Commodity Market: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल! ब्रेंट $95 के पार, जानिए सोने-चांदी का हाल

Commodity Market Updates: आज शुक्रवार, 4 सितंबर को वैश्विक कमोडिटी बाजार में मिला-जुला रुख देखने को मिल रहा है। मध्य पूर्व में गहराते सैन्य तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच एक बार फिर से भड़की तबाही की चिंगारी के चलते कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका गहरा गई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतों में बड़ा उछाल आया है। दूसरी ओर, अमेरिकी एंप्लॉयमेंट डेटा से ठीक पहले सोने और चांदी की कीमतों में मजबूती व स्थिरता बनी हुई है।

कच्चे तेल में आई यह तेजी मध्य जुलाई के बाद की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त की ओर इशारा कर रही है। आइए आपको बताते हैं कमोडिटी बाजार का पूरा अपडेट।

कच्चे तेल की कीमतों में उबाल: ब्रेंट $95 और WTI $91 के पार

मिडिल ईस्ट से तेल की सप्लाई रुकने के डर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई क्रूड दोनों की कीमतों में शुक्रवार को बढ़त दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड 15 सेंट (0.2%) चढ़कर $95.67 प्रति बैरल पर पहुंच गया। वीकली आधार पर इसमें 7.1% की भारी बढ़त देखी जा रही है। वही अमेरिकी WTI क्रूड 26 सेंट (0.3%) की बढ़त के साथ $91.56 प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है। हफ्ते भर में WTI में 9.8% का उछाल दर्ज किया गया है। यह 20 जुलाई के बाद कच्चे तेल में दर्ज की गई अब तक की सबसे बड़ी साप्ताहिक तेजी है।

सोने-चांदी का हाल: US Fed के नरम रुख से मिला सहारा

कच्चे तेल की आग के बीच सोने की कीमतों में स्थिरता बनी हुई है और यह भी मामूली साप्ताहिक बढ़त दर्ज करने की राह पर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड $4,477.10 प्रति औंस के मजबूत स्तर पर टिका हुआ है। दिसंबर का अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स 0.4% गिरकर $4,522.60 प्रति औंस पर रहा। सिल्वर (चांदी) 0.1% बढ़कर $66.90 प्रति औंस पर पहुंच गई, जबकि प्लैटिनम और पैलेडियम में मामूली सुस्ती रही।

निवेशक अब आज शाम जारी होने वाले अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल डेटा का इंतजार कर रहे हैं, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों पर अगला कदम उठाने का संकेत मिलेगा।

गुरुवार को गोल्ड में क्यों आई थी 2% की तेजी?

अमेरिकी फेड गवर्नर क्रिस्टोफर वॉलर ने कहा था कि अगर महंगाई दर स्थिर रहती है तो वे ब्याज दरें न बढ़ाने का समर्थन करेंगे। उनके इस बयान के बाद ट्रेडर्स ने सितंबर में रेट हाइक की उम्मीदें कम कर दीं, जिससे गुरुवार को सोने में 2% का बड़ा उछाल आया था।

डॉलर इंडेक्स में हल्की नरमी

दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की ताकत मापने वाला डॉलर इंडेक्स 0.05% घटकर 99.54 पर आ गया। डॉलर कमजोर होने से विदेशी खरीदारों के लिए डॉलर में कोटेड कमोडिटी (सोना-तेल) खरीदना तुलनात्मक रूप से सस्ता हो जाता है, जिससे कीमतों को सहारा मिलता है।

यूरो (Euro): $1.1589 पर स्थिर।

जापानी येन (Yen): डॉलर के मुकाबले 0.07% मजबूत होकर 158.59 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

 

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग की जयपुर में अहम बैठक! सैलरी और पेंशन पर हो सकता है ये बड़ा फैसला

8th Pay Commission Jaipur Meeting: 8वें केंद्रीय वेतन आयोग का काम अब तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन, भत्तों और पेंशन में संशोधन की प्रक्रिया के तहत आयोग देश भर के विभिन्न संघों और संगठनों के साथ लगातार परामर्श कर रहा है।

इसी कड़ी में 8वां वेतन आयोग 31 अगस्त और 1 सितंबर को राजस्थान के जयपुर में हितधारकों और कर्मचारी यूनियनों के साथ आधिकारिक बैठकें करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाला यह आयोग कर्मचारियों की समस्याओं, मांगों और कामकाजी परिस्थितियों का जायजा ले रहा है।

8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने से देश के 50 लाख से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों और 65 लाख से अधिक पेंशनभोगियों को सीधा लाभ मिलेगा।

सितंबर और अक्टूबर में किन-किन शहरों का दौरा करेगा आयोग?

मार्च से ही आयोग विभिन्न राज्यों का दौरा कर आंकड़े और सुझाव जुटा रहा है। आगामी दिनों का शेड्यूल इस प्रकार है:

  • चेन्नई (तमिलनाडु): 7 से 8 सितंबर
  • पुडुचेरी: 9 सितंबर
  • चंडीगढ़: 16 से 18 सितंबर
  • बेंगलुरु (कर्नाटक): 7 से 8 अक्टूबर (अपॉइंटमेंट के लिए 18 सितंबर तक आवेदन खुला है।)
  • मुंबई (सेंट्रल रेलवे): रेलवे कर्मचारियों की कामकाजी स्थितियों का प्रत्यक्ष अनुभव लेने के लिए आयोग मुंबई में सेंट्रल रेलवे का दौरा भी करेगा।

जयपुर बैठक और राज्य दौरों का क्या है मुख्य एजेंडा?

