ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे हूती ठिकानों पर सीधे हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे।
स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी अतिरिक्त सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। रिपोर्ट- ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था।
ब्रिटेन ने अपने टाइफून लड़ाकू विमान सऊदी अरब भेजने का ऐलान किया है। ये विमान हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों से सऊदी शहरों और तेल ठिकानों की रक्षा करेंगे। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार को यह भी साफ कहा कि वे यमन में हूती ठिकानों पर हमला नहीं करेंगे। बीते 2 महीने से हूती और सऊदी के बीच संघर्ष शुरू हो गया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। अब ब्रिटेन सऊदी की मदद के लिए आगे आया है। 4 यूरोपीय देशों ने मिलकर बनाया टायफून विमान टाइफून केवल हमला करने वाला लड़ाकू विमान नहीं है। यह दुश्मन के विमानों को रोकने, हवाई क्षेत्र की सुरक्षा करने और जरूरत पड़ने पर जमीन पर हमला करने में सक्षम है। इसका रडार दूर से दूसरे विमानों का पता लगाने में मदद करता है। जरूरत पड़ने पर यह उनका पीछा कर सकता है और हवा में मिसाइल से उन्हें निशाना बना सकता है। इसे यूरोप के चार देशों- ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन के सहयोग से विकसित किया गया था। इसका निर्माण किसी एक देश का अकेला प्रोजेक्ट नहीं है। ब्रिटेन ने सऊदी की मदद का फैसला क्यों लिया? ब्रिटेन के रक्षा मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने कहा कि सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमले बेहद निंदनीय हैं। खास तौर पर रियाद के एयरपोर्ट को निशाना बनाया जाना दिखाता है कि हूती क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए किस हद तक जा रहे हैं। उन्होंने कहा, इसी वजह से मैंने आज ब्रिटेन की ओर से और सैन्य मदद को मंजूरी दी है। रॉयल एयर फोर्स के टाइफून विमान ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी हवाई क्षेत्र की रक्षा के लिए उड़ान भरेंगे। स्ट्रीटिंग ने कहा कि हूतियों के हमलों से पश्चिम एशिया में स्थिरता को खतरा है। इससे ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक रास्ते भी प्रभावित हो सकते हैं। इसका असर ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। पहले भी मदद दे चुका है ब्रिटेन सऊदी अरब सरकार के अनुरोध पर ब्रिटेन सितंबर में भी सैन्य सहायता देने पर सहमत हुआ था। हालांकि तब उसने रॉयल एयर फोर्स का वॉयेजर विमान देने की घोषणा की थी। इस विमान का इस्तेमाल हवा में दूसरे विमानों में ईंधन भरने के लिए किया जाता है। अब ब्रिटेन टायफून के अलावा एटलस A400M परिवहन विमान और सैन्य सलाहकार भी भेजेगा। परिवहन विमान का इस्तेमाल सऊदी अरब के भीतर सैन्य उपकरण पहुंचाने के लिए किया जाएगा। ब्रिटिश सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों की मदद करेंगे। ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की 16 सितंबर की एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। इस डील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। यह डील पिछले महीने ओमान की राजधानी मस्कट के अमेरिकी दूतावास में हुई थी। इसमें हूती प्रतिनिधियों ने भरोसा दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब-अल-मंदेब से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। पाकिस्तान ने भी सऊदी की मदद से इनकार किया यरुशलम पोस्ट की पिछले महीने की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने मक्का डिफेंस अलायंस के साथी पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था। ———————–
