NEW US Territory, होर्मुज पर ट्रंप का दावा, अमेरिका-ईरान टकराव ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन

NEW US Territory, होर्मुज पर ट्रंप का दावा, अमेरिका-ईरान टकराव ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को एक बार फिर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर होर्मुज जलडमरूमध्य की एक तस्वीर साझा की, जिसमें इसे “NEW US Territory” यानी “नया अमेरिकी क्षेत्र” बताया गया है। ट्रंप के इस कदम से ईरान के साथ बढ़े तनाव के बीच रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इस समुद्री मार्ग को लेकर अमेरिकी बयानबाजी और तीखी हो गई है।

 

ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका अपना रुख नहीं बदलता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहेगा। ट्रंप ने इससे पहले 18 अगस्त को भी यही तस्वीर साझा की थी। इससे पहले 14 अगस्त को लॉन्ग आइलैंड में एक पुलिस अकादमी में भाषण के दौरान ट्रंप ने कहा था कि वह जल्द ही होर्मुज जलडमरूमध्य को अमेरिका का क्षेत्र घोषित कर सकते हैं।

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ईरान ने ट्रंप के दावे पर किया पलटवार

 

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहन रेजाई ने होर्मुज पर ट्रंप के दावे का जवाब देते हुए कहा कि जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने में अमेरिका की असमर्थता और उस पर अपना अधिकार जताने के दावे के बीच बड़ा विरोधाभास है। रेजाई ने कहा कि फारस की खाड़ी में एक नए ‘पोस्ट-अमेरिकन ऑर्डर’ का स्वागत है। उन्होंने अमेरिकी दबाव के खिलाफ पड़ोसी देशों को भी चेतावनी दी है।

 

ईरान पर नए और कड़े प्रतिबंधों की तैयारी

 

ट्रंप की ताजा पोस्ट ऐसे समय आई है जब अमेरिका ईरान के खिलाफ नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। इससे दोनों देशों के बीच बढ़ते आर्थिक टकराव के और गहराने की आशंका है। ईरान ने प्रस्तावित प्रतिबंधों की निंदा की है। उसका कहना है कि नए प्रतिबंध उसकी अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकते हैं और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों को प्रभावित कर सकते हैं। इनमें चीन सबसे अहम है, जो ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार बना हुआ है।

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अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ईरान के खिलाफ नए प्रतिबंधों की घोषणा कर सकते हैं। उन्होंने इन प्रतिबंधों को “इतिहास के सबसे कड़े प्रतिबंध” बताया है। बेसेंट ने चीन से भी ईरान के तेल निर्यात को लेकर अमेरिका के साथ सहयोग करने का आग्रह किया है।

 

ईरान ने अमेरिकी दबाव को खारिज किया

 

ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने प्रस्तावित अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए कहा कि यह अमेरिकी अधिकार क्षेत्र को उसकी सीमाओं से बाहर लागू करने की कोशिश है। बघाई ने कहा कि इस तरह के द्वितीयक प्रतिबंधों का अंतरराष्ट्रीय कानून में कोई आधार नहीं है। वहीं, मोहन रेजाई ने पड़ोसी देशों को अमेरिका के आर्थिक अभियान में शामिल होने के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि जो देश अमेरिका के आर्थिक युद्ध का हिस्सा बनेंगे, उन्हें ईरान दुश्मन के रूप में देखेगा।

 

होर्मुज जलडमरूमध्य बना टकराव का केंद्र

 

होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। ईरान का कहना है कि यह समुद्री मार्ग बंद है और उसने बिना अनुमति तेल टैंकरों के प्रवेश को लेकर कार्रवाई की चेतावनी दी है। होर्मुज में आवाजाही बाधित होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। फिलहाल केवल कुछ ही कमोडिटी जहाज इस जलमार्ग से गुजर पाए हैं, जबकि बड़े कच्चे तेल के टैंकर और LNG जहाज काफी हद तक यहां से दूर हैं।

