ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे हूती ठिकानों पर सीधे हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे।
स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी अतिरिक्त सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। रिपोर्ट- ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था।
ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे यमन में हूती ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। 4 यूरोपीय देशों ने मिलकर बनाया टायफून विमान टाइफून केवल हमला करने वाला लड़ाकू विमान नहीं है। यह दुश्मन के विमानों को रोकने, हवाई क्षेत्र की सुरक्षा करने और जरूरत पड़ने पर जमीन पर हमला करने में सक्षम है। इसका रडार दूर से दूसरे विमानों का पता लगाने में मदद करता है। जरूरत पड़ने पर यह उनका पीछा कर सकता है और हवा में मिसाइल से उन्हें निशाना बना सकता है। इसे यूरोप के चार देशों- ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन के सहयोग से विकसित किया गया था। इसका निर्माण किसी एक देश का अकेला प्रोजेक्ट नहीं है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे। स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। हालांकि तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था। ———————–
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सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा:अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव बनाने वाला यूरोप खुद भी उससे बड़े पैमाने पर तेल-गैस खरीद रहा है। 2022 से अब तक यूरोपीय देशों ने रूस से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने जुलाई 2025 में गुजरात स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे, जिसमें रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी रही है। 2026 के शुरुआती नौ महीनों में भी करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए की खरीद हुई। रूस के मुताबिक, जिन रास्तों से रूसी ऊर्जा खरीदने की छूट है, उनके जरिए यूरोप को तेल और गैस की सप्लाई जारी है। रूस से ईंधन छूट के नियम अलग-अलग यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। वहीं, भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त आयात शुल्क लगा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत पर दबाव और यूरोपीय देशों को मिली छूट के नियम अलग-अलग क्यों हैं। भास्कर एनालिसिस: खरीद रोकने से यूरोप को मंहगाई का डर तेल-गैस महंगी हो सकती है यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप में गैस और बिजली की कीमतें बढ़ी थीं। रिपोर्ट में गैस की कीमतों में 46% और बिजली की कीमतों में 21% तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है। रूस से सप्लाई पूरी तरह बंद होने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इससे आम लोगों के बिल और कंपनियों की लागत बढ़ने का डर है। 2026 में भी रूस से गैस खरीद बढ़ी यूरोपीय संघ की ऊर्जा नियामक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मई 2026 के बीच यूरोप में रूस से पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस की खरीद पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 7% बढ़ी। रूस से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की खरीद भी 11% बढ़ी। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद यूरोप की रूस पर ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरे देशों से गैस खरीदना भी आसान नहीं यूरोप अमेरिका और दूसरे देशों से भी गैस खरीदता है। लेकिन दूसरे देशों से गैस मंगाने के लिए अलग इंतजाम और खर्च की जरूरत होती है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भी ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में रूस से खरीद तुरंत बंद करना यूरोप के लिए आसान नहीं है। पहले से हुए समझौते भी बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों ने रूस के साथ लंबे समय के लिए गैस खरीदने के समझौते कर रखे हैं। यूरोप की ऊर्जा नियामक एजेंसी के मुताबिक, रूसी एलएनजी खरीदने के लिए कुछ कंपनियों के सालाना 20 से 32 अरब घनमीटर तक के अनुबंध हैं। इन समझौतों और दूसरी जगह से गैस लाने के इंतजाम में समय लगने के कारण आयात बंद करना मुश्किल है। रूस की एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार EU है ऊर्जा पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस से होने वाले एलएनजी निर्यात में यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 49% थी। चीन की हिस्सेदारी 24% रही। पाइपलाइन के जरिए भेजी जाने वाली रूसी गैस में भी यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 32% थी। चीन की हिस्सेदारी 31% और तुर्किये की 29% रही। यानी रूस से गैस खरीदने में यूरोप अब भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से एलएनजी खरीदने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन समेत नीदरलैंड्स भी शामिल है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई: रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव बनाने वाला यूरोप खुद भी उससे बड़े पैमाने पर तेल-गैस खरीद रहा है। 