नवी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर ट्रंप भड़के

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी न्यायविद् नवी पिल्लई को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की कड़ी आलोचना करते हुुए दावा किया कि कई अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में अपनी भूमिका के कारण वे इस पुरस्कार के हकदार थे।

श्री ट्रंप ने शुक्रवार देर रात सोशल मीडिया पर लगभग 600 शब्दों की एक पोस्ट में इस साल की विजेता नवी पिल्लई की योग्यता पर सवाल उठाए और उन पर इज़राइल का विरोध करने का आरोप लगाया। श्री ट्रंप ने लिखा, “मैं इस महिला के बारे में कुछ नहीं जानता और कोई और भी नहीं जानता! मुझे नहीं पता कि इस महिला ने क्या किया है।”

गौरतलब है कि भारतीय मूल की श्रीमती पिल्लई अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश और मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र की पूर्व उच्चायुक्त रह चुकी हैं और उन्हें शांति एवं अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए यह पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है। उन्होंने कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों पर संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग की अध्यक्षता भी की है।

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श्रीमती पिल्लई ने पुरस्कार मिलने पर कहा कि विश्व नेताओं की ‘मानवाधिकारों की रक्षा करने और युद्ध से दूर रहने की कानूनी जिम्मेदारी’ है। श्री ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने आठ युद्ध सुलझाए हैं और दो और को सुलझाने के करीब हैं। उन्होंने ईरान से जुड़े विवादों और यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध का जिक्र किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, “मैंने आठ युद्ध सुलझाए और जिन देशों की मैंने मदद की, उनके राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों ने नॉर्वेजियन नोबेल समिति को पत्र भेजे।”

उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का विशेष रूप से जिक्र करते हुए कहा कि इसे सुलझाने के उनके अकेले के प्रयास ही यह सम्मान पाने के लिए काफी होने चाहिए थे। श्री ट्रंप ने कहा, “असल में मुझे आठ नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे, न कि सिर्फ़ एक।” श्री ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र की भी आलोचना की और दावा किया कि जिन विवादों का उन्होंने जिक्र किया, उन्हें सुलझाने में संयुक्त राष्ट्र की कोई भूमिका नहीं है।

उन्होंने लिखा, “जिन सभी युद्धों को मैंने सुलझाया, उनमें मैंने कभी संयुक्त राष्ट्र से बात नहीं की-उनसे कोई मदद नहीं मिली।” उन्होंने कहा कि अमेरिका को, जिसका प्रतिनिधित्व उन्होंने किया, यह पुरस्कार मिलना चाहिए था। श्री ट्रंप ने इस फैसले को लेकर नॉर्वे पर भी निशाना साधा, जबकि नॉर्वे खुद नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देता है। यह सम्मान नॉर्वेजियन नोबेल समिति द्वारा चुना जाता है। उन्होंने लिखा, “यह नॉर्वे पर एक ऐसा अमिट दाग है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।” उन्होंने इस पुरस्कार को ‘हमेशा के लिए बदनाम’ करार दिया और इसके लिए ‘लोकतंत्र-विरोधी और सभ्यता के दुश्मन कट्टरपंथी विचारकों’ को जिम्मेदार ठहराया।

Pic Credit : UNI

भारतवंशी नवनीतम पिल्लै को शांति का नोबेल

ओस्लो। नॉर्वे की नोबेल समिति ने 2026 के शांति पुरस्कार का ऐलान कर दिया है। इस वर्ष यह पुरस्कार भारतवंशी नवनीतम नवी पिल्लै को दिया जाएगा। दक्षिण अफ्रीका में जन्मीं पिल्लै ने रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाले नेल्सन मंडेला समेत कई लोगों की मदद की थी। पिल्लै को युद्ध अपराध और नरसंहार के दोषियों को सजा दिलाने और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के प्रयासों के लिए यह सम्मान दिया गया है।

नोबेल समिति ने पुरस्कार की घोषणा करते हुए कहा है कि दुनिया में युद्ध और संघर्ष बढ़ रहे हैं। ऐसे में शांति बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना और उसे मजबूत करना बेहद जरूरी है। पुरस्कार मिलने के बाद पिल्लै ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर मजाकिया अंदाज में तंज किया। जब उनके साथियों ने पुरस्कार मिलने पर तालियां बजाईं, तो पिल्लै ने मजाक में कहा, ‘अगर आप थोड़ी और तालियां बजाएंगे, तो शायद मैं यह पुरस्कार ट्रंप के साथ बांट लूं’।

