नीलकंठ मिश्रा ने भारतीय शेयर बाजारों में तेजी नहीं टिकने की बताई बड़ी वजह, सोमवार को भी FII ने की 1148 करोड़ रुपये की बिकवाली

विदेशी निवेशकों की बिकवाली रुकने का नाम नहीं ले रही है। फॉरेन इनवेस्टर्स ने 19 अक्तूबर यानी सोमवार को भी बिकवाली की। इससे पिछले हफ्ते की अच्छी तेजी के बाद हफ्ते के पहले दिन बाजार में बड़ी बिकवाली देखने को मिली। निफ्टी 1.11 फीसदी यानी 257 अंक गिरकर 22,888 पर बंद हुआ। सेंसेक्स 1.17 फीसदी यानी 876 अंक गिरकर 73,852 पर क्लोज हुआ। विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय बाजार को लेकर जब तक बदलेगा नहीं, तब तक बाजार में तेजी टिक नहीं पाएगी।

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल का बड़ा असर 

वर्ल्ड बैंक में एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर-इंडिया नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि अमेरिका में बॉन्ड्स की बढ़ती यील्ड की वजह से भारतीय बाजार में विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी घट रही है। निवेश के जटिल नियमों का असर भी फॉरेन इनवेस्टर्स के इनवेस्टमेंट पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सिर्फ टैक्स घटाने से काम नहीं चलेगा। इनवेस्टमेंट प्रोसेस को आसान बनाना होगा, नियमों को पारदर्शी बनाना होगा और फैसले लेने की प्रक्रिया तेज करनी होगी। उन्होंने कहा कि रुपये पर जितना दिख रहा है, उससे ज्यादा दबाव है।

अमेरिका और भारतीय बाजार में रिटर्न के बीच का फर्क घटा

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ने पर फॉरेन इनवेस्टर्स को भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट में निवेश में फायदा नहीं दिखता है। अमेरिका और भारत में रिटर्न के बीच का फर्क घट गया है, जिससे निवेश के लिहाज से भारत का अट्रैक्शन कम हुआ है। हाल में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड अमेरिका में कई दशकों के सबसे हाई लेवल पर पहुंच गई। न सिर्फ अमेरिका बल्कि यूरोपीय देशों में भी बॉन्ड यील्ड बढ़ी है। यील्ड में उछाल से अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश में दिलचस्पी बढ़ी है।

भारतीय बाजार में घट रही विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी

मिश्रा ने एक उदाहरण की मदद से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका में बॉन्ड यील्ड 2 फीसदी और भारत में 8 फीसदी है, तो भारत में निवेश करने में फायदा है। लेकिन, अगर अमेरिका में यील्ड बढ़कर 5.3 फीसदी हो जाती है और भारत में 7.3 फीसदी रहती है भारत में निवेश में दिलचस्पी कम हो जाती है। इसका मतलब है कि फॉरेन इनवेस्टर्स को भारत में निवेश करने में फायदा नहीं दिखता। ऐसी स्थिति में वे भारत की जगह अमेरिका में इनवेस्ट करना पसंद करेंगे।

FIIs ने सोमवार को शुद्ध रूप से की 1,148 करोड़ की बिकवाली

स्टॉक एक्सचेंजों के प्रोविजनल डेटा के मुताबिक, फॉरेन इनवेस्टर्स ने 19 अक्तूबर को भारतीय बाजार में शुद्ध रूप से 1,148 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। उन्होंने 11,240.64 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। लेकिन, 12,389.28 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने शुद्ध रूप से 3,201.19 करोड़ रुपये की खरीदारी की। फॉरेन इनवेस्टर्स की बिकवाली के बीच DII ने लगातार खरीदारी कर भारतीय शेयर बाजार को सहारा दिया है।

RBI MPC: तेजी से बढ़ रही ग्रोथ, आरबीआई की सख्ती, शेयर दबाव में, अब आगे क्या?

केंद्रीय बैंक आरबीआई (RBI) ने रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स की कटौती की और इसे 5.5% कर दिया। मार्केट को इसने हैरान नहीं किया, क्योंकि इसकी उम्मीद पहले से ही थी। हालांकि कुछ और बातें ऐसी रही, जिसने मार्केट का ध्यान अपनी तरफ खींचा। आरबीआई ने ग्रोथ का अनुमान तेजी से बढ़ाया तो दूसरी तरफ महंगाई का भी अनुमान बढ़ाया है और साथ ही अपना रुख न्यूट्रल से कैलिब्रेटेड टाइटनिंग कर दिया है। आरबीआई ने इस वित्त वर्ष 2027 के लिए जीडीपी ग्रोथ के अनुमान को 6.7% से बढ़ाकर 7.1% कर दिया तो महंगाई का अनुमान भी 5% से बढ़ाकर 5.2% किया।

मार्केट में मिला-जुला रुझान

आरबीआई के रुझान से मार्केट को मिला-जुला संकेत मिला। जीडीपी अपग्रेड निश्चित रूप से कंपनियों की कमाई के लिए अच्छी बात है लेकिन महंगाई के अनुमान में बढ़ोतरी और मौद्रिक नीतियों की सख्ती से यह संकेत मिला कि दरों में आगे भी बढ़ोतरी की संभावना है। आरबीआई गवर्नर ने भी ऐसे संकेत दिए हैं।

वैसे मार्केट पहले से ही कमजोर है। पिछले महीने सितंबर में निफ्टी 6.1% गिरकर 22,620 तक आ गया था, जोकि मार्च के बाद इसकी सबसे बड़ी मासिक गिरावट थी तो सेंसेक्स 5.8% गिरकर 72,480 पर आ गया। साथ ही अक्टूबर में एंट्री करते ही इसने लगातार आठ हफ्तों की लगातार गिरावट दिखाई, जो 25 वर्षों में इसकी सबसे लंबी गिरावट रही। आरबीआई के 5 अगस्त के पॉलिसी पॉज के बाद इंडेक्स लगभग 7.5% गिर चुका है।

