नीलकंठ मिश्रा ने भारतीय शेयर बाजारों में तेजी नहीं टिकने की बताई बड़ी वजह, सोमवार को भी FII ने की 1148 करोड़ रुपये की बिकवाली

विदेशी निवेशकों की बिकवाली रुकने का नाम नहीं ले रही है। फॉरेन इनवेस्टर्स ने 19 अक्तूबर यानी सोमवार को भी बिकवाली की। इससे पिछले हफ्ते की अच्छी तेजी के बाद हफ्ते के पहले दिन बाजार में बड़ी बिकवाली देखने को मिली। निफ्टी 1.11 फीसदी यानी 257 अंक गिरकर 22,888 पर बंद हुआ। सेंसेक्स 1.17 फीसदी यानी 876 अंक गिरकर 73,852 पर क्लोज हुआ। विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार को लेकर जब तक बदलेगा नहीं, तब तक बाजार में तेजी टिक नहीं पाएगी।

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल का बड़ा असर 

वर्ल्ड बैंक में एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर-इंडिया नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि अमेरिका में बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड की वजह से भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी घट रही है। निवेश के जटिल नियमों का असर भी फॉरेन इनवेस्टर्स के इनवेस्टमेंट पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सिर्फ टैक्स घटाने से काम नहीं चलेगा। इनवेस्टमेंट प्रोसेस को आसान बनाना होगा, नियमों को पारदर्शी बनाना होगा और फैसले लेने की प्रक्रिया तेज करनी होगी। उन्होंने कहा कि रुपये पर जितना दिख रहा है, उससे ज्यादा दबाव है।

अमेरिका और भारतीय बाजार में रिटर्न के बीच का फर्क घटा

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर फॉरेन इनवेस्टर्स को भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट में निवेश में फायदा नहीं दिखता है। अमेरिका और भारत में रिटर्न के बीच का फर्क घट गया है, जिससे निवेश के लिहाज से भारत का अट्रैक्शन कम हुआ है। हाल में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड अमेरिका में कई दशकों के सबसे हाई लेवल पर पहुंच गई। न सिर्फ अमेरिका बल्कि यूरोपीय देशों में भी बॉन्ड यील्ड बढ़ी है। यील्ड में उछाल से अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश में दिलचस्पी बढ़ी है।

भारतीय बाजार में घट रही विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी

मिश्रा ने एक उदाहरण की मदद से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका में बॉन्ड यील्ड 2 फीसदी और भारत में 8 फीसदी है, तो भारत में निवेश करने में फायदा है। लेकिन, अगर अमेरिका में यील्ड बढ़कर 5.3 फीसदी हो जाती है और भारत में 7.3 फीसदी रहती है भारत में निवेश में दिलचस्पी कम हो जाती है। इसका मतलब है कि फॉरेन इनवेस्टर्स को भारत में निवेश करने में फायदा नहीं दिखता। ऐसी स्थिति में वे भारत की जगह अमेरिका में इनवेस्ट करना पसंद करेंगे।

FIIs ने सोमवार को शुद्ध रूप से की 1,148 करोड़ की बिकवाली

स्टॉक एक्सचेंजों के प्रोविजनल डेटा के मुताबिक, फॉरेन इनवेस्टर्स ने 19 अक्तूबर को भारतीय बाजार में शुद्ध रूप से 1,148 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। उन्होंने 11,240.64 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। लेकिन, 12,389.28 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने शुद्ध रूप से 3,201.19 करोड़ रुपये की खरीदारी की। फॉरेन इनवेस्टर्स की बिकवाली के बीच DII ने लगातार खरीदारी कर भारतीय शेयर बाजार को सहारा दिया है।

Stock Market: ‘जीडीपी मजबूत, फिर भी क्यों टूट रहा शेयर बाजार?’ हर्ष गोयनका ने बताईं ये 7 बड़ी वजहें!