नोबेल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष योर्गेन वाट्ने फ्राइडनेस ने कहा कि इस साल के पुरस्कार के जरिए समिति दुनिया को याद दिलाना चाहती है कि देश हो या दुनिया कानून का पालन करना जरूरी है। इसी से व्यवस्था चलती है और विवादों को बिना हिंसा के सुलझाया जा सकता है।

बहरहाल, नवनीतम नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था। उनका परिवार भारतीय तमिल मूल का है। उनके दादा 1890 के दशक में भारत से बंधुआ मजदूर बनकर दक्षिण अफ्रीका गए थे। वहां वे गन्ने के खेतों में काम करते थे। उनके बेटे नारायणसामी नायडू के परिवार में 1941 में पिल्लै का जन्म हुआ। वह आठ बच्चों वाले परिवार में पांचवें नंबर पर थीं।

अमेरिका ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट पर प्रतिबंध लगाए:रुबियो बोले- धमकी देना बंद करे, वरना खत्म कर देंगे; नेतन्याहू के खिलाफ अरेस्ट वारंट से नाराज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सरकार ने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि कोर्ट अमेरिका के खिलाफ कार्रवाई करना बंद करे, वरना अमेरिका उसे खत्म करने की कोशिश करेगा। अमेरिका कोर्ट से इसलिए भी नाराज है, क्योंकि उसने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू समेत कई इजराइली अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए हैं। अमेरिकी सरकार का आरोप है कि कोर्ट अमेरिकी और इजराइली नागरिकों को गलत तरीके से निशाना बना रहा है। कोर्ट बोला- प्रतिबंधों से काम नहीं रुकेगा ICC की डिप्टी प्रॉसिक्यूटर नजहत शमीम खान ने अमेरिकी प्रतिबंधों की निंदा की। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून और एक स्वतंत्र अदालत के काम को कमजोर करने की कोशिश है। खान ने साफ किया कि प्रतिबंधों के बावजूद कोर्ट अपनी जांच और कानूनी कार्रवाई जारी रखेगा। अमेरिका ने ICC पर प्रतिबंध ऐसे दिन लगाए, जब दक्षिण अफ्रीका की पूर्व न्यायाधीश नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान हुआ। पिल्लै 2003 से 2008 तक ICC की अपील चैंबर में जज रही थीं। हालांकि, अमेरिका ने प्रतिबंध लगाने की योजना नोबेल पुरस्कार की घोषणा से काफी पहले बना ली थी। अमेरिकी कंपनियों पर भी पड़ सकता है असर अमेरिकी प्रतिबंधों का असर उन कंपनियों पर भी पड़ सकता है, जो ICC को सेवाएं देती हैं। अमेरिकी कंपनियों को कोर्ट के साथ कारोबार करने से रोका जा सकता है। इससे उसकी बैंकिंग, बीमा और सॉफ्टवेयर सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। प्रतिबंधों की आशंका को देखते हुए ICC ने पहले से तैयारी शुरू कर दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेयर की जगह दूसरे विकल्प अपनाने और बैंकिंग व स्वास्थ्य बीमा के लिए नए इंतजाम करने शुरू कर दिए थे। अमेरिका ने सहयोगी देशों से भी दबाव बनाने को कहा रुबियो ने कहा कि अमेरिका ने ICC और उसके सदस्य देशों को अपनी चिंताओं का समाधान करने का मौका दिया था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने अमेरिका के सहयोगी देशों से भी कोर्ट पर लगाम लगाने को कहा। रुबियो के मुताबिक, प्रतिबंधों के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखा गया है। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकला, तो अमेरिका आगे और कदम उठा सकता है। क्या है इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट की स्थापना 2002 में हुई थी। यह युद्ध अपराध, मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध और नरसंहार जैसे मामलों की सुनवाई करता है। इसके 125 सदस्य देश हैं। यूरोपीय संघ के सभी देश इसके सदस्य हैं, लेकिन अमेरिका खुद इस कोर्ट का सदस्य नहीं है। ————————– ये खबर भी पढ़े़ं… वेंस बोले-वीजा लेकर अमेरिका में काम करने वाले बंधुआ मजदूर:भारत का जवाब- अमेरिकी अर्थव्यवस्था यही संभाल रहे; H-1B वीजा लेने वालों मे 71% भारतीय अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने H-1B वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को ‘बंधुआ मजदूर’ बताया है। उन्होंने यह बयान गुरुवार को 8 IT कंपनियों को ग्रीन कार्ड से जुड़े PERM प्रोग्राम से सस्पेंड किए जाने पर दिया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Nobel Peace Prize 2026: भारतीय मूल की नावी पिल्लई को मिला शांति का नोबेल, जानें कौन हैं और क्यों चुनी गईं

दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर से निकलकर अंतरराष्ट्रीय न्याय के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाली  नावी पिल्लई  को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार देने का ऐलान किया गया है। नॉर्वे की नोबेल समिति ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर को नवनेथम ‘नावी’ पिल्लई को शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों के लिए चुना। भारतीय तमिल मूल के परिवार में जन्मीं पिल्ले ने अपने करियर में भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम किया। उनका सफर इस बात की मिसाल है कि कानून के जरिए भी अन्याय के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ी जा सकती है।

रंगभेद के दौर में शुरू हुआ संघर्ष

नावी पिल्लई का जन्म दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में एक भारतीय तमिल मूल के परिवार में हुआ था। उस समय देश में रंगभेद की व्यवस्था लागू थी, जिसमें नस्ल के आधार पर लोगों के अधिकार और अवसर तय होते थे। ऐसे माहौल में पिल्ले ने कानून का रास्ता चुना और वकील के रूप में उन लोगों के अधिकारों की पैरवी की, जिन्हें भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता था।

उनके करियर का एक अहम हिस्सा रंगभेद का विरोध करने वाले लोगों को कानूनी सहायता देना रहा। उन्होंने नेल्सन मंडेला और अन्य रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं के समर्थन में काम किया। आगे चलकर उनका योगदान दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्याय और मानवाधिकारों के क्षेत्र तक पहुंचा।

अंतरराष्ट्रीय न्याय और जवाबदेही पर जोर

नोबेल समिति के अनुसार, नवी पिल्ले ने अपने लंबे करियर में हिंसा और संघर्ष से प्रभावित लोगों को न्याय दिलाने की दिशा में काम किया। उन्होंने सरकारों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह ठहराने के प्रयास किए। उनके काम में अंतरराष्ट्रीय कानून के महत्व और मानवाधिकारों की रक्षा पर खास जोर रहा।

गाजा पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को लेकर भी चर्चा में रहीं

नावी पिल्लई संयुक्त राष्ट्र के उस जांच आयोग की अध्यक्ष भी रहीं, जिसने फिलिस्तीनी क्षेत्र में इजरायल की कार्रवाई की जांच की थी। आयोग ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला कि इजरायल ने गाजा में नरसंहार किया है। हालांकि, इजरायल ने इस रिपोर्ट को खारिज करते हुए इसे ‘निंदनीय’ बताया था। इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक बहस को जन्म दिया।

कब मिलेगा नोबेल शांति पुरस्कार और कितनी है इनामी राशि?

नावी पिल्लई को यह सम्मान 10 दिसंबर 2026 को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में प्रदान किया जाएगा। यह तारीख स्वीडिश उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि है, जिन्होंने अपनी वसीयत के जरिए इन पुरस्कारों की शुरुआत की थी।

नोबेल शांति पुरस्कार के साथ 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर यानी लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर की राशि दी जाती है।  नावी पिल्लई का चयन मानवाधिकारों, न्याय और अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में उनके योगदान को वैश्विक पहचान देता है।

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PoK के लोग बोले-हमें भारत का रास्ता दो, तारबंदी हटाओ:115 दिन से जारी ‘आजादी आंदोलन’ तेज, प्रदर्शनकारी एलओसी के पास जमा