अब आगे क्या

आरबीआई ने अपने आउटलुक से यह संकेत दिया है कि इसका फोकस फिलहाल इनफ्लेशन पर है। वैसे भी जून 2026 तिमाही में भारतीय इकॉनमी 7.8% की रफ्तार से बढ़ी थी जोकि आरबीआई के पहले के अनुमान 7% से अधिक रही। अब आरबीआई ने पूरे वित्त वर्ष 2027 के लिए ग्रोथ के अनुमान को बढ़ाकर 7.1% कर दिया। इसका मतलब है कि कंपनियों की मांग और रेवेन्यू की ग्रोथ मजबूत रह सकती है।

अब सबसे बड़ी परीक्षा सितंबर तिमाही के नतीजे को लेकर है। निफ्टी 50 की कंपनियों से रेवेन्यू और मुनाफे में सालाना करीब 20% के ग्रोथ की उम्मीद है। हालांकि तेल और कच्चे माल की लागत में उछाल से रेवेन्यू में बढ़ोतरी का पूरा फायदा प्रॉफिट में नहीं बदल सकता है और कुछ एनालिस्ट्स का मानना है कि ऑपरेटिंग मार्जिन में सालाना आधार पर सितंबर तिमाही में 100-150 बीपीएस की गिरावट आ सकती है।

ऐसे में असली सवाल ये रहेगा कि कंपनियां बढ़ती लागत को कितना सोख सकती है और ईबीआईटीडीए मार्जिन कितना बचा सकती हैं। सितंबर तिमाही के कारोबारी नतीजे पर तो मार्केट की नजर रहेगी ही लेकिन इसके अलावा आगे यह भी देखना होगा कि मैनेजमेंट की कमेंट्री क्या रहती है, क्या कंपनियों के पास प्राइसिंग पावर है, और वित्त वर्ष 2027 में डिमांड कैसी रहती है।

फिलहाल तो इस समय सबसे बड़ा रिस्क कच्चा तेल भी है। ग्लोबल ऑयल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड उछलकर प्रति बैरल $101 के पार चला गया क्योंकि इससे इनफ्लेशन, करंट अकाउंट, रुपये और कॉरपोरेट मार्जिन- चारों पर दबाव पड़ता है। दूसरी तरफ अमेरिका और भारत में बॉल्ड यील्ड ऊंची है, जिससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय मार्केट में निवेश का क्रेज फीका पड़ सकता है। अमेरिका में 10-साल का ट्रेजरी यील्ड उछलकर करीब 5.3% और भारत में 10-साल का गवर्नमेंट बॉन्ड यील्ड 7.2% पर पहुंच गया। इससे रुपये पर दबाव बढ़ रहा है। DIIs की खरीदारी और एसआईपी फ्लो ने एक जरूरी सहारा दिया है, लेकिन यूएस यील्ड में बढ़ोतरी, कमजोर रुपए और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों की वजह से विदेशी पैसे की तेजी से वापसी मुश्किल हो गई है।

कंक्लूजन

बाजार का समीकरण बदल चुका है। 7.1% GDP ग्रोथ से कमाई का निचला स्तर तय होता है तो महंगाई की 5.2% की रफ्तार और 5.5% रेपो रेट से वैल्यूएशन रीरेटिंग की ऊपरी सीमा तय होती है। सितंबर में निफ्टी पहले ही लगभग 6% और अगस्त की पॉलिसी के बाद से लगभग 8% गिर चुका है, इसलिए अगला दौर इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या कंपनी की कमाई उम्मीदों से बेहतर हो सकती है। फिलहाल आरबीआई ने सस्ते कर्ज की संभावना खत्म कर दी है तो इक्विटी को बड़े बदलाव की जरूरत है। खास बात ये है कि भारत का ग्रोथ इंजन बना हुआ है लेकिन कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कई वर्षों के हाई लेवल के करीब ग्लोबल बॉन्ड यील्ड और मार्जिन पर दबाव से कंपनियों की मजबूत कमाई के बावजूद शेयरों का जोश फीका हो सकता है।

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RBI ने 25 बीपीएस बढ़ाया रेपो रेट

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

कॉरपोरेट बॉन्ड इंडेक्स का फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट! NSE को SEBI की हरी झंडी, अब इस सिग्नल का है इंतजार

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (NSE) को कॉर्पोरेट बॉन्ड इंडेक्स पर फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट शुरू करने के लिए मार्केट रेगुलेटर SEBI से नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) मिल गया है। हालांकि अभी इस प्रोडक्ट को लॉन्च करने के लिए RBI से अहम मंजूरी मिलनी बाकी है। यह ऐसे समय में हुआ है, जब एनएसई के शेयर अभी हाल ही में बीएसई पर लिस्ट हुए हैं। ₹22563 करोड़ के आईपीओ को 5 गुना से अधिक सब्सक्रिप्शन मिलने के बाद इसके ₹1785 के शेयर 24 सितंबर को 1% से कम प्रीमियम में ₹1800 पर लिस्ट हुए थे।

क्या बदलेगा कॉर्पोरेट बॉन्ड इंडेक्स के फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट्स से