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सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा:अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…
वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान हूती विद्रोहियों के हमले के डर से बंकरों वाले महल में रहने को मजबूर हैं। उनके पास करोड़ों का महल है लेकिन बढ़ते हमलों के डर से उन्हें बार-बार अपना ठिकाना बदलना पड़ रहा है। बीते कुछ समय में हूतियों ने सऊदी पर हमले बढ़ा दिए हैं। इसी महीने रियाद एयरपोर्ट को 20 बार निशाना बनाया गया। इसके चलते एयरपोर्ट बंद है और उड़ाने रद्द हैं। प्रिंस सलमान की सुरक्षा के लिए चुने गए गार्ड तैनात रिपोर्ट के मुताबिक, मोहम्मद बिन सलमान की सुरक्षा के लिए खास तौर पर चुने गए गार्ड तैनात हैं। हूती विद्रोहियों के हमलों के खतरे को देखते हुए सऊदी अरब अपने शाही महलों और तेल ठिकानों की सुरक्षा भी बढ़ा रहा है। इसके लिए मिसाइलों को हवा में रोकने वाले एयर डिफेंस सिस्टम को अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जा रहा है। इस महीने सऊदी के एयरपोर्ट पर हुए बड़े हमले 6 अक्टूबर: जजान और नजरान के एयरपोर्ट को निशाना बनाया गया। खामिस मुशैत की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को सऊदी एयर डिफेंस ने रोकने का दावा किया। 7 अक्टूबर: रियाद और अभा के एयरपोर्ट पर हमले हुए। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, तीन विदेशी नागरिकों की मौत हुई और 36 लोग घायल हुए। 8 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर एक और हमला हुआ। अधिकारियों के मुताबिक, तीन सऊदी नागरिकों की मौत हुई। सरकारी एयरलाइन सऊदिया का एक विमान भी क्षतिग्रस्त हुआ। 10 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 1 भारतीय नागरिक समेत 13 लोगों की मौत हुई और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसके बाद एयरपोर्ट पर उड़ानें रोकनी पड़ीं। 11 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट के पर एक मिसाइल या ड्रोन गिरा। एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत हुई और 11 लोग घायल हुए। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। क्राउन प्रिंस सलमान की आलीशान जिंदगी से जुड़े किस्से 41 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की आलीशान जिंदगी से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं। कहीं उन्होंने करोड़ों रुपए खर्च कर पार्टी की, तो कहीं हजारों करोड़ की पेंटिंग, हवेली और यॉट से उनका नाम जुड़ा। 1. मालदीव में एक महीने के लिए 474 करोड़ रुपए में लिया रिसॉर्ट लेखक जस्टिन शेक की किताब ‘ब्लड एंड ऑयल’ के मुताबिक, जुलाई 2015 में सलमान ने मालदीव का वेला रिसॉर्ट एक महीने के लिए करीब 474 करोड़ रुपए में किराए पर लिया था। यहां पिटबुल, साइ और डीजे अफ्रोजैक ने परफॉर्म किया। एक रात सलमान खुद मंच पर पहुंचे और अपने पसंदीदा गाने बजाने लगे। पार्टी की खबर बाहर आने के बाद इसे एक हफ्ते के भीतर खत्म कर दिया गया। 2. 4268 करोड़ की पेंटिंग की खरीद से जुड़ा नाम लियोनार्डो दा विंची की पेंटिंग ‘साल्वेटर मुंडी’ 2017 में करीब 4268 करोड़ रुपए में बिकी थी। इसे दुनिया की सबसे महंगी पेंटिंग में गिना जाता है। इस पेंटिंग की खरीद से सलमान का नाम भी जुड़ा था। हालांकि, अबू धाबी के संस्कृति और पर्यटन विभाग ने दावा किया था कि पेंटिंग उसने खरीदी है। 3. फ्रांस में 2848 करोड़ की हवेली सलमान ने 2015 में फ्रांस के वर्साय में करीब 2848 करोड़ रुपए की एक आलीशान हवेली खरीदी थी। 