पीओके (पाक के कब्जे वाले कश्मीर) में आजादी की आवाजें तेज हो गई हैं। एलओसी (नियंत्रण रेखा) से लगभग 7 किमी दूर मंधोल में 25 हजार लोगों का हुजूम आंदोलन पर बैठा है। पाक आर्मी चीफ आसिम मुनीर और पाक पीएम शहबाज शरीफ के खिलाफ नारे गूंज रहे हैं। जॉइंट अवामी लीग (जेएएल) के नेता अब आर-पार के लिए कमर कस चुके हैं। उन्होंने दो टूक ऐलान किया है कि पाक सरकार को पुंछ और मेंढर का रास्ता खोलना होगा। ये रास्ता भारत की ओर जाता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हम भारत से मिलना चाहते हैं। पाक हुकूमत ने प्रदर्शनों के कारण पीओके की सप्लाई लाइन को काट दिया है। लोगों के पास आटा और खाने का सामान नहीं है। 5 जून से पीओके में जारी आंदोलन के 115वें दिन सोमवार को मंधोल के इलाके में खासी गहमागहमी रही। पीओके के मुजफ्फराबाद से अब लोग एलओसी के पास जमा होने लगे हैं। जेएएल के नेताओं की अपील पर रोज एलओसी पर हुजूम बढ़ रहा है। लोगों का कहना है कि पाक हुकूमत का दमन अब उनके इरादों को डिगा नहीं पाएगा। पाकिस्तान ने बरसों तक उनके हकों को दबाया है, लेकिन अब इंतेहा हो चुकी है। फैसला होकर रहेगा। आईएसआई की ‘डाला ब्रिगेड’ की जीपें अब पीओके में फेल हो रही हैं पीओके में अब क्या हालात? खुफिया एजेंसी आईएसआई की डाला ब्रिगेड यानी वो जीपें जिनमें लोगों को गिरफ्तार कर डाला जाता था, वो अब फेल हो रही हैं। हालात ये हो गए हैं कि आईएसआई के एजेंट इन्हें लेकर जाने से घबराने लगे हैं। पीओके के प्रदर्शनकारी इन पर पथराव करते हैं। आर्मी चीफ मुनीर क्या करेंगे? पाक आर्मी चीफ मुनीर के लिए पीओके को कब्जे में रखना बेहद जरूरी है। इसके लिए वे गुपचुप पीओके में अपने फौजियों को भेज रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत पाक आर्मी अपने सैनिकों को पीओके में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ नहीं उतार सकती है। क्या पीओके खुल पाएगा? पाक आर्मी जेएएल के आंदोलन को कुचलने में विफल रही है। लेकिन पीओके के हालात ऐसे है कि वहां के लोग अब पाक हुकूमत के जुल्मों को और ज्यादा नहीं सहने वाले हैं। पीओके का खुल पाना काफी हद तक लोगों के आंदोलन की तीव्रता पर निर्भर करेगा। 1948 के कबाइली हमले के दौरान बने पीओके के दौर को बदला भी जा सकता है। पीओके सरकार क्या करेगी? पीओके में 27 जुलाई को स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद चुनाव कराए गए। पूर्व पीएम नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएलएन आर्मी के साथ सांठगांठ कर सरकार बनाने में कामयाब रही है। लेकिन हालात ये है कि यहां की कैबिनेट के लोग आंदोलनकारियों के सामने जाने से कतरा रहे हैं। विरोध के बाद भी चुनाव, नवाज शरीफ की पार्टी जीती

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ईरान के लिए ‘सीक्रेट हथियार’ बना रहा चीन! रिपोर्ट में हुए खुलासे से अमेरिका में हड़कंप

China Secret Support to Iran: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच चीन एक तरफ तो खुद को शांतिदूत के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्दे के पीछे से ईरान की आर्थिक और सैन्य ताकत बढ़ाने में लगा हुआ है। एक खोजी रिपोर्ट ने इस पूरे मामले से पर्दा उठाया है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन, ईरान के लिए एक खास ‘सीक्रेट हथियार’ भी बना रहा है।

अमेरिकी अखबार ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ (WSJ) की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से ईरान के रक्षा मंत्रालय को भेजे जाने वाले ‘डुअल-यूज’ पार्ट्स यानी दोहरे इस्तेमाल वाले घटकों की डिलीवरी में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। ईरानी सीमा शुल्क डेटा, अमेरिकी अधिकारियों और इस गुप्त व्यापार से जुड़े लोगों के हवाले से आई इस रिपोर्ट से कई अहम सवाल खड़े हो रहे हैं। चीन और अमेरिका के शीर्ष नेताओं की मुलाकात के बीच इस खुलासे ने वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।

चीन से क्या-क्या मिल रहा है ईरान को?

‘डुअल-यूज’ पार्ट्स वे सामान होते हैं जिनका उपयोग आम नागरिक उपकरणों के साथ-साथ खतरनाक हथियारों में भी किया जा सकता है। WSJ रिपोर्ट के मुताबिक, चीन से ईरान भेजे गए सामान में ये प्रमुख चीजें शामिल हैं:

इलेक्ट्रॉनिक्स और जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण: जो मिसाइलों की सटीक निशाना लगाने की क्षमता बढ़ाते हैं।

इलेक्ट्रिक मोटर और एयरक्राफ्ट इंजन पार्ट्स: जिनका सीधा इस्तेमाल सैन्य ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम में होता है।

रासायनिक सामग्री: जिसका इस्तेमाल बैलिस्टिक मिसाइल के फ्यूल बनाने में किया जा सकता है।

उपग्रह तस्वीरें: अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि 17 जुलाई के उस हमले से पहले और बाद में ईरान ने चीनी सैटेलाइट इमेजरी का इस्तेमाल किया, जिसमें तीन अमेरिकी सैनिक मारे गए थे।

कार्गो फ्लाइट्स में अचानक उछाल: ‘महान एयर’ का संदिग्ध रोल

फ्लाइट ट्रैकिंग साइट ‘FlightRadar24’ के डेटा के मुताबिक, अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित ईरानी एयरलाइन महान एयर ने मार्च के महीने में चीन के बीजिंग, शंघाई और गुआंगझू से तेहरान के लिए हर हफ्ते सिर्फ 4 उड़ानें भरी थीं।

