Daily Voice : अमेरिकी मध्यावधि चुनाव बाजार के लिए कर सकते हैं ट्रिगर का काम, चुनिंदा आईटी शेयरों पर रहे नजर

Daily Voice : IT शेयरों में हालिया तेजी भले ही अभी किसी टिकाऊ रिकवरी का संकेत न हो,लेकिन हर उछाल पर आईटी शेयरों में बिकवाली की एकतरफा रणनीति अपनाना भी जल्दबाजी हो सकती है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे बाजारों के लिए एक ट्रिगर का काम कर सकते हैं,लेकिन इस बात की संभावना कम है कि केवल इसी वजह से बाजार में कोई बड़ी तेजी या कच्चे तेल में भारी गिरावट आएगी। ये बातें अल्फएक्यूरेट एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक और संस्थापक राजेश कोठारी ने मनीकंट्रोल से हुई एक बातचीत में कही हैं।

उन्होंने आगे कहा कि आईटी शेयरों में आई हालिया तेजी पॉजिटिव संकेत है लेकिन निवेशकों को अभी यह नहीं मान लेना चाहिए कि इस सेक्टर में टिकाऊ तेजी की शुरुआत हो गई है। पोर्टफोलियो में कोई बदलाव करने से पहले तेल सप्लाई की स्थिति,डॉलर,बॉन्ड यील्ड और कॉर्पोरेट अर्निंग पर नजर रखने की जरूरत है।

आईटी में तीन बातों पर नजर रखने की जरूरत

राजेश कोठारी के मुताबिक IT शेयरों में हालिया तेजी उत्साहजनक है,लेकिन इसे एक टिकाऊ तेजी मान लेने में सावधानी बरतने की जरूरत है। बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तेजी इंडस्ट्री की अर्निंग आउटलुक से मेल खाती है या यह सिर्फ ‘ओवरसोल्ड’लेवल्स से आई खरीदारी है? हमें आईटी में तीन बातों पर नजर रखने की जरूरत है:

मांग की स्थिति: विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप में टाले जा सकने वाला टेक्नोलॉजी खर्च (discretionary technology spending)अहम बना हुआ है। बेहतर सौदे हासिल करने का नतीजा रेवेन्यू ग्रोथ के रूप में दिखना चाहिए।

AI से बदलाव और अवसर: AI कमाई के नए स्रोत पैदा कर सकता है, लेकिन यह पारंपरिक बिलिंग मॉडल को भी बदल सकता है और कीमतों पर दबाव डाल सकता है।

वैल्यूएशन और अर्निंग आउटलुक: भारी तेजी के बाद, जिन शेयरों की कीमत उनकी कमाई की संभावनाओं से आगे निकल गई है, उनमें मुनाफावसूली (प्रॉफिट-टेकिंग) देखने को मिल सकती है।

राजेश कोठारी का मानना ​​है कि आईटी सेक्टर में तेजी आने पर हर शेयर बेच देने की रणनीति जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन इस तेजी के पीछे भागना भी कोई समझदारी नहीं है। आईटी में उन कंपनियों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए जिनकी ग्रोथ की संभावनाएं बेहतर हो रही हैं, जिनके ग्राहकों के साथ मजबूत संबंध हैं और जिनके पास AI से कमाई करने के ठोस मौके हैं। ऐसी कंपनियों से दूर रहने की जरूरत है जो अभी भी कमजोर मांग से जूझ रही हैं।

क्या आप कंजम्पशन सेक्टर को लेकर सतर्क हैं? कंजम्पशन डिमांड और इससे जुड़े शेयरों पर आपकी क्या राय है?

राजेश कोठारी ने कहा कि कंजम्पशन सेक्टर को लेकर पूरी तरह सतर्क रहने के बजाय,चुनिंदा रुख अपनाना पसंद करेंगे। जरूरी चीजों पर होने वाले खर्च और गैर-जरूरी (वैकल्पिक) चीजों पर होने वाले खर्च के बीच का अंतर समझना जरूरी है। कई ‘फास्ट फ्रीक्वेंसी’ डेटा इंडिकेटर कंजम्पशन ट्रेंड में सुधार दिखा रहे हैं (जैसे रिटेल क्रेडिट ग्रोथ, टू-व्हीलर की बिक्री में बढ़ोतरी, आदि)।

इस सेक्टर में ऐसी कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जिनके पास मजबूत ब्रांड, अच्छा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, कीमतों को तय करने की ताकत, अच्छी बैलेंस शीट और सही वैल्यूएशन हों। वैकल्पिक उपभोग (discretionary consumption) के सेक्टर में केवल कीमतों में बढ़ोतरी पर निर्भर रहने के बजाय, बिक्री की मात्रा (volume) में बढ़त के संकेतों पर भी नजर रखने की जरूरत है।

क्या आप आने वाले समय में ‘अल नीनो’ (El Niño) को बड़ा जोखिम मानते हैं? इसका महंगाई, ग्रामीण मांग और भारत के विकास पर क्या असर पड़ सकता है?

