Daily Voice: बाजार में अभी डिफेंसिव नजरिया बनाए रखने की जरूरत, लंबी अवधि में इंश्योरेंस सेक्टर दिखाएगा कमाल

Daily Voice : कोर महंगाई की चाल को देखते हुए 2027 की शुरुआत में फेड फंड्स रेट में एक और बढ़ोतरी संभव है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। भारत की आर्थिक विकास दर 6.5% से 7% के बीच स्थिर रहेगी। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। इंश्योरेंस सेक्टर में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना दिख रही है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन से इस सेक्टर को सपोर्ट मिलेगा। ये बातें वॉटरफ़ील्ड एडवाइज़र्स के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर और इक्विटीज़ हेड विपुल भोवर ने मनीकंट्रोल के साथ हुई एक बातचीत में कही हैं।

क्या आप US ट्रेज़री मार्केट को ग्लोबल मार्केट के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यूएस का बॉन्ड मार्केट,ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम की नींव है। इस मार्केट में होने वाले स्ट्रक्चरल बदलाव आज ग्लोबल मार्केट पर असर डालने वाले सबसे अहम मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर हैं। जब “रिस्क-फ्री” US सॉवरेन डेट से अच्छा रिटर्न मिलता है तो यह ग्लोबल एसेट एलोकेशन की रणनीतियों को पूरी तरह से बदल देता है।

ट्रेजरी यील्ड के बढ़ने से ग्लोबल इक्विटी मल्टीपल्स पर दबाव पड़ता है और दुनिया भर की कंपनियों के लिए कर्ज लेने की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकते हैं,कैपिटल एक्सपेंडिचर में रुकावट आ सकती है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

क्या अमेरिका की वित्तीय स्थिति टिकाऊ नहीं लगती?

इस पर उन्होंने आगे कहा कि जरूरी खर्च और ब्याज पर होने वाले भारी खर्च(जो इस साल 1 ​​लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो गए हैं) में लगातार बढ़ोतरी से एक ढांचागत असंतुलन पैदा हो रहा है। अगर बड़े नीतिगत सुधार नहीं किए गए तो कर्ज का यह बढ़ता बोझ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को घटा सकता है और भविष्य में आर्थिक मजबूती में बाधा डाल सकता है।

कांग्रेसनल बजट ऑफिस का अनुमान है कि 2026 में फ़ेडरल घाटा लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा,जो अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 6 प्रतिशत है। इसके चलते अमेरिकी जनता पर मौजूद कर्ज GDP के 100 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा।

क्या आपको उम्मीद है कि इस साल के आखिर तक US फ़ेडरल रिज़र्व दो और बार ब्याज दरें बढ़ाएगा और उसके बाद अगले साल की पहली तिमाही में एक और बढ़ोतरी करेगा?

सितंबर 2026 में चेयरमैन केविन वॉर्श की अगुवाई में फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की,जिससे ये दरें 3.75 प्रतिशत से 4.00 प्रतिशत की रेंज में आ गईं। ‘डॉट प्लॉट’ से पता चला कि FOMC के 18 में से 16 सदस्यों को उम्मीद है कि इस साल कम से कम एक बार और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी होगी,हालांकि सिर्फ़ चार सदस्यों को दो और बार बढ़ोतरी की उम्मीद है।

एनर्जी की बढ़ती लागत की वजह से आई महंगाई इस सख्ती को सही ठहराती है। कोर महंगाई के ट्रेंड को देखते हुए 2027 की शुरुआत में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी हो सकती है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए,हालांकि इस साल एक और बढ़ोतरी की संभावना है,लेकिन दो और बार बढ़ोतरी होने की संभावना कम है।

क्या आपको लगता है कि भारत की विकास दर 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास स्टेबल हो जाएगी?

भारत की आर्थिक विकास दर के 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच स्टेबल होने की उम्मीद है। IMF ने वित्त वर्ष 2026 और 2027 के लिए 6.5 प्रतिशत GDP विकास दर का अनुमान लगाया है। महामारी के बाद के असर, सरकारी खर्च और रुकी हुई मांग की वजह से भारत में विकास दर 7.8 प्रतिशत के करीब रही है, लेकिन बेस इफ़ेक्ट के कम होने और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव व ऊंची ब्याज दरों जैसी ग्लोबल चुनौतियों के कारण इतनी ऊंची दरें शायद लंबे समय तक बनी न रह पाएं। हालांकि, 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर के साथ भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

अमेरिकी डॉलर में बढ़ोतरी के अहम कारण क्या हैं?

