सऊदी ने मक्का के पास हूती ड्रोन मार गिराया:यह इस्लाम का सबसे पवित्र शहर; हूती बोले- मक्का को कोई खतरा नहीं

सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम ने मंगलवार को मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने बुधवार को बताया कि ड्रोन को मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही मार गिराया गया। सैन्य गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल-मलिकी ने कहा कि इस्लाम के पवित्र स्थलों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सऊदी अरब के लिए रेड लाइन है। उन्होंने कहा कि गठबंधन हूतियों के खिलाफ जरूरी कदम उठाएगा। वहीं हूति विद्रोहियों ने मक्का या दूसरे पवित्र स्थलों को निशाना बनाने की बात से इनकार किया है। हूतियों की समाचार एजेंसी SABA के मुताबिक, संगठन से मक्का या अन्य पवित्र स्थलों को कोई खतरा नहीं है। मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर है। यहां मुस्लिमों के प्रमुख पवित्र स्थल हैं और हर साल दुनिया भर से लाखों लोग हज के लिए पहुंचते हैं। अल-मलिकी ने इस घटना को मक्का को निशाना बनाने की हूतियों की दूसरी कोशिश बताया। इससे पहले जुलाई 2017 में गठबंधन ने हूतियों पर मक्का की ओर बैलिस्टिक मिसाइल दागने का आरोप लगाया था। इस्लामिक देशों के संगठन ने हूती हमलों को आतंकवाद बताया इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने मक्का और मदीना क्षेत्र में हूती हमलों की निंदा की है। संगठन ने कहा कि पवित्र जगहों, मस्जिदों और आम लोगों के ठिकानों पर हमला करना आतंकवाद है। ऐसी कार्रवाई इस्लाम की सीख और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। यमन में तनाव के बाद सऊदी में हमले ईरान से जुड़े हूतियों का आरोप है कि सऊदी अरब यमन में हवाई हमले कर रहा है और क्रूज मिसाइलें दाग रहा है। यमन के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में हूती लड़ाकों और सऊदी समर्थित सरकारी बलों के बीच भारी लड़ाई चल रही है। इसी बीच हूतियों ने यमन के पश्चिमी लाल सागर तट पर तेजी से अपना कब्जा बढ़ाया है। उन्होंने सोमवार को इस इलाके में दो और द्वीप ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश पर भी कब्जा कर लिया। ये दोनों द्वीप बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में स्थित हैं। हूतियों ने पिछले हफ्ते सऊदी एयरबेस पर हमले का दावा किया हूतियों ने पिछले एक हफ्ते सऊदी अरब के खिलाफ कई हमलों का दावा किया है। सोमवार को संगठन ने एक एयरबेस को निशाना बनाने की बात कही थी। हूतियों के मुताबिक, यह कार्रवाई यमन पर हुए हवाई हमलों के जवाब में की गई। ————— ये खबर भी पढ़ें… मक्का में पहली बार मिसाइल अटैक का इमरजेंसी अलर्ट:हूती विद्रोहियों ने सऊदी पर हमला किया; 2017 में भी मक्का की ओर आई थी मिसाइल यमन के हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इसके बाद सऊदी अरब ने मक्का में पहली बार इमरजेंसी अलर्ट जारी किया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

मक्का में पहली बार मिसाइल अटैक का इमरजेंसी अलर्ट:हूती विद्रोहियों के हमले के बाद ऊंची इमारतों से दूर रहने की अपील

यमन के हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इसके बाद सऊदी अरब ने मक्का में पहली बार इमरजेंसी अलर्ट जारी किया। सऊदी सिविल डिफेंस के मुताबिक, नेशनल अर्ली वार्निंग प्लेटफॉर्म ने यह अलर्ट जारी किया था। लोगों से ऊंची इमारतों से दूर रहने की अपील की गई। लोगों से कहा गया कि वे भीड़ और खुले इलाकों में जाने से बचें और तुरंत किसी सुरक्षित जगह चले जाएं। कुछ देर बाद सिविल डिफेंस ने बताया कि खतरा टल गया है। हालांकि, लोगों से भीड़ से दूर रहने और किसी घटना की वीडियो या फोटो नहीं बनाने की अपील की गई। मंगलवार सुबह जेद्दा और ताइफ में भी ऐसे ही इमरजेंसी अलर्ट जारी किए गए थे। इन्हें भी कुछ देर बाद हटा लिया गया। हूती हमलों में 13 लोग घायल हुए थे ये इमरजेंसी अलर्ट सऊदी अरब पर हूतियों के लगातार हमलों के बीच जारी किए गए हैं। सोमवार को हूतियों ने सऊदी शहरों खमिस मुशैत, अबहा और ताइफ की ओर कई मिसाइल और ड्रोन दागे थे। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के प्रवक्ता कर्नल तुर्की अल-मलिकी के मुताबिक, इन हमलों में कम से कम 13 नागरिक घायल हुए थे। मंगलवार को जारी बयान में अल-मलिकी ने सऊदी नागरिकों को निशाना बनाने वाले हूतियों के हमलों को जानबूझकर किया गया हमला बताया। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब की संप्रभुता की रक्षा के लिए सेना इन हमलों का मजबूती से जवाब देगा। हूतियों की बढ़ती गतिविधियों को रोकने के लिए सभी जरूरी सैन्य कदम उठाए जाएंगे। पिछले हफ्ते 73 लोग घायल हुए थे पिछले हफ्ते भी हूतियों ने सऊदी अरब पर मिसाइलों और ड्रोन की बड़ी संख्या में हमले किए थे। इनमें अबहा, खमिस मुशैत, जाजान और नजरान शहरों को निशाना बनाया गया था। इन हमलों में कम से कम 73 लोग घायल हुए थे। हमलों के बाद सऊदी अरब की कुछ ऊर्जा सुविधाओं का काम भी कुछ समय के लिए रोकना पड़ा था। खबर लगातार अपडेट हो रही है…

रिपोर्ट- पाकिस्तान ने सऊदी की मदद करने से इनकार किया:हूती विद्रोहियों के हमले के बाद सऊदी ने इजराइल से मदद मांगी

यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के बड़े इलाके पर हूती विद्रोहियों के कब्जे के बाद सऊदी अरब बड़े संकट में है। यरुशलम पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के मक्का रक्षा गठबंधन के साथी पाकिस्तान ने यमन में लड़ने के लिए अपनी सेना या सैन्य संसाधन भेजने से इनकार कर दिया है। पाकिस्तान ने कहा है कि उसकी सेना सऊदी अरब की जमीन की रक्षा के लिए तैनात की जा सकती है, लेकिन वह किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। इसके बाद सऊदी अरब ने हूती सैन्य कार्रवाई से निपटने के लिए अब इजराइल से खुफिया मदद मांगी है। यह बातचीत अमेरिका की मध्यस्थता में हुई। खास बात यह है कि सऊदी अरब इजराइल को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता। उसके इजराइल के साथ राजनयिक संबंध भी नहीं हैं। इसके बावजूद रियाद ने इजराइल से मदद मांगी है। पाकिस्तान-सऊदी ने अगस्त में रक्षा समझौता साइन किया था ‘एक पर हमला, मतलब तीनों पर हमला।’ इसी सिद्धांत के साथ पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये ने 7 अगस्त को ‘मक्का जॉइंट डिफेंस पैक्ट’ पर साइन किया था। तीनों देशों के बीच इस समझौते को कई जानकारों ने ‘मुस्लिम नाटो’ की दिशा में एक अहम कदम माना था। इसकी वजह यह थी कि यह समझौता NATO की तरह सदस्य देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की बात करता है। इसके तहत जरूरत पड़ने पर तीनों देश एक-दूसरे की सैन्य मदद करेंगे, आधुनिक हथियारों की संयुक्त खरीद करेंगे, रक्षा तकनीक साझा करेंगे और सुरक्षा से जुड़े मामलों में मिलकर काम करेंगे। इसके अलावा पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच सामूहिक आत्मरक्षा की अलग संधि भी है। इसके बावजूद हूती हमले के बाद पाकिस्तान ने सऊदी को सेना मदद देने से साफ इनकार कर दिया। अमेरिका और ब्रिटेन ने भी नहीं की सऊदी की मदद यमन में हूती विद्रोहियों के हमले और तेजी से बढ़ते कब्जे ने सऊदी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब अब मदद के लिए अपने सहयोगी देशों से संपर्क कर रहा है। पाकिस्तान के अलावा अमेरिका और ब्रिटेन ने भी यमन में हूती संगठन के खिलाफ सीधे हमले करने से इनकार कर दिया है। अमेरिका ने खुफिया मदद देने की पेशकश की है, जबकि ब्रिटेन सैन्य सलाहकार देने की बात कह रहा है। इजराइली अखबार इजराइल हायोम के मुताबिक, सऊदी क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान ने हूतियों के हमलों से निपटने के लिए दूसरे खाड़ी देशों और मिस्र से भी मदद मांगी है। हूती विद्रोहियों ने लाल-सागर में दो और द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। इससे पहले पिछले हफ्ते हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा और बाब-अल मंदेब में मौजूद मायून द्वीप पर भी कब्जा किया था। इन दोनों जगहों पर सऊदी अरब के समर्थन वाली यमनी सरकारी सेना का नियंत्रण था। हूतियों के इन द्वीपों पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। बाब-अल-मंदेब एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए शॉर्टकट रास्ता है। यहां से गुजरने के बाद जहाज स्वेज नहर के रास्ते भूमध्य सागर तक पहुंचते हैं। बाब अल-मंदेब बंद हुआ तो जहाजों को लेना पड़ेगा लंबा रास्ता अगर बाब अल-मंदेब के पास तनाव बढ़ा और जहाजों की आवाजाही बंद हुई, तो एशिया और यूरोप के बीच चलने वाले जहाजों को अफ्रीका के चारों ओर घूमकर जाना पड़ेगा। अभी जहाज लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते जाते हैं। यह रास्ता बंद होने पर उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी छोर से केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना होगा। इससे जहाजों को हजारों किलोमीटर ज्यादा दूरी तय करनी पड़ेगी और सफर में कई दिन ज्यादा लगेंगे। इससे ईंधन और शिपिंग का खर्च बढ़ेगा। लंबे समय तक रास्ता बंद रहा तो सामान पहुंचने में देरी हो सकती है। तेल, पेट्रोल-डीजल और दूसरी आयातित चीजों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर भारत में आयात लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है। 12 साल से चल रही हैं यमन में लड़ाई यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है। 2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है। —————— यह खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी टोयोटा हिलक्स: इस पर मशीनगन-रॉकेट लॉन्चर लगाना आसान, 45 साल से दुनियाभर के आतंकियों की पहचान बनी यमन के लाल सागर तट पर पिछले हफ्ते हूती लड़ाकों का बड़ा काफिला नजर आया। इसमें बड़ी संख्या में टोयोटा हिलक्स पिकअप शामिल थीं। कई गाड़ियों पर मशीनगन और रॉकेट लॉन्चर लगे थे। पूरी खबर पढ़ें…

हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी टोयोटा हिलक्स:इस पर मशीनगन-रॉकेट लॉन्चर लगाना आसान, 45 साल से दुनियाभर के आतंकियों की पहचान बनी