हालांकि आयोग ने कोई आधिकारिक लिस्ट जारी नहीं की है, लेकिन कर्मचारी यूनियनों द्वारा सौंपे गए ज्ञापनों के आधार पर बैठकों में मुख्य रूप से इन मुद्दों पर चर्चा हो रही है:

फिटमेंट फैक्टर और बेसिक पे: बेसिक सैलरी में बढ़ोतरी और नए फिटमेंट फैक्टर का निर्धारण।

महंगाई के हिसाब से वेतन संशोधन: महंगाई दर और जीवन यापन की लागत के अनुकूल सैलरी स्ट्रक्चर तैयार करना।

भत्तों का पुनर्गठन: हाउस रेंट अलाउंस (HRA) और ट्रैवल अलाउंस (TA) में सुधार।

पेंशन सुधार: सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय सुरक्षा को बेहतर बनाना।

कर्मचारी कल्याण और कार्य परिस्थितियां: कर्मचारियों के मनोबल और कार्यस्थल की सुविधाओं में सुधार।

कब तक लागू होंगी 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें?

आयोग के गठन 3 नवंबर 2025 से 18 महीने के भीतर सिफारिशें सौंपनी हैं। इसका मतलब है कि आयोग फरवरी से मई 2027 के बीच अपनी आधिकारिक रिपोर्ट सरकार को सौंप सकता है।

पिछले वेतन आयोगों के रुझान को देखें तो सिफारिशें आने के बाद उनके अंतिम क्रियान्वयन में 2 से 3 साल का समय लग जाता है। यानी 2027 में होने वाली घोषणाओं का पूर्ण लाभ कर्मचारियों को 2029 या 2030 तक मिल सकता है।

Gold Outlook: सोने ने पकड़ी रॉकेट जैसी रफ्तार! 1 दिन में 4% उछला भाव, एक्सपर्ट्स से जानिए अगला टारगेट

Gold Price Prediction: घरेलू और वैश्विक बाजार में गुरुवार को सोने की कीमतों में एक बार फिर रिकॉर्ड तेजी देखने को मिली। हालिया सत्रों में पीली धातु में 4% से अधिक का जोरदार उछाल आया है, जिससे इसके दाम दो महीने के नए उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में गिरावट के बाद सर्राफा बाजार में यह बड़ी तेजी दर्ज की गई है।

एशियाई कारोबार की शुरुआत में अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड $4,500 प्रति औंस के आसपास पहुंच गया। वहीं, भारतीय वायदा बाजार (MCX) में सोना तेजी के साथ ₹1,58,008 प्रति 10 ग्राम के आसपास ट्रेड करता दिखा।

क्यों आई सोने में अचानक इतनी बड़ी तेजी?

सोने की कीमतों में अचानक आए इस बड़े उछाल के पीछे अमेरिका का एक बड़ा फैसला है। अमेरिकी वित्त विभाग ने लंबी अवधि (10 से 30 साल) वाले बॉन्ड बाजार को अतिरिक्त लिक्विडिटी सहायता देने के लिए बायबैक ऑपरेशंस का दायरा दोगुना करने का ऐलान किया है। इस फैसले के बाद अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में गिरावट आई और अमेरिकी डॉलर कमजोर हो गया।

चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है, इसलिए डॉलर के कमजोर होने और बॉन्ड यील्ड गिरने से बिना ब्याज देने वाले एसेट जैसे सोने की मांग अचानक बढ़ गई।

MCX Gold Target: एक्सपर्ट्स से जानिए अब कहां तक जाएंगे दाम

कमोडिटी मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक तकनीकी सपोर्ट लेवल कायम हैं, तब तक सोने में यह तेजी जारी रहेगी।

चॉइस ब्रोकिंग के एक्सपर्ट आमिर माकडा के अनुसार, ‘तकनीकी चार्ट पर MCX गोल्ड अपने 20, 50 और 100 दिनों के मूविंग एवरेज से ऊपर बना हुआ है, जो शॉर्ट-टर्म में तेजी का संकेत देता है। इमीडिएट रेजिस्टेंस ₹1,59,250 प्रति 10 ग्राम पर है। अगर यह इस स्तर को पार करता है, तो अगला टारगेट ₹1,60,000 होगा।

ऑगमेंट की चीफ रिसर्च ऑफिसर रेनिशा चैनानी ने कहा कि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने ने अपनी पुरानी रेंज ($4,340-$4,440) को तोड़ दिया है और $4,500 का टारगेट हासिल कर लिया है। अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में अगला लक्ष्य $4,600 है, जो भारतीय बाजार (MCX) में करीब ₹1,62,000 प्रति 10 ग्राम के स्तर के बराबर बैठता है।

तेजी के बीच ये है एक बड़ा रिस्क

सोने में तेजी के बीच निवेशकों को अमेरिकी केंद्रीय बैंक (US Fed) के रुख पर ध्यान देने की जरूरत है। यूएस फेड की जुलाई बैठक के मिनट्स से साफ हुआ है कि नीति निर्माता अभी भी महंगाई को लेकर चिंतित हैं।

अगर अमेरिका में महंगाई दर 2% के लक्ष्य तक नहीं आती है, तो फेड ब्याज दरों में फिर से बढ़ोतरी कर सकता है। अगर आने वाले दिनों में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो डॉलर और बॉन्ड यील्ड में रिकवरी आ सकती है, जो सोने की इस रफ्तार पर ब्रेक लगा सकती है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Monetary Policy : अगर महंगाई ऊंचे स्तर पर रही तो RBI ब्याज दरों में कर सकता है बढ़ोतरी – MPC मेंबर

