India Growth Forecast: चार बड़ी ग्लोबल एजेंसियों ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया, जानिए वजह

India Growth Forecast: भारत की आर्थिक ग्रोथ को लेकर अच्छी खबर आई है। चार बड़ी ग्लोबल एजेंसियों ने भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया है। इसकी वजह निवेश, खपत और एक्सपोर्ट का उम्मीद से बेहतर रहना है।

इनमें चारों में एक OECD यानी ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट है। यह दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर नजर रखने वाला आर्थिक संगठन है। साथ ही, दो क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां Fitch Ratings और S&P Global Ratings हैं। वहीं Asian Development Bank (ADB) एशिया के देशों को आर्थिक विकास के लिए मदद और फंडिंग देने वाला संस्थान है।

ग्रोथ का अनुमान कितना बढ़ा?

OECD ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान 6.3% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया है। चारों एजेंसियों में यह सबसे बड़ी बढ़ोतरी है।

Fitch ने अपना अनुमान 6.4% से बढ़ाकर 6.9% किया है। S&P Global Ratings और ADB ने भी अपना अनुमान 40-40 बेसिस प्वाइंट बढ़ाया है। दोनों ने अब भारत की ग्रोथ 7% रहने का अनुमान लगाया है। अब चारों एजेंसियों का अनुमान 6.9% से 7.1% के बीच है। इससे पहले यह 6.3% से 6.6% के बीच था।

पिछले हफ्ते Moody’s Ratings ने भी भारत की ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया था। उसने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इसे 6% से बढ़ाकर 7% किया था।

जून तिमाही में 7.8% की ग्रोथ

ग्रोथ अनुमान बढ़ाने की सबसे बड़ी वजह जून तिमाही के आंकड़े हैं। अप्रैल-जून तिमाही में भारत की GDP 7.8% बढ़ी। यह ज्यादातर एजेंसियों के पुराने अनुमान से काफी ज्यादा थी। S&P के मुताबिक, फैक्ट्री और इंडस्ट्री से जुड़ी गतिविधियां मजबूत रहीं। लोगों ने भी खर्च किया। गुड्स एक्सपोर्ट बढ़ा। सरकारी निवेश भी तेज रहा।

Fitch ने कहा कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत रही। पहली तिमाही की 7.8% ग्रोथ का असर पूरे साल के अनुमान पर भी पड़ा है। बाकी महीनों में ग्रोथ कुछ धीमी हो सकती है। फिर भी पूरे साल का आंकड़ा पहले के अनुमान से बेहतर रह सकता है।

निवेश से मिल रहा बड़ा सहारा

निवेश भारत की ग्रोथ का बड़ा सहारा बन रहा है। पहली तिमाही में ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन 11.9% बढ़ा। ADB के मुताबिक, कम ब्याज दर और सरकारी खर्च से निवेश को मदद मिल रही है। कंपनियों की बैलेंस शीट भी मजबूत है।

Fitch को प्राइवेट निवेश में भी तेजी की उम्मीद है। उसे इस साल निवेश में 10% से ज्यादा बढ़ोतरी की उम्मीद है। जुलाई में नॉन-फूड क्रेडिट 19% बढ़ा। इससे कंपनियों की कर्ज की मांग मजबूत रहने का संकेत मिलता है।

घरेलू मांग भी मजबूत

महंगी ऊर्जा के बावजूद देश में मांग बनी हुई है। S&P के मुताबिक, लोगों की खपत अच्छी रही। इंडस्ट्री और सरकारी खर्च से भी ग्रोथ को सहारा मिला। Moody’s ने भी मजबूत घरेलू मांग और निजी खपत को अहम बताया है। भारत के पास कच्चे तेल की सप्लाई के कई विकल्प हैं। विदेशी मुद्रा भंडार भी पर्याप्त है।

ADB ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए महंगाई का अनुमान 5.2% से घटाकर 5% कर दिया है। इसका मतलब है कि महंगी ऊर्जा का असर उम्मीद से कम पड़ा है।

एक्सपोर्ट भी दे रहा सहारा

S&P ने मजबूत गुड्स एक्सपोर्ट को भी ग्रोथ की वजह बताया है। ADB के मुताबिक, सर्विसेज एक्सपोर्ट भी अच्छा बना हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में मजबूती जारी रहने की उम्मीद है। AI से जुड़ी टेक्नोलॉजी सर्विसेज की मांग से भी भारत को फायदा मिल सकता है।

सितंबर के शुरुआती आंकड़े भी अच्छे संकेत दे रहे हैं। HSBC Flash Composite PMI अगस्त के 54.3 से बढ़कर सितंबर में 56.5 हो गया। मैन्युफैक्चरिंग PMI भी बढ़कर 55.7 पर पहुंच गया।

