Bhaum pradosh vrat 2026: भौम प्रदोष व्रत आज, मंगल दोष से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव को अर्पित करें ये खास चीजें

Bhaum pradosh vrat 2026: प्रदोष हर माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। यह तिथि भगवान शिव को अत्यंत प्रिय मानी जाती है। इस दिन सच्ची श्रद्धा से उपवास करने वाले भक्तों को भगवान शिव और माता पार्वती का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन प्रदोष काल में पूजा का विधान है, इसलिए इसे प्रदोष व्रत कहा जाता है। वहीं, त्रयोदशी तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। ‘भौम’ का अर्थ मंगल ग्रह (या मंगलवार) से है। यह व्रत भगवान शिव, माता पार्वती और हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने तथा कर्ज एवं मंगल दोष से मुक्ति पाने के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव को कुछ खास चीजें अर्पित करने से मंगल दोष का प्रभाव कम होता है।

सितंबर 2026 भौम प्रदोष व्रत एवं मुहूर्त

तिथि : मंगलवार, 8 सितंबर 2026

त्रयोदशी तिथि प्रारंभ : 8 सितंबर 2026, दोपहर 02:42 बजे

त्रयोदशी तिथि समाप्त : 9 सितंबर 2026, दोपहर 12:30 बजे

प्रदोष पूजा मुहूर्त : शाम 06:43 बजे से रात 09:01 बजे तक

मंगल दोष मुक्ति के लिए भौम प्रदोष पर करें ये उपाय

शिवलिंग पर लाल चीजें अर्पित करें: प्रदोष काल में शिवलिंग पर शुद्ध जल व दूध अर्पित करने के बाद लाल चंदन, लाल कनेर के फूल या गुलाल चढ़ाएं। भगवान शिव को 11 या 21 बेलपत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्री राम’ लिखकर अर्पित करें।

ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ : पूजन के दौरान ‘ऋणमोचक मंगल स्तोत्र’ या ‘मंगलाष्टक’ का पाठ करें। इससे मंगल के अशुभ प्रभाव समाप्त होते हैं।

हनुमान जी की उपासना : भौम प्रदोष पर हनुमान जी को चमेली का तेल और सिंदूर (चोला) चढ़ाएं। उन्हें गुड़, भुने चने या बूंदी का भोग लगाएं और हनुमान चालीसा अथवा सुंदरकांड का पाठ करें।

मंगल ग्रह के मंत्रों का जाप : मंगल दोष शांति के लिए कम से कम 108 बार `ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः` या `ॐ अं अंगारकाय नमः` मंत्र का जाप करें।

दान कार्य : पूजा के बाद किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को लाल रंग की वस्तुएं दान करें, जैसे— मसूर की दाल, गुड़, तांबे का बर्तन, लाल वस्त्र या अनार।

भौम प्रदोष व्रत पूजा विधि

  • सुबह स्नान करके लाल या स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  • सूर्यास्त के समय पुन: स्नान या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • शिवलिंग का जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और चंदन से अभिषेक करें।
  • हनुमान जी को गुड़-चने का भोग लगाएं और ‘ऋणमोचक मंगल स्तोत्र’ या सुंदरकांड का पाठ करें।
  • अंत में धूप-दीप जलाकर शिव जी और हनुमान जी की आरती करें।

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Hartalika Teej 2026: सुख और सौभाग्य प्राप्ति के लिए कब किया जाएगा हरतालिका तीज का व्रत, जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Hartalika Teej 2026: हरतालिका तीज हिंदू धर्म का एक प्रमुख और बेहद पवित्र त्यौहार है, जिसे शादीशुदा महिलाएं और अविवाहित कन्याएं पूरी आस्था और विधि-विधान से करती हैं। यह व्रत हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी कन्याएं अच्छा घर और वर पाने की लालसा में यह व्रत करती हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए अन्न-जल त्यागकर कठोर तपस्या की थी। उन्होंने बालू (मिट्टी) का शिवलिंग बनाकर पूजा की थी। माता पार्वती के इस अनन्य समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इसी दिन उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, हरत और आलिका। इसमें हरत का अर्थ है हरण करना या छिपाना और आलिका अर्थात सहेली/सखी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती की सहेलियां उनका अपहरण करके उन्हें एक घने जंगल में ले गई थीं, ताकि उनके पिता उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध भगवान विष्णु से न कर दें। जंगल में रहकर ही उन्होंने यह तपस्या की थी, इसलिए इसे ‘हरतालिका तीज’ कहा जाता है।