Monetary Policy : मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी के एक्सटर्नर मेंबर सौगत भट्टाचार्य ने कहा है कि अगर महंगाई का दबाव बना रहता है तो रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का अगला कदम ब्याज दरों में बढ़ोतरी का हो सकता है। हालांकि,उन्होंने कहा कि इस तरह का कोई भी फैसला महंगाई के आने वाले आंकड़ों और इस बात पर निर्भर करेगा कि हालिया कीमतों का दबाव और कितना गहरा होता है।

भट्टाचार्य ने कहा कि MPC के महंगाई के अनुमान और पॉलिसी स्टेटमेंट से भविष्य के कदम की दिशा का संकेत पहले ही मिल चुके हैं। उन्होंने कहा,”मुझे लगता है कि अगला कदम क्या होगा, यह साफ़ तौर पर बताया गया था,”साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि “अगले कदम की ज़रूरत कब पड़ सकती है।”

उन्होंने आगे कहा कि चाहे दबाव खाने-पीने की चीज़ों,ईंधन या कोर कंपोनेंट्स से आ रहा हो, हेडलाइन महंगाई ही MPC का मुख्य लक्ष्य बनी हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर 2026-27 में औसत महंगाई दर लगभग 5% रहती है तो महंगाई को काबू में रखने के लिए मौजूदा 5.25% पॉलिसी रेट कुछ ज़्यादा ही अकोमोडेटिव(नरम)हो सकती है। पॉलिसी मेकर ऐसी स्थिति में नहीं पड़ना चाहते जहां वे समय से कदम उठाने में पीछे रह जाएं और बाद में उन्हें ज़्यादा सख्त कदम उठाने पड़ें।

उन्होंनें इस बात की ओर भी इशारा किया कि कंपनियां बढ़ती इनपुट लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं। उन्होंने इसके लिए मज़बूत कॉर्पोरेट मार्जिन और क्रेडिट ग्रोथ का हवाला दिया। अगस्त की पॉलिसी समीक्षा के बाद जारी हालिया महंगाई के आंकड़े इस बात का तसदीक करते हैं कि इनपुट की कीमतों और लागत का असर आउटपुट की कीमतों पर पड़ रहा है,जिससे संकेत मिलता है कि कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

भट्टाचार्य ने कहा कि वास्तविक ब्याज दरें एक अहम पैमाना तो हैं,लेकिन पॉलिसी के लिए कोई तय बेंचमार्क नहीं हैं। उन्होंने बताया कि ब्याज दर पर फ़ैसला लेने से पहले पॉलिसी बनाने वाले कई आर्थिक पहलुओं पर विचार करते हैं।

सौगत भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि RBI के आकलन में ग्लोबल घटनाओं जैसे US फेडरल रिजर्व और दूसरे बड़े सेंट्रल बैंकों के पॉलिसी फैसलों को भी ध्यान में रखा जाता है। हालांकि,उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत की मॉनेटरी पॉलिसी से जुड़े फैसलों में घरेलू महंगाई और ग्रोथ ही मेन फैक्टर बने हुए हैं।

अगली MPC मीटिंग को देखते हुए,भट्टाचार्य ने कहा कि कोई भी फैसला लेने से पहले एमपीसी कमिटी महंगाई के आने वाले आंकड़ों पर बारीकी से नज़र रखेगी। अगर महंगाई की रफ़्तार और तेज़ होती है तो ब्याज दरों में जल्द बढ़ोतरी की ज़रूरत पड़ सकती है। अगर कीमतों का दबाव कम होता है तो RBI के पास पॉलिसी को सख़्त करने से पहले और इंतज़ार करने की गुंजाइश हो सकती है।

टैक्स बचाते-बचाते कहीं आप तो नहीं कर रहे ये 3 बड़ी गलतियां? समझें स्मार्ट सेविंग का गणित

Smart Financial Planning: अक्सर लोग टैक्स बचाने के लिए ऐसे फाइनेंशियल फैसले ले लेते हैं, जिनका नुकसान उन्हें सालों-साल उठाना पड़ता है। इनकम टैक्स के सेक्शन 80C के तहत ₹1.5 लाख की छूट पाने के चक्कर में ज्यादातर लोग बिना सोचे-समझे ट्रेडिशनल इंश्योरेंस प्लान या गलत जगह पैसा फंसा देते हैं।

अगर आप भी सिर्फ टैक्स की बचत को अपना एकमात्र मकसद मानकर निवेश कर रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। जानिए वे 3 बड़ी गलतियां जो आपकी वेल्थ को बढ़ाने के बजाय घटा रही हैं।

इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट को एक साथ मिलाना

टैक्स बचाने के लिए लोग सबसे पहली गलती यह करते हैं कि वे एंडोमेंट या मनी-बैक पॉलिसी ले लेते हैं। इन पॉलिसियों में मिलने वाला रिटर्न महज 4% से 6% के आसपास होता है, जो महंगाई दर को भी मात नहीं दे पाता।

इसका दूसरा स्मार्ट ऑप्शन ये है कि इंश्योरेंस और इन्वेस्टमेंट को हमेशा अलग रखें। लाइफ कवर के लिए सिर्फ टर्म इंश्योरेंस लें, जो कम प्रीमियम में भारी-भरकम कवर देता है।

लॉक-इन और रिटर्न का गणित समझे बिना निवेश करना

केवल 80C की लिमिट भरने के लिए टैक्स-सेविंग एफडी (5 साल का लॉक-इन) या ऐसे प्रोडक्ट्स में पैसा लगा देना, जहाँ रिटर्न टैक्स-एडजस्टेड होने के बाद बेहद कम बचता है। इसका कड़वा सच ये है कि बैंक एफडी पर मिलने वाले ब्याज पर आपकी टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है, जिससे आपका असल रिटर्न और कम हो जाता है।

