तेज विकास के बावजूद रुपये की कमजोरी दे रही दर्द, 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने का लक्ष्य छिटका दूर

IMF के आंकड़ों के मुताबिक तेज विकास दर के बावजूद रुपये की कमजोरी के कारण भारत के 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य 2029 तक टल सकता है। इसके पहले अनुमान थी कि 2027 में भारत जापान और UK को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। लेकिन IMF के पूर्वानुमानों के ‘मनीकंट्रोल’ द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चलता है कि रुपये की गिरावट ने 5 लाख करोड़ डॉलर के टारगेट को एक साल और आगे के लिए टाल दिया है।

भारत 2027 में जापान और यूके को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है, लेकिन 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का देश का यह लक्ष्य एक साल के लिए पिछड़ सकता है। इस टारगेट को रुपये की गिरती कीमत की वजह से झटका लग सकता है। जानकारों का कहना है कि रुपए के वैल्यू में कमी आने से डॉलर के हिसाब से देश के आर्थिक उत्पादन की वैल्यू में कमी आ रही है।

मनीकंट्रोल द्वारा इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के नवीनतम ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ (WEO) डेटाबेस के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की अर्थव्यवस्था के 2029 में 5 लाख करोड़ डॉलर के स्तर को पार करने का अनुमान है, जबकि अप्रैल में इसके 2028 तक इस स्तर को पार करने का अनुमान लगाया गया था।

IMF ने रुपये के संदर्भ में भारत के आर्थिक आउटपुट के अनुमान को तो बढ़ाया है, लेकिन 2028 के लिए भारत की नॉमिनल GDP के अपने अनुमान को 5.1 लाख करोड़ डॉलर से घटाकर 4.996 लाख करोड़ डॉलर कर दिया है।

5 लाख करोड़ डॉलर का टारगेट खिसका दूर

यह अंतर भारत की डॉलर-मूल्य वाली जीडीपी पर मुद्रा के अवमूल्यन (मूल्य में गिरावट) के बढ़ते प्रभाव को दिखाता है, जो ग्लोबल इकोनॉमिक रैंकिंग में देश की स्थिति तय करता है।

आईएमएफ (IMF) के अक्टूबर के अनुमानों के अनुसार, 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था 4.06 लाख करोड़ डॉलर की होगी, जो 2027 में बढ़कर 4.52 लाख करोड़ डॉलर और 2029 में 5.54 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगी।

रुपये की गिरावट ने मजबूत घरेलू विकास के असर को किया बेअसर

ताजा अनुमान बताते हैं कि 5 लाख डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने में हो रही देरी की मुख्य वजह भारत की नॉमिनल आर्थिक ग्रोथ में आई गिरावट नहीं, बल्कि विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) से जुड़े अनुमान में हुआ बदलाव है।

IMF का अब अनुमान है कि 2028 में रुपया प्रति डॉलर औसतन 95.5 के स्तर पर रहेगा, जबकि अप्रैल के अनुमानों में यह आंकड़ा 93.3 था। 2027 के लिए, एक्सचेंज रेट का अनुमान 93 से बदलकर 95 हो गया है।

साल की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया 5 प्रतिशत से ज्यादा कमजोर हो चुका है। शुक्रवार को रुपया 96.73 के स्तर पर बंद हुआ, जिसके बाद RBI ने इसमें और गिरावट को रोकने के लिए कदम उठाए।

इस बीच, घरेलू मुद्रा में भारत की नॉमिनल GDP के 2028 में 477.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। अप्रैल में यह अनुमान 471.9 लाख करोड़ रुपये था, यानी इस अनुमान में 1.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। लेकिन, जब इसे डॉलर में बदला जाता है तो आर्थिक आउटपुट का यह अनुमान लगभग 63 अरब डॉलर कम हो जाता है।

मनीकंट्रोल की गणना से पता चलता है कि अप्रैल के 93.3 रुपए प्रति डॉलर के एक्सचेंज रेट अनुमान के आधार पर, 2028 के लिए भारत की रुपये में मापी गई GDP का IMF का ताजा अनुमान लगभग 5.11 लाख करोड़ डॉलर बैठता है, जो 5 लाख करोड़ डॉलर के आंकड़े से काफी ऊपर है। हालांकि, एक्सचेंज रेट के संशोधित अनुमान के आधार पर यह आंकड़ा घटकर लगभग 4.996 लाख करोड़ डॉलर रह जाता है।

इससे पता चलता है कि रुपये की कमजोरी, घरेलू नॉमिनल आउटपुट में हुई बढ़ोतरी के असर को पूरी तरह खत्म कर देती है। इससे यह भी साफ होता है कि भारत कब इस डॉलर-बेस्ड अहम इकोनॉमिक माइल स्टोन को हासिल करेगा, यह तय करने में विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) में होने वाले बदलाव कितने अहम होते हैं।

2027 में भारत, जापान और UK को छोड़ सकता है पीछे

इस देरी के बावजूद, 2027 में भारत के ग्लोबल आर्थिक रैंकिंग में चौथे स्थान पर पहुंचने का अनुमान है। इस सूची में भारत अमेरिका, चीन और जर्मनी के बाद आएगा।

IMF के अक्टूबर के अनुमानों के अनुसार, 2027 में भारत की GDP 4.52 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगी। यह यूनाइटेड किंगडम की 4.49 लाख करोड़ डॉलर और जापान की अनुमानित 4.47 लाख करोड़ डॉलर की GDP से थोड़ी अधिक होगी। हालांकि, इन तीनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच का अंतर काफी कम है, जिसका मतलब है कि विनिमय दरों (exchange rates) में उतार-चढ़ाव अंतिम नतीजों को बदल सकते हैं।

IMF के ताजा अनुमानों के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था के और विस्तार करने की उम्मीद है। 2030 में यह 6.13 लाख करोड़ डॉलर और 2031 में 6.74 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकती है। इस स्तर पर भारत जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

 

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Share Market Rally: 5 वजहों से 700 प्वाइंट्स चढ़ा Sensex, आईटी सेक्टर की रौनक में Nifty पहुंचा 22600 के पास

Share Market Rally: वैल्यू बाइंग और इकनॉमिक ग्रोथ आउटलुक में अपग्रेड ने घरेलू स्टॉक मार्केट में आज शानदार रौनक बिखेरी। इस माहौल में सेंसेक्स 693 प्वाइंट्स उछल पड़ा तो निफ्टी ने फिर से 22500 का लेवल हासिल किया और 22600 के करीब पहुंचा। हालांकि ब्रोडर लेवल पर मार्केट में मिला-जुला रुझान है और स्मॉलकैप स्पेस में बिकवाली का काफी दबाव है। निफ्टी मिडकैप 100 में करीब आधे फीसदी की बढ़त है तो दूसरी तरफ निफ्टी स्मॉलकैप 100 में करीब 1% की गिरावट है।

