आज का एक्सप्लेनर:हूतियों से लड़ने सऊदी जा रहीं पाक-तुर्किये की सेनाएं, पाकिस्तान ने पहले इनकार किया, आखिर किस मजबूरी में एक्टिवेट हुआ ‘मक्का पैक्ट’

पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब ने पहली बार ‘मक्का पैक्ट’ एक्टिवेट कर दिया है। 2 महीने पहले हुए करार के तहत किसी एक देश पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। यानी, अब हूतियों से जंग में उलझे सऊदी की मदद के लिए पाक-तुर्किये को सेनाएं भेजनी पड़ेंगी। आखिर मदद मांगने को कैसे मजबूर हुआ सऊदी, क्या वाकई दूसरे देश के लिए लड़ेंगी पाकिस्तान-तुर्किये की सेनाएं और क्या इससे भारत को चिंता करनी चाहिए; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: हूतियों ने सऊदी अरब को मदद मांगने पर कैसे मजबूर किया? जवाब: सऊदी अरब के पड़ोस में है यमन। यहां की कुल 4 करोड़ की आबादी में करीब 35% जैदी शिया हैं। इन्हीं शियाओं का हथियारबंद समूह और राजनीतिक ऑर्गेनाइजेशन है हूती। यमन की मान्यता प्राप्त सरकार को सऊदी अरब का समर्थन हासिल है। सऊदी के जवान सरकार की सेना के साथ मिलकर कई इलाकों में डेरा डाले हुए हैं। वहीं सरकार के खिलाफ विद्रोह करके यमन के उत्तर-पश्चिम इलाके, राजधानी सना और लाल सागर के तटीय इलाके में हूतियों का कब्जा है। इन्हें ईरान से हथियार और पैसे की मदद मिलती है। 2015 से ही हूतियों और सऊदी समर्थित यमन की सेना में इलाकों पर कब्जे को लेकर छिटपुट संघर्ष चलता रहा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र ने सीजफायर करवाया। बीते साल शुरू हुई ईरान-अमेरिका जंग के दौरान ईरान ने अमेरिका के सहयोगी सऊदी पर भी हमले किए। हूतियों ने भी कई बार सऊदी पर हमला करने की धमकी दी। 5 अगस्त 2026 को हूतियों ने सऊदी समर्थित यमन सेना के कैंपों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले शुरू कर दिए. हूतियों ने आरोप लगाया कि यहां सऊदी गठबंधन सेना जमावड़ा बढ़ा रही थी। इसी के साथ 4 साल पुराना सीजफायर टूट गया… सवाल-2: पाकिस्तान ने पहले टाला, फिर जमीनी सेना भेजने को क्यों तैयार हुआ? जवाब: 10 सितंबर को पाकिस्तान ने कहा, ‘सऊदी पर हूतियों के हमले के खिलाफ मक्का पैक्ट के तहत कोई कार्रवाई करने पर कोई बातचीत नहीं हुई है। जब वक्त आएगा, तब कदम उठाएंगे।’ पाकिस्तान के इस रुख के पीछे 3 वजहें थीं… 1. साझा सैन्य कमांड का कोई ढांचा नहींः तुर्किये के डिप्लोमेट रहे मुस्तफा एनेस एसेन के मुताबिक, ‘मक्का पैक्ट प्रतीकात्मक है, क्योंकि इसका एक जॉइंट सैन्य कमांड स्ट्रक्चर नहीं है। तुर्किये और पाकिस्तान का सीधे टकराव में शामिल होना मुश्किल है। 2. मध्यस्थ की भूमिका को खतराः पाकिस्तान, अमेरिका-ईरान जंग में मध्यस्थता की भूमिका में है। उसने ईरान से हूतियों पर लगाम कसने के लिए कहा और सऊदी पर हमलों की निंदा भी की। लेकिन इससे आगे बढ़ने से पाकिस्तान की मध्यस्थता वाली भूमिका खतरे में पड़ सकती थी। 3. शिया-सुन्नी की लड़ाई में नहीं उलझना चाहताः पाकिस्तान में शियाओं की भी बड़ी आबादी है। 2015 में सऊदी ने हूतियों के खिलाफ जंग में मदद मांगी थी, तब भी पाकिस्तान ने इनकार कर दिया था। तब के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा था, ‘हम किसी सांप्रदायिक जंग का हिस्सा नहीं बनना चाहते, क्योंकि इसकी दरारें पाकिस्तान के अंदर भी नजर आएंगी।’ इधर 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से फोन पर हूतियों पर हवाई हमले करने को कहा था। ट्रम्प ने मदद ठुकरा दी। फिर 15 सितंबर को हूतियों और अमेरिका में सीक्रेट मीटिंग हुई, जिसमें हूतियों ने वादा किया कि वो लाल सागर में अमेरिका और इजराइल के जहाजों पर हमला नहीं करेंगे। इससे सऊदी को अमेरिकी मदद मिलने की उम्मीद और कम हो गई। सऊदी ने दावा किया कि 15-16 सितंबर की रात हूतियों ने सऊदी के पवित्र शहर मक्का की तरफ ड्रोन छोड़े। हूतियों के प्रवक्ता याह्या सिरी का कहना था, ‘हमारा निशाना सऊदी के तेल और सैन्य ठिकाने थे, जो कि पवित्र स्थलों से काफी दूर हैं।’ हालांकि ड्रोन को रोकने के दौरान मक्का प्रांत के ताइफ शहर में एक व्यक्ति की मौत हो गई और दो लोग घायल हो गए। इसके बाद पाकिस्तान का रुख बदलने लगा… सवाल-3: तो क्या वाकई पाक-तुर्किये की सेनाएं हूतियों से लड़ेंगी? जवाब: साझा बयान में कहा गया है, ‘तीनों देश सऊदी में ‘तेजी से’ जॉइंट फोर्सेज और दूसरी ताकत (यानी हथियार, इंटेलिजेंस वगैरह) तैनात करेंगे।’ हालांकि पाकिस्तानी सैनिकों का सऊदी जाना नई बात नहीं है…. वहीं तुर्किये के विदेश मंत्री फिदान ने कहा है कि मक्का पैक्ट, नाटो की तरह काम करेगा, लेकिन मदद का पैमाना आगे की बातचीत से तय होगा। तुर्किये के सामने अपनी सेना भेजने में एक अड़चन ये भी है कि उसके कानून के तहत विदेश में सेना भेजने के लिए संसद की मंजूरी लेनी होगी। 5 अक्टूबर के फैसले में भी कहा गया है कि सऊदी की मदद में सेनाओं की तैनाती तीनों देशों के राष्ट्रीय कानूनों और आपसी सहमति के आधार पर होगी। सवाल-4: पाकिस्तान-भारत जंग छिड़ी, तो क्या तुर्किये-सऊदी भी लड़ने आएंगे? जवाब: सऊदी और तुर्किये भारत को दुश्मन नहीं मानते, इसलिए जंग में उनके हमले की आशंका बेहद कम है। लेकिन 3 बातें गौर करनी चाहिए… पाकिस्तान पैक्ट का फायदा उठाएगा: कार्नेगी इंडिया थिंकटैंक में सिक्योरिटी स्टडीज प्रोग्राम के फेलो दिनकर पेरी के मुताबिक, ‘यह पैक्ट पश्चिम एशिया के लिए बना है, लेकिन पाकिस्तान इसे भारत के साथ संघर्षों में इस्तेमाल करने की कोशिश करेगा। खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद बनी हालात के चलते।’ सऊदी भारत पर हमला नहीं करेगा: भारत और सऊदी अरब के अच्छे कूटनीतिक संबंध हैं। सऊदी और भारत में सालाना 40 बिलियन डॉलर से ज्यादा का व्यापार होता है। सऊदी-पाकिस्तान से यह 5 बिलियन डॉलर से भी कम है। इसलिए पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी कहते हैं, ‘अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करे या ऑपरेशन सिंदूर जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो, तो सऊदी पाकिस्तान का रक्षक बनकर नहीं आएगा।’ तुर्किये हथियार सप्लाई जारी रखेगा: रिपोर्ट्स के मुताबिक 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को 350 से ज्यादा ड्रोन्स भेजे थे। पाकिस्तान के समर्थन में स्टेटमेंट जारी किया था। पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया के मुताबिक, ‘इस पैक्ट से भारत-पाकिस्तान की स्थिति नहीं बदलेगी। तुर्किये पाकिस्तान को ड्रोन सप्लाई करता रहेगा और सऊदी खुद को पाकिस्तान का समर्थक दिखाने से बचेगा।’ सवाल-5: भारत के पास इस नई चुनौती की क्या काट है? जवाब: भारत की सबसे बड़ी काट उसके खाड़ी देशों से डिप्लोमैटिक और व्यापारिक रिश्ते हैं। खाड़ी देशों में 89 लाख भारतीय रहते हैं। भारत सऊदी अरब का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। सऊदी अरब अपना करीब 16% तो UAE करीब 11% कच्चा तेल भारत को बेचता है। मई 2026 में ही भारत ने UAE के साथ रक्षा समझौता किया है। यह रिश्ते और मजबूत किए जा सकते हैं… ——– ये एक्सप्लेनर भी पढ़िए… पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। पूरी खबर पढ़िए…