2022 से अब तक यूरोपीय देशों ने रूस से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने जुलाई 2025 में गुजरात स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे, जिसमें रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी रही है। 2026 के शुरुआती नौ महीनों में भी करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए की खरीद हुई। रूस के मुताबिक, जिन रास्तों से रूसी ऊर्जा खरीदने की छूट है, उनके जरिए यूरोप को तेल और गैस की सप्लाई जारी है। रूस से ईंधन छूट के नियम अलग-अलग यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। वहीं, भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त आयात शुल्क लगा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत पर दबाव और यूरोपीय देशों को मिली छूट के नियम अलग-अलग क्यों हैं। भास्कर एनालिसिस: खरीद रोकने से यूरोप को मंहगाई का डर तेल-गैस महंगी हो सकती है यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप में गैस और बिजली की कीमतें बढ़ी थीं। रिपोर्ट में गैस की कीमतों में 46% और बिजली की कीमतों में 21% तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है। रूस से सप्लाई पूरी तरह बंद होने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इससे आम लोगों के बिल और कंपनियों की लागत बढ़ने का डर है। 2026 में भी रूस से गैस खरीद बढ़ी यूरोपीय संघ की ऊर्जा नियामक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मई 2026 के बीच यूरोप में रूस से पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस की खरीद पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 7% बढ़ी। रूस से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की खरीद भी 11% बढ़ी। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद यूरोप की रूस पर ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरे देशों से गैस खरीदना भी आसान नहीं यूरोप अमेरिका और दूसरे देशों से भी गैस खरीदता है। लेकिन दूसरे देशों से गैस मंगाने के लिए अलग इंतजाम और खर्च की जरूरत होती है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भी ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में रूस से खरीद तुरंत बंद करना यूरोप के लिए आसान नहीं है। पहले से हुए समझौते भी बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों ने रूस के साथ लंबे समय के लिए गैस खरीदने के समझौते कर रखे हैं। यूरोप की ऊर्जा नियामक एजेंसी के मुताबिक, रूसी एलएनजी खरीदने के लिए कुछ कंपनियों के सालाना 20 से 32 अरब घनमीटर तक के अनुबंध हैं। इन समझौतों और दूसरी जगह से गैस लाने के इंतजाम में समय लगने के कारण आयात बंद करना मुश्किल है। रूस की एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार EU है ऊर्जा पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस से होने वाले एलएनजी निर्यात में यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 49% थी। चीन की हिस्सेदारी 24% रही। पाइपलाइन के जरिए भेजी जाने वाली रूसी गैस में भी यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 32% थी। चीन की हिस्सेदारी 31% और तुर्किये की 29% रही। यानी रूस से गैस खरीदने में यूरोप अब भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से एलएनजी खरीदने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन समेत नीदरलैंड्स भी शामिल है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई: रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर विवाद शुरू हो गया है। देश की करीब 96% आबादी मुस्लिम है, लेकिन सरकार ने सरकारी स्कूलों के ड्रेस कोड में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत ऐसे कपड़े पहनने पर रोक लगाई गई है, जिन्हें सरकार धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मानती है। इसके बाद हिजाब पहनकर स्कूल पहुंचीं कुछ छात्राओं और शिक्षकों को कक्षाओं में जाने से रोक दिया गया। फैसले के विरोध में छात्राओं ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। सरकार ने ड्रेस कोड में क्या बदलाव किया 96% आबादी मुस्लिम, फिर भी धर्मनिरपेक्ष देश अजरबैजान की करीब 96% आबादी खुद को मुस्लिम मानती है। इनमें ज्यादातर शिया मुस्लिम हैं, जबकि सुन्नी मुस्लिम भी बड़ी संख्या में हैं। इसके बावजूद अजरबैजान का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष बताता