57 एकड़ में फैली यह हवेली बाहर से पुराने शाही महल जैसी दिखती है। इसमें सिनेमा हॉल, स्विमिंग पूल और शानदार सजावट है। हवेली में एक ऐसा कमरा भी है, जहां पानी के बीच बैठकर ऊपर तैरती मछलियों को देखा जा सकता है। यहां के फव्वारे, लाइटें और एसी तक आईफोन से चलाए जा सकते हैं। 4. आधे घंटे यॉट देखी, पसंद आई तो दोगूनी कीमत में खरीदी रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2015 में फ्रांस में छुट्टियां मनाते समय सलमान को ‘सेरेन’ नाम की सुपरयॉट पसंद आ गई। उन्होंने करीब आधे घंटे तक इसे देखा और फिर लगभग 5472 करोड़ रुपए में खरीद लिया। इस यॉट में दो हेलीपैड हैं। इसके अलावा, इसमें एक खास कमरा भी है, जहां से पानी के अंदर का नजारा देखा जा सकता है। 5. नियोम के महल में निजी समुद्र तट और 10 हेलीपैड सऊदी अरब के नियोम में लाल सागर के किनारे सलमान का एक आलीशान महल भी है। यहां निजी समुद्र तट, बड़े-बड़े बगीचे और गोल्फ कोर्स हैं। महल में हेलिकॉप्टर उतारने के लिए 10 हेलीपैड भी बनाए गए हैं। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
हूती विद्रोहियों ने यमन के दक्षिणी प्रांत शबवा में सेना के एक मिलिट्री कैंप पर बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया है। सोमवार को हुए इस हमले में 53 सैनिकों की मौत हो गई, जबकि 200 से ज्यादा घायल हुए हैं। यमन के सैन्य अधिकारियों ने न्यूज एजेंसी AP को यह जानकारी दी। सेना के प्रवक्ता कर्नल माजिद अल-नजिली ने बताया कि हूती विद्रोहियों ने पुलिस और सुरक्षा बलों के ट्रेनिंग सेंटर पर तीन बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इससे पहले पिछले हफ्ते हूती विद्रोहियों ने अदन शहर में राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागी थीं। हमले के वक्त प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, हालांकि सभी सुरक्षित बच गए। हमले में 4 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 2 सुरक्षाकर्मी शामिल थे। सऊदी अरब के हवाई हमले में 9 लोगों की मौत हूती प्रशासन के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, रविवार को यमन के उत्तरी प्रांत सादा में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के हवाई हमले में कम से कम 9 लोगों की मौत हुई। इनमें 5 बच्चे और 2 महिलाएं शामिल हैं। हूती विद्रोहियों ने दावा किया कि सप्ताहांत में हुए कई हमलों में 30 से ज्यादा लोग मारे गए या घायल हुए। सऊदी अरब ने इस पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। हूती विद्रोहियों ने हाल के हफ्तों में सऊदी अरब पर भी हमले तेज किए हैं। वे यमन के गृहयुद्ध में सरकार का समर्थन करने के कारण सऊदी अरब को निशाना बना रहे हैं। विद्रोहियों ने सऊदी हवाई अड्डों, तेल और सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं। इन हमलों से हजारों उड़ानें प्रभावित हुई हैं और 19 लोगों की मौत हुई है। सऊदी तेल कंपनी अरामको के मुख्यालय पर भी हमला किया गया है। सऊदी अरब के समर्थन से लड़ रही यमन की सरकार यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। सऊदी हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सरकारी सेनाओं को हवाई मदद देता है। वहीं, ईरान पर हूती विद्रोहियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।

यमन के दक्षिण-पूर्वी प्रांत शबवा में सोमवार को एक सरकारी सैन्य प्रशिक्षण ठिकाने पर मिसाइलें हमलों में कम से कम 25 सैनिकों की जान चली गई और 30 से अधिक घायल हो गए।
प्रांतीय राजधानी अताक के पास जरदान जिले में स्थित अल-आलम सैन्य अड्डे पर गिरी तीनों मिसाइलों ने परिसर के भीतर बने एक प्रशिक्षण शिविर को निशाना बनाया। एक सैन्य अधिकारी ने इस हमले के पीछे हुती विद्रोहियों का हाथ बताया है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे फुटेज में घटनास्थल पर भारी तबाही और हताहत लोग दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय चिकित्सा सूत्र ने बताया कि हताहतों का यह आंकड़ा शुरुआती है और इसमें बढ़ोतरी हो सकती है।