Indian Stock Market Crash Reasons: भारतीय अर्थव्यवस्था जहां एक तरफ मजबूत जीडीपी ग्रोथ और बेहतरीन फंडामेंटल्स के साथ दुनिया में चमक रही है, वहीं दूसरी ओर घरेलू शेयर बाजार में लगातार बिकवाली और गिरावट का दौर जारी है। निवेशक इस बात से हैरान हैं कि जब देश की इकोनॉमी मजबूत है, तो शेयर बाजार लाल निशान में क्यों कारोबार कर रहा है?

इस बड़े विरोधाभास पर मशहूर उद्योगपति और आरपीजी एंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भले ही हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अफसोस की बात यह है कि ग्लोबल लिक्विडिटी भारत से निकलकर दूसरे बाजारों की ओर बह रही है। गोयनका ने भारतीय शेयर बाजार में आ रही इस गिरावट के पीछे ये 7 प्रमुख कारण गिनाए हैं।

1. विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की ताबड़तोड़ बिकवाली

भारतीय शेयर बाजार से विदेशी निवेशक लगातार अपना पैसा बाहर निकाल रहे हैं। एशियाई और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अन्य उभरते बाजारों में बेहतर अवसरों के कारण FIIs भारतीय इक्विटी से लगातार बिकवाली कर रहे हैं, जिससे बाजार पर भारी दबाव बन रहा है।

2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी

अमेरिका में 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड में लगातार इजाफा हो रहा है। जब अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ता है, तो विदेशी निवेशकों के लिए बिना जोखिम के अमेरिका में ही बेहतर रिटर्न मिलने लगता है। इसी वजह से वे भारत जैसे उभरते जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करने लगते हैं।

3. क्रूड ऑयल की कीमतें $100 के पार

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुकी हैं। भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा क्रूड ऑयल इंपोर्ट करता है। महंगे तेल से भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ता है और कॉर्पोरेट मार्जिन पर सीधा असर पड़ता है।

4. भारतीय रुपये में रिकॉर्ड कमजोरी

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की फंड निकासी के कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। रुपये में गिरावट के कारण विदेशी निवेशकों को अपने निवेश पर करेंसी लॉस का डर रहता है, जिससे वे बिकवाली तेज कर देते हैं।

5. इंफ्लेशन और रेट-हाइक का डर

महंगे क्रूड ऑयल और सप्लाई चेन में रुकावटों की वजह से वैश्विक और घरेलू स्तर पर महंगाई दोबारा बढ़ने की आशंका गहरा गई है। इससे केंद्रीय बैंकों (जैसे- अमेरिकी फेडरल रिजर्व और RBI) द्वारा ब्याज दरों में कटौती टलने या दोबारा दरें बढ़ाने का डर बाजार में बैठ गया है।

6. भारतीय शेयरों का वैल्यूएशन अभी भी ऊंचा

दुनिया के अन्य बाजारों की तुलना में भारतीय शेयर बाजार का वैल्यूएशन (P/E रेशियो) अब भी काफी प्रीमियम या महंगा बना हुआ है। जब बाजारों में अनिश्चितता होती है, तो निवेशक महंगे वैल्यूएशन वाले शेयरों से मुनाफा वसूलकर सस्ते बाजारों (जैसे- चीन या ब्राजील) की ओर रुख करते हैं।

7. वैश्विक स्तर पर रिस्क-ऑफ सेंटीमेंट

वैश्विक स्तर पर युद्ध के हालात, भू-राजनीतिक तनाव और बड़े आर्थिक संकटों के चलते ग्लोबल इन्वेस्टर्स जोखिम भरे संपत्तियों से दूर भाग रहे हैं। वे इक्विटी के बजाय सोना, कैश और अमेरिकी बॉन्ड जैसी सुरक्षित जगह पर अपनी पूंजी ट्रांसफर कर रहे हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Daily Voice: बाजार में अभी डिफेंसिव नजरिया बनाए रखने की जरूरत, लंबी अवधि में इंश्योरेंस सेक्टर दिखाएगा कमाल