अगर आपकी रिस्क क्षमता इजाजत देती है, तो इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम(ELSS) में निवेश करें। इसमें केवल 3 साल का लॉक-इन होता है और लंबे समय में 12% से 15% तक का संभावित रिटर्न मिल सकता है।

इंश्योरेंस कवर को ही वेल्थ क्रिएटर्स समझ लेना

कई लोग गारंटीड रिटर्न वाली पॉलिसियों में यह सोचकर सालों तक प्रीमियम भरते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित है और टैक्स भी बच रहा है। 20-25 साल बाद मिलने वाला ₹20 लाख का फंड महंगाई के कारण आज के ₹5-6 लाख के बराबर भी नहीं होगा। यानी आप सुरक्षित रहकर भी अपनी खरीदारी की ताकत खो रहे हैं।

स्मार्ट सेविंग का आसान गणित

टैक्स बचाने और वेल्थ क्रिएट करने के लिए सही एसेट एलोकेशन बेहद जरूरी है। जहां ट्रेडिशनल इंश्योरेंस प्लान 10 से 20 साल के लंबे लॉक-इन के साथ महज 4% से 6% का औसत रिटर्न देते हैं, वहीं ELSS (टैक्स सेविंग म्यूचुअल फंड) सिर्फ 3 साल के सबसे कम लॉक-इन पीरियड में 12% से 15% तक का शानदार अनुमानित रिटर्न और 80C के तहत छूट देता है। इसके अलावा 15 साल की अवधि वाला PPF 7.1% का पूरी तरह टैक्स-फ्री रिटर्न देता है, जबकि सबसे स्मार्ट रणनीति यानी ‘टर्म प्लान + इंडेक्स फंड’ का कॉम्बिनेशन टर्म प्लान पर 80C की छूट के साथ-साथ लॉन्ग टर्म में 12%+ का तगड़ा रिटर्न हासिल करने में मदद करता है।

कैसे करें स्मार्ट शुरुआत?

टैक्स बचाना निवेश की प्रक्रिया का एक छोटा सा हिस्सा होना चाहिए, मुख्य लक्ष्य नहीं। सबसे पहले अपनी उम्र और जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस और हेल्थ इंश्योरेंस लें। इसके बाद बचे हुए पैसों को ELSS, PPF या NPS जैसे बेहतर रिटर्न देने वाले साधनों में अपनी रिस्क प्रोफाइल के अनुसार बांटें।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Gold Silver Price Today: गिर गए सोने-चांदी के दाम, आखिर क्या है कारण, अब आगे क्या होनी चाहिए निवेश रणनीति

Gold Silver Price Today: इंटरनेशनल मार्केट में सोने-चांदी की कीमतों में दबाव देखने को मिल रहा है। दरअसल, निवेशकों ने US ट्रेजरी यील्ड, तेल की कीमतों और ब्याज दरों के आउटलुक पर विचार किया, जिसके चलते सोने के मुकाबले चांदी में ज़्यादा गिरावट आई। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, COMEX सोना $4,406 प्रति औंस पर ट्रेड कर रहा था, जिसमें 0.33% की गिरावट थी, जबकि COMEX चांदी $63.145 प्रति औंस पर थी, जिसमें 1.39% की गिरावट थी।

ये बदलाव पिछले सेशन में दोनों कीमती धातुओं में गिरावट के बाद आए हैं। मंगलवार (18 अगस्त) को सोने में लगभग 2% की गिरावट आई थी, जबकि चांदी में भी तेज़ गिरावट देखी गई थी।

सोना और चांदी क्यों गिर रहे हैं?

US ट्रेजरी यील्ड में उतार-चढ़ाव इसका मुख्य कारण है। ज़्यादा यील्ड आम तौर पर सोने पर दबाव डालती है क्योंकि इस धातु पर कोई ब्याज नहीं मिलता, जिससे यील्ड देने वाली संपत्तियां ज़्यादा आकर्षक हो जाती हैं। US यील्ड अपने हालिया ऊंचे स्तरों से नीचे आई हैं, लेकिन ग्लोबल बॉन्ड बिकवाली के कारण प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में लंबे समय के लिए उधार लेने की लागत कई सालों के उच्चतम स्तर के करीब पहुंचने के बाद भी वे ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।

बाजार US फेडरल रिज़र्व की जुलाई की बैठक के मिनट्स (कार्यवृत्त) का भी इंतज़ार कर रहा है। निवेशक सेंट्रल बैंक की ब्याज दर की दिशा के बारे में संकेत तलाशेंगे, खासकर इसलिए क्योंकि हालिया US डेटा में कमज़ोर रोज़गार और रिटेल खर्च के साथ-साथ कम महंगाई दर दिखाई दी है।

चांदी पर क्यों है ज़्यादा दबाव?

हालिया कारोबार में सोने के मुकाबले चांदी में ज़्यादा तेज़ गिरावट आई है। सोने के विपरीत, चांदी की औद्योगिक मांग का एक बड़ा हिस्सा होता है, जिसका मतलब है कि इसकी कीमतें ग्लोबल आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी उम्मीदों पर भी प्रतिक्रिया दे सकती हैं। यह हालिया कमज़ोरी कीमती धातुओं में व्यापक गिरावट के बाद आई है।

घरेलू बाज़ार में क्या हो रहा है?

