Tinder CEO ने कर्मचारियों से पूछा सफलता का मतलब, जवाब सुनकर हुए हैरान, जानें क्या होगा नया नियम

आज के दौर में डेटिंग ऐप पर मैच मिलना आसान हो सकता है, लेकिन क्या उस मैच से कोई अच्छी बातचीत या सच्चा रिश्ता भी बनता है? Tinder के नए CEO स्पेंसर रास्कॉफ ने जब अपनी टीम से यही सवाल पूछा, तो उन्हें ऐसा जवाब मिला जिसने कंपनी की सोच पर ही सवाल खड़े कर दिए। कई कर्मचारियों के पास सफलता को समझाने के लिए ठोस जवाब नहीं था, जबकि कुछ का ध्यान केवल कमाई और मुनाफे पर था। इसके बाद कंपनी ने तय किया कि अब सफलता सिर्फ पैसों से नहीं, बल्कि लोगों के बीच बनने वाले कनेक्शन से भी मापी जाएगी।

जब CEO के सवाल पर कर्मचारी हो गए खामोश

स्पेंसर रास्कॉफ ने जुलाई 2025 में Tinder की कमान संभाली थी। इसके बाद उन्होंने कर्मचारियों से पूछा कि आखिर उनकी नजर में ऐप की सफलता क्या है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई कर्मचारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए। जिन लोगों ने जवाब दिया, उनमें से कई ने तिमाही मुनाफे और वित्तीय लक्ष्यों का जिक्र किया। रास्कॉफ को महसूस हुआ कि कंपनी शायद उस मूल मकसद से दूर हो गई है, जिसके लिए लोग Tinder का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने Fortune को दिए इंटरव्यू में माना कि नए फीचर्स और इनोवेशन की कमी के कारण ऐप यूजर्स की बदलती उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा था।

अब मैच नहीं, बातचीत भी होगी सफलता का पैमाना

Tinder ने इस समस्या से निपटने के लिए एक नया तरीका अपनाया है। कंपनी ने ‘स्पार्क्स’ (Sparks) नाम का मापदंड पेश किया, जिसके तहत उन बातचीतों को गिना जाता है, जहां मैच होने के बाद दोनों लोग कम से कम छह बार एक-दूसरे को जवाब देते हैं। लाखों मैसेज के विश्लेषण में कंपनी ने पाया कि इस तरह बातचीत आगे बढ़ने पर फ्लर्टिंग और आमने-सामने मिलने की योजना बनने की संभावना अधिक होती है। यानी अब Tinder के लिए सिर्फ दो लोगों का मैच होना काफी नहीं है। कंपनी यह भी देखना चाहती है कि उस मैच के बाद बातचीत कितनी आगे बढ़ती है।

यूजर्स को समझने के लिए बनाए दो काल्पनिक किरदार

कर्मचारी अलग-अलग लोगों की डेटिंग से जुड़ी जरूरतों को बेहतर समझ सकें, इसके लिए कंपनी ने दो काल्पनिक यूजर पर्सोना भी बनाए हैं। इनमें एबी को एक चिंतित रोमांटिक और जैस्मिन को खुशमिजाज, मिलनसार शख्स के रूप में दिखाया गया है। इस पहल का उद्देश्य टीम को यह समझाना है कि हर यूजर की पसंद, उम्मीदें और रिश्ता तलाशने का तरीका एक जैसा नहीं होता।

तेजी से नए फीचर्स ला रहा है Tinder

कंपनी अब डबल डेट, आमने-सामने मिलने वाले इवेंट और AI आधारित मैचमेकिंग जैसी सुविधाओं पर भी काम कर रही है। रास्कॉफ के मुताबिक, कंपनी अब एक साल पहले की तुलना में 70 फीसदी ज्यादा कोड तैयार कर रही है। इससे नए फीचर्स तेजी से लॉन्च करना संभव हुआ है। जनवरी में विकसित एक इवेंट फीचर को लॉस एंजिलिस में सिर्फ आठ सप्ताह में लॉन्च कर दिया गया, जबकि पहले ऐसे प्रोजेक्ट में छह से 12 महीने लग सकते थे।

क्या Tinder की नई रणनीति रंग ला रही है?

रास्कॉफ के मुताबिक, कंपनी के प्लेटफॉर्म पर मैचों में सालाना आधार पर 14 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। साथ ही, बेहतर बातचीत के संकेतकों में भी सुधार देखने को मिला है। हालांकि, इन शुरुआती आंकड़ों से यह तय नहीं होता कि यूजर्स को लंबे समय तक बेहतर रिश्ते मिलेंगे या नहीं। लेकिन Tinder की नई रणनीति एक अहम बदलाव जरूर दिखाती है, अब कंपनी का ध्यान सिर्फ इस बात पर नहीं है कि कितने लोग मैच कर रहे हैं, बल्कि इस पर भी है कि उन मैचों से आगे कोई सार्थक जुड़ाव बन रहा है या नहीं।

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खेती से AI तक… बिजनेस आइडिया से जीतें डेढ़ लाख रुपये! जानिए IIT कानपुर के मेंटरशिप वाले चैलेंज में कैसे करें रजिस्ट्रेशन

आपके पास कोई ऐसा आइडिया है, जो लोगों की जिंदगी आसान बना सकता है या किसी बड़ी समस्या का समाधान कर सकता है, तो उसे हकीकत में बदलने का मौका है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर युवाओं को उनके नए विचारों को आगे बढ़ाने में मदद करेगा। इसके लिए यूथ एंटरप्रेन्योर्स चैलेंज (YEC) 2027 के तहत आवेदन मांगे गए हैं। इस राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चुने जाने वाले युवाओं को विशेषज्ञों का मार्गदर्शन मिलेगा। इस प्रतियोगिता में बेहतरीन प्रदर्शन करने वाली टीमों को डेढ़ लाख रुपये तक का नकद पुरस्कार भी मिलेगा। आवेदन करने की अंतिम तिथि 22 अक्टूबर 2026 है। यह पहल भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय के अंतर्गत विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2027 का हिस्सा है। इसमें आईआईटी कानपुर नॉलेज पार्टनर की भूमिका निभा रहा है।

आइडिया को कारोबार में बदलने में मिलेगी मदद

इस प्रतियोगिता का उद्देश्य ऐसे युवाओं की पहचान करना है, जो तकनीक और नए प्रयोगों के जरिए समाज की समस्याओं का समाधान निकालना चाहते हैं। कई बार युवाओं के पास अच्छा विचार होता है, लेकिन उसे आगे बढ़ाने, उसका प्रोटोटाइप तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने का रास्ता नहीं पता होता। ऐसे युवाओं को प्रतियोगिता के माध्यम से अपने विचार को बेहतर बनाने का मौका मिलेगा। आईआईटी कानपुर का स्टार्टअप इनक्यूबेशन एंड इनोवेशन सेंटर (एसआईआईसी) भी नए विचारों को व्यावहारिक रूप देने और उन्हें बड़े स्तर पर लागू करने की दिशा में मददगार साबित हो सकता है।