फिर भी जोखिम खत्म नहीं हुए

करीब 7% का ग्रोथ अनुमान आने का मतलब यह नहीं है कि 7.8% की रफ्तार आगे भी बनी रहेगी। Fitch को बाकी वित्त वर्ष में ग्रोथ कुछ धीमी पड़ने की आशंका है। कमजोर मानसून का असर खेती और ग्रामीण मांग पर पड़ सकता है। महंगाई बढ़ने से लोगों की खरीदारी क्षमता भी घट सकती है।

Fitch को दिसंबर तक महंगाई 5.5% पहुंचने की उम्मीद है। उसे RBI की ओर से ब्याज दर बढ़ाने की भी आशंका है। OECD ने भी कहा है कि हाल की तेज ग्रोथ के बावजूद साल की दूसरी छमाही में लोगों की खरीदारी क्षमता पर दबाव पड़ सकता है। इससे ग्रोथ की रफ्तार कुछ कम हो सकती है।

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BRICS Summit 2026: ‘कमजोर कड़ी’ से ग्रोथ इंजन तक: 14 साल में कैसे बदली भारत की BRICS कहानी

BRICS Summit 2026: जब भारत ने 2012 में नई दिल्ली में BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी, तब देश की अर्थव्यवस्था आज के मुकाबले काफी अलग स्थिति में थी। उस समय BRICS समूह भी काफी नया था। इसकी शुरुआत BRIC के रूप में हुई थी, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। साल 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हो गया।

गौरतलब है कि भारत पहले से ही इस ऐसे समूह का हिस्सा था, जिसे 21वीं सदी की उभरती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधि माना जाता था। लेकिन उस समय यह सवाल भी उठ रहे थे कि क्या भारत वास्तव में इस उम्मीद पर खरा उतर पाएगा?

14 साल बाद, जब भारत 2026 में एक बार फिर BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, तो स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

अब भारत ऐसा देश नहीं है, जो BRICS में अपनी जगह साबित करने की कोशिश कर रहा हो। बल्कि अब भारत को इस समूह की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक और BRICS की आर्थिक और रणनीतिक ताकत का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।

2012 और 2026 के इन दोनों मौकों के बीच का अंतर यह समझने का अच्छा तरीका है कि इन 14 सालों में भारत कितना बदल गया है।

जब भारत BRICS की ‘कमजोर कड़ी’ था

2012 में सवाल यह नहीं था कि क्या भारत BRICS को आकार दे सकता है, बल्कि यह था कि क्या वह इस समूह का सबसे कमजोर सदस्य बनता जा रहा है।

क्या भारत सच में BRICS में अपनी जगह का हकदार था? क्या BRIC में “I” (इंडिया) की जगह इंडोनेशिया को ले लेना चाहिए था? क्या भारत इस समूह की सबसे कमजोर कड़ी था? ये सवाल उस समय के आर्थिक माहौल को दिखाते थे।

भारत की विकास दर तेजी से धीमी हो गई थी, महंगाई ज्यादा थी, रुपया दबाव में था और आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने की सरकार की क्षमता को लेकर चिंताएं बढ़ रही थीं।

जून 2012 में, Standard & Poor’s (S&P) ने चेतावनी दी थी कि भारत अपनी इन्वेस्टमेंट-ग्रेड सॉवरेन रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है। इसके पीछे धीमी विकास दर और पॉलिसी बनाने में आ रही राजनीतिक रुकावटों का हवाला दिया गया था। उस समय भारत की रेटिंग BBB- थी, जो स्पेक्युलेटिव ग्रेड से बस एक पायदान ऊपर थी।

यह चेतावनी उस समय भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर फैली निराशा का एक अहम संकेत बन गई थी।

Goldman Sachs के अर्थशास्त्री Jim O’Neill, जिन्होंने BRIC (ब्रिक) शब्द गढ़ा था, भारत के वैल्यूएशन को लेकर भी बहुत उत्साहित नहीं थे। अगस्त 2012 के एक इंटरव्यू में, उन्होंने वैल्यूएशन के मामले में भारत को चार BRIC अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम आकर्षक बताया था; उन्होंने चीन को पहले स्थान पर रखा, जिसके बाद ब्राज़ील, रूस और फिर भारत का नंबर था।

उस समय भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति भी उतनी ही मुश्किल थी। 2012-13 में विकास दर 5 प्रतिशत से नीचे गिर गई थी, जबकि महंगाई का स्तर ऊंचा बना रहा। भारत के बारे में धारणा बदलने लगी थी; अब उसे एक उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति के बजाय ऐसी अर्थव्यवस्था के तौर पर देखा जाने लगा था जो पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत गतिरोध), महंगाई और धीमी होती विकास दर से जूझ रही थी।

दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत BRICS का हिस्सा तो था, लेकिन इस बात पर संदेह था कि क्या वह दूसरी उभरती हुई ताकतों के साथ कदम मिलाकर चल पाएगा।