कब किया जाएगा हरतालिका तीज व्रत 2026

साल 2026 में हरतालिका तीज व्रत सोमवार, 14 सितंबर 2026 को किया जाएगा। तृतीया तिथि के समय और पूजा के शुभ मुहूर्त की पूरी जानकारी निम्नलिखित है:

तिथि और मुहूर्त

तृतीया तिथि प्रारंभ : 13 सितंबर 2026, सुबह 07:08 बजे

तृतीया तिथि समाप्त : 14 सितंबर 2026, सुबह 07:06 बजे

प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्त : 14 सितंबर 2026, सुबह 06:12 बजे से 07:06 बजे तक

प्रदोष काल (संध्या) पूजा : 13 सितंबर 2026, शाम 06:00 बजे से रात 08:30 बजे तक

हरतालिका व्रत के प्रमुख नियम और परंपराएं

निर्जला व्रत : यह अत्यंत कठिन व्रतों में से एक माना जाता है, जिसमें महिलाएं 24 घंटे से भी अधिक समय तक बिना पानी और भोजन के रहती हैं।

पार्थिव शिवलिंग पूजन : इस दिन शाम को या प्रदोष काल में मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमाएं बनाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है।

सोलह श्रृंगार : महिलाएं नए कपड़े पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और सोलह श्रृंगार करके पूजा में बैठती हैं।

रात भर जागरण : पूजा के बाद पूरी रात भजन-कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है और अगले दिन सुबह पारण करके व्रत पूरा होता है।

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: भाद्रपद में बना भौम प्रदोष व्रत का संयोग, जानें सही तारीख और इस व्रत के लाभ

Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: हिंदू धर्म का कैलेंडर चंद्रमाह पर आधारित होता है और यह अंग्रेजी कैलेंडर से अलग होता है। इस समय हिंदू कैलेंडर का छठा माह भाद्रपद चल रहा है। प्रत्येक हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। “भौम” मंगल देव का ही एक नाम है, और यह व्रत भगवान शिव और हनुमान जी दोनों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर, 2026, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस व्रत में सूर्योदय के बाद प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा रहते हैं।

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने के त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 3 बजे होगा। ऐसे में प्रदोष काल को देखते हुए प्रदोष व्रत 8 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा का शुभ समय शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

कर्ज से मुक्ति : इसे ‘ऋण मोचन प्रदोष’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पुराने कर्ज और आर्थिक समस्याओं से जल्द राहत मिलती है।

भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष में मंगल देव को भूमि का कारक माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से नया घर खरीदने, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति के लाभ का योग बनता है।

मंगल दोष का निवारण : जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मंगल से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।

शिव और हनुमान जी की कृपा : मंगलवार होने के कारण भगवान शिव के साथ-साथ भगवान हनुमान जी की भी विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

शत्रु और भय से रक्षा : भगवान शिव और हनुमान जी की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और मन से अज्ञात भय, चिंता या मानसिक तनाव समाप्त होता है।

पूजा विधि

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और भगवान शिव व हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन में फलाहार लें और सात्विक रहें।
  • सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय (प्रदोष काल) शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • शाम को स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें, शिव चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में आरती करें और अपनी क्षमता अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

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Bhadrapad Bhauma Pradosh Vrat: हिंदू धर्म का कैलेंडर चंद्रमाह पर आधारित होता है और यह अंग्रेजी कैलेंडर से अलग होता है। इस समय हिंदू कैलेंडर का छठा माह भाद्रपद चल रहा है। प्रत्येक हिंदू माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह तिथि जब मंगलवार के दिन पड़ती है, तो इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाता है। “भौम” मंगल देव का ही एक नाम है, और यह व्रत भगवान शिव और हनुमान जी दोनों की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 8 सितंबर, 2026, मंगलवार के दिन पड़ रही है। इसलिए भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष व्रत होगा। प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। इस व्रत में सूर्योदय के बाद प्रदोष काल में पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा रहते हैं।

