कल का मौसम 19 June: IMD ने बिहार समेत इन 12 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट दिया, 23 राज्यों में आएगा आंधी-तूफान, देखें Weather Alert

Kal ka Mausam 19 जून: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 19 जून के लिए देश का विशेष डेली वेदर बुलेटिन और चेतावनी जारी कर दी है। कल देश के कई राज्यों में मौसम के दो बेहद अलग रूप देखने को मिलेंगे। एक तरफ जहां मौसम विभाग ने बिहार और असम समेत देश के 12 राज्यों/क्षेत्रों में भारी से बहुत भारी बारिश का कड़ा अलर्ट दिया है। वहीं 23 राज्यों में गरज-चमक के साथ आंधी-तूफान और ओलावृष्टि का संकट मंडरा रहा है। उत्तर प्रदेश समेत कुछ राज्यों में लू का कहर भी जारी रहेगा।

मानसून की स्थिति: इन राज्यों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल

दक्षिण-पश्चिम मानसून की उत्तरी सीमा (NLM) फिलहाल हरनाई, सोलापुर, हैदराबाद, भद्राचलम, कोरापुट, फूलबनी, रांची, जमुई और मुजफ्फरपुर से होकर गुजर रही है। मौसम विभाग के अनुसार अगले 4-5 दिनों के दौरान मानसून के तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार के कुछ और हिस्सों तथा छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां पूरी तरह अनुकूल हैं।

बिहार और असम समेत इन 12 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट

19 जून को देश के कई हिस्सों में मूसलाधार बारिश होने की प्रबल संभावना है। असम व मेघालय और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल व सिक्किम के अलग-अलग हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट है। बिहार, अरुणाचल प्रदेश, दक्षिण भारत के तमिलनाडु, पुडुचेरी व कराइकल और पूर्वोत्तर के नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा के अलग-अलग पॉकेट्स में भारी बारिश होने की संभावना है।

बिहार और राजस्थान में 80 Kmph का भीषण महातूफान

19 जून को कुछ राज्यों में हवाओं की रफ्तार बेहद विनाशकारी हो सकती है। बिहार और पूर्वी राजस्थान दोनों ही इलाकों में 60-70 किमी/घंटे की रफ्तार से तीव्र झंझावाती तूफान चलने की आशंका है, जिसकी अधिकतम स्पीड 80 किलोमीटर प्रति घंटे (Gusting to 80 kmph) तक जा सकती है। झारखंड, ओडिशा, पश्चिमी मध्य प्रदेश और पश्चिमी राजस्थान इन चार क्षेत्रों में कल 50-60 किमी/घंटे की रफ्तार वाले थंडरस्क्वाल का अलर्ट जारी किया गया है। इसके साथ ही कल पश्चिमी राजस्थान में अलग-अलग स्थानों पर धूलभरी आंधी चलने की भी संभावना है।

दिल्ली-यूपी समेत देश के 23 राज्यों में आंधी-तूफान और बिजली का अलर्ट

19 जून को देश के कुल 23 राज्यों/क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर गरज-चमक, आकाशीय बिजली और तेज हवाओं का तांडव देखने को मिलेगा। दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर-लद्दाख, केरल व माहे, कोंकण व गोवा, मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा, विदर्भ, पूर्वी मध्य प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, तटीय आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तरी आंतरिक कर्नाटक और पश्चिम बंगाल व सिक्किम।

इन सभी क्षेत्रों में 40-50 किमी/घंटे की रफ्तार से धूलभरी हवाएं और आंधी चलने का अनुमान है। तटीय कर्नाटक, रायलसीमा और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में कल हल्की से मध्यम आंधी के साथ बिजली कड़कने की संभावना है। अरुणाचल प्रदेश, असम व मेघालय, छत्तीसगढ़ और नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम व त्रिपुरा में कल आकाशीय बिजली गिरने और गरज-चमक का अलर्ट है।

हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में ओले गिरने की चेतावनी

पहाड़ी राज्यों में कल आंधी-तूफान के साथ ओलावृष्टि की दोहरी मार पड़ने वाली है। मौसम विभाग के ताजा बुलेटिन के अनुसार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर-लद्दाख के अलग-अलग इलाकों में गरज-चमक के साथ ओले गिरने की गंभीर आशंका जताई गई है।