लेकिन अप्रैल के अंत तक यह संख्या बढ़कर 27 उड़ानें प्रति सप्ताह हो गई। सितंबर 2026 के पहले हफ्ते में महान एयर की फ्लाइट्स की संख्या 39 तक पहुंच गई। इन अधिकांश उड़ानों का इस्तेमाल यात्रियों को ले जाने के बजाय गुप्त सैन्य और तकनीकी कार्गो (हथियारों के पुर्जों) की डिलीवरी के लिए किया जा रहा था।

अमेरिकी पाबंदियों को दरकिनार कर खेल कर रहा तेल का ‘मास्टरमाइंड’

अमेरिकी पाबंदियों से पंगु हो चुकी ईरानी अर्थव्यवस्था को चीन संजीवनी दे रहा है। अमेरिकी सांसदों के अनुसार, चीन ईरान के क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट का 80% से ज्यादा हिस्सा खुद खरीद रहा है। अमेरिकी वित्तीय पाबंदियों को चकमा देने के लिए चीनी बैंकों और छद्म कंपनियों के नेटवर्क का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे तेहरान तक पैसा आसानी से पहुंच रहा है।

16 सितंबर को बीजिंग में हुई बैठक में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने साफ शब्दों में कहा था कि चीन और ईरान ‘व्यापक रणनीतिक भागीदार’ हैं और चीन ईरान के ‘वैध अधिकारों और हितों’ की रक्षा के लिए सहयोग मजबूत करने को तैयार है।

ट्रंप-जिनपिंग की मीटिंग के बीच अमेरिकी सियासत में भूचाल

वाशिंगटन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद एयरपोर्ट जाकर उनका स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच व्यापार, एआई सुरक्षा और ताइवान जैसे मुद्दों पर चर्चा होनी है, लेकिन अमेरिकी संसद में ईरान का मुद्दा सबसे ऊपर आ गया है।

सीनेटर एलिसा स्लॉटकिन समेत कई डेमोक्रेट नेताओं ने व्हाइट हाउस को पत्र लिखकर मांग की है कि राष्ट्रपति ट्रंप, शी जिनपिंग के सामने चीन की इस ‘सैन्य मदद’ का मुद्दा सख्ती से उठाएं। सीनेटरों ने आरोप लगाया कि चीनी कंपनियां अमेरिकी सैनिकों की हत्या और ईरान के मिसाइल प्रोग्राम को जिंदा रखने में मदद कर रही हैं।

हालांकि, ट्रंप प्रशासन चीन से सीधे टकराने में थोड़ा हिचकिचा रहा है। ट्रंप पहले कह चुके हैं कि शी जिनपिंग ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वे ईरान को सीधे हथियार नहीं देंगे और वे शी पर भरोसा करते हैं।

चीन की सफाई: ‘हमारी छवि खराब करने की कोशिश’

इन गंभीर आरोपों पर चीन के विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। बीजिंग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि यह ‘चीन को बदनाम करने की साजिश’ है। चीन का तर्क है कि वह दोहरे उपयोग वाले सामानों के निर्यात पर सख्त नियम लागू करता है और अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं।

ईरान में अमेरिकी हमला युद्ध अपराध हो सकता है:UN रिपोर्ट में गर्ल्स स्कूल पर हमले का जिक्र; पुतिन के बाद अब ट्रम्प की जवाबदेही पर सवाल