ऑल इंडिया सराफा एसोसिएशन के अनुसार, भारत में मंगलवार (18 अगस्त) को सोने की कीमतें ₹2,000 बढ़कर 99.9% शुद्धता वाले सोने के लिए ₹1.58 लाख प्रति 10 ग्राम हो गईं। वहीं चांदी की कीमत भी ₹730 बढ़कर ₹2.40 लाख प्रति किलोग्राम हो गई। घरेलू कीमतें ग्लोबल स्पॉट कीमतों में गिरावट के अनुरूप थीं, साथ ही रुपया, आयात लागत और स्थानीय मांग ने भी भारतीय बुलियन दरों को प्रभावित किया।

क्रूड प्राइस बढ़ा रही अनिश्चितता

US-ईरान संघर्ष और होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई का दबाव बढ़ सकता है और सेंट्रल बैंकों के लिए ब्याज दरों को लेकर स्थिति और मुश्किल हो सकती है। अगर निवेशकों को लगता है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी, तो इसका असर सोने की कीमतों पर पड़ सकता है।

वहीं, जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवन एसेट) के तौर पर सोने की मांग बढ़ सकती है। इससे बुलियन मार्केट दो विपरीत ताकतों के बीच फंसा हुआ है — एक तरफ सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की मांग और दूसरी तरफ ऊंची यील्ड/ब्याज दरों को लेकर चिंता।

अब निवेशकों को किन बातों पर रखनी चाहिए नजर?

सोने और चांदी की कीमतों में बदलाव की तत्काल वजह US फेड की बैठक के मिनट्स (बैठक का ब्योरा) हो सकते हैं। अगर इससे कोई संकेत मिलता है कि पॉलिसी बनाने वाले महंगाई को लेकर चिंतित हैं और ब्याज दरों में कटौती के पक्ष में नहीं हैं, तो बुलियन पर दबाव बना रह सकता है।

दूसरी ओर, अगर आर्थिक आंकड़े कमजोर रहते हैं या फेड की तरफ से ब्याज दरें कम रखने का संकेत (डोविश सिग्नल) मिलता है, तो ऊंची ब्याज दरों की उम्मीदें कम होने से सोने और चांदी को सहारा मिल सकता है।

फिलहाल, US ट्रेजरी यील्ड, डॉलर, कच्चे तेल की कीमतें, जियोपॉलिटिकल घटनाक्रम और फेड के संकेत ही वे मुख्य कारक हैं जिन पर कीमती धातुओं की कीमतों में अगले बदलाव के लिए नज़र रखनी होगी।

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

El Nino Impact: क्या अल-नीनो बिगाड़ेगा भारत की जीडीपी का खेल? सिटीग्रुप के अर्थशास्त्री ने की ये प्रेडिक्शन 

Indian Economy and El Nino: अल-नीनो को लेकर जताई जा रही आशंकाओं के बीच देश की आर्थिक वृद्धि दर यानी GDP ग्रोथ को लेकर राहत भरी खबर आई है। ग्लोबल फाइनेंशियल फर्म सिटीग्रुप के एमडी और चीफ इकोनॉमिस्ट (इंडिया) समीरन चक्रवर्ती ने मनीकंट्रोल को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कहा कि अल-नीनो के कारण FY27 में भारत की जीडीपी ग्रोथ में 20 से 30 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आ सकती है, लेकिन गैर-ग्रामीण क्षेत्रों की मजबूत मांग इस नुकसान की भरपाई कर देगी।

सिटीग्रुप के अनुसार, बाजार में अल-नीनो का डर जितना पहले था, उसके मुकाबले अर्थव्यवस्था के हालिया आंकड़े काफी बेहतर रहे हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ता नहीं दिख रहा है।

ग्रामीण इलाकों से मिल रहे मजबूत संकेत

अल-नीनो की आशंकाओं के बावजूद ग्रामीण अर्थव्यवस्था से पॉजिटिव आंकड़े सामने आ रहे हैं। FADA के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जुलाई 2026 (FY27) के दौरान देश में ट्रैक्टरों की बिक्री में सालाना आधार पर 21% की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसी अवधि के दौरान टू-व्हीलर्स की बिक्री में भी 17% का उछाल देखने को मिला है।

समीरन चक्रवर्ती ने बताया कि ‘हाई-फ्रीक्वेंसी ग्रोथ नंबरों में अल-नीनो का खौफ नहीं दिखता। इस साल अल-नीनो का असर खरीफ के बजाय रबी पर अधिक हो सकता है।’

बारिश और खाद्य महंगाई की मौजूदा स्थिति

देश में मानसून और महंगाई के मोर्चे पर फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। जून में हुई कम बारिश के कारण कुल बारिश में 13% की कमी जरूर दर्ज की गई थी, लेकिन जुलाई और अगस्त में स्थिति में काफी सुधार हुआ है। बुवाई का रकबा भी पिछले साल के लगभग बराबर ही है। सब्जियों या अनाज की कीमतों में कोई असामान्य उछाल नहीं देखा गया है। जुलाई 2026 में खाद्य महंगाई दर 5.52% पर रही।

महंगाई को लेकर असली जोखिम वित्त वर्ष 2026-27 की चौथी तिमाही (जनवरी-मार्च 2027) में आ सकता है, अगर उस दौरान असामान्य रूप से ज्यादा गर्मी देखने को मिलती है।

न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी से बढ़ी ग्रामीण मांग

सिटीबैंक के अर्थशास्त्री का मानना है कि पिछले दो सालों से ग्रामीण इलाकों की मांग शहरी इलाकों से बेहतर बनी हुई है। 2025 से सभी राज्यों में न्यूनतम मजदूरी में दोहरे अंकों की वृद्धि हुई है।

पिछले 6-7 सालों में लेबर के मुकाबले कंपनियों का पलड़ा भारी था, लेकिन लेबर कानूनों के तहत हुए एकमुश्त वेज एडजस्टमेंट ने आम लोगों के हाथों में पैसा पहुंचाया है, जिससे मांग में तेजी आई है।