कब रखा जाएगा प्रदोष व्रत

वैदिक पंचांग के अनुसार भाद्रपद महीने के त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 08 सितंबर को सुबह 05 बजकर 12 मिनट पर होगी। वहीं, इस तिथि का समापन 09 सितंबर को रात 3 बजे होगा। ऐसे में प्रदोष काल को देखते हुए प्रदोष व्रत 8 सितंबर, दिन मंगलवार को रखा जाएगा। इस दिन प्रदोष काल पूजा का शुभ समय शाम 06:35 बजे से रात 08:52 बजे तक रहेगा।

भौम प्रदोष व्रत का महत्व

कर्ज से मुक्ति : इसे ‘ऋण मोचन प्रदोष’ भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से पुराने कर्ज और आर्थिक समस्याओं से जल्द राहत मिलती है।

भूमि और संपत्ति का लाभ: ज्योतिष में मंगल देव को भूमि का कारक माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत करने से नया घर खरीदने, जमीन-जायदाद से जुड़े विवाद सुलझाने और अचल संपत्ति के लाभ का योग बनता है।

मंगल दोष का निवारण : जिनकी कुंडली में मंगल दोष या मंगल से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनके लिए यह व्रत बहुत लाभदायक माना जाता है।

शिव और हनुमान जी की कृपा : मंगलवार होने के कारण भगवान शिव के साथ-साथ भगवान हनुमान जी की भी विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है।

शत्रु और भय से रक्षा : भगवान शिव और हनुमान जी की कृपा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और मन से अज्ञात भय, चिंता या मानसिक तनाव समाप्त होता है।

पूजा विधि

  • सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और भगवान शिव व हनुमान जी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
  • दिन में फलाहार लें और सात्विक रहें।
  • सूर्यास्त से ठीक पहले और बाद का समय (प्रदोष काल) शिव पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  • शाम को स्नान के बाद शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और फूल चढ़ाएं।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करें, शिव चालीसा और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
  • पूजा के अंत में आरती करें और अपनी क्षमता अनुसार किसी गरीब या जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

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Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन पर ग्रहण और भद्रा के साथ रहेगा पंचक का साया, जानें त्योहार पर पंचक का क्या होगा असर

Raksha Bandhan 2026: रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम का पर्व है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उनकी सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों की हमेशा रक्षा करने का वचन देते हैं और राखी बांधने पर उन्हें उपहार देते हैं। यह पर्व हर साल सावन की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इस पर्व और इस दिन का विशेष स्थान है। इसके अलावा इस साल रक्षा बंधन पर कई दुर्लभ संयोग बन रहे हैं।

इस साल रक्षा बंधन पर साल 2026 का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण लग रहा है। सावन पूर्णिमा पर भद्रा का साया रहेगा और साथ ही पंचक भी रहेगा। यह तीनों ही ऐसी बातें हैं, जिनमें शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। राखी बांधते समय भद्रा, ग्रहण और पंचक का विचार किया जाता है। ऐसे में लोगों के मन में राखी के त्योहार को लेकर भ्रम हो रहा है कि भद्रा और पंचक के दौरान राखी बांधने को लेकर क्या नियम और मान्यताएं हैं :

भद्रा का विचार : शास्त्रों में भद्रा के समय राखी बांधना पूरी तरह वर्जित माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण को उसकी बहन सूर्पणखा ने भद्रा काल में ही राखी बांधी थी, जिसके कारण उसके पूरे कुल का नाश हो गया। इसलिए भद्रा समाप्त होने के बाद ही राखी बांधी जाती है।

पंचक का विचार : पंचक के दौरान राखी बांधने पर कोई प्रतिबंध या दोष नहीं होता है। पंचक का प्रभाव मुख्य रूप से नए घर के निर्माण, छत ढालने, लकड़ी इकट्ठा करने, दक्षिण दिशा की यात्रा करने या अंतिम संस्कार जैसे कार्यों पर लागू होता है। रक्षाबंधन जैसे शुभ और धार्मिक त्यौहार पर इसका कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। इस बार पंचक का आरंभ गुरुवार से हो रहा है। गुरुवार से जो पंचक आरंभ होता है उसे सामान्य माना जाता है।