अब इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज की बात करें तो फिलहाल 09:55 AM पर सेंसेक्स 692.86 प्वाइंट्स यानी 0.96% की बढ़त के साथ 72,617.54 और निफ्टी भी 213.10 प्वाइंट्स यानी 0.95% के उछाल के साथ 22,576.45 पर है। इंट्रा-डे में सेंसेक्स 696.23 प्वाइंट्स चढ़कर 72,620.91 और निफ्टी 217.80 प्वाइंट्स उछलकर 22,581.15 तक पहुंच गया था।

Stock Market Rally: ये है वजह

वैल्यू बाइंग

निचले स्तर पर खरीदारी यानी वैल्यू बाइंग से मार्केट को सपोर्ट मिला है।

India VIX में नरमी

मार्केट की घबराहट को मापने वाले वोलैटिलिटी इंडेक्स India VIX में नरमी से मार्केट को सपोर्ट मिला है। फिलहाल यह 4.40% की तेजी के साथ 14.58 पर है। इसके अधिक होने का मतलब शॉर्ट टर्म में वोलैटिलिटी बढ़ने की आशंका और कम होने का मतलब शॉर्ट टर्म में उठा-पटक कम होने की संभावना है।

जीडीपी ग्रोथ के अनुमान में बढ़ोतरी

IMF (इंटरनेशनल मॉनीटरी फंड) ने अपनी अक्टूबर की वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक में अनुमान लगाया है कि इस वित्त वर्ष 2027 में भारतीय अर्थव्यवस्था 6.4% की बजाय 7% की रफ्तार से बढ़ेगी। आईएमएफ के मुताबिक मजबूत घरेलू मांग और सर्विसेज एक्टिविटी से इसे वैश्विक स्तर पर आर्थिक उथल-पुथल से संभलने में मदद मिली।

IT Stocks का शानदार सपोर्ट

सेक्टरवाइज आज मार्केट को आईटी सेक्टर का शानदार सपोर्ट मिला है, जिसका निफ्टी इंडेक्स 3% से अधिक उछल पड़ा। इसे एफएमसीजी और रियल्टी से भी मजबूत सपोर्ट मिल रहा है, जिनके निफ्टी इंडेक्स 1-1% से अधिक मजबूत हुए हैं। निफ्टी पीएसयू बैंक करीब 1% और निफ्टी प्राइवेट बैंक करीब आधे फीसदी ऊपर चढ़ा है।

टेक्निकल वजह

एनालिस्ट्स के मुताबिक जब निफ्टी 22,300 के ऊपर है, इसमें रिकवरी की पूरी गुंजाइश है।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ईरान के 19 जहाज श्रीलंका के पास फंसे:खाना-पानी और ईंधन की कमी, अमेरिकी प्रतिबंधों के डर से मदद करने से बच रही सरकार

श्रीलंका के तट के पास अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरान के 19 जहाज फंसे हुए हैं। इन जहाजों पर खाने-पीने के सामान, पानी और ईंधन की कमी हो गई है। इसके बावजूद श्रीलंका सरकार फिलहाल उनकी मदद करने से बच रही है। सरकार को डर है कि ईरानी जहाजों को सहायता देने से अमेरिकी प्रतिबंधों का जोखिम पैदा हो सकता है। श्रीलंका का कहना है कि वह किसी भी फैसले से पहले अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखेगा। श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता थुषारा रोड्रिगो के मुताबिक, ये जहाज देश के तट से करीब 24 समुद्री मील दूर खड़े हैं। हालांकि, श्रीलंका को अमेरिका की ओर से अब तक कोई आधिकारिक चेतावनी नहीं मिली है कि ईरानी जहाजों की मदद करने पर उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। होर्मुज में अमेरिकी नाकेबंदी के बाद से फंसे जहाज श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिता हेराथ ने संडे टाइम्स को बताया कि ये ईरान के तेल टैंकर हैं। उनके मुताबिक, होर्मुज में अमेरिका की नौसैनिक नाकेबंदी दोबारा शुरू होने के बाद से दर्जनों ईरानी जहाज फंसे हुए हैं और अपने देश नहीं लौट पा रहे हैं। होर्मुज फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों से होने वाली सप्लाई का एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से गुजरता है। श्रीलंका के अमेरिका और ईरान, दोनों से कारोबारी रिश्ते श्रीलंका के लिए यह फैसला आसान नहीं है। देश अभी आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है और अमेरिका व ईरान दोनों उसके कारोबारी साझेदार हैं। श्रीलंका को आर्थिक संकट के दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से राहत पैकेज दिलाने में अमेरिका ने अहम भूमिका निभाई थी। अमेरिका की मदद से कृषि क्षेत्र को खाद्य संकट से उबारने के प्रयास भी किए गए थे। श्रीलंका के अधिकारियों के मुताबिक, जहाजों को सामान और दूसरी सेवाएं देने वाली कंपनियां अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित खतरे को लेकर सतर्क हैं। ऐसे में सरकार को मानवीय जरूरतों और अमेरिका के साथ अपने रिश्तों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। पहले भी ईरानी जहाज को मदद दे चुका है श्रीलंका करीब सात महीने पहले अमेरिकी टॉरपीडो हमले में ईरान का नौसैनिक जहाज IRIS Dena डूब गया था। इस घटना में 87 ईरानी नौसैनिकों की मौत हुई थी। यह जहाज भारत के निमंत्रण पर आयोजित नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा लेने के बाद अपने देश लौट रहा था। इसके बाद एक दूसरे ईरानी जहाज को तकनीकी खराबी के कारण श्रीलंका के बंदरगाह पर लाया गया था। उसके घायल नाविकों का श्रीलंकाई अस्पतालों में इलाज किया गया। जहाज से बचाए गए लोगों और घायल नाविकों को बाद में सुरक्षित ईरान भेज दिया गया था। एक्सपर्ट बोले- हमला होने पर मदद देना नैतिक जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार दयान जयतिलके ने कहा कि श्रीलंका मुश्किल स्थिति में है और उसकी मदद करने की भी व्यावहारिक सीमाएं हैं। उनके मुताबिक, दुनिया को यह समझना चाहिए कि श्रीलंका जानबूझकर सहायता से इनकार नहीं कर रहा, बल्कि उसे सावधानी से फैसला लेना पड़ रहा है। जयतिलके ने कहा कि ये युद्धपोत नहीं, बल्कि मालवाहक जहाज हैं, जो ईरान से चीन तक तेल ले जाते थे। अगर इन जहाजों पर हमला होता है और वे मदद के लिए श्रीलंका के जलक्षेत्र में आते हैं, तो उन्हें तुरंत सहायता देना देश की नैतिक जिम्मेदारी होगी। ——————– ये खबर भी पढ़ें…. ईरान ने अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर किया:हमलों के डर से ब्रिटेन से 12 बमवर्षक हटे; अमेरिकी सैनिक होटलों में रहने को मजबूर ईरान पर हमला करके अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखाना चाहता था, लेकिन अब यही युद्ध उसके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ईरानी हमलों के बाद अमेरिका को मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य तैनाती बदलनी पड़ी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Daily Voice: बाजार में अभी डिफेंसिव नजरिया बनाए रखने की जरूरत, लंबी अवधि में इंश्योरेंस सेक्टर दिखाएगा कमाल

