहण से जुड़े नियम दोनों ही मान्य नहीं रहेंगे। ऐसे में बहनें बिना सूतक की बाधा के अपने भाई को राखी बांध सकती हैं।

कहां दिखाई देगा ग्रहण?

28 अगस्त का आंशिक चंद्र ग्रहण अफ्रीका, यूरोप, उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका तथा पश्चिमी एशिया के कई देशों में दिखाई देगा। हालांकि, भारत में यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा, इसलिए यहां सूतक काल मान्य नहीं होगा।

Sawan Putrada Ekadashi 2026: क्या इस साल दो दिन होगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत? जानें सही तारीख, मुहूर्त और पारण समय

Sawan Putrada Ekadashi 2026: क्या इस साल दो दिन होगा सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत? जानें सही तारीख, मुहूर्त और पारण समय

Sawan Putrada Ekadashi 2026: पुत्रदा एकादशी का व्रत मुख्य रूप से संतान की सुख-शांति और अच्छी सेहत के लिए किया जाता है। लेकिन कुछ नि:संतान दंपत्ति इस व्रत को संतान प्राप्ति की कामना से भी करते हैं। वैसे यह व्रत पुत्रदा एकादशी व्रत सावन और पौष माह में दो बार किया जाता है। सावन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जाएगा। यह सावन माह की अंतिम एकादशी होगी। पंचांग के अनुसार, इस साल सावन पुत्रदा एकादशी पर दो दिन उपवास का संयोग बन रहा है। माना जा रहा है कि इस बार सावन पुत्रदा एकादशी 23 अगस्त और 24 अगस्त दो दिन है। इसमें भी हरिवासर का समापन सूर्योदय के बाद हो रहा है। ऐसे में लोगों को सावन पुत्रदा एकादशी व्रत की तारीख को लेकर कन्फ्यूजन है।

सावन पुत्रदा एकादशी व्रत 2026 तारीख

पंचांग के अनुसार, सावन पुत्रदा एकादशी के लिए जरूरी श्रावण शुक्ल एकादशी तिथि 23 अगस्त को 02:00 ए एम से लेकर 24 अगस्त को 04:18 ए एम तक रहेगी। व्रत के लिए उदयातिथि की मान्यता है। इस आधार पर सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत 23 अगस्त को है, लेकिन हरिवासर 24 अगस्त को सुबह 10:49 ए एम तक है।

सूर्योदय के बाद तक रहेगा हरिवासर

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरिवासर जब तक खत्म नहीं होता है, तब तक व्रती पारण नहीं कर सकते हैं। 24 अगस्त को हरिवासर समापन सूर्योदय के बाद हो रहा है। इस वजह से यह व्रत दो दिनों का होगा। 23 अगस्त को गृहस्थ लोग सावन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखेंगे और 24 अगस्त को वैष्णव लोगों को व्रत रखना है। जो लोग 23 अगस्त को व्रत रखेंगे, उनका पारण 24 अगस्त को हरिवासर खत्म होने के बाद दोपहर के समय होगा, वहीं 24 अगस्त को व्रत रखने वाले लोग 25 अगस्त को सूर्योदय के बाद पारण करेंगे।

सावन पुत्रदा एकादशी 2026 मुहूर्त

23 अगस्त को सावन पुत्रदा एकादशी की पूजा का मुहूर्त सुबह में 07:32 ए एम से लेकर दोपहर 12:24 पी एम तक है। वहीं 24 अगस्त को पूजा का मुहूर्त सुबह में 05:55 ए एम से 07:32 ए एम तक और फिर 09:09 ए एम से 10:46 ए एम तक है।

23 अगस्त को ब्रह्म मुहूर्त 04:26 ए एम से 05:10 ए एम तक और अभिजीत मुहूर्त 11:58 ए एम से दोपहर 12:49 पी एम तक रहेगा। वहीं 24 अगस्त को ब्रह्म मुहूर्त 04:27 ए एम से 05:11 ए एम तक है, जबकि अभिजीत मुहूर्त 11:57 ए एम से दोपहर 12:49 पी एम तक रहेगा।