Daily Voice : कोर महंगाई की चाल को देखते हुए 2027 की शुरुआत में फेड फंड्स रेट में एक और बढ़ोतरी संभव है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। भारत की आर्थिक विकास दर 6.5% से 7% के बीच स्थिर रहेगी। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। इंश्योरेंस सेक्टर में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना दिख रही है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन से इस सेक्टर को सपोर्ट मिलेगा। ये बातें वॉटरफ़ील्ड एडवाइज़र्स के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर और इक्विटीज़ हेड विपुल भोवर ने मनीकंट्रोल के साथ हुई एक बातचीत में कही हैं।

क्या आप US ट्रेज़री मार्केट को ग्लोबल मार्केट के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यूएस का बॉन्ड मार्केट,ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम की नींव है। इस मार्केट में होने वाले स्ट्रक्चरल बदलाव आज ग्लोबल मार्केट पर असर डालने वाले सबसे अहम मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर हैं। जब “रिस्क-फ्री” US सॉवरेन डेट से अच्छा रिटर्न मिलता है तो यह ग्लोबल एसेट एलोकेशन की रणनीतियों को पूरी तरह से बदल देता है।

ट्रेजरी यील्ड के बढ़ने से ग्लोबल इक्विटी मल्टीपल्स पर दबाव पड़ता है और दुनिया भर की कंपनियों के लिए कर्ज लेने की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकते हैं,कैपिटल एक्सपेंडिचर में रुकावट आ सकती है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

क्या अमेरिका की वित्तीय स्थिति टिकाऊ नहीं लगती?

इस पर उन्होंने आगे कहा कि जरूरी खर्च और ब्याज पर होने वाले भारी खर्च(जो इस साल 1 ​​लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो गए हैं) में लगातार बढ़ोतरी से एक ढांचागत असंतुलन पैदा हो रहा है। अगर बड़े नीतिगत सुधार नहीं किए गए तो कर्ज का यह बढ़ता बोझ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को घटा सकता है और भविष्य में आर्थिक मजबूती में बाधा डाल सकता है।

कांग्रेसनल बजट ऑफिस का अनुमान है कि 2026 में फ़ेडरल घाटा लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा,जो अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 6 प्रतिशत है। इसके चलते अमेरिकी जनता पर मौजूद कर्ज GDP के 100 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा।

क्या आपको उम्मीद है कि इस साल के आखिर तक US फ़ेडरल रिज़र्व दो और बार ब्याज दरें बढ़ाएगा और उसके बाद अगले साल की पहली तिमाही में एक और बढ़ोतरी करेगा?

सितंबर 2026 में चेयरमैन केविन वॉर्श की अगुवाई में फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की,जिससे ये दरें 3.75 प्रतिशत से 4.00 प्रतिशत की रेंज में आ गईं। ‘डॉट प्लॉट’ से पता चला कि FOMC के 18 में से 16 सदस्यों को उम्मीद है कि इस साल कम से कम एक बार और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी होगी,हालांकि सिर्फ़ चार सदस्यों को दो और बार बढ़ोतरी की उम्मीद है।

एनर्जी की बढ़ती लागत की वजह से आई महंगाई इस सख्ती को सही ठहराती है। कोर महंगाई के ट्रेंड को देखते हुए 2027 की शुरुआत में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी हो सकती है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए,हालांकि इस साल एक और बढ़ोतरी की संभावना है,लेकिन दो और बार बढ़ोतरी होने की संभावना कम है।

क्या आपको लगता है कि भारत की विकास दर 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास स्टेबल हो जाएगी?

भारत की आर्थिक विकास दर के 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच स्टेबल होने की उम्मीद है। IMF ने वित्त वर्ष 2026 और 2027 के लिए 6.5 प्रतिशत GDP विकास दर का अनुमान लगाया है। महामारी के बाद के असर, सरकारी खर्च और रुकी हुई मांग की वजह से भारत में विकास दर 7.8 प्रतिशत के करीब रही है, लेकिन बेस इफ़ेक्ट के कम होने और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव व ऊंची ब्याज दरों जैसी ग्लोबल चुनौतियों के कारण इतनी ऊंची दरें शायद लंबे समय तक बनी न रह पाएं। हालांकि, 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर के साथ भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

अमेरिकी डॉलर में बढ़ोतरी के अहम कारण क्या हैं?