18 से 35 साल के युवा कर सकेंगे आवेदन

इस प्रतियोगिता में 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवा हिस्सा ले सकते हैं। ऐसे स्टार्टअप संस्थापक आवेदन कर सकते हैं, जिनके उद्यम को डीपीआईआईटी से मान्यता मिली हो या जो एमएसएमई के रूप में पंजीकृत हों। सरकारी, निजी, गैर सरकारी संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों में काम करने वाले पेशेवर भी निर्धारित शर्तों के तहत आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए संबंधित संस्थान से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) देना होगा। युवा अकेले या अधिकतम तीन सदस्यों की टीम बनाकर हिस्सा ले सकते हैं। प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा।

खेती से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक पर मौका

युवा स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, कृषि, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तीकरण, शासन व्यवस्था और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों से जुड़े अपने विचार पेश कर सकते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर आधारित नए समाधान भी इसमें शामिल किए जा सकते हैं। विचार ऐसा होना चाहिए, जो किसी वास्तविक समस्या को हल करने में मदद करे और जिसे भविष्य में उपयोगी समाधान के रूप में विकसित किया जा सके।

पहले स्थान पर डेढ़ लाख रुपये का पुरस्कार

प्रतियोगिता के तहत चुनी गई टीमों को अलग-अलग चरणों में अपने विचार प्रस्तुत करने होंगे। क्षेत्रीय स्तर पर अक्टूबर और नवंबर 2026 में प्रस्तुतियां प्रस्तावित हैं। राष्ट्रीय स्तर पर चयनित टीमों को दिसंबर में मार्गदर्शन मिलेगा। इसके बाद 8 और 9 दिसंबर को आईआईटी कानपुर परिसर में प्रत्यक्ष मार्गदर्शन का कार्यक्रम प्रस्तावित है। प्रोटोटाइप और पोस्टर तैयार करने के लिए प्रत्येक फाइनलिस्ट टीम को 5,000 रुपये की सहायता भी दी जाएगी। प्रतियोगिता का अंतिम चरण 10 से 12 जनवरी 2027 के बीच प्रस्तावित है। इसमें पहले स्थान पर आने वाली टीम को 1.50 लाख रुपये, दूसरे स्थान पर एक लाख रुपये, तीसरे स्थान पर 75 हजार रुपये, चौथे स्थान पर 50 हजार रुपये और पांचवें स्थान पर 30 हजार रुपये मिलेंगे। फाइनल में पहुंचने वाले प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र के साथ नीति निर्माताओं और निवेशकों से जुड़ने का अवसर भी मिलेगा।

22 अक्टूबर तक करना होगा पंजीकरण

इच्छुक युवा माय भारत पोर्टल पर जाकर विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग 2027 के अंतर्गत यूथ एंटरप्रेन्योर्स चैलेंज के लिए आवेदन कर सकते हैं। पंजीकरण की अंतिम तिथि 22 अक्टूबर 2026 है। आवेदन और पात्रता से जुड़ी जानकारी के लिए आधिकारिक लिंक https://mybharat.gov.in/pages/youth-entrepreneurs-challenge पर जाना होगा।

कानपुर से अखंड प्रताप सिंह की रिपोर्ट

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दुनिया बना रही बुद्धि, भारत बनेगा पालतू?

बुद्धि के ब्रह्म ने मानो मशीन में, एआई में अपना निवास बना लिया हो। तभी अब मशीनें मनुष्य से लाखों गुना विशाल दिमाग दिखलाते हुए हैं। हर दिन, हर सप्ताह इतनी खबरें, ऐसी-ऐसी कवर स्टोरीज आ रही हैं कि अब एआई का न ओर है और न छोर। इस सप्ताह पत्रिका द इकोनॉमिस्ट का कवर देखा, यूरेका एआई! यदि विज्ञान की खोजों का जिम्मा मशीनों ने अपने हाथ में ले लिया तो? देख पढ़ने की तुक समझ नहीं आई। लगा पढ़ने की जरूरत ही नहीं है! आखिर मनुष्य यानी पाठक पढ़े भी तो उसमें एआई के असीम को समझने, विचारने का सामर्थ्य कितना है? उसके करने के लिए अब है क्या? बेचारा मनुष्य। जहाँ वह असंख्य दिमागी सीमाओं में बँधा हुआ है, वहीं एआई स्वतंत्र है, स्वच्छंद है, बेफिक्र है और अपने ही पुर्जों, भाषा के अनंत में उड़ता हुआ।

बात केवल लिखने-पढ़ने की ही नहीं है। द इकोनॉमिस्ट की 15 अक्टूबर की कवर स्टोरी के अनुसार, छह अक्टूबर 2026 का दिन गणित के इतिहास का सबसे बड़ा दिन साबित हो सकता है। कैसे? इस दिन अमेरिकी कंपनी ओपनएआई ने एक ही दिन में 719 शोधपत्र जारी किए। दावा किया कि उसके एआई मॉडल ने गणित की कम से कम 372 ऐसी समस्याओं के समाधान खोज लिए हैं जिनमें बड़े-बड़े गणितज्ञ दशकों से उलझे हुए थे। उससे पहले सितंबर में एआई ने तरल पदार्थों की गति से जुड़ी एक ऐसी गणितीय समस्या को महज 88 घंटों में हल करने का दावा किया जिस पर गणितज्ञ एक सदी से माथापच्ची कर रहे थे।

नतीजतन गणितज्ञ हैरान-परेशान हैं। कुछ तो विरोध में उतर आए हैं। आखिर मनुष्य के वर्षों के अध्ययन, चिंतन और शोध का अर्थ क्या बचेगा यदि मशीन चंद घंटों में उत्तर निकाल दे? और वह भी ऐसे उत्तर जिन्हें सही मानने से पहले मनुष्य को समझने में ही महीनों लग जाएँ! ध्यान रहे, ये एआई कंपनियों के घोषित समाधान हैं, जिनकी स्वतंत्र वैज्ञानिक जाँच और पुष्टि अलग प्रश्न है।

