अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के साथ क्या किया? जानिए ऐसा वहां क्या हुआ कि बवाल इस हद तक पहुंच गया

Albania Supreme Court Fire: भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली से सुलग रहे अल्बानिया में अब गृहयुद्ध जैसे हालात हो गए है। राजधानी तिराना में पिछले कई दिनों से चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन इतने हिंसक हो गए कि गुस्साई भीड़ ने सीधे देश के सुप्रीम कोर्ट के दफ्तरों को ही आग के हवाले कर दिया। आखिर क्यों भड़का है यूरोप के इस छोटे से देश में ऐसा जनसैलाब कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जंग छिड़ गई है? आइए आपको बताते हैं इसकी असली वजह।

क्यों भड़का इतना बड़ा बवाल?

अल्बानिया में यह प्रदर्शन ‘फ्लेमिंगो’ नामक नागरिक और छात्र आंदोलन के बैनर तले हो रहा है। हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सोशलिस्ट प्रधानमंत्री एडी रामा (Edi Rama) के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार सड़कों पर हैं।

यह पूरा विवाद तब और भड़क उठा जब सरकार ने एक ऐसे क्षेत्र में बड़े लक्जरी पर्यटन विकास की अनुमति दे दी, जो फ्लेमिंगो का प्राकृतिक आवास माना जाता है। इस प्रोजेक्ट के तार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर से जुड़े होने के कारण मामला और संवेदनशील हो गया।

भ्रष्टाचार, शिक्षा और महंगाई की मार

अल्बानिया के युवा देश में बढ़ती बेरोजगारी, चरम पर पहुंच चुके भ्रष्टाचार, और जर्जर होती सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं। जनता का आरोप है कि सरकार आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है।

वैसे प्रधानमंत्री एडी रामा ने इन हिंसक प्रदर्शनों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि प्रदर्शनकारियों को बाहरी तत्वों और वामपंथी उग्रवादी समूहों (एंटीफा) द्वारा वैचारिक रूप से कट्टर बनाया गया है।

लगातार छठे दिन भी जारी इस हिंसक संघर्ष ने अल्बानिया की सरकार के सामने गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है, और सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस जन-आक्रोश को संभालना बड़ी चुनौती बन गया है।

फ्रांस, इटली और स्पेन में भी भारी हिंसा और आगजनी

वैसे सिर्फ अल्बानिया ही नहीं है जो विरोध प्रदर्शनों की आग में झुलस रहा है। फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगाल की सड़कों पर भी जनसैलाब उमड़ पड़ा है, जिसने कई प्रमुख यूरोपीय शहरों को रणक्षेत्र में बदल दिया है।

फ्रांस में पिछले तीन हफ्तों से हाई स्कूल के छात्र शिक्षा संसाधनों की कमी के खिलाफ नाकाबंदी कर रहे थे, जो अब व्यापक महंगाई विरोधी आंदोलन बन चुका है। पेरिस, मार्सेली, ल्यों और लिमोगेस में भारी लूटपाट और हिंसा हुई। लिमोगेस में 19वीं सदी के सिटी हॉल में आग लगा दी गई।

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ‘जिन्होंने लूटपाट की है और गणतंत्र को गिराने की कोशिश की है, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा।’ अब तक 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा, ‘माइग्रेंट्स ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है, उन्हें तुरंत सीमाएं बंद करनी चाहिए!’ वैसे फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस हिंसा में प्रवासियों की भूमिका से इनकार किया है।

स्पेन की राजधानी मैड्रिड के ‘पुएर्ता डेल सोल’ स्क्वायर पर हफ्तों से सैकड़ों तंबू गड़े हुए हैं, जो घरों के आसमान छूते किरायों और बेदखली के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। यह विरोध 87 वर्षीय मैरीकार्मेन की बेदखली के बाद अस्पताल में हुई मौत के बाद शुरू हुआ।

स्पेन में न्यूनतम वेतन 1,221 यूरो (~$1,370) है, जबकि 80 वर्ग मीटर के अपार्टमेंट का औसत किराया 1,130 यूरो (~$1,270) है। यानी युवा अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा केवल रहने पर खर्च कर रहे हैं। जनता के दबाव के कारण संसद में हाउसिंग बिल पास न होने पर प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने नवंबर में मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की है।

इटली में महंगाई दर बढ़कर 4.2% पर पहुंच गई है। मिलान, ट्यूरिन और बोलोग्ना में हिंसक झड़पें हुईं। मिलान में पुलिस गाड़ियों पर वॉटर कैनन चलाए गए और 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें अधिकांश नाबालिग है। अब ’17 अक्टूबर आंदोलन’ ने हर शनिवार स्थायी प्रदर्शन का आह्वान किया है।

वहीं बाल्कन देश सर्बिया में पिछले दो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे छात्र आगामी चुनावों में पूर्व सत्तावादी नेता अलेक्जेंडर वुसिक की वापसी को चुनौती दे रहे हैं।

Silver Gold Price Today : एशियाई बाजारों में शुरुआती कारोबार में सोने-चांदी के भाव में नरमी, जानिए आगे कैसी रह सकती है इनकी चाल