2026 की ओर आगे बढ़ते हुए

आज स्थिति काफी अलग है।

भारत 2026 के ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में एक ऐसी अर्थव्यवस्था के साथ शामिल हो रहा है जिसने प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज विकास दर बनाए रखी है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी (GDP) में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सरकार ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अर्थव्यवस्था ने अपनी विकास की गति बनाए रखी है।

यह 2010 के दशक की शुरुआत में मंदी के दौरान भारत की 5 प्रतिशत से कम विकास दर के मुकाबले एक बड़ा अंतर है।

बता दें कि यह बदलाव सिर्फ एक तिमाही के जीडीपी आंकड़ों तक सीमित नहीं है। भारत के आर्थिक आधार और वैश्विक संस्थानों द्वारा उनके मूल्यांकन के तरीके में भी बदलाव आया है।

‘फॉलन एंजेल’ (Fallen Angel) के डर से ‘A-‘ रेटिंग तक का सफर

शायद इस बदलाव को समझने का एक सबसे साफ उदाहरण भारत की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग है।

2012 में S&P की चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी थी कि भारत इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग खोने वाला पहला BRIC देश बन सकता है। इससे भारत की अर्थव्यवस्था की कमजोरियों को लेकर सवाल उठने लगे थे।

लेकिन सितंबर 2026 में Japan Credit Rating Agency (JCR) ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को एक पायदान बढ़ाकर BBB+ से A- कर दिया। रेटिंग के साथ Stable Outlook भी दिया गया। JCR ने इसकी वजह भारत की मजबूत और मुश्किल परिस्थितियों में भी टिके रहने वाली आर्थिक विकास दर, वित्तीय स्थिति में सुधार, मजबूत बैंकिंग सिस्टम और बेहतर बाहरी आर्थिक स्थिति को बताया।

JCR ने भारत की लगातार तेज आर्थिक विकास दर, मजबूत निजी खपत और सरकारी निवेश को भी अहम कारण माना। इसके अलावा GST और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे नीतिगत कदमों का भी उल्लेख किया गया।

एजेंसी ने सरकारी खर्च की गुणवत्ता में सुधार की भी तारीफ की। खास तौर पर पूंजीगत खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ते निवेश को भारत की आर्थिक मजबूती का अहम हिस्सा बताया गया।

इस रेटिंग में बढ़ोतरी की अहमियत सिर्फ रेटिंग बढ़ने तक सीमित नहीं है। असली बदलाव यह है कि 2012 के मुकाबले आज भारत की अर्थव्यवस्था और उसके जोखिम को लेकर चर्चा पूरी तरह बदल गई है।

2012 में चिंता इस बात की थी कि क्या भारत अपनी इन्वेस्टमेंट ग्रेड रेटिंग बचा पाएगा? वहीं आज चर्चा इस बात पर हो रही है कि क्या भारत की तेज आर्थिक विकास दर उसे आने वाले समय में दुनिया की एक बहुत बड़ी आर्थिक ताकत बनने में मदद कर सकती है।

BRICS में बदलाव आया है और इसमें भारत की जगह भी बदली है

जिस ग्रुप में भारत BRIC के तौर पर शामिल हुआ था, उसमें भी जबरदस्त बदलाव आया है।

BRICS का दायरा इसके शुरुआती चार सदस्यों से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ और बाद में हुए विस्तार में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसमें जुड़ गए।

अब यह ग्रुप दुनिया की आबादी और अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही, यह सिर्फ एक आर्थिक नाम से बदलकर उभरते और विकासशील देशों के लिए एक व्यापक राजनीतिक और कूटनीतिक मंच बन गया है।

इस विस्तार ने BRICS में भारत की स्थिति को और भी अहम बना दिया है।

ध्यान दें कि भारत BRICS की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से काफी बड़ी है, लेकिन आर्थिक विकास, बड़ी आबादी, विशाल बाजार, तकनीकी क्षमता और दूसरे देशों के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंधों का मेल भारत को BRICS में काफी महत्वपूर्ण बनाता है।

वहीं, 2012 के BRICS की तुलना में आज स्थिति अलग है। तब भारत को मुख्य रूप से BRICS के दूसरे देशों से तुलना करके देखा जाता था। लेकिन अब भारत सिर्फ समूह के दूसरे सदस्यों के साथ अपनी स्थिति की तुलना नहीं कर रहा है, बल्कि यह भी कोशिश कर रहा है कि बदला हुआ BRICS आगे किस दिशा में जाए और उसका स्वरूप कैसा हो।

आर्थिक कहानी से रणनीतिक अहमियत तक

BRICS में भारत का उभार सिर्फ GDP तक सीमित नहीं है। यह भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दूसरे देशों से संबंध बनाए रखने की भारत की क्षमता के बारे में भी है।