यमन के लाल सागर तट पर पिछले हफ्ते हूती लड़ाकों का बड़ा काफिला नजर आया। इसमें बड़ी संख्या में टोयोटा हिलक्स पिकअप शामिल थीं। कई गाड़ियों पर मशीनगन और रॉकेट लॉन्चर लगे थे। आम तौर पर सामान ढोने और रोजमर्रा के काम में इस्तेमाल होने वाली ये गाड़ियां यहां युद्ध में इस्तेमाल होने वाले वाहनों की तरह नजर आ रही थीं। हिलक्स का युद्ध में इस्तेमाल नया नहीं है। करीब 45 साल से यह गाड़ी दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में विद्रोहियों और आतंकियों के बीच नजर आती रही है। इसकी मजबूत बनावट, खराब रास्तों पर चलने की क्षमता और पीछे के खुले हिस्से में हथियार लगाने की सुविधा इसे ऐसे गुटों के लिए उपयोगी बनाती है। इराक में ISIS से लेकर यमन के हूतियों और अफ्रीका के अलग-अलग सशस्त्र गुटों तक, कई संगठनों ने टोयोटा की पिकअप का इस्तेमाल किया है।
आतंकियों को टोयाटा हिलक्स इतनी पसंद क्यों है? हिलक्स के लड़ाकों और आतंकी संगठनों के बीच इस्तेमाल की एक बड़ी वजह इसकी मजबूती और खराब रास्तों पर आसानी से चलने की क्षमता है। यह गाड़ी ऐसे इलाकों में भी चल सकती है, जहां सामान्य गाड़ियों के लिए पहुंचना मुश्किल होता है। खासकर रेगिस्तान और ऊबड़-खाबड़ रास्तों में यह उपयोगी साबित होती है। बीबीसी के कार्यक्रम ‘टॉप गियर’ में भी हिलक्स की मजबूती को परखने के लिए एक प्रयोग किया गया था। इसमें गाड़ी को पेड़ से टकराया गया, कई घंटे समुद्र के पानी में डुबोया गया, ऊंचाई से गिराया गया और भारी वजन के नीचे दबाया गया। इसके अलावा उसे इमारत से टकराया गया और उसमें आग भी लगाई गई। इन सबके बाद भी उसे दोबारा चलाया जा सका। हिलक्स जैसी गाड़ियों की मरम्मत भी अपेक्षाकृत आसान मानी जाती है। दुनिया भर में आम लोगों के बीच इनकी लोकप्रियता के कारण इनके स्पेयर पार्ट्स भी आसानी से मिल जाते हैं। पिकअप में हथियार लगाकर बना देते हैं ‘टेक्निकल’ टोयोटा हिलक्स जैसी पिकअप के पीछे का हिस्सा खुला होता है। इसमें मशीनगन और दूसरे हथियार लगाए जा सकते हैं। हथियार लगने के बाद ऐसी गाड़ियों को आम तौर पर ‘टेक्निकल’ कहा जाता है। ये गाड़ियां हल्की होती हैं और खराब रास्तों पर भी चल सकती हैं। इसलिए सशस्त्र गुट इन्हें लड़ाई में इस्तेमाल करते रहे हैं। यह किसी एक आतंकी संगठन की बनाई गाड़ी नहीं है। अलग-अलग युद्धों में कई गुटों ने आम पिकअप को हथियारों के साथ इस्तेमाल किया है। ‘टेक्निकल’ नाम सोमालिया से आया हथियारों से लैस पिकअप के लिए ‘टेक्निकल्स’ नाम 1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया में ज्यादा चलन में आया। उस समय सहायता एजेंसियां अपने कर्मचारियों और सामान की सुरक्षा के लिए स्थानीय सशस्त्र गुटों को पैसे देती थीं। इसे ‘टेक्निकल असिस्टेंस’ यानी तकनीकी मदद कहा जाता था। बाद में हथियारों से लैस पिकअप गाड़ियों को ही ‘टेक्निकल्स’ कहा जाने लगा। इसके बाद यह नाम दूसरे युद्धग्रस्त इलाकों में भी इस्तेमाल होने लगा। 1987 के ‘टोयोटा वॉर’ में बदला लड़ाई का तरीका टोयोटा पिकअप के इस्तेमाल का सबसे चर्चित उदाहरण 1987 का चाड-लीबिया युद्ध है। बाद में इसे ‘टोयोटा वॉर’ यानी ‘टोयोटा युद्ध’ कहा गया। उस समय लीबिया के पास टैंक, लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर जैसे भारी हथियार थे। वहीं चाड के पास इतने बड़े सैन्य संसाधन नहीं थे। फ्रांस ने चाड को करीब 400 टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर दी थीं। इनके साथ एंटी-टैंक और एंटी-एयर मिसाइलें भी थीं। इन गाड़ियों की सबसे बड़ी ताकत उनकी रफ्तार और रेगिस्तान में चलने की क्षमता थी। वे भारी टैंकों के मुकाबले तेजी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकती थीं और जल्दी दिशा बदल सकती थीं। चाड के लड़ाकों ने इसी का फायदा उठाया। वे लीबिया के धीमे टैंकों के आसपास तेजी से घूमते, हमला करते और वहां से निकल जाते। फ्रांस की हवाई मदद के साथ चाड ने लीबिया के खिलाफ कई बड़ी जीत हासिल कीं। इस युद्ध ने दिखाया कि तेज और मजबूत पिकअप गाड़ियां भी भारी सैन्य वाहनों के खिलाफ लड़ाई में बड़ा फायदा दे सकती हैं। अफ्रीका से पश्चिम एशिया तक, लड़ाकों की पसंद बनी हिलक्स ‘टोयोटा वॉर’ के बाद दूसरे लड़ाकू समूहों ने भी ऐसी पिकअप गाड़ियों की उपयोगिता को समझा। धीरे-धीरे टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर जैसी गाड़ियां अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई संघर्षग्रस्त इलाकों में दिखाई देने लगीं। इनकी मजबूती, लंबी दूरी तक चलने की क्षमता और खराब रास्तों पर आसानी से चल पाने की वजह से ये गाड़ियां युद्धग्रस्त इलाकों में खास तौर पर उपयोगी साबित हुईं। यही वजह है कि तालिबान, अल-कायदा और बाद में आईएसआईएस जैसे संगठनों की तस्वीरों और वीडियो में भी टोयोटा की पिकअप गाड़ियां अक्सर दिखाई देती रही हैं। इस तरह टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर सिर्फ आम इस्तेमाल की गाड़ियां नहीं रहीं, बल्कि कई युद्धग्रस्त इलाकों में लड़ाकों के बीच भी उनकी अलग पहचान बन गई। बाद में इस संघर्ष को ‘टोयोटा वॉर’ कहा गया। इस युद्ध ने दिखाया कि किसी लड़ाई में सिर्फ भारी हथियार और बड़े टैंक ही निर्णायक नहीं होते। तेज और मजबूत पिकअप गाड़ियां भी मुश्किल इलाकों में बड़ा फायदा दे सकती हैं। अफ्रीका से पश्चिम एशिया तक पहुंची टोयोटा पिकअप ‘टोयोटा वॉर’ के बाद दूसरे लड़ाकू समूहों ने भी ऐसी पिकअप गाड़ियों की उपयोगिता को समझा। धीरे-धीरे टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर जैसी गाड़ियां अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई संघर्षग्रस्त इलाकों में दिखाई देने लगीं। तालिबान, अल-कायदा और बाद में आईएस जैसे संगठनों की तस्वीरों और वीडियो में भी टोयोटा की पिकअप गाड़ियां नजर आती रही हैं। यानी हिलक्स और लैंड क्रूजर सिर्फ आम इस्तेमाल की गाड़ियां नहीं रहीं। कई युद्धग्रस्त इलाकों में ये लड़ाकों और गुरिल्ला गुटों की पहचान का हिस्सा बन गईं। आतंकियों तक इतनी टोयोटा पहुंचती कैसे हैं? सवाल यह है कि जब टोयोटा सीधे आतंकियों या विद्रोहियों को वाहन बेचने से इनकार करती है, तो उनके पास इतनी बड़ी संख्या में हिलक्स और लैंड क्रूजर पहुंचती कैसे हैं? 2015 में आईएस के तेजी से फैलने के दौरान अमेरिकी आतंकवाद रोधी अधिकारियों ने टोयोटा से इसी बारे में जवाब मांगा था। वे जानना चाहते थे कि आतंकी संगठन इतनी बड़ी संख्या में नई हिलक्स और लैंड क्रूजर कैसे हासिल कर रहा है। टोयोटा ने कहा था कि उसकी नीति ऐसे संभावित खरीदारों को वाहन बेचने की अनुमति नहीं देती, जो उनका इस्तेमाल अर्धसैनिक या आतंकी गतिविधियों में कर सकते हैं। लेकिन शोरूम से बिकने के बाद किसी गाड़ी का पूरा सफर ट्रैक करना मुश्किल होता है। पुरानी गाड़ियां चोरी होकर, बिचौलियों के जरिए या अनौपचारिक खरीद-बिक्री के रास्ते कई हाथों से गुजर सकती हैं। इसी वजह से किसी वाहन के निर्माता के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि आखिर उसकी गाड़ी कुछ समय बाद किसके पास पहुंची। इराक में बिक्री बढ़ने पर उठे थे सवाल टोयोटा के आंकड़ों के मुताबिक, इराक में हिलक्स और लैंड क्रूजर की बिक्री 2011 में करीब 6,000 से बढ़कर 2013 में 18,000 हो गई थी। 2014 में यह संख्या करीब 13,000 रही। यह वही दौर था जब आईएस ने सीरिया से इराक में बड़ा हमला शुरू किया था और उसका कब्जा बगदाद के बाहरी इलाकों तक पहुंच गया था। हालांकि, बिक्री बढ़ने से यह साबित नहीं होता कि ये गाड़ियां सीधे आईएस तक पहुंचीं। लेकिन इसने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि संघर्ष से पहले इतनी बड़ी संख्या में गाड़ियां आखिर किन लोगों ने खरीदीं और बाद में वे कहां गईं। ऐसा ही एक मामला अमेरिकी प्लंबर की फोर्ड पिकअप का सामने आया था। उसकी गाड़ी बाद में सीरिया में आईएस लड़ाकों के इस्तेमाल में दिखाई दी। खास बात यह थी कि गाड़ी के दरवाजे पर प्लंबर का नाम और फोन नंबर भी लिखा हुआ था। हूतियों के पास हिलक्स कैसे पहुंची अभी पता नहीं यमन के लाल सागर तट पर हूती लड़ाकों के पास दिखाई दे रही हिलक्स को लेकर भी यही सवाल है। इन गाड़ियों को उन्होंने कैसे हासिल किया, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। यह पता नहीं है कि उन्होंने इन्हें पुरानी गाड़ियों के रूप में खरीदा, बिचौलियों के जरिए हासिल किया, दूसरे देशों से मंगाया या किसी दूसरे रास्ते से अपने कब्जे में लिया।