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी चलेगी भीषण हीट वेव

एक तरफ जहां देश का एक बड़ा हिस्सा आंधी और बारिश की चपेट में रहेगा, वहीं कुछ राज्यों में सूरज की तपिश और लू का कहर जारी रहेगा। उत्तर प्रदेश (पूर्वी और पश्चिमी), महाराष्ट्र (मध्य महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ) और तेलंगाना के अलग-अलग हिस्सों में भीषण लू चलने की संभावना है। उत्तर प्रदेश में यह स्थिति 24 जून तक लगातार बनी रह सकती है। आंध्र प्रदेश, गंगीय पश्चिम बंगाल, कोंकण व गोवा और ओडिशा में अत्यधिक उमस भरी गर्मी लोगों को बेहाल करेगी।

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El Nino Fear Impact: अल नीनो के डर से यहां किसानों ने पानी बचाने के लिए धान उगाने की टेक्नीक ही बदली! इससे हो रही बचत समझिए

El Nino Impact on Rice Farming: प्रशांत महासागर में अल नीनो (El Niño) के पैर पसारने और कम बारिश की आशंका के बीच आंध्र प्रदेश के किसानों ने एक चौंकाने वाला कदम उठाया है। सूखे और पानी की किल्लत के डर से यहां के किसानों ने पानी बचाने के लिए धान उगाने की अपनी पारंपरिक तकनीक से अलग हट कर काम करना शुरू किया है। किसान अब पारंपरिक रूप से धान के खेतों को पानी से लबालब भरने के बजाय आधुनिक और कम पानी लेने वाली तकनीकों को अपना रहे हैं, जिससे लाखों लीटर पानी की बचत हो रही है।

पीटीआई की रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जेआर पुरम गांव के एक ऐसे ही किसान की कहानी बताई गई है। 52 वर्षीय किसान मज्जी सत्यम के एक ऐसे ही के पास 5 एकड़ जमीन और दो बोरवेल हैं। वे जीवनभर अपने पिता के सिखाए पारंपरिक तरीके से ही धान उगाते रहे हैं। यानी पहले नर्सरी में पौधे तैयार करना फिर उन्हें पानी से लबालब भरे खेतों में ट्रांसप्लांट (रोपाई) करना और कटाई तक खेतों में पानी जमा रखना।

इस खरीफ सीजन में अल नीनो के कारण कम बारिश की आशंका को देखते हुए सत्यम ने अपनी तकनीक बदल दी है। सत्यम ने पीटीआई को बताया कि, ‘पिछले साल मई में ही बारिश आ गई थी। इस साल अभी तक नहीं आई है। मैंने सुना है कि अल नीनो के कारण इस बार बारिश कम होगी। इसलिए मैंने DSR आजमाने का फैसला किया है।’

क्या है DSR तकनीक?

DSR यानी डायरेक्ट सीडेड राइस (Direct Seeded Rice – धान की सीधी बुआई)। इस तकनीक में नर्सरी तैयार करने की बिल्कुल जरूरत नहीं होती। इसमें बीज सीधे मुख्य खेत में बोए जाते हैं। इसमें न तो रोपाई की जरूरत पड़ती है, न ही खेतों में पानी जमा रखने या कीचड़ बनाने की आवश्यकता होती है। कम मानसून की मार झेलने वाले किसानों के लिए यह तकनीक एक बेहतरीन विकल्प बनकर उभरी है।

एक एकड़ में बचता है 12 लाख लीटर पानी

पारंपरिक धान की खेती में अत्यधिक पानी की खपत होती है। इसके मुकाबले डीओएसआर (DSR) और एडब्ल्यूडी (AWD – अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग) तकनीकें पानी की जरूरतों को काफी कम कर देती हैं। AWD एक ऐसी तकनीक है जिसमें खेतों को लगातार पानी में डुबोकर रखने के बजाय चक्रों में पानी दिया और सुखाया जाता है।

डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन के निदेशक (ग्रामीण आजीविका और जलवायु कार्रवाई) सुमन सारस्वतीभटला ने बचत के आंकड़े बताते हुए कहा कि ड्राय डीएसआर पारंपरिक तरीकों की तुलना में प्रति एकड़ लगभग 11 से 12 लाख लीटर पानी बचाता है।

