वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान हूती विद्रोहियों के हमले के डर से बंकरों वाले महल में रहने को मजबूर हैं। उनके पास करोड़ों का महल है लेकिन बढ़ते हमलों के डर से उन्हें बार-बार अपना ठिकाना बदलना पड़ रहा है। बीते कुछ समय में हूतियों ने सऊदी पर हमले बढ़ा दिए हैं। इसी महीने रियाद एयरपोर्ट को 20 बार निशाना बनाया गया। इसके चलते एयरपोर्ट बंद है और उड़ाने रद्द हैं। प्रिंस सलमान की सुरक्षा के लिए चुने गए गार्ड तैनात रिपोर्ट के मुताबिक, मोहम्मद बिन सलमान की सुरक्षा के लिए खास तौर पर चुने गए गार्ड तैनात हैं। हूती विद्रोहियों के हमलों के खतरे को देखते हुए सऊदी अरब अपने शाही महलों और तेल ठिकानों की सुरक्षा भी बढ़ा रहा है। इसके लिए मिसाइलों को हवा में रोकने वाले एयर डिफेंस सिस्टम को अलग-अलग जगहों पर तैनात किया जा रहा है। इस महीने सऊदी के एयरपोर्ट पर हुए बड़े हमले 6 अक्टूबर: जजान और नजरान के एयरपोर्ट को निशाना बनाया गया। खामिस मुशैत की ओर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइल को सऊदी एयर डिफेंस ने रोकने का दावा किया। 7 अक्टूबर: रियाद और अभा के एयरपोर्ट पर हमले हुए। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, तीन विदेशी नागरिकों की मौत हुई और 36 लोग घायल हुए। 8 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर एक और हमला हुआ। अधिकारियों के मुताबिक, तीन सऊदी नागरिकों की मौत हुई। सरकारी एयरलाइन सऊदिया का एक विमान भी क्षतिग्रस्त हुआ। 10 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 1 भारतीय नागरिक समेत 13 लोगों की मौत हुई और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसके बाद एयरपोर्ट पर उड़ानें रोकनी पड़ीं। 11 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट के पर एक मिसाइल या ड्रोन गिरा। एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत हुई और 11 लोग घायल हुए। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। क्राउन प्रिंस सलमान की आलीशान जिंदगी से जुड़े किस्से 41 साल के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की आलीशान जिंदगी से जुड़े कई किस्से मशहूर हैं। कहीं उन्होंने करोड़ों रुपए खर्च कर पार्टी की, तो कहीं हजारों करोड़ की पेंटिंग, हवेली और यॉट से उनका नाम जुड़ा। 1. मालदीव में एक महीने के लिए 474 करोड़ रुपए में लिया रिसॉर्ट लेखक जस्टिन शेक की किताब ‘ब्लड एंड ऑयल’ के मुताबिक, जुलाई 2015 में सलमान ने मालदीव का वेला रिसॉर्ट एक महीने के लिए करीब 474 करोड़ रुपए में किराए पर लिया था। यहां पिटबुल, साइ और डीजे अफ्रोजैक ने परफॉर्म किया। एक रात सलमान खुद मंच पर पहुंचे और अपने पसंदीदा गाने बजाने लगे। पार्टी की खबर बाहर आने के बाद इसे एक हफ्ते के भीतर खत्म कर दिया गया। 2. 4268 करोड़ की पेंटिंग की खरीद से जुड़ा नाम लियोनार्डो दा विंची की पेंटिंग ‘साल्वेटर मुंडी’ 2017 में करीब 4268 करोड़ रुपए में बिकी थी। इसे दुनिया की सबसे महंगी पेंटिंग में गिना जाता है। इस पेंटिंग की खरीद से सलमान का नाम भी जुड़ा था। हालांकि, अबू धाबी के संस्कृति और पर्यटन विभाग ने दावा किया था कि पेंटिंग उसने खरीदी है। 3. फ्रांस में 2848 करोड़ की हवेली सलमान ने 2015 में फ्रांस के वर्साय में करीब 2848 करोड़ रुपए की एक आलीशान हवेली खरीदी थी। 57 एकड़ में फैली यह हवेली बाहर से पुराने शाही महल जैसी दिखती है। इसमें सिनेमा हॉल, स्विमिंग पूल और शानदार सजावट है। हवेली में एक ऐसा कमरा भी है, जहां पानी के बीच बैठकर ऊपर तैरती मछलियों को देखा जा सकता है। यहां के फव्वारे, लाइटें और एसी तक आईफोन से चलाए जा सकते हैं। 4. आधे घंटे यॉट देखी, पसंद आई तो दोगूनी कीमत में खरीदी रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2015 में फ्रांस में छुट्टियां मनाते समय सलमान को ‘सेरेन’ नाम की सुपरयॉट पसंद आ गई। उन्होंने करीब आधे घंटे तक इसे देखा और फिर लगभग 5472 करोड़ रुपए में खरीद लिया। इस यॉट में दो हेलीपैड हैं। इसके अलावा, इसमें एक खास कमरा भी है, जहां से पानी के अंदर का नजारा देखा जा सकता है। 5. नियोम के महल में निजी समुद्र तट और 10 हेलीपैड सऊदी अरब के नियोम में लाल सागर के किनारे सलमान का एक आलीशान महल भी है। यहां निजी समुद्र तट, बड़े-बड़े बगीचे और गोल्फ कोर्स हैं। महल में हेलिकॉप्टर उतारने के लिए 10 हेलीपैड भी बनाए गए हैं। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा पर दशकों से अरबों डॉलर खर्च किए हैं। उसके पास आधुनिक फाइटर जेट हैं। मिसाइलों को हवा में नष्ट करने वाले महंगे सिस्टम भी हैं। सैन्य खर्च के मामले में वह दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है। हूतियों के पास सऊदी अरब जैसी बड़ी सेना और आधुनिक हथियार नहीं हैं। लेकिन उन्होंने सस्ते ड्रोन और कम ऊंचाई पर उड़ने वाली क्रूज मिसाइलों को अपनी ताकत बना लिया है। इन हथियारों का पता लगाना और उन्हें हवा में ही नष्ट करना मुश्किल होता है। सऊदी अरब के लिए हूतियों के सस्ते ड्रोन रोकना महंगा सौदा साबित हो रहा है। करीब 15 लाख रुपए के एक ड्रोन को नष्ट करने के लिए 25 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़ रहे हैं। हूती विद्रोही इसका फायदा उठाकर सऊदी अरब की महंगी सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ी कर रहे हैं। बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब के पास इतने आधुनिक हथियार होने के बावजूद हूती उसके अहम ठिकानों तक पहुंच कैसे