शेयर बाजार में हेरफेर मामले में ED की बड़ी कार्रवाई, 6 शहरों में 29 ठिकानों पर की छापेमारी

केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मुंबई जोनल ऑफिस-I ने शेयर बाजार में कथित हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। ED ने 16 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र, गुजरात समेत 6 शहरों में 29 ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई मुंबई, नासिक, अहमदाबाद, गांधीनगर, सूरत और भावनगर में की गई।

ED के इस जांच का संबंध लिस्टेड कंपनियों M/s R M Drip and Sprinklers Systems Ltd और M/s R&B Denims Ltd के शेयरों में कथित हेरफेर से है। ED ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 के तहत यह कार्रवाई की है।

शेयरों के आवंटन से लेकर कीमत बढ़ाने तक की जांच

प्रवर्तन निदेशालय की जांच में सामने आया कि अप्रैल 2023 से मार्च 2024 के बीच दोनों कंपनियों ने चुनिंदा व्यक्तियों और संस्थाओं को 3.5 करोड़ से अधिक शेयर और कन्वर्टिबल वारंट जारी किए। जांच एजेंसी के मुताबिक, इन शेयरों के भुगतान में बड़ी रकम कुछ सीमित और आपस में जुड़े लोगों, कंपनियों और कर्जदाताओं के समूह से आई थी। इसके साथ ही आरोप है कि इसके बाद आने वाले महीनों में दोनों कंपनियों के शेयरों की कीमत लगातार बढ़ाई गई, जबकि अधिकांश शेयर उन्हीं लोगों के पास बने रहे।

‘Multibagger Stocks’ जैसे व्हाट्सऐप ग्रुप से निवेशकों को लुभाया

ED की जांच में यह भी सामने आया कि दिसंबर 2025 के अंत से फरवरी 2026 के बीच ‘Multibagger Stocks’ जैसे नामों वाले व्हाट्सऐप कम्युनिटी ग्रुप के जरिए इन दोनों शेयरों को खरीदने के लिए रोजाना टिप्स भेजे जा रहे थे। जांच एजेंसी के अनुसार, इन ग्रुपों के जरिए छोटे और खुदरा निवेशकों को शेयर खरीदने के लिए आकर्षित किया गया। इन ग्रुपों को चलाने के लिए हरियाणा और मुंबई में दूसरे लोगों के नाम पर लिए गए सिम कार्ड का इस्तेमाल किया गया, जबकि इनका संचालन गुजरात के भावनगर से किया जा रहा था।

ED के मुताबिक, इन संदेशों के बाद दोनों शेयरों में खरीदारों की संख्या करीब 3,400 से बढ़कर एक लाख से अधिक हो गई।

व्हाट्सऐप ग्रुप डिलीट होते ही शेयरों में भारी गिरावट

जांच के अनुसार, 25 फरवरी 2026 को इन व्हाट्सऐप ग्रुपों को अचानक डिलीट कर दिया गया। इसके बाद दोनों कंपनियों के शेयर लोअर सर्किट पर आ गए और कुछ ही दिनों में उनकी कीमत करीब 70 प्रतिशत तक गिर गई। इस घटनाक्रम के कारण एक लाख से अधिक छोटे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। कई निवेशक ऐसे शेयरों के साथ फंस गए, जिन्हें वे गिरती कीमतों के बीच बेच नहीं पा रहे थे।

कंपनियों के दफ्तर, प्रमोटरों के घर और ब्रोकिंग फर्मों पर छापे

ED ने जिन ठिकानों की तलाशी ली, उनमें दोनों कंपनियों के कार्यालय, उनके प्रमोटरों के आवास, कम कीमत पर शेयर पाने वाले लोगों के ठिकाने, स्टॉक-ब्रोकिंग और फाइनेंस कंपनियों के कार्यालय तथा कथित तौर पर प्रचार के लिए इस्तेमाल किए गए व्हाट्सऐप ग्रुपों के संचालन से जुड़े लोगों के परिसर शामिल हैं। छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी ने कई आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस, शेयर लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड और संपत्तियों के दस्तावेज बरामद कर जब्त किए हैं।

ED मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और शेयर बाजार में कथित हेरफेर से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच कर रही है। मामले में आगे की जांच जारी है।

यह भी पढ़ें: देश के इस हिस्से में 22 अक्टूबर तक जारी रहेगा भारी बारिश का दौर, दिल्ली-यूपी और उत्तराखंड के लिए IMD ने दिया ये अलर्ट

साधना ग्रुप के राकेश गुप्ता को ईडी ने किया गिरफतार, देर रात करीब दो बजे कोर्ट में हुई पेशी

साधना टीवी और अन्य मीडिया नेटवर्क के मालिकाना अधिकार वाले साधना ग्रुप के सीएमडी राकेश गुप्ता को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 168 करोड़ रुपये के मनी लॉन्डरिंग मामले में आज गिरफ्तार कर लिया है। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने राकेश गुप्ता को ईडी की 7 दिन की रिमांड में देने का आदेश दिया है। प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी से मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूछताछ और कथित हवाला लेनदेन की जांच के लिए हिरासत की मांग की थी।

गुप्ता को शुक्रवार, 9 अक्टूबर, 2026 की रात 10.25 बजे दिल्ली के वसंत कुंज स्थित ईश्वर फार्म्स से गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसी के मुताबिक, गिरफ्तारी के बाद गुप्ता को 10 अक्टूबर की रात करीब 2:03 बजे ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इसके बाद अदालत में रिमांड आवेदन पर सुनवाई हुई। ड्यूटी मजिस्ट्रेट ने कहा कि, गुप्ता की उम्र और दिखाए गए खास कामों को देखते हुए, सात दिन के बजाय पांच दिन की ईडी कस्टडी सही है। अपने आदेश में अतिरिक्त सत्र जज सौरभ प्रताप सिंह लालेर ने कहा कि 63 वर्षीय गुप्ता को 15 अक्टूबर को शाम 4 बजे फिर से अदालत में पेश करना होगा।

क्या है पूरा मामला?