Silver Gold Price Today : मंगलवार को एशियाई बाजारों के शुरुआती कारोबार में सोने की कीमतों में गिरावट आई है। निवेशक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी नीति और रिटेल महंगाई के आंकड़ों पर नजर रखे हुए हैं। इससे ब्याज दरों की आगे की दिशा के बारे में संकेत मिल सकते हैं। फिलहाल हाजिर सोना (स्पॉट गोल्ड) 0.3% गिरकर 4,126.84 डॉलर प्रति औंस पर दिख रहा है। वहीं, दिसंबर की डिलीवरी वाला अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स 0.3% गिरकर 4,146.00 डॉलर पर दिख रहा है।

निवेशकों का फोकस अब यूएस फेड की 27-28 अक्टूबर की नीति बैठक और अगले हफ्ते आने वाले अमेरिकी ‘पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर्स’ (PCE) डेटा पर है। यूएस फेड 2% महंगाई दर का लक्ष्य लेकर चल रहा है, इसलिए वह इस डेटा पर बहुत बारीकी से नजर रखे हुए है।

यूएस फेड ने सितंबर में अपनी बेंचमार्क ब्याज दरों को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 3.75%-4.00% की रेंज में कर दिया था। CME के ​​’फेडवॉच टूल’ के मुताबिक ट्रेडर्स का मानना ​​है कि इस बात की 83% संभावना है कि केंद्रीय बैंक अगले हफ्ते दरों में कोई खास बदलाव नहीं करेगा,जबकि दिसंबर में दरों के बढ़ने की उम्मीद 94% बनी हुई है।

इस बीच बैंक ऑफ जापान के गवर्नर काज़ुओ उएदा ने कहा है कि रिटेल महंगाई दर केंद्रीय बैंक के 2% के लक्ष्य के काफी करीब है। ग्लोबल स्तर पर AI की भारी मांग और टाइट जॉब मार्केट के कारण महंगाई का दबाव बढ़ रहा है, जिससे ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की संभावना के संकेत मिलते हैं।

आमतौर पर, ऊंची ब्याज दरों का असर सोने की कीमतों पर पड़ता है क्योंकि इससे सोना (बुलियन) अपने पास रखने की ‘अपॉर्चुनिटी कॉस्ट’ बढ़ जाती है, जबकि सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता।

जियोपोलिटिकल फ्रंट की बात करें तो यमन के ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों ने सोमवार को कहा कि उन्होंने सऊदी अरब के एनर्जी इंफ्रा, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर कई हमले किए हैं।

दूसरी कीमती धातुओं की बात करें तो, स्पॉट सिल्वर 0.7% गिरकर 56.69 डॉलर प्रति औंस पर आ गई है। वहीं, प्लैटिनम 1,639.65 डॉलर पर सपाट दिख रहा है। जबकि, पैलेडियम 0.7% गिरकर 1,112.08 डॉलर पर आ गया है।

एक्सपर्ट्स की राय

स्मॉलकेस मैनेजर और ओमनीसाइंस कैपिटल के सीईओ विकास गुप्ता का कहना है कि अगले 2-3 के नजरिए से सोने को लेकर आम राय यही है कि इसकी कीमतें बढ़ेंगी। इस अवधि के दौरान महंगाई और ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी होगी। हालांकि,ये दोनों चीजें एक साथ नहीं हो सकतीं।

विकास गुप्ता का मानना है कि केंद्रीय बैंक सोने के बड़े खरीदार हो सकते हैं,लेकिन साथ ही ऐसे बड़े विक्रेता भी हो सकते हैं जो उसी समय सोना बेचें,जिससे सोने की कीमतें नियंत्रण में बनी रह सकती है।

भारत में त्योहारों और शादियों का सीजन आने वाला है। आमतौर पर इससे सोने की कीमतें बढ़ती हैं। हालांकि,फेड द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना को देखते हुए,ग्लोबल मार्केट में सोने की कीमतें दबाव में रह सकती हैं। भारत में त्योहारों के दौरान सोने की कीमतों में थोड़ी तेजी आ सकती है,लेकिन उसके बाद कीमतें स्थिर रहने की संभावना है।

ब्रिकवर्क रेटिंग्स में हेड ऑफ रिसर्च,राजीव शरण का कहना है कि भारत में दशहरा मनाया जा रहा है और इस समय 24-कैरेट सोना लगभग 1.48 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है। पिछले महीने यह अपने रिकॉर्ड हाई से 6% से ज्यादा नीचे आया है। इस त्योहारी सीजन में जो बदलाव आया है वह सोने के प्रति भारतीय परिवारों के लगाव में नहीं,बल्कि इसे खरीदने के तरीके में है। भारतीय अपने त्योहारी बजट को तो स्टेबल रख रहे हैं,भले ही इसके लिए उन्हें कम वजन वाले आभूषण खरीदने पड़ें।

साथ ही लोग सोने के सिक्कों,बार और एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड (ETF) में अधिक निवेश कर रहे हैं। यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि त्योहारी खरीदारी अब केवल गहने खरीदने तक सीमित न रहकर, संपत्ति को सुरक्षित रखने के एक व्यवस्थित तरीके में बदल रही है। आगे चलकर, अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें सोने की कीमतों में बहुत तेज उछाल नहीं आने देंगी,जिससे निकट भविष्य में सोने की कीमत में 5% तक की उतार-चढ़ाव वाली रेंज बनी रहने की संभावना है। इस दशहरे पर,खरीदार कीमतों में आई हालिया गिरावट को किसी चेतावनी के रूप में नहीं, बल्कि खरीदारी शुरू करने के एक अच्छे मौके के तौर पर देख रहे हैं।