23 अगस्त को राहुकाल शाम 05:15 पी एम से 06:53 पी एम तक रहेगा, वहीं 24 अगस्त को राहुकाल सुबह में 07:32 ए एम से 09:09 ए एम तक है।

सावन पुत्रदा एकादशी 2026 पारण

24 अगस्त को पारण का समय दोपहर में 01:41 बजे से शाम 04:16 बजे तक है, वहीं 25 अगस्त को व्रत का पारण सुबह 05:55 बजे से सुबह 06:20 बजे के बीच होगा। उस दिन पारण के लिए आपको केवल 25 मिनट का ही समय प्राप्त होगा क्योंकि उसके बाद द्वादशी तिथि का समापन हो जाएगा और त्रयोदशी तिथि शुरू हो जाएगी।

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Kamika Ekadashi 2026 Katha: आज द्विपुष्कर योग में कामिका एकादशी का व्रत आज, पूजा में जरूर सुनें ये व्रत कथा और जानें आज पूजा का मुहूर्त

Kamika Ekadashi 2026 Katha: कामिका एकादशी व्रत भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने के बाद पहला एकादशी व्रत होता है। यह उपवास सावन में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को करने से ब्रह्म हत्या की दोष से मुक्ति मिलती है, पाप मिटते हैं और श्री हरि की कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस व्रत की पूजा में भक्तों को कामिका एकादशी की व्रत कथा जरूर सुननी चाहिए।

माना जाता है कि ऐसा करने वाले श्रद्धालुओं को वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य फल मिलता है। इस साल कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त रविवार को है। इस दिन द्विपुष्कर योग बन रहा है। इस योग में व्रत, पूजा पाठ, जप, तप और शुभ काम करने का आपको दोगुना फल प्राप्त होगा। आइए जानें कामिका एकादशी की व्रत कथा, मुहूर्त और पारण समय के बारे में।

कामिका एकादशी 2026 मुहूर्त और पारण समय

सावन कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ : 8 अगस्त, दोपहर 1:59 बजे से

सावन कृष्ण एकादशी तिथि का समापन : 9 अगस्त, 11:04 एम पर

कामिका एकादशी पूजा मुहूर्त : सुबह 07:27 बजे से दोपहर 12:26 बजे तक

लाभ-उन्नति मुहूर्त : सुबह 09:07 बजे से 10:47 बजे तक

अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त : सुबह 10:47 बजे से दोपहर 12:26 बजे तक

द्विपुष्कर योग : 11:04 ए एम से दोपहर 02:43 बजे तक

व्रत पारण समय : 10 अगस्त, सोमवार, सुबह 5:47 बजे से 8 बजे

द्वादशी तिथि का समापन : 10 अगस्त, सुबह 08:00 बजे

कामिका एकादशी व्रत कथा

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताने का निवेदन किया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि एक बार ब्रह्मदेव ने नारद जी को एक कथा सुनाई थी, वही कथा मैं आपको सुनाता हूं-

ब्रह्माजी ने नारद मुनि को बताया कि श्रावण कृष्ण एकादशी को कामिका एकादशी भी कहा जाता है। जो लोग यह व्रत रखते हैं, उनको सुदर्शन चक्र धारण करने वाले भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इस व्रत की कथा के अनुसार, एक गांव में एक ठाकुर रहता था। वह बड़ा ही क्रोधी था। एक दिन वो अपने घर से किसी काम के लिए निकला, तो उसका गांव के ही एक ब्राह्मण से किसी बात को लेकर वाद विवाद हो गया।

देखते ही देखते बात इतनी बिगड़ गई कि उसने क्रोध में आकर उस ब्राह्मण की हत्या कर दी। जब उसका गुस्सा शांत हुआ तो उसे अपने किए गए पाप का एहसास हुआ। उस अपराध बोध से मुक्ति के लिए उसने उस ब्राह्मण का अंतिम संस्कार करना चाहा, लेकिन गांव के अन्य ब्राह्मणों ने उसे इसकी अनुमति नहीं दी।