पाकिस्तान ने आतंकी मसूद-अजहर पर इनाम बढ़ाकर 70 लाख किया:भगोड़ा घोषित किया; अक्टूबर में FATF बैठक होनी है, उससे पहले कार्रवाई की

पाकिस्तान ने जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के प्रमुख मसूद अजहर पर इनाम बढ़ाकर 70 लाख पाकिस्तानी रुपए कर दिया है। पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने आतंकियों की नई रेड बुक में अजहर को भगोड़ा घोषित किया है। यह कार्रवाई अक्टूबर में होने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की बैठक से पहले हुई है। FIA ने अजहर पर पहले घोषित इनाम में 20 लाख पाकिस्तानी रुपए की बढ़ोतरी की है। एजेंसी ने 2021 में उस पर 50 लाख पाकिस्तानी रुपए का इनाम रखा था। FATF की बैठक से पहले क्यों अहम है कार्रवाई? पाकिस्तान पहले FATF की ग्रे लिस्ट में रह चुका है। इस दौरान उस पर आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कार्रवाई करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव था। अक्टूबर 2022 में FATF ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर कर दिया था। अब अक्टूबर में FATF की प्लेनरी बैठक होने वाली है। ऐसे में मसूद अजहर जैसे आतंकी के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा पाकिस्तान के लिए अहम मानी जा रही है। इससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिखाने की कोशिश कर सकता है कि वह आतंकवाद और आतंकी फंडिंग के खिलाफ कदम उठा रहा है। 2021 में पाकिस्तान ने कहा था- अजहर अफगानिस्तान भाग गया पाकिस्तान ने 2021 में दावा किया था कि मसूद अजहर उसके देश में नहीं है और वह अफगानिस्तान भाग गया है। उसी साल FIA ने अपनी रेड बुक में उसे भगोड़ा बताते हुए 50 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था। अब पांच साल बाद पाकिस्तान ने इनाम की रकम बढ़ा दी है। हालांकि, पाकिस्तान ने यह साफ नहीं किया है कि अजहर इस समय कहां है। संसद हमले का मास्टरमाइंड है आतंकी अजहर पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर 2001 में भारत की संसद पर हुए हमले का मास्टरमाइंड है। इसके अलावा भी उसने भारत में कई आतंकी हमलों को अंजाम दिया है। मसूद 2016 में हुए पठानकोट हमले का भी मास्टरमाइंड है। इस मामले में दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक, मसूद ने भारत पर हमलों के लिए जैश-ए-मोहम्मद के कैडर का इस्तेमाल किया था। उसने 2005 में अयोध्या में राम जन्मभूमि और 2019 में पुलवामा में CRPF के जवानों पर भी हमला करवाया था। इसके अलावा मसूद 2016 में उरी हमले और अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ में भारतीय कॉन्सुलेट पर अटैक का भी जिम्मेदार है। 1994 में पहली बार भारत आया था मसूद अजहर मसूद अजहर पहली बार 29 जनवरी, 1994 को बांग्लादेश से विमान में सवार होकर ढाका से दिल्ली पहुंचा था। 1994 में अजहर फर्जी पहचान बनाकर श्रीनगर में दाखिल हुआ था। उसका मकसद हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी और हरकत-उल-मुजाहिदीन गुटों के बीच तनाव कम करना था। इस बीच भारत ने उसे आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए अनंतनाग से गिरफ्तार कर लिया था। तब अजहर ने कहा था- कश्मीर को आजाद कराने के लिए 12 देशों से इस्लाम के सैनिक आए हैं। हम आपकी कार्बाइन का जवाब रॉकेट लॉन्चर से देंगे। इसके 4 साल बाद जुलाई 1995 में जम्मू-कश्मीर में 6 विदेशी टूरिस्ट्स को अगवा कर लिया गया। किडनैपर्स ने टूरिस्ट के बदले समूद अजहर को रिहा करने की मांग की। इस बीच अगस्त में दो टूरिस्ट किडनैपर्स की कैद से भागने में कामयाब हो गए। हालांकि, बाकियों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। 1999 में विमान हाईजैक के बाद भारत सरकार ने अजहर को छोड़ 24 दिसंबर 1999 को काठमांडू से दिल्ली आ रहे एक भारतीय विमान को अजहर के भाई सहित दूसरे आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था। वो इसे अफगानिस्तान के कंधार ले गए, जहां उस वक्त तालिबान का शासन था। विमान में कैद लोगों के बदले मसूद अजहर सहित 3 आतंकियों को छोड़ने की मांग की गई। आतंकियों की मांग पूरी हुई और मसूद आजाद हो गया। इसके बाद वह पाकिस्तान भाग गया। चीनी सरकार UNSC में मसूद को ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित होने से कई बार बचा चुकी है। 2009 में अजहर को वैश्विक आतंकी की लिस्ट में शामिल करने के लिए पहली बार प्रस्ताव आया था। तब लगातार 4 बार चीन ने सबूतों की कमी का हवाला देकर प्रस्ताव पास नहीं होने दिया। ऑपरेशन सिंदूर में मसूद के परिवार के 10 सदस्य मारे गए थे भारत ने 22 अप्रैल को हुए पहलगाम हमले के बाद 7 मई को पाकिस्तान में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। बहावलपुर पर भारतीय हमले में मसूद के परिवार के 10 लोग मारे गए थे। इसके अलावा 4 सहयोगियों की भी मौत हुई थी। मरने वालों में मसूद की बड़ी बहन और उसका पति, मसूद का भतीजा और उसकी पत्नी, मसूद की एक भतीजी और उसके पांच बच्चे शामिल हैं। हमले के वक्त मसूद मौके पर नहीं था, इस वजह से उसकी जान बच गई थी। बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के मुताबिक आतंकी मसूद ने परिवार के लोगों के मरने के बाद एक बयान भी जारी किया था। इसमें उसने कहा था कि मैं भी मर जाता तो खुशनसीब होता। ———————- ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों का लाल-सागर में दो और द्वीपों पर कब्जा यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Houthi attack Saudi: सऊदी अरब के तेल भंडार पर बड़ा संकट! कुछ ही दिनों में खत्म हो सकता है स्टॉक, हूती विद्रोहियों के हमलों से टेंशन में MBS