ईडी की जांच मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले पर आधारित है। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के बजाय भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं, 406, 409, 420, 468, 471, 477A और 120-B, के तहत दर्ज की गई थी। इनमें धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश से संबंधित आरोप शामिल हैं। जांच एजेंसी का आरोप है कि गुप्ता ने साधना ग्रुप की कंपनी साधना मीडिया प्राइवेट लिमिटेड (SMPL) को दिवालिया प्रक्रिया में पहुंचाने की साजिश रची।

संबंधित लेनदारों के पास कंपनी की 99.41% हिस्सेदारी होने के बावजूद कंपनी को दिवालिया प्रक्रिया में धकेला गया। जांच अधिकारी के अनुसार, इस प्रक्रिया के कारण करीब 110.10 करोड़ रुपये का आयकर मांग का भुगतान नहीं हुआ। वहीं, आरोपी पर SMPL और Aryan TV के दोबारा बिक्री सौदों के जरिए 2.50 करोड़ से 2.82 करोड़ रुपये नकद प्राप्त करने का आरोप है। एजेंसी का दावा है कि इससे जुड़ी रकम का इस्तेमाल कनेक्टेड कंपनियों को भुगतान करने में किया गया।

ईडी ने क्यों मांगी हिरासत?

ईडी ने अदालत को बताया कि आरोपी से पूछताछ के दौरान कई अहम पहलुओं की जांच करनी है। इनमें कथित हवाला के जरिए भेजी गई रकम, शार्पलाइन ब्रॉडकास्ट लिमिटेड में रखे गए 2.99 करोड़ रुपये और सरोज कंस्ट्रक्शन एंड ग्राफिक्स को कथित तौर पर देय 8.98 करोड़ रुपये शामिल हैं। जांच एजेंसी के मुताबिक, आरोपी के iPhone 13 Pro और iPad Pro से मिले डेटा की जांच के साथ-साथ सह-आरोपियों के बयानों का भी विश्लेषण करना है। एजेंसी दुबई और सिडनी में टेलीकास्ट की रसीदों, क्रिप्टोकरेंसी/हवाला से जुड़े कथित लेनदेन और गोल मार्केट स्थित कार्यालय में रखे बैंक बुक व डीमैट रिकॉर्ड की जांच करना चाहती है। जांच एजेंसी ने अदालत को यह भी बताया कि गवाह आरोपी के कर्मचारी और रिश्तेदार हैं, इसलिए गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

आरोपी के वकील की दलील

आरोपी के वकील ने रिमांड का विरोध करते हुए कहा कि गिरफ्तारी दिल्ली में हुई, जबकि आरोपी को कौशांबी, गाजियाबाद स्थित कैंप कार्यालय में पेश किया गया। बचाव पक्ष ने आयकर विभाग की शिकायत नहीं होने और संबंधित कर मांग के भुगतान का भी हवाला दिया। हालांकि, अदालत ने गिरफ्तारी से जुड़े दस्तावेजों, गिरफ्तारी के आधार और अन्य रिकॉर्ड की जांच की। आदेश में कहा गया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए गए थे और आरोपी को उनकी जानकारी दी गई थी। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि गिरफ्तारी मेमो पर दो गवाहों के हस्ताक्षर थे और आरोपी के बेटे गौरव गुप्ता को गिरफ्तारी की सूचना दी गई थी।

Delhi Protest: ‘गिरफ्तार होने ही आया हूं…’, अभिजीत दीपके हिरासत में; IGI एयरपोर्ट पर प्लेन में घुसी दिल्ली पुलिस

फर्जी CSR डोनेशन रैकेट पर ED की बड़ी कार्रवाई, 4 राज्यों में 8 ठिकानों पर की छापेमारी

केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मुंबई जोन-I ने फर्जी CSR डोनेशन रैकेट से जुड़े मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-NCR में कुल 8 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया है। यह कार्रवाई डॉ. धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह और अन्य से जुड़े मामले में की जा रही है।

ED की तलाशी के दायरे में मार्केट ऑपरेटर्स, ट्रस्टी, बिचौलिए और CSR फंड से जुड़े अन्य लोगों के ठिकाने शामिल हैं। शुरुआती जांच में कथित तौर पर सैकड़ों करोड़ रुपये के फर्जी CSR नेटवर्क का खुलासा हुआ है।

PMLA के तहत शुरू हुई जांच

ED ने यह जांच 12 जुलाई 2026 को जुहू पुलिस स्टेशन, ग्रेटर मुंबई में दर्ज FIR नंबर 1044/2026 के आधार पर शुरू की है। FIR में धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के खिलाफ Maharashtra Medical Practitioners Act, 1961, National Medical Commission Act, 2019 और Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 के तहत आरोप दर्ज हैं।मामले में IPC की धारा 420, 467, 471 और 475 के अनुरूप अपराधों का भी उल्लेख है, जो PMLA की अनुसूची में शामिल हैं।

12वीं पास व्यक्ति ने करीब 30 साल तक खुद को बताया डॉक्टर

ED की जांच के मुताबिक, धर्मेंद्र कुमार सिंह के पास मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता या मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण नहीं था और उन्होंने कथित तौर पर केवल 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बावजूद वह करीब तीन दशकों तक खुद को डॉक्टर बताते रहे और ‘Doctor’ की उपाधि का इस्तेमाल करते रहे।

जांच एजेंसी के मुताबिक, इसी पहचान और डॉक्टर की सामाजिक विश्वसनीयता का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने चैरिटेबल ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं का नेटवर्क खड़ा किया। इन संस्थाओं के जरिए स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी CSR गतिविधियों के नाम पर PSUs और निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में CSR फंड जुटाए गए।