 

 

Gold Price Today: सोने में गिरावट पर लगा ब्रेक, दशहरा पर 24 और 22 कैरेट दोनों का भाव चढ़ा

 

 

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September CPI : सितंबर में रिटेल महंगाई 23 महीने के हाई पर आई, खाने-पीने की चीजों ने दिया सबसे तगड़ा झटका

September CPI : सितंबर में भारत की रिटेल महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई। नई कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) सीरीज़ में यह पहली बार है जब महंगाई दर 5 प्रतिशत के स्तर से ऊपर गई है। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का इस बढ़त में सबसे ज्यादा योगदान रहा है, जिससे परिवारों का खर्च काफी बढ़ गया है। आज 12 अक्टूबर को आए आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में महंगाई दर 4.83 प्रतिशत थी, जिसमें बढ़ोतरी हुई है। यह मार्च के बाद से सालाना महंगाई दर में लगातार छठी मासिक बढ़ोतरी है।

इस बढ़ोतरी के साथ महंगाई दर भारतीय रिज़र्व बैंक के 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर चली गई, हालांकि यह केंद्रीय बैंक की 2-6 प्रतिशत की स्वीकार्य सीमा के भीतर ही रही है।

खाने-पीने की चीजो की महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ी

कंज्यूमर फ़ूड प्राइस इंडेक्स (CFPI) के हिसाब से, खाने-पीने की चीज़ों की महंगाई अगस्त में 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत हो गई। प्याज़ की कीमतों में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अगस्त में इसकी महंगाई दर 48.78 प्रतिशत थी, जो सितंबर में बढ़कर 108.09 प्रतिशत हो गई। लहसुन की महंगाई दर 43.60 प्रतिशत से बढ़कर 54.62 प्रतिशत हो गई, जबकि नींबू की कीमतों में 36.41 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जो पिछले महीने 15.15 प्रतिशत थी।

हालांकि, कुछ सब्जियों में राहत मिली। आलू की कीमतों में सालाना 11.50 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि टमाटर की कीमतें 8.62 प्रतिशत कम हुईं। चांदी के गहनों में महंगाई दर 87.80 प्रतिशत के बहुत ऊंचे स्तर पर बनी रही, हालांकि अगस्त में यह 106.81 प्रतिशत थी। सितंबर में पान-तंबाकू की महंगाई 4.71% से बढ़कर 4.8% पर रही। वहीं, फूड एंड बेवरेजेज महंगाई 5.66% से बढ़कर 7.36% पर रही।

ग्रामीण इलाकों में महंगाई 6 प्रतिशत के पार

ग्रामीण भारत में महंगाई में ज़्यादा तेज़ी देखी गई। सितंबर में ग्रामीण भारत की खुदरा महंगाई अगस्त के 5.24 प्रतिशत से बढ़कर 6.08 प्रतिशत हो गई। शहरी इलाकों में महंगाई 4.31 प्रतिशत से बढ़कर 4.88 प्रतिशत हो गई। इसके चलते ग्रामीण और शहरी महंगाई के बीच का अंतर बढ़कर 1.20 प्रतिशत हो गया, जबकि अगस्त में यह 0.93 प्रतिशत था।

बड़े राज्यों में, तमिलनाडु की रिटेल महंगाई दर 6.81 प्रतिशत दर्ज की गई, इसके बाद ओडिशा में 6.70 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 6.68 प्रतिशत, तेलंगाना में 6.64 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 6.29 प्रतिशत रही।

कीमतों का दबाव सिर्फ़ खाने-पीने की चीज़ों तक ही सीमित नहीं

ताज़ा आंकड़ों से कई तरह की सेवाओं और खाने-पीने से जुड़ी चीज़ों के अलावा अन्य कैटेगरी में भी महंगाई बढ़ने का पता चलता है। पर्सनल केयर, मिसिलेनियस महंगाई घटकर 13.75% पर रही है। वहीं, रेस्टोरेंट,एकॉमडेशन सर्विस महंगाई बढ़कर 9.36% पर रही है। एजुकेशन सर्विसेस महंगाई 3.73% से बढ़कर 3.94% पर रही है।

सितंबर में रिक्रिएशन, स्पोर्ट & कल्चर महंगाई बढ़कर 2.16 प्रतिशत पर आ गई। वहीं, इंफो, कम्युनिकेशन महंगाई 2.01 प्रतिशत से बढ़कर 2.44 प्रतिशत पर रही। सितंबर रिटेल महंगाई दर 23 महीने के ऊपरी स्तर पर रही है। ट्रांसपोर्टेशन महंगाई दर 4.60 प्रतिशत से बढ़कर 5.01 प्रतिशत पर आ गई है। वहीं, हेल्थ महंगाई दर 1.34 प्रतिशत से बढ़कर 1.40 प्रतिशत पर रही है। फर्निशिंग, घरेलू उपकरण महंगाई दर 3.11 न पर रही है। हाउसिंग यूटिलिटी महंगाई 2.61प्रतिशत से बढ़कर 2.74 प्रतिशत पर रही है। वहीं, कपड़ा, जूता चप्पल महंगाई 3.56 प्रतिशत से बढ़कर 3.93 प्रतिशत पर रही है।