पर गणित मात्र एक विषय है। मौसम की भविष्यवाणी, परमाणु संलयन के प्रयोग, नई धातुओं और पदार्थों की खोज, प्रोटीन की संरचना, दवाइयों का निर्माण आदि सभी में तो एआई घुस चुकी है। जीव विज्ञान में भी छलाँगें हैं। मशीनें डीएनए की भाषा पढ़ रही हैं। उसमें फेरबदल सुझा रही हैं। सूखे और गर्मी को झेलने वाली फसलें तैयार करने की कोशिश हो रही है। प्रयोगशालाओं में जीवित कोशिकाओं के कंप्यूटर मॉडल बनाने की तैयारी है। मतलब कल को वैज्ञानिक किसी दवा का असर पहले कंप्यूटर की आभासी कोशिका पर जाँचेंगे। और आगे? बिल्कुल नए जीवों की रचना भी संभव होगी! द इकोनॉमिस्ट ने बताया है कि एआई की मदद से प्राकृतिक वायरसों से अलग सोलह प्रयोगात्मक वायरस बनाए जा चुके हैं, जो बैक्टीरिया पर हमला करते हैं। सोचें, जिस जीव-जगत को समझने में मनुष्य को सदियाँ लगीं, अब उसकी जैविक संरचना में परिवर्तन और नए जीव बनाने की संभावनाएँ मशीनों से लगातार खुल रही हैं और खुलती जाएँगी।

असली बात इससे भी आगे की है। गूगल डीपमाइंड, ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियाँ एआई को केवल वैज्ञानिकों की सहायता करने वाला औजार नहीं बनाए रखना चाहतीं। वे स्वयं वैज्ञानिक खोजों के मैदान में उतर रही हैं। क्यों? इसलिए भी कि विज्ञान की कठिन समस्याएँ हल करते हुए उनके एआई मॉडल और अधिक बुद्धिमान बन सकते हैं। यानी मशीन विज्ञान की समस्याएँ सुलझाएगी, उससे अपनी बुद्धि बढ़ाएगी और फिर उसी बढ़ी हुई बुद्धि से अपने से भी बेहतर मशीन बनाने की कोशिश करेगी।

तब मनुष्य कहाँ होगा? वैज्ञानिक खोज का मालिक, उसका निरीक्षक या मशीन द्वारा निकाले गए निष्कर्षों को समझने में लगा एक विद्यार्थी, शोधकर्ता? द इकोनॉमिस्ट की संपादकीय चिंता यही है कि विज्ञान में मनुष्य की समझ और नियंत्रण बना रहना चाहिए। अन्यथा वह स्थिति भी संभव है जिसमें मशीनें खोजें करती रहें और मनुष्य केवल उनसे पूछता रहे कि अब क्या करना है। पत्रिका ने तो यहाँ तक लिखा है कि ऐसा समाज मनुष्यों को मशीनों के पालतू प्राणियों जैसी स्थिति में पहुँचा सकता है!

इस नई दुनिया का बाजार तेजी से सभी ओर बन रहा है। एआई की बुद्धि अब टोकन के हिसाब से बिक रही है। जिस तरह कभी अनाज, नमक या पशुओं से मूल्य का हिसाब होता था, वैसे अब मशीन की भाषा पढ़ने, लिखने और सोचने की कीमत टोकन में तय हो रही है। एक कंपनी का एआई दूसरी कंपनी से चालीस गुना सस्ता हो सकता है। सस्ते और महँगे एआई मॉडलों के बीच ग्राहक को चुनाव कराने वाली ओपनराउटर जैसी कंपनी को खरीदने के लिए भुगतान कंपनी स्ट्राइप ने कथित तौर पर 7.5 अरब डॉलर का सौदा किया है।

यानी बुद्धि का नया बाजार! किस काम के लिए सस्ती मशीन का दिमाग लगाना है और किस काम के लिए महँगी मशीन का, यह कारोबार का नया हिसाब, नया मॉडल है। जाहिर है औद्योगिक उत्पादनों, सेवाओं में जैसे सस्ते विकल्प देकर बाजार पर कब्जा करता है वैसे ही एआई बाजार में भी चीन की डीपसीक जैसी कंपनियाँ सस्ते एआई मॉडल बेचकर अमेरिकी कंपनियों को चुनौती दे रही हैं।

और अब जरा कल्पना करें, दिमाग में भारत पर सोचें तो क्या मिलेगा? खाली खोखा! दुनिया में जब अमेरिका और चीन की कंपनियाँ मशीनों से गणित की अनसुलझी समस्याएँ हल कराने, नई दवाएँ और जीव बनाने तथा एआई से एआई की बुद्धि बढ़ाने में लगी हैं, तब भारत इस वैज्ञानिक क्रांति में कहाँ खड़ा है? बकौल विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2026 के, भारत इनोवेशन में 139 अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट में 38वें स्थान पर है। स्विट्जरलैंड पहले, स्वीडन दूसरे, अमेरिका तीसरे, दक्षिण कोरिया चौथे और सिंगापुर पाँचवें स्थान पर हैं। चीन दसवें स्थान पर पहुँच चुका है।

मतलब दुनिया में नवाचार की दौड़ का हिसाब देखें तो भारत अभी पहले तीस देशों में भी नहीं है। जबकि भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्थाओं में एक है। उसके नौजवान वैश्विक तकनीकी कंपनियों में काम कर रहे हैं। कहने को भारत सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के निर्यात में दुनिया में पहले स्थान पर है। ऐसे ही विकसित चरण के स्टार्टअप उद्यमों में वेंचर कैपिटल सौदों के मामले में चौथे स्थान पर है। नवाचार से प्राप्त परिणामों में 25वें स्थान पर है। लेकिन मार कहाँ खा रहा है? नवाचार के लिए आबोहवा याकि जरूरी संसाधनों और व्यवस्थाओं में 49वें स्थान पर होने के कारण! मतलब दुनिया की तकनीक को चलाने, उसके लिए सेवाएँ देने और उसका बाजार बनने के जुगाड़ों में भारत आगे है, लेकिन मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीक बनाने की बुनियादी क्षमता में पीछे।

जबकि चीन की छलाँगें क्या हैं? वह सॉफ्टवेयर और मोबाइल एप्लीकेशन से आगे सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण और गहन वैज्ञानिक अनुसंधान की दुनिया में अपनी ताकत बढ़ा रहा है। द इकोनॉमिस्ट के अनुसार, अमेरिका में गहन विज्ञान और भौतिक तकनीक पर आधारित 12,752 स्टार्टअप हैं। चीन में ऐसी कंपनियों की संख्या 2025 में 3,466 हो गई। पाँच वर्षों में दोगुने से अधिक! और ये कंपनियाँ केवल मोबाइल एप्लीकेशन बनाने या ऑनलाइन सामान बेचने वाली नहीं हैं। ये भौतिक दुनिया की नई तकनीकों पर काम करने वाली कंपनियाँ हैं।

यानी चीन की तैयारी उस दुनिया के लिए है जिसमें मशीनें विज्ञान की खोज करेंगी और उनसे नई मशीनें, नई दवाएँ, नए पदार्थ और नई उत्पादन प्रणालियाँ बनेंगी। तब सवाल है कि भारत क्या करेगा? दुनिया की तकनीक का सेवा प्रदाता और उपभोक्ता बना रहेगा? या अपनी खोज, अपने आविष्कार और अपनी वैज्ञानिक क्षमता से उस दुनिया के निर्माण में भी हिस्सा लेगा?