Daily Voice : कोर महंगाई की चाल को देखते हुए 2027 की शुरुआत में फेड फंड्स रेट में एक और बढ़ोतरी संभव है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। भारत की आर्थिक विकास दर 6.5% से 7% के बीच स्थिर रहेगी। इसके बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा। इंश्योरेंस सेक्टर में लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना दिख रही है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन से इस सेक्टर को सपोर्ट मिलेगा। ये बातें वॉटरफ़ील्ड एडवाइज़र्स के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर और इक्विटीज़ हेड विपुल भोवर ने मनीकंट्रोल के साथ हुई एक बातचीत में कही हैं।

क्या आप US ट्रेज़री मार्केट को ग्लोबल मार्केट के लिए एक बड़ा जोखिम मानते हैं?

इसके जवाब में उन्होंने कहा कि यूएस का बॉन्ड मार्केट,ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम की नींव है। इस मार्केट में होने वाले स्ट्रक्चरल बदलाव आज ग्लोबल मार्केट पर असर डालने वाले सबसे अहम मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर हैं। जब “रिस्क-फ्री” US सॉवरेन डेट से अच्छा रिटर्न मिलता है तो यह ग्लोबल एसेट एलोकेशन की रणनीतियों को पूरी तरह से बदल देता है।

ट्रेजरी यील्ड के बढ़ने से ग्लोबल इक्विटी मल्टीपल्स पर दबाव पड़ता है और दुनिया भर की कंपनियों के लिए कर्ज लेने की लागत बढ़ जाती है। इसके कारण प्रॉफिट मार्जिन कम हो सकते हैं,कैपिटल एक्सपेंडिचर में रुकावट आ सकती है और बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

क्या अमेरिका की वित्तीय स्थिति टिकाऊ नहीं लगती?

इस पर उन्होंने आगे कहा कि जरूरी खर्च और ब्याज पर होने वाले भारी खर्च(जो इस साल 1 ​​लाख करोड़ डॉलर से अधिक हो गए हैं) में लगातार बढ़ोतरी से एक ढांचागत असंतुलन पैदा हो रहा है। अगर बड़े नीतिगत सुधार नहीं किए गए तो कर्ज का यह बढ़ता बोझ प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को घटा सकता है और भविष्य में आर्थिक मजबूती में बाधा डाल सकता है।

कांग्रेसनल बजट ऑफिस का अनुमान है कि 2026 में फ़ेडरल घाटा लगभग 2 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा,जो अमेरिका की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 6 प्रतिशत है। इसके चलते अमेरिकी जनता पर मौजूद कर्ज GDP के 100 प्रतिशत से अधिक हो जाएगा।

क्या आपको उम्मीद है कि इस साल के आखिर तक US फ़ेडरल रिज़र्व दो और बार ब्याज दरें बढ़ाएगा और उसके बाद अगले साल की पहली तिमाही में एक और बढ़ोतरी करेगा?

सितंबर 2026 में चेयरमैन केविन वॉर्श की अगुवाई में फ़ेडरल रिज़र्व ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की,जिससे ये दरें 3.75 प्रतिशत से 4.00 प्रतिशत की रेंज में आ गईं। ‘डॉट प्लॉट’ से पता चला कि FOMC के 18 में से 16 सदस्यों को उम्मीद है कि इस साल कम से कम एक बार और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी होगी,हालांकि सिर्फ़ चार सदस्यों को दो और बार बढ़ोतरी की उम्मीद है।

एनर्जी की बढ़ती लागत की वजह से आई महंगाई इस सख्ती को सही ठहराती है। कोर महंगाई के ट्रेंड को देखते हुए 2027 की शुरुआत में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी हो सकती है,लेकिन लंबे समय तक सख्ती का दौर चलने की उम्मीद नहीं है। इसलिए,हालांकि इस साल एक और बढ़ोतरी की संभावना है,लेकिन दो और बार बढ़ोतरी होने की संभावना कम है।

क्या आपको लगता है कि भारत की विकास दर 6.5 से 7 प्रतिशत के आसपास स्टेबल हो जाएगी?

भारत की आर्थिक विकास दर के 6.5 प्रतिशत से 7 प्रतिशत के बीच स्टेबल होने की उम्मीद है। IMF ने वित्त वर्ष 2026 और 2027 के लिए 6.5 प्रतिशत GDP विकास दर का अनुमान लगाया है। महामारी के बाद के असर, सरकारी खर्च और रुकी हुई मांग की वजह से भारत में विकास दर 7.8 प्रतिशत के करीब रही है, लेकिन बेस इफ़ेक्ट के कम होने और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव व ऊंची ब्याज दरों जैसी ग्लोबल चुनौतियों के कारण इतनी ऊंची दरें शायद लंबे समय तक बनी न रह पाएं। हालांकि, 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर के साथ भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

अमेरिकी डॉलर में बढ़ोतरी के अहम कारण क्या हैं?

अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज पर ज़्यादा यील्ड (रिटर्न) मुख्य रूप से महंगाई के दबाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से प्रभावित होती है, जो ग्लोबल इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करती हैं। इसके अलावा, जियोपॉलिटिकल अस्थिरता बढ़ने से जोखिम से बचने वाले निवेशक अमेरिकी डॉलर से मिलने वाली सुरक्षा और लिक्विडिटी की ओर आकर्षित होते हैं। इसके अलावा,अमेरिकी टेक्नोलॉजी शेयरों में भारी विदेशी निवेश और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर होने वाला खर्च डॉलर की मांग को और बढ़ा रहा है। दूसरे G10 देशों की तुलना में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मज़बूती, डॉलर की स्थिति को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी के तौर पर और मजबूत कर रही है।

क्या आप इक्विटी को लेकर इसलिए सतर्क हैं कि तेल की कीमतें ज़्यादा हैं और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ रही हैं या आपकी इस सोच के पीछे कोई और भी वजह है?

तेल की ऊंची कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार के लिए बड़ी चुनौतियां हैं। इसके साथ ही मिडिल ईस्ट में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई की चिंताएं भी हैं। ऐसे में,मौजूदा महंगे वैल्यूएशन को बनाए रखने के लिए बाजार में अभी तुरंत पॉजिटिव असर डालने वाली कोई वजह नहीं दिख रही है। ऐसे में जब तक अर्निंग्स की साफ तस्वीर नहीं दिखती या वैल्यूएशन में जरूरी टाइम करेक्शन नहीं होता,तब तक डिफेंसिव रुख अपनाना ही बेहतर है।

क्या आपको भारत में भी ब्याज दरें बढ़ाने का दौर शुरू होता दिख रहा है?