मॉनेटरी पॉलिसी पर असर

सितंबर में महंगाई के आंकड़े RBI के लिए एक चुनौती हैं, क्योंकि मार्च से कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के कारण हेडलाइन महंगाई दर, RBI की तय सीमा (टॉलरेंस बैंड) के ऊपरी स्तर के करीब पहुंच गई है।

इन दबावों का बने रहना RBI के भविष्य के पॉलिसी फैसलों के लिए अहम होगा। अब यह देखना होगा कि क्या खाने-पीने की चीजों की महंगाई में बढ़ोतरी कुछ समय के लिए है या यह आम कंज्यूमर कीमतों पर भी इसका असर दिखने लगा है। RBI एमपीसी की अगली बैठक दिसंबर में होगी।

 

 

Market Outlook : गिरावट के साथ बंद हुआ बाजार, जानिए 13 अक्टूबर को कैसी रह सकती है इसकी चाल

महंगाई दर भी आंकड़ों की बाजीगरी

भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दर यानी रेपो रेट करीब 44 महीने के बाद की है। बीते 44 महीनों में ब्याज दर या तो स्थिर रही या उसमें कमी की गई। लंबे समय से रेपो रेट 5.25 फीसदी पर स्थिर था, जिसे बढ़ा कर 5.50 फीसदी कर दिया गया है। मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की दोमासिक बैठक के बाद जब रेपो रेट बढ़ाने की घोषणा हुई तो मामला सिर्फ 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी पर रुक नहीं गया, बल्कि सूत्रों के हवाले से और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर दावा किया गया कि रेपो रेट में अभी और बढ़ोतरी होगी। यहां तक कहा गया कि इसमें एक फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। अगली बैठक दिसंबर में है और उस समय 0.50 फीसदी बढ़ोतरी की बात कही जा रही है।

रेपो रेट बढ़ने और आगे बढ़ते रहने की खबरों का बहुत बड़ा असर गुरुवार, आठ अक्टूबर को शेयर बाजार पर पड़ा। बीएसई का संवेदी सूचकांक एक हजार अंक से ज्यादा गिर गया। निवेशकों के लाखों करोड़ रुपए एक दिन में डूब गए वैसे पिछले नौ हफ्ते से लगातार शेयर बाजार गिर रहा है और करीब 20 लाख रुपए की बाजार पूंजी स्वाहा होने की खबर है।

बहरहाल, रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में जो बढ़ोतरी की उसका आधार यह था कि महंगाई बढ़ रही है। सवाल है कि महंगाई कितनी बढ़ रही है? सरकार के आंकड़ों में तो महंगाई इतनी नहीं बढ़ी है कि उसे नियंत्रित करने के लिए रेपो रेट बढ़ाना पड़े!

खुदरा महंगाई का सबसे ताजा आंकड़ा अगस्त है। अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही, जो जुलाई में 4.45 फीसदी थी। यह सरकारी आंकड़ा है। सोचें, रिजर्व बैंक ने खुद चार फीसदी की औसत महंगाई दर बनाए रखने का लक्ष्य तय किया। उसके दो से छह फीसदी का लक्ष्य बनाया है। यानी अधिकतम छह फीसदी तक महंगाई होती है तो काम चल सकता है। उससे ज्यादा होने पर मुश्किल होगी। उसके हिसाब से औसत महंगाई चार फीसदी तक रहे तो ठीक है। फिर 4.45 फीसदी या 4.82 फीसदी की महंगाई दर को पैनिक होने की स्थिति नहीं मान सकते हैं। इसका अर्थ है कि इन आंकड़ों से अलग असली आंकड़ा कुछ और है। महंगाई के सरकारी आंकड़ों से अलग असली महंगाई वह है, जिसे लोग महसूस कर रहे हैं पर सरकार बता नहीं रही है।

असली महंगाई की बात करें तो वह सरकार के आंकड़ों से बहुत ज्यादा है। बरसात खत्म हो गई है फिर प्याज की कीमतें 70 रुपए किलो से कम नहीं हैं। यह स्थिति तब है, जब सरकार सस्ता प्याज बिकवाने की बात कर रही है। इसी तरह 31 अक्टूबर तक सरकार ने शुल्क मुक्त चीनी के आयात की अनुमति दी थी फिर भी चीनी की कीमत 70 रुपए किलो से कम नहीं हो रही है। ईंधन की महंगाई चरम पर है। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतें बेहिसाब बढ़ी हैं, जिससे माल ढुलाई बहुत महंगा हुआ है और खाने पीने की सारी चीजों की कीमत बढ़ गई है। इसके बावजूद महंगाई का आंकड़ा 4.82 फीसदी बताते है। यह हाथी के दिखाने के दांत हैं। असली महंगाई इससे कहीं ज्यादा है। यह वैसे ही है जैसे गर्मियों में बताया जाता है कि तापमान 45 डिग्री है, लेकिन महसूस होने वाला तापमान 52 डिग्री या उससे ज्यादा है। असल में महसूस होने वाली गर्मी कई दूसरे फैक्टर पर निर्भर करती है। वैसे ही महसूस होने वाली महंगाई अलग है और सरकार का आंकड़ा अलग है।