CSR फंड के डायवर्जन का कथित नेटवर्क

ED की जांच में सामने आए प्रमुख बिंदुओं के मुताबिक—

ट्रस्ट, ट्रस्टी, बिचौलिए, कमीशन एजेंट और उपकरण सप्लायर का एक नेटवर्क कथित तौर पर बनाया गया था।इन ट्रस्टों का इस्तेमाल मुख्य रूप से PSUs से CSR डोनेशन हासिल करने के लिए किया गया।कंपनियों के सामने वैध CSR प्रोजेक्ट के तौर पर प्रस्ताव रखे गए, लेकिन आरोप है कि प्रोजेक्ट या तो आंशिक रूप से किए गए या प्राप्त फंड के अनुपात में काम नहीं हुआ।कथित तौर पर वेंडर बिलों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया और अतिरिक्त रकम को फर्जी या शेल संस्थाओं के जरिए बाहर निकालने की कोशिश की गई। इसके साथ ही ये भी जानकारी मिली कि CSR फंड हासिल कराने या लेन-देन में मध्यस्थता करने वाले बिचौलियों और ब्रोकरों को कमीशन/किकबैक दिए जाने का भी आरोप है।

निजी कंपनियों के CSR फंड को कैश में लौटाने का आरोप

जांच में CSR फंड के कथित कैश रीसाइक्लिंग मॉडल का भी पता चला है। ED के अनुसार, निजी कंपनियों से मिले CSR योगदान की बड़ी रकम कथित तौर पर नकद वापस कर दी जाती थी, जबकि ट्रस्ट अपने पास केवल एक छोटा हिस्सा कमीशन के तौर पर रखते थे।यानी आरोप है कि CSR व्यवस्था का इस्तेमाल अकाउंटेड रकम को अनअकाउंटेड कैश में बदलने के माध्यम के रूप में किया गया।

करीब 200 करोड़ रुपये CSR फंड की रूटिंग का अनुमान

ED की प्रारंभिक जांच के मुताबिक, इस कथित नेटवर्क के जरिए लगभग ₹200 करोड़ के CSR फंड को रूट किए जाने की जानकारी सामने आई है।तलाशी के दौरान बरामद दस्तावेजों और अन्य सामग्री के आधार पर जांच एजेंसी अब यह पता लगाने में जुटी है कि CSR फंड किन संस्थाओं और व्यक्तियों के जरिए ट्रांसफर किए गए, कितनी रकम कथित तौर पर डायवर्ट या रीसाइकिल की गई और इसमें कौन-कौन से बिचौलिए तथा लाभार्थी शामिल थे।

यह भी पढ़ें: फर्जी GST-ITC घोटाले में ED की बड़ी कार्रवाई: जमशेदपुर और कोलकाता में 4 ठिकानों पर छापेमारी

कोलकाता में ED की बड़ी कार्रवाई, MassArt Society से जुड़े 15 ठिकानों पर छापेमारी!

कोलकाता में जांच एजेंसी ED की बड़ी कार्रवाई

कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान आयोजित किए जाने वाले ‘Preview Shows’ में वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले में ED ने कार्रवाई की है। जांच एजेंसी ने MassArt Society से जुड़े 15 ठिकानों पर सर्च और सीजर ऑपरेशन शुरू किया है। इस कार्रवाई में पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन के करीबी सहयोगियों से जुड़े ठिकाने भी जांच के दायरे में हैं।

indside

केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कोलकाता टीम मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में यह कार्रवाई कर रही है। मामला MassArt (Mahanirban Road Mass Art) Society की ओर से दुर्गा पूजा के दौरान आयोजित होने वाले ‘Preview Shows’ में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। ED की ओर से यह कार्रवाई PMLA, 2002 की धारा 17 के तहत की जा रही है।

पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन भी जांच के दायरे में

ED की कार्रवाई में पूर्व मंत्री इंद्रनील सेन और उनके करीबी लोगों से जुड़े ठिकाने भी शामिल हैं। टीम डाक्यूमेंट्स, पैसों के लेन-देन से जुड़े रिकॉर्ड और दूसरे जरूरी सबूतों की जांच कर रही है। फिलहाल तलाशी जारी है। जांच पूरी होने के बाद मिले सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जा सकती है।

क्या है आरोप?

ED के मुताबिक, MassArt Society पर आरोप है कि उसने खुद को UNESCO से जुड़ी संस्था बताकर आम लोगों से बड़ी रकम जुटाई। जांच एजेंसी को शक है कि लोगों से जुटाए गए इस पैसे का इस्तेमाल संस्था से जुड़े लोग खुद के फायदे के लिए कर रहे थे। ED इसी लेन-देन और पैसों के इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कर रही है।

अहमदाबाद में ED का बड़ा एक्शन, स्टील कनेक्ट इंडिया की 4.53 करोड़ की संपत्ति को किया जब्त

अहमदाबाद में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बैंक लोन से जुड़े मामले में स्टील कनेक्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड पर बड़ी कार्रवाई की है। जांच एजेंसी ने स्टील कनेक्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ी करीब 4.53 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां को जब्त कर लिया है। एजेंसी ने ये कार्रवाई प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) 2002 के तहत की है। जांच में करीब 79.56 करोड़ रुपये की अपराध से अर्जित आय से जुड़े लेनदेन की बात सामने आई है। ED ने फंड के इस्तेमाल और लेनदेन की जांच के बाद चल और अचल संपत्तियों के खिलाफ यह कार्रवाई की है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला

CBI ने दर्ज करवाया था FIR

ED ने यह जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से दर्ज FIR के आधार पर शुरू की थी। इस FIR में IPC, 1860 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की अलग-अलग धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। ED ने पैसों के लेनदेन और उनके इस्तेमाल की जांच के बाद करीब 4.53 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां अटैच करने का आदेश जारी किया है। यह कार्रवाई ED की अहमदाबाद यूनिट ने की है।