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज पर ज़्यादा यील्ड (रिटर्न) मुख्य रूप से महंगाई के दबाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित होती है, जो ग्लोबल इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करती हैं। इसके अलावा, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता बढ़ने से जोखिम से बचने वाले निवेशक अमेरिकी डॉलर से मिलने वाली सुरक्षा और लिक्विडिटी की ओर आकर्षित होते हैं। इसके अलावा,अमेरिकी टेक्नोलॉजी शेयरों में भारी विदेशी निवेश और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर होने वाला खर्च डॉलर की मांग को और बढ़ा रहा है। दूसरे G10 देशों की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मज़बूती, डॉलर की स्थिति को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी के तौर पर और मजबूत कर रही है।

क्या आप इक्विटी को लेकर इसलिए सतर्क हैं कि तेल की कीमतें ज़्यादा हैं और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ रही हैं या आपकी इस सोच के पीछे कोई और भी वजह है?

तेल की ऊंची कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई की चिंताएं भी हैं। ऐसे में,मौजूदा महंगे वैल्यूएशन को बनाए रखने के लिए बाजार में अभी तुरंत पॉजिटिव असर डालने वाली कोई वजह नहीं दिख रही है। ऐसे में जब तक अर्निंग्स की साफ तस्वीर नहीं दिखती या वैल्यूएशन में जरूरी टाइम करेक्शन नहीं होता,तब तक डिफेंसिव रुख अपनाना ही बेहतर है।

क्या आपको भारत में भी ब्याज दरें बढ़ाने का दौर शुरू होता दिख रहा है?

उम्मीद है कि भारत में ब्याज दरें बढ़ाने का दौर अक्टूबर 2026 में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक से शुरू होगा। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने फरवरी 2023 से रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है, लेकिन घरेलू और ग्लोबल स्तर पर बढ़ते दबावों के कारण इसमें बदलाव की जरूरत है।

कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाने और रुपये की कीमत घटने की वजह से खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। ग्लोबल फाइनेंशियल हालात के खराब होने के साथ,अर्थशास्त्रियों को दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे दर बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी और सख्ती का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।

क्या आपको लगता है कि मौजूदा स्तरों पर इंश्योरेंस सेक्टर में खरीदारी का मौका है?

भारत में इंश्योरेंस मार्केट की पहुंच अभी भी काफी कम है और 2026 से 2030 के बीच सालाना प्रीमियम ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन की वजह से यह सेक्टर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना रखता है।

 

Market Next Week : मिड और स्मॉल कैप्स में लगातार चौथे हफ्ते दिखी गिरावट, जानिए अगले हफ्ते कैसी रह सकती है बाजार की चाल

 

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जेपी मॉर्गन ने Nifty 50 के लिए 27000 का टारेगट दिया, भारतीय शेयर बाजार के बुरे दिन खत्म

शेयर बाजार में आने वाली तेजी को लेकर क्या आपके मन में संदेह है? अगर हां तो आपको जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट पर गौर करने की जरूरत है। जेपी मॉर्गन ने निफ्टी 50 के लिए 27,000 का टारगेट बताया है। उसका मानना है कि वैल्यूएशन में इम्प्रूवमेंट है। साध ही घरेलू इकोनॉमी से जु़ड़े बेहतर डेटा की वजह से भारतीय शेयर बाजार फिर से अट्रैक्टिव हो गया है।

भारतीय बाजार के लिए ग्लोबल रिस्क बरकरार

जेपी मॉर्गन में इंडिया इक्विटी रिसर्च के हेड संजय मोकिम ने ग्लोबल स्थितियों खासकर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड को भारतीय शेयर बाजार के लिए बड़ा रिस्क बताया है। उनका मानना है कि इससे भारतीय शेयर बाजार में तेजी पर असर पड़ सकता है। इसका असर भारत में विदेशी निवेशकों के निवेश पर भी पड़ सकता है।