यह इसलिए भी हुआ क्योंकि सरकार ने महंगाई के आकलन का तरीका भी बदल दिया है। अब 2024 की नई सीरीज के आधार पर महंगाई का आकलन हो रहा है। सरकार ने बड़ी होशियारी से खुदरा महंगाई के बास्केट में खाने पीने की चीजों का वजन कम कर दिया। खुदरा महंगाई का आकलन करने वाली पुरानी सीरीज में खाने और पीने की चीजों का वजन 45.86 फीसदी होता था। नई सीरीज में इसे घटा कर 35.75 फीसदी कर दिया है। यानी 11 फीसदी से ज्यादा की कमी की गई है।

सोचें, जिन वस्तुओं का सबसे ज्यादा उपभोग है और जिन वस्तुओं की कीमतें अलग अलग सीजन में अलग अलग कारणों से बहुत बढ़ती रहती है उनके वजन में इतनी बडी कटौती कर दी गई। जाहिर है इससे महंगाई की दर पहले के मुकाबले कम दिखाई देगी। लेकिन लोगों को ज्यादा महसूस होगी क्योंकि खाने पीने की चीजों की कीमतें तो बेतहाशा बढ़ रही हैं। हालांकि भले सरकार इस महसूस होने वाली महंगाई का आंकड़ा नहीं बता रही है लेकिन उसको पता है और इसलिए रेपो रेट में बढ़ोतरी हुई है।

मौद्रिक समाधान काफी नहीं

चुनौतियों की वजह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला भंग होने तथा अर्थव्यवस्था की कमजोरियों में छिपी हो, तो मौद्रिक नीति जैसे बैंड-एड नाकाफी साबित होते हैं, जबकि उनके साइड इफेक्ट्स से नई दिक्कतें सामने आती हैं। 

फिलहाल ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति के मामले में अपना रुख “न्यूट्रल” से बदलकर “कैलिब्रेटेड टाइटनिंग” कर दिया है। इसका अर्थ है कि आगे ब्याज दर स्थिर रहेगी या बढ़ेगी, लेकिन यह घटेगी नहीं। फिलहाल संभावना यही है कि इस वित्त वर्ष में ब्याज दर और बढ़ेगी। पश्चिम एशिया के युद्ध से उपजे ऊर्जा एवं कमोडिटी संकट और धनी देशों में बॉन्ड ब्याज दर बढ़ने से दरपेश चुनौतियों के बीच रिजर्व बैंक के पास इसके अलावा शायद ही कोई और चारा है। भारत में अब ब्याज दर 5.5 प्रतिशत होने के बाद उम्मीद जताई गई है कि यहां से हो रहे पूंजी पलायन को रोकने में कुछ सहायता मिलेगी। ऐसा हुआ तो रुपये की गिरती कीमत को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

लेकिन बुधवार को ब्याज दर में वृद्धि के एलान के बावजूद रुपया पांच महीने के निचले स्तर तक गिर गया। स्पष्टतः नई मौद्रिक नीति भी रुपये को सहारा देने के लिहाज से पर्याप्त साबित नहीं हुई। जबकि नई नीति से महंगाई और बढ़ सकती है। खुद आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगली तीन तिमाहियों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर के औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। अगस्त में ये दर पांच फीसदी थी। नई दर की घोषणा के बाद शेयर बाजार में ऑटो एवं उपभोक्ता सामग्री से जुड़ी कंपनियों और प्रॉपर्टी जैसे क्षेत्रों के शेयरों पर उलटा असर पड़ा।

दरअसल, ऊंची ब्याज दर के कारण कार, घर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महंगे सामानों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाएगा। इससे अनेक ग्राहकों की खरीदारी क्षमता प्रभावित होगी। इस कदम का खराब असर कच्चे माल (जैसे तांबा, स्टील), परिवहन भाड़ा और ए.सी., टीवी, फ्रिज जैसी वस्तुओं के दाम पर भी पड़ सकता है। ये सामान 5-8 प्रतिशत तक और महंगे हो सकते हैं। तो कुल सूरत बिगड़ेगी। दरअसल, जब चुनौतियों की वजह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला के भंग होने तथा अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमजोरियों में छिपी हो, तो मौद्रिक नीति जैसे बैंड-एड नाकाफी साबित होते हैं, जबकि इनके साइड इफेक्ट्स से नई दिक्कतें सामने आ जाती हैं।

घर, गाड़ी की ईएमआई महंगी हुई

मुंबई। लंबे अरसे के बाद भारतीय रिजर्व बैंक यानी आरबीआई ने नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की दोमासिक बैठक के बाद बुधवार को गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रेपो रेट में बढ़ोतरी का ऐलान किया। आरबीआई ने करीब साढ़े तीन साल के बाद रेपो रेट में बढ़ोतरी की है। इसे 5.25 से बढ़ा कर 5.50 फीसदी कर दिया गया है। बढ़ती हुई महंगाई के कारण आरबीआई को यह फैसला करना पड़ा है।

आरबीआई के इस फैसले के बाद बैंकों से कर्ज लेना महंगा होगा और पहले से लिए गए कर्ज की ईएमआई भी महंगी हो जाएगी। देश में महंगाई दर बढ़ने की वजह से आरबीआई को फरवरी 2023 के बाद यानी करीब साढ़े तीन साल बाद रेपो रेट बढ़ाना पड़ा है। रेपो रेट वो ब्याज दर है जिस पर कॉमर्शियल बैंक भारतीय रिजर्व बैंक से कर्ज लेता है। अगर आरबीआई ज्यादा ब्याज दर पर कर्ज देगा तो बैंक भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेंगे।