इसके जवाब उन्होंने कहा कि ‘अल नीनो’ एक जोखिम तो है,लेकिन इसे देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि भारत के विकास का पूरा आउटलुक ही खराब हो जाएगा। कोई निष्कर्ष निकालने से पहले फसल उत्पादन, जलाशयों के जल-स्तर, खाने-पीने की चीजों की कीमतों के रुझान और ग्रामीण मांग के इंडीकेटरों पर नजर रखने की जरूरत है।

Q2FY27 में बैंकों के नतीजे कैसे रह सकते है? क्या इनके मौजूदा वैल्यूएशन अच्छे लग रहे है या इन स्तरों से आगे बढ़ने की गुंजाइश सीमित है?

इसके जवाब में राजेश कोठारी ने कहा कि बैंक शेयरों का प्रदर्शन उत्साहजनक है। ज़्यादातर बैंकों ने लोन वितरण (डिस्बर्समेंट) में अच्छी बढ़ोतरी और मज़बूत एसेट क्वालिटी की जानकारी दी है। अच्छे बैंकों में मध्यम अवधि के नजरिए निवेश के अच्छे मौके दिख रहे हैं लेकिन वैल्यूएशन के नजरिए से चुनिंदा शेयरों पर ही दांव लगाने की सलाह होगी।

ऐसे बैंकों पर फोकस करने की सलाह होगी जिनकी अर्निंग ग्रोथ को टिकाऊ कोर इनकम,अच्छी एसेट क्वालिटी और मजबूत फंडिंग फ्रेंचाइजी का सपोर्ट हासिल हो। अगले दो से तीन तिमाहियों में मार्जिन में सुधार की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भी नजर रहनी चाहिए।

 

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El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

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नई GDP सीरीज ने बदली अर्थव्यवस्था की तस्वीर, निर्माण में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी दोगुने से ज्यादा

भारत की नई GDP सीरीज ने अर्थव्यवस्था के कई बड़े सेक्टरों की तस्वीर बदल दी है। खासकर निर्माण क्षेत्र के GVA (ग्रॉस वैल्यू एडेड) में बड़ा बदलाव दिखा है। GVA का मतलब किसी सेक्टर ने अर्थव्यवस्था में कितनी नई वैल्यू जोड़ी। नई सीरीज के मुताबिक, यहां निजी कंपनियों की हिस्सेदारी पहले के अनुमान से दोगुने से भी ज्यादा हो गई है।

वहीं, होटल और रेस्तरां सेक्टर में तस्वीर उलट है। यहां घरेलू कारोबार की हिस्सेदारी बढ़ी है। सड़क परिवहन और कुछ दूसरे सेक्टरों में भी नए आंकड़ों ने पुराने अनुमानों को बदला है।

निर्माण में निजी कंपनियों का GVA बढ़ा

नई 2022-23 बेस सीरीज में निर्माण क्षेत्र में निजी कंपनियों का GVA ₹7.46 लाख करोड़ आंका गया है। पुरानी 2011-12 बेस सीरीज में यह सिर्फ ₹3.53 लाख करोड़ था। यानी नए आंकड़ों में इसमें 111% की बड़ी बढ़ोतरी हुई है।

दूसरी ओर, घरेलू क्षेत्र से जुड़े निर्माण GVA को घटाया गया है। यह ₹17.12 लाख करोड़ से घटकर ₹12.37 लाख करोड़ रह गया है। यानी इसमें 27.8% की कमी हुई है।

सरकारी क्षेत्र के निर्माण GVA में भी बढ़ोतरी हुई है। यह 23.3% बढ़कर ₹1.30 लाख करोड़ हो गया है। हालांकि, पूरे निर्माण क्षेत्र का GVA बहुत ज्यादा नहीं बदला है। नई सीरीज में यह ₹21.13 लाख करोड़ है, जबकि पुरानी सीरीज में ₹21.71 लाख करोड़ था।

इस बदलाव से निर्माण क्षेत्र में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 35.3% हो गई है। पुरानी सीरीज में यह सिर्फ 16.3% थी। वहीं, घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 79% से घटकर 58.5% रह गई है।

सीधे शब्दों में कहें तो नई GDP सीरीज निर्माण क्षेत्र को पहले के मुकाबले ज्यादा संगठित और कॉरपोरेट सेक्टर से जुड़ा हुआ दिखाती है।

होटल और रेस्तरां में उलटी तस्वीर

होटल और रेस्तरां सेक्टर में कहानी अलग है। यहां घरेलू कारोबार की हिस्सेदारी बढ़ी है। नई सीरीज में घरेलू क्षेत्र का GVA ₹1.45 लाख करोड़ से बढ़कर ₹1.69 लाख करोड़ हो गया है।

इसके उलट, निजी कंपनियों का GVA ₹1.19 लाख करोड़ से घटकर ₹1.09 लाख करोड़ रह गया है। इस सेक्टर का कुल GVA भी बढ़ा है। यह 5.7% बढ़कर ₹2.80 लाख करोड़ हो गया है।

अब होटल और रेस्तरां के GVA में घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 60.6% है। पुरानी सीरीज में यह 54.6% थी। वहीं, निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 44.9% से घटकर 39.1% रह गई है।

MoSPI निजी कंपनियों के आंकड़ों के लिए MCA-21 की कंपनी फाइलिंग का इस्तेमाल करता है। घरेलू कारोबार का अनुमान लगाने के लिए अब वर्कफोर्स से जुड़े सर्वे और प्रति कर्मचारी वैल्यू एडेड के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