उम्मीद है कि भारत में ब्याज दरें बढ़ाने का दौर अक्टूबर 2026 में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की बैठक से शुरू होगा। रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) ने फरवरी 2023 से रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखा है, लेकिन घरेलू और ग्लोबल स्तर पर बढ़ते दबावों के कारण इसमें बदलाव की जरूरत है।

कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर जाने और रुपये की कीमत घटने की वजह से खुदरा महंगाई दर 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बनी हुई है। ग्लोबल फाइनेंशियल हालात के खराब होने के साथ,अर्थशास्त्रियों को दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जिससे दर बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी और सख्ती का एक नया दौर शुरू हो जाएगा।

क्या आपको लगता है कि मौजूदा स्तरों पर इंश्योरेंस सेक्टर में खरीदारी का मौका है?

भारत में इंश्योरेंस मार्केट की पहुंच अभी भी काफी कम है और 2026 से 2030 के बीच सालाना प्रीमियम ग्रोथ के 6.9 प्रतिशत तक बढ़ने का अनुमान है। मिडिल क्लास की बढ़ती खपत,मददगार रेगुलेटरी सुधार और डिजिटल इनोवेशन की वजह से यह सेक्टर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए जबरदस्त ग्रोथ की संभावना रखता है।

 

Market Next Week : मिड और स्मॉल कैप्स में लगातार चौथे हफ्ते दिखी गिरावट, जानिए अगले हफ्ते कैसी रह सकती है बाजार की चाल

 

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पाकिस्तान के खजाने में अचानक 3 अरब डॉलर बढ़े:विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 26 अरब डॉलर पहुंचा; इसमें कमाई कम, कर्ज ज्यादा

पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में एक हफ्ते में 3 अरब डॉलर से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। 11 सितंबर तक स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा भंडार का 21.39 अरब डॉलर पहुंच गया। यह बैंक के इतिहास का सबसे ऊंचा स्तर है। स्टेट बैंक और दूसरे बैंकों को मिलाकर पाकिस्तान का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 26.79 अरब डॉलर हो गया है। यह सितंबर 2021 के बाद सबसे ज्यादा है। हालांकि, इस अचानक बढ़ोतरी की बड़ी वजह विदेशी कर्ज है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय बाजार से रकम जुटाने के लिए यूरोबॉन्ड जारी किया था। इससे उसके रिजर्व में बड़ी मात्रा में डॉलर जुड़े। यानी रिजर्व में आया यह पैसा पूरी तरह नई कमाई नहीं है। शहबाज बोले- रिजर्व बढ़ना आर्थिक नीतियों की सफलता प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने विदेशी मुद्रा भंडार के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने पर वित्त मंत्री मोहम्मद औरंगजेब, स्टेट बैंक के गवर्नर जमील अहमद और अपनी आर्थिक टीम की तारीफ की। उन्होंने विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी इस उपलब्धि में योगदान के लिए धन्यवाद दिया। शहबाज ने कहा कि स्टेट बैंक के पास रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार सरकार की आर्थिक टीम की लगातार मेहनत का नतीजा है। उन्होंने इसे इस बात का संकेत बताया कि सरकार की आर्थिक नीतियां सही दिशा में आगे बढ़ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय पूंजी बाजार में दोबारा लौटने से दुनिया के निवेशकों का भरोसा उसकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ रहा है। यूरोबॉन्ड से मुद्रा भंडार बढ़ा 11 सितंबर को खत्म हुए हफ्ते में पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार में 3.06 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। स्टेट बैंक के मुताबिक, इसका मुख्य कारण यूरोबॉन्ड से मिली रकम थी। यूरोबॉन्ड विदेशी बाजार से कर्ज लेने के लिए जारी किया जाने वाला एक तरह का बॉन्ड है। इसे खरीदने वाले निवेशक सरकार को पैसा देते हैं। सरकार तय समय के बाद यह रकम ब्याज के साथ वापस करती है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरोबॉन्ड जारी कर रकम जुटाई और उसे अपने विदेशी मुद्रा भंडार में शामिल कर लिया। इसलिए रिजर्व बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान ने एक हफ्ते में इतनी नई कमाई कर ली। डॉलर फिलहाल उसके पास जरूर हैं, लेकिन उनका एक बड़ा हिस्सा कर्ज के रूप में आया है। इससे पाकिस्तान को अभी विदेशी भुगतान करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिल गई है। लेकिन आगे इसी कर्ज को चुकाने के लिए उसे फिर विदेशी मुद्रा जुटानी होगी। अभी पाकिस्तान के पास कितने डॉलर हैं? एक हफ्ते पहले कुल रिजर्व 23.72 अरब डॉलर था। यानी सिर्फ सात दिन में इसमें करीब 3.08 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। कुल रिजर्व सितंबर 2021 के करीब 27.1 अरब डॉलर के स्तर से अभी थोड़ा कम है। हालांकि, अकेले स्टेट बैंक के पास मौजूद 21.39 अरब डॉलर अब तक का सबसे ज्यादा रिजर्व है। रिजर्व बढ़ने से पाकिस्तान को क्या फायदा? विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने का मतलब है कि पाकिस्तान के पास अब डॉलर का बड़ा बफर है। इन डॉलर का इस्तेमाल वह तेल, मशीनरी, कच्चा माल और दूसरी जरूरी चीजें खरीदने में कर सकता है। विदेशी कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाने के लिए भी डॉलर की जरूरत होती है। पाकिस्तान का कुल 26.79 अरब डॉलर का रिजर्व करीब तीन महीने के आयात खर्च के बराबर है। इसका मतलब मौजूदा रिजर्व करीब तीन महीने के औसत आयात बिल के बराबर है। इसका यह मतलब नहीं कि पाकिस्तान तीन महीने तक बिना कोई नया डॉलर कमाए काम चला सकता है। विदेशों में काम करने वाले पाकिस्तानियों से भी मदद मिली पाकिस्तान के लिए विदेशों में काम करने वाले लोगों से आने वाला पैसा यानी रेमिटेंस भी विदेशी मुद्रा का बड़ा स्रोत है। अगस्त में पाकिस्तान को करीब 3.66 अरब डॉलर की रेमिटेंस मिली। जुलाई में यह रकम करीब 3.63 अरब डॉलर थी। इसी दौरान पाकिस्तान का बाकी दुनिया के बीच लेन-देन में घाटा भी सिर्फ 9.8 करोड़ डॉलर रहा। जुलाई में यह घाटा 44.5 करोड़ डॉलर था। यानी जुलाई के मुकाबले अगस्त में स्थिति बेहतर हुई, लेकिन घाटा अभी भी बना हुआ है। पाकिस्तान अभी भी आयात पर ज्यादा डॉलर खर्च कर रहा अगस्त में पाकिस्तान ने करीब 6.64 अरब डॉलर का सामान और सेवाएं आयात कीं, जबकि उसका निर्यात करीब 3.33 अरब डॉलर रहा। यानी पाकिस्तान विदेशों से जितने डॉलर का सामान और सेवाएं खरीद रहा है, उतने डॉलर वह बेचकर नहीं कमा पा रहा। जुलाई-अगस्त 2026 में पाकिस्तान का कुल घाटा करीब 54.3 करोड़ डॉलर रहा। पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 85.3 करोड़ डॉलर था। इससे पता चलता है कि बाहरी खाते की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा की जरूरत अभी भी काफी ज्यादा है। अब सबसे बड़ी चुनौती रिजर्व को बनाए रखना पाकिस्तान के लिए अब सिर्फ विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना ही काफी नहीं होगा। उसे आने वाले महीनों में इसे बनाए रखना भी होगा। इसके लिए तीन चीजें अहम रहेंगी: खासकर तेल की कीमत बढ़ने पर पाकिस्तान का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे उसके विदेशी मुद्रा भंडार पर फिर दबाव पड़ेगा। पाकिस्तान का खजाना भरा, फिर भी विदेशी कर्ज की जरूरत रिकॉर्ड रिजर्व के बावजूद पाकिस्तान को पुराने कर्ज चुकाने हैं। सितंबर से दिसंबर 2026 के बीच उसे IMF को कई भुगतान करने हैं। साथ ही, पाकिस्तान दूसरे देशों और संस्थानों से भी विदेशी मुद्रा जुटाने के रास्ते खुले रखना चाहता है। रॉयटर्स के मुताबिक, पाकिस्तान चीन के साथ 30 अरब युआन की मुद्रा स्वैप व्यवस्था को 2027 में बढ़ाने पर विचार कर रहा है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर दोनों देशों को एक-दूसरे की मुद्रा उपलब्ध कराई जा सकती है। वहीं, पाकिस्तान अमेरिका के साथ 10 अरब डॉलर की एक्सचेंज स्टेबिलाइजेशन सुविधा को लेकर भी बातचीत कर रहा है। इसका इस्तेमाल विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने की स्थिति में किया जा सकता है। इसके अलावा पाकिस्तान का 7 अरब डॉलर का IMF कार्यक्रम भी जारी है। ——————– यह खबर भी पढ़ें… पाकिस्तान के बाद बांग्लादेश में भी तुर्किये की ड्रोन यूनिट पाकिस्तान के बाद अब तुर्किये बांग्लादेश में भी अपनी रक्षा तकनीक का दायरा बढ़ा रहा है। दोनों देश मिलकर ड्रोन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें…