उस ठाकुर पर ब्रह्म हत्या का दोष था। समय व्यतीत होने के साथ-साथ उसके मन पर ब्रह्म हत्या के दोष और आत्म ग्लानि का भार बढ़ने लगा। एक दिन उसकी मुलाकात एक ऋषि से हुई। उसने ब्रह्म हत्या की घटना बताई और उससे मुक्ति का उपाय पूछा। तब उस ऋषि मुनि ने उससे कहा कि ब्रह्म हत्या से मुक्ति के लिए तुमको सावन कृष्ण एकादशी यानि कामिका एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करना चाहिए। भगवान विष्णु की कृपा से ही तुम ब्रह्म हत्या दोष से मुक्ति पा सकते हो। इससे तुम्हारे अन्य पाप भी मिट जाएंगे।

जब श्रावण कृष्ण एकादशी आई तो उस ठाकुर ने विधिपूर्वक कामिका एकादशी व्रत किया और भगवान विष्णु की पूजा की। रात्रि जागरण के समय वह भगवान विष्णु की मूर्ति के पास सो गया। स्वप्न में भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिए और उनकी कृपा से वह ब्रह्म हत्या दोष से मुक्त हो गया।

Hariyali Teej 2026 Vastu tips: किसी दिशा में सबसे ज्यादा फलदायी होगी पूजा, यहां जानें हरियाली तीज के लिए वास्तु टिप्स

Hariyali Teej 2026 Vastu tips: हरियाली तीज हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं द्वारा पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य के लिए मनाया जाता है। कुंवारी लड़कियां भी मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए 108 वर्षों तक कठिन तपस्या की थी। तब भगवान शिव ने सावन माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह पर्व शिव-पार्वती के पुनर्मिलन और अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है।

कब किया जाएगा हरियाली तीज 2026 व्रत?

हरियाली तीज 2026 का व्रत 15 अगस्त 2026, शनिवार को रखा जाएगा।

तिथि और मुहूर्त विवरण

तृतीया तिथि प्रारंभ : 14 अगस्त 2026 को शाम 6:46 बजे से

तृतीया तिथि समाप्त : 15 अगस्त 2026 को शाम 5:28 बजे तक

उदया तिथि : 15 अगस्त 2026 को पड़ने के कारण व्रत इसी दिन रखा जाएगा।

शिव-पार्वती की मूर्ति रखने के लिए कौन सी दिशा है शुभ?

वास्तु शास्त्र में पूजा-पाठ, देवी-देवताओं के लिए शुभ दिशा का वर्णन किया गया है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, हरियाली तीज के दिन शिव-पार्वती की मूर्ति को उत्तर-पूर्व दिशा में विराजमान करना चाहिए। यह दिशा को देवताओं की मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिशा में शिव-पार्वती की मूर्ति को विराजमान करने से घर में सुख-शांति का वास होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसलिए कहा जाता है कि मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्ति को विराजमान करने से पहले शुभ दिशा के बारे में जरूर जान लें।

अगर घर में उत्तर-पूर्व दिशा में शिव-पार्वती की मूर्ति को रखना संभव नहीं है, तो ऐसे में उत्तर दिशा में मूर्ति को विरजमान करना शुभ माना जाता है। इस दिशा में मूर्ति को विराजमान करने से सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। हरियाली तीज के दिन पूजा के दौरान पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुख होना चाहिए।

किस दिशा में न रखें मूर्ति?

वास्तु शास्त्र के अनुसार, भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति को दक्षिण दिशा में भूलकर भी विराजमान नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस दिशा में पितरों का वास माना जाता है। इस दिशा में पूजा करने से शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।

Kamika Ekadashi 2026: सावन की पहली एकादशी का व्रत इस दिन होगा, नोट करें सही तारीख, मुहूर्त और पूजा विधि