ED ने क्यों जब्त की 4.53 करोड़ रुपये संपत्तियां 

जांच के दौरान ED ने पाया कि, कंपनी के तत्कालीन निदेशकों ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर बैंक से मिले लोन की तय शर्तों का पालन नहीं किया। एजेंसी के मुताबिक, लोन की रकम को नकद निकालने, दूसरी जुड़ी हुई कंपनियों में भेजने और बिना किसी वास्तविक कारोबार के इस्तेमाल करने की बात सामने आई है। ED के मुताबिक, कंपनी ने लोन का पैसा उन बैंक खातों में ट्रांसफर किया जो लोन देने वाले बैंकों के समूह में शामिल नहीं थे। इसके अलावा रकम को निदेशकों के निजी खातों और कंपनी की सब्सिडियरी कंपनियों के खातों के जरिए भी इधर-उधर किया गया।

Delhi Weather Update: मानसून ने कहा अलविदा, अब बिगड़ेगी दिल्ली की हवा! जानें आने वाले दिनों का हाल

National Herald Case: सोनिया और राहुल गांधी ने दिल्ली HC में ED की याचिका को दी चुनौती, बताया ‘कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग’

National Herald Case: नेशनल हेराल्ड मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। दोनों नेताओं ने कोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस चुनौती का विरोध किया है, जिसमें एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी है।

18 सितंबर को दाखिल अलग-अलग लेकिन काफी हद तक एक जैसे जवाबों में, कांग्रेस नेताओं ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि एजेंसी, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के आधार पर प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) का केस नहीं बना सकती।

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में 12 अक्टूबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

गांधी परिवार ने ED की कार्रवाई के कानूनी आधार पर उठाए सवाल

दाखिल किए गए जवाबों के मुताबिक, गांधी परिवार का कहना है कि ED की कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह मामला पुलिस में दर्ज FIR के बजाय सुब्रमण्यम स्वामी की 2013 की निजी शिकायत के आधार पर शुरू हुई थी।

गांधी परिवार का तर्क है कि PMLA में ED की कार्रवाई का आधार “निजी शिकायत” बनाने का कोई प्रावधान नहीं है। उनका कहना है कि स्वामी की शिकायत उन कानूनी शर्तों को पूरा नहीं करती जो एजेंसी के लिए मनी लॉन्ड्रिंग की कार्रवाई शुरू करने के लिए जरूरी हैं।

उनकी दलीलें PMLA की धारा 5(1) पर केंद्रित हैं। जवाबों में कहा गया है कि यह प्रावधान उन स्थितियों में कार्रवाई की इजाजत देता है जिनमें CrPC की धारा 173 के तहत पुलिस की अंतिम रिपोर्ट शामिल हो, या फिर किसी अधिकृत अधिकारी की शिकायत हो जो ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (सूचीबद्ध अपराध) की जांच कर रहा हो।

बचाव पक्ष का कहना है कि कोई निजी व्यक्ति ऐसी जांच नहीं कर सकता और जांच करने के लिए मजिस्ट्रेट को मिली शक्तियां इस कानूनी जरूरत को दरकिनार नहीं कर सकतीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र

गांधी परिवार ने ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी हवाला दिया है।

उनका तर्क है कि इस फैसले के अनुसार, PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए ‘शेड्यूल्ड ऑफेंस’ (अनुसूचित अपराध) का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। जवाब में यह भी आरोप लगाया गया है कि ED ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ‘निजी शिकायत’ के जिक्र का इस्तेमाल तो किया है, लेकिन उसके व्यापक संदर्भ पर ध्यान नहीं दिया है।

बचाव पक्ष ने उस लंबी अवधि की ओर भी इशारा किया है, जिसके दौरान स्वामी ने कथित तौर पर अदालत के सामने सबूत पेश नहीं किए। जवाबों के अनुसार, इसे इस बात के संकेत के तौर पर बताया गया कि निजी शिकायत को कार्यवाही का आधार मानने में क्या मुश्किलें आती हैं।

ED के अपने पुराने रिकॉर्ड का दिया हवाला

गांधी परिवार ने ED के पुराने रिकॉर्ड और बातचीत का हवाला देकर अपनी बात को सही ठहराने की कोशिश की है।

उनके जवाबों में जनवरी और अगस्त 2015 में जारी एजेंसी के टेक्निकल सर्कुलर, 2013 में सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन के सामने दी गई जानकारी और 2024 में राइट टू इन्फॉर्मेशन (RTI) के तहत मिले जवाब का जिक्र है।

बचाव पक्ष का कहना है कि इन रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि ED ने पहले यह रुख अपनाया था कि PMLA के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले FIR जरूरी है।

जवाबों में ED द्वारा जून 2021 में दर्ज ECIR का भी जिक्र है, जो स्वामी की शिकायत के सात साल बाद दर्ज की गई थी। बचाव पक्ष ने कहा कि ECIR को ट्रायल कोर्ट के सामने सितंबर 2025 में ही पेश किया गया, जब कोर्ट ने एजेंसी को इसे रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था।

नई FIR और ट्रायल कोर्ट का आदेश

जवाबों में 3 अक्टूबर, 2025 को दिल्ली पुलिस की इकोनॉमिक ऑफेंस विंग द्वारा दर्ज की गई FIR का भी जिक्र है। हालांकि, गांधी परिवार की दलीलों के अनुसार, ED ने ट्रायल कोर्ट को बताया था कि वह इस FIR पर निर्भर नहीं है।

हाई कोर्ट के सामने यह विवाद ट्रायल कोर्ट के उस फैसले से पैदा हुआ है जिसमें उसने ED की प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया था। दलीलों के मुताबिक, दिसंबर के आदेश में कहा गया था कि इस शिकायत पर कानूनी तौर पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

गांधी परिवार ने इस बात पर जोर दिया है कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानूनी और अधिकार-क्षेत्र से जुड़े उन मुद्दों पर आधारित था, जो ‘प्रेडिकेट-ऑफेंस’ (मूल अपराध) के लिए FIR न होने से संबंधित थे। उनका कहना है कि निचली अदालत ने मुख्य आरोपों पर उनके गुण-दोष के आधार पर कोई फैसला नहीं सुनाया।