राखी बांधने का सही नियम :

यदि रक्षाबंधन पर भद्रा का साया है, तो भद्रा काल बीतने का इंतजार करें।

पंचक चल रहा हो तब भी आप भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में आराम से राखी बांध सकते हैं।

रक्षाबंधन पर पंचक और भद्रा का समय

27 अगस्त को पंचक दोपहर 1 बजकर 36 मिनट पर लग जाएगा। 28 तारीख को रक्षाबंधन है और पंचक पूरे पांच दिन रहता है। पंचक 1 सितंबर को सुबह 3 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगा।

27 अगस्त को भद्रा पूर्णिमा तिथि आरंभ होने के साथ ही लग जाएगी और रात 9 बजकर 29 मिनट तक रहेगी। इसलिए रक्षाबंधन 27 की बजाय 28 अगस्त को मनाया जाएगा। 28 को सूर्योदय के साथ पूर्णिमा तिथि 9 बजकर 49 मिनट तक ही है जो भद्रा मुक्त है।

रक्षाबंधन के दिन शतभिषा नक्षत्र रहेगा। इसलिए इस दिन राखी बांधने को कोई दोष नहीं लगेगा। रक्षाबंधन शतभिषा नक्षत्र में होगा। इसलिए आप बेफिक्र होकर राखी बांध सकते हैं।

रक्षाबंधन पर रहेगा चंद्र ग्रहण?

इस साल का दूसरा और अंतिम चंद्रग्रहण 28 अगस्त को लगने जा रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि चंद्रग्रहण के दिन क्या राखी बांध सकते हैं। चंद्रग्रहण का सूतक काल ग्रहण आरंभ होने से 9 घंटे पहले लग जाता है। लेकिन, यह चंद्रग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा इसलिए इसका सूतक भी मान्य नहीं होगा। इसलिए रक्षाबंधन का पर्व आप बिना किसी के चिंता का मना सकते हैं।

Sawan Last Pradosh Vrat 2026 Today: सावन का अंतिम प्रदोष व्रत आज, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Sawan Fourth Somwar 2026: एकसाथ 5 शुभ संयोग लेकर आ रहा है सावन का अंतिम सोमवार व्रत, जानें शिववास योग का महत्व, तारीख और मुहूर्त

Sawan Fourth Somwar 2026: सावन का महीना अब धीरे-धीरे अपने समापन की ओर पहुंच रहा है। इस माह में सोमवार के व्रत का विशेष स्थान है। श्रद्धालु पूरी आस्था और विधि-विधान से सावन के सभी सोमवार का व्रत करते हैं। इस साल सावन का चौथा और अंतिम सोमवार 24 अगस्त 2026 को पड़ रहा है। इस दिन 5 शुभ संयोग बन रहे हैं, जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। साथ ही, सावन के चौथे सोमवार में भगवान शिव का वास कैलाश पर होगा, जिससे यह दिन रुद्राभिषेक के लिए अति उत्तम माना जा रहा है। जो लोग सावन सोमवार व्रत होंगे, वे अंतिम सोमवार को उद्यापन करेंगे। जो लोग अभी तक भगवान शिव का जलाभिषेक नहीं कर पाए हैं, उनके लिए भी यह एक अच्छा अवसर है, जिससे आपको भगवान भोलेनाथ की कृपा प्राप्त हो सकती है।

5 शुभ संयोग में अंतिम सावन सोमवार

सावन पुत्रदा एकादशी : अंतिम सावन सोमवार पर सावन पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण है और वैष्णव भक्तों का व्रत भी है। यह दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति का उत्तम अवसर है। शिव और हरि की पूजा से आपका कल्याण होगा।

प्रीति योग : सावन के अंतिम सोमवार पर प्रीति योग प्रात:काल से ही बन जाएगा, जो सुबह 07 बजकर 04 मिनट तक रहेगा। यह एक शुभ, सकारात्मक और मंगलकारी योग है, जो शुभ कार्यों के लिए अच्छा है। इसके स्वामी ग्रह बुध और अधिपति देव भगवान विष्णु हैं।

