El Nino Impact: क्या भारत के मछली मार्केट पर भी कहर बनकर टूटने वाला है अल नीनो? फिशिंग इंडस्ट्री पर इसके असर को समझिए

El Nino Impact on Indian Fisheries: इस वक्त भारतीय मानसूनस और इसपर डिपेंड खेती किसानी के बीच सबसे अधिक चर्चा अल-नीनो को लेकर हो रही है। ऐसी आशंकाएं उठ रही हैं कि क्या अल नीनो भारत में तांडव मचाएगा? भारत सरकार ने भी इसे लेकर तैयारियां शुरू कर दी हैं। ऐसे 12 राज्य चिन्हित किए गए हैं जिनपर अल नीनो का सर्वाधिक असर देखने को मिल सकता है। ऐसे में हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर में बताया गया है कि अल नीनो का खतरा सिर्फ मानसूनी बारिश या खेती पर ही नहीं है बल्कि इसका एक बड़ा और खतरनाक असर मछली बाजार और पूरी फिशिंग इंडस्ट्री पर भी पड़ सकता है। आइए इस खतरे को समझते हैं।

आपको बता दें कि हाल ही में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने प्रशांत महासागर में अल नीनो के विकसित होने और दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान इसके और मजबूत होने की घोषणा की है। इससे ठीक एक दिन पहले अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने भी अल नीनो के उभरने की पुष्टि करते हुए अनुमान जताया था कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसके बेहद मजबूत होने की 63 प्रतिशत संभावना है। अब तक अल नीनो के आते ही सिर्फ सूखे, कम बारिश और फसलों के नुकसान पर चर्चा होती रही है लेकिन इसका एक बड़ा असर भारत के समुद्री जीवन और मछुआरों की आजीविका पर पड़ने जा रहा है।

समंदर के भीतर कैसे उथल-पुथल मचाता है अल नीनो?

रिपोर्ट के मुताबिक अल नीनो तब विकसित होता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। वैसे तो यह घटना भारत से हजारों किलोमीटर दूर होती है लेकिन यह पूरे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में वायुमंडलीय परिसंचरण पैटर् को बदल देती है। इसके चलते मानसून की बारिश, समुद्र का तापमान और समुद्री उत्पादकता सीधे तौर पर प्रभावित होती है। मछलियां इन पर्यावरणीय बदलावों के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। आईआईटी दिल्ली के स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी की असिस्टेंट प्रोफेसर मोनिका मकवाना बताती हैं कि अल नीनो उन ट्रेड विंड्स को कमजोर कर देता है जो समुद्री परिसंचरण और अपवेलिंग (Upwelling – समुद्र की गहराई से पोषक तत्वों का ऊपर आना) को संचालित करती हैं। अरब सागर में समुद्री उत्पादकता पूरी तरह मानसून आधारित अपवेलिंग पर निर्भर है। हवाएं कमजोर होने से सतह के पानी तक पोषक तत्वों की सप्लाई घट जाती है। इससे मछलियों के फूड नेट कमजोर हो जाता है।

वहीं बंगाल की खाड़ी अपनी अर्ध-बंद भौगोलिक स्थिति और नदियों से आने वाले मीठे पानी के बड़े प्रवाह के कारण अलग तरह से प्रतिक्रिया करती है। अल नीनो के दौरान वहां भी समुद्र की सतह का तापमान बढ़ सकता है और समुद्री हीटवेव की घटनाएं अधिक बार देखने को मिल सकती हैं।

इंडियन ऑयल सारडीन और मैकेरल मछलियों पर सीधा असर

वैज्ञानिकों ने भारतीय समुद्रों में अल नीनो के इन प्रभावों को दर्ज किया है। केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के अध्ययनों से पता चला है कि जलवायु में आने वाला यह बदलाव व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों जैसे कि ऑयल सारडीन (Oil Sardine) और इंडियन मैकेरल (Indian Mackerel) के डिस्ट्रिब्यूशन, उनकी संख्या और मौसमी व्यवहार को प्रभावित करता है। दक्षिण-पूर्वी अरब सागर के शोध बताते हैं कि मैकेरल मछली की पकड़ सीधे तौर पर बारिश, समुद्र की उत्पादकता और अल नीनो व ला नीना से जुड़े व्यापक जलवायु पैटर्न से जुड़ी हुई है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) के सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के शोधकर्ता इमरान समद का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में सारडीन और मैकेरल की पकड़ में जो उतार-चढ़ाव आ रहे हैं, उसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारक है।