ED 24 घंटे के अंदर हाई कोर्ट पहुंची

बचाव पक्ष ने उस तेजी पर भी सवाल उठाए हैं जिसके साथ ED हाई कोर्ट पहुंची।

जवाबों के मुताबिक, एजेंसी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के 24 घंटे के अंदर अपनी रिविजन याचिका दायर की। गांधी परिवार ने इस रफ्तार को “बिजली की गति” बताया और तर्क दिया कि ऐसा लगता है कि इस कार्रवाई में एजेंसी पर आम तौर पर लागू होने वाली आंतरिक मंज़ूरी की प्रक्रियाओं को नजरअंदाज किया गया है।

उन्होंने हाई कोर्ट से ED की रिविजन याचिका को खारिज करने का भी आग्रह किया है और इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया है।

क्या है नेशनल हेराल्ड केस?

नेशनल हेराल्ड केस की शुरुआत बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से 2013 में की गई एक शिकायत से हुई थी। इस शिकायत में Associated Journals Ltd (AJL) के अधिग्रहण को लेकर कथित साजिश के आरोप लगाए गए थे। बता दें कि AJL ही नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन करती है।

यह शिकायत ‘यंग इंडियन’ से भी जुड़ा है, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास सबसे ज्यादा शेयर हैं। आरोप AJL की उन संपत्तियों से जुड़े हैं जिनकी कीमत 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई है, और साथ ही ‘यंग इंडियन’ के जरिए किए गए 50 लाख रुपये के लेन-देन से भी जुड़े हैं।

वहीं, इस मामले में ED ने अप्रैल 2025 में मनी लॉन्ड्रिंग की शिकायत दर्ज की। ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2025 में इसे खारिज कर दिया, जिसके बाद एजेंसी दिल्ली हाई कोर्ट गई।

इस मामले में शामिल अन्य लोगों और संस्थाओं में सैम पित्रोदा, सुमन दुबे, सुनील भंडारी, यंग इंडियन और डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।

यह भी पढ़ें: Onion prices: फिर रुलाने की तैयारी में प्याज के भाव, सब्सिडी के बावजूद मेट्रो शहरों में आसमान छू रहे प्याज के दाम

US नागरिकों को निशाना बनाने वाले फर्जी कॉल सेंटर का ED ने किया भंडाफोड़, पटियाला-पुणे में रात तक चल रहा था पूरा नेटवर्क

(रिपोर्ट- शंकर आनंद) 

केंद्रीय जांच एजेंसी ED यानी प्रवर्तन निदेशालय के हैदराबाद जोनल ऑफिस ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत पटियाला, चंडीगढ़ और पुणे में तलाशी अभियान चलाया। जांच के दौरान US नागरिकों को निशाना बनाकर ठगी और जबरन वसूली करने वाले संगठित फर्जी कॉल सेंटर नेटवर्क का खुलासा हुआ है। इस मामले में ईडी की तफ्तीश में सामने आया है कि ये कॉल सेंटर कॉरपोरेट कंपनियों की तरह संचालित किए जा रहे थे। इनमें बाकायदा कंप्यूटर, हेडसेट, डायलर और VoIP सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा था। आरोप है कि नेटवर्क के मास्टरमाइंड गुजरात के अहमदाबाद से इन कॉल सेंटरों को रिमोट तरीके से नियंत्रित कर रहे थे।

पटियाला के दो कॉल सेंटरों में 194 कर्मचारी

ED के मुताबिक, पटियाला के अर्बन एस्टेट फेज-II में DM Web Solutions के नाम से चल रहे दो कॉल सेंटरों में कुल 194 लोग काम कर रहे थे। इन कॉल सेंटरों का संचालन और नियंत्रण अहमदाबाद के हर्षिल रावल और रवि रामी तथा उनके सहयोगियों के हाथ में था। वहीं, पुणे के हिंजवड़ी फेज-II स्थित Gera’s Imperial Complex में चल रहे कॉल सेंटर में 22 लोग काम कर रहे थे। इसे अहमदाबाद के विपुल कोटाडिया और उसके सहयोगियों द्वारा संचालित किए जाने की जानकारी सामने आई है।

नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर से युवाओं की भर्ती

जांच में पता चला कि कॉल सेंटरों में काम करने वाले कई कर्मचारियों की पहचान स्थानीय नेटवर्क के जरिए की गई थी। इनमें बड़ी संख्या में नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों से आए लोग शामिल थे। ईडी के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर कर्मचारी निम्न आय वर्ग और बेरोजगार पृष्ठभूमि से थे। उन्हें करीब 30 हजार से 50 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता था। इसके अलावा पीड़ितों से सफलतापूर्वक रकम वसूलने पर इंसेंटिव भी दिया जाता था।

ऐसे चलता था US नागरिकों को ठगने का पूरा खेल

जांच में फर्जी कॉल सेंटर के काम करने का पूरा तरीका सामने आया है। सबसे पहले मास्टरमाइंड कथित तौर पर अमेरिकी नागरिकों का डेटा हासिल करते थे। इसके बाद सिस्टम के जरिए बड़े पैमाने पर स्पैम ई-मेल या कंप्यूटर पर पॉप-अप अलर्ट भेजे जाते थे। इन फर्जी अलर्ट में पीड़ितों को बताया जाता था कि उनके कंप्यूटर में वायरस है, बैंक अकाउंट खतरे में है या उनकी पहचान और कानूनी स्थिति से जुड़ी कोई गंभीर समस्या है। इसके साथ एक फर्जी टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर दिया जाता था। पीड़ित जब उस नंबर पर फोन करता था तो कॉल सेंटर में उसे अलग-अलग स्तर के कर्मचारियों के पास भेजा जाता था।