घरेलू स्थितियां बाजार में तेजी के लिए अनुकूल

मोकिम ने कहा कि इंडिया की इकोनॉमी की स्थितियां शेयर बाजार के लिए अनुकूल हैं। अप्रैल-जून तिमाही के नतीजे उम्मीद से बेहतर रहे हैं। वैल्यूएशंस खासकर लार्जकैप शेयरों की वैल्यूएशन कम हुई है। उन्होंने कहा, “भारतीय शेयरों में वैल्यू ट्रेड पिछले तीन सालों के मुकाबले अब बेहतर हैं।” उन्होंने कहा कि विदेशी निवेशकों के रुख में बदलाव से भी स्थिति अनुकूल हुई है।

निवेशक फिर से भारतीय बाजार को लेकर उत्साहित

उन्होंने कहा कि नॉर्थ एशियन टेक्नोलॉजी स्टॉक्स में उतार-चढ़ाव और भारत में लार्जकैप शेयरों की सही वैल्यूएशंस से इनवेस्टर्स एक बार फिर भारत में निवेश को लेकर उत्साहित हैं। हालांकि, उनका मानना है कि भारतीय बाजारों में विदेशी निवेश तुरंत बढ़ने नहीं जा रहा है। उनका मानना है कि वैश्विक स्थितियों को लेकर ज्यादा चिंता है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल से डॉलर का विकल्प मिला

मोकिम ने अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बारे में कहा कि इसके बढ़ने से निवेशकों के पास अपेक्षाकृत सुरक्षित डॉलर एसेट्स का एक विकल्प मिल गया है। उन्होंने कहा, “जब 10 साल के बॉन्ड्स की यील्ड इस लेवल पर हैं तो आपको इमर्जिंग मार्केट्स एसेट्स में निवेश करने की क्या जरूरत है।” उन्होंने भारत में आईपीओ, क्वालिफायड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट्स (QIP) और ब्लॉक डील्स का भी जिक्र किया।

आआईपीओ, क्यूआईपी और ब्लॉक डील में काफी पैसा जा रहा

उन्होंने कहा कि आईपीओ, क्यूआईपी और ब्लॉक डील में काफी पैसा जा रहा है। अभी बाजार में नए शेयरों की सप्लाई म्यूचुअल फंड्स में हर महीने होने वाले निवेश के मुकाबले ज्यादा है। उन्होंने कहा कि इसका असर छोटी अवधि में लिक्विडिटी पर पड़ेगा। लेकिन, मीडियम टर्म में यह अच्छा है, क्योंकि इससे बाजार का दायरा बढ़ेगा और निवेश के नए मौके बनेंगे।

Bank Nifty Trend : बैंक निफ्टी में तीन दिन की बढ़त थमी, 1% से ज्यादा टूटा इंडेक्स, केनरा बैंक और कोटक ने लगाई सबसे तगड़ी चपत

Bank Nifty Trend : कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच 14 जुलाई को बैंक निफ्टी इंडेक्स में 1% से ज्यादा की गिरावट आई है। जिससे इसकी लगातार तीन दिनों की बढ़त का सिलसिला थम गया है। आज ब्रेंट क्रूड की कीमत कुछ समय के लिए 85 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई,जो 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के समझौते के बाद से सबसे ऊंची कीमत है। सोमवार को अमेरिकी सेना ने लगातार तीसरी रात ईरान पर हमले किए। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी शिपिंग पर रोक फिर से लागू कर दी और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए 20% शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है।

कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से उधार लेने की लागत बढ़ सकती है,बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी हो सकती है और ट्रेजरी से होने वाले मुनाफे में कमी आ सकती है। इसके चलते बैंकिंग शेयरों पर दबाव बना है।