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज पर ज़्यादा यील्ड (रिटर्न) मुख्य रूप से महंगाई के दबाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित होती है, जो ग्लोबल इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करती हैं। इसके अलावा, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता बढ़ने से जोखिम से बचने वाले निवेशक अमेरिकी डॉलर से मिलने वाली सुरक्षा और लिक्विडिटी की ओर आकर्षित होते हैं। इसके अलावा,अमेरिकी टेक्नोलॉजी शेयरों में भारी विदेशी निवेश और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर होने वाला खर्च डॉलर की मांग को और बढ़ा रहा है। दूसरे G10 देशों की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मज़बूती, डॉलर की स्थिति को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी के तौर पर और मजबूत कर रही है।

क्या आप इक्विटी को लेकर इसलिए सतर्क हैं कि तेल की कीमतें ज़्यादा हैं और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ रही हैं या आपकी इस सोच के पीछे कोई और भी वजह है?

तेल की ऊंची कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई की चिंताएं भी हैं। ऐसे में,मौजूदा महंगे वैल्यूएशन को बनाए रखने के लिए बाजार में अभी तुरंत पॉजिटिव असर डालने वाली कोई वजह नहीं दिख रही है। ऐसे में जब तक अर्निंग्स की साफ तस्वीर नहीं दिखती या वैल्यूएशन में जरूरी टाइम करेक्शन नहीं होता,तब तक डिफेंसिव रुख अपनाना ही बेहतर है।

क्या आपको भारत में भी ब्याज दरें बढ़ाने का दौर शुरू होता दिख रहा है?

उम्मीद है कि भारत में ब्याज दरें बढ़ाने का दौर अक्टूबर 2026 में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक से शुरू होगा। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने फरवरी 2023 से रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है, लेकिन घरेलू और ग्लोबल स्तर पर बढ़ते दबावों के कारण इसमें बदलाव की जरूरत है।

कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाने और रुपये की कीमत घटने की वजह से खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। ग्लोबल फाइनेंशियल हालात के खराब होने के साथ,अर्थशास्त्रियों को दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे दर बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी और सख्ती का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।

क्या आपको लगता है कि मौजूदा स्तरों पर इंश्योरेंस सेक्टर में खरीदारी का मौका है?

भारत में इंश्योरेंस मार्केट की पहुंच अभी भी काफी कम है और 2026 से 2030 के बीच सालाना प्रीमियम ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन की वजह से यह सेक्टर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना रखता है।

 

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UP-EDGE Project: योगी सरकार का पूर्वांचल पर मेगा प्लान! 28 जिलों की बदलने वाली है किस्मत, ₹2,500 करोड़ से होगा ये बदलाव

UP-EDGE Project: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा प्लान तैयार किया है। विश्व बैंक (World Bank) के सहयोग से ₹2,500 करोड़ की UP-EDGE प्रोजेक्ट प्रस्तावित की गई है। पांच साल तक चलने वाली इस परियोजना का मकसद पूर्वांचल के जिलों में स्थानीय क्षमता के आधार पर रोजगार, आय और निवेश के नए अवसर तैयार करना है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंगलवार (22 सितंबर) को कहा कि वह पूर्वांचल क्षेत्र के 28 जिलों को समर्पित एक परियोजना शुरू करेगी।

इसका उद्देश्य स्थानीय संसाधनों को निवेश, रोजगार, उद्यमिता और निर्यात के अवसरों में बदलना है। विश्व बैंक के सहयोग से शुरू की जाने वाली उत्तर प्रदेश सक्षम जिला-आधारित आर्थिक विकास (UP-EDGE) परियोजना पूर्वांचल क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन को भी मजबूत करेगी।

28 जिलों को मिलेगा फायदा

UP-EDGE यानी UP Enabling District-Led Economic Growth Project के तहत फिलहाल पूर्वांचल के 28 जिलों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा बुंदेलखंड के सात जिलों को भी परियोजना में शामिल किए जाने की संभावना है। इस प्रोजेक्ट को विश्व बैंक के सहयोग से लागू किया जाना प्रस्तावित है।