सरकारी प्रोत्साहन और क्रेडिट ग्रोथ का मिला सहारा

भारत में घरेलू मांग को बढ़ाने में पिछले साल दिए गए राजकोषीय और मौद्रिक प्रोत्साहन की बड़ी भूमिका रही है। इनकम टैक्स में छूट, जीएसटी दरों में कटौती और ब्याज दरों में कटौती जैसे कदमों ने बाजार में लिक्विडिटी बढ़ाई।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, 31 जुलाई 2026 तक देश के सभी शेड्यूल्ड बैंकों का कुल क्रेडिट ₹225.87 लाख करोड़ पहुंच गया, जो सालाना आधार पर लगभग 19% अधिक है।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (Q1FY27) में FMCG कंपनियों की बिक्री में जबरदस्त वॉल्यूम ग्रोथ देखने को मिली है, जो मजबूत उपभोक्ता मांग का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Retirement Planning: रिटायरमेंट के लिए क्या ₹1 करोड़ का फंड काफी है? एक्सपर्ट से समझें महंगाई और रिटर्न का पूरा गणित

Retirement Planning Calculation: भारतीय निवेशकों के बीच सालों से ₹1 करोड़ को रिटायरमेंट का एक मैजिक नंबर माना जाता रहा है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि एक बार बैंक खाते या म्यूचुअल फंड में ₹1 करोड़ आ गए, तो उनका बुढ़ापा आराम से कट जाएगा। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, आज के दौर में यह सोच बेहद खतरनाक साबित हो सकती है।

किसी व्यक्ति के लिए ₹1 करोड़ का कॉर्पस काफी हो सकता है, तो किसी के लिए ₹5 करोड़ भी कम पड़ सकते हैं। आपका रिटायरमेंट फंड कितना होना चाहिए, यह किसी राउंड फिगर पर नहीं बल्कि आपकी मासिक खर्चों, महंगाई दर, रिटायरमेंट की उम्र और लाइफ एक्सपेक्टेंसी पर निर्भर करता है। आइए एक्सपर्ट्स से समझते हैं रिटायरमेंट प्लानिंग का पूरा गणित।

क्यों फेल हो सकता है ₹1 करोड़ का ‘मैजिक नंबर’?

वाइज फिनसर्व के ग्रुप सीईओ और सीआईओ अजय कुमार यादव के अनुसार, ₹1 करोड़ की समस्या यह नहीं है कि यह छोटा अमाउंट है, बल्कि समस्या यह है कि यह नंबर आपके भविष्य की जीवनशैली के खर्चों को नहीं दर्शाता।

मान लीजिए कोई व्यक्ति 60 साल की उम्र में रिटायर होता है और 90 साल की उम्र (30 साल का रिटायरमेंट) तक का प्लान बनाता है। अगर ₹1 करोड़ पर 7% सालाना रिटर्न मिले, तो व्यक्ति हर महीने ₹66,500 की फिक्स्ड पेंशन ले सकता है।

अगर महंगाई दर केवल 5% सालाना भी मान ली जाए, तो आज का ₹66,500 का खर्च 10 साल बाद बढ़कर ₹1.08 लाख और 20 साल बाद ₹1.76 लाख प्रति माह हो जाएगा। यानी आपके पैसे की क्रय शक्ति तेजी से घटेगी और कुछ ही सालों में ₹1 करोड़ का फंड खत्म हो जाएगा।

इन्फ्लेशन-एडजस्टेड रिटर्न का असली गणित

अगर आपका पोर्टफोलियो 7% का रिटर्न देता है और महंगाई दर 5% रहती है, तो आपका वास्तविक या इन्फ्लेशन-एडजस्टेड रिटर्न केवल 2% ही रह जाता है। इस 2% वास्तविक रिटर्न के हिसाब से देखें, तो ₹1 करोड़ का फंड 30 सालों के लिए केवल ₹37,000 प्रति माह की ही परचेजिंग पावर दे पाएगा।

अगर कोई व्यक्ति हर महीने ₹1 लाख निकालना चाहता है और वह महंगाई को अनदेखा करता है, तो उसका ₹1 करोड़ का कॉर्पस 12.5 साल में खत्म होगा। लेकिन अगर महंगाई जोड़ दी जाए, तो यह फंड मात्र 9.1 साल यानी करीब 69 साल की उम्र तक में ही पूरी तरह खत्म हो जाएगा।

आपको रिटायरमेंट के लिए असल में कितने पैसों की जरूरत है?

रिटायरमेंट कॉर्पस की गणना हमेशा उल्टे क्रम से करनी चाहिए। मान लीजिए एक 40 वर्षीय व्यक्ति का आज का मासिक खर्च ₹1 लाख है और वह 60 साल में रिटायर होना चाहता है। 6% महंगाई दर पर 60 साल की उम्र में वही जीवनशैली बनाए रखने के लिए उसे प्रति माह ₹3.21 लाख यानी साल के करीब ₹38.49 लाख की आवश्यकता होगी।

कितना कॉर्पस चाहिए होगा?

बिना महंगाई एडजस्टमेंट (7% रिटर्न पर) 60 साल की उम्र में कम से कम ₹4.82 करोड़ का फंड चाहिए। 5% पोस्ट-रिटायरमेंट महंगाई जोड़ने पर यही फंड बढ़कर ₹8.68 करोड़ हो जाता है।

क्या है 30X रिटायरमेंट रूल?