इसी तरह वेट डीएसआर प्रति एकड़ लगभग 4 से 5.5 लाख लीटर पानी की बचत करता है। AWD पारंपरिक खेती के मुकाबले लगभग 3 से 5 लाख लीटर पानी बचाता है। दोनों तकनीकों के सही ढंग से काम करने के लिए खेत के ऊपरी 30-40 सेंटीमीटर हिस्से में मिट्टी की नमी का लगातार बने रहना बेहद महत्वपूर्ण है, जो यह तय करता है कि किसानों को कब और कैसे बुआई करनी है।

3000 करोड़ लीटर पानी की हुई रिकॉर्ड बचत

सत्यम अकेले ऐसे किसान नहीं हैं। श्रीकाकुलम और विजयनगरम जिलों के 1500 से अधिक गांवों में करीब 10 लाख एकड़ धान के क्षेत्र में किसानों को एक्शन फॉर क्लाइमेट एंड एनवायरनमेंट (ACE) कार्यक्रम के तहत पानी की अधिक खपत वाली पारंपरिक खेती से दूर ले जाया जा रहा है। यह पहल फार्मा क्षेत्र की प्रमुख कंपनी डॉ रेड्डीज लैबोरेटरीज के सीएसआर (CSR) फंड के सहयोग से संचालित डॉ. रेड्डीज फाउंडेशन द्वारा की जा रही है।

पिछले साल इन दोनों जिलों के किसानों ने 3667 एकड़ में DSR और 21963 एकड़ में AWD तकनीक को अपनाया था। इस वजह से 3000 करोड़ लीटर से अधिक पानी की बचत हुई और 50000 टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन में कमी आई। अल नीनो के दोबारा पूर्वानुमान को देखते हुए इस साल इन आंकड़ों में और बड़ी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।

इसी गांव के एक अन्य 50 वर्षीय किसान आर सन्यास राव पिछले साल से ही 5 एकड़ में वेट डीएसआर का सफल प्रयोग कर रहे हैं। इससे उनकी मजदूरी की लागत घट गई और नर्सरी व रोपाई का झंझट खत्म हो गया। इस साल वे दो एकड़ में ड्राय डीएसआर और तीन एकड़ में मक्के की खेती कर रहे हैं।

सरकारी कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र भी किसानों को धान का रकबा घटाने, कम समय वाली फसलों या दालों और अनाजों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। सत्यम का कहना है कि अगर अल नीनो गंभीर हुआ, तो हम सिर्फ घर के खाने के लिए ही धान उगाएंगे।

बदल गया बुआई का कैलेंडर और बढ़ाई गई मिट्टी की सेहत

चक्रवात और बारिश पर निर्भर रहने वाले इस बेल्ट (श्रीकाकुलम) में बुआई का पारंपरिक समय पहले ही बदल चुका है। पहले जहां धान जून के अंत में बोया जाता था, वहीं पिछले 3-4 वर्षों में यह जुलाई में शिफ्ट हो गया है और मुख्य रोपाई अगस्त तक चली जाती है। इस खाली समय का उपयोग करने के लिए फाउंडेशन किसानों को खरीफ शुरू होने से पहले (मई-जून की अवधि में) कम समय वाली कवर फसलें जैसे उड़द, मूंग और तिल उगाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

इसके अलावा पटसन और नेपियर जैसी हरी खाद वाली फसलें मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद करती हैं। पिछले साल 2372 एकड़ में कवर फसलें और 1508 एकड़ में एग्रो-फॉरेस्ट्री (नारियल के बगीचों में इमारती लकड़ी और फलों के पौधे लगाना) की गई थी।

मिट्टी की जांच और डिजिटल सलाह

श्रीकाकुलम की मिट्टी के स्वास्थ्य में भी गिरावट देखी जा रही है। फाउंडेशन ने जनवरी 2025 में हैदराबाद में अपनी अत्याधुनिक सुविधा शुरू की है। इसके माध्यम से किसानों को त्वरित मिट्टी जांच रिपोर्ट और फसल संबंधी सलाह दी जा रही है। पिछले साल 5000 से अधिक सॉयल हेल्थ कार्ड जारी किए गए। इनमें पाया गया कि मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर बहुत कम है।

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सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है जबकि पोटाश की मात्रा अधिक है। इस साल अल नीनो के प्रभाव और उर्वरकों की कमी को देखते हुए विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों से बल्क एसएमएस, पोस्टर और किसान बैठकों के माध्यम से किसानों को आदत या सुविधा के बजाय मिट्टी की जरूरत के हिसाब से सटीक खाद डालने के लिए जागरूक किया जा रहा है।