ट्रंप बोले-ईरान डील के लिए तैयार हो, तभी होगी बातचीत:नेगोसिएटिंग टीम से वार्ता रोकने को कहा; होर्मुज को लेकर तनाव जारी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी नेगोसिएटिंग टीम से ईरान के साथ वार्ता रोकने को कहा है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प ने यह फैसला तब तक के लिए लिया है, जब तक तेहरान किसी डील के लिए तैयार नहीं हो जाता। अमेरिकी अधिकारी ने अल जजीरा को बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच अब तक सकारात्मक बातचीत हुई थी, लेकिन ट्रम्प ने आगे की बातचीत शुरू करने से पहले इंतजार करने का फैसला किया। ट्रम्प ने मंगलवार को होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए सोशल मीडिया पर मैप पोस्ट किया था। ट्रम्प के पोस्ट के बाद ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का हिस्सा बताना सिर्फ एक गलतफहमी है। पोस्ट में ट्रम्प ने लिखा- नया अमेरिकी क्षेत्र ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर एक ग्राफिक पोस्ट किया, जिसके ऊपर ‘नया अमेरिकी क्षेत्र’ लिखा था। इस मैप में होर्मुज स्ट्रेट और उसके आसपास का समुद्री इलाका दिखाया गया था। इसमें ईरान, ओमान और UAE के हिस्से भी नजर आ रहे थे। ट्रम्प बोले- होर्मुज में नाकाबंदी जारी ट्रम्प ने मंगलवार को होर्मुज को लेकर कहा कि वहां अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी अभी भी पूरी तरह लागू है। होर्मुज खुला है और वहां आवाजाही जारी है। वहीं, ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका के अपना वादा पूरी करने तक ईरान होर्मुज को दोबारा नहीं खोलेगा। ट्रम्प के कहने से होर्मुज अमेरिका का हिस्सा हो जाएगा? सीधा जवाब है- नहीं। होर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ता है। इस रास्ते से दुनिया के कई देशों के तेल और गैस से भरे जहाज गुजरते हैं। इसलिए इस पर सिर्फ किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी देशों के जहाजों को इस रास्ते से आने-जाने का अधिकार है। इसी वजह से कोई भी देश सिर्फ अपने दम पर इस समुद्री मार्ग पर कब्जे का दावा नहीं कर सकता। इसलिए ट्रम्प का मैप एक राजनीतिक दावा या मैसेज माना जा सकता है, लेकिन इससे अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट पर अपने आप कोई नया कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। होर्मुज स्ट्रेट पर किसका अधिकार है? होर्मुज स्ट्रेट का उत्तरी हिस्सा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी हिस्सा ओमान के मुसंदम क्षेत्र से लगता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले जहाज इसी रास्ते से अरब सागर और फिर हिंद महासागर की ओर जाते हैं। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक देश का नहीं, बल्कि कई देशों के लिए अहम समुद्री मार्ग है। अमेरिका यहां अपने युद्धपोत और नौसैनिक बल तैनात रखता है ताकि समुद्री व्यापार और अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। होर्मुज स्ट्रेट इतना अहम क्यों है? खाड़ी देशों से दुनिया को भेजे जाने वाले करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होर्मुज स्ट्रेट से होती है। फरवरी में अमेरिका-ईरान जंग शुरू होने से पहले हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इस रास्ते से होकर गुजरता था। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की एनर्जी सप्लाई काफी हद तक इसी रास्ते पर निर्भर है। इसी वजह से अमेरिका चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही जल्द से जल्द सामान्य हो। दूसरी ओर, ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता और समझौते में किए गए वादे पूरे नहीं करता, तब तक यह रास्ता नहीं खोला जाएगा। ————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प की लोकप्रियता घटी, सिर्फ 33% लोगों की पसंद:ईरान युद्ध के चलते गिरावट; 80% अमेरिकी बोले- जंग लंबी चलेगी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता ईरान युद्ध के बीच लगातार घट रही है। रॉयटर्स/इप्सोस के ताजा सर्वे में सिर्फ 33% अमेरिकियों ने ट्रम्प के कामकाज को मंजूरी दी। पूरी खबर पढ़ें…