जानकारी के मुताबिक, 2026 का यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका-चीन की प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया का संकट और व्यापक भू-राजनीतिक बंटवारा अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नए सिरे से आकार दे रहे हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता (strategic autonomy) के प्रति भारत की लंबे समय से चली आ रही प्राथमिकता और उन देशों के साथ एक ही समय में जुड़ने की उसकी क्षमता—जिनके हित हमेशा एक जैसे नहीं होते—इस माहौल में और भी अहम हो गई है।

चैथम हाउस ने रणनीतिक स्वायत्तता को भारत की विदेश नीति की एक पुरानी विशेषता बताया है। साथ ही, यह भी कहा है कि भारत का यह नजरिया नई दिल्ली को उन देशों के साथ संबंध बनाए रखने में मदद करता है जिनके साथ पश्चिम के संबंध मुश्किल भरे रहे हैं। संस्थान ने अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा से तेजी से बदलती दुनिया में ‘मध्यम शक्तियों’ (middle powers) के लिए ‘रणनीतिक हेजिंग’ (strategic hedging) के बढ़ते महत्व पर भी जोर दिया है।

बता दें कि भारत के लिए, इसका मतलब है कि ब्रिक्स सिर्फ एक आर्थिक ग्रुप नहीं है। यह उन कई मंचों में से एक है जिनके जरिए नई दिल्ली किसी एक बड़े पावर ब्लॉक के साथ औपचारिक रूप से जुड़े बिना अपने हितों को आगे बढ़ा सकती है।

2026 के समिट का महत्व भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन और अन्य बड़े नेता नई दिल्ली में इकट्ठा हो रहे हैं क्योंकि भारत इस ग्रुप की मेजबानी कर रहा है। भू-राजनीतिक बंटवारे के दौर में इन नेताओं का भारत आना ही नई दिल्ली की बढ़ती ‘इकट्ठा करने की क्षमता’ (convening power) को दिखाता है।

इन देशों के साथ भारत के रिश्ते जटिल हैं और अक्सर उनमें काफी मतभेद भी रहे हैं। चीन भारत का रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है; रूस भारत के रक्षा और ऊर्जा हितों से गहराई से जुड़ा है; ईरान भारत की कनेक्टिविटी और पश्चिम एशिया से जुड़ी रणनीतियों के लिए अहम है। फिर भी, भारत इन सभी के साथ एक ही कूटनीतिक ढांचे के भीतर काम करने में सक्षम है।

भारत की आर्थिक कहानी में गुणात्मक बदलाव भी आया है।

पहले भारत की BRIC वाली छवि मुख्य रूप से उसके सर्विस सेक्टर, IT इंडस्ट्री, बढ़ते कंज्यूमर मार्केट और डेमोग्राफिक क्षमता से जुड़ी थी। आज, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और उभरती हुई टेक्नोलॉजी देश की आर्थिक कहानी का बहुत बड़ा हिस्सा बन गई हैं।

UPI और आधार जैसे प्लेटफॉर्म के विकास ने भारत को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का एक खास मॉडल दिया है, जबकि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाली पहलों का मकसद आयात पर निर्भरता कम करना और भारत को मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक वैकल्पिक जगह के तौर पर स्थापित करना रहा है।

JCR ने खास तौर पर भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और GST का जिक्र उन नीतियों के तौर पर किया है जिन्होंने देश की आर्थिक नींव को मजबूत किया है।

आसान शब्दों में कहें तो, 2012 में जब भारत BRICS समिट में शामिल हुआ, तो सवाल यह था कि क्या वह दूसरी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ कदम से कदम मिलाकर चल पाएगा। 2026 में, भारत एक बड़े हो चुके BRICS की मेजबानी कर रहा है। ऐसे समय में जब वह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, उसे JCR से ‘A-‘ सॉवरेन रेटिंग मिली है, और वह उस ग्रुप के एजेंडे को आकार देने की कोशिश कर रहा है जिसका आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है।

इस अंतर ने सवाल को ही बदल दिया है। 2012 में बहस यह थी कि—क्या भारत BRICS में शामिल होने के लायक है? 2026 में, ज्यादा अहम सवाल यह है कि: भारत BRICS के भविष्य को किस हद तक आकार दे सकता है?