पाकिस्तान का ड्रोन हमलों से बचने के लिए सस्ता तरीका:सेना-पुलिस के ठिकानों पर मछली पकड़ने वाला जाल लगा रहे, दावा- इसमें ड्रोन फंसकर फट जाएंगे

पाकिस्तान में ड्रोन हमलों से बचने के लिए पुलिस और सेना अब मछली पकड़ने वाले जाल का इस्तेमाल कर रही है। अल जजीरा के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के संवेदनशील इलाकों में पुलिस चौकियों और सुरक्षा ठिकानों के ऊपर कई मीटर की ऊंचाई पर ये जाल लगाए जा रहे हैं। सुरक्षाकर्मियों का ऐसा मानना है कि हमलावर ड्रोन इन जालों में फंस सकते हैं। इससे ड्रोन हमले में होने वाला नुकसान 40 से 50% तक कम किया जा सकता है। हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों ने इस तरीके को पूरी तरह भरोसेमंद मानने से इनकार किया है। आतंकी गोलीबारी से ज्यादा ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे पुलिस के मुताबिक, जाल लगाने की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आतंकियों ने हमले का तरीका बदल दिया है। अब वे गोलीबारी और मोर्टार के साथ ड्रोन का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में 29 जुलाई को सबसे घातक हमलों में से एक हुआ था। बम से भरे ड्रोन से पुलिस चौकी पर हमला किया। इसमें 11 पुलिसकर्मी मारे गए। इसके बाद कई घंटे तक चली मुठभेड़ में 15 हमलावर भी मारे गए। पुलिस के मुताबिक, इस साल खैबर पख्तूनख्वा के हंगू जिले में कम से कम 16 हमले हो चुके हैं। इसी वजह से यह जिला प्रांत के सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल है। ऐसे हमलों से बचने के लिए हंगू पुलिस ने कम लागत वाला तरीका अपनाया। पुलिस चौकी की छत और चारदीवारी के बीच कई मीटर ऊपर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए गए। इससे चौकी के ऊपर एक तरह की जालीदार छत बन गई। एक चेकपोस्ट पर करीब 1 लाख रुपए खर्च हंगू के जिला पुलिस अधिकारी तारिक हबीब के मुताबिक, एक सामान्य पुलिस चेकपोस्ट को इस तरह के जाल से ढकने में करीब 1.4 लाख रुपए खर्च होते हैं। खैबर पख्तूनख्वा पुलिस के प्रवक्ता के मुताबिक, हंगू के अलावा कोहाट, करक, बन्नू, लक्की मरवत और डेरा इस्माइल खान जैसे कम से कम 5 और संवेदनशील जिलों में भी पुलिस चौकियों और चेकपोस्ट पर ये जाल लगाए गए हैं। प्रांत के कुछ इलाकों में सेना के ठिकानों पर भी ‘एंटी-ड्रोन जाल’ लगाए गए हैं। पुलिस ने इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रांतीय सरकार से अतिरिक्त पैसे भी मांगे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों को इस तरीके पर भरोसा नहीं इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज के कार्यकारी निदेशक इम्तियाज गुल ने इसे नासमझी वाला सस्ता तरीका बताया। उनके मुताबिक, आतंकियों का निशाना हमेशा पुलिस स्टेशन या चेकपोस्ट ही नहीं होते। ड्रोन का इस्तेमाल बड़े और जरूरी ठिकानों पर हमला करने के लिए किया जाता है, ताकि हमले का असर ज्यादा दिखाई दे और लोगों में डर पैदा हो। उन्होंने कहा कि असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां ड्रोन के हवा में उठते ही उसे रोकने की क्षमता रखती हैं। यूक्रेन में भी इस्तेमाल हुआ है ऐसा तरीका पेशावर के आतंकवाद और सुरक्षा विशेषज्ञ फिदा अदील ने बताया कि मछली पकड़ने वाले जाल से ड्रोन रोकना कोई नया तरीका नहीं है। सेना पहले से ही सामान और ठिकानों को छिपाने के लिए ऐसे जाल इस्तेमाल करती रही है। यूक्रेन में भी रूसी ड्रोन को रोकने के लिए इनका इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, अदील के मुताबिक, विस्फोटक से भरे ड्रोन के खिलाफ जाल कितना काम करेगा, यह उसके डिजाइन और उसे लगाने के तरीके पर निर्भर करता है। उन्होंने पुलिस के 40 से 50% नुकसान कम होने के दावे पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि असली हमले या सही परीक्षण के बिना इस आंकड़े की पुष्टि नहीं हो सकती। ——————— यह खबर भी पढ़ें… सऊदी अरब में तैनात होंगी पाकिस्तान-तुर्किये की फौज लाल सागर में हूती विद्रोहियों की बढ़ती ताकत ने अब सऊदी अरब को सीधे सैन्य कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया है। सऊदी समर्थित यमनी सेना ने हूतियों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। इसी बीच पाकिस्तान और तुर्किये भी सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए अपने सैन्य बल तैनात करने की तैयारी में हैं। पूरी खबर पढ़ें…