Opener से Banker और फिर Closer

इस फर्जीवाड़े को तीन चरणों में अंजाम दिया जाता था, उसे हम इस तरह से समझ सकते हैं:-

  • पहला चरण:- Opener/Dialler.. शुरुआत में Opener पीड़ित से बात करता था। वह खुद को Amazon, Microsoft, PayPal जैसी कंपनियों के टेक्निकल सपोर्ट कर्मचारी के तौर पर पेश कर सकता था। उसका मकसद पीड़ित का भरोसा हासिल करना और उसकी चिंता का स्तर समझना होता था।
  • दूसरा चरण- Banker: इसके बाद Banker की भूमिका आती थी। वह कथित तौर पर पीड़ित के बैंक अकाउंट, उपलब्ध रकम और चल-अचल संपत्तियों के बारे में जानकारी हासिल करता था, ताकि पैसे वसूलने का तरीका तय किया जा सके।
  • तीसरा चरण- Closer:- इसके बाद कॉल Closer को ट्रांसफर की जाती थी। Closer पीड़ित पर दबाव बनाने के लिए खुद को अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसी, बैंक के फ्रॉड डिविजन या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पेश करता था। पीड़ित को तत्काल भुगतान नहीं करने पर कानूनी या आर्थिक नुकसान की धमकी दी जाती थी।

Gift Card, कैश और गोल्ड के जरिए वसूली

ED की जांच में सामने आया कि पीड़ितों से रकम हासिल करने के लिए पारंपरिक बैंकिंग चैनल के बजाय अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था। पीड़ितों को Apple और Google Play जैसे गिफ्ट कार्ड खरीदने, कैश भेजने या सोना खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था। कुछ मामलों में अमेरिका में मौजूद कूरियर के जरिए पीड़ितों से कैश या गोल्ड कलेक्ट करने की व्यवस्था भी की जाती थी। इसके बाद रकम को क्रिप्टोकरेंसी, हवाला और अन्य माध्यमों के जरिए भारत सहित दूसरे देशों में ट्रांसफर कर कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की जाती थी।

Cloud के जरिए रिमोट कंट्रोल

ED के अनुसार, पटियाला और पुणे के कॉल सेंटरों में लगे कंप्यूटरों को मास्टरमाइंड Cloud के जरिए रिमोट तरीके से नियंत्रित करते थे। टारगेट का नाम और संपर्क विवरण भी कर्मचारियों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाता था। कॉल-ब्लास्ट की शुरुआती प्रक्रिया भी मास्टरमाइंड द्वारा नियंत्रित सिस्टम और IT सपोर्ट टीम के जरिए संचालित की जाती थी। इसके बाद Opener, Banker और Closer की पूरी प्रक्रिया के जरिए पीड़ित से रकम वसूलने का काम होता था।

गुजरात के अहमदाबाद से होता था रकम का प्रोसेसिंग और लेयरिंग

जांच में सामने आया कि कथित तौर पर हर्षिल रावल और रवि रामी पीड़ितों से हासिल रकम के आगे के ट्रांसफर और प्रोसेसिंग की व्यवस्था करते थे। ED के मुताबिक, अपराध से हासिल रकम को विभिन्न माध्यमों से भारतीय मुद्रा में बदला जाता था। इसके बाद इस पैसे का इस्तेमाल चल-अचल संपत्तियां खरीदने में किया जाता था या रकम को क्रिप्टो/बिटकॉइन के रूप में रखा जाता था। कुछ रकम देश के बाहर भी रखे जाने की जानकारी जांच में सामने आई है।

Digital Evidence से सामने आई पूरी चेन

ED की तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य बरामद हुए हैं। इन साक्ष्यों से कथित तौर पर हवाला ऑपरेटरों, अंगड़िया फर्मों और अमेरिका में पीड़ितों से वसूली गई रकम के कलेक्शन में शामिल लोगों की भूमिका सामने आई है। जांच एजेंसी के मुताबिक, डिजिटल एविडेंस से भारत के अलग-अलग हिस्सों में संचालित फर्जी कॉल सेंटरों के बीच एक संगठित नेटवर्क की जानकारी मिली है।

ये भी पढ़ें- आडवाणी से लेकर जयशंकर और जगदीप धनखड़ तक…दिल्ली में SIR को लेकर कई दिग्गजों को नोटिस

Tirupati Laddu prasadam: तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिला पाम ऑयल और केमिकल, ED के हत्थे चढ़े सुकृति फूड्स के कैलाश चंद मंगला

Tirupati Laddu prasadam: आंध्र प्रदेश के तिरुमला तिरुपति मंदिर के प्रसाद में मिलावटी घी का इस्तेमाल करने के मामले प्रवर्तन निदेशालय ने बड़ी कार्रवाई की है। एजेंसी ने इस मामले में घी की आपूर्ति करने वाली कंपनी सुकृति फूड्स के प्रवर्तक कैलाश चंद मंगला को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार कर लिया है। एजेंसी ने आरोप लगाया है कि मशहूर तिरुपति लड्डू प्रसादम बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया घी, रिफाइंड पाम ऑयल, पाम कर्नेल ऑयल, पामोलिन और कई केमिकल्स का इस्तेमाल करके बनाया गया था। और बाद में इसे तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) को गाय के घी के रूप में सप्लाई किया गया।

जांच एजेंसी ने यह कार्रवाई 2019 से 2024 के बीच तिरुमला तिरुपति देवस्थानम से मिले मिलावटी घी के नमूनों की जांच के बाद की है। विभिन्न मीडिया स्रोतों से आ रही खबरों में कहा गया है कि मंगला इस मामले में कई साजिशकर्ताओं में से एक है। उसने श्री वैष्णवी डेयरी स्पेशलिटीज, मालगंगा मिल्क एंड एग्रो प्रोडक्ट्स और एआर. डेयरी फूड्स जैसी कई कंपनियों के साथ तालमेल के जरिए मिलावटी घी की आपूर्ति की।