बैठक में परियोजना की प्रारंभिक रिपोर्ट यानी PPR को भारत सरकार को भेजने समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। राज्य सरकार की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विश्व बैंक के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में परियोजना के विभिन्न प्रस्तावित घटकों पर चर्चा की गई। इनमें प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (PPR) को भारत सरकार को भेजना भी शामिल है।

बुंदेलखंड के सात जिले शामिल

विश्व बैंक के प्रैक्टिस मैनेजर हून सोह, लीड इकोनॉमिस्ट ऑरेलियन क्रॉस, सीनियर इकोनॉमिस्ट विंसेंट बेलिंगा और सीनियर स्पेशलिस्ट नेहा गुप्ता के साथ हुई बैठक में बताया गया कि यूपी-एज प्रोजेक्ट पूर्वांचल के 28 जिलों के लिए तैयार की गई है। बयान के मुताबिक, बुंदेलखंड के सात जिलों को भी इस परियोजना में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। करीब 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना की अवधि पांच साल होगी।

पूर्वांचल में उत्तर प्रदेश की करीब 40% आबादी

बैठक में बताया गया कि पूर्वांचल में यूपी की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 27.6 प्रतिशत है। क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत से करीब 45 फीसदी कम है। लगभग 80 प्रतिशत कार्यबल कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में यह परियोजना जिलों की जरूरतों और स्थानीय संभावनाओं के आधार पर आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करेगी।

कृषि के साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर पर जोर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पूर्वांचल में विकास की काफी संभावनाएं हैं। उन्होंने जिलेवार बड़े निवेश प्रोजेक्ट के लिए स्थानीय जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया। सरकार के मुताबिक, इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। सीएम योगी ने कृषि के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की भूमिका बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने स्थानीय उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और वैश्विक बाजारों से जोड़ने पर भी जोर दिया।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब एक लाख नए उद्यम विकसित करने और महिला उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने का भी प्रस्ताव है। पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ई-कॉमर्स, डेटा सेंटर और डिजिटल जिलों जैसे क्षेत्रों में भी नए अवसर विकसित किए जाएंगे। वाराणसी, गोरखपुर और प्रयागराज जैसे प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में कौशल विकास और ट्रेनिंग को बढ़ावा देने के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिसिटी और स्वास्थ्य पर्यटन की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।

ODOP को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने की तैयारी

मुख्यमंत्री ने ‘एक जिला, एक उत्पाद (ODOP)’ समेत अन्य स्थानीय उत्पादों को नए बाजारों से जोड़ने पर विशेष ध्यान देने की बात कही। बेहतर बाजार व्यवस्था और वैश्विक पहुंच के जरिए इन उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। UP-EDGE प्रोजेक्ट के जरिए सरकार का फोकस सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित रखने के बजाय जिले की स्थानीय आर्थिक क्षमता के हिसाब से विकास मॉडल तैयार करने पर है। प्रोजेक्ट के अगले चरण में प्रस्तावित PPR को केंद्र सरकार के समक्ष भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “पूर्वांचल में विकास की अपार संभावनाएं हैं। स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और आर्थिक अवसरों को ध्यान में रखते हुए जिलेवार बड़े निवेश परियोजनाओं की कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे तथा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।”

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उन्होंने कहा कि पूर्वांचल के विकास में कृषि के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र की भूमिका भी बढ़ानी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और वैश्विक बाजारों से जोड़कर निर्यात के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। आदित्यनाथ ने एक जिला एक उत्पाद (ODOP) और अन्य स्थानीय उत्पादों को नए बाजार तंत्र से जोड़ने पर विशेष ध्यान देने को कहा।

IIP Growth: औद्योगिक उत्पादन जून में 7.3% बढ़ा, मैन्युफैक्चरिंग और पावर सेक्टर में दमदार ग्रोथ

IIP Growth: जून 2026 में देश का औद्योगिक उत्पादन (IIP) 7.3% बढ़ा है। यह मई के 5.1% के मुकाबले काफी बेहतर रहा। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के मुताबिक, जून में इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) का क्विक एस्टिमेट 123.1 रहा। पिछले साल जून में यह 114.7 था।