एनएसई के प्रस्तावित प्रोडक्ट से मार्केट को कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट के रिस्क को मैनेज करने के लिए एक एक्सचेंज-ट्रेडेड इंस्ट्रूमेंट मिलेगा और इससे देश के कॉर्पोरेट बॉन्ड डेरिवेटिव्स मार्केट के डेवलपमेंट को सपोर्ट मिलेगा। कॉर्पोरेट बॉन्ड इंडेक्स फ्यूचर्स से रिस्क मैनेजमेंट, पोर्टफोलियो हेजिंग और प्राइस डिस्कवरी के लिए एक और जरिया मिलेगा।

यह पहल देश के फिक्स्ड-इनकम मार्केट को मजबूत करने और मार्केट में हिस्सा लेने वालों के लिए उपलब्ध एक्सचेंज-ट्रेडेड रिस्क-मैनेजमेंट प्रोडक्ट्स की रेंज को बढ़ाने की एनएसई की कोशिशों का हिस्सा है। एनएसई के चीफ बिजनेस डेवलपमेंट ऑफिसर श्रीराम कृष्णन का कहना है कि सेबी से मिली एनओसी देश के फिक्स्ड-इनकम मार्केट के लिए एक अहम पड़ाव है। उनका कहना है कि बेहतर डेरिवेटिव इकोसिस्टम से कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट मजबूत होगा।

NSE के शेयरों की क्या है स्थिति

एनएसई के शेयर आईपीओ निवेशकों को ₹1785 के भाव पर जारी हुए थे। ₹1800 पर लिस्ट होने के बाद 24 सितंबर यानी लिस्टिंग के ही दिन यह ₹1878 की रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचा था। इस हाई से फिसलने के बाद एनएसई के शेयर आज 1 अक्टूबर 2026 को ₹1755 के भाव तक आ गए जोकि इसके शेयरों के लिए रिकॉर्ड निचला स्तर है। फिलहाल बीएसई पर यह 0.29% की गिरावट के साथ ₹1757.85 के भाव पर है।

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Rupee vs Dollar: फेड के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने से गिरा रुपया, जुलाई के बाद पहली बार 96 के लेवल के पार पहुंचा

Rupee vs Dollar: अमेरिका में इंटरेस्ट रेट बढ़ने का असर 17 सितंबर को रुपये पर दिखा। डॉलर के मुकाबले यह 96 के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार हो गया। जुलाई के बाद पहली बार रुपया इस लेवल पर पहुंचा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 96.03 के लेवल पर चल रहा था। 16 सितंबर को यह 95.95 के लेवल पर बंद हुआ था।

अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve ने 16 सितंबर को इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का ऐलान किया। फेड ने करीब तीन साल बाद इंटरेस्ट रेट 0.4 फीसदी बढ़ाया है। इतना ही नहीं फेड ने आगे भी सख्त मॉनेटरी पॉलिसी का संकेत दिया है। 25 बेसिस प्लाइंट्स बढ़ने के बाद अमेरिका में अब इंटरेस्ट रेट 3.75-4 फीसदी हो गया है।

फेडरल रिजर्व की इंटरेस्ट रेट तय करने वाली कमेटी (FOMC) की बैठक 15 सितंबर को शुरू हुई थी। इसके नतीजे भारतीय समय के मुताबिक 16 सितंबर को रात करीब 12 बजे आए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फेड का फैसला अनुमान के मुताबिक रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि 16 सितंबर को अमेरिकी केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स का इजाफा करेगा। फेड चेयरमैन केविन वॉर्श ने पहले कहा था कि फिलहाल उनका फोकस इनफ्लेशन को कंट्रोल करने पर रहेगा।

फेड इस साल इंटरेस्ट रेट में और एक बार इजाफा कर सकता है। दरअसल, क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल से दुनियाभर में महंगाई बढ़ी है। इनफ्लेशन को कंट्रोल में करने के लिए बैंक ऑफ जापान (BoJ) और यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) सहित कई देशों के केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट बढ़ाने को मजबूर हुए हैं। दुनियाभर के केंद्रीय बैंक महंगाई को बढ़ने से रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

फेडरल रिजर्व के रेट बढ़ा देने के बाद माना जा रहा है कि आरबीआई (RBI) भी अक्तूबर की अपनी मॉनेटरी पॉलिसी में इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 5 अक्तूबर को शुरू होगी। तीन दिन की बैठक के बाद इसके नतीजे 7 अक्तूबर को आएंगे।

भारत में भी रिटेल इनफ्लेशन लगातार बढ़ रहा है। अगस्त में रिटेल इनफ्लेशन 4.80 से ऊपर निकल गया। यह आरबीआई के 4 फीसदी के तय लेवल से काफी ऊपर निकल चुका है। फेड के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का असर रुपया सहित भारतीय शेयर बाजार पर पड़ता है।

RBI ने एनबीएफसी लाइसेंस सरेंडर करने का टाटा संस का अप्लिकेशन खारिज किया, जानिए क्या है इसका मतलब

आरबीआई ने टाटा संस की एनबीएफसी लाइसेंस सरेंडर करने का अप्लिकेशन खारिज कर दिया है। टाटा संस ने स्वैच्छिक रूप से बतौर नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी (एनबीएफसी) अपना सर्टिफिकेट ऑफ रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के लिए अप्लेकिशन दिया था। सूत्रों ने सीएनबीसी-टीवी18 को यह जानकारी दी।

टाटा संस को अब खुद को लिस्ट कराना होगा

RBI के टाटा संस का अप्लिकेशन खारिज कर देने का मतलब है कि टाटा संस को अब अपर-लेयर एनबीएफसी के लिए तय केंद्रीय बैंक के नियमों का पालन करना होगा। उसे खुद को स्टॉक एक्सचेंजों में भी लिस्ट कराना होगा। सूत्रों ने यह जानकारी दी। टाटा संस टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी है।