सड़क परिवहन में भी बड़ा बदलाव

सड़क परिवहन में निजी कंपनियों का GVA काफी कम कर दिया गया है। नई सीरीज में यह ₹54,788 करोड़ है। पुरानी सीरीज में यह आंकड़ा ₹1.25 लाख करोड़ था। यानी इसमें 56.1% की कमी की गई है।

घरेलू क्षेत्र का GVA भी घटा है। लेकिन यहां गिरावट सिर्फ 9.2% रही। नई सीरीज में घरेलू क्षेत्र का GVA ₹5.15 लाख करोड़ है।

मैन्युफैक्चरिंग में बदलाव इतना बड़ा नहीं है। घरेलू क्षेत्र का GVA करीब 10% बढ़ा है। दूसरी ओर, निजी कंपनियों का GVA 3.7% घटा है।

इससे मैन्युफैक्चरिंग में घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी 13.3% से बढ़कर 14.8% हो गई है। निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 80.6% से घटकर करीब 78.8% रह गई है।

रियल एस्टेट में भी घरेलू कारोबार का हिस्सा बढ़ा

रियल एस्टेट, मकानों के मालिकाना हक और प्रोफेशनल सर्विसेज में भी घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ी है। नई सीरीज में घरेलू GVA 21.3% बढ़ा है।

वहीं, निजी कंपनियों के GVA में सिर्फ 2.7% की बढ़ोतरी हुई है। इस पूरी कैटेगरी का GVA 10.1% बढ़ा है।

कृषि में घरेलू क्षेत्र का दबदबा कायम

कृषि, वानिकी और मछली पालन में तस्वीर ज्यादा नहीं बदली है। इस सेक्टर के GVA में 96% से ज्यादा हिस्सा घरेलू क्षेत्र का है।

2022-23 के लिए घरेलू GVA को ₹42.73 लाख करोड़ से बढ़ाकर ₹45.80 लाख करोड़ किया गया है। यानी नई सीरीज में भी कृषि का बड़ा हिस्सा छोटे और घरेलू कारोबार से ही जुड़ा माना गया है।

नई सीरीज में पुराने आंकड़े भी

नई GDP सीरीज में पहले के मुकाबले ज्यादा सर्वे और सरकारी डेटा का इस्तेमाल किया गया है। फिर भी कुछ जगह पुराने आंकड़ों पर निर्भरता बनी हुई है।

उदाहरण के लिए, खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल इंजनों की संख्या का अनुमान 1997 और 2003 की Livestock Census के आंकड़ों से लगाया गया है। नई जानकारी नहीं मिलने के कारण 2015-16 के बाद भी इसी अनुमान को आगे बढ़ाया गया है।

कृषि की मार्केटिंग लागत के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। पहले 2004-05 की एक स्टडी के आधार पर इसे फसल उत्पादन का 3.22% माना गया था।

नई सीरीज में जिन राज्यों ने अपनी जानकारी दी है, वहां नए और राज्यवार आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन जहां जानकारी नहीं मिली, वहां अब भी 3.22% वाला पुराना अनुपात ही लागू है।

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GDP Growth: जून तिमाही में 7.8% रही भारत की जीडीपी ग्रोथ, सर्विसेज सेक्टर की ग्रोथ सबसे ज्यादा

GDP Growth: इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा रहा है। जून तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.8 फीसदी रही। यह एनालिस्ट्स और इकोनॉमिस्ट्स के अनुमान से ज्यादा है। खास बात यह है कि जून तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ तब 7.8 फीसदी रही, जब वैश्विक स्थितियां काफी चैलेंजिंग थीं।

मार्च तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 8.6 फीसदी

इस साल मार्च तिमाही में भारत में जीडीपी ग्रोथ 8.6 फीसदी थी। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लिमेंटेशन (MoSPI) ने 31 अगस्त को जून तिमाही के जीडीपी के डेटा जारी किए। जीडीपी की ग्रोथ अनुमान से ज्यादा रही। मनीकंट्रोल के पोल में इकोनॉमिस्ट्स ने जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 7.3 फीसदी रहने का अनुमान जताया था।

जून तिमाही में जीवीए 8.2 फीसदी रहा

जून तिमाही में ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) 8.2 फीसदी रहा। मार्च तिमाही में यह 8.7 फीसदी था। जीवीए का मतलब इकोनॉमी में उत्पादित गुड्स और सर्विसेज की कुल वैल्यू से है। इसमें नेट इनडायरेक्ट टैक्स शामिल नहीं होता है। जून तिमाही में अर्थव्यवस्था के शानदार प्रदर्शन में सर्विसेज और इनवेस्टमेंट का बड़ा हाथ है।

पहली तिमाही में सर्विसेज सेक्टर की ग्रोथ सबसे ज्यादा

जून तिमाही में सर्विसेज का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। इसकी ग्रोथ 10 फीसदी रही। एक साल पहले की समान अवधि में सर्विसेज सेक्टर की ग्रोथ 8 फीसदी थी। मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ 9.2 फीसदी रही। कंस्ट्रक्शन सेक्टर की ग्रोथ 7.7 फीसदी रही। ट्रेड, होटल्स, ट्रांसपोर्ट, कम्युनिकेशन और ब्रॉडकास्टिंग से संबंधित सर्विसेज सेगमेंट की ग्रोथ 8.5 फीसदी रही।