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चिकित्सा सूत्र के अनुसार, आपातकालीन और मेडिकल टीमें घायलों को शबवा के अस्पतालों में पहुंचाने में जुटी हैं। शिविर से बरामद कुछ शव बुरी तरह झुलस चुके हैं, जिससे मृतकों की अंतिम संख्या तय करने में मुश्किलें आ रही हैं। जरदान जिले में स्थित अल-आलम एक बड़ा सैन्य ठिकाना है। इसका इस्तेमाल यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन का समर्थन करने वाले बल करते हैं।
हुती विद्रोहियों ने फिलहाल इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। यह वारदात ऐसे समय में हुई है, जब यमन के कई मोर्चों पर हुती विद्रोहियों और सऊदी गठबंधन समर्थित सरकारी बलों के बीच लड़ाई और हमले तेज हो गए हैं।
यमन 2014 के उत्तरार्ध से ही भयानक संघर्ष में फंसा हुआ है, जब हूतियों ने राजधानी सना और देश के अधिकतर उत्तरी हिस्से पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के समर्थन में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 2015 में सैन्य हस्तक्षेप किया था।
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सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा पर दशकों से अरबों डॉलर खर्च किए हैं। उसके पास आधुनिक फाइटर जेट हैं। मिसाइलों को हवा में नष्ट करने वाले महंगे सिस्टम भी हैं। सैन्य खर्च के मामले में वह दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है। हूतियों के पास सऊदी अरब जैसी बड़ी सेना और आधुनिक हथियार नहीं हैं। लेकिन उन्होंने सस्ते ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों को अपनी ताकत बना लिया है। इन हथियारों का पता लगाना और उन्हें हवा में ही नष्ट करना मुश्किल होता है। सऊदी अरब के लिए हूतियों के सस्ते ड्रोन रोकना महंगा सौदा साबित हो रहा है। करीब 15 लाख रुपए के एक ड्रोन को नष्ट करने के लिए 25 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं। हूती विद्रोही इसका फायदा उठाकर सऊदी अरब की महंगी सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी कर रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब के पास इतने आधुनिक हथियार होने के बावजूद हूती उसके अहम ठिकानों तक पहुंच कैसे जा रहे हैं? महंगे हथियारों के सामने सस्ते ड्रोन की चुनौती सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों से आधुनिक और महंगे हथियार खरीदता रहा है। इनमें अत्याधुनिक फाइटर जेट, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। लेकिन हूतियों के हमले के आगे ये सब बेअसर हैं। वे कम कीमत वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। ये हथियार कई बार जमीन के काफी करीब उड़ते हैं। ऐसे में रडार के लिए उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। सऊदी अरब को इन हमलों को रोकने के लिए कई बार बेहद महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 30 करोड़ होती है। इसके मुकाबले एक ड्रोन की कीमत महज 15 लाख होती है। इसका नुकसान सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है। महंगी मिसाइलों का भंडार भी सीमित होता है। यूक्रेन और ईरान जंग से इंटरसेप्टर मिसाइल की मांग बढ़ी यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों के कारण दुनियाभर में मिसाइल इंटरसेप्टर की मांग बढ़ी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक इसी तरह हमलों को रोकते रहना मुश्किल हो सकता है। हूतियों की ताकत भी पहले जैसी नहीं रही। उन्होंने