मंगला ने मिलावटी वस्तुओं के इस्तेमाल को छिपाने और असली गाय के घी के उत्पादन और आपूर्ति का दिखावा करने के मकसद से घी और रिफाइंड पाम आयल की खरीद-बिक्री से जुड़े फर्जी रिकार्ड तैयार किए। ईडी ने इससे पहले भोले बाबा आर्गेनिक डेयरी मिल्क नाम की कंपनी के प्रमोटर और निदेशक विपिन जैन को इसी तरह के आरोपों में गिरफ्तार किया था।

230 करोड़ रुपये मूल्य का कथित मिलावटी घी सप्लाई किया गया

न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, टीटीडी को 2019 से 2024 के बीच 230 करोड़ रुपये मूल्य का कथित मिलावटी घी सप्लाई किया गया था। इसमें से 96 करोड़ रुपये का मिलावटी घी कथित तौर पर सुकृति फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटर कैलाश चंद मंगला ने बनाया था। ईडी ने मामले में मंगला को गिरफ्तार करने के बाद ये आरोप लगाए।

किस चीज से बना था टीटीडी में सप्लाई किया गया घी?

प्रवर्तन निदेशालय के मुताबिक, तिरुपति लड्डू प्रसाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया मिलावटी घी, रिफाइंड पाम ऑयल, पाम कर्नेल ऑयल और पामोलिन के साथ-साथ कई केमिकल्स का इस्तेमाल करके बनाया गया था। एजेंसी ने खास तौर पर MG-90, मोनोग्लिसराइड्स, मायवेसेट सॉफ्ट 400 और एसिटिक एसिड एस्टर का नाम उन केमिकल्स में लिया है जिनका इस्तेमाल बनाने की प्रक्रिया में किया गया था। टीटीडी में इसे “एगमार्क स्पेशल ग्रेड काउ घी” के तौर पर सप्लाई किया गया।

कथित मिलावटी घी की सप्लाई कैसे हुई?

ईडी ने आरोप लगाया कि मंगला ने अलग-अलग समूहों के जरिए मिलावटी घी की आपूर्ति की। एजेंसी के मुताबिक, मंगला ने घी और रिफाइंड पाम ऑयल की बिक्री और खरीद से जुड़े झूठे रिकॉर्ड भी बनाए और उन्हें मेंटेन किया। एजेंसी ने आरोप लगाया कि इसका मकसद मिलावट के असली इस्तेमाल को छिपाना और असली गाय के घी के सही उत्पादन और आपूर्ति का दिखावा करना था।

महिला होने की वजह से किया नौकरी देने से इनकार, अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 12 लाख रुपये का मुआवजा देगा IOC

नकली दवाओं पर लगाम के लिए उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका

देश में नकली और मिलावटी दवाओं के निर्माण तथा बिक्री पर पूरी तरह से अंकुश लगाने के लिए उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके एक एकीकृत राष्ट्रीय ढांचे को बनाने, मामलों की समयबद्ध जांच व तेजी से सुनवाई, जब्त दवाओं की अनिवार्य फॉरेंसिक जांच और नकली दवा सिंडिकेट के खिलाफ प्रवर्तन एजेंसियों की समन्वित कार्रवाई की मांग की गई है।

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की इस याचिका में मांग की गई है कि नकली दवाओं से जुड़े मामलों में जांच तीन महीने के भीतर और अदालती सुनवाई एक साल के भीतर पूरी की जाए। इसके अलावा छापेमारी और जब्ती को अनिवार्य वीडियोग्राफी कराने और देश भर में जांच व अभियोजन को संचालित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया बनाने का अनुरोध किया गया है।

इस याचिका में एक राष्ट्रीय डिजिटल निगरानी प्रणाली स्थापित करने की भी सिफारिश की गई है, जिससे मामलों की एफआईआर से लेकर अंतिम निपटारे तक निगरानी की जा सके और राज्य पुलिस, सीबीआई, ईडी, सीमा शुल्क विभाग और फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सके।

Also Read : ओडिशा में 3,406 करोड़ रुपये की सेमीकंडक्टर परियोजना को मंजूरी

याचिकाकर्ता ने मांग की है कि नकली दवाओं के उत्पादन, वितरण और वित्तपोषण में शामिल नेटवर्क के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति और काले धन से संबंधित कड़े कानूनों के तहत कार्रवाई करते हुए उनकी संपत्तियों को जब्त किया जाए। याचिका में तर्क दिया गया है कि औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 वर्तमान में संगठित सिंडिकेट से निपटने के लिए अपर्याप्त है, क्योंकि इसमें वित्तीय जांच, गवाह संरक्षण और समयबद्ध फॉरेंसिक विश्लेषण के स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं।

बेंगलुरु के 90 से अधिक अस्पतालों में कथित तौर पर कैंसर की नकली दवाओं की आपूर्ति के हालिया मामलों, जहरीले कफ सिरप से हुई मौतों और विभिन्न राज्यों में जब्त की गई नकली दवाओं का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि इस समस्या को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक संगठित अपराध है जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार), अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 47 (लोक स्वास्थ्य में सुधार का राज्य का कर्तव्य) का सीधा उल्लंघन है।

Pic Credit : ANI

पाकिस्तान ने आतंकी मसूद-अजहर पर इनाम बढ़ाकर 70 लाख किया:भगोड़ा घोषित किया; अक्टूबर में FATF बैठक होनी है, उससे पहले कार्रवाई की