सऊदी अरब में तैनात होंगी पाकिस्तान-तुर्किये की फौज:हूती विद्रोहियों के खिलाफ साथ आए तीनों देश; पिछले महीने पाकिस्तान ने मदद से इनकार किया था

पाकिस्तान और तुर्किये अपनी सेना जल्द सऊदी अरब में तैनात करेगी। यह फैसला सोमवार को रियाद में मक्का गठबंधन की आपात बैठक में हुआ। हूती विद्रोहियों से जुड़े हमलों के बाद सुरक्षा खतरों को देखते हुए तीनों देश साथ आ गए हैं। हूतियों ने यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। यह इलाका सऊदी अरब के बेहद करीब है। इससे सऊदी की सुरक्षा और व्यापार पर संकट बढ़ गया है। हालांकि, इससे पहले पाकिस्तान ने सितंबर में सऊदी को सैन्य मदद देने से इनकार कर दिया था। यरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी ने हूती हमले के बाद सबसे पहले पाकिस्तान से मदद मांगी थी। लेकिन पाकिस्तान ने कहा कि उसकी सेना किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। हूती विद्रोहियों ने लाल-सागर में दो और द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। इससे पहले पिछले हफ्ते हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा और बाब अल-मंदेब में मौजूद मायून द्वीप पर भी कब्जा किया था। इन दोनों जगहों पर सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना का नियंत्रण था। हूतियों के इन द्वीपों पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। बाब अल-मंदेब एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए शॉर्टकट रास्ता है। यहां से गुजरने के बाद जहाज स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं। सऊदी अरब जल्द हूतियों पर हमला कर सकता है सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा सैनिकों को यमन में उतार सकता है। इसका मकसद बाब अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं – इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। मक्का पैक्ट लागू- एक पर हमला तीनों पर माना जाएगा रियाद में सोमवार को हुई बैठक में मक्का रक्षा समझौता औपचारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते के तहत एक देश पर हमला तीनों पर माना जाएगा। इस बैठक में तीनों देशों के वरिष्ठ रक्षा और सैन्य अधिकारी शामिल हुए। तुर्किये की ओर से विदेश मंत्री हाकान फिदान, रक्षा मंत्री याशार ग्यूलर शामिल हुए। सऊदी अरब की ओर से विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद, रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान शामिल हुए। पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार ने किया। उनके साथ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ भी मौजूद रहे। पाकिस्तान के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल नौमान महमूद भी बैठक में शामिल हुए। उन्हें मक्का रक्षा पैक्ट का महासचिव नियुक्त किया गया है।

Houthi-Saudi War: हूती हमलों के बीच खाड़ी में बड़ा सैन्य फैसला, सऊदी अरब में जल्द तैनात होंगे पाकिस्तान-तुर्की के सैनिक

Houthi-Saudi War: यमन के हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान और तुर्की ने बड़ा ऐलान किया है। ‘मक्का संयुक्त रक्षा समझौते’ के तहत दोनों देश सऊदी अरब में अपने सैनिकों और सैन्य क्षमताओं की जल्द तैनाती की दिशा में आगे बढ़ेंगे। तीनों देशों ने सऊदी की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ किसी भी हमले या खतरे को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच हुए त्रिपक्षीय मक्का रक्षा गठबंधन की एक उच्चस्तरीय समिति रियाद में बैठक की, जिसके बाद ये फैसला लिया गया।

क्या है पूरा मामला?

सोमवार को रियाद में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के वरिष्ठ अधिकारियों की आपात बैठक हुई। इसमें पाकिस्तान के चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर, उप प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार और रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ समेत कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। बैठक के बाद जारी एक संयुक्त बयान में तीनों देशों ने कहा कि वे सऊदी अरब की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के खिलाफ किसी भी हमले या धमकी को स्वीकार नहीं करेंगे। साथ ही, सामूहिक रक्षा से जुड़ी प्रतिबद्धताओं को व्यावहारिक रूप से लागू करने और जरूरी सैन्य बल व क्षमताएं उपलब्ध कराने पर सहमति बनी है।

क्या है मक्का संयुक्त रक्षा समझौता?

अगस्त में हुए इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के तहत अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है तो बाकी दोनों देश उसके समर्थन में सामने आएंगे। इस समझौते में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब शामिल हैं। इस गठजोड़ में तुर्की की नाटो की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। पाकिस्तान मुस्लिम दुनिया का एकमात्र परमाणु हथियार संपन्न देश है। जबकि सऊदी अरब खाड़ी क्षेत्र की प्रमुख सैन्य और आर्थिक शक्तियों में से एक है।

कितने सैनिक जाएंगे, भूमिका क्या होगी?

हालांकि, तीनों देशों ने सऊदी अरब में सैन्य बलों की तेजी से तैनाती की बात कही है। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि पाकिस्तान और तुर्की कितने सैनिक भेजेंगे। यह भी नहीं बताया गया है कि तैनात सैनिकों को किस तरह की जिम्मेदारी दी जाएगी।

हूती हमलों के बीच बढ़ी चिंता

यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब सऊदी अरब को यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है। हूती पहले भी सऊदी शहरों, तेल प्रतिष्ठानों और समुद्री मार्गों को निशाना बना चुके हैं। सितंबर में हूतियों ने बड़ा सैन्य अभियान चलाकर यमन की सऊदी समर्थित सरकार के नियंत्रण वाले कई इलाकों पर कब्जा कर लिया था।

इसके जवाब में सोमवार को सऊदी समर्थित बलों ने जवाबी अभियान शुरू किया और हूतियों के कब्जे वाले क्षेत्रों को वापस लेने की कोशिश तेज कर दी। हूती विद्रोहियों ने कहा है कि उन्होंने सऊदी अरब की राजधानी रियाद में बड़ा हमला किया है। यह हमला ईरान के समर्थक इस गुट और यमन की सऊदी-समर्थित अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के बीच बढ़ती लड़ाई के दौरान हुआ है।

यमन ने हूतियों को खदेड़ने के लिए फौज भेजी:इनके कब्जे में देश का एक-तिहाई हिस्सा, यहां 80% आबादी रहती है

यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने हूती विद्रोहियों को खदेड़ने और कब्जे वाले इलाकों को वापस लेने के लिए फौज भेजना शुरू कर दिया है। राष्ट्रपति राशद अल-अलीमी ने रविवार को इसका ऐलान करते हुए कहा कि सरकारी सेना पूरे यमन में राज्य का नियंत्रण बहाल करेगी। यमन में हूतियों का करीब एक-तिहाई इलाके पर नियंत्रण है। यहां देश की करीब 80% आबादी रहती है। यही वजह है कि हूतियों का क्षेत्रफल कम होने के बावजूद उनका देश की आबादी और अहम शहरों पर बड़ा प्रभाव है। हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर कब्जा बढ़ाया हूतियों ने पिछले 48 घंटों में यमन के पश्चिमी तट पर कई रणनीतिक पहाड़ियों पर कब्जा किया है। अगर हूती इस इलाके को सरकारी इलाके से काट देते हैं, तो सरकार पूरी तरह इस पर नियंत्रण खो देगी। हूतियो ने इस इलाके में यमन के तीसरे सबसे बड़े शहर ताइज पर भी कब्जा बढ़ाया है। यहां सैकड़ों लोग रहते हैं और हजारों सरकारी समर्थक लड़ाके भी तैनात हैं। शहर पर दबाव बढ़ने से आम लोगों के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यमनी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद अल-कादी के मुताबिक, आसपास की पहाड़ियों पर कब्जा हूतियों को मजबूत रक्षा स्थिति देता है। इससे तट की ओर होने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई का सामना करना उनके लिए आसान होगा और इन इलाकों को वापस लेना सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है। बाब अल-मंदेब पर भी हूतियों की नजर हूतियों की हालिया बढ़त सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। उन्होंने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास भी अपनी स्थिति मजबूत की है। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया का 12% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। हाल ही में हूतियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश पर कब्जा कर लिया है। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। इन पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। यूरोप और एशिया के बीच आने-जाने वाले जहाजों के लिए यह रास्ता बेहद अहम है। ऐसे में इस इलाके पर हूतियों का नियंत्रण बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर भी असर पड़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के बीच बाब अल-मंदेब की अहमियत और बढ़ गई है। 12 साल से चल रही हैं यमन में लड़ाई यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है। 2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है। युद्ध से यमन पहले ही गंभीर मानवीय संकट में है। देश का बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो चुका है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक, कुछ इलाकों में हर 4 में से 3 परिवारों को पर्याप्त खाना नहीं मिल रहा। नई लड़ाई में हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं। ऐसे में अगर सैन्य अभियान लंबा चला, तो यमन में भूख और विस्थापन का संकट और बढ़ सकता है। सऊदी अरब भी हूतियों पर हमला कर सकता है सऊदी अरब भी यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा सैनिकों को उतार सकता है। इसका मकसद बाब अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं – इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। ———————– यह खबर भी पढ़ें… अल-कायदा ने फ्लाईदुबई हमले के आरोपी की तारीफ की: कहा- जंग अभी खत्म नहीं हुई, अमेरिकी-इजराइली विमानों पर 9/11 जैसे हमले करो आतंकी संगठन अल-कायदा ने फ्लाईदुबई की फ्लाइट में भारतीय पायलट स्मित मच्छर पर हमला करने वाले ओमानी को-पायलट हमाम अल-हमामी की तारीफ की। पूरी खबर पढ़ें…

रिपोर्ट- सऊदी अरब हूती विद्रोहियों पर हमला करेगा:1 लाख सैनिक उतारने की तैयारी, बाब-अलमंदेब से कब्जा छुड़ाएगा; यहां से दुनिया का 12% तेल गुजरता है

सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को उतार सकता है। इसका मकसद लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। हूतियों की इस इलाके में बढ़ती पकड़ से दुनिया के अहम समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है। यह रास्ता एशिया और यूरोप के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है। बाब-अल-मंदेब दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया का 12% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
बाब-अल-मंदेब पर कब्जे के लिए जंग क्यों? पिछले महीने हूतियों ने यमन के तटीय इलाकों में आगे बढ़ते हुए इस रास्ते के आसपास अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने सऊदी समर्थित यमन के सरकारी बलों और UAE समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज को पीछे धकेला। बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। इसके रास्ते जहाज एशिया से लाल सागर और स्वेज नहर होते हुए यूरोप तक पहुंचते हैं। इस वजह से यह वैश्विक व्यापार और तेल की सप्लाई के लिए अहम है। सऊदी अरब को आशंका है कि हूतियों का नियंत्रण बना रहा तो इस रास्ते से होने वाले व्यापार और तेल की ढुलाई पर खतरा बढ़ सकता है। हूतियों के खिलाफ दो तरह के सैन्य ऑपरेशन पर विचार रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं। पहले विकल्प में बाब-अल-मंदेब के आसपास सीमित हमला करके समुद्री रास्ते को सुरक्षित करने की कोशिश की जाएगी। दूसरे विकल्प में यमन के कई इलाकों में एक साथ ऑपरेशन चलाया जा सकता है। इसमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ जैसे इलाके शामिल हो सकते हैं। इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। ऑपरेशन के दायरे के हिसाब से 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिक जुटाए जा सकते हैं। हालांकि, सैन्य कार्रवाई की समयसीमा को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने को तैयार नहीं रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी, लक्ष्य तय करने में मदद और सैन्य सलाह दे रहा है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी नेतृत्व की सीधे सैन्य मदद और हवाई हमले करने की मांग पर सहमति नहीं दी है। फिलहाल अमेरिका के सीधे युद्ध में शामिल होने की उम्मीद नहीं है। सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये से भी सैन्य मदद मिली है। पाकिस्तान ने पिछले महीने अदन में एयर डिफेंस सिस्टम, हल्की तोपें, ड्रोन और ड्रोन रोधी उपकरण भेजे थे। पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान ने यमन में लड़ाई के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला नहीं किया है। तुर्किये के ड्रोन भी यमन में तैनात किए गए हैं। वहीं, फ्रांस ने यानबू में रक्षात्मक प्रणालियां और सैनिक भेजने की घोषणा की है। सऊदी अरब के सामने क्या चुनौती है? यमन में हूतियों के विरोधी गुटों के बीच एकता की कमी सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है। इन गुटों के हित और राजनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं। ऐसे में केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाने से ऑपरेशन की सफलता तय नहीं होगी। सऊदी अरब की चिंता अपने तेल ठिकानों की सुरक्षा को लेकर भी है। हूती पहले भी ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी अरब को निशाना बना चुके हैं। अगर यमन में लड़ाई तेज होती है, तो सऊदी तेल ठिकानों और समुद्री व्यापार पर हमलों का खतरा भी बढ़ सकता है। ———————— ये खबर भी पढ़ें…. नेतन्याहू बोले- हमलावर को किसने भेजा, जांच कर रहे:उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी; रिपोर्ट- चुनाव में हार रहे थे नेतन्याहू, हादसे का फायदा मिला इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि फ्लाईदुबई की फ्लाइट में कैप्टन पर हमले के आरोपी ओमानी पायलट को किसने भेजा था, इसकी जांच की जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस घटना के पीछे कोई व्यक्ति या संगठन मिला, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

रिपोर्ट- सऊदी अरब हूती विद्रोहियों पर हमला करेगा:1 लाख सैनिक उतारने की तैयारी, बाब-अलमंदेब से कब्जा छुड़ाएगा; यहां से दुनिया का 12% तेल गुजरता है

सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को उतार सकता है। इसका मकसद लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। हूतियों की इस इलाके में बढ़ती पकड़ से दुनिया के अहम समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है। यह रास्ता एशिया और यूरोप के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है। बाब-अल-मंदेब दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया का 12% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
बाब-अल-मंदेब पर कब्जे के लिए जंग क्यों? पिछले महीने हूतियों ने यमन के तटीय इलाकों में आगे बढ़ते हुए इस रास्ते के आसपास अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने सऊदी समर्थित यमन के सरकारी बलों और UAE समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज को पीछे धकेला। बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। इसके रास्ते जहाज एशिया से लाल सागर और स्वेज नहर होते हुए यूरोप तक पहुंचते हैं। इस वजह से यह वैश्विक व्यापार और तेल की सप्लाई के लिए अहम है। सऊदी अरब को आशंका है कि हूतियों का नियंत्रण बना रहा तो इस रास्ते से होने वाले व्यापार और तेल की ढुलाई पर खतरा बढ़ सकता है। हूतियों के खिलाफ दो तरह के सैन्य ऑपरेशन पर विचार रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं। पहले विकल्प में बाब-अल-मंदेब के आसपास सीमित हमला करके समुद्री रास्ते को सुरक्षित करने की कोशिश की जाएगी। दूसरे विकल्प में यमन के कई इलाकों में एक साथ ऑपरेशन चलाया जा सकता है। इसमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ जैसे इलाके शामिल हो सकते हैं। इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। ऑपरेशन के दायरे के हिसाब से 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिक जुटाए जा सकते हैं। हालांकि, सैन्य कार्रवाई की समयसीमा को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने को तैयार नहीं रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी, लक्ष्य तय करने में मदद और सैन्य सलाह दे रहा है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी नेतृत्व की सीधे सैन्य मदद और हवाई हमले करने की मांग पर सहमति नहीं दी है। फिलहाल अमेरिका के सीधे युद्ध में शामिल होने की उम्मीद नहीं है। सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये से भी सैन्य मदद मिली है। पाकिस्तान ने पिछले महीने अदन में एयर डिफेंस सिस्टम, हल्की तोपें, ड्रोन और ड्रोन रोधी उपकरण भेजे थे। पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान ने यमन में लड़ाई के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला नहीं किया है। तुर्किये के ड्रोन भी यमन में तैनात किए गए हैं। वहीं, फ्रांस ने यानबू में रक्षात्मक प्रणालियां और सैनिक भेजने की घोषणा की है। सऊदी अरब के सामने क्या चुनौती है? यमन में हूतियों के विरोधी गुटों के बीच एकता की कमी सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है। इन गुटों के हित और राजनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं। ऐसे में केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाने से ऑपरेशन की सफलता तय नहीं होगी। सऊदी अरब की चिंता अपने तेल ठिकानों की सुरक्षा को लेकर भी है। हूती पहले भी ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी अरब को निशाना बना चुके हैं। अगर यमन में लड़ाई तेज होती है, तो सऊदी तेल ठिकानों और समुद्री व्यापार पर हमलों का खतरा भी बढ़ सकता है। ———————— ये खबर भी पढ़ें…. नेतन्याहू बोले- हमलावर को किसने भेजा, जांच कर रहे:उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी; रिपोर्ट- चुनाव में हार रहे थे नेतन्याहू, हादसे का फायदा मिला इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि फ्लाईदुबई की फ्लाइट में कैप्टन पर हमले के आरोपी ओमानी पायलट को किसने भेजा था, इसकी जांच की जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस घटना के पीछे कोई व्यक्ति या संगठन मिला, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यमन के बाजार पर हवाई हमले में 7 की मौत:40 घायल; पिछले 2 महीने में यमन में 700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके

यमन में रविवार को एक हवाई हमले में 7 लोगों की मौत हो गई है। हूती स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इनमें बच्चे भी शामिल हैं। साथ ही, 40 लोग घायल हुए हैं। हमले में ताइज प्रांत के एक बाजार की दुकानों को निशाना बनाया गया। रॉयटर्स के मुताबिक यमन की सरकार ने कहा कि उसकी सेना ने हूती सैन्य कैंप और वाहनों को निशाना बनाते हुए यह हमले किए। रॉयटर्स ने यमनी सरकार के सूत्रों के हवाले से बताया कि हूती विद्रोहियों ने हाल ही में बाजार के पास एक सैन्य कैंप बनाया था। UN के मुताबिक, पिछले 2 महीने में फिर तेज हुए यमन संघर्ष में नागरिकों समेत 700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। साथ ही सितंबर की शुरुआत से अब तक यमन में 82 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। घटना से जुड़ी तस्वीरें… 2014 से चल रही है यमन में जंग यमन में 2014 से गृहयुद्ध चल रहा है। एक तरफ हूती लड़ाके हैं और दूसरी तरफ यमन की सरकार के समर्थन में लड़ने वाली सेनाएं हैं। सऊदी अरब भी यमन की सरकार का समर्थन करता है। 2022 में UN की कोशिश से दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। लेकिन पिछले कुछ महीनों में यह सीजफायर टूट गया। इसके बाद फिर मिसाइल, ड्रोन और हवाई हमले होने लगे। यमन के पास बाब अल-मंदेब स्ट्रेट है। यहां से लाल सागर के रास्ते कई जहाज गुजरते हैं। इसलिए यहां लड़ाई बढ़ने का असर दूसरे देशों के कारोबार और जहाजों की आवाजाही पर भी पड़ सकता है। यमन की सेना का दावा- हूतियों ने सऊदी पर दो ड्रोन दागे यमन सरकार की सेना ने शनिवार को कहा कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी की राजधानी रियाद पर दो ड्रोन दागे थे। लेकिन उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने दोनों ड्रोन्स को रोक दिया। सेना के मुताबिक, इसके अलावा हूतियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी सीमा क्षेत्र खमिस मुशैत को निशाना बनाकर एक बैलिस्टिक मिसाइल भी दागी थी। सऊदी अरब के नागरिक सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि रात में अबहा और जिजान में भी संभावित खतरे की चेतावनी जारी की गई थी। सऊदी पर हूतियों के हमले क्यों बढ़े? यमन की लड़ाई में सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूती विद्रोही उसके खिलाफ लड़ रहे हैं। इसी वजह से हूतियों ने सऊदी अरब को भी निशाना बनाना शुरू किया है। जुलाई से हूतियों ने रियाद समेत अबहा, जिजान, नजरान, ताइफ, जेद्दा और यानबू जैसे शहरों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। उन्होंने एयरपोर्ट, सैन्य ठिकानों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया है। लाल सागर में सऊदी जहाजों पर भी हमले हुए हैं। इसके जवाब में सऊदी अरब यमन में हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले कर रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच टकराव और बढ़ गया है। हूतियों ने तेजी से अहम द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूतियों ने इस महीने लाल सागर के तट की ओर तेजी से बढ़ते हुए बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास के इलाकों पर कब्जा किया है। यह स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसलिए इस इलाके में लड़ाई का असर समुद्री रास्तों पर भी पड़ सकता है। इसके साथ ही, हुती विद्रोहियों ने सऊदी के जहाज या सऊदी से सामान ले जा रहे सभी जहाजों को निशाना बनाने की बात कही है। ———————- यह खबर भी पढ़ें… दावा- सऊदी अरब ने यमन में मिसाइल अटैक किया यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हूतियों ने दावा किया है कि सऊदी अरब ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास एक गांव के लोकल मार्केट पर मिसाइल अटैक किया। पूरी खबर पढ़ें…