ट्रम्प बोले-ईरान डील के लिए तैयार हो, तभी होगी बातचीत:नेगोसिएटिंग टीम से वार्ता रोकने को कहा; होर्मुज को लेकर तनाव जारी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी नेगोसिएटिंग टीम से ईरान के साथ वार्ता रोकने को कहा है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प ने यह फैसला तब तक के लिए लिया है, जब तक तेहरान किसी डील के लिए तैयार नहीं हो जाता। अमेरिकी अधिकारी ने अल जजीरा को बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच अब तक सकारात्मक बातचीत हुई थी, लेकिन ट्रम्प ने आगे की बातचीत शुरू करने से पहले इंतजार करने का फैसला किया। ट्रम्प ने मंगलवार को होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का हिस्सा बताते हुए सोशल मीडिया पर मैप पोस्ट किया था। ट्रम्प के पोस्ट के बाद ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट को अमेरिका का हिस्सा बताना सिर्फ एक गलतफहमी है। पोस्ट में ट्रम्प ने लिखा- नया अमेरिकी क्षेत्र ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर एक ग्राफिक पोस्ट किया, जिसके ऊपर ‘नया अमेरिकी क्षेत्र’ लिखा था। इस मैप में होर्मुज स्ट्रेट और उसके आसपास का समुद्री इलाका दिखाया गया था। इसमें ईरान, ओमान और UAE के हिस्से भी नजर आ रहे थे। ट्रम्प बोले- होर्मुज में नाकाबंदी जारी ट्रम्प ने मंगलवार को होर्मुज को लेकर कहा कि वहां अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी अभी भी पूरी तरह लागू है। होर्मुज खुला है और वहां आवाजाही जारी है। वहीं, ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका के अपना वादा पूरी करने तक ईरान होर्मुज को दोबारा नहीं खोलेगा। ट्रम्प के कहने से होर्मुज अमेरिका का हिस्सा हो जाएगा? सीधा जवाब है- नहीं। होर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच स्थित एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ता है। इस रास्ते से दुनिया के कई देशों के तेल और गैस से भरे जहाज गुजरते हैं। इसलिए इस पर सिर्फ किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी देशों के जहाजों को इस रास्ते से आने-जाने का अधिकार है। इसी वजह से कोई भी देश सिर्फ अपने दम पर इस समुद्री मार्ग पर कब्जे का दावा नहीं कर सकता। इसलिए ट्रम्प का मैप एक राजनीतिक दावा या मैसेज माना जा सकता है, लेकिन इससे अमेरिका को होर्मुज स्ट्रेट पर अपने आप कोई नया कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता। होर्मुज स्ट्रेट पर किसका अधिकार है? होर्मुज स्ट्रेट का उत्तरी हिस्सा ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी हिस्सा ओमान के मुसंदम क्षेत्र से लगता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले जहाज इसी रास्ते से अरब सागर और फिर हिंद महासागर की ओर जाते हैं। इसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक देश का नहीं, बल्कि कई देशों के लिए अहम समुद्री मार्ग है। अमेरिका यहां अपने युद्धपोत और नौसैनिक बल तैनात रखता है ताकि समुद्री व्यापार और अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। होर्मुज स्ट्रेट इतना अहम क्यों है? खाड़ी देशों से दुनिया को भेजे जाने वाले करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होर्मुज स्ट्रेट से होती है। फरवरी में अमेरिका-ईरान जंग शुरू होने से पहले हर दिन करीब 2 करोड़ बैरल तेल इस रास्ते से होकर गुजरता था। भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की एनर्जी सप्लाई काफी हद तक इसी रास्ते पर निर्भर है। इसी वजह से अमेरिका चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही जल्द से जल्द सामान्य हो। दूसरी ओर, ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकाबंदी नहीं हटाता और समझौते में किए गए वादे पूरे नहीं करता, तब तक यह रास्ता नहीं खोला जाएगा। ————– ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प की लोकप्रियता घटी, सिर्फ 33% लोगों की पसंद:ईरान युद्ध के चलते गिरावट; 80% अमेरिकी बोले- जंग लंबी चलेगी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की लोकप्रियता ईरान युद्ध के बीच लगातार घट रही है। रॉयटर्स/इप्सोस के ताजा सर्वे में सिर्फ 33% अमेरिकियों ने ट्रम्प के कामकाज को मंजूरी दी। पूरी खबर पढ़ें…