सारडीन मछली की कहानी

जलवायु और मत्स्य पालन के संबंध को समझने के लिए भारतीय ऑयल सारडीन सबसे सटीक उदाहरण है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि सारडीन की संख्या में उतार-चढ़ाव का सीधा संबंध समुद्र के तापमान, मानसून पैटर्न और भोजन की उपलब्धता से है। मानसून के दौरान अरब सागर में होने वाली अपवेलिंग गहराई से पोषक तत्वों को ऊपर लाती है। इससे प्लवक (plankton – सूक्ष्म जीव) की वृद्धि होती है। यही सारडीन का मुख्य भोजन हैं। प्रोफेसर मोनिका मकवाना बताती हैं कि समुद्र का पानी गर्म और अधिक स्तरीकृत होने से फाइटोप्लांकटन की वृद्धि रुक जाती है, जो समुद्री खाद्य जाल की नींव है। बढ़ता तापमान मछलियों की शारीरिक और मेटाबॉलिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है। इससे उनका आकार छोटा हो जाता है। सारडीन का परिपक्व होना मानसून-पूर्व के महीनों में अपवेलिंग द्वारा लाए जाने वाले ठंडे और पोषक तत्वों से भरपूर पानी पर निर्भर करता है। गर्म पानी के कारण उनके अंडे देने की प्रक्रिया में देरी हो जाती है या यह पूरी तरह विफल हो सकती है।

जगह बदल रही हैं मछलियां

समंदर के गर्म होने से मछलियों के पाए जाने वाले पारंपरिक ठिकाने भी बदल रहे हैं। कई महत्वपूर्ण व्यावसायिक मछलियों ने समुद्र की बदलती स्थितियों के कारण अपनी सीमाओं का विस्तार किया है। उदाहरण के लिए ऑयल सारडीन जो पारंपरिक रूप से भारत के दक्षिण-पश्चिम तट (जैसे केरल) पर केंद्रित थी, अब भारत के उत्तरी और पूर्वी तटों के उन हिस्सों में भी फैल गई है, जहां पहले इसकी संख्या बहुत कम थी। मछलियों के इस तरह जगह बदलने से मछुआरों के सामने अनिश्चितता का संकट खड़ा हो गया है। उनके पारंपरिक मछली पकड़ने के क्षेत्र कम उत्पादक होते जा रहे हैं, जबकि मछलियां अब अपरिचित इलाकों में दिखाई दे रही हैं।

फिशिंग इंडस्ट्री और छोटे मछुआरों पर तिहरी मार

समुद्र के गर्म होने से केवल मछलियों की आबादी प्रभावित नहीं हो रही है बल्कि इससे तटीय इलाकों में चक्रवात का खतरा और समुद्री हीटवेव की तीव्रता भी बढ़ जाती है। मछुआरा समुदायों के लिए यह स्थिति तिहरी मार जैसी साबित होती है। ऐसे में मछली की पकड़ कम हो जाती है। खराब मौसम के कारण समंदर में जाने वाले दिनों की संख्या घट जाती है। चक्रवात और तूफानों में नावें और मछली पकड़ने के गियर (जाल आदि) खराब हो जाते हैं, जिससे बाजार ठप हो जाते हैं और मछुआरे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।

प्रोफेसर मकवाना के मुताबिक इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा खामियाजा उन लोगों को भुगतना पड़ता है जिनकी नुकसान बर्दाश्त करने की क्षमता सबसे कम है। छोटे पैमाने के पारंपरिक मछुआरों के पास न तो गहरे समंदर में जाने के लिए मशीनीकृत नावें होती हैं, न ही उनके पास कोई बड़ी बचत या जोखिम-प्रबंधन प्रणाली (बीमा आदि) होती है।

भविष्य का एक ट्रेलर है अल नीनो

सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल नीनो का यह प्रभाव अब किसी स्थिर जलवायु पर नहीं बल्कि पहले से गर्म हो रहे पर्यावरण पर पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण भारत के समुद्र पहले से ही गर्म हो रहे हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में अल नीनो के कारण होने वाले नुकसान और अधिक गंभीर और स्पष्ट रूप से सामने आएंगे। मोनिका मकवाना कहती हैं कि अल नीनो की घटनाओं को पृथ्वी के भविष्य के एक ट्रेलर के रूप में देखा जा सकता है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग अंततः स्थायी बना देगी।