रेगुलेटरी दर्ज को लेकर खत्म हुई अनिश्चितता

इस डेवलपमेंट से टाटा संस के रेगुलेटरी दर्जे को लेकर कई सालों से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हो गई है। Tata Sons ने मार्च 2024 में कोर इनवेस्टमेंट कंपनी (CIC) के अपने रजिस्ट्रेशन को सररेंडर करने के लिए अप्लिकेशन दिया था। इससे पहले उसने 21,813 करोड़ रुपये का कर्ज तय समय से पहले चुका दिया था। इससे FY24 में टाटा समूह की यह होल्डिंग कंपनी कैश पॉजिटिव हो गई थी।

अपर-लेयर एनबीएफसी लिस्ट में टाटा संस भी

RBI ने टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी फ्रेमवर्क में बनाए रखा है। केंद्रीय बैंक ने इस साल अगस्त में अपर लेयर वाली 17 एनबीएफसी की लिस्ट में टाटा संस को बनाए रखा। उसने कहा था कि लिस्ट में शामिल होने और लाइसेंस सरेंडर करने के टाटा संस के अप्लिकेशन के बीच कोई संबंध नहीं है। उसने कहा था टाटा संस के अप्लिकेशन पर विचार चल रहा है।

पहली बार सितंबर 2022 में लिस्ट में हुई शामिल

RBI ने टाटा संस को पहली बार सितंबर 2022 में अपर-लेयर एनबीएफसी की लिस्ट में शामिल किया था। पहले के नियम के मुताबिक, अपर-लेयर एनबीएफसी को खुद को तीन साल के अंदर लिस्ट कराना जरूरी था। इस हिसाब से टाटा संस को खुद को सितंबर 2025 तक स्टॉक एक्सचेंजों में लिस्ट कराना जरूरी था। लेकिन, डीरजिस्ट्रेशन का अप्लिकेशन लंबित होने के चलते कंपनी ने खुद को लिस्ट नहीं कराया।

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केंद्रीय बैंक ने अपर-लेयर एनबीएफसी नियम में किया बदलाव

RBI ने बाद में अपर-लेयर एनबीएफसी के नियमों में बदलाव किया। इसके मुताबिक, एक लाख करोड़ या इससे ज्यादा एसेट्स वाली एनबीएफसी को अपर-लेयर की कैटेगरी में रखा गया है। टाटा संस का एसेट इस लिमिट से ज्यादा है। इसका मतलब है कि नियमों में बदलाव के बावजूद टाटा संस अपर-लेयर एनबीएफसी की कैटेगरी में है और उसे खुद को शेयर बाजारों पर लिस्ट कराना होगा।

RBI Policy : फाइनेंशियल सेक्टर के दिग्गजों को आज की पॉलिसी आई पसंद, जानिए किन शेयरों में देखने में मिल सकता है एक्शन

RBI Policy : फाइनेंशियल सेक्टर के दिग्गजों को आज की पॉलिसी पसंद आई है। यूजीआरओ कैपिटा (UGRO Capita) में चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर शिल्पा भट्टर का कहना है कि RBI का रेपो रेट के 5.25% पर बनाए रखने का फैसला,दुनिया भर में छाई अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की मैक्रोइकॉनॉमिक मजबूती पर भरोसे को दिखाता है। पश्चिम एशिया युद्ध का शुरुआती असर काफी हद तक खत्म हो जाने के बाद, पॉलिसी की स्थिरता से बिज़नेस कम्युनिटी के भरोसे के मजबूती मिलनी चाहिए,लिक्विडिटी की स्थिति बेहतर होनी चाहिए और MSMEs को वर्किंग कैपिटल को बेहतर ढंग से मैनेज करने में मदद मिलनी चाहिए,जिससे बेहतर रीपेमेंट और मज़बूत क्रेडिट क्वालिटी में मदद मिलेगी। खास बात यह है कि पॉलिसी स्टेटमेंट का टोन काफी न्यूट्रल रहा, इससे यह नहीं लगता कि रेट में जल्द ही सख्ती आने वाली है।

मॉडुलस अल्टरनेटिव्स (Modulus Alternatives) के CEO और CIO संदीप अग्रवाल ने कहा कि RBI का रेपो रेट 5.25% पर बनाए रखने का फैसला,ग्रोथ और मैक्रोइकोनॉमिक स्टेबिलिटी के बीच बैलेंस बनाने के लिए एक सोच-समझकर लिया गया फैसला नजर आता है। महंगाई के दबाव पर करीब से नजर रखी जा रही है और दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितताएं लगातार बढ़ रही हैं,ऐसे में जैसा है वैसा बनाए रखने से स्टेबिलिटी मिलती है और पिछली पॉलिसी के उपायों का असर इकॉनमी में और आगे तक पहुंच पाता है।

उन्होंने आगे कहा कि आरबीआई के आज के फैसले से बैंकिंग सेक्टर को फंडिंग कॉस्ट और इंटरेस्ट रेट्स के बारे में बेहतर अंदाजा लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही रिटेल, MSME और बिज़नेस सेगमेंट में क्रेडिट डिमांड भी बढ़ सकती। आगे महंगाई,लिक्विडिटी की स्थिति और ग्लोबल डेवलपमेंट RBI की पॉलिसी तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे। एक स्थिर पॉलिसी के साथ ही घरेलू इकोनॉमिक फंडामेंटल्स में सुधार से आने वाले महीनों में कर्ज की मांग टिकाऊ ग्रोथ देखने को मिलेगी।