हाथों में कटोरा लेकर आजादी मना रहा 80 साल का पाकिस्तान! कंगाली के ये निशान बयान कर रहे उसके असली हालात

पाकिस्तान को बने करीब 80 साल हो चुके हैं, लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था आज भी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF के कर्ज पर निर्भर है। पिछले कई दशकों में पाकिस्तान को कई बार कर्ज और आर्थिक सुधारों के लिए मदद मिली है। इसके बावजूद देश बार-बार भुगतान संकट में फंसता रहा है और उसे अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए आईएमएफ का सहारा लेना पड़ता है। फिलहाल पाकिस्तान करीब 7 अरब डॉलर के IMF प्रोग्राम के तहत है। वहीं, देश पर सरकारी कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था के कुल आकार यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब 70 फीसदी है।

सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज और उसका ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने रक्षा पर अपना खर्च बढ़ाया है, जबकि विकास से जुड़े कामों पर खर्च काफी सीमित है। आईएमएफ के हालिया कार्यक्रम से पाकिस्तान को 2023 के लगभग डिफॉल्ट की स्थिति के बाद अपनी विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ाने और अर्थव्यवस्था को कुछ हद तक स्थिर करने में मदद मिली है। हालांकि, देश की कई पुरानी आर्थिक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। इन्हीं समस्याओं के कारण पाकिस्तान को बार-बार आईएमएफ से कर्ज लेना पड़ता है।

पाकिस्तान में टैक्स से होने वाली कमाई कम है, निर्यात का दायरा सीमित है और कर्ज चुकाने में सरकार का बड़ा पैसा चला जाता है। इसके अलावा, ऊर्जा क्षेत्र की हालत भी खराब है और देश अपनी जरूरतों के लिए लगातार विदेशी कर्ज और आर्थिक मदद पर निर्भर रहता है। ऐसे में पाकिस्तान जब अपनी आजादी की 80वीं सालगिरह मना रहा है, तो बड़ा सवाल यह है कि उसे बार-बार आईएमएफ के पास क्यों जाना पड़ता है। साथ ही, कई वर्षों से चल रहे आर्थिक सुधार कार्यक्रम आखिर इस कर्ज के चक्र को खत्म करने में सफल क्यों नहीं हो पाए हैं।

पाकिस्तान 25 बार आईएमएफ के पास जा चुका है

आईएमएफ के आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान 1950 में इस संस्था का सदस्य बना था। इसके बाद से वह 25 बार आईएमएफ के साथ अलग-अलग समझौते कर चुका है। इन समझौतों में कई तरह के कर्ज कार्यक्रम शामिल हैं। हालांकि, इनमें से हर कार्यक्रम को आर्थिक संकट से बाहर निकालने वाला बेलआउट पैकेज नहीं कहा जा सकता। फिर भी, बार-बार आईएमएफ की मदद लेने से पता चलता है कि पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझता रहा है।

पाकिस्तान का मौजूदा ‘विस्तारित कोष सुविधा’ कार्यक्रम करीब 7 अरब डॉलर का है। इसे सितंबर 2024 में 37 महीने के लिए मंजूरी दी गई थी। इससे पहले 2023 में पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर की ‘स्टैंडबाय व्यवस्था’ मिली थी। उस समय देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से कम हो रहा था और पाकिस्तान के कर्ज न चुका पाने यानी डिफॉल्ट का खतरा बढ़ गया था।

आईएमएफ ने मई 2026 में पाकिस्तान के मौजूदा आर्थिक कार्यक्रम की समीक्षा पूरी की। इसके बाद करीब 1.1 अरब डॉलर की एक और कर्ज की किस्त जारी करने को मंजूरी दी गई। आईएमएफ के मुताबिक, अलग ‘लचीलापन और स्थिरता सुविधा’ के तहत मिलने वाली रकम को जोड़ने पर दोनों कार्यक्रमों के तहत पाकिस्तान को अब तक करीब 4.8 अरब डॉलर जारी किए जा चुके थे।

इसी आर्थिक स्थिति के बीच पाकिस्तान अपनी आजादी के 80वें साल में प्रवेश कर रहा है। आईएमएफ के नए कार्यक्रमों से देश को कुछ समय के लिए आर्थिक स्थिरता जरूर मिली है, लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को बार-बार संकट में डालने वाली बुनियादी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं।