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GDP Growth: सरकार ने 2.6% GDP ग्रोथ के दावे को खारिज किया, 7.8% को सटीक बताया

GDP Growth: सरकार ने पहली तिमाही की GDP ग्रोथ 2.6% रहने के दावे को खारिज कर दिया है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग ने कहा कि 7.8% की GDP ग्रोथ का आंकड़ा मजबूत प्रोडक्शन डेटा पर आधारित है। उन्होंने पुराने और नए GDP डेटा की तुलना को ‘सेब और संतरे की तुलना’ जैसा बताया। PTI के मुताबिक, सरकार ने कहा कि दोनों आंकड़े अलग-अलग डेटा सीरीज के हैं और उनकी सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

यह विवाद पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बयान के बाद शुरू हुआ था। उनका कहना था कि अगर पिछले साल की पहली तिमाही की GDP को ₹86 लाख करोड़ से घटाकर ₹80 लाख करोड़ नहीं किया जाता, तो मौजूदा ग्रोथ करीब 2.6% होती।

सरकार ने 2.6% के दावे को क्यों बताया गलत?

सौरभ गर्ग के मुताबिक, आलोचक FY26 की पहली तिमाही के पुराने ₹86.05 लाख करोड़ के GDP आंकड़े की तुलना नए ₹80 लाख करोड़ के आंकड़े से कर रहे हैं। यह ₹86.05 लाख करोड़ का आंकड़ा पुराने 2011-12 बेस ईयर वाली GDP सीरीज का था।

फरवरी 2026 में सरकार ने 2022-23 को बेस ईयर मानकर नई GDP सीरीज जारी की। इसके बाद पुरानी सीरीज की जगह नई सीरीज लागू हो गई। नई सीरीज में Q1 FY26 का GDP पहले ₹80.32 लाख करोड़ आंका गया। बाद में यह ₹80.44 लाख करोड़ हुआ और फिर नए IIP और PPI डेटा के आधार पर इसे ₹80 लाख करोड़ किया गया।

PTI के मुताबिक, मंत्रालय ने कहा कि यह सामान्य डेटा रिवीजन की प्रक्रिया है। इसका मकसद पिछले साल का GDP घटाकर मौजूदा ग्रोथ रेट को बढ़ाना नहीं था।

असली तुलना किससे होनी चाहिए?

सरकार का कहना है कि GDP ग्रोथ की तुलना एक ही डेटा सीरीज और स्थिर कीमतों पर की जानी चाहिए। नई 2022-23 बेस ईयर सीरीज के मुताबिक, FY27 की पहली तिमाही में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.8% रही।

मंत्रालय ने स्टील, सीमेंट और ऑटोमोबाइल जैसे सेक्टरों में मजबूत वॉल्यूम ग्रोथ का भी हवाला दिया। PTI के मुताबिक, सरकार का तर्क है कि वास्तविक उत्पादन में बढ़ोतरी के आंकड़े भी मजबूत आर्थिक गतिविधि दिखाते हैं।

मैन्युफैक्चरिंग में रियल ग्रोथ ज्यादा कैसे?

मैन्युफैक्चरिंग की रियल GVA ग्रोथ 9.2% रही, जबकि नॉमिनल ग्रोथ 7.7% रही। इसके चलते इंप्लिसिट GVA डिफ्लेटर माइनस 1.5% रहा।

मंत्रालय ने कहा कि इसका मतलब फैक्ट्री गेट कीमतें घटीं, यह जरूरी नहीं है। नई पद्धति में आउटपुट और इनपुट को अलग-अलग डिफ्लेट किया जाता है। अगर कच्चे माल और दूसरे इनपुट की कीमतें आउटपुट कीमतों से ज्यादा तेजी से बढ़ती हैं, तो ऐसा अंतर आ सकता है।

माइनिंग में रियल ग्रोथ घटी, नॉमिनल क्यों बढ़ी?

Q1 FY27 में माइनिंग की रियल GVA 2.4% घटी। लेकिन नॉमिनल GVA 22.3% बढ़ी। PTI के मुताबिक, इसकी बड़ी वजह मिनरल्स की कीमतों में तेज उछाल रही।

माइनिंग और क्वॉरिंग की PPI महंगाई अप्रैल में 22% और मई में 21.2% रही। कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी दर्ज हुई।

GDP डिफ्लेटर और CPI-WPI में अंतर क्यों?

सरकार ने कहा कि GDP डिफ्लेटर को CPI और WPI से सीधे नहीं मिलाया जा सकता। CPI घरों के खर्च की तय बास्केट को मापता है। WPI मुख्य रूप से वस्तुओं की कीमतों को ट्रैक करता है। वहीं, GDP डिफ्लेटर निवेश, सरकारी खर्च, एक्सपोर्ट और सर्विसेज समेत पूरी अर्थव्यवस्था को कवर करता है।

मंत्रालय ने कहा कि उत्पादन और खर्च के आधार पर निकाले गए GDP आंकड़ों के बीच सांख्यिकीय अंतर भी सामान्य है। जैसे-जैसे ज्यादा डेटा आता है, इसमें बदलाव हो सकता है। इसलिए मौजूदा अंतर को GDP में किसी गड़बड़ी का सबूत नहीं माना जाना चाहिए।