आयुष्मान योग : उस दिन सुबह में 07 बजकर 04 मिनट से आयुष्मान योग का प्रारंभ होगा, जो पूरे दिन रहेगा। आयुष्मान योग भी एक शुभ योग है। इस योग के स्वामी ग्रह चंद्रमा और अधिपति देव गुरु बृहस्पति हैं। इस योग में दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में सकारात्मकता की प्राप्ति होती है।

कैलाश पर शिववास : सावन के अंतिम सोमवार पर भगवान शिव का वास कैलाश पर है। किसी भी दिन यदि शिवजी का वास कैलाश पर हो तो आप रुद्राभिषेक करा सकते हैं, इससे सुख-समृद्धि, शांति, सकारात्मक ऊर्जा में बढ़ोत्तरी होती है।

हंसराज योग : इस समय देवों के गुरु बृहस्पति अपनी उच्च राशि कर्क में विराजमान हैं, जिससे हंसराज योग का निर्माण हुआ है। यह व्यक्ति की उन्नति करने वाला योग है। सावन सोमवार पर हंसराज योग तो बना ही है, उस दिन चंद्रमा धनु राशि में और सूर्य सिंह राशि में विराजमान होंगे।

अंतिम सावन सोमवार पर जलाभिषेक का मुहूर्त

सावन के अंतिम सोमवार पर आप ब्रह्म मुहूर्त से ही जलाभिषेक कर सकते हैं। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रात:काल 04:27 ए एम से 05:11 ए एम तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:57 ए एम से लेकर दोपहर 12:49 पी एम तक रहेगा। अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त सुबह में 05:55 ए एम से 07:32 ए एम तक है, वहीं शुभ-उत्तम मुहूर्त 09:09 ए एम से 10:46 ए एम तक रहेगा। वैसे तो शिव जी के जलाभिषेक के लिए मुहूर्त की जरूरत नहीं पड़ती है, आप दिन में कभी भी जलाभिषेक कर सकते हैं।

Bhauma Pradosh Vrat 2026 Date: सावन के दूसरे और अंतिम प्रदोष व्रत पर त्रिपुष्कर योग का संयोग, जानें कब होगा भौम प्रदोष व्रत और पूजा का मुहूर्त

Bhauma Pradosh Vrat 2026 Date: सावन के दूसरे और अंतिम प्रदोष व्रत पर त्रिपुष्कर योग का संयोग, जानें कब होगा भौम प्रदोष व्रत और पूजा का मुहूर्त

Bhauma Pradosh Vrat 2026 Date: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का अहम स्थान है। यह तिथि भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। माना जाता है कि भगवान शिव इस दिन कैलाश पर्वत पर प्रदोष काल में प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं। और इस समय भगवान की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। प्रदोष व्रत हिंदू कैलेंडर के हर माह की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत में प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद पूजा का विधान है। प्रदोष व्रत का नाम उस दिन से तय होता है, जब यह तिथि पड़ रही हो। जैसे सोमवार को त्रयोदशी तिथि लगने पर सोम प्रदोष व्रत किया जाता है।

सावन माह का अंतिम प्रदोष व्रत मंगलवार के पड़ रहा है। सावन शुक्ल त्रयोदशी तिथि मंगलवार के दिन पड़ने की वजह से यह भौम प्रदोष व्रत होगा। यह व्रत उन श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से फलदायी होता है जिनकी कुंडली में मंगल दोष होता है। संतान की प्राप्ति के लिए भी प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस दिन मंगला गौरी व्रत का भी सुंदर संयोग बनेगा। इस व्रत के दिन शिव पूजा के लिए करीब सवा दो घंटे का मुहूर्त है। सावन के भौम प्रदोष व्रत के दिन त्रिपुष्कर योग बन रहा है, जो तीन गुना फल प्रदान करने वाला माना जाता है।

भौम प्रदोष व्रत 2026 तारीख

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 25 अगस्त को सुबह 6 बजकर 20 मिनट पर प्रारंभ होगी। इस तिथि की समाप्ति 26 अगस्त को सुबह में 7 बजकर 59 मिनट पर होगी। उदयातिथि के आधार पर त्रयोदशी तिथि 26 अगस्त को है, लेकिन सावन का अंतिम प्रदोष यानि भौम प्रदोष व्रत 25 अगस्त दिन मंगलवार को रखा जाएगा। क्योंकि प्रदोष काल का पूजा मुहूर्त 25 अगस्त को मिल रहा है।