पहली तीमाही में मध्यपूर्व में लड़ाई का असर इकोनॉमी पर

जून तिमाही का मतलब अप्रैल, मई और जून के महीनों से है। अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को लड़ाई शुरू हुई थी। जून तिमाही में ज्यादातर समय ईरान को अमेरिकी हमले का सामना करना पड़ा। ईरान ने कई खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले किए।

क्रूड ऑयल  की कीमतें काफी समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहीं

इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से क्रूड ऑयल सहित दूसरी कमोडिटीज की सप्लाई पर काफी ज्यादा असर पड़ा। क्रूड की कीमतें आसमान में पहुंच गईं। लेकिन, सरकार के कैपिटल एक्सपेंडिचर जारी रखने से आर्थिक गतिविधियों को काफी सपोर्ट मिला।

प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर 7.1 फीसदी बढ़ा 

जून तिमाही में प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर 7.1 फीसदी बढ़ा। इससे परिवारों में होने वाली खपत का पता चलता है। ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन 11.9 फीसदी बढ़ा, जबकि सरकार का फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर 4.3 फीसदी बढ़ा। जून तिमाही के जीडीपी ग्रोथ के डेटा ऐसे वक्त आए हैं, जब इनफ्लशन से जुड़े रिस्क बढ़ रहा है।

FY27 में 5 फीसदी रह सकता है रिटेल इनफ्लेशन 

पिछले हफ्ते मनीकंट्रोल के पोल में शामिल इकोनॉमिस्ट्स का यह मानना था कि FY27 में रिटेल इनफ्लेशन 5 फीसदी रह सकता है। इसकी रेंज 4.7 से 5.2 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया। इसकी कई वजहें हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से ऑयल की कीमतें हाई लेवल पर बनी हुई हैं। देश में मानसून की बारिश एक समान नहीं रही है। इसका असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा।

2027 में दुनिया पर मंडरा सकता है बड़ा खाद्य संकट, भारत पर क्या पड़ेगा असर? JP Morgan ने चेतावनी में क्या कहा

2027 में दुनिया पर मंडरा सकता है बड़ा खाद्य संकट, भारत पर क्या पड़ेगा असर? JP Morgan ने चेतावनी में क्या कहा

el nano efact

वैश्विक वित्तीय संस्था JP Morgan से जुड़ी एक चेतावनी के मुताबिक, वर्ष 2027 में दुनिया को बड़े खाद्य आपूर्ति संकट का सामना करना पड़ सकता है। भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया उन देशों में शामिल हो सकते हैं, जहां इसका असर सबसे गंभीर रहने की आशंका है। इस संभावित संकट के पीछे भूराजनीतिक तनाव, उर्वरकों की कमी, कृषि लागत में बढ़ोतरी और अल नीनो से जुड़े बदलते मौसम के पैटर्न को प्रमुख कारण माना गया है।

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2027 की पहली छमाही में महंगाई 5% तक पहुंचने का अनुमान

 

रिपोर्ट के अनुसार, 2027 के पहले छह महीनों में वैश्विक महंगाई करीब 5% तक पहुंच सकती है। इसकी तुलना में 2026 की इसी अवधि में यह करीब 2.8% रही थी।

 

संभावित संकट केवल खाद्यान्न की कमी तक सीमित नहीं रहेगा। उत्पादन लागत बढ़ने और मौसम में अनिश्चितता के कारण किसानों के लिए फसल उत्पादन बनाए रखना भी मुश्किल हो सकता है। अगर खाद्य कीमतों में तेज वृद्धि होती है तो विकासशील देशों में परिवारों को अपनी आय का बड़ा हिस्सा जरूरी खाद्य वस्तुओं पर खर्च करना पड़ सकता है।

 

उर्वरक की कमी बढ़ा सकती है चिंता

 

संभावित खाद्य संकट में उर्वरक आपूर्ति एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कुल यूरिया निर्यात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी करीब 42%, जबकि अमोनिया निर्यात में हिस्सेदारी करीब 27% है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव और प्राकृतिक गैस की बढ़ती कीमतों से आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है।

 

रिपोर्ट में एक संभावित घटनाक्रम की ओर भी इशारा किया गया है। इसके अनुसार, संघर्ष से ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है, जिसके बाद उर्वरकों की कमी, कृषि लागत में बढ़ोतरी, उत्पादन में गिरावट और अंततः खाद्य कीमतों में वृद्धि हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, बाधित आपूर्ति व्यवस्था और उत्पादन को सामान्य स्तर पर लाने में एक से चार साल तक का समय लग सकता है।

 

अल नीनो से फसल उत्पादन पर बढ़ सकता है दबाव

 