है। इसका मतलब है कि सरकार किसी एक धर्म के आधार पर काम नहीं करती। संविधान लोगों को अपने धर्म को मानने की आजादी भी देता है। यही वजह है कि स्कूलों में हिजाब को लेकर विवाद बढ़ गया है। सरकार ड्रेस कोड को सभी छात्रों पर समान रूप से लागू करना चाहती है, जबकि विरोध करने वालों का कहना है कि हिजाब पहनना किसी की निजी पसंद और धार्मिक आस्था का मामला है। छात्राओं ने कक्षाओं का बहिष्कार किया नए नियमों के खिलाफ अजरबैजान में विरोध शुरू हो गया है। स्थानीय मीडिया के मुताबिक, कम से कम दो स्कूलों में छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया। सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें स्कूल में प्रवेश से रोके जाने पर छात्राएं अपनी शिक्षिकाओं से गले मिलती और रोती दिखाई दे रही हैं। शिक्षिका जहरा हसानोवा ने अल जजीरा को बताया कि उन्हें स्कूल में हिजाब पहनकर आने की अनुमति नहीं होने की जानकारी दी गई। उन्होंने कहा कि हिजाब पहनना निजी फैसला है और इसे पहनना या उतारना व्यक्ति की अपनी पसंद होनी चाहिए। जेल में बंद पत्रकार ने विरोध में भूख हड़ताल शुरू की अजरबैजान की जेल में बंद पत्रकार पोलाद असलानोव ने भी नए नियमों के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की है। उन्हें 2020 में देशद्रोह के मामले में दोषी ठहराया गया था और वह 113 साल की सजा काट रहे हैं। उनकी पत्नी गुलमिरा असलानोवा के फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किए गए संदेश में असलानोव ने कहा कि वह जेल में रहते हुए भी लोगों के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। देश में इंटरनेट बंद किए जाने की खबरें भी सामने आईं, लेकिन इंटरनेट पर नजर रखने वाले संगठनों ने इनकी पुष्टि नहीं की है। फैसले के खिलाफ पड़ोसी देश तुर्किये में भी प्रदर्शन अजरबैजान के फैसले का विरोध पड़ोसी देश तुर्किये तक पहुंच गया है। पिछले हफ्ते इस्तांबुल में अजरबैजान के वाणिज्य दूतावास के बाहर लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की। तुर्किये में कुछ लोगों ने इसकी तुलना 1997 के उस दौर से की है, जब वहां हिजाब पहनने वाली महिलाओं को विश्वविद्यालयों में जाने से रोका गया था। उस समय सरकारी नौकरियों में काम करने वाली कुछ महिलाओं को भी हिजाब के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी थी। अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने अपनी पार्टी की बैठक में कहा कि किसी को भी उनके देश की जीवनशैली में दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने सीधे तौर पर तुर्किये का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके बयान को वहां हो रहे प्रदर्शनों से जोड़कर देखा गया। —————– ये खबर भी पढ़ें…. सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा:अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर; अब तेल-गैस की कमाई में हिस्सा मांग रहे विद्रोही सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने देश को तेल की कमाई से निकालकर दुनिया का बड़ा निवेश और पर्यटन केंद्र बनाना चाहते हैं। लेकिन जिस यमन युद्ध से वे पिछले 11 साल से निकलने की कोशिश कर रहे थे, उसी ने उन्हें फिर घेर लिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी शहरों, हवाई अड्डों और तेल ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, कई गलत फैसलों के कारण सऊदी अरब की मुश्किलें बढ़ी हैं। पिछले साल यमन को लेकर सऊदी अरब और UAE के बीच पुरानी साझेदारी टूट गई। सऊदी के खिलाफ लड़ाई में ट्रम्प ने भी सलमान का साथ नहीं दिया। अब सऊदी अरब अपने सहयोगी देशों की मदद से हूतियों के खिलाफ नया अभियान चला रहा है, लेकिन युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता साफ नहीं है। UAE के हटते ही कमजोर पड़ी सऊदी की रणनीति सऊदी अरब और UAE पहले यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ साथ मिलकर लड़ रहे थे। लेकिन बाद में दोनों के हित टकराने लगे। सबसे बड़ा झगड़ा इस बात पर हुआ कि युद्ध के बाद यमन पर किसका और किस तरह का शासन होना चाहिए।
सऊदी अरब- यमन में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। UAE- यमन में अलग देश की मांग करने वाले STC के साथ खड़ा है।
