नई GDP सीरीज ने बदली अर्थव्यवस्था की तस्वीर, निर्माण में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी दोगुने से ज्यादा

भारत की नई GDP सीरीज ने अर्थव्यवस्था के कई बड़े सेक्टरों की तस्वीर बदल दी है। खासकर निर्माण क्षेत्र के GVA (ग्रॉस वैल्यू एडेड) में बड़ा बदलाव दिखा है। GVA का मतलब किसी सेक्टर ने अर्थव्यवस्था में कितनी नई वैल्यू जोड़ी। नई सीरीज के मुताबिक, यहां निजी कंपनियों की हिस्सेदारी पहले के अनुमान से दोगुने से भी ज्यादा हो गई है।

वहीं, होटल और रेस्तरां सेक्टर में तस्वीर उलट है। यहां घरेलू कारोबार की हिस्सेदारी बढ़ी है। सड़क परिवहन और कुछ दूसरे सेक्टरों में भी नए आंकड़ों ने पुराने अनुमानों को बदला है।

निर्माण में निजी कंपनियों का GVA बढ़ा

नई 2022-23 बेस सीरीज में निर्माण क्षेत्र में निजी कंपनियों का GVA ₹7.46 लाख करोड़ आंका गया है। पुरानी 2011-12 बेस सीरीज में यह सिर्फ ₹3.53 लाख करोड़ था। यानी नए आंकड़ों में इसमें 111% की बड़ी बढ़ोतरी हुई है।

दूसरी ओर, घरेलू क्षेत्र से जुड़े निर्माण GVA को घटाया गया है। यह ₹17.12 लाख करोड़ से घटकर ₹12.37 लाख करोड़ रह गया है। यानी इसमें 27.8% की कमी हुई है।

सरकारी क्षेत्र के निर्माण GVA में भी बढ़ोतरी हुई है। यह 23.3% बढ़कर ₹1.30 लाख करोड़ हो गया है। हालांकि, पूरे निर्माण क्षेत्र का GVA बहुत ज्यादा नहीं बदला है। नई सीरीज में यह ₹21.13 लाख करोड़ है, जबकि पुरानी सीरीज में ₹21.71 लाख करोड़ था।

इस बदलाव से निर्माण क्षेत्र में निजी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 35.3% हो गई है। पुरानी सीरीज में यह सिर्फ 16.3% थी। वहीं, घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 79% से घटकर 58.5% रह गई है।

सीधे शब्दों में कहें तो नई GDP सीरीज निर्माण क्षेत्र को पहले के मुकाबले ज्यादा संगठित और कॉरपोरेट सेक्टर से जुड़ा हुआ दिखाती है।

होटल और रेस्तरां में उलटी तस्वीर

होटल और रेस्तरां सेक्टर में कहानी अलग है। यहां घरेलू कारोबार की हिस्सेदारी बढ़ी है। नई सीरीज में घरेलू क्षेत्र का GVA ₹1.45 लाख करोड़ से बढ़कर ₹1.69 लाख करोड़ हो गया है।

इसके उलट, निजी कंपनियों का GVA ₹1.19 लाख करोड़ से घटकर ₹1.09 लाख करोड़ रह गया है। इस सेक्टर का कुल GVA भी बढ़ा है। यह 5.7% बढ़कर ₹2.80 लाख करोड़ हो गया है।

अब होटल और रेस्तरां के GVA में घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 60.6% है। पुरानी सीरीज में यह 54.6% थी। वहीं, निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 44.9% से घटकर 39.1% रह गई है।

MoSPI निजी कंपनियों के आंकड़ों के लिए MCA-21 की कंपनी फाइलिंग का इस्तेमाल करता है। घरेलू कारोबार का अनुमान लगाने के लिए अब वर्कफोर्स से जुड़े सर्वे और प्रति कर्मचारी वैल्यू एडेड के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