ब्याज दर में बढ़ोतरी का असर विकास दर पड़ेगा क्योंकि इससे बाजार में मांग घटती है। मांग कम होने से आपूर्ति स्थिर होगा यानी बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे महंगाई दर कम होगी। रिजर्व बैंक ने दोमासिक बैठक के बाद महंगाई दर का अनुमान भी बढ़ाया है। अब 2026-27 में महंगाई दर 5.2 फीसदी रहने का अनुमान है, जो पहले पांच फीसदी था। ध्यान रहे रिजर्व बैंक ने महंगाई की औसत दर चार फीसदी तय की है। इसे दो से छह फीसदी के बीच रखने का लक्ष्य तय किया गया है।

बहरहाल, रेपो रेट बढ़ने के बाद भी अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर अच्छी खबर है। रिजर्व बैंक ने 2026-27 के लिए जीडीपी की विकास दर का अनुमान 6.7 से बढ़ा कर 7.1 फीसदी कर दिया है। इसमें दूसरी तिमाही की विकास दर 7.2 और तीसरी तिमाही की विकास दर 6.9 फीसदी रहने की उम्मीद है। चौथी तिमाही का अनुमान 6.8 फीसदी पर बरकरार रखा गया है।

RBI Repo Rate Hike : आरबीआई गवर्नर ने कहा, ब्याज दरों में आगे भी कटौती की संभावना नहीं, इसमें अभी और बढ़ोतरी की संभावना

RBI Repo Rate Hike : भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने बुधवार को कहा कि निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की कोई संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक का अगला नीतिगत कदम या तो ब्याज दरों में और बढ़ोतरी हो सकता है या फिर दरों को बरकरार रखा जा सकता है। यह बदलाव महंगाई तथा अन्य आर्थिक स्थितियों में होने वाले बदलावों पर निर्भर करेगा।

यह गाइडेंस तब आया है जब मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी ने रेपो रेट को 5.25% से 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% कर दिया है और अपनी मॉनेटरी पॉलिसी के रुख को ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया है।

संजय मल्होत्रा ​​ने कहा कि निकट भविष्य में “रेट में कटौती की कोई संभावना नहीं है” और आगे की पॉलिसी में हालात के हिसाब से या तो रेट बढ़ाए जाएंगे या फिर उन्हें जस का तस रखा जाएगा।

अक्टूबर में रेपो रेट में की गई यह बढ़ोतरी फरवरी 2023 के बाद RBI की ओर से रेपो रेट में पहली बढ़ोतरी है। उस समय MPC ने पॉलिसी रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 6.50% कर दिया गया था।

रुख में इस बदलाव का समर्थन MPC के छह में से चार सदस्यों ने किया, जबकि दो सदस्यों ने ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग'(सोच-समझकर सख्ती) की ओर बढ़ने के खिलाफ वोट दिया।

रेपो रेट में बढ़ोतरी के बाद, स्टैंडिंग डिपॉज़िट फैसिलिटी रेट को 5.25% पर एडजस्ट किया गया है, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी रेट और बैंक रेट को बढ़ाकर 5.75% कर दिया गया है।

महंगाई बढ़ने का डर रहा हावी

संजय मल्होत्रा ​​ने कहा कि महंगाई का आउटलुक अब वैसा अनुकूल नहीं है जैसा पिछले साल था। कीमतों के दबाव को देखते हुए MPC मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव की जरूरत का आकलन कर रही है।

RBI ने FY27 के लिए कोर महंगाई का अनुमान 4.3% से बढ़ाकर 4.4% कर दिया है। मल्होत्रा ​​ने कहा कि FY27 की अगली तीन तिमाहियों में CPI महंगाई (रिटेल महंगाई) औसतन 5.8% रहने की उम्मीद है।

RBI गवर्नर ने कहा कि मॉनेटरी पॉलिसी को सप्लाई शॉक के ‘सेकंड-राउंड’ असर (यानी सप्लाई में अचानक बदलाव से होने वाले बाद के असर) पर नजर रखनी होगी, भले ही शुरुआती सप्लाई-साइड महंगाई के असर से इन्हें अलग करना मुश्किल हो।

मल्होत्रा ​​ने कहा कि मॉनेटरी पॉलिसी आंशिक रूप से ऐसे ‘सेकंड-राउंड’ असर को रोककर काम करती है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ब्याज दरों में बदलाव का असर इकॉनमी तक पहुंचने में समय लगता है।

दरें बढ़ाने का फैसला कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में फिर से आई अस्थिरता के माहौल में लिया गया है। बैठक से पहले, एनर्जी की बढ़ती लागत, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और घरेलू स्तर पर बढ़ती महंगाई के दबाव के कारण ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदें मज़बूत हो गई थीं। अगस्त में रिटेल महंगाई दर 4.82% रही, जो लगातार तीसरे महीने RBI के 4% के मीडियम टर्म टारगेट से ज्यादा है।

संजय मल्होत्रा ​​ने आगे कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते टकराव ने ग्लोबल इकोनॉमिक सेंटीमेंट को कमजोर किया है और फाइनेंशियल मार्केट में उतार-चढ़ाव बढ़ाया है। उन्होंने ग्लोबल ट्रेड को लेकर बनी अनिश्चितता की ओर भी इशारा किया और कहा कि ग्लोबल महंगाई में तेजी से बढ़ोतरी की आशंका है। उन्होंने कहा कि सख्त मॉनेटरी पॉलिसी और जारी संघर्षों से ग्लोबल इकोनॉमी के लिए जोखिम पैदा हो रहे हैं।