भौम प्रदोष व्रत 2026 मुहूर्त

इस बार भौम प्रदोष व्रत की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम को 6 बजकर 51 मिनट से है, जो रात 9 बजकर 4 मिनट तक रहेगा। शिव पूजा के लिए भक्तों को 2 घंटे 13 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा। इसके अलावा प्रदोष के दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रात:काल 04:27 ए एम से 05:11 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त दिन में 11 बजकर 57 मिनट से दोपहर 12 बजकर 49 मिनट तक रहेगा। उस दिन का निशिता मुहूर्त देर रात 12:01 ए एम से लेकर 26 अगस्त को 12:45 ए एम तक है।

भौम प्रदोष व्रत में त्रिपुष्कर योग का संयोग

सावन का यह भौम प्रदोष व्रत त्रिपुष्कर योग में किया जाएगा। त्रिपुष्कर योग सुबह 5 बजकर 55 मिनट से सुबह 6 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। इस योग में किए गए शुभ कार्यों के तीन गुने फल प्राप्त होते हैं। प्रदोष के दिन रवि योग भी बन रहा है, जो रात में 10 बजकर 51 मिनट से 26 अगस्त को सुबह 5 बजकर 56 मिनट तक रहेगा। रवि योग भी एक शुभ योग होता है। उस दिन सुबह में आयुष्मान् योग 07 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। इस योग में आयु लंबी होती है, उत्तम सेहत का आशीर्वाद मिलता है। सुबह 7:41 बजे से सौभाग्य योग बनेगा, जो रात तक रहेगा। त्रयोदशी व्रत पर उत्तराषाढा नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 10:51 पी एम तक रहेगा, फिर श्रवण नक्षत्र का प्रारंभ होगा।

Raksha Bandhan 2026: 28 अगस्त को चंद्रमा को लगेगा ग्रहण, जानें कैसा होगा रक्षा बंधन का त्योहार और किस समय बांधी जाएगी राखी

Second Mangla Gauri Vrat 2026: सुखी दांपत्य के लिए दूसरे मंगला गौरी व्रत पर करें ये 5 उपाय, जानें मुहूर्त और पूजा विधि

Second Mangla Gauri Vrat 2026: सावन के महीने में सोमवार व्रत के साथ ही मंगलवार को मंगला गौरी व्रत भी किया जाता है। कल यानी 11 अगस्त को इस साल का दूसरा मंगला गौरी व्रत किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन का महीना शिव भक्ति के साथ मां पार्वती की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए भी जाना जाता है। इसमें आने वाले हर मंगलवार को महिलाएं और कुंवारी कन्याएं दांपत्य जीवन में खुशहाली और अखंड सौभाग्य के लिए यह व्रत करती हैं। इस दिन सुखी दांपत्य और जीवन में खुशहाली के लिए 5 खास उपाय विशेष रूप से फलदायी माने जाते हैं।

पूजन के शुभ मुहूर्त (11 अगस्त 2026)

पूजा के लिए सावन के इस पावन दिन पर निम्नलिखित शुभ मुहूर्त रहेंगे:

ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः साधना): सुबह 04:49 बजे से 05:34 बजे तक

अभिजीत मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ समय): दोपहर 12:18 बजे से 01:09 बजे तक

विजय मुहूर्त (शुभ कार्य हेतु): दोपहर 02:52 बजे से 03:43 बजे तक

गोधूलि मुहूर्त: शाम 07:09 से 07:31 तक

संध्या पूजा: शाम 07:09 से 08:16 तक

पूजन विधि

ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ व लाल/पीले वस्त्र धारण करें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर निम्न मंत्र से व्रत का संकल्प लें।

एक साफ चौकी पर लाल या सफेद वस्त्र बिछाकर मां मंगला गौरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। मां के समक्ष आटे से बना 16 बत्तियों वाला घी का दीपक प्रज्वलित करें।