Houthi attack on Saudi Arabia: सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। ड्रोन हमले में क्षतिग्रस्त हुई एक महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन अगर जल्द दोबारा शुरू नहीं हुई, तो अरब देश के पास निर्यात के लिए मौजूद कच्चे तेल का भंडार महज 5 से 7 दिनों में खत्म हो सकता है। ‘रॉयटर्स’ ने सऊदी तेल शिपमेंट से जुड़े तीन उद्योग सूत्रों के हवाले से यह जानकारी दी है।

इस पाइपलाइन के लंबे समय तक बंद रहने से वैश्विक तेल बाजार पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। सऊदी तेल खरीदारों और कारोबारियों के मुताबिक, इससे दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का करीब 4 फीसदी, यानी लगभग 40 लाख बैरल प्रतिदिन, बाजार से हट सकता है।

ड्रोन हमले के बाद बंद हुई पाइपलाइन

सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को शुक्रवार को ड्रोन हमलों में नुकसान पहुंचने के बाद बंद कर दिया गया। यह पाइपलाइन देश के पूर्वी हिस्से में मौजूद तेल क्षेत्रों से कच्चा तेल लाल सागर के किनारे स्थित यानबू बंदरगाह तक पहुंचाती है। सऊदी सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि पाइपलाइन को कितना नुकसान पहुंचा है। इसकी मरम्मत कब तक पूरी होगी। रॉ

यटर्स से बातचीत में उद्योग से जुड़े सूत्रों ने मरम्मत की अलग-अलग समयसीमा बताई है। एक सूत्र के मुताबिक, इसे ठीक करने में 5 से 6 सप्ताह लग सकते हैं। जबकि दूसरे का कहना है कि पाइपलाइन इससे पहले भी चालू हो सकती है। मरम्मत के दौरान पाइपलाइन से आंशिक रूप से तेल पंपिंग शुरू किए जाने की संभावना भी बताई गई है।

यानबू में सिर्फ कुछ दिनों का तेल भंडार

सूत्रों के मुताबिक, यानबू बंदरगाह पर मौजूद कच्चे तेल का स्टॉक मौजूदा निर्यात को केवल 5 से 7 दिनों तक बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। अगर पाइपलाइन लंबे समय तक बंद रही तो यह भंडार भी खत्म हो सकता है। सऊदी अरब के पास मिस्र के कुछ बंदरगाहों पर भी एक्स्ट्रा तेल स्टॉक मौजूद है। इनमें लाल सागर पर स्थित ऐन सुखना और भूमध्य सागर पर स्थित सिदी केरिर शामिल हैं। एक अन्य उद्योग सूत्र के अनुसार, इन भंडारों से ग्राहकों को कुछ और दिनों तक तेल की आपूर्ति की जा सकती है।

भंडारण क्षमता की बात करें तो:

यानबू: करीब 3.5 करोड़ बैरल

ऐन सुखना: करीब 1.8 करोड़ बैरल

सिदी केरिर: करीब 2 करोड़ बैरल

हालांकि ये सभी भंडारण सुविधाएं पूरी क्षमता तक भरी हुई नहीं हैं। ऐसे में पाइपलाइन दोबारा शुरू नहीं होने पर इन भंडारों के भी धीरे-धीरे खत्म होने का खतरा है।

सऊदी अरब का तेल उत्पादन 30 साल के निचले स्तर पर

पाइपलाइन संकट ऐसे समय आया है जब सऊदी अरब का तेल उत्पादन पहले ही काफी गिर चुका है। सऊदी अरब ने OPEC को बताया कि अगस्त में उसका तेल उत्पादन घटकर 62 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया, जबकि फरवरी में यह करीब 1.09 करोड़ बैरल प्रतिदिन था। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA ने शुक्रवार को कहा कि सऊदी अरब की तेल आपूर्ति तीन दशकों से अधिक समय के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है।

इसके पीछे होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर के रास्ते तेल की आवाजाही में आई बाधा को प्रमुख कारण बताया गया है। IEA का अनुमान है कि इस साल वैश्विक तेल आपूर्ति में करीब 57 लाख बैरल प्रतिदिन की गिरावट आ सकती है, जो दुनिया की कुल सप्लाई का लगभग 6 फीसदी है।

होर्मुज संकट के बीच पाइपलाइन थी सऊदी अरब का अहम रास्ता

पिछले करीब छह महीनों से यह पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई थी। इसकी मदद से सऊदी अरब होर्मुज जलडमरूमध्य को बायपास करते हुए लाल सागर के रास्ते तेल का निर्यात कर पा रहा था। इस पाइपलाइन के जरिए प्रतिदिन करीब 40 लाख बैरल तेल यानबू पहुंचाया जाता था। यह मात्रा दुनिया की कुल तेल आपूर्ति के लगभग 4 फीसदी के बराबर है। अब पाइपलाइन बंद होने से सऊदी अरब के सामने तेल निर्यात के वैकल्पिक रास्तों का संकट बढ़ गया है।

लाल सागर में हूतियों से भी बढ़ा खतरा

सऊदी अरब को लाल सागर क्षेत्र में एक और चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यमन के हूती लड़ाकों ने युद्ध के बीच सऊदी तेल शिपमेंट को निशाना बनाने की धमकी दी है। शुक्रवार को उन्होंने लाल सागर के मुहाने पर स्थित एक द्वीप पर कब्जा करने का भी दावा किया।

ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए इसलिए भी अहम थी क्योंकि यह देश को होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने का रास्ता देती थी। इसके लंबे समय तक बंद रहने से सऊदी अरब को अपने स्टोरेज में मौजूद तेल और दूसरे सीमित निर्यात मार्गों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है।

दुनिया भर में तेल कीमतों पर और बढ़ सकता है दबाव

अगर पाइपलाइन की मरम्मत में कई सप्ताह लगते हैं, तो सऊदी अरब के लिए विदेशी ग्राहकों को नियमित तेल आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। लंबे समय तक बंदी का मतलब वैश्विक बाजार से हर दिन लाखों बैरल सऊदी कच्चे तेल की कमी हो सकता है।

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इससे पहले ही सीमित वैश्विक सप्लाई पर दबाव और बढ़ेगा और कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ने की आशंका है। सऊदी अरब की यह पाइपलाइन सिर्फ एक देश की तेल सप्लाई का मामला नहीं है। इसके लंबे समय तक बंद रहने पर पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लड़ाई तेज:सऊदी पर ड्रोन और मिसाइल से हमला, 82 हजार से ज्यादा लोग बेघर

यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लड़ाई फिर तेज हो गई है। रविवार को यमनी सेना ने लाल सागर के पास हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले किए। इसके जवाब में हूतियों ने सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल से हमले करने का दावा किया। हमले की आशंका के बीच सऊदी अरब के दो शहरों अबहा और खमिस मुशैत में सायरन बजाए गए। लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने को कहा गया। सऊदी में यमन सीमा के पास एक प्रोजेक्टाइल गिरने से दो लोग घायल हुए। एक मस्जिद और कुछ दूसरी इमारतों को भी नुकसान पहुंचा। इस लड़ाई का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से अब तक 82 हजार से ज्यादा लोग अपना घर छोड़ चुके हैं। हूतियों ने मोखा शहर पर कब्जा किया पिछले हफ्ते हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर स्थित मोखा शहर पर कब्जा कर लिया था। यह लाल सागर के किनारे बसा एक अहम बंदरगाह शहर है। हूतियों ने बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट के एक द्वीप पर भी कब्जा किया है। बाब-अल-मंदेब दुनिया के अहम समुद्री रास्तों में से एक है। यहां से हर दिन बड़ी संख्या में मालवाहक जहाज गुजरते हैं। इसलिए यहां लड़ाई बढ़ने से दूसरे देशों के कारोबार और तेल की सप्लाई पर भी असर पड़ सकता है। यमन में 500 से ज्यादा सरकारी लड़ाके मारे गए यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ाई में पिछले चार हफ्तों में सरकार समर्थित 500 से ज्यादा लड़ाके मारे गए हैं। सरकार के समर्थन में लड़ने वाली नेशनल रेजिस्टेंस फोर्स ने यह दावा किया है। संगठन के मुताबिक, इसी दौरान होदेदा और ताइज प्रांतों में 1,000 से ज्यादा हूती लड़ाके भी मारे गए। हालांकि, हूतियों ने इन आंकड़ों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इस बीच यमनी सरकार ने लाल सागर के तट पर और सैनिक भेजने का फैसला किया है। सरकार के एक अधिकारी ने पिछले हफ्ते की हार को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकारी बल फिर से इलाके में लौटेंगे। रविवार को यमनी सेना ने मोखा, धुबाब और ताइज प्रांत के कई इलाकों में हूती ठिकानों पर हवाई हमले किए। वहीं, हूतियों ने ताइज में सरकार और सऊदी समर्थित बलों के हमलों तथा सादा प्रांत में तोपखाने से गोलाबारी की जानकारी दी। यमन में 12 साल से चल रही है लड़ाई यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है। 2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है। घर छोड़ने वालों के पास खाने-पीने का सामान भी नहीं संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी के मुताबिक, लड़ाई के कारण घर छोड़ने वाले लोगों की हालत बेहद खराब है। कई परिवार इतनी जल्दी घर से निकले कि कपड़े, खाने-पीने का सामान और दूसरी जरूरी चीजें भी साथ नहीं ले जा सके। अब वे कैंपों, घरों और यहां तक कि सड़कों पर रहने को मजबूर हैं। अदन के एक राहत कैंप के निदेशक अहमद अल-मसावी ने बताया कि विस्थापित लोग बेहद मुश्किल हालात में रह रहे हैं। होदेदा से भागे हुसैन हैदरा ने कहा कि 2015 में जब उन्हें घर छोड़ना पड़ा था, तब तैयारी का समय मिला था। इस बार अचानक भागना पड़ा, इसलिए वे मुश्किल से बच्चों को साथ ले जा सके और जितना हल्का सामान उठा सकते थे, उतना ही लेकर निकले। यमन में बढ़ती लड़ाई का असर सिर्फ वहां के लोगों पर नहीं पड़ रहा है। सऊदी अरब पर हूतियों के हमलों और लाल सागर में बढ़ते तनाव से तेल की कीमतों और दुनिया के समुद्री कारोबार पर भी असर पड़ सकता है। खबर अपडेट हो रही है….

ड्रोन हमले के बाद सऊदी ने तेल पाइपलाइन बंद की:होर्मुज बंद होने के बाद इसी से रोजाना 50 लाख बैरल तेल भेज रहा था

सऊदी अरब ने ड्रोन हमले के बाद अपनी ईस्ट-वेस्ट तेल पाइपलाइन बंद कर दी है। गुरुवार को हुए ड्रोन हमले में पाइपलाइन से जुड़े पंपिंग स्टेशनों में आग लग गई और कुछ लोग घायल हुए। ईरान जंग के चलते होर्मुज बंद होने के बाद सऊदी इसी पाइपलाइन से रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल भेज रहा था। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि पाइपलाइन पर गुरुवार को कई हमले हुए थे। मंत्रालय की टीमें पाइपलाइन को सुरक्षित करने और नुकसान का पता लगाने में जुटी हैं। फिलहाल यह साफ नहीं है कि ये हमले किसने किए। अब तक किसी भी देश या संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है। ड्रोन हमले से पंपिंग स्टेशनों में लगी आग अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, हमले में पाइपलाइन के पास बने पंपिंग स्टेशनों को निशाना बनाया गया। पंपिंग स्टेशन पाइपलाइन में तेल को आगे भेजने में मदद करते हैं। शुक्रवार को ली गई सैटेलाइट तस्वीर में एक पंपिंग स्टेशन पर आग से काफी नुकसान दिखाई दिया। एक दूसरी तस्वीर में स्टेशन से काला धुआं निकलता दिखा। अभी यह साफ नहीं है कि पाइपलाइन को सीधे कितना नुकसान हुआ है। यह भी पता नहीं है कि पाइपलाइन फिर से कब शुरू होगी। सऊदी का दावा- इराक से आए थे ड्रोन सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा कि रियाद और मदीना इलाकों में पाइपलाइन पर कई ड्रोन से हमला किया गया। सऊदी के मुताबिक, ये ड्रोन इराक से आए थे। सऊदी ने कहा कि इराक के प्रधानमंत्री के कहने पर उसने अभी जवाबी हमला नहीं करने का फैसला किया है। सऊदी चाहता है कि इराक पहले अपनी जमीन से होने वाले ऐसे हमलों को रोकने के लिए कार्रवाई करे। इराक ने भी हमले की निंदा की है। इराकी सरकार ने कहा कि वह इस मामले की जांच करेगी और अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल दूसरे देशों पर हमला करने के लिए नहीं होने देगी। होर्मुज बंद होने के बाद बढ़ी पाइपलाइन की अहमियत सऊदी अरब का ज्यादातर तेल देश के पूर्वी हिस्से में निकलता है। इसे दूसरे देशों तक पहुंचाने के लिए आमतौर पर जहाजों का इस्तेमाल होता है, जिन्हें फारस की खाड़ी से बाहर निकलने के लिए होर्मुज स्ट्रेट से गुजरना पड़ता है। ईरान युद्ध के बाद होर्मुज का रास्ता बंद हुआ तो सऊदी ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का सहारा लिया। यह पाइपलाइन तेल को देश के पूर्वी हिस्से से सीधे पश्चिमी तट के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाती है। यानी तेल को होर्मुज से होकर नहीं जाना पड़ता। होर्मुज बंद होने के बाद सऊदी इस पाइपलाइन से रोजाना करीब 50 लाख बैरल तेल यानबू भेज रहा था। वहां से तेल जहाजों के जरिए दूसरे देशों तक पहुंचाया जा सकता है। लाल सागर का रास्ता भी बंद होने की कगार पर होर्मुज के बाद अब लाल सागर का रास्ता भी बंद होने की कगार पर पहुंचता दिख रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के इलाके पर कब्जे का दावा किया है और सऊदी जहाजों को इस रास्ते से गुजरने की इजाजत नहीं देने की बात कही है। हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा है कि सऊदी समर्थित सेनाओं ने बाब अल-मंदेब के बीच स्थित पेरिम द्वीप पर अपना नियंत्रण खो दिया है। हूतियों का दावा है कि अब उनका करीब 5,400 वर्ग किलोमीटर इलाके पर कब्जा है। बाब अल-मंदेब एशिया और यूरोप के बीच जहाजों की आवाजाही का अहम रास्ता है। तेल से भरे जहाज भी इसी रास्ते से लाल सागर के जरिए यूरोप और दूसरे बाजारों तक पहुंचते हैं। —————— ये खबर भी पढ़ें… इजराइल ने लेबनान में हिजबुल्लाह की 2km लंबी सुरंग उड़ाई:विस्फोट के बाद 4.1 तीव्रता का भूकंप आया; नेतन्याहू बोले- मिशन पूरा, हैप्पी न्यू ईयर
इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह की 2 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सुरंग को ब्लास्ट कर तबाह कर दिया। ब्लास्ट के लिए करीब 1100 टन विस्फोटक इस्तेमाल किया गया था। यह विस्फोट इतना तेज था कि इलाके में 4.1 तीव्रता वाले भूकंप जैसे झटके महसूस किए गए। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दावा- बाब अल-मंदेब पर कब्जे के करीब हूती विद्रोही:दुनिया के अहम समुद्री रास्ते पर खतरा बढ़ा; यमनी फोर्स पेरिम द्वीप छोड़कर भागी

