अमेरिका के इनकार किया, अब ब्रिटेन सऊदी की मदद करेगा:टाइफून विमान भेजने का ऐलान, हूती विद्रोहियों के हमले से तेल ठिकानों की हिफाजत होगी

ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे हूती ठिकानों पर सीधे हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे।
स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी अतिरिक्त सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। रिपोर्ट- ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था।

अमेरिका ने इनकार किया, अब ब्रिटेन सऊदी की मदद करेगा:टाइफून विमान भेजने का ऐलान, हूती विद्रोहियों के हमले से रक्षा करेगा

ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे यमन में हूती ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। 4 यूरोपीय देशों ने मिलकर बनाया टायफून विमान टाइफून केवल हमला करने वाला लड़ाकू विमान नहीं है। यह दुश्मन के विमानों को रोकने, हवाई क्षेत्र की सुरक्षा करने और जरूरत पड़ने पर जमीन पर हमला करने में सक्षम है। इसका रडार दूर से दूसरे विमानों का पता लगाने में मदद करता है। जरूरत पड़ने पर यह उनका पीछा कर सकता है और हवा में मिसाइल से उन्हें निशाना बना सकता है। इसे यूरोप के चार देशों- ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन के सहयोग से विकसित किया गया था। इसका निर्माण किसी एक देश का अकेला प्रोजेक्ट नहीं है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे। स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। हालांकि तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था। ———————–
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सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा:अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

करोड़ों का महल फिर भी सऊदी प्रिंस बंकर में छिपे:रिपोर्ट- हूती विद्रोहियों के हमलों से डरे, बार-बार अपने ठिकाने बदल रहे

वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान हूती विद्रोहियों के हमले के डर से बंकरों वाले महल में रहने को मजबूर हैं। उनके पास करोड़ों का महल है लेकिन बढ़ते हमलों के डर से उन्हें बार-बार अपना ठिकाना बदलना पड़ रहा है। बीते कुछ समय में हूतियों ने सऊदी पर हमले बढ़ा दिए हैं। इसी महीने रियाद एयरपोर्ट को 20 बार निशाना बनाया गया। इसके चलते एयरपोर्ट बंद है और उड़ाने रद्द हैं। प्रिंस सलमान की सुरक्षा के लिए चुने गए गार्ड तैनात रिपोर्ट के मुताबिक, मोहम्मद बिन सलमान की सुरक्षा के लिए खास तौर पर चुने गए गार्ड तैनात हैं। हूती विद्रोहियों के हमलों के खतरे को देखते हुए सऊदी अरब अपने शाही महलों और तेल ठिकानों की सुरक्षा भी बढ़ा रहा है। इसके लिए मिसाइलों को हवा में रोकने वाले एयर डिफेंस सिस्टम को अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जा रहा है। इस महीने सऊदी के एयरपोर्ट पर हुए बड़े हमले 6 अक्टूबर: जजान और नजरान के एयरपोर्ट को निशाना बनाया गया। खामिस मुशैत की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को सऊदी एयर डिफेंस ने रोकने का दावा किया। 7 अक्टूबर: रियाद और अभा के एयरपोर्ट पर हमले हुए। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, तीन विदेशी नागरिकों की मौत हुई और 36 लोग घायल हुए। 8 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर एक और हमला हुआ। अधिकारियों के मुताबिक, तीन सऊदी नागरिकों की मौत हुई। सरकारी एयरलाइन सऊदिया का एक विमान भी क्षतिग्रस्त हुआ। 10 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 1 भारतीय नागरिक समेत 13 लोगों की मौत हुई और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसके बाद एयरपोर्ट पर उड़ानें रोकनी पड़ीं। 11 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट के पर एक मिसाइल या ड्रोन गिरा। एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत हुई और 11 लोग घायल हुए। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। क्राउन प्रिंस सलमान की आलीशान जिंदगी से जुड़े किस्से 41 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की आलीशान जिंदगी से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं। कहीं उन्होंने करोड़ों रुपए खर्च कर पार्टी की, तो कहीं हजारों करोड़ की पेंटिंग, हवेली और यॉट से उनका नाम जुड़ा। 1. मालदीव में एक महीने के लिए 474 करोड़ रुपए में लिया रिसॉर्ट लेखक जस्टिन शेक की किताब ‘ब्लड एंड ऑयल’ के मुताबिक, जुलाई 2015 में सलमान ने मालदीव का वेला रिसॉर्ट एक महीने के लिए करीब 474 करोड़ रुपए में किराए पर लिया था। यहां पिटबुल, साइ और डीजे अफ्रोजैक ने परफॉर्म किया। एक रात सलमान खुद मंच पर पहुंचे और अपने पसंदीदा गाने बजाने लगे। पार्टी की खबर बाहर आने के बाद इसे एक हफ्ते के भीतर खत्म कर दिया गया। 2. 4268 करोड़ की पेंटिंग की खरीद से जुड़ा नाम लियोनार्डो दा विंची की पेंटिंग ‘साल्वेटर मुंडी’ 2017 में करीब 4268 करोड़ रुपए में बिकी थी। इसे दुनिया की सबसे महंगी पेंटिंग में गिना जाता है। इस पेंटिंग की खरीद से सलमान का नाम भी जुड़ा था। हालांकि, अबू धाबी के संस्कृति और पर्यटन विभाग ने दावा किया था कि पेंटिंग उसने खरीदी है। 3. फ्रांस में 2848 करोड़ की हवेली सलमान ने 2015 में फ्रांस के वर्साय में करीब 2848 करोड़ रुपए की एक आलीशान हवेली खरीदी थी। 57 एकड़ में फैली यह हवेली बाहर से पुराने शाही महल जैसी दिखती है। इसमें सिनेमा हॉल, स्विमिंग पूल और शानदार सजावट है। हवेली में एक ऐसा कमरा भी है, जहां पानी के बीच बैठकर ऊपर तैरती मछलियों को देखा जा सकता है। यहां के फव्वारे, लाइटें और एसी तक आईफोन से चलाए जा सकते हैं। 4. आधे घंटे यॉट देखी, पसंद आई तो दोगूनी कीमत में खरीदी रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2015 में फ्रांस में छुट्टियां मनाते समय सलमान को ‘सेरेन’ नाम की सुपरयॉट पसंद आ गई। उन्होंने करीब आधे घंटे तक इसे देखा और फिर लगभग 5472 करोड़ रुपए में खरीद लिया। इस यॉट में दो हेलीपैड हैं। इसके अलावा, इसमें एक खास कमरा भी है, जहां से पानी के अंदर का नजारा देखा जा सकता है। 5. नियोम के महल में निजी समुद्र तट और 10 हेलीपैड सऊदी अरब के नियोम में लाल सागर के किनारे सलमान का एक आलीशान महल भी है। यहां निजी समुद्र तट, बड़े-बड़े बगीचे और गोल्फ कोर्स हैं। महल में हेलिकॉप्टर उतारने के लिए 10 हेलीपैड भी बनाए गए हैं। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