अल नीनो से जुड़े मौसम में बदलाव वैश्विक कृषि पर दबाव और बढ़ा सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, अल नीनो के दौरान सूखा, बाढ़ और अन्य प्रतिकूल मौसम की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अल नीनो के कारण फसल उत्पादन में औसतन 3.5% की गिरावट देखी गई है। वहीं, एक 'सुपर अल नीनो' वैश्विक खाद्य महंगाई को करीब 0.7% तक बढ़ा सकता है। यदि इसके साथ ऊर्जा की कीमतों में भी वृद्धि होती है तो इसका प्रभाव 1.3% से 1.5% तक पहुंच सकता है।

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भारत पर भी पड़ सकता है सीधा असर

 

भारत में अगर मानसून कमजोर या अनियमित रहता है तो कृषि क्षेत्र पर सीधा असर पड़ सकता है। बारिश पर निर्भर धान, दाल, तिलहन, कपास और गन्ने जैसी फसलों पर बारिश के बदलते पैटर्न का प्रभाव पड़ने की आशंका है। भारत के सामने चुनौती केवल पर्याप्त अनाज उपलब्ध कराने की नहीं होगी, बल्कि उर्वरक और ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच किसानों के लिए कृषि उत्पादन की लागत को वहनीय बनाए रखना भी होगी।

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ब्राजील और इंडोनेशिया भी जोखिम वाले देशों में

 

रिपोर्ट में ब्राजील और इंडोनेशिया को भी संभावित खाद्य संकट से गंभीर रूप से प्रभावित होने वाले देशों में शामिल किया गया है। कृषि लागत में वृद्धि, फसल उत्पादन में कमी, उर्वरक की संभावित कमी और प्रतिकूल मौसम इन देशों में खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं। हालांकि, संभावित संकट का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले समय में भूराजनीतिक तनाव, उर्वरक की उपलब्धता, ऊर्जा कीमतों और मौसम की स्थिति किस तरह बदलती है।

El Nino Impact On Monsoon: अल-नीनो के साये में मानसून, समझिए कम बारिश से इकॉनमी पर पड़ सकता है कैसा असर

भारत में मानसून पर मंडराते अल-नीनो के खतरे ने आम लोगों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने चेतावनी दी है कि अल-नीनो के मजबूत होने की वजह से मानसूनी बारिश कमजोर पड़ सकती है। इसका सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ेगा। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और हाइड्रोपावर उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। वसे एजेंसी का यह भी मानना है कि अगर मौसम का यह झटका बहुत ज्यादा गंभीर नहीं होता है तो भारत की समग्र अर्थव्यवस्था पर इसका असर सीमित रहने की उम्मीद है।

एसएंडपी के मुताबिक भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र की उन इकॉनमी (जैसे वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस) में शामिल है, जहां के लोग कीमतों में होने वाले उछाल के प्रति बेहद संवेदनशील हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि इन देशों में घरेलू बजट का एक बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है और कृषि काफी हद तक मौसम की स्थितियों पर निर्भर करती है।

12% कम हुई बारिश, अगस्त में भी सुस्त रह सकता है मानसून

भारत के मानसूनी बारिश की स्थिति फिलहाल अच्छी नजर नहीं आ रही है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक 11 अगस्त तक 2026 के मानसून सीजन के दौरान बारिश औसत से 12 प्रतिशत कम दर्ज की गई है। इसके अलावा भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) का अनुमान है कि आने वाले हफ्तों में पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में मानसून और कमजोर हो सकता है।

भारत में सालाना होने वाली कुल बारिश का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मानसून से ही मिलता है। ये खेती-किसानी के लिए बेहद जरूरी है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि में सिंचाई की उचित व्यवस्था नहीं है, जिससे अधिकांश फसलें नियमित बारिश पर ही निर्भर रहती हैं।

दालों, सोयाबीन और मक्के की पैदावार पर पड़ सकता है असर

अगर बारिश में कमी का यह दौर लंबा खींचता है तो इससे दालों, सोयाबीन, कपास और मक्के जैसी फसलों की पैदावार में गिरावट आ सकती है। इस सीजन में किसानों को पहले से ही असमान बारिश का सामना करना पड़ा है। हालांकि जुलाई में हुई बेहतर बारिश ने शुरुआती सुस्त मानसून से हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई की थी, लेकिन अब फिर से जोखिम बढ़ गया है।

मौसम विभाग के ताजा पूर्वानुमानों ने इन चिंताओं को और गहरा कर दिया है। विभाग ने अगस्त महीने में औसत से कम बारिश होने का अंदेशा जताया है जबकि इसी दौरान अल-नीनो की स्थिति और मजबूत होने की संभावना है। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारत में अल-नीनो का संबंध कमजोर या अनिश्चित मानसूनी बारिश से रहा है।

बिजली आपूर्ति और जलाशयों पर भी पड़ेगा प्रभाव

कम बारिश का असर सिर्फ भोजन और फसलों तक ही सीमित नहीं रहेगा। बारिश कम होने से देश के प्रमुख जलाशय खाली रह सकते हैं, जिससे हाइड्रो पावर प्रोडक्शन में कमी आ सकती है। इसका सीधा असर बारिश पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति पर पड़ेगा और ऊर्जा संकट की स्थिति खड़ी हो सकती है।