एक्सिस डायरेक्ट की रिसर्च एनालिस्ट-BFSI, ज्ञानदा वैद्य का कहना है कि महंगाई का दबाव थोड़ा कम हुआ है और ग्रोथ मजबूत बनी रही है। इसको देखते हुए RBI का रेपो रेट में कोई बदलाव न करने और अपना न्यूट्रल रुख बनाए रखने का फैसला काफी हद तक उम्मीद के मुताबिक ही है। हालांकि तेल की कीमतों में नरमी आई है, लेकिन मानसून से जुड़ी चुनौतियां महंगाई के लिए एक बड़ा रिस्क बनी हुई हैं और इस पर पैनी नजर बनी हुई है।

आरबीआई ने महंगाई के अपने अनुमान को थोड़ा कम करके 5% कर दिया है, जो पहले 5.1% था। साथ ही, कोर महंगाई के अनुमान को भी घटाकर 4.3% कर दिया गया है, जो पहले 4.7% था। साथ ही, FY27 के लिए ग्रोथ के अनुमान को भी थोड़ा बढ़ाकर 6.7% कर दिया गया है, जो पहले 6.6% था।

बैंकिंग सेक्टर के नज़रिए से बात करें तो बैंकों ने सीजन के हिसाब से कमजोर रहने वाले Q1 में भी अच्छा काम किया है। इस अवधि में क्रेडिट ग्रोथ मजबूत रही और अर्निंग भी अच्छी रही। इसे क्रेडिट कॉस्ट को कंट्रोल करने और मामूली ओपेक्स ग्रोथ से सपोर्ट मिला, भले ही ज्यादातर बैंकों के मार्जिन में दिक्कतें रही। एसेट क्वालिटी में सुधार इस तिमाही की सबसे बड़ी पॉज़िटिव बात रही। नए एनपीए में नियंत्रण की वजह से ज्यादातर बैंकों में सुधार दिखा।

एक और खास बात यह रही है कि अब तक FCNR(B) डिपॉजिट में मजबूती आई है, जिससे Q2 में डिपॉज़िट ग्रोथ को सपोर्ट मिलना चाहिए। हमें उम्मीद है कि शॉर्ट-टर्म में मार्जिन काफी हद तक रेंज-बाउंड रहेंगे और कोई भी सुधार काफी हद तक पोर्टफोलियो मिक्स में अच्छे बदलाव से होगा।

ऐसे में निवेश के नजरिए से वह बैंक अच्छे लग रहे हैं जिनकी अर्निंग्स ग्रोथ, बैलेंस शीट और वैल्यूएशनम अच्छे हैं। नजरिए से कोटक महिंद्रा बैंक, ICICI बैंक, SBI, फेडरल बैंक और उज्जीवन SFB अच्छे लग रहे है। वहीं, NBFC में बजाज फाइनेंस, श्रीराम फाइनेंस और क्रेडिटएक्सेस ग्रामीण अच्छे नजर आ रहे हैं।

 

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RBI ने खराब ग्लोबल माहौल के बावजूद ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया, महंगाई कम होने की जताई उम्मीद, जानिए कहां से मिल रहा भरोसा

RBI ने खराब ग्लोबल माहौल के बावजूद ग्रोथ का अनुमान बढ़ाया, महंगाई कम होने की जताई उम्मीद, जानिए कहां से मिल रहा भरोसा

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को घरेलू अर्थव्यवस्था को लेकर उम्मीद जताई और 2026-27 के लिए अपने ग्रोथ अनुमान को बढ़ा दिया। वहीं, महंगाई के अनुमान में कटौती की गई है। RBI ने कहा कि देश में घरेलू मांग मज़बूत है,एक्सपोर्ट बढ़ा है,निवेश गतिविधि भी अच्छी है और ग्लोबल फ्रंट में बनी अनिश्चितताओं में कमी आ रही है। मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी के फैसलों के बारे में बताते हुए RBI गवर्नर ने कहा कि पश्चिम एशिया संघर्ष,ट्रेड टेंशन और कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण ग्लोबल माहौल में अस्थिर के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेत कायम हैं।

दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी इकॉनमी के तौर पर भारत की पहचान हुई मजबूत

उन्होंने आगे कहा कि बढ़ती घरेलू मांग,मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज एक्टिविटी में लगातार बनी तेजी और मज़बूत एक्सपोर्ट से इकोनॉमी को सपोर्ट मिल रहा है,जिससे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी इकॉनमी के तौर पर भारत की पहचान और मजबूत हो रही है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में इंडियन इकॉनमी ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। इसको ध्यान में रखते हुए आरबीआई में 2026-27 के अपने रियल GDP ग्रोथ अनुमान को बदलकर 6.7 फीसदी कर दिया है। RBI को उम्मीद है कि पहली तिमाही में ग्रोथ रेट 7.0 फीसदी,दूसरी तिमाही में 6.4 फीसदी,तीसरी तिमाही में 6.5 फीसदी और चौथी तिमाही में 6.8 फीसदी रहेगी। हालांकि, कुछ जोखिम भी बने हुए हैं।

मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर में तेजी कायम

आरबीआई गवर्नर ने कहा कि मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर में तेजी, मज़बूत डिस्क्रिशनरी कंजम्प्शन,इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार हो रहे सरकारी खर्च, मजबूत क्रेडिट ग्रोथ और मर्चेंडाइज़ एक्सपोर्ट में बढ़त से इकोनॉमिक ग्रोथ को सपोर्ट मिल रहा। उन्होंने कहा कि ग्लोबल सप्लाई चेन में डाइवर्सिफिकेशन,बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट और मार्केट डाइवर्सिफिकेशन से भी एक्सटर्नल डिमांड को सपोर्ट मिलने की उम्मीद है।