जा रहे हैं? महंगे हथियारों के सामने सस्ते ड्रोन की चुनौती सऊदी अरब लंबे समय से अमेरिका और यूरोपीय देशों से आधुनिक और महंगे हथियार खरीदता रहा है। इनमें अत्याधुनिक फाइटर जेट, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। लेकिन हूतियों के हमले के आगे ये सब बेअसर हैं। वे कम कीमत वाले ड्रोन और क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। ये हथियार कई बार जमीन के काफी करीब उड़ते हैं। ऐसे में रडार के लिए उनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। सऊदी अरब को इन हमलों को रोकने के लिए कई बार बेहद महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ता है। एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करीब 30 करोड़ होती है। इसके मुकाबले एक ड्रोन की कीमत महज 15 लाख होती है। इसका नुकसान सिर्फ पैसों तक सीमित नहीं है। महंगी मिसाइलों का भंडार भी सीमित होता है। यूक्रेन और ईरान जंग से इंटरसेप्टर मिसाइल की मांग बढ़ी यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्धों के कारण दुनियाभर में मिसाइल इंटरसेप्टर की मांग बढ़ी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक इसी तरह हमलों को रोकते रहना मुश्किल हो सकता है। हूतियों की ताकत भी पहले जैसी नहीं रही। उन्होंने अपने हथियारों के भंडार को बढ़ाया है। अब वे कुछ हथियार खुद भी बनाने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र भी किया गया है कि अब हूती ईरान के भरोसे नहीं रहे। सऊदी की सुरक्षा का फोकस गलत दिशा में रहा सऊदी अरब की एक बड़ी कमजोरी उसका रडार सिस्टम है। देश ने अपनी सुरक्षा के लिए पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाकों पर ज्यादा ध्यान दिया। इन दिशाओं से ईरान और इराक की तरफ से खतरा माना जाता रहा है। लेकिन यमन दक्षिण-पश्चिम में है। इस तरफ से होने वाले हमलों को पकड़ने और रोकने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है। हवाई हमलों को रोकने के लिए सबसे जरूरी है कि दुश्मन के ड्रोन या मिसाइल का समय रहते पता चल जाए। अगर हमले का पता देर से चलता है, तो जवाबी कार्रवाई के लिए कम समय बचता है। ऐसे में महंगी और आधुनिक मिसाइलें होने के बावजूद हमले को रोकना मुश्किल हो जाता है। सेना की बनावट भी बन रही है परेशानी सऊदी अरब की मुश्किल सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है। उसकी सेना का ढांचा और काम करने का तरीका भी चुनौती पैदा करते हैं। सऊदी अरब की नियमित सेना में करीब 2.5 लाख सैनिक हैं। वहीं, नेशनल गार्ड में करीब 1.25 लाख सैनिक हैं। नेशनल गार्ड सेना से अलग है। इसमें ऐसे कबीलों के लोगों की भर्ती की जाती रही है, जिन्हें सऊदी राजपरिवार का वफादार माना जाता है। सेना में सुधार के लिए मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 में कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया। रियाद में संयुक्त सैन्य कमान बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए, ताकि सेना की अलग-अलग इकाइयों के बीच तालमेल बेहतर हो सके। हालांकि, सेना की कार्यशैली बदलना आसान नहीं है। आधुनिक हथियारों के साथ उन्हें चलाने का प्रशिक्षण, तेजी से फैसले लेने की क्षमता और बेहतर तालमेल भी जरूरी है। 2015 में यमन युद्ध शुरू किया, लेकिन जीत आसान नहीं रही सऊदी अरब की मौजूदा परेशानी को समझने के लिए यमन युद्ध का इतिहास देखना जरूरी है। 2015 में मोहम्मद बिन सलमान ने रक्षा मंत्री के रूप में यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था। उस समय उम्मीद थी कि हूतियों को कुछ ही हफ्तों में कमजोर कर दिया जाएगा। लेकिन युद्ध लंबा खिंचता गया।हूतियों ने यमन के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। उन्होंने सऊदी अरब पर भी बार-बार हमले किए। इस युद्ध में सऊदी अरब को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को भी धक्का लगा। 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम हुआ। इससे लड़ाई कुछ समय के लिए थमी, लेकिन संघर्ष का स्थायी समाधान नहीं निकल सका। अब अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमलों के बीच क्षेत्र में तनाव फिर बढ़ गया है। हूती भी इस संघर्ष में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सऊदी अरब के सामने अब समस्या यह है कि वह केवल हवाई हमलों के जरिए हूतियों को हरा पाएगा या नहीं, इस पर गंभीर संदेह है। यमन में हूतियों के विरोधी गुट भी बंटे हुए हैं। उनके बीच एकजुटता की कमी है। ऐसे में सऊदी अरब के लिए जमीन पर किसी मजबूत सहयोगी के सहारे हूतियों को पीछे धकेलना भी आसान नहीं है। ईरान को कैसे मिल रहा है फायदा? हूती ईरान के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में गिने जाते हैं। वे सऊदी अरब और अमेरिका के लिए संघर्ष की लागत बढ़ा सकते हैं। इससे ईरान को क्षेत्र में दबाव बनाने का मौका मिलता है। अमेरिका ने 2025 में हूतियों के खिलाफ करीब चार महीने तक सैन्य अभियान चलाया था। इसके बावजूद वह उन्हें पूरी तरह झुका नहीं सका। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी दोबारा बड़े सैन्य अभियान में उतरने को लेकर हिचक दिखा चुके हैं। अगर हूती अपनी शर्तों पर समझौता कराने में सफल होते हैं या सऊदी अरब को पीछे हटने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह ईरान और उसके सहयोगी गुटों के लिए बड़ी रणनीतिक उपलब्धि होगी। यमन मामलों की विशेषज्ञ फारिया अल-मुस्लिमी के मुताबिक, हूती अपनी समस्याओं का हल बातचीत के बजाय युद्ध के जरिए निकालने की कोशिश करते हैं। वहीं, सऊदी अरब को लगता था कि ज्यादा पैसा खर्च करके और आधुनिक हथियार खरीदकर वह अपने दुश्मनों को काबू में कर सकता है। लेकिन हूतियों के लगातार हमलों ने दिखा दिया कि सिर्फ पैसा और हथियार होने से दुश्मन को हराना आसान नहीं है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों ने यमन के राष्ट्रपति भवन पर हमला किया:5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, 4 की मौत; प्रधानमंत्री मौजूद थे, बाल-बाल बचे यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे, सभी सुरक्षित हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…
सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। 2015 में शुरू हुई लड़ाई को 10 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से पर काबिज हैं। वे सऊदी अरब के अंदर तक ड्रोन और मिसाइलों से हमले करने की क्षमता रखते हैं। हालात अब ऐसे हैं कि सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा के लिए लगातार पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। वहीं, हूती पीछे हटने के बजाय उस पर दबाव बढ़ा रहे हैं। तेल और गैस से होने वाली कमाई में हिस्सा मांगने का दावा भी इसी लड़ाई से जुड़ा है। सवाल यह है कि आखिर सऊदी अरब इतनी ताकत होने के बाद भी हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा? 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई यमन में हूतियों ने 2014 में राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद 2015 में सऊदी अरब ने कई देशों के साथ मिलकर उनके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार दोबारा सत्ता में आए और हूतियों का कब्जा खत्म हो। इसके बाद कई साल तक यमन में हवाई हमले होते रहे। लेकिन हूतियों को पूरी तरह पीछे धकेलने में सऊदी गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया। हूती अब भी यमन के बड़े हिस्से में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। उनकी लड़ाई का असर अब सऊदी अरब की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। अमेरिकी हथियार हूतियों के खिलाफ बेअसर क्यों? सऊदी अरब के पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और दुश्मन के हमलों को रोकने वाले एयर डिफेंस सिस्टम हैं। अमेरिका उसे हथियारों के साथ खुफिया जानकारी और तकनीकी मदद भी देता रहा है। इसके बावजूद हूतियों के खिलाफ निर्णायक जीत नहीं मिल सकी। इसकी एक बड़ी वजह हमले और बचाव पर होने वाला खर्च है। हूती सस्ते ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। दूसरी ओर, इन हमलों को रोकने के लिए सऊदी अरब को कई बार महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलें दागनी पड़ती हैं। यानी हूतियों को हमला करने में जितना पैसा खर्च होता है, उससे कहीं ज्यादा रकम सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा में लगानी पड़ सकती है। इससे लंबे समय तक लड़ाई जारी रखना महंगा हो जाता है। सऊदी के लिए यमन का पहाड़ी इलाका भी बड़ी चुनौती यमन का बड़ा हिस्सा पहाड़ी है। ऐसे इलाकों में विद्रोहियों के ठिकानों का पता लगाना और उन्हें पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होता। हवाई हमलों से किसी ठिकाने को नुकसान पहुंचाया जा सकता है, लेकिन इससे पूरे इलाके पर कब्जा नहीं मिलता। हूती लंबे समय से यमन में सक्रिय हैं और वहां उनकी मजबूत पकड़ है। उन्हें पूरी तरह हटाने के लिए सऊदी अरब को बड़ा जमीनी अभियान चलाना पड़ सकता है। इसमें सैनिकों के मारे जाने और युद्ध लंबे समय तक चलने का खतरा है। ईरान की मदद से हूतियों की ताकत बढ़ी सऊदी अरब और उसके सहयोगी ईरान पर हूतियों को हथियार और तकनीकी मदद देने का आरोप लगाते रहे हैं। ईरान और हूतियों के संबंध इस संघर्ष को क्षेत्रीय राजनीति से भी जोड़ते हैं। इस वजह से सऊदी अरब के लिए लड़ाई सिर्फ यमन के विद्रोहियों तक सीमित नहीं रहती। हूतियों के खिलाफ कार्रवाई बढ़ने पर ईरान के साथ तनाव भी बढ़ सकता है। ऐसे में सैन्य कार्रवाई का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ने का खतरा रहता है। तेल-गैस की कमाई में हिस्सा क्यों मांग रहे हूती? यमन में तेल और गैस से होने वाली कमाई लंबे समय से विवाद का मुद्दा रही है। हूती चाहते हैं कि इस पैसे का इस्तेमाल सरकारी कर्मचारियों के वेतन और दूसरी जरूरतों को पूरा करने में हो। वे तेल-गैस से मिलने वाले राजस्व में हिस्सेदारी की मांग भी करते रहे हैं। तेल की कमाई पर नियंत्रण का मतलब सिर्फ पैसा नहीं है। इससे यह भी तय होता है कि यमन में किसका राजनीतिक और आर्थिक दबदबा रहेगा। इसलिए तेल-गैस के राजस्व का बंटवारा किसी भी समझौते में बड़ा मुद्दा बन सकता है। हूतियों के लिए यह मांग सऊदी अरब और यमन की सरकार पर दबाव बनाने का एक तरीका भी है।
एयरपोर्ट और तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता हाल ही में सऊदी अरब के एयरपोर्ट और तेल-गैस ठिकानों पर हूतियों के हमले हुए हैं। इनमें रियाद का किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी शामिल है। हमलों के कारण उड़ानों और तेल कारोबार की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। सऊदी अरब ने कुछ मिसाइलों को हवा में ही रोकने की जानकारी दी है। सऊदी अरब के सामने हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने, यमन में जमीनी अभियान बढ़ाने या बातचीत के जरिए समझौते की कोशिश करने जैसे विकल्प हैं। लेकिन हर रास्ते के साथ जोखिम जुड़ा है।
सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को उतार सकता है। इसका मकसद लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। हूतियों की इस इलाके में बढ़ती पकड़ से दुनिया के अहम समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है। यह रास्ता एशिया और यूरोप के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है। बाब-अल-मंदेब दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया का 12% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
बाब-अल-मंदेब पर कब्जे के लिए जंग क्यों? पिछले महीने हूतियों ने यमन के तटीय इलाकों में आगे बढ़ते हुए इस रास्ते के आसपास अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने सऊदी समर्थित यमन के सरकारी बलों और UAE समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज को पीछे धकेला। बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। इसके रास्ते जहाज एशिया से लाल सागर और स्वेज नहर होते हुए यूरोप तक पहुंचते हैं। इस वजह से यह वैश्विक व्यापार और तेल की सप्लाई के लिए अहम है। सऊदी अरब को आशंका है कि हूतियों का नियंत्रण बना रहा तो इस रास्ते से होने वाले व्यापार और तेल की ढुलाई पर खतरा बढ़ सकता है। हूतियों के खिलाफ दो तरह के सैन्य ऑपरेशन पर विचार रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं। पहले विकल्प में बाब-अल-मंदेब के आसपास सीमित हमला करके समुद्री रास्ते को सुरक्षित करने की कोशिश की जाएगी। दूसरे विकल्प में यमन के कई इलाकों में एक साथ ऑपरेशन चलाया जा सकता है। इसमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ जैसे इलाके शामिल हो सकते हैं। इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। ऑपरेशन के दायरे के हिसाब से 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिक जुटाए जा सकते हैं। हालांकि, सैन्य कार्रवाई की समयसीमा को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने को तैयार नहीं रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी, लक्ष्य तय करने में मदद और सैन्य सलाह दे रहा है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी नेतृत्व की सीधे सैन्य मदद और हवाई हमले करने की मांग पर सहमति नहीं दी है। फिलहाल अमेरिका के सीधे युद्ध में शामिल होने की उम्मीद नहीं है। सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये से भी सैन्य मदद मिली है। पाकिस्तान ने पिछले महीने अदन में एयर डिफेंस सिस्टम, हल्की तोपें, ड्रोन और ड्रोन रोधी उपकरण भेजे थे। पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान ने यमन में लड़ाई के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला नहीं किया है। तुर्किये के ड्रोन भी यमन में तैनात किए गए हैं। वहीं, फ्रांस ने यानबू में रक्षात्मक प्रणालियां और सैनिक भेजने की घोषणा की है। सऊदी अरब के सामने क्या चुनौती है? यमन में हूतियों के विरोधी गुटों के बीच एकता की कमी सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है। इन गुटों के हित और राजनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं। ऐसे में केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाने से ऑपरेशन की सफलता तय नहीं होगी। सऊदी अरब की चिंता अपने तेल ठिकानों की सुरक्षा को लेकर भी है। हूती पहले भी ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी अरब को निशाना बना चुके हैं। अगर यमन में लड़ाई तेज होती है, तो सऊदी तेल ठिकानों और समुद्री व्यापार पर हमलों का खतरा भी बढ़ सकता है। ———————— ये खबर भी पढ़ें…. नेतन्याहू बोले- हमलावर को किसने भेजा, जांच कर रहे:उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी; रिपोर्ट- चुनाव में हार रहे थे नेतन्याहू, हादसे का फायदा मिला इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि फ्लाईदुबई की फ्लाइट में कैप्टन पर हमले के आरोपी ओमानी पायलट को किसने भेजा था, इसकी जांच की जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस घटना के पीछे कोई व्यक्ति या संगठन मिला, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
सऊदी अरब यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिकों को उतार सकता है। इसका मकसद लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। हूतियों की इस इलाके में बढ़ती पकड़ से दुनिया के अहम समुद्री रास्तों पर खतरा बढ़ गया है। यह रास्ता एशिया और यूरोप के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है। बाब-अल-मंदेब दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया का 12% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