Red Sea Attack: यमन के पास भारतीय झंडे वाले जहाज पर हमला, 13 भारतीयों समेत सभी 14 क्रू सदस्य सुरक्षित

विदेश मंत्रालय (MEA) ने मंगलवार को यमन के तट के पास लाल सागर (Red Sea) में भारतीय झंडे वाले वाणिज्यिक जहाज MSV Faize Noore Oliya पर हुए हमले की कड़ी निंदा की। हमले के बाद जहाज पलट गया और डूब गया। जहाज पर सवार 13 भारतीय नागरिकों समेत सभी 14 क्रू सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया है। विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि 4 अगस्त 2026 को यमन के तट के पास लाल सागर में भारतीय ध्वज वाले वाणिज्यिक जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद जहाज डूब गया। मंत्रालय ने कहा कि सभी 13 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बचा लिया गया है।

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यमनी कोस्ट गार्ड ने सभी 14 लोगों को बचाया

 

केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि यमनी कोस्ट गार्ड ने सभी 14 नाविकों को सुरक्षित बचा लिया और उन्हें मोखा बंदरगाह (Port of Mokha) पहुंचाया। सोनोवाल के मुताबिक, भारतीय जहाज MSV Faize Noore Oliya को यमनी जलक्षेत्र के पास एक प्रोजेक्टाइल से निशाना बनाया गया। इसके बाद जहाज पलट गया और समुद्र में डूब गया। उन्होंने इस हमले को निहत्थे और असुरक्षित मशीनीकृत नौकायन जहाज पर किया गया हमला बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा कि भारतीय नाविकों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए दिए निर्देश

 

सोनोवाल ने बताया कि उन्होंने Director General Maritime Administration (DGMA) को क्षेत्र में मौजूद भारतीय नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी संबंधित एजेंसियों के साथ तत्काल समन्वय करने के निर्देश दिए हैं।साथ ही, बचाए गए क्रू सदस्यों को हर जरूरी सहायता उपलब्ध कराने के लिए भी कहा गया है।

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रियाद स्थित भारतीय दूतावास कर रहा निगरानी

 

विदेश मंत्रालय ने बताया कि रियाद स्थित भारतीय दूतावास पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर रख रहा है और क्रू सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यमनी अधिकारियों के साथ समन्वय कर रहा है। MEA ने बचाव अभियान में सहायता के लिए यमनी अधिकारियों का भी आभार जताया।

 

लाल सागर में लगातार हो रहे हमलों पर भारत की चिंता

 

विदेश मंत्रालय ने क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों पर लगातार हो रहे हमलों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। मंत्रालय ने कहा कि इस तरह के हमले बंद होने चाहिए और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के जरिए बिना किसी बाधा के नौवहन और व्यापार को जल्द से जल्द बहाल किया जाना चाहिए। भारत ने इस बात पर भी जोर दिया कि क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप समुद्री आवाजाही और व्यापार निर्बाध रूप से जारी रहना चाहिए।

अल हुदायदाह के पास हुआ हमला

 

अनादोलु न्यूज एजेंसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यमन सरकार समर्थित नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज (NRF) के हवाले से बताया गया कि जहाज पर हमला अल हुदायदाह से करीब 13 नॉटिकल मील दक्षिण में हुआ था। हमले के बाद जहाज समुद्र में डूब गया।

 

रिपोर्ट के मुताबिक, यमनी नौसेना और कोस्ट गार्ड ने तत्काल बचाव अभियान चलाया और जहाज पर मौजूद सभी 14 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया। बचाए गए नाविकों को चिकित्सा सहायता भी उपलब्ध कराई गई।

 

Red Sea और Bab al-Mandab को लेकर बढ़ी चिंता

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यह घटना ऐसे समय हुई है जब लाल सागर और बाब-अल-मंदब जलडमरूमध्य में समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। बाब-अल-मंदब एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। क्षेत्र में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर पहले भी कई घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में भारतीय जहाज पर हमले ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग रूट की सुरक्षा को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।