सवाल केवल विज्ञान की प्रयोगशालाओं का नहीं है। मनुष्य के जीवन का भी है। आखिर विज्ञान, तकनीक, नवाचार और आर्थिक विकास किसलिए हैं? नागरिक के बेहतर जीवन के लिए ही न? पर भारत और भारत के नागरिक याकि भीड़ बेहतर जीवन की जिद कहाँ करते हैं? लोगों की जिंदगी खैराती बनने, प्रदूषणों, झुग्गी झोपड़ियों, कॉकरोचपने में ही विकसित भारत के सपनों की है। कोई आश्चर्य नहीं कि 2026 में भारत का एक भी शहर दुनिया के सौ सबसे रहने योग्य शहरों में नहीं है! इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की 173 शहरों की ग्लोबल लिवेबिलिटी रैंकिंग में नई दिल्ली 120वें, मुंबई 121वें, चेन्नई 123वें और बेंगलुरु 127वें स्थान पर हैं। दुनिया में कोपेनहेगन पहले, वियना दूसरे और मेलबर्न तीसरे स्थान पर हैं।

भारत की राजधानी दिल्ली को स्वास्थ्य सेवाओं में महज 41.7 और संस्कृति तथा पर्यावरण में 35.4 अंक मिले। सोचें, देश की राजधानी की यह स्थिति! और वह भी तब जब दिल्ली में चमचमाते एयरपोर्ट हैं, मेट्रो है, एक्सप्रेसवे हैं, गगनचुंबी इमारतें हैं। खरबों रुपये निर्माण पर खर्च हुए हैं। बावजूद इसके नागरिक के लिए साफ हवा, अच्छी स्वास्थ्य सेवाएँ, सुरक्षित परिवेश और सुविधाजनक रोजमर्रा का जीवन उपलब्ध कराना चुनौती है। जबकि चीन के सभी सर्वेक्षित शहरों में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लगातार दर्ज होता हुआ है।

तो तस्वीर में एक मशीनें मनुष्य से आगे निकलने की तैयारी में हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत में मनुष्य अभी रहने योग्य शहर की बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहा है। वहाँ चिंता है कि एआई कहीं विज्ञान पर अधिकार न कर ले। यहाँ चिंता है कि प्रदूषण से साँस कैसे बचे, बीमारी में अस्पताल कैसा मिले, सड़क पर चलना कितना सुरक्षित हो और रोजमर्रा की जिंदगी कैसे कटे। दुनिया की वैज्ञानिक छलाँग और भारत के नागरिक की वास्तविकता का अंतर दिन-रात का है! कुछ भी हो सारे विकास की कसौटी तो अंततः मनुष्य जीवन के अपने बदलाव ही तो हैं!

और घूम फिर कर सवाल बुद्धि (मनुष्य की) पर लौटता है। अब तक मनुष्य स्वयं ज्ञान अर्जित करता था। उसे समझने, परखने, उस पर संदेह करने और आगे बढ़ाने में पीढ़ियाँ खपती थीं। अब मशीनें ज्ञान के ऐसे परिणाम सामने रख सकती हैं जिन तक पहुँचने का रास्ता स्वयं वैज्ञानिकों को समझ न आए। तब ज्ञान बढ़ेगा, लेकिन क्या मनुष्य की समझ उसी अनुपात में बढ़ेगी? खासकर भारत जैसे देशों में? दुनिया निश्चित ही आगे अधिक बुद्धिमान मशीनों और उन पर अधिक निर्भर मनुष्यों की बनेगी। उसके जो स्वामी मनुष्य होंगे, मालिक होंगे वे क्या हैसियत इसलिए हुए होंगे, इसकी कल्पना ही दहलाने वाली है!

India exam reforms 2026: देश में बदलेगा प्रवेश परीक्षाओं का पैटर्न, पेपर लीक के बाद कंप्यूटर आधारित परीक्षा ढांचा तैयार करने पर जोर

India exam reforms 2026: केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रलहाद जोशी ने कहा कि भारत प्रौद्योगिकी और बड़े क्वेश्चन बैंक का इस्तेमाल करके अपनी परीक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव करेगा। सरकार पेपर लीक और नकल के आरोपों से सामने आई कमियों को दूर कर रही है, जिनकी वजह से हाल के समय में बड़े पैमाने पर छात्रों ने प्रदर्शन किया था। बुधवार को नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के मौके पर अपने विचार व्यक्त किए।

जोशी ने एक इंटरव्यू में जोशी ने कहा, “हम इसे और ज्यादा टेक्नोलॉजी पर आधारित बना रहे हैं, इसे अधिक निष्पक्ष बना रहे हैं, उन सभी कमियों को हम अभी दूर कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि सरकार जल्द से जल्द कंप्यूटर-बेस्ड एग्जाम सहित “सिस्टम में पूरा बदलाव” चाहती है। जोशी ने कहा कि भारत के सबसे जाने-माने टेक फाउंडर, इंफोसिस लिमिटेड के सह संस्थापक और अध्यक्ष नंदन नीलेकणी की अगुवाई वाला एक पैनल सिस्टम में सुधारों की जांच कर रहा है और उसने सरकार के साथ अपने प्लान पर चर्चा की है।

उन्होंने कहा कि पैनल को अभी अपनी रिपोर्ट देनी है, लेकिन उसकी सिफारिशों पर “बहुत, बहुत सकारात्मक और गंभीरता से” विचार किया जाएगा। हाल के वर्षों में भारत में परीक्षा पेपर लीक और दूसरी गड़बड़ियों की बाढ़ आ गई है, जिसमें मेडिकल स्कूलों के लिए अत्यंत प्रतियोगी प्रवेश परीक्षा से जुड़ी दिक्कतें भी शामिल हैं। इन नाकामियों की वजह से जुलाई में बड़े पैमाने पर छात्रों के प्रदर्शन हुए और दुनिया की कुछ सबसे बड़ी परीक्षाएं कराने वाली व्यवस्था की कमियां सामने आईं। इस अशांति के बीच पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।

जोशी ने नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 को कुशल कर्मियों के कौशल और नियोक्ताओं की जरूरत के बीच के अंतर को कम करने के लिए जरूरी बताया। साथ ही कहा कि स्कूल वोकेशनल ट्रेनिंग, इनोवेशन, क्रिटिकल थिंकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारत को अपनी बड़ी युवा आबादी को एक स्किल्ड वर्कफोर्स में बदलने की जरूरत है जो उसके मैन्युफैक्चरिंग के लक्ष्यों को पूरा कर सके।