2025 के आखिर में STC ने दक्षिणी यमन के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। सऊदी अरब को लगा कि इससे उसकी सीमा की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसके बाद दिसंबर 2025 में सऊदी अरब ने मुकल्ला पोर्ट पर हवाई हमला किया। सऊदी का आरोप था कि वहां UAE से आए हथियार उतारे जा रहे थे। जबकि UAE का कहना था कि जहाजों में हथियार नहीं थे और सामान यमन में तैनात उसके सैनिकों के लिए था। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। UAE ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने वाले अपने सैनिक वापस बुला लिए। इसका असर यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ रहे गुटों पर पड़ा। UAE के समर्थन से तैयार हुए हजारों लड़ाके अचानक अपनी पुरानी कमान से अलग हो गए। सऊदी अरब उनकी जगह वैसी मजबूत व्यवस्था नहीं बना पाया। इससे हूतियों को मजबूत होने का मौका मिल गया। ईरान युद्ध ने सऊदी अरब को फिर घसीटा UAE से साझेदारी टूटने के बाद सऊदी अरब अभी यमन में अपने पैर जमाने की कोशिश कर ही रहा था कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद जुलाई में उनका अंतिम संस्कार हुआ। इसमें शामिल होने के लिए हूती प्रतिनिधिमंडल एक विमान से तेहरान पहुंचा। जब ये लौट रहे थे तो इन्हें कहा गया कि वे यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं, हूती अधिकारी ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। इसके बाद प्लेन को अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट उतरना पड़ा। इस घटना से हूती विद्रोही इतने नाराज हो गए कि उन्होंने सऊदी के साथ चल रहा 4 साल पुराना युद्ध विराम तोड़ दिया। ट्रम्प से मदद मांगी, लेकिन अमेरिका ने हाथ खींचे सऊदी अरब को उम्मीद थी कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उसकी सैन्य मदद करेगा। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग भी बढ़ाया था। लेकिन हूतियों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में यह भरोसा कमजोर पड़ता दिखा। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से दो बार बात की और हूतियों पर हमला करने का आग्रह किया। ट्रम्प ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया। इसके बजाय अमेरिका ने ओमान में हूतियों से बातचीत की, ताकि उनके साथ अपना संघर्षविराम बनाए रखा जा सके। सऊदी अरब अब दूसरे देशों से मदद जुटा रहा है। फ्रांस ने रक्षा संसाधन और सैन्यकर्मी भेजने पर सहमति जताई है, जबकि ब्रिटेन ने सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरने के लिए विमान भेजने की बात कही है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने भी रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। जंग का सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर असर मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना चाहते हैं। इसके लिए वे देश में घूमने-फिरने की जगहें, खेल, फिल्में और मनोरंजन बढ़ा रहे हैं। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी शुरू किए जा रहे हैं। लेकिन लगातार हो रहे हमलों से इन योजनाओं पर खतरा बढ़ गया है। इलाके में तनाव के कारण इस साल कई फिल्म समारोह, पुरस्कार कार्यक्रम और संगीत के बड़े आयोजन टालने पड़े हैं। अक्टूबर के आखिर में सऊदी अरब में होने वाली बड़ी निवेश बैठक पर भी असर पड़ने की आशंका है। तेल के ठिकानों पर हमले और तेल की सप्लाई रुकने से देश की कमाई घट सकती है। सऊदी अरब अब हूतियों से लड़ने के लिए यमन के अपने साथी गुटों की मदद ले रहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि सिर्फ हवाई हमले करने और कुछ इलाकों पर कब्जा करने से यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। यमन में लड़ने वाले गुटों के बीच ही कई बातों पर सहमति नहीं है। वे इस बात पर भी एकमत नहीं हैं कि आगे यमन की सरकार कैसी होनी चाहिए। हूतियों को रोकना मुश्किल, तेल कारोबार पर खतरा सऊदी अरब के सामने दो बड़ी मुश्किलें हैं। पहली, हूतियों के हमलों को रोकना और अपनी सीमाओं और तेल के ठिकानों को सुरक्षित रखना। दूसरी, यमन में लड़ाई खत्म करने का ऐसा रास्ता निकालना, जिससे उसे बार-बार हमला न करना पड़े। जानकारों का कहना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई जारी रहेगी, ईरान हूतियों की मदद से सऊदी अरब पर दबाव बना सकता है। ऐसे में सिर्फ हथियारों और हवाई हमलों से सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक शांति बनाए रखना मुश्किल होगा। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की लड़ाई उसकी सीमाओं से दूर रहे, लेकिन अब यही लड़ाई उसके लिए बड़ी परेशानी बन गई है। इससे देश की सुरक्षा, तेल से होने वाली कमाई और विकास की योजनाओं पर असर पड़ रहा है। अब मोहम्मद बिन सलमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे देश को फिर से विकास के रास्ते पर कैसे आगे बढ़ाएं, जबकि यमन की लड़ाई कब खत्म होगी, यह अभी साफ नहीं है।

बेसिक सवाल है! इस सप्ताह रिजर्व बैंक के ब्याज दर फैसले, शेयर बाजार, जीडीपी की हवाबाजी, लुढ़कते रुपए, भारत से भागती पूंजी जैसे तथ्यों से बेसिक सवाल है कि तब देश की आर्थिकी भला चल कैसे रही है? वह प्लेटफॉर्म पर खड़ी है या वह उस छुक-छुक इंजन से बंधी है जो भाप छोड़ रहा है पर न कोयला है न बॉयलर में भभकती आग है?
आप भी सोचें, भारत के हर बंदे को सोचना चाहिए कि आखिर भारत की आर्थिकी के पहियों का मौजूदा इंजन है क्या?