 

Houthis और क्षेत्रीय तनाव का भी असर

 

रिपोर्ट के मुताबिक, यमन के पश्चिमी तट और बाब-अल-मंदब के आसपास सक्रिय नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज (NRF) का नेतृत्व तारेक सालेह करते हैं, जो यमन की प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल के सदस्य हैं। यह घटना क्षेत्र में जारी अन्य तनावों के बीच हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि ईरान समर्थित यमनी हूती समूह ने 20 जुलाई को सऊदी अरब के खिलाफ कथित 'नौसैनिक नाकाबंदी' की घोषणा की थी। इसके बाद रियाद ने अपने जहाजों को निशाना बनाए जाने की किसी भी कोशिश के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी थी।

क्या पाकिस्तान का नक्शा बदलने वाला है और उससे अलग नया देश बन पाएगा बलूचिस्तान? समझिए आजादी के दावे के पीछे कितना दम

Balochistan Claim Explained: रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का दावा करने वाले बलूच समूहों ने 11 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील तेज कर दी है। पाकिस्तान से आजादी का ऐलान करने के बाद बलूचों के इस ग्लोबल कैंपेन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बलूचिस्तान वास्तव में दुनिया का सबसे नया संप्रभु देश बन सकता है और क्या इससे पाकिस्तान का नक्शा बदल जाएगा? इसको लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन चल रहे हैं लेकिन इंटरनेशन कानून और ग्लोबल डिप्लोमेसी का इतिहास बताता है कि सिर्फ स्वतंत्रता का ऐलान कर देने से ही कोई नया देश अस्तित्व में नहीं आ जाता। किसी भी क्षेत्र को नए राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए कूटनीतिक मान्यता, रीजनल कंट्रोल और इंटरनेशनल वैलिडेशन की सबसे बड़ी चुनौतियों से पार पाना होता है।

आजादी का ऐलान केवल पहला कदम, संप्रभुता के लिए क्या हैं नियम?

अंतरराष्ट्रीय कानून किसी भी क्षेत्र या समूह द्वारा खुद को स्वतंत्र घोषित करने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। हालांकि सिर्फ एकतरफा ऐलान कर देने से ऑटोमेटिकली कोई नया देश नहीं बन जाता। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मोंटेवीडियो कन्वेंशन के मानदंडों के मुताबिक किसी क्षेत्र को संप्रभु राज्य के रूप में काम करने के लिए मुख्य रूप से चार शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है-

  • 1 – उस क्षेत्र में एक स्थायी आबादी होनी चाहिए।
  • 2 – उस देश की एक डिफाइंड टेरिटरी और बॉर्डर होना चाहिए।
  • 3 – उस देश में एक प्रभावी सरकार होनी चाहिए।
  • 4 – दूसरे संप्रभु देशों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता होनी चाहिए।

अगर बलूच समूह इनमें से कुछ शर्तों का आंशिक रूप से दावा भी करते हैं तब भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता के बिना कोई भी नया क्षेत्र वैश्विक संस्थाओं का हिस्सा नहीं बन सकता।

कूटनीतिक मान्यता: बलूचिस्तान के राह की सबसे बड़ी रुकावट

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने ग्लोबल कम्युनिटी से संप्रभुता स्वीकार करने की अपील की तो है लेकिन अब तक दुनिया के किसी भी देश ने इसे आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी है। कूटनीतिक मान्यता एक संप्रभु देश द्वारा लिया जाने वाला विशुद्ध राजनीतिक निर्णय होता है। जब तक बलूचिस्तान को अन्य देशों से औपचारिक कूटनीतिक मान्यता नहीं मिलती, तब तक वह संयुक्त राष्ट्र (UN) का सदस्य नहीं बन सकता। इसके अलावा अन्य देशों के साथ सामान्य कूटनीतिक संबंध स्थापित नहीं कर सकता। इसके साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF, विश्व बैंक) का फायदा उसे नहीं मिल सकता।