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Retail Inflation : लगातार चौथे महीने महंगाई बढ़ी, रिटेल इंफ्लेशन जुलाई में 4.45% हुई; RBI के लिए बढ़ेगी मुश्किल

Retail Inflation : रिटेल महंगाई जुलाई में लगातार चौथे महीने बढ़ी है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) आधारित महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 4.45% हो गई। जून में यह 4.38% थी। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी इसका बड़ा कारण रही।

जुलाई में महंगाई लगातार दूसरे महीने RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर रही। अप्रैल में महंगाई 3.48% थी। इसके बाद मई में 3.93%, जून में 4.38% और जुलाई में 4.45% हो गई। यानी अप्रैल से अब तक महंगाई करीब 1 प्रतिशत अंक बढ़ चुकी है।

खाने-पीने की चीजों ने बढ़ाई महंगाई

जुलाई में Consumer Food Price Index (CFPI) आधारित महंगाई 5.52% रही। जून में यह 5.32% थी। ग्रामीण इलाकों में खाने-पीने की महंगाई ज्यादा रही। यहां यह 5.79% रही। शहरी इलाकों में यह 5.05% थी।

इसी वजह से आने वाले महीनों में भी महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ICRA के मुताबिक, अगस्त में रिटेल महंगाई 4.7% तक पहुंच सकती है।

गांवों में महंगाई का ज्यादा दबाव

ग्रामीण भारत में कुल रिटेल महंगाई जुलाई में 4.84% रही। जून में यह 4.74% थी। वहीं, शहरी महंगाई 3.93% से मामूली बढ़कर 3.96% हो गई। खाने-पीने की चीजों के अलावा कपड़े और जूते भी ग्रामीण इलाकों में ज्यादा महंगे हुए। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी महंगाई 3.97% रही। शहरी क्षेत्रों में यह 2.41% थी।

कुछ सेवाओं की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी हुई। जुलाई में रेस्टोरेंट और होटल से जुड़ी सेवाओं की महंगाई 7.72% रही। ट्रांसपोर्ट की महंगाई 4.43% और पर्सनल केयर, सोशल प्रोटेक्शन, अन्य सेवाओं की महंगाई 14.77% रही।

अदरक, लहसुन और प्याज ने रुलाया

रसोई में इस्तेमाल होने वाली कुछ चीजें जुलाई में काफी महंगी हुईं। अदरक की कीमतों में सालाना आधार पर 83.62% की बढ़ोतरी हुई। जून में यह 50.41% थी। लहसुन की महंगाई भी 17.93% से बढ़कर 35.36% हो गई। प्याज की कीमतें भी तेजी से बढ़ीं। प्याज की महंगाई जून के 4.73% से बढ़कर जुलाई में 22.54% हो गई।

हालांकि, कुछ सब्जियों ने राहत दी। जुलाई में टमाटर की कीमत सालाना आधार पर 4.59% घटी। जून में टमाटर 31.92% महंगा था। आलू की कीमत 16.56% और भिंडी की कीमत 5.52% घटी।

सोना-चांदी भी महंगे

महंगाई के आंकड़ों में कीमती धातुओं की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी दिखी। जुलाई में चांदी के आभूषणों की कीमत सालाना आधार पर 109.84% बढ़ी। सोने, हीरे और प्लैटिनम के आभूषण भी महंगे हुए। इनकी कीमतों में क्रमशः 32.98% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

आगे ब्याज दरों पर क्या होगा?

महंगाई बढ़ने से RBI के लिए ब्याज दरों को लेकर फैसला थोड़ा मुश्किल हो सकता है। RBI ने हाल में रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा था। कोटक महिंद्रा बैंक की चीफ इकोनॉमिस्ट उपासना भारद्वाज के मुताबिक, बारिश, कच्चे तेल की कीमत और इनपुट लागत पर नजर रखना जरूरी होगा। उनका मानना है कि वित्त वर्ष 2027 की तीसरी तिमाही से महंगाई 5% के ऊपर जा सकती है।

ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर ने कहा कि वित्त वर्ष 2027 में औसत CPI महंगाई करीब 5% रह सकती है। पश्चिम एशिया में तनाव और मानसून इसके लिए बड़े जोखिम हैं। अगर महंगाई का दबाव दूसरी चीजों तक भी फैलता है, तो दिसंबर 2026 की बैठक में RBI ब्याज दर बढ़ाने पर विचार कर सकता है।

तेलंगाना में सबसे ज्यादा महंगाई

राज्यों की बात करें तो जुलाई में तेलंगाना में महंगाई सबसे ज्यादा 6.32% रही। इसके बाद आंध्र प्रदेश में 5.72% और तमिलनाडु में 5.44% रही। वहीं, मिजोरम में महंगाई सबसे कम 1.84% रही। मेघालय में यह 2.31% और त्रिपुरा में 2.32% रही। दिल्ली में भी महंगाई अपेक्षाकृत कम 2.68% रही।