पहले देश विशेष की ताक़त उसकी फ़ौज, कारखानों और खेतों से मापी जाती थी। अब पैसे से है। मतलब पूंजी, कमाई, बचत, श्रीवृद्धि, लक्ष्मी की चंचलता प्राथमिक कसौटी (वैश्विक भी) है। इस मायने में भारत की रियलिटी क्या है? क्या यह रियलिटी नहीं है कि देश के अमीर, देश की बुद्धि भारत छोड़ विदेश जा बस रही है? क्या यह खबर नहीं है कि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकाल कर दूसरे देशों के बाजारों में निवेश कर रहे हैं? मतलब भारत का शेयर बाजार जोखिम भरा, कम कमाई का है वही इंडोनेशिया हो या तुर्किये, आसियान देश वैश्विक पूंजी के लिए इसलिए कमाई वाले हैं क्योंकि इन देशों की इकोनॉमी सचमुच तेजी से बढ़ती हुई है।
सोचें, सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में अप्रैल-जून 2026 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत थी, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA) की बढ़ोतरी 8.2 प्रतिशत। सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 की विकास दर का अनुमान बढ़ा कर 7.1 प्रतिशत किया। अब यदि भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत बढ़ रही है, तो उसकी करेंसी, रुपया और शेयर बाज़ार क्यों लगातार कमजोर होता हुआ है? गुरूवार को सेंसेक्स फिर भारी गिरा। तथ्य है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने वर्ष 2026 में अब तक लगभग 30.4 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे है। अकेले अक्टूबर के शुरुआती नौ दिनों में लगभग 47,000 करोड़ रुपए के भारतीय शेयरों को विदेशियों ने बेचा।
दुनिया के किसी भी पैमाने पर यह मामूली उतार-चढ़ाव नहीं है। सो, सीधा सवाल है एक तरफ भारत में उत्पादन बढ़ने के सरकारी आंकड़े हैं, वहीं विदेशी निवेशक भारत की कंपनियों के भविष्य को लेकर घबराए हुए हैं, उनके शेयर बेच भाग रहे हैं? ऐसे ही भारत की करेंसी विदेशी बाजार में कौड़ियों वाली हैसियत में है। इस वर्ष डॉलर के मुक़ाबले रुपए का मूल्य सात प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।
सरकारी दावा है कि आर्थिकी की रेलगाड़ी तेज़ विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, कंक्रीटों में नजर आते बुनियादी ढांचे से दुनिया की सर्वाधिक तेज़ बुलेट ट्रेन है। वहीं रियलिटी में गाड़ी प्लेटफॉर्म पर छुक-छुक करते हुए है। बाज़ार की हकीकत, भारतीय करेंसी के घटते भाव, विदेशी पूंजी के भागने, अब नई ऊंची ब्याज दर, महंगा तेल-ईंधन, महंगे कर्ज व व्यापारियों, अमीरों का भागना या हाथ पर हाथ धरे बैठे होना है।
कह सकते हैं कि खेती, आईटी कंपनियां, सेवा क्षेत्र, मेक इन इंडिया के कारखानों की भाप से आर्थिकी का इंजन सरपट भागता हुआ है। पर खेती यदि खुशहाल होती तो किसानों के पेट नहीं भरे होते! किसान तब दो-दो हजार रुपए की प्रधानमंत्री की रेवड़ी पर टकटकी लगाए उसका इंतजार क्या करते हुए होते? सब्जी बाजार, आटे-तेल के दाम क्या आम आदमी का जीना हराम ऐसा किए हुए होते जो रिजर्व बैंक को महंगाई के हवाले ब्याज दर बढ़ाने का फैसला करना पड़ता? ऐसी ही आईटी कंपनियों, सेवा क्षेत्र की कंपनियों के शेयर बाजार में लुढ़कने का औसत है। भारत की आईटी कंपनियों की अमेरिका में हुई एआई क्रांति से लुटिया डूबती हुई है। इन कंपनियों में ही निवेशित पूंजी सर्वाधिक भाग रही है। और मेक इन इंडिया या इंफ्रास्ट्रक्चर की तो बात ही नहीं होनी चाहिए। अंबानी हो, अडानी हो, एयरलाइंस सेक्टर हो या टेक्सटाइल सेक्टर या बैंकिंग सब महंगाई बढ़ा रहे हैं या बांग्लादेश, वियतनाम, आसियान देशों से पिट रहे हैं या आर्थिकी का कर्जा बढ़ा रहे हैं। बट्टेखाते में भारत की पूंजी, बचत वैसे ही जा रही है जैसे शेयर बाजार के चक्कर में मध्यवर्गीय नौकरीपेशा नौजवानों ने म्यूचुअल फंड (एसआईपी) के जरिए अपनी बचत को शेयर बाज़ार में उड़ेला, जबकि खर्चों के लिए कर्ज लेकर अपने आपको ब्याज (जो महंगा होना ही है) के चक्रव्यूह में फंसाया।
सो, पूंजी देशी (कभी भारत में घर-परिवार रिकॉर्ड बचत किया करते थे) हो या विदेशी वह भारत की इकोनॉमी को दौड़ाती हुई नहीं है। न ही भारत की उत्पादकता (यदि होती तो चीन के आयातों पर क्या खतरनाक स्तर पर आश्रित होते?) का इंजन है। तो ले देकर पैसे की मालिक या तो सरकार, उसके खर्च और बाबुओं का भ्रष्टाचार है या सरकारी कृपाओं के क्रोनी खरबपति याकि अडानी-अंबानी जैसे देशी जगत सेठ हैं। इन सबकी ऊर्जा के इंजन का नाम क्या है? 140 करोड़ लोगों का पेट! हां, भारत के 140 करोड़ लोगों की बुनियादी भूख, जीने का संघर्ष ही 2026 की इंडियन इकोनॉमी की वह छुक-छुक रेलगाड़ी है, जिसमें फर्स्ट क्लास, मिडिल क्लास के कुछ डिब्बे हैं बाकी तो भूखे पेटों की आग, उसके हाथ-पांव मार कर जीने की जिजीविषा है!
क्या नहीं?