जमीनी हकीकत: पाकिस्तान का प्रशासनिक व सैन्य नियंत्रण

संप्रभु देश का दर्जा हासिल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण है। भले ही बलूचिस्तान के अलग अलग हिस्सों में अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं लेकिन इस्लामाबाद अभी भी अपने नागरिक प्रशासन, सुरक्षा बलों और न्यायिक प्रणाली के माध्यम से इस पूरे प्रांत पर संवैधानिक और प्रशासनिक नियंत्रण रखता है। जब तक पाकिस्तान का इस प्रांत पर व्यावहारिक और प्रशासनिक नियंत्रण बना रहता है तब तक बलूचिस्तान की संप्रभुता के किसी भी दावे को व्यावहारिक धरातल पर भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर क्या कहता है?

रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान का तर्क है कि उनके लोगों के पास आत्मनिर्णय का अधिकार है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दस्तावेज आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करते हैं लेकिन इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय कानून मौजूदा संप्रभु राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता की भी कड़ाई से रक्षा करता है। ऐतिहासिक रूप से अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही किसी देश से अलग होने का समर्थन किया है, जैसे कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति या व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ लंबे समय से जारी सशस्त्र संघर्ष की स्थिति में।

क्या भारत दे सकता है बलूचिस्तान को मान्यता?

बलूच नेताओं द्वारा कूटनीतिक समर्थन की अपील के बाद यह सवाल भी उठता है कि क्या भारत बलूचिस्तान को एक अलग देश के रूप में मान्यता दे सकता है? भारत का आधिकारिक और पुराना कूटनीतिक रुख यही रहा है कि वह बलूचिस्तान को पाकिस्तान का अभिन्न अंग मानता है। भारत ने बलूचिस्तान में मानव अधिकारों के उल्लंघन और सुरक्षा चिंताओं का मुद्दा तो बार-बार उठाया है लेकिन उसने अलगाववादी दावों या अलग देश की घोषणा को कभी औपचारिक मान्यता नहीं दी है। किसी भी अलग हुए क्षेत्र को मान्यता देना भारत की लंबी अवधि की विदेश नीति में एक बहुत बड़ा बदलाव होगा, जिसके व्यापक भू-राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

इतिहास के सबक: सिर्फ घोषणा से नहीं बनते नए देश

आपको बता दें कि दुनिया का इतिहास भी इस बात का गवाह है कि सिर्फ स्वतंत्रता की घोषणा करने से राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता। इसे कोसोवो के उदाहरण से समझा जा सकता है। कोसोवो ने 2008 में अपनी आजादी की घोषणा की थी और उसे 100 से अधिक देशों ने मान्यता दी है लेकिन इसके बावजूद कई बड़ी वैश्विक शक्तियां आज भी इसे पूर्ण देश नहीं मानती हैं। सोमालीलैंड, उत्तरी साइप्रस और ट्रांसनिस्ट्रिया जैसे क्षेत्रों के पास वर्षों से अपना खुद का शासन ढांचा है लेकिन व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता न मिलने की वजह से वे आज भी औपचारिक देशों की श्रेणी से बाहर हैं।

पाकिस्तान के लिए चुनौतियां और बलूचिस्तान का भविष्य

बलूच अलगाववादी समूहों की यह ताजा घोषणा ऐसे समय में आई है जब पाकिस्तान पहले से ही आंतरिक सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता, खैबर पख्तूनख्वा में उग्रवाद और बलूचिस्तान में जारी उग्रवाद से जूझ रहा है। 11 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस घोषित करने और कूटनीतिक अपील करने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान के मुद्दे पर ध्यान जरूर आकर्षित हुआ है। हालांकि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कानूनी और कूटनीतिक ढांचे के तहत बलूचिस्तान के एक मान्यता प्राप्त संप्रभु देश बनने की राह बेहद कठिन और अनिश्चित है। जब तक प्रभावी क्षेत्रीय नियंत्रण, व्यापक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मान्यता और वैश्विक संस्थाओं में प्रवेश हासिल नहीं होत, तब तक सिर्फ स्वतंत्रता के दावों से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत बलूचिस्तान की कानूनी स्थिति रातों-रात नहीं बदल सकती।