El Nino Impact: क्या भारत के मछली मार्केट पर भी कहर बनकर टूटने वाला है अल नीनो? फिशिंग इंडस्ट्री पर इसके असर को समझिए

El Nino Impact on Indian Fisheries: इस वक्त भारतीय मानसूनस और इसपर डिपेंड खेती किसानी के बीच सबसे अधिक चर्चा अल-नीनो को लेकर हो रही है। ऐसी आशंकाएं उठ रही हैं कि क्या अल नीनो भारत में तांडव मचाएगा? भारत सरकार ने भी इसे लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे 12 राज्य चिन्हित किए गए हैं जिनपर अल नीनो का सर्वाधिक असर देखने को मिल सकता है। ऐसे में हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर में बताया गया है कि अल नीनो का खतरा सिर्फ मानसूनी बारिश या खेती पर ही नहीं है बल्कि इसका एक बड़ा और खतरनाक असर मछली बाजार और पूरी फिशिंग इंडस्ट्री पर भी पड़ सकता है। आइए इस खतरे को समझते हैं।

आपको बता दें कि हाल ही में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने और दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान इसके और मजबूत होने की घोषणा की है। इससे ठीक एक दिन पहले अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने भी अल नीनो के उभरने की पुष्टि करते हुए अनुमान जताया था कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसके बेहद मजबूत होने की 63 प्रतिशत संभावना है। अब तक अल नीनो के आते ही सिर्फ सूखे, कम बारिश और फसलों के नुकसान पर चर्चा होती रही है लेकिन इसका एक बड़ा असर भारत के समुद्री जीवन और मछुआरों की आजीविका पर पड़ने जा रहा है।

समंदर के भीतर कैसे उथल-पुथल मचाता है अल नीनो?

रिपोर्ट के मुताबिक अल नीनो तब विकसित होता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। वैसे तो यह घटना भारत से हजारों किलोमीटर दूर होती है लेकिन यह पूरे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर् को बदल देती है। इसके चलते मानसून की बारिश, समुद्र का तापमान और समुद्री उत्पादकता सीधे तौर पर प्रभावित होती है। मछलियां इन पर्यावरणीय बदलावों के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। आईआईटी दिल्ली के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी की असिस्टेंट प्रोफेसर मोनिका मकवाना बताती हैं कि अल नीनो उन ट्रेड विंड्स को कमजोर कर देता है जो समुद्री परिसंचरण और अपवेलिंग (Upwelling – समुद्र की गहराई से पोषक तत्वों का ऊपर आना) को संचालित करती हैं। अरब सागर में समुद्री उत्पादकता पूरी तरह मानसून आधारित अपवेलिंग पर निर्भर है। हवाएं कमजोर होने से सतह के पानी तक पोषक तत्वों की सप्लाई घट जाती है। इससे मछलियों के फूड नेट कमजोर हो जाता है।

वहीं बंगाल की खाड़ी अपनी अर्ध-बंद भौगोलिक स्थिति और नदियों से आने वाले मीठे पानी के बड़े प्रवाह के कारण अलग तरह से प्रतिक्रिया करती है। अल नीनो के दौरान वहां भी समुद्र की सतह का तापमान बढ़ सकता है और समुद्री हीटवेव की घटनाएं अधिक बार देखने को मिल सकती हैं।

इंडियन ऑयल सारडीन और मैकेरल मछलियों पर सीधा असर

वैज्ञानिकों ने भारतीय समुद्रों में अल नीनो के इन प्रभावों को दर्ज किया है। केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु में आने वाला यह बदलाव व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों जैसे कि ऑयल सारडीन (Oil Sardine) और इंडियन मैकेरल (Indian Mackerel) के डिस्ट्रिब्यूशन, उनकी संख्या और मौसमी व्यवहार को प्रभावित करता है। दक्षिण-पूर्वी अरब सागर के शोध बताते हैं कि मैकेरल मछली की पकड़ सीधे तौर पर बारिश, समुद्र की उत्पादकता और अल नीनो व ला नीना से जुड़े व्यापक जलवायु पैटर्न से जुड़ी हुई है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के शोधकर्ता इमरान समद का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में सारडीन और मैकेरल की पकड़ में जो उतार-चढ़ाव आ रहे हैं, उसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारक है।