हालिया अनुभवों है कि ओलिंपिक आयोजन मेजबान देश में जितना उल्लास एवं गर्व का भाव भरते हैं, उससे कहीं अधिक ये विवादों से घिरते रहे हैं। ओलिंपिक्स अपने पीछे अक्सर कई गंभीर समस्याएं छोड़ जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति (आईओसी) ने पुष्टि कर दी है कि भारत 2036 के ओलिंपिक खेलों की मेजबानी के लिए दावा पेश करने वाले देशों में शामिल है। इसके अलावा कतर, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, हंगरी, तुर्किये और दक्षिण कोरिया ने भी अपना दावा रखा है। इनमें आईओसी किन्हें सक्षम दावेदार मानती है, उसकी सूची वह मार्च 2027 में जारी करेगी। फिर उस सूची में शामिल देशों के साथ उसकी वार्ता होगी। आईओसी के मुताबिक फैसला धन जुटाने की क्षमता और खेल के लिए मौजूद राजनीतिक एवं जन समर्थन की कसौटी पर होगा। 2028 के मध्य में आईओसी 2036 के मेजबान की अपनी प्राथमिकता सूची जारी करेगी। 2029 के मध्य तक अंतिम निर्णय का एलान किया जाएगा।
भारत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य के प्रमुख शहर अहमदाबाद में ओलिंपिक्स आयोजन का इरादा जताया है। नीता अंबानी भारत के दावेदारी अभियान का नेतृत्व कर रही हैं। इसलिए राजनीतिक समर्थन और फंडिंग क्षमता को लेकर शायद ही कोई संदेह उठे। जन समर्थन का मुद्दा पेचीदा है, जिस पर अभी कुछ कहना ठीक नहीं होगा। हालिया अनुभवों पर गौर करें, तो ओलिंपिक आयोजन अब मेजबान देश में जितना उत्सव एवं गर्व का भाव भरते हैं, उससे कहीं अधिक ये विवादों से घिरते रहे हैं। इसकी बड़ी वजह है कि मेजबानी अपने पीछे अक्सर शहर और देश पर भारी आर्थिक बोझ, कर्ज संकट, और रखरखाव के लिए बेकार पड़े महंगे स्टेडियम (सफेद हाथी) जैसी गंभीर समस्याएं छोड़ जाती है।
2004 में ग्रीस और 2026 में ब्राजील में इस आयोजन के कारण नागरिक सेवाओं के बजट में कटौती करनी पड़ी थी। 2020 में टोक्यो ओलिंपिक के आयोजन का कुल खर्च शुरुआती बजट से दोगुने से भी ज्यादा हो गया। उससे सबक लेकर 2024 में पेरिस में मौजूदा और अस्थायी इन्फ्रास्ट्रक्चर के उपयोग की रणनीति अपनाई गई। फिर भी खर्च अनुमानित बजट से कई अरब यूरो ऊपर चला गया। निर्माण कार्यों के लिए गरीबों का होने वाला विस्थापन हर जगह एक अलग समस्या रही है। जब धनी देशों की भी यही कहानी है, तो सवाल है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश को ऐसे आयोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए?
पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने पहली बार ‘मक्का पैक्ट’ एक्टिवेट कर दिया है। 2 महीने पहले हुए करार के तहत किसी एक देश पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। यानी, अब हूतियों से जंग में उलझे सऊदी की मदद के लिए पाक-तुर्किये को सेनाएं भेजनी पड़ेंगी। आखिर मदद मांगने को कैसे मजबूर हुआ सऊदी, क्या वाकई दूसरे देश के लिए लड़ेंगी पाकिस्तान-तुर्किये की सेनाएं और क्या इससे भारत को चिंता करनी चाहिए; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: हूतियों ने सऊदी अरब को मदद मांगने पर कैसे मजबूर किया? जवाब: सऊदी अरब के पड़ोस में है यमन। यहां की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती। यमन की मान्यता प्राप्त सरकार को सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। सऊदी के जवान सरकार की सेना के साथ मिलकर कई इलाकों में डेरा डाले हुए हैं। वहीं सरकार के खिलाफ विद्रोह करके यमन के उत्तर-पश्चिम इलाके, राजधानी सना और लाल सागर के तटीय इलाके में हूतियों का कब्जा है। इन्हें ईरान से हथियार और पैसे की मदद मिलती है। 2015 से ही हूतियों और सऊदी समर्थित यमन की सेना में इलाकों पर कब्जे को लेकर छिटपुट संघर्ष चलता रहा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र ने सीजफायर करवाया। बीते साल शुरू हुई ईरान-अमेरिका जंग के दौरान ईरान ने अमेरिका के सहयोगी सऊदी पर भी हमले किए। हूतियों ने भी कई बार सऊदी पर हमला करने की धमकी दी। 5 अगस्त 2026 को हूतियों ने सऊदी समर्थित यमन सेना के कैंपों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए. हूतियों ने आरोप लगाया कि यहां सऊदी गठबंधन सेना जमावड़ा बढ़ा रही थी। इसी के साथ 4 साल पुराना सीजफायर टूट गया… सवाल-2: पाकिस्तान ने पहले टाला, फिर जमीनी सेना भेजने को क्यों तैयार हुआ? जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने पर कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’ पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें थीं… 1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमेट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट प्रतीकात्मक है, क्योंकि इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं है। तुर्किये और पाकिस्तान का सीधे टकराव में शामिल होना मुश्किल है। 