माँ का ध्यान करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें: “कुंकुमागुरुलिप्तांगा सर्वाभरणभूषिताम्। नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देहं मंगलाह्वयाम्॥”

इसके बाद मां का विधि-विधान से षोडशोपचार पूजन करें।

मां मंगला गौरी की पूजा में 16 की संख्या का विशेष महत्व है। मां को 16 मालाएं, 16 लौंग, 16 सुपारियां, 16 इलायची, 16 चूड़ियां, सुहाग की 16 सामग्रियां, फल, पान, लड्डू और मिठाई अर्पित करें। साथ ही 5 प्रकार के सूखे मेवे और 7 प्रकार के अनाज (गेहूँ, उड़द, मूँग, चना, जौ, चावल और मसूर) अर्पित करें।

व्रत कथा का पाठ करें या श्रद्धापूर्वक सुनें। अंत में आरती करें। इस व्रत में एक ही समय शुद्ध सात्विक अन्न ग्रहण करने का विधान है।

भाग्य बदलने वाले 5 अचूक उपाय

16 श्रृंगार का दान : विवाह में रही बाधाएं दूर करने के लिए अविवाहित कन्याएं इस दिन मां मंगला गौरी को सुहाग की 16 वस्तुएं अर्पित करें और पूजा के बाद इन्हें किसी सुहागिन स्त्री को दान कर दें।

लाल पुष्प और शहद : यदि दांपत्य जीवन में तनाव या अनबन रहती है, तो मां मंगला गौरी को 16 लाल गुड़हल के फूल और शहद अर्पित करें। इसके बाद “ॐ ह्रीं मंगला गौर्यै नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें।

16 बत्तियों का दीपक : इस दिन संध्या समय घर के मंदिर में आटे का 16 बत्तियों वाला दीपक जलाएं और उसमें थोड़ा-सा कपूर डाल दें। इससे घर की दरिद्रता दूर होती है और धन वृद्धि के योग बनते हैं।

अन्न व वस्त्र दान : पूजा के पश्चात 7 प्रकार के अनाज का मिश्रण बनाकर किसी जरूरतमंद को दान करें। साथ ही किसी वृद्ध सुहागिन स्त्री के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लें।

मंगल दोष शांत करने का उपाय : यदि आपकी कुंडली में मंगल दोष के कारण जीवन में परेशानियां आ रही हैं, तो मंगला गौरी पूजा के समय मां को 16 छोटी इलायची और 16 बताशे चढ़ाएं और बाद में इसे प्रसाद स्वरूप परिवार में बांट दें।

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Sawan Bel Patra Ke Upay: सावन के महीने में बेल पत्र के ये उपाय करने से मिल जाएगा सभी तीर्थों का पुण्य फल, जानें इनके बारे में

Sawan Bel Patra Ke Upay: जिस तरह सावन का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, उसी तरह उन्हें बिल्प पत्र यानी बेलपत्र भी प्रिय हैं। भगवान शिव की पूजा में बेल पत्र का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव की पूजा बेलपत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बेल पत्र की जड़ में दुनिया में जितने सभी प्रसिद्ध तीर्थ निवास करते हैं। इसलिए इसकी जड़ के पास दीपक जलाने, दीपमाला दान करने से कई गुना फल मिलता है।

कहा जाता है कि जो व्यक्ति धूप-दीप, फूलों से बिल्ववृक्ष के मूल का पूजन करता है, वह शिवलोक को प्राप्त करता है और उसके सन्तान और सुख दोनों में वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति को संतान से सुख मिलता है। शिवपुराण सावन के अनुसार, सावन के पवित्र महीने में बिल्व पत्र के पेड़ के नीचे दीपक जलाने का विशेष महत्व और अनेक लाभ बताए गए हैं। इसे प्रदोष काल या रात में जलाना अत्यंत फलदायी माना जाता है। सावन में बेलपत्र के पेड़ के नीचे दीया जलाने के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

भगवान शिव का आशीर्वाद : शिवपुराण के अनुसार, बेलपत्र के वृक्ष की जड़ में स्वयं महादेव का वास होता है। सावन में इसके नीचे दीपक जलाने से भगवान भोलेनाथ अत्यंत प्रसन्न होते हैं और साधक को सुख-शांति तथा आरोग्य का वरदान देते हैं।