रूस पर 1,600 नये प्रतिबंध लगायेगा यूरोपीय संघ

यूरोपीय संघ (ईयू) की विदेश नीति प्रमुख काजा कलास ने सोमवार को कहा कि ईयू रूस पर नये प्रतिबंध लगाने जा रहा है जिसके तहत रूस के सैन्य-औद्योगिक क्षेत्र और यूक्रेन के कब्जे वाले इलाकों में चुनाव कराने से जुड़े करीब 1,600 लोगों और संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डाला जायेगा।

लक्जमबर्ग में यूरोपीय संघ के विदेश मंत्रियों की बैठक से पहले सुश्री कलास ने कहा कि संघ का मानना है कि रूस की युद्ध के लिए धन जुटाने की क्षमता को सीमित करने का प्रभावी साधन प्रतिबंध हैं। उन्होंने अमेरिका से अपनी नीतियों को यूरोपीय सहयोगियों के साथ मिलाने का आग्रह किया। उन्होंने यूक्रेन युद्ध को खत्म कराने के लिए अमेरिका से मॉस्को पर दबाव बढ़ाने की अपील की।

“श्री कलास ने कहा, “हमारा स्पष्ट मानना है कि रूस पर दबाव ही काम करेगा।” उन्होंने कहा कि रूस ने यह युद्ध शुरू किया था और इसे रोकने के लिए उस पर ही दबाव बनाया जाना चाहिए।

प्रस्तावित प्रतिबंधों में रूस का सैन्य-औद्योगिक ढांचा और यूक्रेन के कब्जे वाले क्षेत्रों में आयोजित वे चुनाव निशाने पर हैं, जिन्हें सुश्री कलास ने ‘फर्जी चुनाव’ करार दिया। युद्ध जारी रखने की रूस की क्षमता को कमजोर करने के प्रयासों के तहत यूरोपीय संघ अपने प्रतिबंधों का दायरा लगातार बढ़ा रहा है।

सुश्री कलास ने दावा किया कि यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों के कारण रूस को एक ट्रिलियन यूरो से हाथ धोना पड़ा है और यह रकम अब युद्ध में इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि रूस के ‘शैडो फ्लीट’ के खिलाफ उठाये गये कदमों से भी रूस के लिए अपने सैन्य अभियान को वित्तपोषित करना मुश्किल हो रहा है।

यह स्वीकार करते हुए कि रूस पाबंदियों से बचने के नये तरीके ढूंढ़ रहा है, सुश्री कलास ने कहा कि ईयू भी उसी हिसाब से अपने कदमों में बदलाव कर रहा है। उन्होंने कहा कि विदेश मामलों की परिषद की पिछली लगातार 10 बैठकों में संघ ने नयी प्रतिबंध सूचियों पर सहमति जतायी है।

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सुश्री कलास ने कहा कि अगर अमेरिका भी ऐसा ही रुख अपनाता है तो यूरोपीय संघ रूस पर दबाव बढ़ाने में ज्यादा बेहतर स्थिति में होगा। उन्होंने अमेरिका से रूस पर ‘ग्राहम बिल’ को लागू करने का आग्रह किया।

यूक्रेन में नए सिरे से चुनाव कराने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मांग पर सुश्री कलास ने कहा कि संवैधानिक प्रावधानों के तहत युद्ध के दौरान आमतौर पर चुनाव नहीं कराये जाते हैं। उन्होंने कहा कि यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने संकेत दिया है कि अगर युद्धविराम हो जाता है तो वे जल्द से जल्द चुनाव कराने के लिए तैयार होंगे। उन्होंने कहा, “चुनाव हमेशा देश के भीतर विभिन्न समूहों के बीच का मुकाबला होते हैं, जबकि हमले बाहर से हो रहे हैं।” उन्होंने कहा कि युद्ध जारी रहने के दौरान राष्ट्रीय एकजुटता बनाए रखना बेहद महत्वपूर्ण है।