बाब-अल-मंदेब पर कब्जे के लिए जंग क्यों? पिछले महीने हूतियों ने यमन के तटीय इलाकों में आगे बढ़ते हुए इस रास्ते के आसपास अपनी पकड़ मजबूत की। उन्होंने सऊदी समर्थित यमन के सरकारी बलों और UAE समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज को पीछे धकेला। बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है। इसके रास्ते जहाज एशिया से लाल सागर और स्वेज नहर होते हुए यूरोप तक पहुंचते हैं। इस वजह से यह वैश्विक व्यापार और तेल की सप्लाई के लिए अहम है। सऊदी अरब को आशंका है कि हूतियों का नियंत्रण बना रहा तो इस रास्ते से होने वाले व्यापार और तेल की ढुलाई पर खतरा बढ़ सकता है। हूतियों के खिलाफ दो तरह के सैन्य ऑपरेशन पर विचार रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं। पहले विकल्प में बाब-अल-मंदेब के आसपास सीमित हमला करके समुद्री रास्ते को सुरक्षित करने की कोशिश की जाएगी। दूसरे विकल्प में यमन के कई इलाकों में एक साथ ऑपरेशन चलाया जा सकता है। इसमें अल-बायदा, मारिब, ताइज और अल-जौफ जैसे इलाके शामिल हो सकते हैं। इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। ऑपरेशन के दायरे के हिसाब से 1 लाख से ज्यादा यमनी सैनिक जुटाए जा सकते हैं। हालांकि, सैन्य कार्रवाई की समयसीमा को लेकर अभी स्थिति साफ नहीं है। अमेरिका सीधे युद्ध में उतरने को तैयार नहीं रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया जानकारी, लक्ष्य तय करने में मदद और सैन्य सलाह दे रहा है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी नेतृत्व की सीधे सैन्य मदद और हवाई हमले करने की मांग पर सहमति नहीं दी है। फिलहाल अमेरिका के सीधे युद्ध में शामिल होने की उम्मीद नहीं है। सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्किये से भी सैन्य मदद मिली है। पाकिस्तान ने पिछले महीने अदन में एयर डिफेंस सिस्टम, हल्की तोपें, ड्रोन और ड्रोन रोधी उपकरण भेजे थे। पाकिस्तानी सैन्य सलाहकार सऊदी अधिकारियों के साथ काम कर रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तान ने यमन में लड़ाई के लिए अपने सैनिक भेजने का फैसला नहीं किया है। तुर्किये के ड्रोन भी यमन में तैनात किए गए हैं। वहीं, फ्रांस ने यानबू में रक्षात्मक प्रणालियां और सैनिक भेजने की घोषणा की है। सऊदी अरब के सामने क्या चुनौती है? यमन में हूतियों के विरोधी गुटों के बीच एकता की कमी सऊदी अरब के लिए बड़ी चुनौती है। इन गुटों के हित और राजनीतिक लक्ष्य अलग-अलग हैं। ऐसे में केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाने से ऑपरेशन की सफलता तय नहीं होगी। सऊदी अरब की चिंता अपने तेल ठिकानों की सुरक्षा को लेकर भी है। हूती पहले भी ड्रोन और मिसाइलों से सऊदी अरब को निशाना बना चुके हैं। अगर यमन में लड़ाई तेज होती है, तो सऊदी तेल ठिकानों और समुद्री व्यापार पर हमलों का खतरा भी बढ़ सकता है। ———————— ये खबर भी पढ़ें…. नेतन्याहू बोले- हमलावर को किसने भेजा, जांच कर रहे:उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी; रिपोर्ट- चुनाव में हार रहे थे नेतन्याहू, हादसे का फायदा मिला इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि फ्लाईदुबई की फ्लाइट में कैप्टन पर हमले के आरोपी ओमानी पायलट को किसने भेजा था, इसकी जांच की जा रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस घटना के पीछे कोई व्यक्ति या संगठन मिला, तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
यमन में रविवार को एक हवाई हमले में 7 लोगों की मौत हो गई है। हूती स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इनमें बच्चे भी शामिल हैं। साथ ही, 40 लोग घायल हुए हैं। हमले में ताइज प्रांत के एक बाजार की दुकानों को निशाना बनाया गया। रॉयटर्स के मुताबिक यमन की सरकार ने कहा कि उसकी सेना ने हूती सैन्य कैंप और वाहनों को निशाना बनाते हुए यह हमले किए। रॉयटर्स ने यमनी सरकार के सूत्रों के हवाले से बताया कि हूती विद्रोहियों ने हाल ही में बाजार के पास एक सैन्य कैंप बनाया था। UN के मुताबिक, पिछले 2 महीने में फिर तेज हुए यमन संघर्ष में नागरिकों समेत 700 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। साथ ही सितंबर की शुरुआत से अब तक यमन में 82 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। घटना से जुड़ी तस्वीरें… 2014 से चल रही है यमन में जंग यमन में 2014 से गृहयुद्ध चल रहा है। एक तरफ हूती लड़ाके हैं और दूसरी तरफ यमन की सरकार के समर्थन में लड़ने वाली सेनाएं हैं। सऊदी अरब भी यमन की सरकार का समर्थन करता है। 2022 में UN की कोशिश से दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। लेकिन पिछले कुछ महीनों में यह सीजफायर टूट गया। इसके बाद फिर मिसाइल, ड्रोन और हवाई हमले होने लगे। यमन के पास बाब अल-मंदेब स्ट्रेट है। यहां से लाल सागर के रास्ते कई जहाज गुजरते हैं। इसलिए यहां लड़ाई बढ़ने का असर दूसरे देशों के कारोबार और जहाजों की आवाजाही पर भी पड़ सकता है। यमन की सेना का दावा- हूतियों ने सऊदी पर दो ड्रोन दागे यमन सरकार की सेना ने शनिवार को कहा कि हूती विद्रोहियों ने सऊदी की राजधानी रियाद पर दो ड्रोन दागे थे। लेकिन उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने दोनों ड्रोन्स को रोक दिया। सेना के मुताबिक, इसके अलावा हूतियों ने सऊदी अरब के दक्षिणी सीमा क्षेत्र खमिस मुशैत को निशाना बनाकर एक बैलिस्टिक मिसाइल भी दागी थी। सऊदी अरब के नागरिक सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि रात में अबहा और जिजान में भी संभावित खतरे की चेतावनी जारी की गई थी। सऊदी पर हूतियों के हमले क्यों बढ़े? यमन की लड़ाई में सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूती विद्रोही उसके खिलाफ लड़ रहे हैं। इसी वजह से हूतियों ने सऊदी अरब को भी निशाना बनाना शुरू किया है। जुलाई से हूतियों ने रियाद समेत अबहा, जिजान, नजरान, ताइफ, जेद्दा और यानबू जैसे शहरों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। उन्होंने एयरपोर्ट, सैन्य ठिकानों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाया है। लाल सागर में सऊदी जहाजों पर भी हमले हुए हैं। इसके जवाब में सऊदी अरब