दूसरे फेज की महंगाई बढ़ने को जोखिम कायम

RBI ने अपने महंगाई के अनुमान में भी बदलाव किया। उसका मनना है कि वित्त वर्ष 2026-27 में रिटेल महंगाई 5.0 फीसदी रह सकती है। पहली तिमाही में महंगाई पहले के अनुमान से कम रही है, इसके चलते आगे के लिए भी अच्छे संकेत मिल रहे है। गवर्नर ने कहा कि महंगाई में हाल में देखने को मिली बढ़ोतरी की मेन वजह खाने-पीने की चीजों और ईंधन की कीमतों में आई तेजी है,न कि बड़े पैमाने पर आई डिमांड।

RBI को उम्मीद है कि खुदरा महंगाई इस फाइनेंशियल ईयर के तीसरे क्वार्टर में पीक पर होगी और उसके बाद कम हो जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि एल नीनो,कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और जियोपॉलिटिकल घटनाएं महंगाई के अनुमान पर असर डाल रहे हैं,जबकि खाने की चीजो,फ्यूल और दूसरी इनपुट लागतों में बढ़ोतरी से दूसरे दौर के असर एक बड़ा रिस्क बने हुए हैं।

कच्चे तेल के शॉर्ट-टर्म आउटलुक का अंदाजा लगाना मुश्किल

आरबीआई गवर्नर ने कहा कि वेस्ट एशिया संघर्ष से सप्लाई में आई रुकावटें जून के बाद कम हो गई थीं, लेकिन जुलाई की शुरुआत से फिर से बढ़ी मुश्किलों ने एक बार फिर ग्लोबल एनर्जी मार्केट और सप्लाई चेन में उतार-चढ़ाव बढ़ा दिया है।

कच्चे तेल पर RBI ने कहा कि इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमतें अभी भी बहुत वोलेटाइल हैं। जून में इंडियन बास्केट क्रूड में तेज गिरावट आई थी,लेकिन वेस्ट एशिया में फिर से तनाव बढ़ने की वजह से जुलाई में कच्चे तेल कीमतें काफी बढ़ गईं,जिससे इसके शॉर्ट-टर्म आउटलुक का अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से इनपुट कॉस्ट बढ़ सकता है। इससे दूसरे दौर का महंगाई का दबाव बन सकता है।

ग्लोबल ट्रेड में जारी अनिश्चितता का दिख सकता है असर

गवर्नर ने ग्लोबल ट्रेड में जारी अनिश्चितता की ओर इशारा करते हुए कहा कि नए US टैरिफ,ग्लोबल ट्रेड ग्रोथ में कमी और जियोपॉलिटिकल तनाव से बाहरी माहौल पर असर पड़ने की उम्मीद है। हालांकि,भारत को हाल ही में हुए बाइलेटरल ट्रेड एग्रीमेंट,हेल्दी सर्विसेज एक्सपोर्ट और मजबूत इनवर्ड रेमिटेंस से सपोर्ट मिलने की उम्मीद है। इससे करंट अकाउंट पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी।

फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के फ्लो में मजबूती

RBI ने कहा कि फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट के फ्लो में मजबूती बनी हई है। हाल के महीनों में फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट में भी सुधार देखने को मिला है। इससे डेट मार्केट में कैपिटल लाने के लिए पॉलिसीगत उपायों से मदद मिली है। नतीजतन,इस साल बैलेंस ऑफ पेमेंट्स में अच्छा सरप्लस हासिल होने की उम्मीद है।

भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व अच्छी स्थिति में

RBI गवर्नर ने कहा कि भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व लगभग 693 अरब डॉलर की अच्छी स्थिति में है। यह दस महीने से ज्यादा का इम्पोर्ट कवर दे सकता है। RBI की एक्सचेंज-रेट पॉलिसी पर उन्होंने कहा कि हम अपनी पॉलिसी जारी रखेंगे कि यह मार्केट की ताकतों के हिसाब से तय होगी। हालांकि एक्सेंज रेट में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव होने पर हस्तक्षेप किया जाएगा,सट्टेबाजी पर रोक लगेगी और गलत हरकतों को रोकेंगे ताकि यह पक्का हो सके कि इकोनॉमिक एक्टिविटी में कोई बाधा न आए।

अपने संबोधन के खत्म करते हुए RBI गवर्नर ने कहा कि भारत के मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स ग्लोबल झटकों के खिलाफ सपोर्ट देते रहेंगे। हालांकि पॉलिसी बनाने वाले भविष्य में कोई भी पॉलिसी एक्शन लेने से पहले महंगाई,कच्चे तेल की कीमतों,मौसम की स्थिति और जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट पर करीब से नजर रखेंगे।

 

 

RBI Policy Highlights : रेपो रेट में नहीं हुआ कोई बदलाव, जानिए महंगाई और ग्रोथ पर क्या है RBI गवर्नर की राय

RBI MPC Meet: फिर एक बार जस की तस छोड़ी जा सकती है रेपो रेट, 5 अगस्त को आएगा फैसला

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपनी अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में भी प्रमुख नीतिगत दर रेपो को बिना किसी बदलाव के जस का तस छोड़ सकता है। देश के 10 अर्थशास्त्रियों और ट्रेजरी प्रमुखों के एक सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है। RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की मीटिंग 3-5 अगस्त को होने वाली है। इस साल जून की बैठक में रेपो रेट में लगातार तीसरी बार कोई बदलाव न करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत पर स्थिर छोड़ा गया था।

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, सर्वे में ज्यादातर उत्तरदाताओं का अनुमान रहा कि केंद्रीय बैंक आक्रामक रुख अपनाते हुए अपनी नीतिगत स्थिति को ‘न्यूट्रल’ बनाए रखेगा। ऐसा भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और असमान मानसून से महंगाई के बढ़ते जोखिमों को देखते हुए किया जा सकता है। अर्थशास्त्रियों ने कहा कि केंद्रीय बैंक ‘देखो और इंतजार करो’ मोड में रहेगा क्योंकि वह महंगाई की स्थिति का आकलन कर रहा है।