सुश्री कलास ने ‘ऊर्जा युद्धविराम’ के टिके रहने पर भी चिंता जतायी और कहा कि ईयू को अभी तक यह नहीं दिखा है कि रूस इसका पालन कर रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों की जान बचाने के लिए किसी भी तरह के संघर्षविराम को केवल ऊर्जा बुनियादी ढांचे तक सीमित रखने के बजाय और आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्दियों से पहले ऊर्जा सुविधाओं की रक्षा करना बेहद महत्वपूर्ण था, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि हमलों को रोकने के लिए लड़ाई पर व्यापक रोक लगानी होगी।

पश्चिम एशिया के मुद्दे पर सुश्री कलास ने हवाई अड्डे पर हूती विद्रोहियों के बढ़ते हमलों की निंदा की और मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य को खुला रखने और लाल सागर से व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए यूरोपीय संघ एक अंतरराष्ट्रीय बल के समन्वय से अपने नौसैनिक ‘ऑपरेशन एस्पाइड्स’ को मजबूत करने के उपायों पर चर्चा कर रहा है।

सुश्री कलास ने कहा कि यूरोपीय संघ द्वारा लेबनान में नागरिक और सैन्य घटकों वाले एक नये मिशन की स्थापना पर भी फैसला लेने की उम्मीद है। यदि यह निर्णय स्वीकार कर लिया जाता है तो यह मिशन कुछ ही महीनों में ज़मीनी स्तर पर काम करने के लिए तैयार हो सकता है।

Pic Credit : UNI

रियाद एयरपोर्ट पर फिर हमला, धमाकों के बाद खाली कराया:24 घंटे में 225 उड़ानें रद्द; 20 दिन में चौथा हमला

सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर शनिवार को फिर हमला हुआ। रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बीते 20 दिन में यह चौथा हमला है। हमले के बाद एयरपोर्ट खाली कराया गया और वहां विमानों की आवाजाही रोक दी गई। समाचार एजेंसी AP के मुताबिक, क्षेत्रीय अधिकारियों ने इसकी जानकारी दी। फ्लाइट ट्रैकिंग वेबसाइट फ्लाइट अवेयर के मुताबिक, हमले के चलते बीते 24 घंटे में एयरपोर्ट की कम से कम 225 उड़ानें रद्द हुईं। हूती विद्रोहियों ने एयरलाइंस को चेतावनी दी थी यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना के बीच लड़ाई तेज हो गई है। सऊदी अरब यमन सरकार की सेना को हवाई हमलों के जरिए मदद दे रहा है। इसका मकसद लाल सागर के पास हूतियों की हालिया बढ़त को रोकना है। हूतियों ने इस हफ्ते अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस को चेतावनी दी थी कि सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र में उड़ानें चलाने के गंभीर नतीजे हो सकते हैं। उन्होंने सऊदी हवाई क्षेत्र को अपने सैन्य अभियानों का क्षेत्र बताया था। हालांकि, शनिवार के हमले की जिम्मेदारी हूतियों ने तत्काल नहीं ली। सऊदी सरकार की ओर से भी हमले को लेकर तुरंत कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। हमले के बाद ट्रम्प बोले- मैं खुश नहीं हूं सऊदी अरब ने अपने एयरपोर्ट, सैन्य ठिकानों और तेल से जुड़ी जगहों पर हमलों के बीच अमेरिका और दूसरे सहयोगी देशों से मदद मांगी है। अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिका की मदद में खुफिया जानकारी साझा करना, हमले के लिए ठिकानों की पहचान करना और सैन्य योजना बनाने में सहयोग देना शामिल है। शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमलों के बारे में पूछा गया। उन्होंने कहा, यह अच्छा नहीं है और मैं खुश नहीं हूं। हालांकि, इन हमलों के जवाब में अमेरिका की ओर से सैन्य मदद देने का कोई संकेत नहीं मिला। एयर इंडिया समेत कई एयरलाइंस ने उड़ानें रोकीं सऊदी अरब में बढ़ते खतरे के बीच कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस ने रियाद और दूसरे सऊदी एयरपोर्ट के लिए उड़ानें रोक दी हैं। इनमें एयर इंडिया, फ्लाईदुबई, लुफ्थांसा ग्रुप और पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस शामिल हैं। यूरोपीय संघ की विमानन सुरक्षा एजेंसी ने भी सऊदी हवाई क्षेत्र को लेकर अपनी चेतावनी बढ़ाई है। एजेंसी के मुताबिक, हूती विद्रोही अब सऊदी अरब के अंदर तक हमले करने में सक्षम हैं और उनका ध्यान एयरपोर्ट जैसे विमानन ठिकानों पर भी बढ़ा है। रियाद एयरपोर्ट पर हमले बढ़े 19 सितंबर 2026 – एयरपोर्ट के ईंधन भंडारण क्षेत्र के पास हमला हुआ, जिससे वहां आग लगी और काला धुआं उठता देखा गया। हूती समूह ने रियाद के सैन्य व रणनीतिक ठिकानों पर हमले का दावा किया। 7 अक्टूबर 2026 – रियाद और आभा एयरपोर्ट को निशाना बनाकर किए गए हमलों में एक सूडानी नागरिक की मौत हुई और 8 अन्य लोग घायल हुए। 8 अक्टूबर 2026 – एयरपोर्ट पर दो अलग-अलग हमले हुए। पहला एयरपोर्ट सुविधाओं पर और दूसरा सऊदी एयरलाइंस के खड़े विमान (Airbus A320) पर। इनमें कैप्टन हमूद अली अल-कलीसामी (सऊदी पायलट) समेत 3 सऊदी नागरिकों की मौत हुई। ——————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में फ्लोरिडा के तट से टकराया इसायस तूफान: 170 किमी की रफ्तार से हवाएं चल रहीं अमेरिका के मेक्सिको की खाड़ी से लगे तटीय इलाकों में शुक्रवार को इसायस तूफान टकराया। फ्लोरिडा और अलबामा में 170 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल रही हैं। पूरी खबर पढ़ें…