2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान, अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका में है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ने से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती थी। 3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान में शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी थी, तब भी पाकिस्तान ने इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’ इधर 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर हूतियों पर हवाई हमले करने को कहा था। ट्रम्प ने मदद ठुकरा दी। फिर 15 सितंबर को हूतियों और अमेरिका में सीक्रेट मीटिंग हुई, जिसमें हूतियों ने वादा किया कि वो लाल सागर में अमेरिका और इजराइल के जहाजों पर हमला नहीं करेंगे। इससे सऊदी को अमेरिकी मदद मिलने की उम्मीद और कम हो गई। सऊदी ने दावा किया कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने सऊदी के पवित्र शहर मक्का की तरफ ड्रोन छोड़े। हूतियों के प्रवक्ता याह्या सिरी का कहना था, ‘हमारा निशाना सऊदी के तेल और सैन्य ठिकाने थे, जो कि पवित्र स्थलों से काफी दूर हैं।’ हालांकि ड्रोन को रोकने के दौरान मक्का प्रांत के ताइफ शहर में एक व्यक्ति की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए। इसके बाद पाकिस्तान का रुख बदलने लगा… सवाल-3: तो क्या वाकई पाक-तुर्किये की सेनाएं हूतियों से लड़ेंगी? जवाब: साझा बयान में कहा गया है, ‘तीनों देश सऊदी में ‘तेजी से’ जॉइंट फोर्सेज और दूसरी ताकत (यानी हथियार, इंटेलिजेंस वगैरह) तैनात करेंगे।’ हालांकि पाकिस्तानी सैनिकों का सऊदी जाना नई बात नहीं है…. वहीं तुर्किये के विदेश मंत्री फिदान ने कहा है कि मक्का पैक्ट, नाटो की तरह काम करेगा, लेकिन मदद का पैमाना आगे की बातचीत से तय होगा। तुर्किये के सामने अपनी सेना भेजने में एक अड़चन ये भी है कि उसके कानून के तहत विदेश में सेना भेजने के लिए संसद की मंजूरी लेनी होगी। 5 अक्टूबर के फैसले में भी कहा गया है कि सऊदी की मदद में सेनाओं की तैनाती तीनों देशों के राष्ट्रीय कानूनों और आपसी सहमति के आधार पर होगी। सवाल-4: पाकिस्तान-भारत जंग छिड़ी, तो क्या तुर्किये-सऊदी भी लड़ने आएंगे? जवाब: सऊदी और तुर्किये भारत को दुश्मन नहीं मानते, इसलिए जंग में उनके हमले की आशंका बेहद कम है। लेकिन 3 बातें गौर करनी चाहिए… पाकिस्तान पैक्ट का फायदा उठाएगा: कार्नेगी इंडिया थिंकटैंक में सिक्योरिटी स्टडीज प्रोग्राम के फेलो दिनकर पेरी के मुताबिक, ‘यह पैक्ट पश्चिम एशिया के लिए बना है, लेकिन पाकिस्तान इसे भारत के साथ संघर्षों में इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा। खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद बनी हालात के चलते।’ सऊदी भारत पर हमला नहीं करेगा: भारत और सऊदी अरब के अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं। सऊदी और भारत में सालाना 40 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है। सऊदी-पाकिस्तान से यह 5 बिलियन डॉलर से भी कम है। इसलिए पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी कहते हैं, ‘अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करे या ऑपरेशन सिंदूर जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो, तो सऊदी पाकिस्तान का रक्षक बनकर नहीं आएगा।’ तुर्किये हथियार सप्लाई जारी रखेगा: रिपोर्ट्स के मुताबिक 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को 350 से ज्यादा ड्रोन्स भेजे थे। पाकिस्तान के समर्थन में स्टेटमेंट जारी किया था। पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया के मुताबिक, ‘इस पैक्ट से भारत-पाकिस्तान की स्थिति नहीं बदलेगी। तुर्किये पाकिस्तान को ड्रोन सप्लाई करता रहेगा और सऊदी खुद को पाकिस्तान का समर्थक दिखाने से बचेगा।’ सवाल-5: भारत के पास इस नई चुनौती की क्या काट है? जवाब: भारत की सबसे बड़ी काट उसके खाड़ी देशों से डिप्लोमैटिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। खाड़ी देशों में 89 लाख भारतीय रहते हैं। भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। सऊदी अरब अपना करीब 16% तो UAE करीब 11% कच्चा तेल भारत को बेचता है। मई 2026 में ही भारत ने UAE के साथ रक्षा समझौता किया है। यह रिश्ते और मजबूत किए जा सकते हैं… ——– ये एक्सप्लेनर भी पढ़िए… पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। पूरी खबर पढ़िए…