सभी बड़े सेक्टरों में बढ़त

जून में चारों बड़े सेक्टरों ने सकारात्मक प्रदर्शन किया। बिजली और गैस सप्लाई सबसे आगे रही। इसमें 10.6% की ग्रोथ दर्ज हुई। मैन्युफैक्चरिंग 7.8% बढ़ा। वॉटर सप्लाई, सीवरेज और वेस्ट मैनेजमेंट में 6.1% की बढ़ोतरी हुई। वहीं, माइनिंग और क्वैरींग सेक्टर 1% बढ़ा।

किन सेक्टरों ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया?

मैन्युफैक्चरिंग के 23 में से 19 इंडस्ट्री ग्रुप में सालाना आधार पर बढ़ोतरी दर्ज की गई। इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट सेक्टर सबसे आगे रहा। इसमें 34% की शानदार ग्रोथ हुई। स्विचगियर, सर्किट ब्रेकर, UPS, सॉलिड-स्टेट ड्राइव और ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टर की मांग बढ़ने से यह तेजी आई।

इसके बाद मोटर व्हीकल, ट्रेलर और सेमी-ट्रेलर सेक्टर में 17.5% की बढ़ोतरी हुई। ऑटो पार्ट्स, पैसेंजर कार और कमर्शियल व्हीकल्स की मजबूत मांग इसका बड़ा कारण रही। फूड प्रोडक्ट्स सेक्टर भी 10.8% बढ़ा। इसमें चाय, नॉन-बासमती चावल और स्टार्च का अहम योगदान रहा।

कैपिटल गुड्स में सबसे तेज बढ़त

इस्तेमाल के आधार पर देखें तो कैपिटल गुड्स में सबसे ज्यादा 14.2% की ग्रोथ दर्ज की गई। इंटरमीडिएट गुड्स 9.3%, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 7.7% और इन्फ्रास्ट्रक्चर/कंस्ट्रक्शन गुड्स 7.5% बढ़े। वहीं, प्राइमरी गुड्स और कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स दोनों में 4.9% की बढ़ोतरी हुई। कुल IIP ग्रोथ में सबसे बड़ा योगदान इंटरमीडिएट गुड्स, प्राइमरी गुड्स और कैपिटल गुड्स का रहा।

IIP की गणना का तरीका बदला

MoSPI ने 2022-23 बेस ईयर वाली नई IIP सीरीज में बड़ा बदलाव किया है। अब होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) की जगह आउटपुट प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (Output PPI) का इस्तेमाल किया जाएगा। यह बदलाव IIP बास्केट के 463 में से 234 आइटम ग्रुप पर लागू होगा, जिनकी कुल हिस्सेदारी 36.02% है।

मंत्रालय का कहना है कि Output PPI कीमतों का ज्यादा सटीक आकलन करता है। इससे वैल्यू के आधार पर रिपोर्ट होने वाले उत्पादों के वास्तविक उत्पादन का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा। साथ ही, भारत की औद्योगिक उत्पादन मापने की प्रणाली अंतरराष्ट्रीय मानकों के और करीब पहुंच जाएगी।

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अमिताभ कांत ने कहा-अमेरिकी इकोनॉमी में जगह बनाए बैगर भारत तेज ग्रोथ हासिल नहीं कर सकता

नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत ने भारत के साथ ट्रेड डील को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है कि हाई इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए भारत को अमेरिका के साथ निश्चित रूप से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) करना चाहिए। इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी में गहरी पैठ बनाए बगैर तेज रफ्तार से बढ़ना नामुमकिन है।

कांत ने भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित समझौते को देश के लिए बहुत अहम और जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि यह डील संतुलित होने के साथ ही ऐसा होना चाहिए जिससे दोनों देशों को फायदा हो। उन्होंने कहा कि जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्ते बढ़ाकर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि जब तक हम अमेरिकी इकोनॉमी में अपनी पैठ नहीं बनाते हमारे लिए बहुत तेज रफ्तार वाली गोथ हासिल करना नामुमकिन होगा। अमेरिका के साथ डील से भारतीय निर्यातकों के लिए एक समान मौके सुनिश्चित होने चाहिए। उन्होंने कहा, “अमेरिका के साथ हमारा एफटीए बहुत अहम है। लेकिन, यह दोनों देशों के लिए पारस्परिक फायदेमंद होना चाहिए।”