ईरान पर फरवरी में हुए अमेरिका हमलों को लेकर UN की जांच रिपोर्ट गुरुवार को सामने आई। UN की स्वतंत्र जांच टीम ने कहा कि उसके पास यह मानने की पर्याप्त वजह है कि मिनाब के गर्ल्स स्कूल और एक स्पोर्ट्स सेंटर पर हमले अमेरिकी सेना ने किए थे। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों हमले अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध हो सकते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर युद्ध अपराध के आरोप लगे थे। इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने 2023 में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। अब UN की रिपोर्ट के बाद ट्रम्प की किसी तरह की व्यक्तिगत जिम्मेदारी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ईरान में अमेरिका के 2 हमलों की UN ने जांच की पहला- मिनाब गर्ल्स स्कूल पर हमले में 120 बच्चों की मौत मिनाब स्कूल पर हमले के बाद की तस्वीरें… दूसरा- स्पोर्ट्स सेंटर पर हमले में 22 नागरिक मारे गए UN की रिपोर्ट के बाद अब क्या होगा? रिपोर्ट अभी किसी अदालत का फैसला नहीं है। इसे UN मानवाधिकार परिषद में रखा जाएगा। इसके बाद आगे जांच और कार्रवाई की मांग उठ सकती है। अमेरिका से भी पूछा जा सकता है कि स्कूल को सैन्य ठिकाना क्यों माना गया और हमला करने से पहले खुफिया जानकारी की ठीक से जांच क्यों नहीं हुई। आगे की जांच में पता लगाया जाएगा कि हमले का फैसला किसने लिया और किस जानकारी के आधार पर लिया। अगर किसी अधिकारी की गंभीर गलती या जानबूझकर की गई कार्रवाई सामने आती है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई या मुकदमा हो सकता है। क्या ट्रम्प भी जिम्मेदार माने जाएंगे? UN की रिपोर्ट में अमेरिकी सेना पर युद्ध अपराध का आरोप है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रम्प भी इसके लिए सीधे जिम्मेदार माने जाएंगे। इसके लिए यह देखना होगा कि ट्रम्प ने हमले का आदेश दिया था या नहीं, उन्हें इसकी जानकारी थी या नहीं और उन्हें हमला रोकने की जानकारी या ताकत थी या नहीं। पहले जांच में हमले के लिए जिम्मेदार सैन्य अधिकारियों की भूमिका सामने आएगी। उसके बाद ही यह देखा जाएगा कि ट्रम्प की इसमें कोई भूमिका थी या नहीं। ईरान की सरकार पर भी गंभीर आरोप UN की जांच में ईरानी सरकार की कार्रवाई को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जांच टीम के मुताबिक, दिसंबर के आखिर में शुरू हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों को दबाने के दौरान ईरानी अधिकारियों ने गैरकानूनी हत्याएं, मनमानी गिरफ्तारियां और लोगों को जबरन गायब करने जैसी कार्रवाइयां कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने प्रदर्शनकारियों की आवाज दबाने के लिए इंटरनेट बंद किया और मौत की सजा का भी इस्तेमाल किया। UN टीम ने कहा कि ईरानी अधिकारियों की कार्रवाई आम नागरिकों के खिलाफ व्यापक और सुनियोजित हमले का हिस्सा थी। जांच के मुताबिक, यह मानवता के खिलाफ अपराध की श्रेणी में आ सकता है। ————————- यह खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश में टॉर्च की रोशनी में मरीजों का इलाज: 20 साल का सबसे बड़ा बिजली संकट; भारत पहले ही ज्यादा बिजली दे रहा, मदद मुश्किल बांग्लादेश इस समय 20 साल के सबसे गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है। कई इलाकों में रोजाना घंटों कटौती हो रही है। पूरी खबर पढ़ें…

सऊदी ने मक्का के पास हूती ड्रोन मार गिराया:यह इस्लाम का सबसे पवित्र शहर; हूती बोले- मक्का को कोई खतरा नहीं

सऊदी अरब के एयर डिफेंस सिस्टम ने मंगलवार को मक्का के दक्षिण में एक हूती ड्रोन को इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने बुधवार को बताया कि ड्रोन को मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होने से पहले ही मार गिराया गया। सैन्य गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल-मलिकी ने कहा कि इस्लाम के पवित्र स्थलों और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सऊदी अरब के लिए रेड लाइन है। उन्होंने कहा कि गठबंधन हूतियों के खिलाफ जरूरी कदम उठाएगा। वहीं हूति विद्रोहियों ने मक्का या दूसरे पवित्र स्थलों को निशाना बनाने की बात से इनकार किया है। हूतियों की समाचार एजेंसी SABA के मुताबिक, संगठन से मक्का या अन्य पवित्र स्थलों को कोई खतरा नहीं है। मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर मक्का इस्लाम का सबसे पवित्र शहर है। यहां मुस्लिमों के प्रमुख पवित्र स्थल हैं और हर साल दुनिया भर से लाखों लोग हज के लिए पहुंचते हैं। अल-मलिकी ने इस घटना को मक्का को निशाना बनाने की हूतियों की दूसरी कोशिश बताया। इससे पहले जुलाई 2017 में गठबंधन ने हूतियों पर मक्का की ओर बैलिस्टिक मिसाइल दागने का आरोप लगाया था। इस्लामिक देशों के संगठन ने हूती हमलों को आतंकवाद बताया इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) ने मक्का और मदीना क्षेत्र में हूती हमलों की निंदा की है। संगठन ने कहा कि पवित्र जगहों, मस्जिदों और आम लोगों के ठिकानों पर हमला करना आतंकवाद है। ऐसी कार्रवाई इस्लाम की सीख और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है। यमन में तनाव के बाद सऊदी में हमले ईरान से जुड़े हूतियों का आरोप है कि सऊदी अरब यमन में हवाई हमले कर रहा है और क्रूज मिसाइलें दाग रहा है। यमन के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्सों में हूती लड़ाकों और सऊदी समर्थित सरकारी बलों के बीच भारी लड़ाई चल रही है। इसी बीच हूतियों ने यमन के पश्चिमी लाल सागर तट पर तेजी से अपना कब्जा बढ़ाया है। उन्होंने सोमवार को इस इलाके में दो और द्वीप ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश पर भी कब्जा कर लिया। ये दोनों द्वीप बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में स्थित हैं। हूतियों ने पिछले हफ्ते सऊदी एयरबेस पर हमले का दावा किया हूतियों ने पिछले एक हफ्ते सऊदी अरब के खिलाफ कई हमलों का दावा किया है। सोमवार को संगठन ने एक एयरबेस को निशाना बनाने की बात कही थी। हूतियों के मुताबिक, यह कार्रवाई यमन पर हुए हवाई हमलों के जवाब में की गई। ————— ये खबर भी पढ़ें… मक्का में पहली बार मिसाइल अटैक का इमरजेंसी अलर्ट:हूती विद्रोहियों ने सऊदी पर हमला किया; 2017 में भी मक्का की ओर आई थी मिसाइल यमन के हूती विद्रोहियों ने मंगलवार को सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए। इसके बाद सऊदी अरब ने मक्का में पहली बार इमरजेंसी अलर्ट जारी किया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अमेरिका ने पहली बार माना- स्पेस में हथियार तैनात किए:कौन से वेपन, कब भेजे गए अभी सीक्रेट, अंतरिक्ष में युद्ध का खतरा बढ़ा