रिपोर्ट- सऊदी ने परमाणु बम बनाने का विकल्प खुला रखा:अमेरिका परमाणु बिजली बनाने की तकनीक दे रहा, इजराइल कर चुका विरोध

सऊदी अरब ने परमाणु बम बनाने की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। अमेरिकी अखबार द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट अमेरिकी संसद को दी गई है। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने साफ किया है कि सऊदी ने अभी परमाणु बम बनाने का फैसला नहीं किया है। यह रिपोर्ट अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु समझौते के बाद सामने आई है। जुलाई में हुए इस समझौते के तहत सऊदी अरब में परमाणु बिजली का ढांचा तैयार किया जाएगा। इजराइल इस समझौते का विरोध कर चुका है। परमाणु बिजली बनाने वाली तकनीक से हथियार का रास्ता खुल सकता है दरअसल परमाणु तकनीक से बिजली बनाने के लिए यूरेनियम को एक खास प्रक्रिया से तैयार किया जाता है। इसे यूरेनियम एनरिचमेंट कहते हैं। समझौते के तहत सऊदी अरब यूरेनियम को करीब 20% तक एनरिच कर सकेगा। यह परमाणु बम के लिए जरूरी स्तर से काफी कम है। समस्या यह है कि एक बार किसी देश के पास यूरेनियम को 20% तक एनरिच करने की क्षमता आ जाए, तो उसे हथियार बनाने लायक स्तर तक जाने में कम समय लग सकता है। इसी वजह से अमेरिकी सांसदों को डर है कि सऊदी अरब भविष्य में परमाणु हथियार बना सकता है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान कर चुके हैं हथियार बनाने की बात सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बनाता है, तो सऊदी अरब भी परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करेगा। अमेरिकी अधिकारी भी लंबे समय से मानते रहे हैं कि सऊदी परमाणु हथियार बनाने में दिलचस्पी रखता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी ने बम बनाने का फैसला कर लिया है। सांसदों का सवाल- सऊदी को अपने देश में एनरिचमेंट फैसेलिटि क्यों चाहिए? अमेरिकी सीनेटर एड मार्की और जेफ मर्कली समेत छह डेमोक्रेट सांसदों ने इस समझौते का विरोध किया है। उनका सवाल है कि अगर सऊदी अरब का मकसद सिर्फ परमाणु बिजली बनाना है, तो वह अपने देश में यूरेनियम एनरिच करने की सुविधा क्यों चाहता है। अमेरिका बोला- समझौता परमाणु हथियार बनाने के लिए नहीं अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि समझौते का मकसद सऊदी अरब में शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा विकसित करना है। अमेरिका के मुताबिक, इससे क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत होगी और परमाणु हथियारों को फैलने से रोकने के नियमों का पालन होगा। इस समझौते की शुरुआत जो बाइडेन के राष्ट्रपति रहते हुई थी। तब अमेरिका चाहता था कि परमाणु समझौते के बदले सऊदी अरब, इजराइल को औपचारिक मान्यता दे। इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका, सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी, आधुनिक हथियार और असैन्य परमाणु कार्यक्रम में सहयोग देने को तैयार था। बदले में सऊदी अरब से उम्मीद थी कि वह इजराइल के साथ दूतावास खोलेगा, राजदूत नियुक्त करेगा और आधिकारिक संबंध शुरू करेगा। हालांकि, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध की वजह से यह प्लान फेल हो गया। बाद में ट्रम्प ने रणनीति बदली और इजराइल के साथ रिश्तों को इस समझौते से अलग कर दिया। अमेरिकी संसद के पास समझौते की समीक्षा के लिए 90 दिन हैं अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुआ यह समझौता 30 साल का है। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में परमाणु बिजली से जुड़ा ढांचा तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाएंगी। अमेरिकी संसद इस समझौते की समीक्षा कर रही है। इसके लिए संसद के पास 90 दिन का समय है। अगर इस दौरान संसद समझौते को रोकने के लिए प्रस्ताव पास नहीं करती, तो यह अपने आप लागू हो सकता है। सऊदी अरब NPT का सदस्य है सऊदी अरब न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NPT) का सदस्य है। इस संधि के तहत सदस्य देश परमाणु हथियार नहीं बनाने और अपने परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में रखने पर सहमत होते हैं। अगर सऊदी अरब खुलकर परमाणु हथियार बनाने की दिशा में बढ़ता है, तो उसे अमेरिका और यूरोपीय देशों समेत कई देशों के दबाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जिससे निवेश, व्यापार और रक्षा सहयोग प्रभावित हो सकता है। ———————- ये खबर भी पढ़ें… दावा- सऊदी अरब ने यमन में मिसाइल अटैक किया: बाब अल-मंदेब के पास लोकल मार्केट पर हमला यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हूतियों ने दावा किया है कि सऊदी अरब ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास एक गांव के लोकल मार्केट पर मिसाइल अटैक किया। पूरी खबर पढ़ें…

अमेरिका के दुश्मनों को न्यूयॉर्क आकर बोलने की छूट क्यों:आज ईरानी राष्ट्रपति पजशकियान जाएंगे; पहले कब-कब ऐसा हुआ, 5 किस्से