अमेरिका के साथ डील के लिए कॉमर्स मिनिस्ट्री की बातचीत की तारीख करते हुए उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि कॉमर्स मिनिस्ट्री एफटीए को लेकर अच्छा काम कर रही है। उन्होंने कहा कि भारत को बातचीत में अपना पक्ष मजबूती से रखना चाहिए। कुछ मसलों के मामले में धैर्य जरूरी है। उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि हमें बातचीत में मजबूती से अपना पक्ष रखना चाहिए।”

नीति आयोग के पूर्व सीईओ ने अमिताभ कांत ने राजेश अग्रवाल के 13 जुलाई के उस बयान के बाद ये बातें कही हैं, जिसमें अग्रवाल ने कहा था कि भारत-अमेरिका के बीच समझौते का फ्रेमवर्क हस्ताक्षर के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी कहा था कि दोनों पक्षों को इसके समय और स्ट्रक्चर के लिए तैयार होना है। उन्होंने यह भी कहा था कि व्यापक ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर भी बातचीत भी आगे बढ़ रही है।

भारत और अमेरिका कई महीनों की बातचीत के बाद इस साल फरवरी में अंतरिम समझौते के लिए तैयार हुए थे। इस समझौते के तहत अमेरिका भारत से होने वाले एक्सपोर्ट्स पर टैरिफ 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने को तैयार हो चुका है। कांत ने कहा कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी है।

उन्होंने कहा, “अमेरिका 30 ट्रिलयन (लाख करोड़) डॉलर की इकोनॉमी है। यह 3.5 फीसदी की दर से भी बढ़ती है तो दुनिया के लिए बड़ी डिमांड बनेगी। इसलिए हमारे लिए इस इकोनॉमी में जगह बनाए बगैर तेजी से बढ़ना नामुमकिन होगा। “

भारत-अमेरिका डील से बढ़ सकती है देश की इकोनॉमी की ग्रोथ: सुरजीत भल्ला

दुनिया के दूसरे देशों की तरह भारत ने पश्चिम एशिया संकट का सामना किया है। अब अमेरिका के साथ व्यापार समझौता भारत की इकोनॉमी की ग्रोथ की रफ्तार बढ़ा सकता है। मशहूर अर्थशास्त्री और आईएमएफ के पूर्व एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर सुरजीत भल्ला ने यह अनुमान जताया है। मनीकंट्रोल की श्वेता पुंज को दिए इंटरव्यू में उन्होंने अमेरिका से ट्रेड डील के फायदों के साथ ही इंडियन इकोनॉमी के बारे में कई अहम बातें बताईं।

पश्चिम एशिया क्राइसिस का भारत की ग्रोथ पर ज्यादा असर नहीं

पश्चिम एशिया में जारी टेंशन के बारे में उन्होंने कहा कि मैंने कई बार कहा है कि दुनिया बदल चुकी है। अमेरिका की ग्रोथ बहुत अच्छी है। उसने सबको हैरान किया है। फिर लड़ाई शुरू हो गई। यहां तक कि यूरोप की भी ग्रोथ अपनी रफ्तार से चल रही है। अब सवाल है कि दुनिया में किस देश की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है? हमें इस बारे में सोचना होगा। अगर उन्हें (अमेरिका-यूरोप) नुकसान उठाना पड़ा है और हमें नुकसान नहीं हुआ है तो इसका मतलब यह है कि इस लड़ाई का हमारे ग्रोथ रेट पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है।

भारत में इकोनॉमी की ग्रोथ में घरेलू कंजम्प्शन की बड़ी हिस्सेदारी

भल्ला ने कहा कि इसकी वजह यह है कि हमारी ग्रोथ में ज्यादा योगदान घरेलू कंजम्प्शन का है, जो दूसरे देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है। विकासशील देशों में निवेश ज्यादा देखने को मिलता है। लेकिन, मेरा मानना है कि हर व्यक्ति इस बात से हैरान है कि पश्चमि एशिया संकट का ग्रोथ और इनफ्लेशन पर असल में असर नहीं पड़ा है। पहले ऑयल की कीमतों में उछाल का इनफ्लेशन पर ज्यादा असर पड़ा था। यही बात ग्रोथ के मामले में भी लागू होती है। सरकारें ऑयल की सप्लाई का रास्ता निकाल रही हैं।