ईरान ने अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर किया:ब्रिटेन से 12 बमवर्षक हटे, खाड़ी के कई सैन्य ठिकाने छोड़े

ईरान पर हमला करके अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखाना चाहता था, लेकिन अब यही युद्ध उसके लिए नई मुश्किलें खड़ी कर रहा है। ईरानी हमलों के बाद अमेरिका को मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य तैनाती बदलनी पड़ी है। अब ब्रिटेन के एक एयरबेस से B-1 बमवर्षक विमान भी अचानक अमेरिका वापस बुला लिए गए। अमेरिका ने इसे सुरक्षा के लिहाज से उठाया गया सामान्य कदम बताया है। राष्ट्रपति ट्रम्प और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी। लेकिन पिछले कुछ महीनों की घटनाएं बताती हैं कि ईरानी हमलों ने अमेरिकी सैन्य रणनीति को बदलने पर मजबूर किया है। बहरीन, कुवैत, कतर और यूएई में तैनात अमेरिकी सैनिकों को हटाना पड़ा है। कुछ ठिकानों को हुए नुकसान के बाद अमेरिका उन्हें दोबारा बनाने के बजाय ईरान से और दूर ले जाने पर विचार कर रहा है। ब्रिटेन से 12 बमवर्षक अचानक क्यों हटाए गए? ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस पर अमेरिका के 12 B-1 बमवर्षक विमान तैनात थे। ये विमान लंबी दूरी तक उड़कर हमला करने में सक्षम हैं। लेकिन अमेरिकी कमांडरों को ऐसी जानकारी मिली कि ईरान समर्थित लोग एयरबेस की बाड़ के ठीक बाहर से ड्रोन हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि फेयरफोर्ड एयरबेस अमेरिका और ब्रिटेन के सैन्य सहयोग का पुराना केंद्र है। इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1944 में डी-डे की तैयारी के समय बनाया गया था। ब्रिटेन का एयरबेस अकेला मामला नहीं है। ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इन हमलों के बाद अमेरिका ने बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों से अपने कई सैनिकों को हटाया। ये सभी ठिकाने ईरान की मिसाइल और ड्रोन की पहुंच में थे। कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को काफी नुकसान हुआ। पोर्ट शुएबा पर हुए हमले में छह अमेरिकी सैनिक मारे गए। ईरानी हमले में अमेरिकी सेना का एक ऑपरेशन सेंटर भी नष्ट हो गया। अमेरिकी सैनिकों को होटल-दफ्तरों में रहना पड़ा ईरानी हमलों का असर इतना ज्यादा हुआ कि कई अमेरिकी सैनिकों को अपने सैन्य ठिकाने छोड़कर होटल और दफ्तरों में जाना पड़ा। यहीं से अमेरिका के सामने नई समस्या खड़ी हुई। ईरान ने यह पता लगाना शुरू कर दिया कि अमेरिकी सैनिक कहां रह रहे हैं। कुछ सैनिक ऐसे होटलों में भी रह रहे थे, जहां सुरक्षा बहुत कम थी। इसके बाद ईरान ने इन जगहों को भी निशाना बनाना शुरू किया। सऊदी अरब में CIA के एक ठिकाने को भी नुकसान पहुंचा। मिडिल ईस्ट में अमेरिका जिन 13 बड़े सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करता था, उनमें से कई हमलों के बाद रहने और काम करने लायक नहीं रहे। पेंटागन के अंदर अब कुछ ठिकानों को फिर से बनाने की बजाय उन्हें और दूर ले जाने पर विचार हो रहा है। ड्रोन हमले ने अमेरिका की सोच बदल दी इस युद्ध से अमेरिका को एक नई बात समझ आई है। पहले माना जाता था कि अगर अमेरिकी सैनिकों और विमानों को दुश्मन की मिसाइलों की