 

 

RBI Policy : RBI ने वित्त वर्ष 2027 के GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया, दूसरी और तीसरी तिमाही के अनुमान भी बढ़े

RBI Policy : RBI ने वित्त वर्ष 2027 के GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया, दूसरी और तीसरी तिमाही के अनुमान भी बढ़े

RBI Policy : RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने 7 अक्टूबर को घोषणा की कि रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अपनी वास्तविक GDP ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, दूसरी और तीसरी तिमाही के ग्रोथ अनुमान भी बढ़ाए गए हैं। सेंट्रल बैंक ने Q2FY27 के ग्रोथ का अनुमान 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत और Q3FY27 के ग्रोथ अनुमान 6.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है। उसने Q4FY27 के ग्रोथ अनुमान को 6.8 प्रतिशत पर ही बनाए रखा गया है। हालांकि, Q1FY28 के लिए RBI ने ग्रोथ का अनुमान 7.3 प्रतिशत से घटाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया है।

मार्च 2027 में खत्म होने वाले फाइनेंशियल ईयर के लिए पूरे साल का नया अनुमान, पहले के अनुमान से 0.4 प्रतिशत ज़्यादा है। संजय मल्होत्रा ​​ने कहा कि घरेलू आर्थिक ग्रोथ मजबूत स्तर पर है और मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी को उम्मीद है कि अर्थव्यवस्था मज़बूत बनी रहेगी। गवर्नर ने कहा कि पहली तिमाही में ग्रोथ की वजह प्राइवेट खपत रही। लोगों की खर्च करने की इच्छा (डिस्क्रीशनरी स्पेंडिंग) से लगातार मिल रहे सपोर्ट के कारण खपत का स्तर काफी हद तक मजबूत बना रहा।

उन्होंने आगे कहा कि हाई-फ़्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स से पता चलता है कि दूसरी तिमाही में भी आर्थिक गतिविधि की रफ़्तार बनी रही, हालांकि पहली तिमाही की तुलना में इसमें थोड़ी कमी आई। उन्होंने कहा कि लागत के दबाव के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बनी रहीं।

भारत की विकास दर के अनुमान में ऐसे समय में बढ़ोतरी हुई है जब ग्लोबल इकोनॉमी कमजोर है। मल्होत्रा ​​ने कहा कि पिछले साल की तुलना में इस साल वैश्विक विकास दर धीमी रहने का अनुमान है।

उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के फिर से बढ़ने से ग्लोबल इकोनॉमिक सेंटीमेंट खराब हो गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में अस्थिरता बढ़ा दी है। ट्रेड को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण ग्लोबल सेंटीमेंट में घबराहट बनी हुई है और युद्ध तथा सख्त नीतियों से ग्लोबल इकोनॉमी के लिए जोखिम पैदा हो रहे हैं।

बता दें कि आज MPC ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत से 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत कर दिया और अपने पॉलिसी रुख को ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया। चार सदस्यों ने इस बदलाव का समर्थन किया, जबकि दो ने इसका विरोध किया।

इस पर संजय मल्होत्रा ​​ने कहा कि महंगाई का आउटलुक पिछले साल के मुकाबले कम अनुकूल है। इसी लिए कमिटी ने पॉलिसी रेट में बदलाव करना ज़रूरी समझा। RBI ने वित्त वर्ष 2027 के लिए कोर महंगाई दर 4.4 प्रतिशत और वित्त वर्ष की बाकी तीन तिमाहियों में कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (खुदरा महंगाई दर) औसतन 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।

 

 

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Daily Voice: बाजार में अभी डिफेंसिव नजरिया बनाए रखने की जरूरत, लंबी अवधि में इंश्योरेंस सेक्टर दिखाएगा कमाल

Daily Voice : कोर महंगाई की चाल को देखते हुए 2027 की शुरुआत में फेड फंड्स रेट में एक और बढ़ोतरी संभव है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। भारत की आर्थिक विकास दर 6.5% से 7% के बीच स्थिर रहेगी। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। इंश्योरेंस सेक्टर में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना दिख रही है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन से इस सेक्टर को सपोर्ट मिलेगा। ये बातें वॉटरफ़ील्ड एडवाइज़र्स के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर और इक्विटीज़ हेड विपुल भोवर ने मनीकंट्रोल के साथ हुई एक बातचीत में कही हैं।

क्या आप US ट्रेज़री मार्केट को ग्लोबल मार्केट के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यूएस का बॉन्ड मार्केट,ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम की नींव है। इस मार्केट में होने वाले स्ट्रक्चरल बदलाव आज ग्लोबल मार्केट पर असर डालने वाले सबसे अहम मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर हैं। जब “रिस्क-फ्री” US सॉवरेन डेट से अच्छा रिटर्न मिलता है तो यह ग्लोबल एसेट एलोकेशन की रणनीतियों को पूरी तरह से बदल देता है।

ट्रेजरी यील्ड के बढ़ने से ग्लोबल इक्विटी मल्टीपल्स पर दबाव पड़ता है और दुनिया भर की कंपनियों के लिए कर्ज लेने की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकते हैं,कैपिटल एक्सपेंडिचर में रुकावट आ सकती है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

क्या अमेरिका की वित्तीय स्थिति टिकाऊ नहीं लगती?