अपने हथियारों के भंडार को बढ़ाया है। अब वे कुछ हथियार खुद भी बनाने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र भी किया गया है कि अब हूती ईरान के भरोसे नहीं रहे। सऊदी की सुरक्षा का फोकस गलत दिशा में रहा सऊदी अरब की एक बड़ी कमजोरी उसका रडार सिस्टम है। देश ने अपनी सुरक्षा के लिए पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाकों पर ज्यादा ध्यान दिया। इन दिशाओं से ईरान और इराक की तरफ से खतरा माना जाता रहा है। लेकिन यमन दक्षिण-पश्चिम में है। इस तरफ से होने वाले हमलों को पकड़ने और रोकने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। हवाई हमलों को रोकने के लिए सबसे जरूरी है कि दुश्मन के ड्रोन या मिसाइल का समय रहते पता चल जाए। अगर हमले का पता देर से चलता है, तो जवाबी कार्रवाई के लिए कम समय बचता है। ऐसे में महंगी और आधुनिक मिसाइलें होने के बावजूद हमले को रोकना मुश्किल हो जाता है। सेना की बनावट भी बन रही है परेशानी सऊदी अरब की मुश्किल सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है। उसकी सेना का ढांचा और काम करने का तरीका भी चुनौती पैदा करते हैं। सऊदी अरब की नियमित सेना में करीब 2.5 लाख सैनिक हैं। वहीं, नेशनल गार्ड में करीब 1.25 लाख सैनिक हैं। नेशनल गार्ड सेना से अलग है। इसमें ऐसे कबीलों के लोगों की भर्ती की जाती रही है, जिन्हें सऊदी राजपरिवार का वफादार माना जाता है। सेना में सुधार के लिए मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया। रियाद में संयुक्त सैन्य कमान बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए, ताकि सेना की अलग-अलग इकाइयों के बीच तालमेल बेहतर हो सके। हालांकि, सेना की कार्यशैली बदलना आसान नहीं है। आधुनिक हथियारों के साथ उन्हें चलाने का प्रशिक्षण, तेजी से फैसले लेने की क्षमता और बेहतर तालमेल भी जरूरी है। 2015 में यमन युद्ध शुरू किया, लेकिन जीत आसान नहीं रही सऊदी अरब की मौजूदा परेशानी को समझने के लिए यमन युद्ध का इतिहास देखना जरूरी है। 2015 में मोहम्मद बिन सलमान ने रक्षा मंत्री के रूप में यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था। उस समय उम्मीद थी कि हूतियों को कुछ ही हफ्तों में कमजोर कर दिया जाएगा। लेकिन युद्ध लंबा खिंचता गया।हूतियों ने यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। उन्होंने सऊदी अरब पर भी बार-बार हमले किए। इस युद्ध में सऊदी अरब को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धक्का लगा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ। इससे लड़ाई कुछ समय के लिए थमी, लेकिन संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। अब अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बीच क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ गया है। हूती भी इस संघर्ष में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सऊदी अरब के सामने अब समस्या यह है कि वह केवल हवाई हमलों के जरिए हूतियों को हरा पाएगा या नहीं, इस पर गंभीर संदेह है। यमन में हूतियों के विरोधी गुट भी बंटे हुए हैं। उनके बीच एकजुटता की कमी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए जमीन पर किसी मजबूत सहयोगी के सहारे हूतियों को पीछे धकेलना भी आसान नहीं है। ईरान को कैसे मिल रहा है फायदा? हूती ईरान के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में गिने जाते हैं। वे सऊदी अरब और अमेरिका के लिए संघर्ष की लागत बढ़ा सकते हैं। इससे ईरान को क्षेत्र में दबाव बनाने का मौका मिलता है। अमेरिका ने 2025 में हूतियों के खिलाफ करीब चार महीने तक सैन्य अभियान चलाया था। इसके बावजूद वह उन्हें पूरी तरह झुका नहीं सका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी दोबारा बड़े सैन्य अभियान में उतरने को लेकर हिचक दिखा चुके हैं। अगर हूती अपनी शर्तों पर समझौता कराने में सफल होते हैं या सऊदी अरब को पीछे हटने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह ईरान और उसके सहयोगी गुटों के लिए बड़ी रणनीतिक उपलब्धि होगी। यमन मामलों की विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी के मुताबिक, हूती अपनी समस्याओं का हल बातचीत के बजाय युद्ध के जरिए निकालने की कोशिश करते हैं। वहीं, सऊदी अरब को लगता था कि ज्यादा पैसा खर्च करके और आधुनिक हथियार खरीदकर वह अपने दुश्मनों को काबू में कर सकता है। लेकिन हूतियों के लगातार हमलों ने दिखा दिया कि सिर्फ पैसा और हथियार होने से दुश्मन को हराना आसान नहीं है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
पिछले कुछ सालों में Gen Z यानी युवा पीढ़ी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी है। बांग्लादेश, नेपाल, पेरू और मेडागास्कर में युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारें गिरा दीं। भारत में भी कई प्रदर्शनों में युवाओं की अहम भूमिका रही है। अब यूरोप में भी युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, स्पेन में बेरोजगारी और ब्रिटेन में पेंशन नीतियों को लेकर नाराजगी है। युवाओं के लिए नौकरी पाना, अच्छी शिक्षा हासिल करना और सस्ता घर खरीदना मुश्किल होता जा रहा है। यूरोप में इस मुश्किल ने युवाओं और बुजुर्गों के बीच आर्थिक और राजनीतिक टकराव बढ़ा दिया है। बुजुर्गों की आबादी बढ़ने के साथ राजनीति में उनका प्रभाव भी मजबूत हुआ है। वहीं, युवाओं की संख्या घट रही है। ऐसे में उनके लिए अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाना और मुश्किल हो रहा है। फ्रांस: युवाओं को स्कूलों के लिए पैसा चाहिए, बुजुर्गों को पेंशन फ्रांस में युवाओं के सामने नौकरी की कमी है। बेरोजगारी 20% पहुंच चुकी है। इस साल दूसरी तिमाही में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ शून्य रही। दूसरी तरफ, सरकार के कुल खर्च का करीब 25% पेंशन पर जाता है। यानी बजट का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों की पेंशन में खर्च हो रहा है। कुछ साल पहले राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने रिटायरमेंट की उम्र 62 से बढ़ाकर 64 साल करने का फैसला किया था। इसके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार को फैसला निलंबित करना पड़ा। अब पक्ष हो या विपक्ष कोई भी पेंशन में कटौती को लेकर चर्चा भी नहीं करता। युवा चाहते हैं कि स्कूलों की हालत सुधरे और शिक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च हो। वामपंथी नेताओं का तर्क है कि पेंशन बचाते हुए शिक्षा का बजट भी बढ़ाया जा सकता है। लेकिन सवाल है कि पैसा आएगा कहां से? फ्रांस पर पहले से भारी कर्ज है, और अमीरों पर ज्यादा टैक्स लगाने से भी सरकार को खास कमाई नहीं हुई है। ऐसे में दोनों वर्गों की मांगें पूरी करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्पेन: युवाओं के लिए घर खरीदना मुश्किल स्पेन में भी यही समस्या दिख रही है। वहां घरों की कमी और बढ़ते किराए को लेकर हाल में प्रदर्शन हुए। स्पेन में युवाओं की बेरोजगारी 22% से ज्यादा है और घरों की कीमतें वेतन के मुकाबले कहीं तेजी से बढ़ी हैं। नतीजा यह है कि कई युवा 30 साल की उम्र पार करने के बाद भी माता-पिता के साथ रहने को मजबूर हैं। जो अलग रहते हैं, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा किराए में चला जाता है। ऐसे में बचत करना और अपना घर खरीदना मुश्किल है। दूसरी ओर, जिन बुजुर्गों के पास पहले से घर हैं, उन्हें बढ़ती कीमतों का फायदा मिल सकता