पाकिस्तान में ड्रोन हमलों से बचने के लिए पुलिस और सेना अब मछली पकड़ने वाले जाल का इस्तेमाल कर रही है। अल जजीरा के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के संवेदनशील इलाकों में पुलिस चौकियों और सुरक्षा ठिकानों के ऊपर कई मीटर की ऊंचाई पर ये जाल लगाए जा रहे हैं। सुरक्षाकर्मियों का ऐसा मानना है कि हमलावर ड्रोन इन जालों में फंस सकते हैं। इससे ड्रोन हमले में होने वाला नुकसान 40 से 50% तक कम किया जा सकता है। हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस तरीके को पूरी तरह भरोसेमंद मानने से इनकार किया है। आतंकी गोलीबारी से ज्यादा ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे पुलिस के मुताबिक, जाल लगाने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आतंकियों ने हमले का तरीका बदल दिया है। अब वे गोलीबारी और मोर्टार के साथ ड्रोन का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में 29 जुलाई को सबसे घातक हमलों में से एक हुआ था। बम से भरे ड्रोन से पुलिस चौकी पर हमला किया। इसमें 11 पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद कई घंटे तक चली मुठभेड़ में 15 हमलावर भी मारे गए। पुलिस के मुताबिक, इस साल खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में कम से कम 16 हमले हो चुके हैं। इसी वजह से यह जिला प्रांत के सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल है। ऐसे हमलों से बचने के लिए हंगू पुलिस ने कम लागत वाला तरीका अपनाया। पुलिस चौकी की छत और चारदीवारी के बीच कई मीटर ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए गए। इससे चौकी के ऊपर एक तरह की जालीदार छत बन गई। एक चेकपोस्ट पर करीब 1 लाख रुपए खर्च हंगू के जिला पुलिस अधिकारी तारिक हबीब के मुताबिक, एक सामान्य पुलिस चेकपोस्ट को इस तरह के जाल से ढकने में करीब 1.4 लाख रुपए खर्च होते हैं। खैबर पख्तूनख्वा पुलिस के प्रवक्ता के मुताबिक, हंगू के अलावा कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान जैसे कम से कम 5 और संवेदनशील जिलों में भी पुलिस चौकियों और चेकपोस्ट पर ये जाल लगाए गए हैं। प्रांत के कुछ इलाकों में सेना के ठिकानों पर भी ‘एंटी-ड्रोन जाल’ लगाए गए हैं। पुलिस ने इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रांतीय सरकार से अतिरिक्त पैसे भी मांगे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों को इस तरीके पर भरोसा नहीं इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक इम्तियाज गुल ने इसे नासमझी वाला सस्ता तरीका बताया। उनके मुताबिक, आतंकियों का निशाना हमेशा पुलिस स्टेशन या चेकपोस्ट ही नहीं होते। ड्रोन का इस्तेमाल बड़े और जरूरी ठिकानों पर हमला करने के लिए किया जाता है, ताकि हमले का असर ज्यादा दिखाई दे और लोगों में डर पैदा हो। उन्होंने कहा कि असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां ड्रोन के हवा में उठते ही उसे रोकने की क्षमता रखती हैं। यूक्रेन में भी इस्तेमाल हुआ है ऐसा तरीका पेशावर के आतंकवाद और सुरक्षा विशेषज्ञ फिदा अदील ने बताया कि मछली पकड़ने वाले जाल से ड्रोन रोकना कोई नया तरीका नहीं है। सेना पहले से ही सामान और ठिकानों को छिपाने के लिए ऐसे जाल इस्तेमाल करती रही है। यूक्रेन में भी रूसी ड्रोन को रोकने के लिए इनका इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, अदील के मुताबिक, विस्फोटक से भरे ड्रोन के खिलाफ जाल कितना काम करेगा, यह उसके डिजाइन और उसे लगाने के तरीके पर निर्भर करता है। उन्होंने पुलिस के 40 से 50% नुकसान कम होने के दावे पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि असली हमले या सही परीक्षण के बिना इस आंकड़े की पुष्टि नहीं हो सकती। ——————— यह खबर भी पढ़ें… सऊदी अरब में तैनात होंगी पाकिस्तान-तुर्किये की फौज लाल सागर में हूती विद्रोहियों की बढ़ती ताकत ने अब सऊदी अरब को सीधे सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया है। सऊदी समर्थित यमनी सेना ने हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। इसी बीच पाकिस्तान और तुर्किये भी सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपने सैन्य बल तैनात करने की तैयारी में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