पहुंच से दूर रखा जाए तो वे सुरक्षित रहेंगे। लेकिन ड्रोन ने यह सोच बदल दी है। ड्रोन छोटे होते हैं, उन्हें छिपाना आसान है और उन्हें बहुत दूर से भी हमला करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, यूक्रेन ने पिछले साल रूस के खिलाफ इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। उसने ड्रोन को ट्रकों में छिपाकर रूस के अंदर तक पहुंचाया और वहीं से उन्हें उड़ाकर सैन्य विमानों पर हमला किया। अब अमेरिका को डर है कि इसी तरह की रणनीति उसके सैन्य ठिकानों के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है। ईरानी सेना कमजोर हुई, लेकिन उसने अमेरिका को रोक दिया ट्रम्प का कहना है कि शुरुआती हमलों में ईरान की पूरी नौसेना खत्म हो गई और उसकी वायुसेना भी काम करने की स्थिति में नहीं है। फिर भी ईरान ने अमेरिकी सेना को कई जगह पीछे हटने पर मजबूर किया है। यही इस युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना है। ईरान की सेना को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन वह अमेरिकी सैनिकों को ईरान के करीब मौजूद ठिकानों पर टिकने नहीं दे रहा। अमेरिकी सैनिकों को अब पहले से ज्यादा दूर रहना पड़ रहा है। अमेरिका लंबे समय से मिडिल ईस्ट में अपनी सेना की मौजूदगी को इस दलील से सही ठहराता रहा है कि इससे दुनिया के अहम समुद्री रास्ते सुरक्षित रहते हैं। लेकिन अब अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर के कुछ हिस्सों में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की पूरी गारंटी नहीं दे पा रहा है। अमेरिका को अपने सैनिक और भी दूर ले जाने पड़ सकते हैं पेंटागन अब इजराइल और जॉर्डन में नए सैन्य ठिकाने बनाने पर विचार कर रहा है। लेकिन यह आसान काम नहीं है। नए ठिकानों के लिए अमेरिकी कांग्रेस से पैसा लेना होगा। इसके बाद निर्माण और तैयारी में कई साल लग सकते हैं। इस बीच अमेरिका को अपने मौजूदा सैनिकों और हथियारों को दूसरे सुरक्षित ठिकानों पर रखना होगा। यही वजह है कि अमेरिका अब अपने देश के अंदर भी एक बड़े नए सैन्य ठिकाने की योजना पर सोच रहा है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने हाल में अमेरिकी सैनिकों से बात करते हुए मिडिल ईस्ट के क्षतिग्रस्त ठिकानों की बजाय अमेरिका के अंदर नया बड़ा बेस बनाने की बात की। सबसे बड़ा सवाल: क्या अमेरिका पहले जैसा दबदबा रखता है? अमेरिका को अपनी सेना को ईरान से और दूर रखना पड़ रहा है। इससे किसी भी नए हमले के लिए ज्यादा समय, ज्यादा ईंधन और ज्यादा पैसा लगेगा। अमेरिका के लिए यह सिर्फ एक सैन्य समस्या नहीं है। इसका राजनीतिक असर भी हो सकता है। ईरान को कमजोर माना जाता है, फिर भी उसके हमलों के कारण अमेरिका को अपने सैनिक और विमान बार-बार पीछे हटाने पड़ रहे हैं। इससे दूसरे देशों को यह संदेश मिल सकता है कि सीधे अमेरिकी सेना से भिड़ने के बजाय उसके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर भी उसे पीछे हटने पर मजबूर किया जा सकता है। यही इस युद्ध का सबसे बड़ा उलटा असर है। ट्रम्प ईरान को झुकाने के लिए युद्ध में उतरे थे। लेकिन अब अमेरिका को ही यह तय करना पड़ रहा है कि ईरान के करीब अपनी सेना को सुरक्षित कैसे रखा जाए।