सारडीन मछली की कहानी

जलवायु और मत्स्य पालन के संबंध को समझने के लिए भारतीय ऑयल सारडीन सबसे सटीक उदाहरण है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सारडीन की संख्या में उतार-चढ़ाव का सीधा संबंध समुद्र के तापमान, मानसून पैटर्न और भोजन की उपलब्धता से है। मानसून के दौरान अरब सागर में होने वाली अपवेलिंग गहराई से पोषक तत्वों को ऊपर लाती है। इससे प्लवक (plankton – सूक्ष्म जीव) की वृद्धि होती है। यही सारडीन का मुख्य भोजन हैं। प्रोफेसर मोनिका मकवाना बताती हैं कि समुद्र का पानी गर्म और अधिक स्तरीकृत होने से फाइटोप्लांकटन की वृद्धि रुक जाती है, जो समुद्री खाद्य जाल की नींव है। बढ़ता तापमान मछलियों की शारीरिक और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है। इससे उनका आकार छोटा हो जाता है। सारडीन का परिपक्व होना मानसून-पूर्व के महीनों में अपवेलिंग द्वारा लाए जाने वाले ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर पानी पर निर्भर करता है। गर्म पानी के कारण उनके अंडे देने की प्रक्रिया में देरी हो जाती है या यह पूरी तरह विफल हो सकती है।

जगह बदल रही हैं मछलियां

समंदर के गर्म होने से मछलियों के पाए जाने वाले पारंपरिक ठिकाने भी बदल रहे हैं। कई महत्वपूर्ण व्यावसायिक मछलियों ने समुद्र की बदलती स्थितियों के कारण अपनी सीमाओं का विस्तार किया है। उदाहरण के लिए ऑयल सारडीन जो पारंपरिक रूप से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट (जैसे केरल) पर केंद्रित थी, अब भारत के उत्तरी और पूर्वी तटों के उन हिस्सों में भी फैल गई है, जहां पहले इसकी संख्या बहुत कम थी। मछलियों के इस तरह जगह बदलने से मछुआरों के सामने अनिश्चितता का संकट खड़ा हो गया है। उनके पारंपरिक मछली पकड़ने के क्षेत्र कम उत्पादक होते जा रहे हैं, जबकि मछलियां अब अपरिचित इलाकों में दिखाई दे रही हैं।

फिशिंग इंडस्ट्री और छोटे मछुआरों पर तिहरी मार

समुद्र के गर्म होने से केवल मछलियों की आबादी प्रभावित नहीं हो रही है बल्कि इससे तटीय इलाकों में चक्रवात का खतरा और समुद्री हीटवेव की तीव्रता भी बढ़ जाती है। मछुआरा समुदायों के लिए यह स्थिति तिहरी मार जैसी साबित होती है। ऐसे में मछली की पकड़ कम हो जाती है। खराब मौसम के कारण समंदर में जाने वाले दिनों की संख्या घट जाती है। चक्रवात और तूफानों में नावें और मछली पकड़ने के गियर (जाल आदि) खराब हो जाते हैं, जिससे बाजार ठप हो जाते हैं और मछुआरे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।

प्रोफेसर मकवाना के मुताबिक इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जिनकी नुकसान बर्दाश्त करने की क्षमता सबसे कम है। छोटे पैमाने के पारंपरिक मछुआरों के पास न तो गहरे समंदर में जाने के लिए मशीनीकृत नावें होती हैं, न ही उनके पास कोई बड़ी बचत या जोखिम-प्रबंधन प्रणाली (बीमा आदि) होती है।

भविष्य का एक ट्रेलर है अल नीनो

सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो का यह प्रभाव अब किसी स्थिर जलवायु पर नहीं बल्कि पहले से गर्म हो रहे पर्यावरण पर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के समुद्र पहले से ही गर्म हो रहे हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में अल नीनो के कारण होने वाले नुकसान और अधिक गंभीर और स्पष्ट रूप से सामने आएंगे। मोनिका मकवाना कहती हैं कि अल नीनो की घटनाओं को पृथ्वी के भविष्य के एक ट्रेलर के रूप में देखा जा सकता है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग अंततः स्थायी बना देगी।