पीटीआई के मुताबिक, इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर का कहना है, ‘‘फिलहाल, महंगाई नरम बनी हुई है और ऐसे में यथास्थिति ही सबसे अच्छा नीतिगत विकल्प है।” जना स्मॉल फाइनेंस बैंक के ट्रेजरी प्रमुख गोपाल त्रिपाठी का मानना है कि केंद्रीय बैंक मानसून की स्थिति और एफसीएनआर (बी) योजना की सफलता का इंतजार करेगा।

पूरे FY27 में रेपो रेट में हो सकती है वृद्धि

सर्वे के अधिकांश उत्तरदाताओं का मानना है कि भले ही अगस्त में पॉलिसी रेट को स्थिर रखा जाए लेकिन पूरे वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान इसमें बढ़ोतरी हो सकती है। अगर महंगाई का दबाव बढ़ा तो चालू वित्त वर्ष के दौरान रेपो रेट में कम से कम 2 बार बढ़ोतरी हो सकती है।

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महंगाई और ग्रोथ के अनुमानों को लेकर क्या राय

कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल के बावजूद, ज्यादातर लोगों को उम्मीद है कि RBI महंगाई के अनुमान में कोई बदलाव नहीं करेगा। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना ​​है कि अगर भूराजनीतिक तनाव बना रहा है तो इसमें बढ़ोतरी हो सकती है। धनलक्ष्मी बैंक के ट्रेजरी हेड बालासुब्रमण्यन आर का मानना है कि RBI वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1% कर देगा।

ग्रोथ के अनुमानों को लेकर भी राय बंटी हुई है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि मजबूत घरेलू मांग के कारण वित्त वर्ष 2027 के GDP ग्रोथ अनुमान में थोड़ी बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं कुछ अन्य का मानना है कि कोई बदलाव नहीं होगा।

RBI Grade B Phase 2 Admit Card 2026: 25 और 26 जुलाई की परीक्षा के लिए आरबीआई ने जारी किया एडमिट कार्ड, डाउनलोड करने के लिए यहां बताए जा रहे हैं स्टेप्स

RBI Grade B Phase 2 Admit Card 2026: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने आरबीआई ग्रेड B फेज 2 एडमिट कार्ड 2026 जारी कर दिया है। पहले फेज की परीक्षा में सफल घोषित उम्मीदवार फेज 2 की परीक्षा देंगे। केंद्रीय बैंक ने इन उम्मीदवारों का हॉल टिकट आधिकारिक वेबसाइट rbi.org.in पर जारी कर दिया है। उम्मीदवारों को अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड करने के लिए अपना रजिस्ट्रेशन नंबर या रोल नंबर के साथ अपने पासवर्ड या जन्म तिथि का इस्तेमाल करके लॉग इन करना होगा।

आरबीआई ग्रेड बी फेज 2 परीक्षा 25 और 26 जुलाई, 2026 को होनी है। एडमिट कार्ड में कैंडिडेट का नाम, परीक्षा की तारीख, शिफ्ट का समय, परीक्षा केंद्र, रिपोर्टिंग का समय और परीक्षा के दिन के निर्देश जैसी जरूरी जानकारी होगी। केंद्रीय बैंक ने साफ़ किया है कि एडमिट कार्ड सिर्फ ऑनलाइन मिलेंगे। कोई प्रिंटेड कॉपी पोस्ट से नहीं भेजी जाएगी, इसलिए कैंडिडेट को परीक्षा से पहले अपना हॉल टिकट डाउनलोड और प्रिंट करना होगा।

बता दें, परीक्षा के लिए एडमिट कार्ड एक जरूरी दस्तावेज होता है। उम्मीदवारों के लिए इस अपने साथ परीक्षा केंद्र ले जाना जरूरी होता है। इसके बिना उन्हें परीक्षा में दाखिल होने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इसलिए सभी परीक्षार्थियों को समय से अपने हॉल टिकट डाउनलोड कर लेना चाहिए। आखिरी समय में डाउनलोड करने का इंतजार नहीं करना चाहिए।

आरबीआई ग्रेड बी फेज 2 एडमिट कार्ड 2026 कैसे डाउनलोड करें

कैंडिडेट इन स्टेप्स को फ़ॉलो कर सकते हैं:

  • आरबीआई की ऑफिशियल वेबसाइट rbi.org.in पर जाएं।
  • होमपेज पर ‘Opportunities@RBI’ सेक्शन पर क्लिक करें।
  • ‘Current Vacancies’ टैब खोलें।
  • ‘Call Letters’ पर क्लिक करें।
  • ‘Officers in Grade B (DR) – Phase II – PY 2026’ के लिए लिंक चुनें।
  • अपना रजिस्ट्रेशन नंबर या रोल नंबर और पासवर्ड या जन्म तिथि डालें।
  • अपना एडमिट कार्ड देखने के लिए डिटेल्स सबमिट करें।
  • इसे डाउनलोड करें और भविष्य में इस्तेमाल के लिए प्रिंटआउट ले लें।

साथ ले जाने वाले डॉक्यूमेंट्स

परीक्षा के दिन, कैंडिडेट्स को आरबीआई ग्रेड बी फेज 2 एडमिट कार्ड की एक प्रिंटेड कॉपी के साथ एक वैध मूल फोटो पहचान पत्र, जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट, वोटर आईडी या ड्राइविंग लाइसेंस ले जाना होगा। परीक्षार्थियों को यह भी सलाह दी जाती है कि वे एडमिट कार्ड पर दिए गए रिपोर्टिंग टाइम से 30 से 60 मिनट पहले परीक्षा केंद्र पर पहुंचें। उन्हें हॉल टिकट पर प्रिंटेड सभी डिटेल्स को ध्यान से देखना चाहिए और आखिरी समय में किसी भी परेशानी से बचने के लिए आरबीआईI द्वारा जारी किए गए एग्जाम-डे इंस्ट्रक्शन्स को फॉलो करना चाहिए।