Tripura Civic Polls: स्थानीय निकाय चुनाव के लिए त्रिपुरा SEC ने बुलाई सर्वदलीय बैठक, नवंबर में होंगे अगरतला सहित 21 नगरपालिकाओं में चुनाव

‘औपनिवेशिक मानसिकता वाली भाषा अपमानजनक!’ US PERM विवाद पर अमेरिका को भारत का करारा जवाब

PERM Program Suspension: अमेरिका द्वारा चुनिंदा कंपनियों के ‘परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन’ (PERM) प्रोग्राम को निलंबित किए जाने और इस संबंध में अमरीकी उप-राष्ट्रपति की ओर से की गई टिप्पणियों पर भारत सरकार ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक विस्तृत और सख्त बयान जारी करते हुए साफ किया है कि इस फैसले से H-1B वीजा धारकों के मौजूदा स्टेटस पर कोई सीधा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन यह दोनों देशों के आपसी आर्थिक और तकनीकी हितों के अनुकूल नहीं है।

इसके साथ ही, भारत ने अमेरिकी उप-राष्ट्रपति द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा और बयानों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित और अपमानजनक करार दिया है।

विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान के 5 मुख्य बिंदु:

1. PERM प्रोग्राम के निलंबन पर भारत की नजर

भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिकी श्रम विभाग द्वारा कुछ विशेष कंपनियों के लिए PERM प्रोग्राम को निलंबित करने के फैसले पर बारीकी से नजर बनाए हुए है।

2. H-1B वीजाधारकों पर नहीं पड़ेगा असर, ग्रीन कार्ड प्रक्रिया हो सकती है प्रभावित

विदेश मंत्रालय ने आम लोगों और आईटी पेशेवरों की आशंकाओं को दूर करते हुए स्थिति साफ की है। PERM प्रोग्राम, H-1B वीजा व्यवस्था से पूरी तरह अलग है। इस सस्पेंशन का असर पहले से जारी H-1B वीजा की वैधता या वीजा धारकों और उनके आश्रितों के लीगल स्टेटस पर नहीं पड़ेगा। हालांकि, प्रभावित कंपनियों के पात्र कर्मचारियों की स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया पर कुछ असर पड़ सकता है।

3. प्रतिभाओं की आवाजाही दोनों देशों के हित में

बयान में भारत ने अमेरिका को याद दिलाया कि कुशल भारतीय पेशेवरों का अमेरिका जाना दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए बेहद फायदेमंद है। यह न केवल भारतीयों के लिए अवसर पैदा करता है, बल्कि अमेरिकी कंपनियों को विश्वस्तरीय टैलेंट, इनोवेशन, रिसर्च, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धात्मकता में बढ़त दिलाता है।

भारतीय टैलेंट अमेरिका में जॉब क्रिएशन और शेयरधारकों के लिए वेल्थ (संपत्ति) बनाने में अहम भूमिका निभाता है। अमेरिका का यह कदम दोनों देशों की साझी महत्त्वाकांक्षाओं और प्रगति को आगे नहीं बढ़ाता है।

4. US उप-राष्ट्रपति की टिप्पणियों पर सख्त ऐतराज

अमेरिकी उप-राष्ट्रपति के बयान पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारत सरकार ने कहा, ‘ऐसी टिप्पणियां पूरी तरह अनावश्यक और अनुचित हैं। ये बयान इस सच्चाई को नजरअंदाज करते हैं कि अमेरिका में रहने वाले भारतीय पेशेवर अत्यधिक शिक्षित, कुशल और वहां के इनोवेशन इकोसिस्टम के प्रमुख आधार हैं।’

अमेरिका का खुद का इतिहास आप्रवासियों की मेहनत और नवाचार से गढ़ा गया है। ऐसी शब्दावली या भाषा का इस्तेमाल करना, जिसमें औपनिवेशिक काल की दर्दनाक यादें जुड़ी हों, बेहद अपमानजनक और आपत्तिजनक है।

5. स्थिति पर लगातार निगरानी

भारत सरकार ने कहा है कि वह इस मुद्दे से जुड़ी हर एक डेवलपमेंट पर लगातार नजर रख रही है और अमेरिकी प्रशासन के साथ सभी हितधारकों के सामने भारतीय पेशेवरों के हितों को मजबूती से उठाती रहेगी।