सबसे बड़ा जोखिम आम परिवारों के बजट पर है। कृषि उत्पादन में कमी आने से बाजार में खाद्य पदार्थों की आपूर्ति घट जाएगी और कीमतें ऊपर चढ़ जाएंगी। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा, खासकर तब जब रोजमर्रा की जरूरी चीजें महंगी हो जाएंगी।

भारत के पास चावल का पर्याप्त स्टॉक, लेकिन चुनौतियां बरकरार

तमाम जोखिमों के बावजूद भारत के पास खाद्य आपूर्ति के बड़े झटके से निपटने के लिए कुछ मजबूत सुरक्षा चक्र मौजूद हैं। देश के पास वर्तमान में चावल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। इसके अलावा पिछले अल-नीनो दौर की तुलना में भारत की खेती के तरीकों, सिंचाई सुविधाओं और फसल तकनीकों में काफी सुधार हुआ है। इससे भी देश की खाद्य उत्पादन क्षमता मजबूत हुई है।

एसएंडपी का कहना है कि मौसम से जुड़ी अस्थायी रुकावट का मतलब यह नहीं है कि इकॉनमी को तुरंत कोई बड़ा नुकसान पहुंचेगा। नुकसान का पैमाना इस बात पर निर्भर करेगा कि मौसम कितना प्रतिकूल होता है और सरकार इससे निपटने के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई करती है। भारतीय उपभोक्ताओं के लिए तत्काल चिंता यही है कि अगर बारिश और कमजोर होती है तो रोजमर्रा के खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। यह दबाव कितने समय तक रहेगा, यह काफी हद तक मानसून, फसल उत्पादन और आने वाले महीनों में अल-नीनो की ताकत पर निर्भर करेगा।

El Nino Impact: अल नीनो और युद्ध के बीच भारत के मानसून से दुनिया को क्यों हो रही टेंशन? नए संकट की आहट!

El Nino Impact On Monsoon: वैश्विक स्तर पर खाद्य महंगाई की मार झेल चुकी दुनिया के सामने साल 2026 के अंत तक एक बार फिर से भोजन महंगा होने का नया संकट मंडराने लगा है। हमारी सहयोगी वेबसाइट ‘फर्स्टपोस्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया और यूक्रेन में जारी युद्ध की वजह से फ्यूल और फर्टीलाइजर की सप्लाई काफी प्रभावित हो रही है।इसके अलावा दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातक देश भारत में मानसून की धीमी और देर से हुई शुरुआत ने वैश्विक चावल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को लेकर दुनिया भर की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

कच्चे तेल के ऊंचे दाम, खाद आपूर्ति में रुकावट और जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम कृषि उत्पादन व उसके परिवहन की लागत को लगातार बढ़ा रहे हैं। इस वजह से दुनिया भर के उपभोक्ताओं को इस साल के अंत और वर्ष 2027 के दौरान खाद्य महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में राहत की खबर यह है कि घरेलू स्तर पर सुधरती बारिश और पर्याप्त अनाज भंडार के दम पर भारत पर इसका असर सीमित रहने का अनुमान है।

संयुक्त राष्ट्र ने दिए संकेत: साल के अंत से फिर बढ़ेंगे खाने-पीने के सामान के दाम

साल 2022 में ग्लोबल महंगाई को बढ़ाने में खाद्य कीमतों ने मुख्य भूमिका निभाई थी लेकिन चालू वर्ष में ऊर्जा लागत अधिक रहने के बावजूद खाद्य कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित रही हैं। हालांकि यह राहत अस्थाई साबित हो सकती है। रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के मुख्य अर्थशास्त्री मैक्सिमो टोरेरो ने चेतावनी दी है कि कमोडिटी की कीमतें अब ज्यादा तेजी से बढ़ेंगी और साल के अंत तक खाद्य सामग्री के दाम बढ़ने शुरू हो जाएंगे।

इसका असर अगले साल यानी 2027 में और अधिक देखने को मिलेगा। टोरेरो के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कमोडिटी की बढ़ी हुई कीमतों का असर रिटेल यानी खुदरा बाजार में दिखने में तीन से छह महीने का समय लगता है।

हालांकि हाल के महीनों में गेहूं, मक्का और चावल जैसी प्रमुख फसलों की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी देखी गई है, लेकिन यह मौजूदा समय की ठीक-ठाक पैदावार दिखा रही है। असली चुनौती अगली बुवाई के सीजन में उत्पादन लागत बढ़ने से सामने आएगी।

युद्ध की वजह से सप्लाई चेन पर बढ़ा भारी दबाव

ईरान से जुड़े मौजूदा संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा की है। ये दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा समुद्री मार्गों में से एक है। मैक्सिमो टोरेरो के मुताबिक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह का अवरोध कृषि प्रणालियों और उसके इनपुट्स पर सीधा असर डालता है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की ऊंची दरें सिंचाई, पैकेजिंग, प्रोसेसिंग और ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ा देती हैं। इसके अलावा नेचुरल गैस के दाम बढ़ने से खाद बनाना भी काफी महंगा हो जाता है।