है। उनकी संपत्ति की कीमत बढ़ रही है, जबकि युवाओं के लिए घर खरीदना और मुश्किल होता जा रहा है। यही अंतर दोनों पीढ़ियों के बीच तनाव बढ़ा रहा है। ब्रिटेन में पेंशन पर खर्च को लेकर बहस ब्रिटेन में भी युवा बेरोजगारी और महंगे मकानों से परेशान हैं। युवाओं में बेरोजगारी करीब 16% है। खासकर लंदन और उसके आसपास घरों का किराया बहुत ज्यादा है। मुश्किल यह है कि रोजगार के नए मौके भी ज्यादातर इन्हीं इलाकों में पैदा होते हैं। ऐसे में युवाओं के लिए नौकरी मिलने के बाद भी घर का खर्च उठाना आसान नहीं है। ब्रिटेन में बुजुर्गों की पेंशन बढ़ाने के लिए ‘ट्रिपल लॉक’ नाम की व्यवस्था है। इसके तहत पेंशन हर साल महंगाई, औसत वेतन में बढ़ोतरी या 2.5% में से जो भी ज्यादा हो, उतनी बढ़ाई जाती है। इससे बुजुर्गों की पेंशन घटने के बजाय बढ़ती रहती है। सरकार अगर पेंशन पर खर्च कम करने की कोशिश करती है, तो उसे राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ सकता है।प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने एक लोकल चुनाव से पहले इस व्यवस्था में बदलाव करने की बात कही थी। हालांकि विरोधी नेताओं ने इसे महज चुनावी जुमला बताया। उनका कहना है कि अगर वे ऐसा करते हैं तो ये उनके लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। युवाओं पर बुजुर्गों का पलड़ा भारी क्यों? राजनीतिक पकड़ मजबूत होना: बुजुर्गों की राजनीतिक दलों और ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है। वे चुनाव में भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेताओं के लिए उनकी मांगों को नजरअंदाज करना मुश्किल होता है। पेंशन का फायदा पूरे परिवार को मिलना: कई युवा नौकरी या कमाई के बावजूद अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों में बुजुर्गों की पेंशन घर का खर्च चलाने में मदद करती है। अगर सरकार पेंशन घटाती है, तो इसका असर पूरे परिवार पर पड़ सकता है। कामकाजी लोगों को यह चिंता भी रहती है कि पेंशन कम होने पर माता-पिता के खर्च की जिम्मेदारी उन पर बढ़ जाएगी। पेंशन को अपने भविष्य से जोड़कर देखना: युवाओं को लगता है कि आज बुजुर्गों को पेंशन मिलेगी, तो भविष्य में उन्हें भी इसका फायदा मिल सकता है। इसलिए वे पेंशन व्यवस्था के खिलाफ खुलकर नहीं बोलते हैं। इसके उलट, बुजुर्गों को शिक्षा पर ज्यादा सरकारी पैसा खर्च करने के लिए मनाना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हें नहीं मिलता। यही वजह है कि पेंशन पर खर्च घटाने और शिक्षा जैसी सेवाओं पर खर्च बढ़ाने के बीच सहमति बनाना आसान नहीं है। ——————————— ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। सूचना मंत्रालय के मुताबिक, हमले में 4 लोगों की मौत हुई है, जिनमें 2 सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। हूती विद्रोहियों ने कहा कि उन्होंने अदन में सऊदी अरब के सैन्य अभियान मुख्यालय पर हमला किया। हूती मीडिया ने हथियारों के भंडार को निशाना बनाने का दावा भी किया। हालांकि, इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है। अदन यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार की अंतरिम राजधानी है। देश में सरकार और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से संघर्ष जारी है। सऊदी अरब के समर्थन से लड़ रही यमन की सरकार यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है और हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सरकारी सेनाओं को हवाई मदद देता है। वहीं, ईरान पर हूती विद्रोहियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। राष्ट्रपति भवन परिसर पर हमले से यमन में संघर्ष और बढ़ने की आशंका है। हूतियों ने कहा है कि उनका निशाना सऊदी सैन्य