आज का एक्सप्लेनर:हूतियों से लड़ने सऊदी जा रहीं पाक-तुर्किये की सेनाएं, पाकिस्तान ने पहले इनकार किया, आखिर किस मजबूरी में एक्टिवेट हुआ ‘मक्का पैक्ट’

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने पहली बार ‘मक्का पैक्ट’ एक्टिवेट कर दिया है। 2 महीने पहले हुए करार के तहत किसी एक देश पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। यानी, अब हूतियों से जंग में उलझे सऊदी की मदद के लिए पाक-तुर्किये को सेनाएं भेजनी पड़ेंगी। आखिर मदद मांगने को कैसे मजबूर हुआ सऊदी, क्या वाकई दूसरे देश के लिए लड़ेंगी पाकिस्तान-तुर्किये की सेनाएं और क्या इससे भारत को चिंता करनी चाहिए; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: हूतियों ने सऊदी अरब को मदद मांगने पर कैसे मजबूर किया? जवाब: सऊदी अरब के पड़ोस में है यमन। यहां की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती। यमन की मान्यता प्राप्त सरकार को सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। सऊदी के जवान सरकार की सेना के साथ मिलकर कई इलाकों में डेरा डाले हुए हैं। वहीं सरकार के खिलाफ विद्रोह करके यमन के उत्तर-पश्चिम इलाके, राजधानी सना और लाल सागर के तटीय इलाके में हूतियों का कब्जा है। इन्हें ईरान से हथियार और पैसे की मदद मिलती है। 2015 से ही हूतियों और सऊदी समर्थित यमन की सेना में इलाकों पर कब्जे को लेकर छिटपुट संघर्ष चलता रहा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र ने सीजफायर करवाया। बीते साल शुरू हुई ईरान-अमेरिका जंग के दौरान ईरान ने अमेरिका के सहयोगी सऊदी पर भी हमले किए। हूतियों ने भी कई बार सऊदी पर हमला करने की धमकी दी। 5 अगस्त 2026 को हूतियों ने सऊदी समर्थित यमन सेना के कैंपों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए. हूतियों ने आरोप लगाया कि यहां सऊदी गठबंधन सेना जमावड़ा बढ़ा रही थी। इसी के साथ 4 साल पुराना सीजफायर टूट गया… सवाल-2: पाकिस्तान ने पहले टाला, फिर जमीनी सेना भेजने को क्यों तैयार हुआ? जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने पर कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’ पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें थीं… 1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमेट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट प्रतीकात्मक है, क्योंकि इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं है। तुर्किये और पाकिस्तान का सीधे टकराव में शामिल होना मुश्किल है। 2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान, अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका में है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ने से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती थी। 3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान में शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी थी, तब भी पाकिस्तान ने इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’ इधर 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर हूतियों पर हवाई हमले करने को कहा था। ट्रम्प ने मदद ठुकरा दी। फिर 15 सितंबर को हूतियों और अमेरिका में सीक्रेट मीटिंग हुई, जिसमें हूतियों ने वादा किया कि वो लाल सागर में अमेरिका और इजराइल के जहाजों पर हमला नहीं करेंगे। इससे सऊदी को अमेरिकी मदद मिलने की उम्मीद और कम हो गई। सऊदी ने दावा किया कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने सऊदी के पवित्र शहर मक्का की तरफ ड्रोन छोड़े। हूतियों के प्रवक्ता याह्या सिरी का कहना था, ‘हमारा निशाना सऊदी के तेल और सैन्य ठिकाने थे, जो कि पवित्र स्थलों से काफी दूर हैं।’ हालांकि ड्रोन को रोकने के दौरान मक्का प्रांत के ताइफ शहर में एक व्यक्ति की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए। इसके बाद पाकिस्तान का रुख बदलने लगा… सवाल-3: तो क्या वाकई पाक-तुर्किये की सेनाएं हूतियों से लड़ेंगी? जवाब: साझा बयान में कहा गया है, ‘तीनों देश सऊदी में ‘तेजी से’ जॉइंट फोर्सेज और दूसरी ताकत (यानी हथियार, इंटेलिजेंस वगैरह) तैनात करेंगे।’ हालांकि पाकिस्तानी सैनिकों का सऊदी जाना नई बात नहीं है…. वहीं तुर्किये के विदेश मंत्री फिदान ने कहा है कि मक्का पैक्ट, नाटो की तरह काम करेगा, लेकिन मदद का पैमाना आगे की बातचीत से तय होगा। तुर्किये के सामने अपनी सेना भेजने में एक अड़चन ये भी है कि उसके कानून के तहत विदेश में सेना भेजने के लिए संसद की मंजूरी लेनी होगी। 5 अक्टूबर के फैसले में भी कहा गया है कि सऊदी की मदद में सेनाओं की तैनाती तीनों देशों के राष्ट्रीय कानूनों और आपसी सहमति के आधार पर होगी। सवाल-4: पाकिस्तान-भारत जंग छिड़ी, तो क्या तुर्किये-सऊदी भी लड़ने आएंगे? जवाब: सऊदी और तुर्किये भारत को दुश्मन नहीं मानते, इसलिए जंग में उनके हमले की आशंका बेहद कम है। लेकिन 3 बातें गौर करनी चाहिए… पाकिस्तान पैक्ट का फायदा उठाएगा: कार्नेगी इंडिया थिंकटैंक में सिक्योरिटी स्टडीज प्रोग्राम के फेलो दिनकर पेरी के मुताबिक, ‘यह पैक्ट पश्चिम एशिया के लिए बना है, लेकिन पाकिस्तान इसे भारत के साथ संघर्षों में इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा। खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद बनी हालात के चलते।’ सऊदी भारत पर हमला नहीं करेगा: भारत और सऊदी अरब के अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं। सऊदी और भारत में सालाना 40 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है। सऊदी-पाकिस्तान से यह 5 बिलियन डॉलर से भी कम है। इसलिए पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी कहते हैं, ‘अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करे या ऑपरेशन सिंदूर जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो, तो सऊदी पाकिस्तान का रक्षक बनकर नहीं आएगा।’ तुर्किये हथियार सप्लाई जारी रखेगा: रिपोर्ट्स के मुताबिक 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को 350 से ज्यादा ड्रोन्स भेजे थे। पाकिस्तान के समर्थन में स्टेटमेंट जारी किया था। पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया के मुताबिक, ‘इस पैक्ट से भारत-पाकिस्तान की स्थिति नहीं बदलेगी। तुर्किये पाकिस्तान को ड्रोन सप्लाई करता रहेगा और सऊदी खुद को पाकिस्तान का समर्थक दिखाने से बचेगा।’ सवाल-5: भारत के पास इस नई चुनौती की क्या काट है? जवाब: भारत की सबसे बड़ी काट उसके खाड़ी देशों से डिप्लोमैटिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। खाड़ी देशों में 89 लाख भारतीय रहते हैं। भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। सऊदी अरब अपना करीब 16% तो UAE करीब 11% कच्चा तेल भारत को बेचता है। मई 2026 में ही भारत ने UAE के साथ रक्षा समझौता किया है। यह रिश्ते और मजबूत किए जा सकते हैं… ——– ये एक्सप्लेनर भी पढ़िए… पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। पूरी खबर पढ़िए…

पाकिस्तान का ड्रोन हमलों से बचने के लिए सस्ता तरीका:सेना-पुलिस के ठिकानों पर मछली पकड़ने वाला जाल लगा रहे, दावा- इसमें ड्रोन फंसकर फट जाएंगे