इसी तरह यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस के तेल और गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों ने डीजल और नेचुरल गैस के निर्यात पर असर डाला है। इससे दुनिया भर में किसानों की उत्पादन लागत बढ़ रही है। यूरोप, अमेरिका, ब्राजील और एशिया के किसान इस दबाव को महसूस कर रहे हैं और कम मुनाफे की वजह से फसलें उगाएं या न उगाएं, इस सवाल से जूझ रहे हैं।

भारत का मानसून बना दुनिया के लिए अहम वॉचपॉइंट

दुनिया में चावल के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक और सबसे बड़े निर्यातक देश भारत का मानसून अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजारों के लिए एक प्रमुख वॉचपॉइंट बना हुआ है। भारत में मानसून की देरी से शुरुआत और औसत से कम बारिश ने चावल के उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी थीं। अगर भारत के चावल उत्पादन में कोई बड़ी बाधा आती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई टाइट हो सकती है। इससे कीमतें तेजी से ऊपर जा सकती हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर सीमित: बजाज एसेट मैनेजमेंट की रिपोर्ट

बजाज एसेट मैनेजमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में देर से आए मानसून का देश की इकॉनमी पर बड़ा निगेटिव असर पड़ने की संभावना बेहद कम है। रिपोर्ट में बताया गया है कि जून के आखिरी हफ्ते में बारिश काफी बेहतर हुई है। जुलाई में भी मानसूनी बारिश मजबूत रही। देश के प्रमुख नदी घाटियों और जलाशयों में पानी का स्तर बेहतर स्थिति में है। भारत के पास सरकारी गोदामों में अनाज का भंडार तय बफर नॉर्म्स से लगभग 5 गुना अधिक है। ये खाद्य कीमतों में उछाल को रोकने में एक मजबूत कवच का काम करेगा।

वित्त वर्ष 2027 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित खुदरा महंगाई दर औसतन 5 से 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ये खाद्य आपूर्ति के अस्थाई दबावों की वजह से होगी। हालांकि कोर इन्फ्लेशन दर कंट्रोल में है। भारत की रूरल इकॉनमी मजबूत बनी हुई है। मई में ट्रैक्टरों की बिक्री में सालाना आधार पर 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसी तरह एग्रीकल्चर क्रेडिट करीब 15 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा। गैर-कृषि आय के मजबूत रहने से बुवाई में देरी के बावजूद ग्रामीण खपत बनी हुई है।

रिपोर्ट में ऐतिहासिक तथ्यों के हवाले से कहा गया कि जून 2026 पिछले एक सदी में सबसे शुष्क महीनों में से एक रहा लेकिन पूरे मानसून का नतीजा जून से तय नहीं होता। अगर अगस्त और सितंबर में बारिश का सिलसिला बेहतर बना रहता है तो मानसून घाटे की चिंताएं दूर हो जाएंगी और 2026 को एक रिकवरिंग मानसून वर्ष के रूप में देखा जाएगा।

बढ़ती लागत से किसानों ने घटाई बुवाई: अमेरिका से ऑस्ट्रेलिया तक संकट

बढ़ती उत्पादन लागत के कारण दुनिया भर के किसानों ने फसलों का रकबा घटाना शुरू कर दिया है। ईरान संघर्ष के शुरुआती तीन महीनों में वैश्विक स्तर पर गेहूं और मक्के की बुवाई में गिरावट आई है। कई अमेरिकी किसानों ने सोयाबीन की ओर रुख किया है क्योंकि इसमें खाद की जरूरत कम होती है। अमेरिकन फार्म ब्यूरो फेडरेशन के अनुमान के मुताबिक अतिरिक्‍त सरकारी मदद के बिना 2027 में 9 प्रमुख फसलें उगाने वाले अमेरिकी किसानों को कुल मिलाकर 32 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है।

दुनिया के बड़े कृषि निर्यातक देशों में शामिल ऑस्ट्रेलिया ने अनुमान लगाया है कि फ्यूल और खाद की अत्यधिक ऊंची कीमतों के साथ इनपुट्स की अनिश्चितता के चलते उसकी सर्दियों की फसल उत्पादन में 21 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।

अल नीनो की आहट से खाद्य सुरक्षा पर मंडराया ‘परफेक्ट स्टॉर्म’

भू-राजनीतिक तनावों के साथ-साथ अल नीनो मौसम पैटर्न के मजबूत होने की आशंका ने संकट को और गहरा कर दिया है। एफएओ ने चेतावनी दी है कि अल नीनो की वजह से मौसम पर पड़ने वाला असर फसलों की पैदावार घट सकती है। ऐसा हुआ तो खाद्य आपूर्ति में कमी आएगी और दुनिया भर में करोड़ों लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ सकते हैं।

जलवायु का झटका, ऊर्जा की ऊंची कीमतें और फ्यूल-खाद की आपूर्ति में आ रही बाधा, ये सारी बातें मिलकर वैश्विक कृषि क्षेत्र के लिए एक परफेक्ट स्टॉर्म यानी चौतरफा संकट पैदा कर रही हैं। हालांकि कमोडिटी बाजार अब तक कुछ हद तक टिकाऊ बने रहे हैं लेकिन बढ़ती उत्पादन लागत का पूरा असर आने वाले महीनों में सुपरमार्केट और खुदरा दुकानों में सामानों के दामों में दिखाई देगा।