अमेरिका ने पहली बार माना है कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं। अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने सोमवार इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका के पास ऑर्बिट में ऐसे हथियार हैं, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर अमेरिकी सैनिकों को दुश्मन के हमले से बचाने के लिए किया जा सकता है। अमेरिकी अधिकारी ने यह नहीं कहा कि ये हथियार आखिर किस तरह के हैं, कितने हैं और इन्हें कब अंतरिक्ष में भेजा गया था। अमेरिका का यह खुलासा ऐसे समय हुआ है, जब अमेरिका, रूस और चीन के बीच अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने की होड़ चल रही है। इससे अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ और तेज होने की आशंका भी बढ़ गई है। रूस-चीन के लिए क्यों अहम है यह खुलासा? अमेरिका लंबे समय से रूस और चीन की बढ़ती अंतरिक्ष सैन्य ताकत को लेकर चिंता जताता रहा है। आज के युद्ध में सैटेलाइट बहुत जरूरी हो गए हैं। सेनाएं इनका इस्तेमाल आपस में संपर्क करने, रास्ता पता करने, खुफिया जानकारी जुटाने और मिसाइलों पर नजर रखने जैसे कामों में करती हैं। ऐसे में अगर किसी देश के सैटेलाइट पर हमला होता है तो उसकी सैन्य ताकत कमजोर हो सकती है। इसलिए बड़ी सैन्य ताकतें अब सिर्फ नए सैटेलाइट बनाने पर ही ध्यान नहीं दे रही हैं। वे अपने सैटेलाइट को दुश्मन के हमले से बचाने और जरूरत पड़ने पर दूसरे देश के अंतरिक्ष सिस्टम को रोकने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं। अमेरिका का दावा- रूस अंतरिक्ष में हमले की तैयारी कर रहा अमेरिकी स्पेस फोर्स का कहना है कि रूस अंतरिक्ष को भी युद्ध का हिस्सा मानता है। यानी भविष्य में अगर रूस का किसी देश से बड़ा युद्ध होता है तो वह अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरी तकनीक का इस्तेमाल भी कर सकता है। अमेरिकी अधिकारियों ने रूस के कुछ सैटेलाइट को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि रूस ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है, जिससे जरूरत पड़ने पर दूसरे देशों के सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके और अपने सैटेलाइट को बचाया जा सके। अमेरिका को रूस के अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने की संभावित तैयारी की भी चिंता है। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि रूस ऐसा हथियार बना सकता है, जिससे एक साथ बड़ी संख्या में सैटेलाइट को नुकसान पहुंचाया जा सके। अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ सेना ही नहीं, बल्कि आम लोगों पर भी असर पड़ सकता है। सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं पर असर पड़ने से नेविगेशन, संचार, मौसम की जानकारी और दूसरी जरूरी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। हालांकि, रूस ने अंतरिक्ष में परमाणु हथियार विकसित करने के इन अमेरिकी आरोपों से इनकार किया है। चीन भी तेजी से बढ़ा रहा अंतरिक्ष में ताकत बढ़ा रहा अमेरिका का कहना है कि चीन भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। चीन अपनी सेना को आधुनिक बनाने के तहत ऐसी तकनीक विकसित कर रहा है, जिसका इस्तेमाल अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट और दूसरे सिस्टम को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। अमेरिका चीन की बढ़ती सैन्य और अंतरिक्ष ताकत को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन की हाइपरसोनिक मिसाइलों को लेकर भी चिंता जताई है। ये मिसाइलें बहुत तेज गति से उड़ सकती हैं और इन्हें पकड़ना मुश्किल माना जाता है। इसी माहौल में अमेरिका का यह मानना कि