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INR vs USD: डॉलर के मुकाबले रुपया 37 पैसे मजबूत, जानें क्या है वजह

INR vs USD:  गुरुवार (25 जून) को भारतीय रुपया US डॉलर के मुकाबले 94.30 पर मज़बूती से खुला, जो बुधवार (26 जून) के 94.67/$ के बंद भाव से 37 पैसे ज़्यादा है। इसे ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में भारी गिरावट और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के संभावित दखल से सपोर्ट मिला।

पिछले सेशन में साइकोलॉजिकली ज़रूरी 95/$ के निशान के पास पहुंचने के बाद करेंसी में सुधार हुआ। ट्रेडर्स ने कहा कि RBI ने शायद उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए मार्केट में कदम रखा, जबकि RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​के कमेंट्स ने भी फॉरवर्ड प्रीमियम लेवल को नीचे खींच लिया, जिससे सेंटिमेंट को मदद मिली।

तेल की कीमतों ने रुपये को और किया मज़बूत

ब्रेंट क्रूड रात भर में 4% से ज़्यादा गिरा और एशियाई ट्रेडिंग में 2% और गिरकर लगभग $72.28 प्रति बैरल पर आ गया। यह गिरावट तब आई जब ईरान के साथ US-इज़राइल संघर्ष को खत्म करने के मकसद से शुरुआती समझौते के बाद टैंकरों ने स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज से फिर से मूवमेंट शुरू कर दिया।

ब्रेंट की कीमतें अब 28 फरवरी को लड़ाई बढ़ने से पहले के लेवल से नीचे आ गई हैं।

इस हफ़्ते बेंचमार्क 10% से ज़्यादा और इस महीने 21% से ज़्यादा नीचे है, जिससे भारत जैसी तेल इंपोर्ट करने वाली इकॉनमी पर दबाव कम हुआ है।

एक बैंक के करेंसी ट्रेडर ने कहा, “तेल की कम कीमतों और RBI के दखल के असर से रुपये में अच्छी तेज़ी आ रही है।”

एशियाई करेंसी में लगातार कमज़ोरी के बावजूद रुपये में बढ़त आई। फेडरल रिजर्व के इंटरेस्ट रेट को लंबे समय तक ऊंचा रखने की उम्मीद के बीच US डॉलर की मज़बूत सेफ-हेवन डिमांड से रीजनल करेंसी पर दबाव बना रहा।डॉलर इंडेक्स 101.50 के आस-पास रहा, जो कई महीनों के हाई के करीब है, क्योंकि इन्वेस्टर्स का मानना ​​है कि मज़बूत US इकॉनमिक ग्रोथ और स्थिर महंगाई फेड को सख्त मॉनेटरी पॉलिसी की ओर धकेल सकती है।

मार्केट पार्टिसिपेंट्स ने कहा कि बुधवार (24 जून) को रुपये में रिकवरी, क्रूड ऑयल की कम कीमतों के साथ मिलकर, लोकल करेंसी को जल्द ही स्टेबल होने में मदद कर सकती है, भले ही ग्लोबल डॉलर में मज़बूती बनी रहे।

ING ने एक नोट में कहा कि हाल के प्राइस एक्शन से पता चलता है कि मार्केट अब होर्मुज स्ट्रेट के ज़रिए शिपिंग एक्टिविटी के तेज़ी से नॉर्मल होने की उम्मीद कर रहे हैं, जिससे ग्लोबल ऑयल मार्केट में सप्लाई में रुकावट का डर कम हो गया है।

रुपये का आउटलुक

चॉइस ब्रोकिंग की कमोडिटी फंडामेंटल एनालिस्ट पिंकी यादव के मुताबिक, भारतीय रुपया US डॉलर के मुकाबले 94.30 पर मज़बूती से खुला, जिसे ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज़ करेक्शन से सपोर्ट मिला, जो ईरान लड़ाई से पहले के लेवल से नीचे आ गई हैं। ब्रेंट क्रूड इस हफ़्ते 10% से ज़्यादा और इस महीने 21% से ज़्यादा गिरा है, जिससे भारत के इंपोर्ट बिल को लेकर चिंता कम हुई है और घरेलू करेंसी को सपोर्ट मिला है।

यादव ने बताया कि मई में एशियाई बॉन्ड मार्केट में विदेशी इनफ्लो तीन महीने के हाई पर पहुंच गया, जिससे सेंटिमेंट को और मदद मिली। उन्होंने यह भी बताया कि RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ​​ने हाल ही में दोहराया कि इंटरेस्ट रेट बढ़ाने पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी और इस बात पर ज़ोर दिया कि सेंट्रल बैंक रुपये के लिए किसी खास एक्सचेंज रेट को टारगेट नहीं करता है। हालांकि, मार्केट पार्टिसिपेंट्स को उम्मीद है कि RBI सरकारी बैंकों के ज़रिए बहुत ज़्यादा करेंसी वोलैटिलिटी को रोकने के लिए दखल देगा।

पॉज़िटिव फ़ैक्टर्स के बावजूद, रुपये की बढ़त पर रोक लगी रही क्योंकि US डॉलर डॉलर इंडेक्स पर एक साल के हाई 101.5 के पास रहा, इस उम्मीद के बीच कि फ़ेडरल रिज़र्व लंबे समय तक सख्त मॉनेटरी पॉलिसी बनाए रख सकता है।

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