सड़क परिवहन में भी बड़ा बदलाव

सड़क परिवहन में निजी कंपनियों का GVA काफी कम कर दिया गया है। नई सीरीज में यह ₹54,788 करोड़ है। पुरानी सीरीज में यह आंकड़ा ₹1.25 लाख करोड़ था। यानी इसमें 56.1% की कमी की गई है।

घरेलू क्षेत्र का GVA भी घटा है। लेकिन यहां गिरावट सिर्फ 9.2% रही। नई सीरीज में घरेलू क्षेत्र का GVA ₹5.15 लाख करोड़ है।

मैन्युफैक्चरिंग में बदलाव इतना बड़ा नहीं है। घरेलू क्षेत्र का GVA करीब 10% बढ़ा है। दूसरी ओर, निजी कंपनियों का GVA 3.7% घटा है।

इससे मैन्युफैक्चरिंग में घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी 13.3% से बढ़कर 14.8% हो गई है। निजी कंपनियों की हिस्सेदारी 80.6% से घटकर करीब 78.8% रह गई है।

रियल एस्टेट में भी घरेलू कारोबार का हिस्सा बढ़ा

रियल एस्टेट, मकानों के मालिकाना हक और प्रोफेशनल सर्विसेज में भी घरेलू क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ी है। नई सीरीज में घरेलू GVA 21.3% बढ़ा है।

वहीं, निजी कंपनियों के GVA में सिर्फ 2.7% की बढ़ोतरी हुई है। इस पूरी कैटेगरी का GVA 10.1% बढ़ा है।

कृषि में घरेलू क्षेत्र का दबदबा कायम

कृषि, वानिकी और मछली पालन में तस्वीर ज्यादा नहीं बदली है। इस सेक्टर के GVA में 96% से ज्यादा हिस्सा घरेलू क्षेत्र का है।

2022-23 के लिए घरेलू GVA को ₹42.73 लाख करोड़ से बढ़ाकर ₹45.80 लाख करोड़ किया गया है। यानी नई सीरीज में भी कृषि का बड़ा हिस्सा छोटे और घरेलू कारोबार से ही जुड़ा माना गया है।

नई सीरीज में पुराने आंकड़े भी

नई GDP सीरीज में पहले के मुकाबले ज्यादा सर्वे और सरकारी डेटा का इस्तेमाल किया गया है। फिर भी कुछ जगह पुराने आंकड़ों पर निर्भरता बनी हुई है।

उदाहरण के लिए, खेती में इस्तेमाल होने वाले डीजल इंजनों की संख्या का अनुमान 1997 और 2003 की Livestock Census के आंकड़ों से लगाया गया है। नई जानकारी नहीं मिलने के कारण 2015-16 के बाद भी इसी अनुमान को आगे बढ़ाया गया है।

कृषि की मार्केटिंग लागत के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। पहले 2004-05 की एक स्टडी के आधार पर इसे फसल उत्पादन का 3.22% माना गया था।

नई सीरीज में जिन राज्यों ने अपनी जानकारी दी है, वहां नए और राज्यवार आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। लेकिन जहां जानकारी नहीं मिली, वहां अब भी 3.22% वाला पुराना अनुपात ही लागू है।

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GDP Growth: जून तिमाही में 7.8% रही भारत की जीडीपी ग्रोथ, सर्विसेज सेक्टर की ग्रोथ सबसे ज्यादा

GDP Growth: इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अच्छा रहा है। जून तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.8 फीसदी रही। यह एनालिस्ट्स और इकोनॉमिस्ट्स के अनुमान से ज्यादा है। खास बात यह है कि जून तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ तब 7.8 फीसदी रही, जब वैश्विक स्थितियां काफी चैलेंजिंग थीं।

मार्च तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 8.6 फीसदी

इस साल मार्च तिमाही में भारत में जीडीपी ग्रोथ 8.6 फीसदी थी। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इंप्लिमेंटेशन (MoSPI) ने 31 अगस्त को जून तिमाही के जीडीपी के डेटा जारी किए। जीडीपी की ग्रोथ अनुमान से ज्यादा रही। मनीकंट्रोल के पोल में इकोनॉमिस्ट्स ने जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 7.3 फीसदी रहने का अनुमान जताया था।