अमेरिका ने ईरान के साथ जंग छेड़ने के पहले ही दिन ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के घर पर हमला किया। इसमें खामेनेई और उनके 4 करीबी परिवारवालों की मौत हो गई। अब तक इस जंग में आधे से ज्यादा ईरानी लीडरशिप और 8 हजार से ज्यादा ईरानी मारे जा चुके हैं। अमेरिका के डर से ही नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई अब तक सामने नहीं आए हैं। लेकिन 7 महीने बाद अब ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान न्यूयॉर्क पहुंचने वाले हैं। वे हर साल होने वाले यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली (UNGA) में आज भाषण देंगे। उनके साथ विदेश मंत्री अब्बास अरागची भी होंगे। इन नेताओं को अपना दुश्मन मानने वाले अमेरिका ने ही इन्हें वीजा दिया है। ऐसा पहली बार नहीं है कि अमेरिका ने अपने विरोधी नेताओं को UNGA में शामिल होने के लिए वीजा दिया हो और उन नेताओं ने न्यूयॉर्क आकर अमेरिका को कोसा हो। भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे, ऐसे ही 5 चर्चित किस्से… क्यूबा क्रांति के बाद जनवरी 1959 में फिदेल कास्त्रो ने सत्ता संभाली। अमेरिका इससे नाराज था। इतना कि मार्च 1960 में अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने अपनी खुफिया एजेंसी CIA से कास्त्रो सरकार को उखाड़ फेंकने को कहा। हालांकि, सितंबर 1960 में हो रही UNGA के लिए फिदेल कास्त्रो और उनके डेलिगेशन को वीजा देना पड़ा। 19 सितंबर को कास्त्रो न्यूयॉर्क पहुंचे। मैनहटन के शेल्बर्न होटल में उन्होंने बुकिंग कराई थी, लेकिन होटल ने उन्हें ठहराने से मना कर दिया। वे हार्लम के थेरेसा होटल में शिफ्ट हो गए। थेरेसा होटल में कास्त्रो की मुलाकात सोवियत लीडर निकिता ख्रुश्चेव, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासिर और भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से हुई। सिविल राइट्स एक्टिविस्ट मैल्कम एक्स और कई अफ्रीकी-अमेरिकी नेता भी उनसे मिलने पहुंचे। 26 सितंबर 1960 को कास्त्रो ने UNGA में भाषण शुरू करते हुए कहा, ‘कहा जाता है कि मैं लंबे भाषण देता हूं, लेकिन आपको चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं छोटा भाषण ही दूंगा।’ हालांकि कास्त्रो ने इसके उलट किया और UNGA के इतिहास का सबसे लंबा भाषण दे डाला। 269 मिनट यानी 4 घंटे 29 मिनट तक वो बोलते रहे। कास्त्रो ने अमेरिका पर लैटिन अमेरिका में दखल देने और तानाशाही को शह देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि क्यूबा क्रांति केवल एक तानाशाह (बतिस्ता) के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ थी, जिसने क्यूबा को अमेरिका का गुलाम बना रखा था। कास्त्रो ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जॉन एफ. कैनेडी और रिचर्ड निक्सन पर जमकर निशाना साधा। कैनेडी को ‘अनपढ़ और अज्ञानी करोड़पति’ तक कह डाला, जबकि निक्सन को राजनीतिक बुद्धि से कमजोर बताया। 1974 में फिलिस्तीन देश की मांग के लिए बने फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन (PLO) को अमेरिका और इजराइल आतंकी संगठन मानते थे। लेकिन 14 अक्टूबर 1974 को UNGA ने PLO को फिलिस्तीनी जनता का आधिकारिक प्रतिनिधि मान लिया और उन्हें भाषण देने के लिए बुलाया। इजराइल और अमेरिका ने इसका विरोध किया, लेकिन अमेरिका को वीजा देना पड़ा। महीने भर बाद 13 नवंबर 1974 को PLO के मुखिया यासिर अराफात UNGA पहुंचे। ऐसा पहली बार हुआ कि UN के किसी गैर-सदस्य संगठन के नुमाइंदे को UNGA में भाषण देने मिला। 80 मिनट के भाषण में उन्होंने फिलिस्तीनियों के लिए आजाद देश की मांग की। अराफात ने कहा, ‘मैं एक विद्रोही हूं और आजादी ही मेरा मकसद है। क्रांतिकारी और आतंकवादी में फर्क सिर्फ इतना है कि कौन किस वजह से लड़ रहा है? जो कब्जा और शोषण करने वाले हैं वही असली आतंकी हैं, न कि वे जो आजादी के लिए लड़ते हैं।’ आखिर में उन्होंने कहा, ‘आज मैं एक हाथ में जैतून की डाली और दूसरे हाथ में एक स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक लेकर आया हूं। जैतून की डाली को मेरे हाथ से गिरने मत दीजिए।’ अराफात की ये लाइनें आज भी मशहूर हैं। उनकी एक तस्वीर भी काफी चर्चित है, जिसमें उनकी जैकेट से एक होल्स्टर झांकता दिखता है। यह विवाद भी रहा कि मंच पर जाने से पहले उन्होंने पिस्तौल उतारी थी या नहीं। अराफात के भाषण के 9 दिन बाद 22 नवंबर 1974 को UNGA ने PLO को ऑब्जर्वर का दर्जा दे दिया। इसे फिलिस्तीनी मुद्दे को पहली बार दुनिया में मान्यता मिलने की शुरुआत माना जाता है। 19 सितंबर 2006 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने UNGA में भाषण दिया। उन्होंने इराक और अफगानिस्तान में जारी अमेरिकी जंगों को ‘आजादी और लोकतंत्र’ की लड़ाई बताया, जबकि दोनों देश अमेरिकी सेना के कब्जे में थे। अगले ही दिन 20 सितंबर को वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज उसी पोडियम पर पहुंचे। भाषण की शुरुआत में उन्होंने कैथोलिक क्रॉस बनाते हुए कहा, ‘कल यहां शैतान आया था। ठीक यहीं। आज भी यहां गंधक की बदबू आ रही है। कल अमेरिका के राष्ट्रपति, जिन्हें मैं शैतान कहता हूं, यहां आकर ऐसे बोले जैसे पूरी दुनिया के मालिक हों।’ शावेज ने बुश की पॉलिसी को ‘बमों और गोलियों से थोपा गया लोकतंत्र’ बताया। उन्होंने UN सिक्योरिटी काउंसिल में सुधार और वीटो पावर खत्म करने की मांग रखी। दिलचस्प बात है कि उस दिन UNGA में कोई सीनियर अमेरिकी एम्बेस्डर नहीं था, सिर्फ एक जूनियर नोट-टेकर मौजूद था। बाद में अमेरिका के तत्कालीन UN एम्बेस्डर जॉन बोल्टन ने शावेज के भाषण को अपमानजनक और अंतरराष्ट्रीय मामलों को देखने का ‘कॉमिक-स्ट्रिप’ नजरिया करार दिया, यानी बचकाना और कार्टूनिश बताया। सितंबर 1969 में लीबियाई सेना के कैप्टन मुअम्मर गद्दाफी ने राजा इदरीस प्रथम का तख्तापलट कर दिया। गद्दाफी ने अमेरिका विरोधी नीतियां अपनाईं और परमाणु प्रोग्राम शुरू किया। इससे नाराज अमेरिका ने लीबिया को ‘आतंकवाद प्रायोजक देश’ घोषित कर दिया। सत्ता संभालने के 40 साल बाद पहली बार गद्दाफी अमेरिका पहुंचे और 23 सितंबर 2009 को उन्होंने UNGA में पहला भाषण दिया। भूरे बेडुइन चोगे, काली टोपी, काला चश्मा, सीने पर अफ्रीका महाद्वीप जैसा ब्रोच पहने और लाल रूमाल लिए गद्दाफी ने खुद को ‘अफ्रीकी राजाओं का राजा’ बताया। गद्दाफी ने आरोप लगाया कि UN अपनी स्थापना के बाद से दुनिया में हुई 65 जंगें रोकने में नाकाम रहा। इसे सुरक्षा परिषद नहीं, बल्कि आतंक परिषद कहा जाना चाहिए। गद्दाफी को बोलने के लिए 15 मिनट मिले थे, लेकिन वे नोटबुक से फाड़े गए पीले-बिखरे पन्नों से 96 मिनट तक भाषण देते रहे। लंबे भाषण की वजह से साभागार आधा खाली हो गया। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन और UN में अमेरिकी एम्बेस्डर सुजैन राइस तक बाहर चली गईं। पीछे सिर्फ जूनियर नोट-टेकर बैठे रहें। गद्दाफी का खुद का ट्रांसलेटर भी थक गया और उसने बीच में भाषण छोड़ दिया। UN स्टाफ को उसकी जगह लेनी पड़ी। भाषण के आखिर-आखिर में गद्दाफी ने UN चार्टर की एक कॉपी हाथ में उठाई, उसके कुछ हिस्से जोर से पढ़े और उसे हल्का-सा फाड़कर पीछे उछाल दिया। कहा कि सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों को मिला वीटो चार्टर की भावना के खिलाफ है। इसे खत्म होना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को ‘हमारा बेटा’ कहकर सराहा- ‘हम अफ्रीकी खुश और गर्वित हैं कि अफ्रीका का एक बेटा अमेरिका पर राज कर रहा है।’ उसी दिन बाद में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने UNGA में जवाब दिया कि वे UN चार्टर को दोबारा स्वीकार करने आए हैं, उसे फाड़ने नहीं। UN की प्रवक्ता मिशेल मोंटास ने चार्टर के अपमान को अस्वीकार्य बताया। 23 सितंबर 2010 की सुबह ओबामा ने UNGA में ईरान से बातचीत की पेशकश करते हुए नरम लहजे में भाषण दिया। हालांकि कुछ ही घंटों बाद ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद मंच पर पहुंचे, तो माहौल पलट गया। अहमदीनेजाद ने 9/11 हमलों को लेकर 3 थ्योरी गिनाईं। पहली- एक ताकतवर आतंकी गुट ने अमेरिकी खुफिया तंत्र को चकमा देकर इसे अंजाम दिया; दूसरी- खुद अमेरिकी सरकार के कुछ लोगों ने डूबती अर्थव्यवस्था को संभालने, मिडिल-ईस्ट में पकड़ मजबूत करने और जायोनी शासन (इजराइल) को बचाने के लिए यह हमला रचा और तीसरी- यह किसी आतंकी गुट का काम था, जिसका अमेरिकी सरकार ने फायदा उठाया। अहमदीनेजाद ने 9/11 के लिए अमेरिकी सरकार को ही घेरते हुए दावा किया कि बहुसंख्यक अमेरिकी, दुनिया के ज्यादातर देश और नेता इससे (दूसरी थ्योरी) से सहमत हैं। उन्होंने इसकी जांच के लिए एक अंतरराष्ट्रीय फैक्ट-फाइंडिंग टीम बनाने की मांग भी रखी। दूसरी थ्योरी सुनते ही अमेरिका समेत 33 डेलिगेशन सागाभाग से बाहर निकल गए। इनमें कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कोस्टा रिका और यूरोपीय संघ के सभी 27 देश शामिल थे। अमेरिकी मिशन के प्रवक्ता मार्क कॉर्नब्लाऊ ने कहा कि अहमदीनेजाद ‘घटिया साजिश का दावा और यहूदी-विरोधी बकवास’ कर रहे हैं। वाइट हाउस ने भी बयान जारी किया कि राष्ट्रपति ओबामा को यह टिप्पणियां ‘बेहद आक्रामक और आपत्तिजनक’ लगीं, खासकर इसलिए क्योंकि यह उसी न्यूयॉर्क शहर में की गईं, जहां वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की इमारतें गिरी थीं। आखिर अमेरिका अपने सबसे बड़े दुश्मन को अपनी ही जमीन पर क्यों आने देता है? इसका जवाब 79 साल पुराने एक समझौते में है… यही वजह है कि जंग के बीच अमेरिका कानूनी तौर पर ईरानी डेलिगेशन को रोक नहीं सकता। हालांकि अमेरिका डेलिगेशन की आवाजाही सीमित कर सकता है। ऐसा हो भी रहा है। इस बार के UNGA के लिए पहुंचने वाला ईरानी डेलिगेशन सिर्फ UN मुख्यालय, ईरान के स्थायी UN मिशन, ईरानी राजदूत के आवास और जॉन एफ. कैनेडी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के बीच आ-जा सकेंगे। कहीं और जाने के लिए उन्हें अमेरिकी सरकार से इजाजत लेनी होगी। अमेरिका ने ईरान से अपना डेलिगेशन छोटा रखने को कहा है। साथ ही उनके क्लब और बाजार जाने पर रोक लगा दी। लग्जरी शॉपिंग भी बैन कर दी। तो क्या अमेरिका विरोधी नेता को UNGA के लिए न्यूयॉर्क आने से रोक ही नहीं सकता? ‘हेडक्वार्टर एग्रीमेंट’ में अमेरिकी सरकार को एक अधिकार मिला है कि जिस व्यक्ति से ‘अमेरिका की सुरक्षा को खतरा’ हो, वे उसे रोक सकते हैं। इसी को आधार बनाकर अमेरिका ने 1988 में यासिर अराफात को वीजा नहीं दिया था। अमेरिकी विदेश विभाग ने तब कहा था कि PLO के आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के पुख्ता सबूत हैं। नतीजतन UNGA को उस साल अपना पूरा सत्र जिनेवा शिफ्ट करना पड़ा और अमेरिका को इसके लिए भारी आलोचना झेलनी पड़ी। अमेरिका ने 2025 और 2026 में भी फिलिस्तीनी अथॉरिटी के अध्यक्ष महमूद अब्बास को वीजा नहीं दिया। अमेरिका का कहना है कि PLO और फिलिस्तीनी अथॉरिटी अपने वादों पर खरे नहीं उतरे। वे इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस के जरिए इजराइल-फिलिस्तीन विवाद को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पिछली बार अब्बास ने UNGA में वर्चुअली भाषण दिया था। ऐसा इस बार भी होगा। हालांकि, अमेरिका को मिली इस छूट में बारीक फर्क है। दरअसल, अब्बास और PLO के अधिकारी UN के किसी पूर्ण सदस्य देश के प्रमुख नहीं, बल्कि एक गैर-सदस्य इकाई के नुमाइंदे हैं। इसलिए उन पर पाबंदी लगाना अमेरिका के लिए राजनीतिक और कानूनी तौर पर थोड़ा आसान है। ईरान जैसे किसी पूर्ण सदस्य देश के चुने हुए राष्ट्रपति को रोकना कहीं ज्यादा बड़ा कूटनीतिक कदम होगा और इससे अमेरिका पर ‘हेडक्वार्टर एग्रीमेंट’ तोड़ने का आरोप लगेगा। ————– ये खबर भी पढ़िए… चप्पल-लुंगी वाले हूती लड़ाके कौन, जिन्होंने सऊदी का F-15 जेट गिरा दिया; पाक-अमेरिका तक इनसे दूर क्यों भाग रहे पैरों में हवाई चप्पल, कमर में लुंगी, मुंह में कात दबाए हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब का F-15 फाइटर जेट गिरा दिया है। वो भी अपनी देसी बैलिस्टिक मिसाइल से। यमन की सऊदी समर्थित सेना की बख्तरबंद गाड़ियां छीन लीं और निशाना चूकी DF-15 मिसाइल भी उठा ले गए। हूतियों के हमले से इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का तक हाई अलर्ट पर है। पूरी खबर पढ़िए…