पाकिस्तान ने जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के प्रमुख मसूद अजहर पर इनाम बढ़ाकर 70 लाख पाकिस्तानी रुपए कर दिया है। पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने आतंकियों की नई रेड बुक में अजहर को भगोड़ा घोषित किया है। यह कार्रवाई अक्टूबर में होने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) की बैठक से पहले हुई है। FIA ने अजहर पर पहले घोषित इनाम में 20 लाख पाकिस्तानी रुपए की बढ़ोतरी की है। एजेंसी ने 2021 में उस पर 50 लाख पाकिस्तानी रुपए का इनाम रखा था। FATF की बैठक से पहले क्यों अहम है कार्रवाई? पाकिस्तान पहले FATF की ग्रे लिस्ट में रह चुका है। इस दौरान उस पर आतंकी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कार्रवाई करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव था। अक्टूबर 2022 में FATF ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से बाहर कर दिया था। अब अक्टूबर में FATF की प्लेनरी बैठक होने वाली है। ऐसे में मसूद अजहर जैसे आतंकी के खिलाफ कार्रवाई की घोषणा पाकिस्तान के लिए अहम मानी जा रही है। इससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह दिखाने की कोशिश कर सकता है कि वह आतंकवाद और आतंकी फंडिंग के खिलाफ कदम उठा रहा है। 2021 में पाकिस्तान ने कहा था- अजहर अफगानिस्तान भाग गया पाकिस्तान ने 2021 में दावा किया था कि मसूद अजहर उसके देश में नहीं है और वह अफगानिस्तान भाग गया है। उसी साल FIA ने अपनी रेड बुक में उसे भगोड़ा बताते हुए 50 लाख रुपए का इनाम घोषित किया था। अब पांच साल बाद पाकिस्तान ने इनाम की रकम बढ़ा दी है। हालांकि, पाकिस्तान ने यह साफ नहीं किया है कि अजहर इस समय कहां है। संसद हमले का मास्टरमाइंड है आतंकी अजहर पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर 2001 में भारत की संसद पर हुए हमले का मास्टरमाइंड है। इसके अलावा भी उसने भारत में कई आतंकी हमलों को अंजाम दिया है। मसूद 2016 में हुए पठानकोट हमले का भी मास्टरमाइंड है। इस मामले में दिल्ली पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक, मसूद ने भारत पर हमलों के लिए जैश-ए-मोहम्मद के कैडर का इस्तेमाल किया था। उसने 2005 में अयोध्या में राम जन्मभूमि और 2019 में पुलवामा में CRPF के जवानों पर भी हमला करवाया था। इसके अलावा मसूद 2016 में उरी हमले और अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ में भारतीय कॉन्सुलेट पर अटैक का भी जिम्मेदार है। 1994 में पहली बार भारत आया था मसूद अजहर मसूद अजहर पहली बार 29 जनवरी, 1994 को बांग्लादेश से विमान में सवार होकर ढाका से दिल्ली पहुंचा था। 1994 में अजहर फर्जी पहचान बनाकर श्रीनगर में दाखिल हुआ था। उसका मकसद हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी और हरकत-उल-मुजाहिदीन गुटों के बीच तनाव कम करना था। इस बीच भारत ने उसे आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के लिए अनंतनाग से गिरफ्तार कर लिया था। तब अजहर ने कहा था- कश्मीर को आजाद कराने के लिए 12 देशों से इस्लाम के सैनिक आए हैं। हम आपकी कार्बाइन का जवाब रॉकेट लॉन्चर से देंगे। इसके 4 साल बाद जुलाई 1995 में जम्मू-कश्मीर में 6 विदेशी टूरिस्ट्स को अगवा कर लिया गया। किडनैपर्स ने टूरिस्ट के बदले समूद अजहर को रिहा करने की मांग की। इस बीच अगस्त में दो टूरिस्ट किडनैपर्स की कैद से भागने में कामयाब हो गए। हालांकि, बाकियों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। 1999 में विमान हाईजैक के बाद भारत सरकार ने अजहर को छोड़ 24 दिसंबर 1999 को काठमांडू से दिल्ली आ रहे एक भारतीय विमान को अजहर के भाई सहित दूसरे आतंकियों ने हाईजैक कर लिया था। वो इसे अफगानिस्तान के कंधार ले गए, जहां उस वक्त तालिबान का शासन था। विमान में कैद लोगों के बदले मसूद अजहर सहित 3 आतंकियों को छोड़ने की मांग की गई। आतंकियों की मांग पूरी हुई और मसूद आजाद हो गया। इसके बाद वह पाकिस्तान भाग गया। चीनी सरकार UNSC में मसूद को ग्लोबल टेरेरिस्ट घोषित होने से कई बार बचा चुकी है। 2009 में अजहर को वैश्विक आतंकी की लिस्ट में शामिल करने के लिए पहली बार प्रस्ताव आया था। तब लगातार 4 बार चीन ने सबूतों की कमी का हवाला देकर प्रस्ताव पास नहीं होने दिया। ऑपरेशन सिंदूर में मसूद के परिवार के 10 सदस्य मारे गए थे भारत ने 22 अप्रैल को हुए पहलगाम हमले के बाद 7 मई को पाकिस्तान में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। बहावलपुर पर भारतीय हमले में मसूद के परिवार के 10 लोग मारे गए थे। इसके अलावा 4 सहयोगियों की भी मौत हुई थी। मरने वालों में मसूद की बड़ी बहन और उसका पति, मसूद का भतीजा और उसकी पत्नी, मसूद की एक भतीजी और उसके पांच बच्चे शामिल हैं। हमले के वक्त मसूद मौके पर नहीं था, इस वजह से उसकी जान बच गई थी। बीबीसी उर्दू की रिपोर्ट के मुताबिक आतंकी मसूद ने परिवार के लोगों के मरने के बाद एक बयान भी जारी किया था। इसमें उसने कहा था कि मैं भी मर जाता तो खुशनसीब होता। ———————- ये खबर भी पढ़ें… हूती विद्रोहियों का लाल-सागर में दो और द्वीपों पर कब्जा यमन के हूती विद्रोहियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों पर कब्जा कर लिया है। यमन सरकार के मुताबिक हूतियों ने ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश द्वीपों पर अपने लड़ाके तैनात किए हैं। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…