यमन के हूती विद्रोही बाब अल-मंदेब पर कब्जे के करीब पहुंच गए हैं। यह यह द्वीप बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में है। रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से जानकारी दी है कि यमनी गवर्नमेंट फोर्स ने पेरिम द्वीप पर कंट्रोल छोड़ दिया है और वे पीछे हट गए हैं। पेरिम द्वीप पर कंट्रोल बाब अल-मंदेब पर पकड़ बनाने के लिए बेहद अहम है। इसके ठीक सामने धुबाब शहर है, जहां हूती लड़ाके दाखिल हो गए हैं। बाब अल-मंदेब समुद्र का एक संकरा रास्ता है। यहां कब्जे के बाद आस-पास गुजरने वाले जहाजों पर हमला करना आसान हो जाएगा। हूती विद्रोही 10 दिनों से यमन के लाल सागर तट पर लगातार आगे बढ़ रहे हैं। वे मोखा समेत कई रणनीतिक इलाकों पर कब्जा कर चुके हैं। अब वे शहर ताइज की ओर बढ़ रहे हैं। मोखा पर कब्जे से लाल सागर में बढ़ा खतरा हूतियों ने यमन के लाल सागर तट पर स्थित रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा पर गुरूवार को कब्जा कर लिया था। यह शहर बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से करीब 75 किलोमीटर दूर है। रॉयटर्स के मुताबिक, मोखा पर कब्जे के अभियान में ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने हूतियों को सैन्य सलाह और मदद दी थी। हालांकि, ईरान सार्वजनिक तौर पर हूतियों को सैन्य निर्देश देने से इनकार करता है। बाब अल-मंदेब लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच अहम समुद्री रास्ता है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने पर तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इससे ईंधन की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। यह खतरा ऐसे समय बढ़ा है, जब ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच होर्मुज स्ट्रेट में पहले से समुद्री यातायात प्रभावित है। अगर बाब अल-मंदेब में भी संकट बढ़ा, तो दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर दबाव और बढ़ सकता है। ईरानी कमांडरों की मौजूदगी का दावा तेहरान की गतिविधियों से परिचित एक क्षेत्रीय राजनयिक के मुताबिक, ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के कई वरिष्ठ कमांडर पहले ही यमन में हैं। उन्होंने सऊदी अरब के खिलाफ हूतियों के हमलों की निगरानी की और उनकी कमान संभाली। राजनयिक के मुताबिक, हमलों की रणनीति को लेकर कई हफ्तों तक चर्चा हुई थी। एक अन्य ईरानी अधिकारी ने बताया कि ईरान ने हूतियों समेत अपने सहयोगी समूहों के साथ कई बैठकें की थीं। हालांकि, उनके मुताबिक मोखा पर हमला करने का फैसला हूतियों ने खुद लिया था। यमन की सऊदी समर्थित सरकार से जुड़े पांच सैन्य अधिकारियों ने भी कहा कि लाल सागर के किनारे हूतियों के नए अभियान में ईरान ने उनकी मदद की थी। यमनी सैन्य सूत्रों के मुताबिक, पकड़े गए हूती लड़ाकों से मिली जानकारी के आधार पर दावा किया गया है कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की कुद्स फोर्स के वरिष्ठ कमांडर अब्दोलरेजा शहलाई इस अभियान को दिशा दे रहे थे। ईरान ने इस दावे की पुष्टि नहीं की है। ईरानी सूत्रों के मुताबिक, शहलाई कुद्स फोर्स में हैं और पहले भी यमन में रह चुके हैं। नाकेबंदी के बावजूद हथियार पहुंचाने का दावा ईरानी सूत्रों के मुताबिक, यमन में हूतियों के इलाकों पर हवाई और समुद्री नाकाबंदी के बावजूद रिवोल्यूशनरी गार्ड्स अभी भी हथियार और सैन्यकर्मी यमन के अंदर और बाहर पहुंचाने में सक्षम हैं। हालांकि, सूत्रों ने यह नहीं बताया कि ऐसा किस तरीके से किया जा रहा है। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के यमन मामलों के जानकार अहमद नागी के मुताबिक, लाल सागर के किनारे हूतियों का अभियान अचानक शुरू नहीं हुआ। इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी। नागी के मुताबिक, हूतियों की सैन्य क्षमता बढ़ने की एक बड़ी वजह उन्हें मिले नए हथियार हैं। इनमें ईरान से मिले हथियारों के साथ-साथ अलग-अलग तस्करी नेटवर्क से हासिल किए गए हथियार भी शामिल हैं। उन्होंने मौजूदा अभियान में हूतियों के ड्रोन के इस्तेमाल का भी जिक्र किया। सऊदी ने मोखा पर बड़ा हवाई हमला नहीं किया जब हूती मोखा की तरफ बढ़ने लगे, तो यमनी सरकार ने सऊदी अरब से ज्यादा हवाई मदद और दूसरी सैन्य सहायता मांगी थी। यमन के दो अधिकारियों ने यह जानकारी दी। अधिकारियों के मुताबिक, यमनी सरकार चाहती थी कि सऊदी अरब हूतियों के मुख्य इलाकों में उनके ठिकानों पर हवाई हमले करे। इनमें राजधानी सना और तेल डिपो जैसे रणनीतिक ठिकाने शामिल थे। हालांकि, सऊदी अरब ने मोखा के मोर्चे पर बड़ा हवाई अभियान नहीं चलाया। उसने यमन को हथियार, लॉजिस्टिक मदद और खुफिया जानकारी दी। सऊदी ने कुछ हवाई हमले जरूर किए, लेकिन उनका मुख्य फोकस उत्तरी मोर्चे के जौफ और मारिब प्रांतों पर रहा। यमनी अधिकारियों के मुताबिक, सऊदी अरब हूतियों के साथ बड़ा सैन्य टकराव नहीं चाहता। उसे डर है कि इससे सऊदी क्षेत्र में हूतियों के ड्रोन हमले और बढ़ सकते हैं। ट्रम्प ने सऊदी की एयरस्ट्राइक की मांग ठुकराई हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब को अमेरिकी मदद की उम्मीद थी। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रम्प से सीधे अमेरिकी हवाई हमले करने की अपील की थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने इनकार कर दिया। इसके बावजूद अमेरिका सऊदी की मदद कर रहा है। CNN के मुताबिक, 100 से ज्यादा अमेरिकी सैन्य सलाहकार सऊदी अरब में मौजूद हैं। एक अमेरिकी अधिकारी ने इनकी संख्या करीब 200 बताई है। ये अमेरिकी सैन्यकर्मी सऊदी सेना को हूतियों से जुड़ी खुफिया जानकारी और संभावित लक्ष्यों की पहचान में मदद कर रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी सैनिक हूतियों के खिलाफ होने वाले हवाई हमलों में सीधे हिस्सा नहीं ले रहे हैं। फिलहाल अमेरिका सीधे सैन्य कार्रवाई से बच रहा है। ऐसे में मोखा पर कब्जे के बाद हूतियों को रोकने के लिए सऊदी अरब और यमन सरकार की अगली रणनीति अहम होगी।