ट्रैक (Trackk) के सह-संस्थापक और सीईओ वेदांत गुप्ते और अजय कुमार यादव के अनुसार, 30X रूल एक अच्छा शुरुआती अनुमान हो सकता है:

नियम: अपने रिटायरमेंट के पहले साल के कुल अनुमानित खर्च को 30 से गुणा कर दें।

उदाहरण: अगर रिटायरमेंट के पहले साल का खर्च ₹38.49 लाख है, तो ₹38.49 लाख × 30 = लगभग ₹11.55 करोड़ का कॉर्पस चाहिए।

यह बड़ा फंड आपको शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव, मेडिकल इमरजेंसी और लंबी उम्र जीने के जोखिम से सुरक्षा का बड़ा कवर देता है।

महंगाई के अलावा इन 3 बातों का रखें खास ध्यान

लाइफ एक्सपेक्टेंसी: अब औसतन लोग लंबा जीवन जी रहे हैं। अपनी वित्तीय योजना 75 या 80 साल के बजाय कम से कम 90 साल की उम्र मानकर बनाएं।

हेल्थकेयर कॉस्ट: इलाज का खर्च आम महंगाई की तुलना में दोगुनी तेजी से बढ़ता है। इसके लिए रिटायरमेंट फंड से अलग एक समर्पित मेडिकल एंड इमरजेंसी रिजर्व बनाएं।

कैश फ्लो पर ध्यान दें, गोल नंबर पर नहीं: ₹1 करोड़ या ₹5 करोड़ जैसे गोल नंबरों के पीछे भागने के बजाय यह तय करें कि रिटायरमेंट के बाद आपको हर महीने कितना कैश फ्लो चाहिए और आपका घर कहां मेट्रो शहर या टियर-2 शहर है।

आपके लिए क्या है सही रिटायरमेंट नंबर?

भारतीय निवेशकों के लिए कोई एक फिक्स्ड रिटायरमेंट नंबर नहीं हो सकता। ₹1 करोड़ एक शुरुआत का पड़ाव तो हो सकता है, लेकिन यह पूरा रिटायरमेंट प्लान नहीं है। आपका सही नंबर वह है जो आपकी जीवनशैली, स्वास्थ्य जरूरतों, पेंशन/रेंटल इनकम और महंगाई को जोड़कर तैयार होता है ताकि रिटायरमेंट के बाद आपके पैसे कभी खत्म न हों।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Share Market Crash: मजबूत एशियाई संकेतों के बावजूद Sensex लाल, 4 वजहों से आया Nifty आया 24300 के करीब

Share Market Crash: विदेशी निवेशकों की ताबड़तोड़ बिकवाली और लगातार दूसरे महीने आरबीआई के टारगेट रेंज से अधिक महंगाई की रफ्तार ने आज मार्केट पर तेज दबाव बनाया। वैश्विक मार्केट से मिले-जुले रुझानों के बीच सेंसेक्स 250 प्वाइंट्स से अधिक टूट गया तो निफ्टी भी फिसलकर 24300 के करीब आ गया। हालांकि ब्रोडर लेवल पर भी रुझान मिला-जुला है। निफ्टी मिडकैप 100 पर फिलहाल बिकवाली का दबाव है लेकिन निफ्टी स्मॉलकैप 100 ग्रीन है। अब घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज की बात करें तो फिलहाल 09:45 AM पर सेंसेक्स (Sensex) 159.82 प्वाइंट्स यानी 0.20% की गिरावट के साथ 77,806.53 और निफ्टी 50 (Nifty 50) भी 90.25 प्वाइंट्स यानी 0.37% की फिसलन के साथ 24,345.70 पर है। इंट्रा-डे में सेंसेक्स 256.72 प्वाइंट्स टूटकर 77,709.63 और निफ्टी 119.65 प्वाइंट्स गिरकर 24,316.30 तक आ गया था।

Share Market Crash: ये है वजह

महंगाई की तेज रफ्तार

जुलाई में महंगाई 19 महीने के ऊपरी स्तर पर पहुंच गई है। लगातार चौथे महीने इसमें इजाफा हुआ है और लगातार दूसरे महीने यह आरबीआई के 2-4% के टारगेट रेंज से ऊपर रहा। जुलाई में रिटेल महंगाई दर मासिक आधार पर 4.38% से बढ़कर 4.45% पर रही है। खाने-पीने की चीजों ने महंगाई बढ़ाई है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली

एक कारोबारी दिन पहले 12 अगस्त को विदेशी निवेशकों ने इक्विटी मार्केट में खरीदारी से अधिक बिकवाली की जिसका दबाव आज मार्केट में दिख रहा है। विदेशी निवेशकों ने ₹1002.50 करोड़ के शेयरों की नेट बिक्री की।

बैंकिंग स्टॉक्स में बिकवाली का दबाव

मार्केट को आज बैंकिंग शेयरों में बिकवाली का दबाव झेलना पड़ा है। सरकारी और प्राइवेट, दोनों सेक्टर्स के बैंकों के निफ्टी इंडेक्स में आधे-आधे फीसदी से अधिक की गिरावट है तो निफ्टी मेटल और निफ्टी फार्मा में भी आधे फीसदी की गिरावट है। निफ्टी ऑटो फिलहाल ग्रीन है लेकिन इसमें बढ़त आधे फीसदी से कम ही है।

Sensex की वीकली एक्सपायरी

सेंसेक्स के इंडेक्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की आज वीकली एक्सपायरी है तो इसका मार्केट पर दबाव दिख रहा है।

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Retail Inflation : लगातार चौथे महीने महंगाई बढ़ी, रिटेल इंफ्लेशन जुलाई में 4.45% हुई; RBI के लिए बढ़ेगी मुश्किल

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Asian Market: यूएस CPI आंकड़ों में नरमी से उछले एशिया मार्केट, कोस्पी 4% से ज्यादा चढ़ा