जून तिमाही में जीवीए 8.2 फीसदी रहा

जून तिमाही में ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) 8.2 फीसदी रहा। मार्च तिमाही में यह 8.7 फीसदी था। जीवीए का मतलब इकोनॉमी में उत्पादित गुड्स और सर्विसेज की कुल वैल्यू से है। इसमें नेट इनडायरेक्ट टैक्स शामिल नहीं होता है। जून तिमाही में अर्थव्यवस्था के शानदार प्रदर्शन में सर्विसेज और इनवेस्टमेंट का बड़ा हाथ है।

पहली तिमाही में सर्विसेज सेक्टर की ग्रोथ सबसे ज्यादा

जून तिमाही में सर्विसेज का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। इसकी ग्रोथ 10 फीसदी रही। एक साल पहले की समान अवधि में सर्विसेज सेक्टर की ग्रोथ 8 फीसदी थी। मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ 9.2 फीसदी रही। कंस्ट्रक्शन सेक्टर की ग्रोथ 7.7 फीसदी रही। ट्रेड, होटल्स, ट्रांसपोर्ट, कम्युनिकेशन और ब्रॉडकास्टिंग से संबंधित सर्विसेज सेगमेंट की ग्रोथ 8.5 फीसदी रही।

पहली तीमाही में मध्यपूर्व में लड़ाई का असर इकोनॉमी पर

जून तिमाही का मतलब अप्रैल, मई और जून के महीनों से है। अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी को लड़ाई शुरू हुई थी। जून तिमाही में ज्यादातर समय ईरान को अमेरिकी हमले का सामना करना पड़ा। ईरान ने कई खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले किए।

क्रूड ऑयल  की कीमतें काफी समय तक 100 डॉलर से ऊपर रहीं

इस दौरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से क्रूड ऑयल सहित दूसरी कमोडिटीज की सप्लाई पर काफी ज्यादा असर पड़ा। क्रूड की कीमतें आसमान में पहुंच गईं। लेकिन, सरकार के कैपिटल एक्सपेंडिचर जारी रखने से आर्थिक गतिविधियों को काफी सपोर्ट मिला।

प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर 7.1 फीसदी बढ़ा 

जून तिमाही में प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर 7.1 फीसदी बढ़ा। इससे परिवारों में होने वाली खपत का पता चलता है। ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन 11.9 फीसदी बढ़ा, जबकि सरकार का फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर 4.3 फीसदी बढ़ा। जून तिमाही के जीडीपी ग्रोथ के डेटा ऐसे वक्त आए हैं, जब इनफ्लशन से जुड़े रिस्क बढ़ रहा है।

FY27 में 5 फीसदी रह सकता है रिटेल इनफ्लेशन 

पिछले हफ्ते मनीकंट्रोल के पोल में शामिल इकोनॉमिस्ट्स का यह मानना था कि FY27 में रिटेल इनफ्लेशन 5 फीसदी रह सकता है। इसकी रेंज 4.7 से 5.2 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया। इसकी कई वजहें हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से ऑयल की कीमतें हाई लेवल पर बनी हुई हैं। देश में मानसून की बारिश एक समान नहीं रही है। इसका असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा।

Bullet Train Update: मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कब शुरू होगी? 61% काम पूरा, जानिए पहले किस रूट पर दौड़ेगी

Bullet Train news: भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। 508 किलोमीटर लंबे मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर को डेवलप करने का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसने 61 फीसदी से ज्यादा की फिजिकल प्रोग्रेस कर ली है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की जून महीने की रिपोर्ट के मुताबिक इस मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर अब तक 90966.89 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।

पहले किस रूट पर और कब दौड़ेगी पहली बुलेट ट्रेन?