कुल मिलाकर, जुलाई के आंकड़े बताते हैं कि महंगाई का दबाव धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अभी इसकी बड़ी वजह खाने-पीने की चीजें और कुछ सप्लाई से जुड़ी समस्याएं हैं। अगर यह दबाव आगे भी बना रहता है, तो इसका असर RBI की ब्याज दरों की अगली रणनीति पर पड़ सकता है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

IIP Growth: औद्योगिक उत्पादन जून में 7.3% बढ़ा, मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर में दमदार ग्रोथ

IIP Growth: जून 2026 में देश का औद्योगिक उत्पादन (IIP) 7.3% बढ़ा है। यह मई के 5.1% के मुकाबले काफी बेहतर रहा। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के मुताबिक, जून में इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) का क्विक एस्टिमेट 123.1 रहा। पिछले साल जून में यह 114.7 था।

सभी बड़े सेक्टरों में बढ़त

जून में चारों बड़े सेक्टरों ने सकारात्मक प्रदर्शन किया। बिजली और गैस सप्लाई सबसे आगे रही। इसमें 10.6% की ग्रोथ दर्ज हुई। मैन्युफैक्चरिंग 7.8% बढ़ा। वॉटर सप्लाई, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट में 6.1% की बढ़ोतरी हुई। वहीं, माइनिंग और क्वैरींग सेक्टर 1% बढ़ा।

किन सेक्टरों ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया?

मैन्युफैक्चरिंग के 23 में से 19 इंडस्ट्री ग्रुप में सालाना आधार पर बढ़ोतरी दर्ज की गई। इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट सेक्टर सबसे आगे रहा। इसमें 34% की शानदार ग्रोथ हुई। स्विचगियर, सर्किट ब्रेकर, UPS, सॉलिड-स्टेट ड्राइव और ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टर की मांग बढ़ने से यह तेजी आई।

इसके बाद मोटर व्हीकल, ट्रेलर और सेमी-ट्रेलर सेक्टर में 17.5% की बढ़ोतरी हुई। ऑटो पार्ट्स, पैसेंजर कार और कमर्शियल व्हीकल्स की मजबूत मांग इसका बड़ा कारण रही। फूड प्रोडक्ट्स सेक्टर भी 10.8% बढ़ा। इसमें चाय, नॉन-बासमती चावल और स्टार्च का अहम योगदान रहा।

कैपिटल गुड्स में सबसे तेज बढ़त

इस्तेमाल के आधार पर देखें तो कैपिटल गुड्स में सबसे ज्यादा 14.2% की ग्रोथ दर्ज की गई। इंटरमीडिएट गुड्स 9.3%, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 7.7% और इन्फ्रास्ट्रक्चर/कंस्ट्रक्शन गुड्स 7.5% बढ़े। वहीं, प्राइमरी गुड्स और कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स दोनों में 4.9% की बढ़ोतरी हुई। कुल IIP ग्रोथ में सबसे बड़ा योगदान इंटरमीडिएट गुड्स, प्राइमरी गुड्स और कैपिटल गुड्स का रहा।

IIP की गणना का तरीका बदला

MoSPI ने 2022-23 बेस ईयर वाली नई IIP सीरीज में बड़ा बदलाव किया है। अब होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) की जगह आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (Output PPI) का इस्तेमाल किया जाएगा। यह बदलाव IIP बास्केट के 463 में से 234 आइटम ग्रुप पर लागू होगा, जिनकी कुल हिस्सेदारी 36.02% है।

मंत्रालय का कहना है कि Output PPI कीमतों का ज्यादा सटीक आकलन करता है। इससे वैल्यू के आधार पर रिपोर्ट होने वाले उत्पादों के वास्तविक उत्पादन का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा। साथ ही, भारत की औद्योगिक उत्पादन मापने की प्रणाली अंतरराष्ट्रीय मानकों के और करीब पहुंच जाएगी।

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Retail Inflation: महंगाई का झटका! जून में बढ़कर 4.38% पहुंची, RBI के लक्ष्य से ऊपर निकली

Retail Inflation: जून महीने में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38% पर पहुंच गई। मई में यह 3.93% थी। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, खाने-पीने की चीजों और ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ने से महंगाई में फिर तेजी आई है। यह पिछले 6 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है और RBI के 4% के लक्ष्य से भी ऊपर निकल गई है।

खाने-पीने की चीजों ने बढ़ाई महंगाई

जून में महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाने-पीने की चीजों के दाम रहे। फूड इंफ्लेशन मई के 4.78% से बढ़कर जून में 5.32% हो गई। चूंकि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) में खाने-पीने की चीजों का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है, इसलिए इनके दाम बढ़ने का असर सीधे कुल महंगाई पर पड़ा।