क्रूड और US बॉन्ड यील्ड बिगाड़ सकते है बाजार का मूड, गिफ्ट निफ्टी दे रहा संकेत, इंडेक्स पर कहां रखें आज नजर

Gift Nifty Indicator: शुक्रवार को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी के निचले स्तर पर खुलने की संभावना है। GIFT निफ्टी 100 अंक से ज़्यादा की गिरावट के साथ कमजोर शुरुआत का संकेत दे रहा है। क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में नई तेज़ी, US ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और एशियाई व US इक्विटी बाज़ारों में गिरावट का असर बाजारों पर पड़ रहा है। मध्य पूर्व के अहम शिपिंग रूट पर हमले तेज़ होने के बाद ब्रेंट क्रूड $110 प्रति बैरल के करीब पहुंच गया, जबकि US में थोक महंगाई बढ़ने से अगले हफ़्ते फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें मजबूत हुईं।

GIFT निफ्टी सुबह 8 बजे 23,343 के आसपास ट्रेड कर रहा था, जो 117 अंक या 0.5 प्रतिशत नीचे था। गुरुवार को भारतीय इक्विटी बाजारों ने लगातार तीन सत्रों की गिरावट का सिलसिला तोड़ा था, हालांकि सीमित दायरे में कारोबार के कारण बढ़त मामूली रही। सेंसेक्स 138.36 अंक या 0.19 प्रतिशत बढ़कर 74,902.59 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 46.30 अंक या 0.20 प्रतिशत बढ़कर 23,477.80 पर पहुंचा।

एशियाई बाजारों में गिरावट

शुक्रवार को एशियाई शेयरों और बॉन्ड में गिरावट आई क्योंकि निवेशक ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और US में सख्त मौद्रिक नीति की संभावना से जूझ रहे थे। MSCI एशिया पैसिफिक इंडेक्स में 1.3 प्रतिशत की गिरावट आई, जिसमें जापान और दक्षिण कोरिया में सबसे ज़्यादा नुकसान देखा गया। जापान का Topix 1 प्रतिशत गिरा, जबकि Nikkei 225 फ्यूचर्स में 2.7 प्रतिशत की गिरावट आई। ऑस्ट्रेलिया के S&P/ASX 200 और हांगकांग के Hang Seng में 0.9 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि शंघाई कंपोजिट 0.6 प्रतिशत गिरा।

गुरुवार की बिकवाली के बाद US इक्विटी फ्यूचर्स में कुछ स्थिरता के संकेत दिखे, जिसमें एशियाई कारोबार में S&P 500 फ्यूचर्स में 0.2 प्रतिशत की बढ़त हुई।

मध्य पूर्व में सप्लाई से जुड़े जोखिम बढ़ने से ब्रेंट $110 के करीब पहुंचा

कच्चा तेल भारतीय बाज़ारों के लिए सबसे बड़ी मैक्रोइकॉनॉमिक चुनौती बना हुआ है। फारस की खाड़ी और लाल सागर दोनों से शिपिंग के लिए बढ़ते खतरों के बीच कीमतों में ज़बरदस्त तेज़ी जारी है। शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स लगभग $110 तक पहुंचने के बाद 1% बढ़कर $108.68 प्रति बैरल हो गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 1% बढ़कर $103.45 प्रति बैरल हो गया। गुरुवार को दोनों बेंचमार्क में 6% से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई थी।

ईरान-समर्थित हूतियों ने गुरुवार को यमन के मोचा बंदरगाह पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे रेड सी में शिपिंग के लिए खतरा बढ़ गया है। साथ ही, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से ट्रैफ़िक पर भी रोक लगी हुई है क्योंकि खाड़ी में टैंकरों पर हमले बढ़ गए हैं।

एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अमेरिका और ईरान के बीच लगातार हमलों से ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है और क्रूड मार्केट में जियोपॉलिटिकल रिस्क प्रीमियम ऊंचा बना हुआ है।

वॉल स्ट्रीट में गिरावट

गुरुवार को अमेरिकी इक्विटी में गिरावट आई क्योंकि प्रोड्यूसर की कीमतों में बढ़ोतरी और क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल से यह चिंता बढ़ गई कि महंगाई के कारण फेडरल रिजर्व को अगले हफ़्ते ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। अगस्त में अमेरिकी थोक महंगाई 0.4% बढ़ी, जिससे कीमतों के दबाव को लेकर चिंता बढ़ गई। इसके जवाब में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी हुई, और 10-साल की यील्ड लगभग तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई।

निफ्टी का टेक्निकल आउटलुक

पोनमुडी को उम्मीद है कि 23,500-23,600 का स्तर निफ्टी के लिए तुरंत रेजिस्टेंस का काम करेगा, जबकि 23,200 का स्तर अहम सपोर्ट बना रहेगा। 23,200 के नीचे जाने पर गिरावट 23,050-23,000 तक बढ़ सकती है, हालांकि बहुत ज़्यादा ओवरसोल्ड मोमेंटम इंडिकेटर टेक्निकल बाउंस की गुंजाइश भी बनाते हैं।

गुरुवार को विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय इक्विटी में नेट सेलर बने रहे और उन्होंने 438 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने बाज़ार को सपोर्ट देना जारी रखा और सेशन के दौरान 1,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की इक्विटी खरीदी।

Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी 111 अंक नीचे, एशिया में भी दबाव, क्रूड $108 के पार

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