ट्रम्प ने मस्क को नेशनल साइंस मेडल से नवाजा:बोले- इलॉन हमारे दौर के थॉमस एडिसन हैं, साइंस को हकीकत में बदल दिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को व्हाइट हाउस में आयोजित ‘साइंस: ए न्यू गोल्डन एज समिट’ में इलॉन मस्क को नेशनल मेडल ऑफ साइंस से सम्मानित किया। ट्रम्प ने अंतरिक्ष खोज, तकनीक और इनोवेशन में मस्क के योगदान की तारीफ करते हुए उन्हें ‘राष्ट्रीय धरोहर’ और ‘आधुनिक दौर का थॉमस एडिसन’ बताया। अवार्ड देने से पहले ट्रम्प ने मस्क को उद्योग जगत का दिग्गज, शानदार इंजीनियर और अब तक के सबसे महान टेक्नोलॉजी फाउंडर्स में से एक बताया। उन्होंने कहा कि मस्क की प्रतिभा और दृढ़ संकल्प ने विज्ञान-कथा को हकीकत में बदल दिया है। ट्रम्प ने टेस्ला में मस्क की भूमिका की तारीफ की ट्रम्प ने टेस्ला की स्थापना में मस्क की भूमिका की भी तारीफ की। उन्होंने टेस्ला को 75 साल से ज्यादा समय में सफल होने वाली पहली नई कार निर्माता कंपनी बताया और कहा कि कंपनी ने इलेक्ट्रिक कारों और सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक को व्यावसायिक रूप से सफल बनाया। ट्रम्प ने अपने चाचा डॉ. जॉन ट्रम्प का भी जिक्र किया, जिन्हें अमेरिकी सरकार ने आविष्कारक निकोला टेस्ला के काम का आकलन करने के लिए नियुक्त किया था। उन्होंने मस्क के न्यूरालिंक और सुपरइंटेलिजेंस से जुड़े काम की भी तारीफ की। ट्रम्प ने कहा कि मस्क ऐसे लोगों की नजर, बोलने और चलने की क्षमता बहाल करने पर काम कर रहे हैं, जो इन्हें खो चुके हैं। नेशनल मेडल ऑफ साइंस की स्थापना 1959 में हुई थी नेशनल मेडल ऑफ साइंस से गूगल के को-फाउंडर सर्गेई ब्रिन, एनवीडिया के सीईओ जेंसन हुआंग और एएमडी की सीईओ लिसा सु को भी सम्मानित किया गया। वहीं, डेल टेक्नोलॉजीज के सीईओ माइकल डेल और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला को नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन दिया गया। यह ट्रम्प के दोनों कार्यकालों में पहली बार था, जब उन्होंने नेशनल मेडल ऑफ साइंस और नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन दिए। नेशनल मेडल ऑफ साइंस की स्थापना अमेरिकी कांग्रेस ने 1959 में की थी। यह अमेरिका में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। यह सम्मान विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में देश के लिए उल्लेखनीय योगदान देने वालों को दिया जाता है। —————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने टाटा-विप्रो को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया:8 आईटी कंपनियों के खिलाफ एक्शन, अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों पर सीधा असर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने गुरुवार को 8 बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इनमें भारत की चार कंपनियां टाटा, इंफोसिस, विप्रो और HCL हैं। इनके अलावा माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी पर भी यह रोक लगाई गई है। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प ने मस्क को नेशनल साइंस मेडल से नवाजा:बोले- इलॉन हमारे दौर के थॉमस एडिसन हैं, साइंस को हकीकत में बदल दिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को व्हाइट हाउस में आयोजित ‘साइंस: ए न्यू गोल्डन एज समिट’ में इलॉन मस्क को नेशनल मेडल ऑफ साइंस से सम्मानित किया। ट्रम्प ने अंतरिक्ष खोज, तकनीक और इनोवेशन में मस्क के योगदान की तारीफ करते हुए उन्हें ‘राष्ट्रीय धरोहर’ और ‘आधुनिक दौर का थॉमस एडिसन’ बताया। अवार्ड देने से पहले ट्रम्प ने मस्क को उद्योग जगत का दिग्गज, शानदार इंजीनियर और अब तक के सबसे महान टेक्नोलॉजी फाउंडर्स में से एक बताया। उन्होंने कहा कि मस्क की प्रतिभा और दृढ़ संकल्प ने विज्ञान-कथा को हकीकत में बदल दिया है। ट्रम्प ने टेस्ला में मस्क की भूमिका की तारीफ की ट्रम्प ने टेस्ला की स्थापना में मस्क की भूमिका की भी तारीफ की। उन्होंने टेस्ला को 75 साल से ज्यादा समय में सफल होने वाली पहली नई कार निर्माता कंपनी बताया और कहा कि कंपनी ने इलेक्ट्रिक कारों और सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक को व्यावसायिक रूप से सफल बनाया। ट्रम्प ने अपने चाचा डॉ. जॉन ट्रम्प का भी जिक्र किया, जिन्हें अमेरिकी सरकार ने आविष्कारक निकोला टेस्ला के काम का आकलन करने के लिए नियुक्त किया था। उन्होंने मस्क के न्यूरालिंक और सुपरइंटेलिजेंस से जुड़े काम की भी तारीफ की। ट्रम्प ने कहा कि मस्क ऐसे लोगों की नजर, बोलने और चलने की क्षमता बहाल करने पर काम कर रहे हैं, जो इन्हें खो चुके हैं। नेशनल मेडल ऑफ साइंस की स्थापना 1959 में हुई थी नेशनल मेडल ऑफ साइंस से गूगल के को-फाउंडर सर्गेई ब्रिन, एनवीडिया के सीईओ जेंसन हुआंग और एएमडी की सीईओ लिसा सु को भी सम्मानित किया गया। वहीं, डेल टेक्नोलॉजीज के सीईओ माइकल डेल और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्या नडेला को नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन दिया गया। यह ट्रम्प के दोनों कार्यकालों में पहली बार था, जब उन्होंने नेशनल मेडल ऑफ साइंस और नेशनल मेडल ऑफ टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन दिए। —————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प ने टाटा-विप्रो को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया:8 आईटी कंपनियों के खिलाफ एक्शन, अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों पर सीधा असर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने गुरुवार को 8 बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इनमें भारत की चार कंपनियां टाटा, इंफोसिस, विप्रो और HCL हैं। इनके अलावा माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी पर भी यह रोक लगाई गई है। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिका में विदेशी छात्रों के लिए नौकरी महंगी होगी:ट्रम्प सरकार ने ₹68 लाख फीस का प्रस्ताव रखा; भारत-चीन के छात्रों पर सबसे ज्यादा असर

अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद नौकरी करना महंगा हो सकता है। ट्रम्प सरकार ने हर नए छात्र के लिए 70 हजार डॉलर यानी करीब ₹68 लाख फीस लगाने का प्रस्ताव रखा है। यह फीस ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) के लिए रखी गई है। इसके तहत विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में नौकरी करने की अनुमति मिलती है। फीस छात्र को नहीं, बल्कि उसके कॉलेज या यूनिवर्सिटी को देनी होगी। इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भारत और चीन के छात्रों पर पड़ेगा। 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में भारत के करीब 3.63 लाख और चीन के करीब 2.66 लाख छात्र पढ़ रहे थे। यानी दोनों देशों के करीब 6.3 लाख छात्र अमेरिका में हैं। इनमें से कई छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT के जरिए अमेरिका में नौकरी करते हैं। खासकर भारतीय छात्र बड़ी संख्या में इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी और दूसरे STEM विषयों की पढ़ाई करते हैं। OPT में एक साल तक नौकरी का मौका मिलता है OPT यानी ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के तहत विदेशी छात्र अपनी पढ़ाई से जुड़े काम का अनुभव ले सकते हैं। आमतौर पर पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें एक साल तक नौकरी करने की अनुमति मिलती है। STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स के छात्रों को दो साल और काम करने की अनुमति मिल सकती है। प्रस्ताव के मुताबिक, किसी छात्र के OPT के लिए पहली बार आवेदन करने पर उसके कॉलेज या यूनिवर्सिटी को 70 हजार डॉलर यानी करीब ₹68 लाख देने होंगे। अगर छात्र OPT को आगे बढ़ाता है तो हर बार रिन्यू कराने पर 30 हजार डॉलर यानी करीब ₹29 लाख फीस देनी होगी। यह पैसा सीधे छात्र से नहीं लिया जाएगा। लेकिन इतनी बड़ी फीस के कारण कॉलेजों और यूनिवर्सिटी पर विदेशी छात्रों को OPT की सुविधा देने का खर्च काफी बढ़ जाएगा। टेक कंपनियों को भी परेशानी हो सकती है OPT के जरिए विदेशी छात्रों को अमेरिका में काम का अनुभव मिलता है। टेक कंपनियां और दूसरी कंपनियां ऐसे छात्रों को खासकर STEM से जुड़े कामों में नौकरी देती हैं। अमेरिकी उच्च शिक्षा संस्थानों से जुड़े संगठन NAFSA ने प्रस्ताव का विरोध किया है। संगठन का कहना है कि विदेशी छात्रों को अमेरिका से दूर करने से देश के इनोवेशन और आर्थिक विकास को नुकसान हो सकता है। अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) का कहना है कि OPT कार्यक्रम में धोखाधड़ी और गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। विभाग ने आरोप लगाया कि इस कार्यक्रम का इस्तेमाल सस्ते विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका लाने के लिए किया जा रहा है। अभी यह सिर्फ प्रस्ताव है। इस पर लोगों और संस्थानों को अपनी राय देने के लिए 60 दिन का समय मिलेगा। इसके बाद सरकार इसे अंतिम रूप दे सकती है। ट्रम्प सरकार पहले भी विदेशी छात्रों पर सख्ती कर चुकी ट्रम्प सरकार विदेशी छात्रों को लेकर पहले भी कई सख्त कदम उठा चुकी है। पिछले साल हजारों विदेशी छात्रों का कानूनी दर्जा खत्म किया गया था। इनमें से कई छात्रों को हिरासत में लिया गया और अमेरिका से बाहर भेजा गया। इस साल सरकार ने विदेशी छात्रों के अमेरिका में रहने की अवधि को लेकर भी नया नियम बनाया था। इसके खिलाफ कॉलेजों और यूनिवर्सिटी ने विरोध किया था। सितंबर में एक संघीय अदालत ने इस नियम को लागू होने से रोक दिया था। अमेरिका में भारतीय स्टूडेंट्स की संख्या घटी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत से आने वाले आवेदकों की संख्या में 15% कमी दर्ज की गई है। अमेरिका में सबसे ज्यादा भारत से स्टूडेंट पढ़ने जाते हैं। कमी की 3 वजहें- 1. सख्त वीजा नियम और नीतियां: इसकी एक बड़ी वजह सख्त वीजा नियम और इमिग्रेशन नीतियां हैं। इन नियमों को लेकर छात्रों में यह डर बढ़ा है कि आगे पढ़ाई और नौकरी के लिए अमेरिका में रहना कितना आसान होगा। 2. वीजा की नई समय सीमा: अमेरिकी सरकार ने छात्र और विजिटर वीजा के लिए पहले से तय रहने की अवधि की व्यवस्था में बदलाव किया है। अब कई मामलों में अमेरिका में रहने की समयसीमा चार साल तक सीमित हो सकती है। इससे लंबे समय की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए परेशानी बढ़ सकती है। 3. भारी फीस का डर: अमेरिका विदेशी छात्रों पर 1 लाख डॉलर तक की फीस लगाने पर भी विचार कर रहा है, खासकर उन छात्रों के लिए जो पढ़ाई पूरी करने के बाद OPT के जरिए अमेरिका में काम करना चाहते हैं। ————————- ये खबर भी पढ़ें… व्हाइट-हाउस की नौकरी छोड़कर अब फॉक्स न्यूज जॉइन करेंगी लेविट:यह ट्रम्प का पसंदीदा चैनल; बच्चों के चलते प्रेस सेक्रेटरी का पद छोड़ा था अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की पूर्व प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिना लेविट अब फॉक्स न्यूज से जुड़ने जा रही हैं। लेविट ने अगस्त में अपने दो बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताने के लिए व्हाइट हाउस का पद छोड़ा था। पूरी खबर यहां पढ़ें…

टाटा की कंपनी की फ्लोटिंग सोलर सेगमेंट में एंट्री, नॉर्वे की कंपनी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में करेगी टेस्टिंग

Tata Power Floating Solar: टाटा पावर ने नॉर्वे की रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी कंपनी ओशन सन के साथ साझेदारी की है। दोनों कंपनियां भारत में फ्लोटिंग सोलर टेक्नोलॉजी का टेस्ट करेंगी।

इसके लिए महाराष्ट्र के मुलशी जलाशय में करीब 300 kWp का पायलट प्रोजेक्ट लगाया जाएगा। यह जलाशय टाटा पावर का है।

फ्लोटिंग सोलर क्या होता है

फ्लोटिंग सोलर यानी पानी की सतह पर लगाए जाने वाले सोलर पैनल होते हैं। इसमें जमीन पर पैनल लगाने के बजाय किसी जलाशय, झील या तालाब की सतह पर पैनल लगाए जाते हैं।

इससे जमीन की जरूरत कम होती है। और खाली पड़ी पानी की सतह का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जाता है।

पायलट प्रोजेक्ट में क्या जांच की जाएगी?

इस पायलट में टेक्नोलॉजी की परफॉर्मेंस देखी जाएगी। साथ ही इसकी भरोसेमंद क्षमता और लागत भी जांची जाएगी। कंपनियां यह भी देखेंगी कि भारत में इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं। इसके लिए इसकी तुलना मौजूदा फ्लोटिंग सोलर सिस्टम से की जाएगी।

तुलना में बिजली उत्पादन, क्षमता का इस्तेमाल और इंस्टॉलेशन का समय देखा जाएगा। ऑपरेशन और मेंटेनेंस की जरूरत, लागत और पूरे प्रोजेक्ट की कारोबारी व्यवहार्यता भी जांची जाएगी।

बाकी फ्लोटिंग सोलर से अलग कैसे?

आमतौर पर फ्लोटिंग सोलर सिस्टम में पैनल को पानी पर तैराने के लिए पॉन्टून का इस्तेमाल होता है। कई पॉन्टून को आपस में जोड़कर एक स्ट्रक्चर बनाया जाता है। ओशन सन की टेक्नोलॉजी इससे अलग है। इसमें सोलर पैनल एक पतली हाइड्रो-इलास्टिक मेम्ब्रेन पर लगाए जाते हैं। यह मेम्ब्रेन सीधे पानी की सतह पर तैरती है।

पायलट से मिलने वाले डेटा से इस टेक्नोलॉजी की असली क्षमता समझने में मदद मिलेगी। इसके बाद भारत में इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने की संभावना देखी जाएगी।

भारत में 102 GW से ज्यादा क्षमता

टाटा पावर के मुताबिक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोलर एनर्जी के अनुमान के अनुसार भारत में फ्लोटिंग सोलर की क्षमता 102 GWp से ज्यादा है।

टाटा पावर के CEO और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रवीर सिन्हा ने कहा कि इनोवेशन कंपनी के लिए काफी अहम है। कंपनी क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन को तेज करने के लिए नई टेक्नोलॉजी पर काम कर रही है। उन्होंने कहा कि ओशन सन के साथ साझेदारी से ग्लोबल टेक्नोलॉजी को भारत में लाकर उसकी वास्तविक परिस्थितियों में जांचने का मौका मिलेगा।