होटल और रेस्तरां में खाने-पीने की सेवाएं भी 6.94% महंगी हुईं। वहीं, निजी गाड़ी चलाने का खर्च 7.35% और माल ढुलाई सेवाओं की लागत 7.70% बढ़ गई। इससे साफ है कि ईंधन और लॉजिस्टिक्स का खर्च भी बढ़ा है।

गहनों की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी

‘अन्य व्यक्तिगत सामान’ श्रेणी सबसे ज्यादा महंगी रही। इसमें सोने-चांदी और गहने शामिल हैं। इस श्रेणी में महंगाई दर 50.17% रही। हालांकि, मई में यह 56.35% थी, यानी बढ़ोतरी की रफ्तार पहले के मुकाबले थोड़ी कम हुई है।

कुछ चीजों के दाम घटे भी

हर चीज महंगी नहीं हुई। जून में कुछ टिकाऊ सामानों की कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गई। गाड़ियों की खरीद पर महंगाई दर -4.59% रही। वहीं मनोरंजन से जुड़े टिकाऊ सामान और घर-बगीचे में इस्तेमाल होने वाले कुछ उपकरण भी सस्ते हुए। सरकार का कहना है कि GST में पहले की गई कटौती का असर इन प्रोडक्ट्स की कीमतों पर दिखा।

गांवों में ज्यादा बढ़ी महंगाई

महंगाई का असर ग्रामीण इलाकों में ज्यादा देखने को मिला। जून में ग्रामीण महंगाई 4.74% रही, जो मई में 4.25% थी। वहीं शहरी महंगाई 3.53% से बढ़कर 3.92% हो गई। इससे पता चलता है कि खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों का असर गांवों में ज्यादा पड़ा।

इस साल के पहले पांच महीनों में महंगाई लगातार कम हो रही थी, लेकिन जून में इसमें फिर तेजी आ गई। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में खाद्य पदार्थों की कीमतें ही महंगाई की दिशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

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इकोनॉमी पर भी पड़ेगी कमजोर मानसून की मार, S&P ने कहा- घट सकती है भारत की GDP ग्रोथ

रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings ने कहा है कि वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में भारत की GDP ग्रोथ घटकर 6.6% रह सकती है। एजेंसी का मानना है कि गैस-तेल के ऊंचे दाम, कमजोर मानसून और वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भारत की GDP ग्रोथ FY26 में 7.7% रही थी। वहीं FY25 में यह 7.1% थी। S&P का अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 6.6% के अनुमान के बराबर है। महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए S&P को उम्मीद है कि RBI इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है।

क्यों घट सकती है GDP ग्रोथ?

S&P के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव के कारण एनर्जी मार्केट दबाव में हैं। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है और महंगाई के जोखिम में इजाफा होता है।

एजेंसी ने यह भी कहा कि अल नीनो के असर से मानसून कमजोर पड़ा है। 22 जून तक देश में बारिश सामान्य से 43% कम दर्ज की गई थी। कमजोर मानसून का असर खेती और ग्रामीण मांग दोनों पर पड़ सकता है।

स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने राज्यों के लिए वैकल्पिक फसल योजनाएं तैयार की हैं। इनमें कम बारिश की स्थिति में होने वाली फसलों की सिफारिश की गई है।

महंगाई बढ़ने की आशंका

S&P का कहना है कि तेल का दाम बढ़ने से उद्योगों का खर्च बढ़ रहा है। सप्लाई चेन पर भी दबाव दिखाई दे रहा है। इसके अलावा उर्वरक (Fertiliser) महंगे होने से खेती की लागत बढ़ सकती है। यह फैक्टर खाद्य उत्पादन और खाद्य कीमतों दोनों पर असर डाल सकता है।

एजेंसी का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की रिटेल इंफ्लेशन बढ़कर 5.1% तक पहुंच सकती है। तीसरी तिमाही में महंगाई 0.5 से 0.6 प्रतिशत अंक तक ज्यादा रह सकती है।

S&P के मुताबिक, कंपनियां तेल के बढ़े दाम का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। हाल में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी भी महंगाई बढ़ाएगी।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर क्या कहा?

अपनी रिपोर्ट ‘Economic Outlook Asia-Pacific Q3 2026: AI-Exposed Markets To Outperform’ में S&P ने कहा कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की तस्वीर तीन बड़े फैक्टर से तय होगी। इनमें वैश्विक आर्थिक गतिविधियों की मजबूती, कच्चे तेल का दबाव और AI बेस्ड टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट में तेजी शामिल है।

एजेंसी का कहना है कि फिलहाल भारत समेत पूरे क्षेत्र पर कच्चे तेल की लागत और महंगाई का दबाव बना हुआ है। इसका असर आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।

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