बैंक निफ्टी की इस गिरावट में केनरा बैंक,कोटक महिंद्रा बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक का योगदान सबसे ज्यादा है। इनमें 2%,1.6% और 1.3% की गिरावट आई है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और फेडरल बैंक भी उन बैंकों में शामिल थे जिनके शेयरों में गिरावट आई है। फाइनेंशियल सर्विस कंपनियों श्रीराम फाइनेंस,बजाज फाइनेंस और बजाज फिनसर्व में 1-2% की कमजोरी के साथ कारोबार हो रहा है। 1.25 बजे के आसपास बैंक निफ्टी 1.15 फीसदी की गिरावट के साथ 57,475 के आसपास कारोबार कर रहा था।

बैंक निफ्टी व्यू

बजाज ब्रोकिंग रिसर्च का कहना है कि बैंक निफ्टी के लिए ऊपर की तरफ,58,700 (जून का हाई) अभी भी एक तत्काल रेजिस्टेंस बना हुआ है। अगर इंडेक्स इस लेवल के ऊपर मजबूती से बंद होता है,तो इससे चल रहे कंसोलिडेशन से ब्रेकआउट की पुष्टि होगी और आने वाले हफ्तों में 59,300 और फिर 60,000 के लेवल की ओर रैली शुरू हो सकती है। अगर बैंक निफ्टी 58,700 के ऊपर नहीं जा पाता है तो इसका मतलब होगा कि पिछले 4 हफ्तों से चल रहा कंसोलिडेशन और जारी रहेगा।

नीचे की तरफ,57,400-57,500 के लेवल के तत्कल सपोर्ट के तौर पर काम करने की उम्मीद है,जो गुरुवार के गैप-अप जोन और सोमवार के निचले स्तर से मेल खाता है। अगला अहम सपोर्ट 56,500 पर है,जहां 20 हफ्ते और 50-हफ्ते के EMA और पिछले हफ्ते का निचला स्तर एक साथ मिलते हैं,जिससे यह एक मजबूत डिमांड जोन बन जाता है।

LKP सिक्योरिटीज के टेक्निकल एनालिस्ट वत्सल भुवा की राय

LKP सिक्योरिटीज के टेक्निकल एनालिस्ट वत्सल भुवा का कहना है कि बैंक निफ्टी के लिए 57,500 पर तत्काल सपोर्ट है। जबकि 57,200 अगला अहम सपोर्ट जोन बना हुआ है। ऊपर की तरफ,58,500 मुख्य रेजिस्टेंस है और इस लेवल के ऊपर ब्रेकआउट से नई तेजी आ सकती है। जब तक इंडेक्स सपोर्ट के ऊपर बना हुआ है ट्रेडर्स को गिरावट पर खरीदारी की रणनीति अपनानी चाहिए।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के वीके विजयकुमार की राय

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार का कहना है कि कुछ ऐसी मुश्किलें फिर से सामने आ रही हैं जिनका असर जल्द ही भारतीय बाजार पर पड़ सकता है। अमेरिका-ईरान के बीच तनाव बढ़ने से ब्रेंट क्रूड की कीमत 84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। अगर तेल में यह तेजी जारी रहती है, तो इससे भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक हालात पर फिर से खरीब असर पड़ सकता है। BoP (भुगतान संतुलन) की कमजोरी और रुपये पर संभावित असर फिर से ऐसी परेशानियां आ सकती हैं जिनसे बाजार पर बुरा असर पड़ सकता है।

उन्होंने आगे कहा कि US में 10 ईयर बॉन्ड यील्ड का बढ़कर 4.61% हो जाना एक और चिंता की बात है,जिसका असर विदेशी निवेश पर पड़ सकता है। जून में भारत की रिटेल महंगाई दर बढ़कर 4.38% हो गई है और इसके और बढ़ने की संभावना है। इन चुनौतियों को देखते हुए,निवेशकों को सावधानी बरतनी होगी। तेजी से बदलते जियोपॉलिटिकल और आर्थिक माहौल में निवेश से जुड़े फैसले लेना बहुत मुश्किल होता जा रहा है। निवेशकों इस लगातार बदलते हालात पर नजर बनाए रखनी चाहिए और खासकर कच्चे तेल की कीमतों के मामले में स्थिति साफ होने का इंतजार करना चाहिए।

 

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