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के मुताबिक भारत की पहली बुलेट ट्रेन का पहला कमर्शियल रन अगस्त 2027 में शुरू होगा। यह शुरुआत 100 किलोमीटर लंबे सूरत से वापी खंड के बीच होगी। यह इस पूरे हाई-स्पीड कॉरिडोर का पहला चरण होगा। इसके बाद वापी-अहमदाबाद और ठाणे-अहमदाबाद सेक्शन को चालू किया जाएगा। इसके बाद अंत में पूरा मुंबई-अहमदाबाद रूट चालू होगा। रेल मंत्री ने स्पष्ट किया है कि पूरे 508 किमी के इस रूट का काम दिसंबर 2029 तक पूरा होने की उम्मीद है।

1.08 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ तक पहुंच सकती है कॉस्ट

मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की निगरानी केंद्र सरकार के प्रगति (PRAGATI) पोर्टल के माध्यम से की जा रही है। वर्तमान में इस कॉरिडोर की अनुमानित लागत लगभग 1.08 लाख करोड़ रुपये रखी गई है। परियोजना के अंत तक इसकी कुल लागत बढ़कर लगभग 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। भारतीय रेलवे लागत में होने वाली इस बढ़ोतरी को बिना जापानी एजेंसी जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (JICA) से अतिरिक्त कर्ज मांगे खुद ही वहन करेगी। गौरतलब है कि JICA ने इस प्रोजेक्ट के एक बड़े हिस्से के लिए फंडिंग दी है।

ग्राउंड पर कितना हुआ काम?

संसद में पेश आंकड़ों और सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक इस 508 किलोमीटर के कॉरिडोर पर काम काफी तेजी से चल रहा है। 209 किलोमीटर ट्रैक बेड बनकर तैयार हो चुका है और 190 किलोमीटर तक ओवरहेड इलेक्ट्रिफिकेशन के मस्तूल तैयार किए जा चुके हैं। 452 किलोमीटर पियर्स का काम भी पूरा कर लिया गया है जबकि 356 किलोमीटर के हिस्से में गर्डर बिछाए जा चुके हैं। महाराष्ट्र में घनसोली से शीलफाटा के बीच 21 किलोमीटर लंबी अंडर-सी टनल का काम चल रहा है। इसमें से 4.8 किलोमीटर टनलिंग का काम पूरा हो चुका है।

सूरत से वापी के बीच के 97 किमी के हिस्से पर नदी पुलों के निर्माण सहित सभी सिविल काम पूरे हो चुके हैं और 86% ट्रैक बेड बिछा दिया गया है। इस पूरे कॉरिडोर का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा एलिवेटेड यानी खंभों पर बनाया जा रहा है जबकि बाकी का हिस्सा टनल, ब्रिज और स्टेशन एरिया का है।

किन 12 स्टेशनों से होकर गुजरेगी बुलेट ट्रेन?

यह हाई-स्पीड कॉरिडोर महाराष्ट्र, गुजरात और केंद्र शासित प्रदेश दादरा एवं नगर हवेली से होकर गुजरता है। इस पूरे रूट पर कुल 12 स्टेशन प्रस्तावित हैं-

  • मुंबई
  • ठाणे
  • विरार
  • बोईसर
  • वापी
  • बिलिमोरा
  • सूरत
  • भरूच
  • वडोदरा
  • आनंद
  • अहमदाबाद
  • साबरमती

320 किमी/घंटे की रफ्तार, महज 1 घंटे 58 मिनट में सफर पूरा

पूरा प्रोजेक्ट चालू होने के बाद बुलेट ट्रेन 320 किलोमीटर प्रति घंटे की अधिकतम रफ्तार से दौड़ेगी। इससे मुंबई और अहमदाबाद के बीच यात्रा के समय में भारी कमी आएगी। जानकारी के मुताबिक अगर बुलेट ट्रेन सिर्फ 4 प्रमुख इंटरमीडिएट स्टेशनों पर रुकती है तो मुंबई से अहमदाबाद की दूरी तय करने में 1 घंटा 58 मिनट का समय लगेगा। अगर ट्रेन सभी 12 स्टेशनों पर रुकते हुए चलती है तो इस सफर को पूरा करने में 2 घंटे 17 मिनट का समय लगेगा। ऐसा माना जा रहा है कि यह कॉरिडोर पश्चिम भारत के दो प्रमुख व्यापारिक केंद्रों को जोड़कर रेल यात्रा का रूप बदल देगा।