अभियान से जुड़े ठिकाने थे। रिपोर्ट- चीन की मदद से मिसाइल बना रहे हूती विद्रोही यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई ———————- ये खबर भी पढ़ें… इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। हथियार बनाने के लिए जरूरी सामान जुटा रहे हूती रिपोर्ट के मुताबिक, यमन के अधिकारियों ने जुलाई में चीन से भेजे गए दो संदिग्ध सामानों की खेप पकड़ी थी। इनमें मिसाइल बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई अहम पुर्जे मिले। पकड़ी गई खेप चीन से भेजी गई थी। इसे यमन के होदेइदा बंदरगाह पहुंचाया जाना था। इजराइली अधिकारियों का कहना है कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईरान हथियारों की सप्लाई के लिए करता रहा है। पकड़ी गई खेप में क्या-क्या मिला? रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था के वरिष्ठ विश्लेषक फैबियन हिंज के मुताबिक, हूती ईरान में डिजाइन की गई खास तरह की मिसाइल बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इन पुर्जों का इस्तेमाल आम नागरिक कामों में करना मुश्किल है। हूतियों की हथियार बनाने की क्षमता पहले से ज्यादा हूती करीब दो दशक पहले यमन में एक विद्रोही संगठन के तौर पर उभरे थे। शुरुआत में उनके पास यमन की सेना से हासिल सोवियत दौर के और उत्तर कोरिया में बने हथियार थे। समय के साथ उन्हें ज्यादा आधुनिक हथियार और तकनीक मिलने लगी। ईरान पर निर्भरता घटाने की कोशिश क्यों? ईरान लंबे समय से हूतियों को हथियार बनाने की तकनीक, डिजाइन और जरूरी पुर्जे देता रहा है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, अब हूती चीन समेत दूसरे देशों से भी हथियार बनाने का सामान जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के ईरान कार्यक्रम के वरिष्ठ निदेशक बेहनाम बेन तालेब्लू ने कहा कि हथियार बनाने के लिए कई जगहों से सामान मिलना किसी संगठन के लिए फायदेमंद होता है। उनके मुताबिक, ईरान पर रोक के बीच हूती सामान जुटाने के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हूती अभी मिसाइल के लिए जरूरी जटिल सिस्टम के लिए ईरान पर निर्भर हैं। वे दूसरे देशों से मिले पुर्जों को जोड़कर कुछ हथियार बना सकते हैं, लेकिन आधुनिक हथियारों की पूरी तकनीक खुद विकसित नहीं कर सकते। चीन के लिए कूटनीतिक चुनौती बढ़ सकती है चीन ईरान और सऊदी अरब, दोनों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। 2023 में चीन ने दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने में भी भूमिका निभाई थी। चीन ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हूतियों के हमलों की निंदा की है और संघर्ष कम करने की अपील की है। अब अगर चीन से आए पुर्जों का इस्तेमाल हूती मिसाइल बनाने में होने के दावे की पुष्टि होती है, तो सऊदी अरब और चीन के रिश्तों पर दबाव बढ़ सकता है। चीन सऊदी अरब का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। मध्य पूर्व के विशेषज्ञ क्रिस्टियन उलरिचसन के मुताबिक, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे और एयरपोर्ट पर हमलों के बाद चीन पर इस मुद्दे को लेकर ज्यादा दबाव पड़ सकता है। फिलहाल यह साफ नहीं होता कि चीन की सरकार ने जानबूझकर हूतियों को मिसाइल बनाने के लिए सामान भेजा था। ————————- यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज में बारूदी सुरंग से टकराकर जहाज डूबा: जंग शुरू होने के बाद पहली बार ऐसा हुआ होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराकर बुधवार सुबह एक मालवाहक जहाज डूब गया। जहाज में 2500 कंटेनर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने यह जानकारी दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