मां लक्ष्मी का वास और धन-धान्य की प्राप्ति : धार्मिक कथाओं के अनुसार, बेलपत्र के वृक्ष में माता लक्ष्मी का भी निवास माना गया है। मान्यता है कि शाम या रात के समय बेलपत्र के नीचे घी का दीपक जलाने से घर से दरिद्रता दूर होती है और आर्थिक संकटों से मुक्ति मिलती है।

पापों का नाश : माना जाता है कि बेलपत्र की जड़ में समस्त तीर्थों का वास होता है। इसके नीचे दीपदान करने से व्यक्ति के ज्ञात-अज्ञात पाप मिट जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष से मुक्ति : घर में या आसपास लगे बेलपत्र के नीचे दीया जलाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और वातावरण शुद्ध एवं सकारात्मक बनता है।

पितृ दोष और कष्टों से राहत : बेलपत्र के पेड़ के पास शाम को दिया जलाने से ग्रह-दोष दूर होते हैं और पितरों का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।

दीपक जलाने का सही तरीका

दीपक के लिए गाय के शुद्ध घी या तिल के तेल का उपयोग करें।

दीपक मुख्य रूप से प्रदोष काल (सूर्यास्त के आसपास का समय) में बेलपत्र की जड़ के पास जलाएं।

दीपक जलाते समय भगवान शिव के मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का मन में जाप करें।

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Kamika Ekadashi 2026: सावन की पहली एकादशी होती है कामिका एकादशी, सुख-समृद्धि और भाग्य को मजबूत बनाने के लिए जरूर करें ये 5 उपाय

Kamika Ekadashi 2026: सावन में आने वाले एकादशी व्रत का विशेष स्थान है। हिंदू कैलेंडर के प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को एकादशी व्रत किया जाता है। सावन हिंदू कैलेंडर का पांचवां महीना है। यह माह भगवान शिव को अति प्रिय है, लेकिन इसके कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु का व्रत किया जाता है।

सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी का व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान शिव की भी पूजा की जाती है। इसलिए इस तिथि का महत्व और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि, इस व्रत को रखने से कई गुना पुण्य फल प्राप्त होता है और जाने-अनजाने में किए गए पापों से भी मुक्ति मिलती है। आइए जानते हैं कि इस साल सावन माह की पहली एकादशी कब है, शुभ मुहूर्त क्या है और इस दिन कौन-से सरल उपाय करने चाहिए।

कब है कामिका एकादशी 2026?

इस साल कामिका एकादशी की तिथि 8 अगस्त 2026 को सुबह 10 बजकर 29 मिनट से शुरू होगी। इसका समापन 9 अगस्त 2026 को सुबह 7 बजकर 34 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार कामिका एकादशी का व्रत 9 अगस्त 2026, रविवार को रखा जाएगा। इस व्रत कर पारण 10 अगस्त 2026 को किया जाएगा। इस दिन शुभ समय सुबह 6 बजकर 36 मिनट से सुबह 9 बजकर 32 मिनट तक रहेगा।

कामिका एकादशी पर करें ये उपाय

  • घर के मुख्य द्वार पर शाम के समय घी का दीपक जलाकर माता लक्ष्मी की पूजा करें। इससे आर्थिक सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
  • सावन में पड़ने वाली एकादशी के दिन भगवान विष्णु को पंचामृत का भोग अर्पित करें। इससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
  • शिवलिंग पर जल में थोड़ा-सा कच्चा दूध मिलाकर अभिषेक करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें। यह सरल उपाय कई गुना पुण्य फल प्रदान करता है।
  • इस दिन आप तुलसी के पौधे के सामने भी घी का दीपक जलाकर रखें। इस दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का 108 बार जाप करें।
  • भगवान शिव को शमी के फूल और भगवान विष्णु को पीले रंग के फूल अर्पित करें। इससे भाग्य मजबूत बनता है।
  • इस दिन सफेद और पीले रंग की वस्तुओं का दान करें। मान्यता है कि इससे पुण्य फल बढ़ता है और अटके कार्यों को भी गति मिलती हैं।

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