इंडिया-EFTA समिट में हुआ समझौता

टाटा पावर और ओशन सन के बीच समझौता दूसरे इंडिया-ईएफटीए प्रॉस्पेरिटी समिट के दौरान हुआ। इसमें भारत और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

टाटा पावर का शेयर 7 अक्टूबर को 344.80 रुपये पर बंद हुआ। पिछले कारोबारी सत्र के मुकाबले इसमें 1.95% की गिरावट रही।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

भूटान के प्रधानमंत्री टोबगे ने पीएम मोदी को क्यों कहा ‘विष्णु का अवतार’? दुनियाभर के नेताओं ने दी बधाई

PM Modi 25 years in office: जापान, भूटान और फिलीपींस सहित कई देशों के नेताओं ने बुधवार (7 अक्टूबर) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निर्वाचित प्रतिनिधि के तौर पर जनसेवा के 25 साल पूरे करने पर बधाई दी। भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग टोबगे ने पीएम मोदी को ‘विष्णु का अवतार’ बताया है। उन्होंने यह बात 2019 में नई दिल्ली में पीएम मोदी के साथ हुई अपनी निजी मुलाकात और एक ज्ञानी एवं दूरदर्शी नेता के गुणों के बारे में अपनी समझ के आधार पर कही। पीएम मोदी 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री चुने गए थे। उन्होंने लगातार तीन कार्यकाल तक इस पद पर सेवाएं दीं। मई 2014 में वह भारत के प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए थे।

शेरिंग टोबगे ने अपने शुभकामना संदेश में पीएम मोदी को ‘हमारे समय का अवतार’ बताया। टोबगे ने 2019 में नई दिल्ली में एक आम नागरिक के तौर पर PM मोदी से हुई मुलाकात को याद करते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री से कहा था कि वह उन्हें बड़े भाई और ‘विष्णु के अवतार’ के रूप में देखते हैं। टोगबे ने कहा, “हमारे क्षेत्र में प्रबुद्ध शासकों को लंबे समय से इसी रूप में देखा जाता रहा है।”

भूटानी प्रधानमंत्री ने कहा कि PM मोदी ने भारतीयों के मन में खुद के प्रति और अपने देश के लिए मजबूत भरोसा जगाया। उन्होंने कहा, “वह भारत को लेकर ज्यादा गर्व महसूस करते हैं, उसके समक्ष मौजूद संभावनाओं के प्रति अधिक महत्वाकांक्षी हैं और दुनिया में उसकी जगह को लेकर ज्यादा आश्वस्त हैं। यह एक प्रबुद्ध शासक के गुण हैं।”

अन्य नेताओं ने क्या कहा?

जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची ने इस मौके पर मोदी को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने भारत के विकास और अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की साख बढ़ाने में मोदी के योगदान की सराहना की। तकाइची ने X पर एक पोस्ट में कहा, “PM मोदी वर्षों से भारतीय समाज और राष्ट्र के विकास के लिए प्रयासरत हैं। वह 2001 से अपने बेहतरीन राजनीतिक नेतृत्व के जरिये सरकार के प्रमुख के तौर पर सेवाएं दे रहे हैं।”

उन्होंने लिखा, “भारत के विकास को गति देने के साथ-साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी देश की साख बढ़ाई है। एक साथी नेता के तौर पर, इन सभी उपलब्धियों के लिए मैं उनके प्रति सम्मान जाहिर करती हूं।” तकाइची ने जुलाई की अपनी हालिया भारत यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें मोदी के साथ जापान-भारत विशेष रणनीतिक एवं वैश्विक साझेदारी को अगले स्तर पर ले जाने के लिए ठोस कदमों पर चर्चा करने का सौभाग्यपूर्ण अवसर मिला।

तकाइची ने अगले साल जापान और भारत के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह मुक्त और स्वतंत्र हिंद प्रशांत क्षेत्र के लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के साथ मिलकर काम करने की इच्छुक हैं। ताकि जापान और भारत, जिनकी रणनीतिक दिशा एक जैसी है, अपनी साझेदारी को और आगे बढ़ा सकें।

फिलीपींस के राष्ट्रपति ने भी दी बधाई

फिलीपींस के राष्ट्रपति बोंगबोंग मार्कोस ने PM मोदी को भारत के लोगों की सेवा की राह में लगातार सफलता की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने X पर एक पोस्ट में कहा, “गुजरात से लेकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व करने तक, प्रधानमंत्री मोदी का सफर सुशासन, इनोवेशन, टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर खास जोर देने वाला रहा है, जिससे भारत में बदलाव लाने और वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका बढ़ाने में योगदान मिला है।”

बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवेर ने मोदी को निर्वाचित प्रतिनिधि के तौर पर जनसेवा के 25 साल पूरे करने पर बधाई दी और कहा कि वह दोनों देशों के बीच मजबूत साझेदारी को और गहरा करने के लिए उत्साहित हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने X पर लिखा, “समर्पित जनसेवा के 25 साल पूरे करने पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। नेपाल आपके और आपकी सरकार के लिए आने वाले वर्षों में निरंतर सफलता और समृद्धि की कामना करता है।”

नाइजीरिया के राष्ट्रपति बोला अहमद टीनुबू ने PM मोदी को बधाई देते हुए कहा, “किसी भी लोकतंत्र में लगातार 25 साल तक नेतृत्व करना एक दुर्लभ उपलब्धि है। मोदी ने दूरदर्शी सोच और विकास के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के साथ नेतृत्व किया है।” उन्होंने कहा, “नाइजीरिया और भारत लोकतांत्रिक देश और ‘ग्लोबल साउथ’ की प्रमुख आवाज के तौर पर एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो ज्यादा निष्पक्ष, समावेशी और प्रतिनिधित्व वाली हो। मुझे पूरा भरोसा है कि उनके नेतृत्व में हमारे लोगों के बीच रिश्ते और भी मजबूत होंगे।”

ये भी पढ़ें- PM मोदी के 25 साल: ‘गुजरात मॉडल’ से ‘विकसित भारत’ तक, देश में ऐसे बदली विकास की राजनीति

बोत्सवाना के राष्ट्रपति डुमा गिदोन बोको ने निर्वाचित प्रतिनिधि के तौर पर जनसेवा के 25 साल पूरे करने पर मोदी को बधाई दी। उन्होंने कहा, “हम भारत के लोगों के प्रति आपके समर्पण और सेवा भाव की सराहना करते हैं। हम आपकी निरंतर सफलता की कामना करते हैं। दोनों देशों के बीच स्थायी मित्रता की उम्मीद करते हैं।” इस अवसर पर देश भर में आज बीजेपी कार्यकर्ता जश्न मना रहे हैं। इसके साथ ही की सार्वजनिक कार्यक्रम में आयोजित हो रहे हैं।