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अमेरिका के साथ व्यापार समझौते से बढ़ेगी ग्रोथ 

अमेरिका, यूनाइटेड किंग्डम से ट्रेड डील के बारे में उन्होंने कहा अमेरिका से व्यापार समझौते के कई फायदे हैं। यह सिर्फ एक व्यापार समझौता नहीं है। यह व्यापार और निवेश का समझौता है। हालांकि, हमने ईयू और यूके के साथ जो व्यापार समझौते किए हैं, उनमें निवेश का कोई प्रावधान नहीं है। ईयू दुनिया के सबसे ज्यादा रेगुलेटेड इकोनॉमीज में से एक है। यूके छोटा है। उसके बाद हमने न्यूजीलैंड से डील की। लेकिन, मेरा मानना है कि अमेरिका के साथ हमारा व्यापार और निवेश का समझौता सबसे अहम है। यह इंडियन इकोनॉमी की की कई समस्याएं दूर करेगा।

इकोनॉमी पर भी पड़ेगी कमजोर मानसून की मार, S&P ने कहा- घट सकती है भारत की GDP ग्रोथ

रेटिंग एजेंसी S&P Global Ratings ने कहा है कि वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में भारत की GDP ग्रोथ घटकर 6.6% रह सकती है। एजेंसी का मानना है कि गैस-तेल के ऊंचे दाम, कमजोर मानसून और वैश्विक अर्थव्यवस्था की सुस्ती का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

भारत की GDP ग्रोथ FY26 में 7.7% रही थी। वहीं FY25 में यह 7.1% थी। S&P का अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 6.6% के अनुमान के बराबर है। महंगाई के बढ़ते दबाव को देखते हुए S&P को उम्मीद है कि RBI इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है।

क्यों घट सकती है GDP ग्रोथ?

S&P के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव के कारण एनर्जी मार्केट दबाव में हैं। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखा है। भारत अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने से आयात बिल बढ़ता है और महंगाई के जोखिम में इजाफा होता है।

एजेंसी ने यह भी कहा कि अल नीनो के असर से मानसून कमजोर पड़ा है। 22 जून तक देश में बारिश सामान्य से 43% कम दर्ज की गई थी। कमजोर मानसून का असर खेती और ग्रामीण मांग दोनों पर पड़ सकता है।

स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने राज्यों के लिए वैकल्पिक फसल योजनाएं तैयार की हैं। इनमें कम बारिश की स्थिति में होने वाली फसलों की सिफारिश की गई है।

महंगाई बढ़ने की आशंका

S&P का कहना है कि तेल का दाम बढ़ने से उद्योगों का खर्च बढ़ रहा है। सप्लाई चेन पर भी दबाव दिखाई दे रहा है। इसके अलावा उर्वरक (Fertiliser) महंगे होने से खेती की लागत बढ़ सकती है। यह फैक्टर खाद्य उत्पादन और खाद्य कीमतों दोनों पर असर डाल सकता है।

एजेंसी का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में भारत की रिटेल इंफ्लेशन बढ़कर 5.1% तक पहुंच सकती है। तीसरी तिमाही में महंगाई 0.5 से 0.6 प्रतिशत अंक तक ज्यादा रह सकती है।

S&P के मुताबिक, कंपनियां तेल के बढ़े दाम का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। हाल में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी भी महंगाई बढ़ाएगी।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र पर क्या कहा?

अपनी रिपोर्ट ‘Economic Outlook Asia-Pacific Q3 2026: AI-Exposed Markets To Outperform’ में S&P ने कहा कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की तस्वीर तीन बड़े फैक्टर से तय होगी। इनमें वैश्विक आर्थिक गतिविधियों की मजबूती, कच्चे तेल का दबाव और AI बेस्ड टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट में तेजी शामिल है।

एजेंसी का कहना है कि फिलहाल भारत समेत पूरे क्षेत्र पर कच्चे तेल की लागत और महंगाई का दबाव बना हुआ है। इसका असर आर्थिक विकास पर पड़ सकता है।

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