Asian Market: ज्यादातर एशिया बाजारों में तेजी देखने को मिल रही है। अनुमान के मुताबिक जुलाई महंगाई आंकड़ों का भी अमेरिकी बाजारों पर खास असर नहीं पड़ा। डाओ जोंस फ्लैट रहा, लेकिन चिप शेयरों में अच्छी तेजी से नैस्डेक आधे परसेंट से ज्यादा चला। उधर सेमीकंडक्टर शेयरों में खरीदारी से कोस्पी करीब 4 फीसदी ऊपर चढ़। निक्केई भी करीब डेढ़ परसेंट ऊपर बना हुआ।

दक्षिण कोरिया का कोस्पी (Kospi) इस क्षेत्र में सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला इंडेक्स रहा, जिसमें 4.48% की बढ़त हुई। जापान के निक्केई 225 (Nikkei 225) में 1.83% की बढ़त हुई, जबकि व्यापक टॉपिक्स (Topix) इंडेक्स 1.01% ऊपर चढ़ा। इसके उलट, हैंग सेंग (Hang Seng) फ्यूचर्स में 0.87% की गिरावट आई, जो व्यापक क्षेत्रीय तेज़ी के बावजूद हांगकांग बाज़ार में कुछ सावधानी का संकेत देता है।

ऑस्ट्रेलिया का बेंचमार्क S&P/ASX 200 उन प्रमुख इंडेक्स में एकमात्र ऐसा इंडेक्स था जिसमें गिरावट देखी गई। यह 0.12% नीचे आया।

वॉल स्ट्रीट (Wall Street)

बुधवार, 12 अगस्त को वॉल स्ट्रीट के बेंचमार्क इंडेक्स मिले-जुले रुख के साथ बंद हुए। जुलाई के महंगाई के आंकड़े उम्मीद के मुताबिक होने के बावजूद निवेशकों ने ज़्यादा उत्साह नहीं दिखाया।

डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज (Dow Jones Industrial Average) 240 अंकों के दायरे में ट्रेड करने के बाद लगभग बिना किसी बदलाव के बंद हुआ। वहीं, S&P 500 और नैस्डैक (Nasdaq) ने 30-स्टॉक वाले इंडेक्स से बेहतर प्रदर्शन किया और क्रमशः 0.3% और 0.5% की बढ़त दर्ज की।

जुलाई में महंगाई के आंकड़े कम रहने के बावजूद सप्ताह के बीच का ट्रेडिंग सेशन सुस्त रहा। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) महंगाई दर महीने-दर-महीने 0.1% और साल-दर-साल 3.4% बढ़ी।

कच्चे तेल की कीमतें

गुरुवार को तेल की कीमतों में $1 से ज़्यादा की गिरावट आई। विश्लेषकों ने 2026 में वैश्विक तेल मांग के अपने अनुमानों में कटौती की, जिसका कारण ईरान के साथ US-इजरायल संघर्ष से पैदा हुई रुकावटें थीं। हालांकि, संघर्ष के कारण सप्लाई में रुकावट की चिंताओं ने कीमतों में और गिरावट को सीमित रखा।

ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स $1.29 या 1.5% गिरकर $87.69 प्रति बैरल पर आ गया, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड $1.30 या 1.6% गिरकर $81.97 प्रति बैरल पर आ गया। एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के अनुसार, पिछले हफ़्ते US में कमर्शियल क्रूड ऑयल का स्टॉक उम्मीद से ज़्यादा बढ़ गया, जो जनवरी 2023 के बाद से सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़ोतरी थी। इस बढ़ोतरी की एक वजह एक्सपोर्ट में भारी गिरावट थी।

US-Iran युद्ध

इस जलमार्ग को फिर से खोलने की दिशा में प्रगति के बहुत कम संकेत मिले हैं, जबकि US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस रणनीतिक रास्ते पर वॉशिंगटन का “पूरा नियंत्रण” है।

US-Iran बातचीत में गतिरोध पैदा होता दिख रहा है क्योंकि दोनों पक्ष अपने कड़े रुख पर अड़े हुए हैं। वॉशिंगटन, तेहरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रखे हुए है। मध्यस्थता की कोशिशों में मदद कर रहे पाकिस्तान ने कहा कि व्यापक शांति प्रक्रिया रुक गई है, हालांकि US-Iran के बीच समझौते (MOU) की समय-सीमा अभी भी बढ़ाई जा सकती है।

मध्य पूर्व में युद्ध, रूस-यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष और बंदरगाहों व रिफाइनरियों समेत एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर बार-बार हो रहे हमलों ने ग्लोबल क्रूड और रिफाइंड-प्रोडक्ट मार्केट में स्थिति को और मुश्किल बना दिया है।

आज सोने की कीमत

US में महंगाई के आंकड़े उम्मीद से कम रहने के बाद फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने को लेकर तत्काल चिंताएं कम हुईं, जिससे सोने की कीमतें $4,400 प्रति औंस के आसपास काफी हद तक स्थिर रहीं।

बुधवार को 0.9% की बढ़त के बाद शुरुआती कारोबार में सोने की कीमतों में बहुत कम बदलाव हुआ। जुलाई में US कंज्यूमर कीमतों में महीने-दर-महीने सिर्फ़ 0.1% की बढ़ोतरी के आंकड़े सामने आए थे। स्पॉट गोल्ड 0.1% गिरकर $4,403.02 प्रति औंस पर आ गया।

Stock Market Live: गिफ्ट निफ्टी दे रहा संकेत, फ्लैट हो सकती है भारतीय बाजार की शुरुआत

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।