पाकिस्तान के हालात हैं बेहद खराब

पाकिस्तान की सबसे बड़ी आर्थिक समस्याओं में से एक लगातार विदेशी मुद्रा की कमी रही है। जब देश का आयात खर्च, पुराने कर्ज की किस्तें और दूसरी विदेशी देनदारियां उसकी निर्यात से होने वाली कमाई और विदेश से आने वाली रकम से ज्यादा हो जाती हैं, तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ने लगता है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान को भुगतान संकट से बचने के लिए दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है। पाकिस्तान के आर्थिक इतिहास में यह स्थिति बार-बार देखने को मिली है। हर कुछ साल बाद देश के सामने विदेशी मुद्रा का संकट खड़ा होता है और उसे आईएमएफ से मदद लेनी पड़ती है।

2023 में पाकिस्तान डिफॉल्ट के करीब पहुंच गया था। इसके बाद सितंबर 2024 में आईएमएफ ने उसके लिए एक नया आर्थिक कार्यक्रम मंजूर किया। करीब 7 अरब डॉलर के इस कार्यक्रम का मकसद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को स्थिर करना, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना, टैक्स से होने वाली कमाई बढ़ाना, सरकारी कंपनियों में सुधार करना और ऊर्जा क्षेत्र की स्थिति बेहतर करना था। इसके साथ ही, लंबे समय तक टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए बेहतर माहौल तैयार करने पर भी जोर दिया गया।

आजादी के 80 साल बाद भी पाकिस्तान का आईएमएफ के एक बड़े कार्यक्रम पर निर्भर रहना बताता है कि देश की कई पुरानी आर्थिक कमजोरियां अब तक दूर नहीं हो पाई हैं।

कछुए की चाल से बढ़ रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान की आर्थिक रिकवरी अभी भी बहुत धीमी है। आईएमएफ के जुलाई 2026 के अनुमान के मुताबिक, 2026 में पाकिस्तान की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 3.6 फीसदी रहने की उम्मीद है। वहीं, खुदरा महंगाई करीब 7.2 फीसदी रह सकती है। 2025 में पाकिस्तान की कुल अर्थव्यवस्था का आकार करीब 407.8 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया था। आईएमएफ ने मई 2026 की समीक्षा में कहा था कि वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में पाकिस्तान की आर्थिक विकास दर में सुधार हुआ है। महंगाई भी नियंत्रण में रही और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने की दिशा में उम्मीद से बेहतर काम हुआ। हालांकि, आईएमएफ ने यह भी चेतावनी दी कि मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के सामने आगे भी अनिश्चितता बनी हुई है और जोखिम कम नहीं हुए हैं।

पाकिस्तान का रक्षा खर्च भी बढ़ा

पाकिस्तान की आर्थिक परेशानियों का एक संबंध देश में सेना की बढ़ती राजनीतिक ताकत से भी जोड़ा जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स ने फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को पाकिस्तान की विदेश नीति पर सबसे ज्यादा प्रभाव रखने वाली शख्सियतों में से एक बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक, उनका प्रभाव अब सिर्फ सैन्य मामलों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के राजनीतिक और सुरक्षा से जुड़े फैसलों में भी उनकी भूमिका बढ़ गई है।

2025 में फील्ड मार्शल बनने के बाद आसिम मुनीर की स्थिति और मजबूत हुई है। इसी बीच, आईएमएफ के आर्थिक कार्यक्रम के तहत वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की जरूरत के बावजूद पाकिस्तान ने अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए पाकिस्तान सरकार ने रक्षा क्षेत्र के लिए 3 लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है। यह पिछले साल की तुलना में करीब 18 फीसदी ज्यादा है। दूसरी ओर, सरकार ने विकास से जुड़े कामों के लिए सिर्फ 1 लाख करोड़ रुपये का संघीय बजट रखा है। इससे साफ है कि आर्थिक दबाव के बावजूद पाकिस्तान में रक्षा खर्च को विकास खर्च की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।

अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था

अमेरिकी राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार नवारो ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े 100% टैरिफ के मुद्दे को आपस में सुलझा लेंगे। दरअसल, शुक्रवार को अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर किया था। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। पहले 500%टैरिफ का प्रस्ताव था 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह बिल कानून बना तो भारत पर असर पहली स्थिति: भारत रूस से तेल खरीदता रहे अमेरिका के 100% टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात बिल पर पड़ सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिका में दोगुना महंगा हो जाएगा। अमेरिकी खरीदार सस्ता विकल्प ढूंढेंगे जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको, चीन। नतीजतन भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद, केमिकल्स आदि के ऑर्डर घट जाएंगे। दूसरी स्थिति: भारत रूस को छोड़कर दूसरे देशों से तेल खरीदे तो रूस से आने वाले तेल पर प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव बढ़ता है, तो भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ेगा। यह महंगा पड़ सकता है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। अमेरिका के प्रतिबंध पूरे असरदार नहीं अमेरिका के प्रतिबंध और टैरिफ से कई देशों की अर्थव्यवस्था और कारोबार पर असर पड़ा, लेकिन राजनीतिक मकसद हमेशा पूरे नहीं हुए। 1. क्यूबा: 1960 से अमेरिका ने 1960 में क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। छह दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ये प्रतिबंध क्यूबा की सरकार को बदलने में सफल नहीं हुए। क्यूबा ने 2023 में संयुक्त राष्ट्र में कहा कि इन प्रतिबंधों से उसे अब तक 159 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है। 2. इराक: 1990 से इराक पर 1990 में आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। इनका उसकी अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर बड़ा असर पड़ा। तेल से होने वाली कमाई और जरूरी सामान के आयात पर असर पड़ा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में प्रतिबंधों के दौरान भूख, बीमारी और गरीबी बढ़ने की बात कही गई। 3. ईरान: 2012 से 2012 में कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद ईरान का तेल निर्यात करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन घट गया। उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दो साल तक मंदी में रही। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2012-14 के दौरान प्रतिबंधों से ईरान के निर्यात को 17.1 अरब डॉलर, यानी उसकी GDP के करीब 4.5% का नुकसान हुआ। 4. चीन: 2018 से अमेरिका ने 2018 में चीन से आने वाले करीब 250 अरब डॉलर के सामान पर अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगाया। 2019 में चीन से अमेरिका आने वाला सामान 16.2% घटकर 452.2 अरब डॉलर रह गया और दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 17.6% कम हुआ। लेकिन अमेरिकी व्यापार आयोग के मुताबिक, इन टैरिफ का ज्यादातर खर्च अमेरिकी कंपनियों और खरीदारों ने उठाया। 5. रूस: 2022 से यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और दूसरे देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे रूस के लिए विदेशों से पैसा जुटाना, कारोबार करना और जरूरी तकनीक हासिल करना मुश्किल हुआ। IMF ने अप्रैल 2022 में अनुमान लगाया था कि उस साल रूस की अर्थव्यवस्था 8.5% घट सकती है। लेकिन रूस ने तेल समेत अपना सामान दूसरे देशों में बेचकर नुकसान को कुछ कम कर लिया। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