उसने अंतरिक्ष में हथियार तैनात कर रखे हैं, यह दिखाता है कि वह भी अंतरिक्ष में अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है। जरूरत पड़ने पर इन हथियारों का इस्तेमाल दुश्मन के हमले से अमेरिकी सैनिकों और उसके अंतरिक्ष सिस्टम को बचाने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में कौन से हथियार तैनात किए गए हैं और वे कितने ताकतवर हैं। उनकी असली क्षमता अभी गुप्त रखी गई है। अंतरिक्ष में युद्ध हुआ तो असर धरती पर भी पड़ेगा अगर अंतरिक्ष में अमेरिका, रूस या चीन के बीच सैन्य टकराव होता है तो उसका असर सिर्फ सेनाओं और सैटेलाइट तक सीमित नहीं रहेगा। आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो सकती है। आज मौसम का पता लगाने, प्राकृतिक आपदाओं पर नजर रखने, रास्ता खोजने और दूर-दूर तक संपर्क बनाए रखने जैसे कई काम सैटेलाइट की मदद से होते हैं। GPS जैसी सेवाओं से विमान, जहाज और ट्रक अपना रास्ता तय करते हैं। बैंकिंग और दूसरे वित्तीय कामों में भी सटीक समय और संचार के लिए सैटेलाइट से मिलने वाली सेवाओं की जरूरत पड़ती है। ऐसे में अगर बड़ी संख्या में सैटेलाइट खराब हो जाते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचता है तो मोबाइल और दूसरे संचार नेटवर्क, नेविगेशन, मौसम की जानकारी और कई जरूरी सेवाओं पर असर पड़ सकता है। यानी अंतरिक्ष में हथियारों की बढ़ती होड़ सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन की सैन्य ताकत का मामला नहीं है। अगर अंतरिक्ष में बड़ा टकराव होता है तो उसका असर दुनिया भर के आम लोगों तक पहुंच सकता है। 1967 की संधि ने परमाणु हथियारों पर लगाई थी रोक अंतरिक्ष में हथियार तैनात करने के अमेरिकी खुलासे के बीच 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी भी चर्चा में आ गई है। अमेरिका, सोवियत संघ और कई दूसरे देशों ने करीब 60 साल पहले यह संधि की थी। इसका मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और सामूहिक विनाश के दूसरे हथियारों की तैनाती से बचाना था। संधि के तहत पृथ्वी की कक्षा में परमाणु हथियार या दूसरे सामूहिक विनाश के हथियार रखने पर रोक लगाई गई है। हालांकि, इसमें हर तरह के पारंपरिक हथियारों को अंतरिक्ष में तैनात करने पर पूरी तरह रोक नहीं है। इसलिए अमेरिका के मौजूदा बयान से सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने इस संधि का उल्लंघन किया है। लेकिन अमेरिका ने अभी यह नहीं बताया है कि ऑर्बिट में तैनात किए गए ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ किस श्रेणी के हथियार हैं। इसलिए इनकी वास्तविक प्रकृति सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के लिहाज से इनकी स्थिति क्या है। ट्रम्प के दौर में अंतरिक्ष पर बढ़ा फोकस ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने अंतरिक्ष को अपनी सुरक्षा के लिए और ज्यादा अहम बना दिया है। ट्रम्प अमेरिका की अंतरिक्ष ताकत बढ़ाने और मिसाइलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी ‘गोल्डन डोम’ मिसाइल डिफेंस योजना भी इसी का हिस्सा है। इस योजना का मकसद अमेरिका को अलग-अलग तरह की मिसाइलों के हमले से बचाना है। इसके लिए जमीन के साथ-साथ अंतरिक्ष में मौजूद तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। मिंक ने सोमवार को बताया कि अमेरिका ऐसा सिस्टम बनाने पर भी तेजी से काम कर रहा है, जो अंतरिक्ष से मिसाइलों को रोक सके। उन्होंने कहा कि इस प्रोग्राम ने शुरुआती कॉन्ट्रैक्ट मिलने से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर एक साल से भी कम समय में पूरा कर लिया है। हालांकि, मिंक ने यह नहीं बताया कि यह सिस्टम कैसे काम करेगा और इसकी पूरी क्षमता क्या होगी।