पाकिस्तान में ड्रोन हमलों से बचने के लिए पुलिस और सेना अब मछली पकड़ने वाले जाल का इस्तेमाल कर रही है। अल जजीरा के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के संवेदनशील इलाकों में पुलिस चौकियों और सुरक्षा ठिकानों के ऊपर कई मीटर की ऊंचाई पर ये जाल लगाए जा रहे हैं। सुरक्षाकर्मियों का ऐसा मानना है कि हमलावर ड्रोन इन जालों में फंस सकते हैं। इससे ड्रोन हमले में होने वाला नुकसान 40 से 50% तक कम किया जा सकता है। हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस तरीके को पूरी तरह भरोसेमंद मानने से इनकार किया है। आतंकी गोलीबारी से ज्यादा ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे पुलिस के मुताबिक, जाल लगाने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आतंकियों ने हमले का तरीका बदल दिया है। अब वे गोलीबारी और मोर्टार के साथ ड्रोन का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में 29 जुलाई को सबसे घातक हमलों में से एक हुआ था। बम से भरे ड्रोन से पुलिस चौकी पर हमला किया। इसमें 11 पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद कई घंटे तक चली मुठभेड़ में 15 हमलावर भी मारे गए। पुलिस के मुताबिक, इस साल खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में कम से कम 16 हमले हो चुके हैं। इसी वजह से यह जिला प्रांत के सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल है। ऐसे हमलों से बचने के लिए हंगू पुलिस ने कम लागत वाला तरीका अपनाया। पुलिस चौकी की छत और चारदीवारी के बीच कई मीटर ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए गए। इससे चौकी के ऊपर एक तरह की जालीदार छत बन गई। एक चेकपोस्ट पर करीब 1 लाख रुपए खर्च हंगू के जिला पुलिस अधिकारी तारिक हबीब के मुताबिक, एक सामान्य पुलिस चेकपोस्ट को इस तरह के जाल से ढकने में करीब 1.4 लाख रुपए खर्च होते हैं। खैबर पख्तूनख्वा पुलिस के प्रवक्ता के मुताबिक, हंगू के अलावा कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान जैसे कम से कम 5 और संवेदनशील जिलों में भी पुलिस चौकियों और चेकपोस्ट पर ये जाल लगाए गए हैं। प्रांत के कुछ इलाकों में सेना के ठिकानों पर भी ‘एंटी-ड्रोन जाल’ लगाए गए हैं। पुलिस ने इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रांतीय सरकार से अतिरिक्त पैसे भी मांगे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों को इस तरीके पर भरोसा नहीं इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक इम्तियाज गुल ने इसे नासमझी वाला सस्ता तरीका बताया। उनके मुताबिक, आतंकियों का निशाना हमेशा पुलिस स्टेशन या चेकपोस्ट ही नहीं होते। ड्रोन का इस्तेमाल बड़े और जरूरी ठिकानों पर हमला करने के लिए किया जाता है, ताकि हमले का असर ज्यादा दिखाई दे और लोगों में डर पैदा हो। उन्होंने कहा कि असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां ड्रोन के हवा में उठते ही उसे रोकने की क्षमता रखती हैं। यूक्रेन में भी इस्तेमाल हुआ है ऐसा तरीका पेशावर के आतंकवाद और सुरक्षा विशेषज्ञ फिदा अदील ने बताया कि मछली पकड़ने वाले जाल से ड्रोन रोकना कोई नया तरीका नहीं है। सेना पहले से ही सामान और ठिकानों को छिपाने के लिए ऐसे जाल इस्तेमाल करती रही है। यूक्रेन में भी रूसी ड्रोन को रोकने के लिए इनका इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, अदील के मुताबिक, विस्फोटक से भरे ड्रोन के खिलाफ जाल कितना काम करेगा, यह उसके डिजाइन और उसे लगाने के तरीके पर निर्भर करता है। उन्होंने पुलिस के 40 से 50% नुकसान कम होने के दावे पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि असली हमले या सही परीक्षण के बिना इस आंकड़े की पुष्टि नहीं हो सकती। ——————— यह खबर भी पढ़ें… सऊदी अरब में तैनात होंगी पाकिस्तान-तुर्किये की फौज लाल सागर में हूती विद्रोहियों की बढ़ती ताकत ने अब सऊदी अरब को सीधे सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया है। सऊदी समर्थित यमनी सेना ने हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। इसी बीच पाकिस्तान और तुर्किये भी सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपने सैन्य बल तैनात करने की तैयारी में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

ड्रोन हमले के बाद तुर्किये का मालवाहक जहाज ब्लैक सी में डूब, 3 भारतीय सहित 11 को सुरक्षित बचाया गया

हाल ही में ब्लैक सी यानी काला सागर में ड्रोन हमले की चपेट में आने से तुर्किये का एक मालवाहक जहाज MV रोयाड मम्मादोव डूब गया। उस पर सवार दो विदेशी नागरिकों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य क्रू मेंबर घायल हो गए। इस जहाह पर सवार 3 भारतीयों समेत 11 अन्य लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। बचाए गए भारतीयों में से एक घायल है, जिसका इलाज रोमानिया में किया जा रहा है।

रोमानिया में भारतीय दूतावास ने सोमवार को बताया कि ब्लैक सी में एक वाणिज्यिक जहाज पर हमला हुआ। इसमें सवार तीन भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं, जिनमें से एक घायल है और उसका रोमानिया में इलाज चल रहा है। MV रोयाड मम्मादोव जहाज पर ब्लैक सी में सफर करते समय हमला हुआ। जिसमें दो विदेशी नागरिकों की मौत हो गई और कई क्रू मेंबर घायल हो गए। भारतीय मिशन के मुताबिक, घायल क्रू मेंबर को इलाज के लिए रोमानिया ले जाया गया।

रोमानिया में भारतीय दूतावास ने X पर एक पोस्ट में कहा, “तीनों भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं। हमने उनसे बात की है। उनमें से एक घायल हो गया है और उसका इलाज चल रहा है।”