पेट्रोल डीजल के दामों में लगी आग तो सड़कों पर उतर गए पाकिस्तानी और IMF को लगे कोसने

पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। ईंधन के महंगे होने, नई पेट्रोलियम लेवी और बढ़ती महंगाई के विरोध में माल ढोने वाले ट्रांसपोर्टरों ने देशभर में अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी है। शनिवार से शुरू हुई इस हड़ताल का असर देश में सामान की आवाजाही पर पड़ सकता है। पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार के साथ बातचीत में अपनी मांगें पूरी नहीं होने के बाद ट्रक चालक, ट्रेलर ऑपरेटर और तेल टैंकर कंपनियां भी हड़ताल में शामिल हो गई हैं।

ट्रांसपोर्टरों के इस कदम से बाजारों तक सामान पहुंचाने में परेशानी बढ़ सकती है। इसका असर जरूरी सामान की सप्लाई पर भी पड़ने की आशंका है। यह हड़ताल ऐसे समय में शुरू हुई है, जब जमात-ए-इस्लामी ने पेट्रोलियम लेवी और बढ़ती महंगाई के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन किया था। इसके बाद अब ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर आम लोगों और कारोबार पर पड़ने को लेकर पाकिस्तान सरकार पर दबाव और बढ़ गया है।

ट्रांसपोर्टरों ने क्यों शुरू की हड़ताल?

पाकिस्तान के ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि गाड़ियों को चलाने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में माल ढोने वाली गाड़ियां चलाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। ट्रांसपोर्टर सरकार से डीजल की कीमत कम करने, मोटरवे टोल घटाने और विदहोल्डिंग टैक्स में राहत देने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा, ट्रांसपोर्टर चाहते हैं कि पूरे पाकिस्तान में एक्सल-लोड के नियम एक जैसे लागू किए जाएं। उनकी मांग है कि 10 पहियों वाले ट्रकों को 35 टन तक सामान ले जाने की अनुमति दी जाए।

ट्रांसपोर्टरों की दूसरी मांगों में कस्टम के नियमों में बदलाव और हाईवे पर जुर्माना कम करना शामिल है। वे यह भी चाहते हैं कि पंजाब हाईवे पेट्रोल से कमर्शियल गाड़ियों के चालान काटने का अधिकार वापस लिया जाए। इसके अलावा, भारी माल ढोने वाली गाड़ियों के लिए ड्राइविंग लाइसेंस आसानी से जारी करने की भी मांग की गई है। ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि इन समस्याओं का समाधान नहीं होने तक कारोबार चलाना मुश्किल होता जा रहा है।

सरकार और ट्रांसपोर्टरों के बीच बातचीत बेनतीजा

शुक्रवार को ट्रांसपोर्टरों के प्रतिनिधियों और पाकिस्तान के संचार मंत्री अलीम खान के बीच बातचीत हुई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता नहीं हो सका। ‘डॉन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑल पाकिस्तान गुड्स ट्रांसपोर्ट इत्तेहाद के प्रवक्ता मोहम्मद ओवैस चौधरी ने कहा कि ट्रांसपोर्टरों ने सरकार के सामने अपनी सभी समस्याएं और मांगें रख दी हैं। सरकार ने बातचीत के लिए सोमवार को एक और बैठक करने का प्रस्ताव दिया है। हालांकि, ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर समाधान नहीं निकलता, तब तक उनका आंदोलन अनिश्चितकाल तक जारी रहेगा। इस हड़ताल से पाकिस्तान में माल की आवाजाही और सामान की सप्लाई पर असर पड़ने की आशंका है।

पाकिस्तान में ईंधन की कीमतें इतनी ज्यादा क्यों हैं?

पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की लागत में बढ़ोतरी बताई जा रही है। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव के कारण ईंधन की सप्लाई पर भी असर पड़ा है। मार्च से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इसका असर पाकिस्तान में भी पड़ा है और सरकार को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बार-बार बदलाव करना पड़ा है। अप्रैल में पेट्रोल की कीमत बढ़कर रिकॉर्ड 459 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थी। वहीं, डीजल की कीमत 520.35 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई थी।

पाकिस्तान के लिए डीजल बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में सड़क के जरिए होने वाले माल परिवहन का बड़ा हिस्सा डीजल से चलता है। ऐसे में डीजल की कीमत बढ़ने का सीधा असर ट्रकों और दूसरी कमर्शियल गाड़ियों के संचालन खर्च पर पड़ता है। इससे सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत भी बढ़ जाती है। इसके अलावा, सरकार ने पेट्रोलियम लेवी भी लागू की है। यह लेवी ईंधन की अंतिम कीमत में जुड़ती है और इसका बोझ सीधे ग्राहकों पर पड़ता है। यही वजह है कि पाकिस्तान में बढ़ती ईंधन कीमतों का असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सामान की कीमतों और आम लोगों के घरेलू बजट पर भी पड़ रहा है।

पेट्रोलियम लेवी क्या है?

पेट्रोलियम लेवी ईंधन पर सरकार की ओर से लगाया जाने वाला एक शुल्क है। इसे पेट्रोल, डीजल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों पर वसूला जाता है। इससे सरकार को राजस्व मिलता है। पाकिस्तान में यह लेवी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है, क्योंकि इसे पहले से महंगे ईंधन के ऊपर लगाया गया है। जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख हाफिज नईम-उर-रहमान ने सरकार से पेट्रोलियम लेवी हटाने की मांग की है। उनका कहना है कि सरकार की आर्थिक और वित्तीय नीतियों का बोझ सीधे आम लोगों पर डाला जा रहा है।

शुक्रवार को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हाफिज नईम-उर-रहमान ने कहा कि यह लेवी स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी सरकार से इसे खत्म करने की अपील की। उन्होंने सरकार की उस दलील को भी खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया है कि पेट्रोलियम लेवी कम करने से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ पाकिस्तान की प्रतिबद्धताओं पर असर पड़ सकता है।

सड़कों पर उतरे आम पाकिस्तानी

ट्रांसपोर्टरों की लंबी हड़ताल का सीधा असर आम लोगों पर पड़ सकता है। अगर हड़ताल ज्यादा दिनों तक जारी रहती है, तो देशभर में सामान की ढुलाई महंगी हो सकती है। ट्रक और ट्रेलर शहरों के बीच खाने-पीने की चीजें, रोजमर्रा का सामान, कारखानों के लिए कच्चा माल और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाते हैं। वहीं, तेल टैंकर पेट्रोल और डीजल की सप्लाई का काम करते हैं।

अगर ट्रांसपोर्ट का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक बंद रहता है, तो कंपनियों को सामान पहुंचाने में देरी हो सकती है। साथ ही, उन्हें ढुलाई और सामान पहुंचाने पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। इसका असर आगे चलकर सामान की कीमतों पर पड़ सकता है और कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाली हड़ताल पाकिस्तान में महंगाई का दबाव और बढ़ा सकती है। यही महंगाई पहले से लोगों की परेशानी का कारण बनी हुई है और इसी के विरोध में प्रदर्शन भी हो रहे हैं।