IIP Growth: औद्योगिक उत्पादन जून में 7.3% बढ़ा, मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर में दमदार ग्रोथ

IIP Growth: जून 2026 में देश का औद्योगिक उत्पादन (IIP) 7.3% बढ़ा है। यह मई के 5.1% के मुकाबले काफी बेहतर रहा। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के मुताबिक, जून में इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) का क्विक एस्टिमेट 123.1 रहा। पिछले साल जून में यह 114.7 था।

सभी बड़े सेक्टरों में बढ़त

जून में चारों बड़े सेक्टरों ने सकारात्मक प्रदर्शन किया। बिजली और गैस सप्लाई सबसे आगे रही। इसमें 10.6% की ग्रोथ दर्ज हुई। मैन्युफैक्चरिंग 7.8% बढ़ा। वॉटर सप्लाई, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट में 6.1% की बढ़ोतरी हुई। वहीं, माइनिंग और क्वैरींग सेक्टर 1% बढ़ा।

किन सेक्टरों ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया?

मैन्युफैक्चरिंग के 23 में से 19 इंडस्ट्री ग्रुप में सालाना आधार पर बढ़ोतरी दर्ज की गई। इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट सेक्टर सबसे आगे रहा। इसमें 34% की शानदार ग्रोथ हुई। स्विचगियर, सर्किट ब्रेकर, UPS, सॉलिड-स्टेट ड्राइव और ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टर की मांग बढ़ने से यह तेजी आई।

इसके बाद मोटर व्हीकल, ट्रेलर और सेमी-ट्रेलर सेक्टर में 17.5% की बढ़ोतरी हुई। ऑटो पार्ट्स, पैसेंजर कार और कमर्शियल व्हीकल्स की मजबूत मांग इसका बड़ा कारण रही। फूड प्रोडक्ट्स सेक्टर भी 10.8% बढ़ा। इसमें चाय, नॉन-बासमती चावल और स्टार्च का अहम योगदान रहा।

कैपिटल गुड्स में सबसे तेज बढ़त

इस्तेमाल के आधार पर देखें तो कैपिटल गुड्स में सबसे ज्यादा 14.2% की ग्रोथ दर्ज की गई। इंटरमीडिएट गुड्स 9.3%, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 7.7% और इन्फ्रास्ट्रक्चर/कंस्ट्रक्शन गुड्स 7.5% बढ़े। वहीं, प्राइमरी गुड्स और कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स दोनों में 4.9% की बढ़ोतरी हुई। कुल IIP ग्रोथ में सबसे बड़ा योगदान इंटरमीडिएट गुड्स, प्राइमरी गुड्स और कैपिटल गुड्स का रहा।

IIP की गणना का तरीका बदला

MoSPI ने 2022-23 बेस ईयर वाली नई IIP सीरीज में बड़ा बदलाव किया है। अब होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) की जगह आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (Output PPI) का इस्तेमाल किया जाएगा। यह बदलाव IIP बास्केट के 463 में से 234 आइटम ग्रुप पर लागू होगा, जिनकी कुल हिस्सेदारी 36.02% है।

मंत्रालय का कहना है कि Output PPI कीमतों का ज्यादा सटीक आकलन करता है। इससे वैल्यू के आधार पर रिपोर्ट होने वाले उत्पादों के वास्तविक उत्पादन का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा। साथ ही, भारत की औद्योगिक उत्पादन मापने की प्रणाली अंतरराष्ट्रीय मानकों के और करीब पहुंच जाएगी।

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