यमन में हूतियों के ठिकानों पर हवाई हमले कर रहा है, जिससे दोनों पक्षों के बीच टकराव और बढ़ गया है। हूतियों ने तेजी से अहम द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूतियों ने इस महीने लाल सागर के तट की ओर तेजी से बढ़ते हुए बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास के इलाकों पर कब्जा किया है। यह स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। इसलिए इस इलाके में लड़ाई का असर समुद्री रास्तों पर भी पड़ सकता है। इसके साथ ही, हुती विद्रोहियों ने सऊदी के जहाज या सऊदी से सामान ले जा रहे सभी जहाजों को निशाना बनाने की बात कही है। ———————- यह खबर भी पढ़ें… दावा- सऊदी अरब ने यमन में मिसाइल अटैक किया यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। हूतियों ने दावा किया है कि सऊदी अरब ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के पास एक गांव के लोकल मार्केट पर मिसाइल अटैक किया। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को कहा कि वे (ईरान) तुरंत होर्मुज इसलिए खोलना चाहते हैं। क्योंकि वे मुश्किल में हैं। उनके पास पैसा नहीं आ रहा है, क्योंकि उनकी कमाई होर्मुज स्ट्रेट से ही होती है। हमने वहां सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी नाकाबंदी कर दी। यह लोहे की दीवार जैसी है। दरअसल दो दिन पहले ईरान ने अमेरिका के सामने जंग रोकने का 7 दिन का प्लान रखा था। ईरान का कहना है कि सबसे पहले लड़ाई बंद हो और ईरान के तेल बेचने पर लगी पाबंदियों में राहत दी जाए। इसके बाद सातवें दिन होर्मुज स्ट्रेट खोला जाएगा और फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई बातचीत शुरू होगी। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा है कि अब यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह संघर्ष खत्म करना चाहता है या नहीं। जंग रोकने का प्रस्ताव ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका को भेजा है। ट्रम्प की चेतावनी के बाद ईरान ने भेजा था प्रस्ताव ईरानी प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पजशकियान ने कहा था कि ईरान अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। इससे एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान को ‘पूरी तरह तबाह’ कर सकता है। अमेरिका ने ईरान के 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था अमेरिकी सेना ने 8 सितंबर को ईरान से जुड़े 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था। इसके कुछ घंटे बाद ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने की ओर 20 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। जॉर्डन की सेना के मुताबिक, उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने इनमें से 18 मिसाइलों को मार गिराया, जबकि 2 आबादी से दूर इलाकों में गिरीं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा था कि ईरान ने अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत को दो बार बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की कोशिश की थी। इसी के जवाब में ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े तेल टैंकरों पर हमला किया। इसके बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 10 जहाजों पर हमले की बात की थी। इनमें 2 अमेरिकी जहाज और 8 तेल टैंकर शामिल थे। इसी दौरान ईरान ने एक अमेरिकी सबमरीन ड्रोन भी पकड़ा था। 28 फरवरी से चल रही है अमेरिका-ईरान की लड़ाई अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। —————————– यह खबर भी पढ़ें… ईरान बोला-फिर हमला हुआ तो युद्ध हिंद महासागर तक फैलेगा: इससे भारत-चीन पर असर ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका या इजराइल ने दोबारा हमला किया तो पश्चिम एशिया की जंग हिंद महासागर तक फैल सकती है। पूरी खबर पढ़ें…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को कहा कि वे (ईरान) तुरंत होर्मुज इसलिए खोलना चाहते हैं। क्योंकि वे मुश्किल में हैं। उनके पास पैसा नहीं आ रहा है, क्योंकि उनकी कमाई होर्मुज स्ट्रेट से ही होती है। हमने वहां सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी नाकाबंदी कर दी। यह लोहे की दीवार जैसी है। दरअसल दो दिन पहले ईरान ने अमेरिका के सामने जंग रोकने का 7 दिन का प्लान रखा था। ईरान का कहना है कि सबसे पहले लड़ाई बंद हो और ईरान के तेल बेचने पर लगी पाबंदियों में राहत दी जाए। इसके बाद सातवें दिन होर्मुज स्ट्रेट खोला जाएगा और फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई बातचीत शुरू होगी। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा है कि अब यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह संघर्ष खत्म करना चाहता है या नहीं। जंग रोकने का प्रस्ताव ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका को भेजा है। ट्रम्प की चेतावनी के बाद ईरान ने भेजा था प्रस्ताव ईरानी प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पजशकियान ने कहा था कि ईरान अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। इससे एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान को ‘पूरी तरह तबाह’ कर सकता है। अमेरिका ने ईरान के 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था अमेरिकी सेना ने 8 सितंबर को ईरान से जुड़े 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था। इसके कुछ घंटे बाद ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने की ओर 20 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। जॉर्डन की सेना के मुताबिक, उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने इनमें से 18 मिसाइलों को मार गिराया, जबकि 2 आबादी से दूर इलाकों में गिरीं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा था कि ईरान ने अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत को दो बार बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की कोशिश की थी। इसी के जवाब में ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े तेल टैंकरों पर हमला किया। इसके बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 10 जहाजों पर हमले की बात की थी। इनमें 2 अमेरिकी जहाज और 8 तेल टैंकर शामिल थे। इसी दौरान ईरान ने एक अमेरिकी सबमरीन ड्रोन भी पकड़ा था। 28 फरवरी से चल रही है अमेरिका-ईरान की लड़ाई अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। —————————– यह खबर भी पढ़ें… ईरान बोला-फिर हमला हुआ तो युद्ध हिंद महासागर तक फैलेगा: इससे भारत-चीन पर असर ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका या इजराइल ने दोबारा हमला किया तो पश्चिम एशिया की जंग हिंद महासागर तक फैल सकती है। पूरी खबर पढ़ें…
ईरान ने अमेरिका के सामने जंग रोकने का 7 दिन का प्लान रखा है। ईरान का कहना है कि सबसे पहले लड़ाई बंद हो और ईरान के तेल बेचने पर लगी पाबंदियों में राहत दी जाए। इसके बाद सातवें दिन होर्मुज स्ट्रेट खोला जाएगा और फिर ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर नई बातचीत शुरू होगी। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा है कि अब यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह संघर्ष खत्म करना चाहता है या नहीं। जंग रोकने का प्रस्ताव ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने मध्यस्थ देशों के जरिए अमेरिका को भेजा है। पजशकियान बोले- समझौते के बाद हमला हुआ पजशकियान ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा कि जून में दोनों देशों के बीच एक समझौते का आधार तैयार हो गया था और ईरान आगे बढ़ने के लिए राजी था। उन्होंने कहा कि उस समय होर्मुज खुला था और बातचीत का रास्ता भी खुला था, लेकिन इसके बाद अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया। पजशकियान के मुताबिक, ईरान अब भी बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन इसके लिए अमेरिकी हमले रुकने जरूरी है। ट्रम्प की चेतावनी के बाद आया प्रस्ताव ईरानी प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में पजशकियान ने कहा था कि ईरान अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। इससे एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चेतावनी दी थी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान को ‘पूरी तरह तबाह’ कर सकता है। अमेरिका ने ईरान के 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था अमेरिकी सेना ने 8 सितंबर को ईरान से जुड़े 5 तेल टैंकरों पर हमला किया था। इसके कुछ घंटे बाद ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकाने की ओर 20 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। जॉर्डन की सेना के मुताबिक, उसके एयर डिफेंस सिस्टम ने इनमें से 18 मिसाइलों को मार गिराया, जबकि 2 आबादी से दूर इलाकों में गिरीं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा था कि ईरान ने अमेरिकी नौसेना के एक युद्धपोत को दो बार बैलिस्टिक मिसाइलों से निशाना बनाने की कोशिश की थी। इसी के जवाब में ईरान के रेवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े तेल टैंकरों पर हमला किया। इसके बाद ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में 10 जहाजों पर हमले की बात की थी। इनमें 2 अमेरिकी जहाज और 8 तेल टैंकर शामिल थे। इसी दौरान ईरान ने एक अमेरिकी सबमरीन ड्रोन भी पकड़ा था। 28 फरवरी से चल रही है अमेरिका-ईरान की लड़ाई अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और उन खाड़ी देशों में हमले किए, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। अमेरिका का कहना है कि उसका मकसद ईरान की परमाणु क्षमता को कमजोर करना है। वहीं ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसे परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार है। —————————– यह खबर भी पढ़ें… ईरान बोला-फिर हमला हुआ तो युद्ध हिंद महासागर तक फैलेगा: इससे भारत-चीन पर असर ईरान ने चेतावनी दी है कि अमेरिका या इजराइल ने दोबारा हमला किया तो पश्चिम एशिया की जंग हिंद महासागर तक फैल सकती है। पूरी खबर पढ़ें…
यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लड़ाई तेज हो गई है। इस बीच ब्रिटेन ने सऊदी को मदद देने का फैसला किया है। सोमवार को न्यूयॉर्क जाते समय पत्रकारों से बात करते हुए ब्रिटिश पीएम ने कहा ब्रिटेन एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग के लिए टैंकर देगा। यानी हवा में उड़ते सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरा जा सकेगा। इधर लड़ाई का असर आम लोगों पर पड़ रहा है। पिछले कुछ दिनों में 3,000 से ज्यादा यमनी शरणार्थी जिबूती पहुंचे हैं। UN के मुताबिक, लाल सागर के तट पर लड़ाई बढ़ने से अब तक 1.2 लाख से ज्यादा यमनी लोग बेघर हो चुके हैं। एयर-टू-एयर रिफ्यूलिंग क्या है? इसमें एक टैंकर विमान हवा में उड़ रहे लड़ाकू विमान में ही ईंधन भरता है। लड़ाकू विमान को ईंधन भरने के लिए एयरबेस पर वापस नहीं उतरना पड़ता। इससे लड़ाकू विमान ज्यादा देर तक हवा में रह सकते हैं और लंबे समय तक निगरानी या रक्षा अभियान चला सकते हैं। ब्रिटेन RAF वॉयजर टैंकर विमान भेज सकता है ब्रिटेन की ओर से एक RAF वॉयजर टैंकर विमान तैनात किए जाने की उम्मीद है। यह विमान साइप्रस स्थित RAF अक्रोटिरी से ऑपरेट कर सकता है। ब्रिटेन की RAF के पास कुल 9 वॉयजर विमान हैं। इनमें 8 सैन्य रजिस्ट्रेशन वाले और एक सिविलियन रजिस्ट्रेशन वाला विमान है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त विमानों को भी सैन्य इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है। यह समझौता समय-सीमित है। मदद महीनों के बजाय कुछ हफ्तों तक रहने की उम्मीद है। हालांकि, बर्नहम ने कहा है कि इसकी समीक्षा जारी रहेगी। ब्रिटेन इस साल पहले ही सऊदी अरब की रक्षा के लिए अपना स्काई सेबर एयर डिफेंस सिस्टम वहां तैनात कर चुका है। हूती तेजी ने लाल सागर के तट के पास अहम द्वीपों पर कब्जा किया यमन के हूतियों ने इस महीने लाल सागर के तट की ओर तेजी से बढ़ते हुए बाब-अल-मंदब स्ट्रेट के पास के इलाकों पर कब्जा किया है। यह स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। इसलिए इस इलाके में लड़ाई का असर समुद्री रास्तों पर भी पड़ सकता है। हूतियों की इस बढ़त के बाद सऊदी अरब ने तटीय इलाकों में सैकड़ों हवाई हमले किए हैं। दूसरी तरफ हूतियों ने सऊदी अरब के शहरों और बुनियादी ढांचे पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइल हमलों का दावा किया है। जिबूती युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता यमन के ठीक सामने स्थित जिबूती ने साफ किया है कि वह हूतियों और सऊदी समर्थित यमनी सरकार के बीच युद्ध में शामिल नहीं होना चाहता। हालांकि, जिबूती अफ्रीका के सबसे ज्यादा सैन्य मौजूदगी वाले देशों में से एक है। 2003 से अमेरिका यहां कैंप लेमोनियर नाम का बड़ा सैन्य बेस चला रहा है। यहां चीन का भी बड़ा सैन्य बेस है। सऊदी पर हूतियों के हमले क्यों बढ़े? यह लड़ाई यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब समर्थित यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के बीच है। हूतियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद और ऊर्जा से जुड़ी सुविधाओं को निशाना बनाकर ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमले करने का दावा किया है। इसके जवाब में सऊदी अरब ने यमन के अंदर हूती ठिकानों पर हमले किए हैं। ब्रिटिश सरकार के मुताबिक, जुलाई से हूतियों ने सऊदी अरब के कई शहरों, एयरपोर्ट, सैन्य ठिकानों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है। इनमें अबहा, जिजान, नजरान, ताइफ, जेद्दा और यानबू शामिल हैं। लाल सागर में सऊदी जहाजों को भी निशाना बनाया गया है। इन हमलों में कुछ आम लोगों के घायल होने की बात कही गई है। ब्रिटेन ने इन हमलों की कड़ी निंदा की है। उसका कहना है कि इससे क्षेत्र की स्थिरता और लाल सागर तथा बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही पर खतरा पैदा होता है। 2014 से चल रही है यमन में जंग यमन में 2014 से गृहयुद्ध चल रहा है। सऊदी अरब और हूतियों के बीच 2022 में UN की मध्यस्थता में एक संघर्षविराम हुआ था। लेकिन हाल के महीनों में यह समझौता बुरी तरह टूट गया है। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच मिसाइल, ड्रोन और हवाई हमले फिर बढ़ गए हैं। इस लड़ाई का असर सिर्फ यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं है। बाब-अल-मंदब से होकर गुजरने वाले समुद्री रास्ते के कारण यहां की सुरक्षा का असर लाल सागर के रास्ते होने वाले अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर भी पड़ सकता है। लेकिन इस लड़ाई की सबसे बड़ी कीमत उन लोगों को चुकानी पड़ रही है, जिन्हें अपना घर छोड़कर दूसरे देश में शरण लेनी पड़ रही है। ब्रिटेन पहले भी हूतियों पर हमला कर चुका है ब्रिटेन पहले भी हूती ठिकानों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर चुका है। जनवरी 2024 में ब्रिटेन ने अमेरिका के साथ मिलकर यमन में हूतियों के सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। यह कार्रवाई लाल सागर में व्यापारिक जहाजों पर हूतियों के लगातार हमलों के बाद की गई थी।अभियान में ब्रिटिश RAF टाइफून लड़ाकू विमानों को वॉयजर टैंकर विमानों से हवा में ईंधन दिया गया था। इसके बाद अप्रैल 2025 में भी ब्रिटेन और अमेरिका ने यमन में हूतियों के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान चलाया। इसमें ब्रिटिश RAF टाइफून लड़ाकू विमानों ने हूतियों के ड्रोन बनाने वाली एक जगह को निशाना बनाया था। इस अभियान में भी टाइफून विमानों को वॉयजर टैंकर से हवा में ईंधन दिया गया था। अब ब्रिटेन ने सऊदी अरब की मांग पर फिर वॉयजर टैंकर उपलब्ध कराने का फैसला किया है। यह मदद फिलहाल कुछ हफ्तों के लिए होगी। ——————— ये खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- ट्रम्प सरकार ने हूती विद्रोहियों से सीक्रेट डील की: अमेरिकी जहाजों पर हमला नहीं करेंगे हूती लड़ाके, बदले में सऊदी की मदद नहीं करेगा अमेरिका अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील की है। एक्सिओस की रिपोर्ट के मुताबिक इस पडील के तहत हूतियों ने अमेरिका को भरोसा दिया है कि वे लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। पूरी खबर पढ़ें…