तेल टैंकर ऑपरेटरों के हड़ताल में शामिल होने से चिंता और बढ़ गई है। अगर ईंधन की ढुलाई प्रभावित होती है, तो पेट्रोल पंपों और दूसरे ईंधन वितरण केंद्रों तक पेट्रोल-डीजल की सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इससे आने वाले दिनों में ईंधन की उपलब्धता को लेकर भी परेशानी खड़ी हो सकती है।

क्या पाकिस्तान का नक्शा बदलने वाला है और उससे अलग नया देश बन पाएगा बलूचिस्तान? समझिए आजादी के दावे के पीछे कितना दम

Balochistan Claim Explained: रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का दावा करने वाले बलूच समूहों ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील तेज कर दी है। पाकिस्तान से आजादी का ऐलान करने के बाद बलूचों के इस ग्लोबल कैंपेन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में दुनिया का सबसे नया संप्रभु देश बन सकता है और क्या इससे पाकिस्तान का नक्शा बदल जाएगा? इसको लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन चल रहे हैं लेकिन इंटरनेशन कानून और ग्लोबल डिप्लोमेसी का इतिहास बताता है कि सिर्फ स्वतंत्रता का ऐलान कर देने से ही कोई नया देश अस्तित्व में नहीं आ जाता। किसी भी क्षेत्र को नए राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए कूटनीतिक मान्यता, रीजनल कंट्रोल और इंटरनेशनल वैलिडेशन की सबसे बड़ी चुनौतियों से पार पाना होता है।

आजादी का ऐलान केवल पहला कदम, संप्रभुता के लिए क्या हैं नियम?

अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी क्षेत्र या समूह द्वारा खुद को स्वतंत्र घोषित करने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। हालांकि सिर्फ एकतरफा ऐलान कर देने से ऑटोमेटिकली कोई नया देश नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानदंडों के मुताबिक किसी क्षेत्र को संप्रभु राज्य के रूप में काम करने के लिए मुख्य रूप से चार शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है-

  • 1 – उस क्षेत्र में एक स्थायी आबादी होनी चाहिए।
  • 2 – उस देश की एक डिफाइंड टेरिटरी और बॉर्डर होना चाहिए।
  • 3 – उस देश में एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए।
  • 4 – दूसरे संप्रभु देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।

अगर बलूच समूह इनमें से कुछ शर्तों का आंशिक रूप से दावा भी करते हैं तब भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बिना कोई भी नया क्षेत्र वैश्विक संस्थाओं का हिस्सा नहीं बन सकता।

कूटनीतिक मान्यता: बलूचिस्तान के राह की सबसे बड़ी रुकावट

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने ग्लोबल कम्युनिटी से संप्रभुता स्वीकार करने की अपील की तो है लेकिन अब तक दुनिया के किसी भी देश ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। कूटनीतिक मान्यता एक संप्रभु देश द्वारा लिया जाने वाला विशुद्ध राजनीतिक निर्णय होता है। जब तक बलूचिस्तान को अन्य देशों से औपचारिक कूटनीतिक मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह संयुक्त राष्ट्र (UN) का सदस्य नहीं बन सकता। इसके अलावा अन्य देशों के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता। इसके साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF, विश्व बैंक) का फायदा उसे नहीं मिल सकता।

जमीनी हकीकत: पाकिस्तान का प्रशासनिक व सैन्य नियंत्रण

संप्रभु देश का दर्जा हासिल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण है। भले ही बलूचिस्तान के अलग अलग हिस्सों में अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं लेकिन इस्लामाबाद अभी भी अपने नागरिक प्रशासन, सुरक्षा बलों और न्यायिक प्रणाली के माध्यम से इस पूरे प्रांत पर संवैधानिक और प्रशासनिक नियंत्रण रखता है। जब तक पाकिस्तान का इस प्रांत पर व्यावहारिक और प्रशासनिक नियंत्रण बना रहता है तब तक बलूचिस्तान की संप्रभुता के किसी भी दावे को व्यावहारिक धरातल पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर क्या कहता है?

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का तर्क है कि उनके लोगों के पास आत्मनिर्णय का अधिकार है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दस्तावेज आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करते हैं लेकिन इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूदा संप्रभु राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता की भी कड़ाई से रक्षा करता है। ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किसी देश से अलग होने का समर्थन किया है, जैसे कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति या व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ लंबे समय से जारी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में।

क्या भारत दे सकता है बलूचिस्तान को मान्यता?

बलूच नेताओं द्वारा कूटनीतिक समर्थन की अपील के बाद यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत बलूचिस्तान को एक अलग देश के रूप में मान्यता दे सकता है? भारत का आधिकारिक और पुराना कूटनीतिक रुख यही रहा है कि वह बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानता है। भारत ने बलूचिस्तान में मानव अधिकारों के उल्लंघन और सुरक्षा चिंताओं का मुद्दा तो बार-बार उठाया है लेकिन उसने अलगाववादी दावों या अलग देश की घोषणा को कभी औपचारिक मान्यता नहीं दी है। किसी भी अलग हुए क्षेत्र को मान्यता देना भारत की लंबी अवधि की विदेश नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव होगा, जिसके व्यापक भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

इतिहास के सबक: सिर्फ घोषणा से नहीं बनते नए देश

आपको बता दें कि दुनिया का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि सिर्फ स्वतंत्रता की घोषणा करने से राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता। इसे कोसोवो के उदाहरण से समझा जा सकता है। कोसोवो ने 2008 में अपनी आजादी की घोषणा की थी और उसे 100 से अधिक देशों ने मान्यता दी है लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी वैश्विक शक्तियां आज भी इसे पूर्ण देश नहीं मानती हैं। सोमालीलैंड, उत्तरी साइप्रस और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्रों के पास वर्षों से अपना खुद का शासन ढांचा है लेकिन व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता न मिलने की वजह से वे आज भी औपचारिक देशों की श्रेणी से बाहर हैं।

पाकिस्तान के लिए चुनौतियां और बलूचिस्तान का भविष्य

बलूच अलगाववादी समूहों की यह ताजा घोषणा ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता, खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद और बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद से जूझ रहा है। 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस घोषित करने और कूटनीतिक अपील करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान के मुद्दे पर ध्यान जरूर आकर्षित हुआ है। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानूनी और कूटनीतिक ढांचे के तहत बलूचिस्तान के एक मान्यता प्राप्त संप्रभु देश बनने की राह बेहद कठिन और अनिश्चित है। जब तक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता और वैश्विक संस्थाओं में प्रवेश हासिल नहीं होत, तब तक सिर्फ स्वतंत्रता के दावों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बलूचिस्तान की कानूनी स्थिति रातों-रात नहीं बदल सकती।