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इससे दुनिया भर के लोगों के लिए महंगाई का खतरा एक बार फिर बढ़ सकता है। दूसरी ओर भारत में सुधरती मानसूनी बारिश, प्रचुर अन्न भंडार और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के चलते देश के भीतर इसका व्यापक आर्थिक असर सीमित रहने की उम्मीद है।

कमजोर मानसून का असर: खरीफ बुवाई पिछले साल से 6% पीछे, दालों-तिलहन की खेती पर पड़ा ये इंपैक्ट

Weak Monsoon Impact: देश के कई प्रमुख फसल उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की भारी कमी और बारिश में देरी का सीधा असर इस साल खरीफ फसलों की बुवाई पर देखने को मिल रहा है। मनी कंट्रोल के ईशान गेरा की रिपोर्ट के मुताबिक 17 जुलाई तक देश में खरीफ फसलों का रकबा पिछले साल की तुलना में 6 प्रतिशत पीछे चल रहा है। किसानों ने इस अवधि तक 65.82 मिलियन हेक्टेयर में बुवाई की है जबकि 2025 की इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 70.05 मिलियन हेक्टेयर था। बारिश की इस लगातार बनी हुई कमी से सबसे ज्यादा मार दालों, मोटे अनाज, तिलहन और कपास की खेती पर पड़ी है। आइए जानते हैं कि मानसून की सुस्ती ने किस फसल की बुवाई को कितना प्रभावित किया है और देश में पानी के जलाशयों का क्या हाल है.

दालों की बुवाई में आई सबसे बड़ी गिरावट (15.1% की कमी)

खरीफ फसलों में दालों की खेती सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। दालों का कुल रकबा पिछले साल के 81.52 लाख हेक्टेयर से 15.1 प्रतिशत घटकर अब 69.23 लाख हेक्टेयर रह गया है। अरहर की बुवाई में करीब 18 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है और यह घटकर 2.48 मिलियन हेक्टेयर पर आ गई है। मूंग का रकबा 11 प्रतिशत घटकर 2.398 मिलियन हेक्टेयर रहा। उड़द की बुवाई में लगभग 6 प्रतिशत की कमी आई है और यह 1.351 मिलियन हेक्टेयर दर्ज की गई।

क्यों चिंताजनक है यह गिरावट?

दालों की बुवाई में यह कमी बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत घरेलू उत्पादन और खपत के बीच के अंतर को पूरा करने के लिए पहले से ही आयात पर निर्भर रहता है।

धान, मोटे अनाज, तिलहन और कपास का क्या है हाल?

राहत की बात यह है कि धान की बुवाई पर मानसून की कमी का असर अपेक्षाकृत कम पड़ा है। यह 16.64 मिलियन हेक्टेयर पर पहुंच चुकी है जो पिछले साल की इसी अवधि के 16.78 मिलियन हेक्टेयर की तुलना में सिर्फ 0.8 प्रतिशत कम है। मोटे अनाज के रकबे में 11.2 प्रतिशत की तेज गिरावट आई है। यह पिछले साल के 13.41 मिलियन हेक्टेयर से गिरकर 11.9 मिलियन हेक्टेयर पर आ गया है। इसमें बाजरा की बुवाई में 18.5 प्रतिशत और मक्का की बुवाई में 5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। तिलहन का रकबा 5.5 प्रतिशत घटकर 14.71 मिलियन हेक्टेयर रह गया है। कपास की बुवाई में भी 6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

मानसून में 24% की कमी, इन राज्यों में गंभीर सूखा

1 जून से 19 जुलाई के बीच भारत में 253.2 मिमी बारिश दर्ज की गई है जो सामान्य स्तर से 24 प्रतिशत कम है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश का यह घाटा अलग अलग है-

  • पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत: सामान्य से 35 प्रतिशत कम बारिश
  • दक्षिण प्रायद्वीप: 27 प्रतिशत की कमी
  • उत्तर-पश्चिम भारत: 23 प्रतिशत की कमी
  • मध्य भारत: 14 प्रतिशत की कमी

राज्यों के स्तर पर बारिश का घाटा

कृषि के लिहाज से महत्वपूर्ण कई राज्यों में बारिश का गंभीर संकट बना हुआ है। बिहार में सामान्य से 44 प्रतिशत कम बारिश हुई है। झारखंड में 41 प्रतिशत की कमी देखने को मिली है। पंजाब में ये कमी 41 प्रतिशत की है। केरल में 34 प्रतिशत कम बारिश हुई है। तेलंगाना में 31 प्रतिशत बारिश कम हुई है। तटीय कर्नाटक में 31 फीसदी कम बारिश देखने को मिली है।

जलाशयों का जलस्तर पिछले साल से 39% नीचे

कम बारिश की वजह से देश के जलाशयों में पानी का भंडारण भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अभी देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 34.46 प्रतिशत पानी ही बचा है। यह उपलब्ध पानी पिछले साल की इसी अवधि के जलस्तर का सिर्फ 60.84 प्रतिशत ही है। यानी 39 प्रतिशत की भारी गिरावट देखने को मिली है। यह जलस्तर पिछले 10 वर्षों के औसत स्तर से भी 1.8 प्रतिशत नीचे चला गया है।