इस पर उन्होंने आगे कहा कि जरूरी खर्च और ब्याज पर होने वाले भारी खर्च(जो इस साल 1 ​​लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो गए हैं) में लगातार बढ़ोतरी से एक ढांचागत असंतुलन पैदा हो रहा है। अगर बड़े नीतिगत सुधार नहीं किए गए तो कर्ज का यह बढ़ता बोझ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को घटा सकता है और भविष्य में आर्थिक मजबूती में बाधा डाल सकता है।

कांग्रेसनल बजट ऑफिस का अनुमान है कि 2026 में फ़ेडरल घाटा लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा,जो अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 6 प्रतिशत है। इसके चलते अमेरिकी जनता पर मौजूद कर्ज GDP के 100 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा।

क्या आपको उम्मीद है कि इस साल के आखिर तक US फ़ेडरल रिज़र्व दो और बार ब्याज दरें बढ़ाएगा और उसके बाद अगले साल की पहली तिमाही में एक और बढ़ोतरी करेगा?

सितंबर 2026 में चेयरमैन केविन वॉर्श की अगुवाई में फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की,जिससे ये दरें 3.75 प्रतिशत से 4.00 प्रतिशत की रेंज में आ गईं। ‘डॉट प्लॉट’ से पता चला कि FOMC के 18 में से 16 सदस्यों को उम्मीद है कि इस साल कम से कम एक बार और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी होगी,हालांकि सिर्फ़ चार सदस्यों को दो और बार बढ़ोतरी की उम्मीद है।

एनर्जी की बढ़ती लागत की वजह से आई महंगाई इस सख्ती को सही ठहराती है। कोर महंगाई के ट्रेंड को देखते हुए 2027 की शुरुआत में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी हो सकती है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए,हालांकि इस साल एक और बढ़ोतरी की संभावना है,लेकिन दो और बार बढ़ोतरी होने की संभावना कम है।

क्या आपको लगता है कि भारत की विकास दर 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास स्टेबल हो जाएगी?

भारत की आर्थिक विकास दर के 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच स्टेबल होने की उम्मीद है। IMF ने वित्त वर्ष 2026 और 2027 के लिए 6.5 प्रतिशत GDP विकास दर का अनुमान लगाया है। महामारी के बाद के असर, सरकारी खर्च और रुकी हुई मांग की वजह से भारत में विकास दर 7.8 प्रतिशत के करीब रही है, लेकिन बेस इफ़ेक्ट के कम होने और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव व ऊंची ब्याज दरों जैसी ग्लोबल चुनौतियों के कारण इतनी ऊंची दरें शायद लंबे समय तक बनी न रह पाएं। हालांकि, 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर के साथ भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

अमेरिकी डॉलर में बढ़ोतरी के अहम कारण क्या हैं?

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज पर ज़्यादा यील्ड (रिटर्न) मुख्य रूप से महंगाई के दबाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित होती है, जो ग्लोबल इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करती हैं। इसके अलावा, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता बढ़ने से जोखिम से बचने वाले निवेशक अमेरिकी डॉलर से मिलने वाली सुरक्षा और लिक्विडिटी की ओर आकर्षित होते हैं। इसके अलावा,अमेरिकी टेक्नोलॉजी शेयरों में भारी विदेशी निवेश और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर होने वाला खर्च डॉलर की मांग को और बढ़ा रहा है। दूसरे G10 देशों की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मज़बूती, डॉलर की स्थिति को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी के तौर पर और मजबूत कर रही है।

क्या आप इक्विटी को लेकर इसलिए सतर्क हैं कि तेल की कीमतें ज़्यादा हैं और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ रही हैं या आपकी इस सोच के पीछे कोई और भी वजह है?

तेल की ऊंची कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई की चिंताएं भी हैं। ऐसे में,मौजूदा महंगे वैल्यूएशन को बनाए रखने के लिए बाजार में अभी तुरंत पॉजिटिव असर डालने वाली कोई वजह नहीं दिख रही है। ऐसे में जब तक अर्निंग्स की साफ तस्वीर नहीं दिखती या वैल्यूएशन में जरूरी टाइम करेक्शन नहीं होता,तब तक डिफेंसिव रुख अपनाना ही बेहतर है।

क्या आपको भारत में भी ब्याज दरें बढ़ाने का दौर शुरू होता दिख रहा है?

उम्मीद है कि भारत में ब्याज दरें बढ़ाने का दौर अक्टूबर 2026 में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक से शुरू होगा। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने फरवरी 2023 से रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है, लेकिन घरेलू और ग्लोबल स्तर पर बढ़ते दबावों के कारण इसमें बदलाव की जरूरत है।

कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाने और रुपये की कीमत घटने की वजह से खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। ग्लोबल फाइनेंशियल हालात के खराब होने के साथ,अर्थशास्त्रियों को दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे दर बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी और सख्ती का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।

क्या आपको लगता है कि मौजूदा स्तरों पर इंश्योरेंस सेक्टर में खरीदारी का मौका है?

भारत में इंश्योरेंस मार्केट की पहुंच अभी भी काफी कम है और 2026 से 2030 के बीच सालाना प्रीमियम ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन की वजह से यह सेक्टर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना रखता है।

 

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