रोमानिया में भारतीय राजदूत मनोज महापात्रा ने भी कॉन्स्टैंटा काउंटी हॉस्पिटल में तीन भारतीय क्रू मेंबर से बात की, जहां उनका इलाज चल रहा था। दूतावास ने कहा कि राजदूत ने हॉस्पिटल के चीफ फिजिशियन से भी बात की। इंडियन मिशन ने कहा कि वह रोमानियाई अधिकारियों और हॉस्पिटल अधिकारियों के संपर्क में है और प्रभावित भारतीय क्रू मेंबर्स को हर मुमकिन मदद दे रहा है।

ड्रोन हमले से जहाज में लगी आग, 2 की मौत

रोमानियाई अधिकारियों ने कहा कि ब्लैक सी में 139 मीटर लंबे जहाज में आग लगने से दो क्रू मेंबर्स की मौत हो गई और 11 अन्य को बचा लिया गया। खबर है कि जहाज में अजरबैजानी और भारतीय नागरिक सवार थे। तुर्किये का मालवाहक जहाज रोमानियाई मछली पकड़ने वाले पोर्ट स्फांटू घोरघे से लगभग 30 नॉटिकल मील दक्षिण में डूब गया। रोमानिया के गृह मंत्रालय ने कहा कि उसके कोस्ट गार्ड बॉर्डर पुलिस को अलर्ट किया गया था कि रोमानिया के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन में मौजूद एक कमर्शियल जहाज में आग लग गई है।

ड्रोन हमले के लिए रूस जिम्मेदार

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने इस घटना के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराया, और आरोप लगाया कि रूसी ड्रोन हमला अंतरराष्ट्रीय जल सीमा में यात्रा कर रहे नागरिक जहाज पर किया गया। जेलेंस्की ने X पर एक पोस्ट में कहा, “न्यूट्रल पानी में मक्का ले जा रहे एक नागरिक जहाज पर दो रूसी ड्रोन ने भयानक हमला किया।” उन्होंने यह भी कहा कि हमले में जहाज का कैप्टन मारा गया।

रूस-यूक्रेन युद्ध से ब्लैक सी में कारोबार पर बढ़ खतरा

इस घटना ने एक बार फिर साबित किया है कि रूस-यूक्रन युद्ध से काला सागर से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर खतरा बढ़ गया है। हमले और मिलिट्री ऑपरेशन की वजह से इस इलाके में और उसके आस-पास चलने वाले मर्चेंट जहाजों को बढ़ती सुरक्षा चिंताओं का सामना करना पड़ रहा है।

भारत ने कमर्शियल शिपिंग पर हमलों पर चिंता जताई

यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब भारत ने मुख्य समुद्री कॉरिडोर में बढ़ते खतरों के बीच कमर्शियल जहाजों और नाविकों की सुरक्षा पर बार-बार चिंता जताई है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पिछले हफ्ते 81वीं यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली में अपने भाषण में खाड़ी, लाल सागर और काला सागर में कमर्शियल शिपिंग और नाविकों पर हमलों पर जोर दिया।

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सऊदी अरब में तैनात होंगी पाकिस्तान-तुर्किये की फौज:हूती विद्रोहियों के खिलाफ साथ आए तीनों देश; पिछले महीने पाकिस्तान ने मदद से इनकार किया था

पाकिस्तान और तुर्किये अपनी सेना जल्द सऊदी अरब में तैनात करेगी। यह फैसला सोमवार को रियाद में मक्का गठबंधन की आपात बैठक में हुआ। हूती विद्रोहियों से जुड़े हमलों के बाद सुरक्षा खतरों को देखते हुए तीनों देश साथ आ गए हैं। हूतियों ने यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। यह इलाका सऊदी अरब के बेहद करीब है। इससे सऊदी की सुरक्षा और व्यापार पर संकट बढ़ गया है। हालांकि, इससे पहले पाकिस्तान ने सितंबर में सऊदी को सैन्य मदद देने से इनकार कर दिया था। यरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने हूती हमले के बाद सबसे पहले पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। हूती विद्रोहियों ने लाल-सागर में दो और द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। इससे पहले पिछले हफ्ते हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा और बाब अल-मंदेब में मौजूद मायून द्वीप पर भी कब्जा किया था। इन दोनों जगहों पर सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना का नियंत्रण था। हूतियों के इन द्वीपों पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। बाब अल-मंदेब एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए शॉर्टकट रास्ता है। यहां से गुजरने के बाद जहाज स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं। सऊदी अरब जल्द हूतियों पर हमला कर सकता है सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा सैनिकों को यमन में उतार सकता है। इसका मकसद बाब अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं – इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। मक्का पैक्ट लागू- एक पर हमला तीनों पर माना जाएगा रियाद में सोमवार को हुई बैठक में मक्का रक्षा समझौता औपचारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला तीनों पर माना जाएगा। इस बैठक में तीनों देशों के वरिष्ठ रक्षा और सैन्य अधिकारी शामिल हुए। तुर्किये की ओर से विदेश मंत्री हाकान फिदान, रक्षा मंत्री याशार ग्यूलर शामिल हुए। सऊदी अरब की ओर से विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद, रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान शामिल हुए। पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार ने किया। उनके साथ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी मौजूद रहे। पाकिस्तान के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नौमान महमूद भी बैठक में शामिल हुए। उन्हें मक्का रक्षा पैक्ट का महासचिव नियुक्त किया गया है।