Tiger Shroff Firing Case में मुंबई पुलिस का बड़ा खुलासा, प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा

Tiger Shroff Firing Case में मुंबई पुलिस का बड़ा खुलासा, प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या कहा

Tiger Shroff Firing Case

बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर मुंबई के जुहू इलाके में हुई फायरिंग के मामले में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। राजस्थान के कोटा रेलवे स्टेशन से तीन संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है। मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच इस मामले की जांच कर रही है।

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पुलिस के मुताबिक वारदात के बाद आरोपी नेपाल भागने की फिराक में थे। हालांकि, आरोपियों की उम्र को लेकर सामने आई जानकारी में बाद में बदलाव हुआ है। मुंबई पुलिस ने स्पष्ट किया है कि गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपी नाबालिग नहीं हैं।

 

यह घटना 18 अक्टूबर 2026 की शाम को हुई थी। टाइगर श्रॉफ एक फुटबॉल ग्राउंड से निकल रहे थे, तभी बाइक सवार तीन लोग वहां पहुंचे। इनमें से दो लोगों ने अभिनेता की कार पर कथित तौर पर गोलीबारी की और इसके बाद मौके से फरार हो गए। घटना में टाइगर श्रॉफ सुरक्षित बच गए। शुरुआती रिपोर्टों में उनके ड्राइवर और एक ऑटो रिक्शा चालक के घायल होने की जानकारी भी सामने आई थी।

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कोटा रेलवे स्टेशन से पकड़े गए तीन आरोपी

 

मुंबई पुलिस और राजस्थान पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए कोटा रेलवे स्टेशन से तीन संदिग्धों को पकड़ा। इस ऑपरेशन में राजस्थान पुलिस के साथ एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) ने भी सहयोग किया।

 

पुलिस के अनुसार, आरोपियों को पकड़ने के लिए कई विशेष टीमें गठित की गई थीं। जांच के दौरान पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज, तकनीकी विश्लेषण और जमीनी स्तर पर की गई पड़ताल की मदद ली। जांच में आरोपियों की गतिविधियों का पता अंधेरी वेस्ट रेलवे स्टेशन से लेकर मुंबई के उत्तरी हिस्से और फिर सूरत तक लगाया गया। इसके बाद उनके पुणे-जयपुर एक्सप्रेस ट्रेन में सवार होने की जानकारी मिली। आगे की कार्रवाई में कोटा पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।

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कौन हैं पकड़े गए आरोपी?

 

शुरुआती जानकारी में तीन संदिग्धों में से एक की उम्र 17 साल बताई गई थी। वहीं, अन्य दो की पहचान बिहार के बेगूसराय निवासी 22 वर्षीय ऋतिक कुमार उर्फ रोशन और हरियाणा के सोनीपत निवासी 18 वर्षीय रेहान के रूप में बताई गई। हालांकि, मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बाद में स्पष्ट किया कि इस मामले में पकड़े गए तीनों आरोपी नाबालिग नहीं हैं। पुलिस के मुताबिक, एक आरोपी की उम्र 18 साल और बाकी दो की उम्र 22 साल है। इस तरह आरोपियों की उम्र को लेकर शुरुआती रिपोर्टों और पुलिस के बाद के बयान में अंतर सामने आया है।

 

नेपाल भागने की फिराक में थे आरोपी

 

मुंबई पुलिस ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि फायरिंग के बाद आरोपी नेपाल भागने की योजना बना रहे थे। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि वारदात के पीछे किसका हाथ था और आरोपियों को किसी अन्य व्यक्ति या गिरोह से निर्देश मिले थे या नहीं। मुंबई पुलिस ने कहा कि आरोपियों को मुंबई लाने की प्रक्रिया जारी है। इस कार्रवाई में दिल्ली, गुजरात और राजस्थान पुलिस भी सहयोग कर रही हैं।

 

जांच के लिए बनाई गईं करीब 20 विशेष टीमें

 

मुंबई पुलिस के डीसीपी राज तिलक रौशन के मुताबिक, रविवार शाम करीब सात बजे बाइक पर तीन लोग आए थे। इनमें से दो ने टाइगर श्रॉफ की कार पर गोलीबारी की और इसके बाद फरार हो गए। घटना की गंभीरता को देखते हुए मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आरोपियों का पता लगाने के लिए करीब 20 विशेष टीमें बनाई थीं।

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, तकनीकी जानकारी और स्थानीय स्तर पर जुटाए गए सुरागों की मदद से उनकी आवाजाही का पता लगाया। पुलिस ने इस मामले में हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट से संबंधित धाराएं लगाई हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ अन्य गिरफ्तारियां होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया गया है।

 

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने दिया कार्रवाई का भरोसा

 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने टाइगर श्रॉफ से बात कर मामले में उचित कार्रवाई का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को ढूंढ निकाला जाएगा और इस तरह की वारदातों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फडणवीस के मुताबिक, आरोपियों के महाराष्ट्र के बाहर से, संभवतः विदेश से, काम करने की आशंका की भी जांच की जा रही है। इसके लिए अन्य राज्यों की पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय किया जाएगा।

 

अब आगे क्या करेगी पुलिस?

 

फिलहाल पुलिस आरोपियों को मुंबई लाने, फायरिंग के पीछे की वजह का पता लगाने और संभावित साजिश की जांच में जुटी है। जांच में यह भी पता लगाया जाएगा कि वारदात में इस्तेमाल की गई बाइक और हथियार कहां से आए तथा आरोपियों को किसने मदद पहुंचाई। पुलिस की जांच पूरी होने और आधिकारिक तौर पर अधिक जानकारी सामने आने के बाद मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी।

फ्रांस में महंगाई पर भड़की हिंसा : राष्ट्रपति मैक्रों ने शांति की अपील की

फ्रांस में बढ़ती महंगाई, शिक्षा बजट में कटौती और चरमराती सार्वजनिक सेवाओं के खिलाफ जारी देशव्यापी प्रदर्शनों के दाैरान हिंसक दंगों, लूटपाट की घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ‘शांति और व्यवस्था’ बनाए रखने की अपील की है।

राष्ट्रपति कार्यालय (एलिसी पैलेस) से राष्ट्र के नाम दिए टीवी संबोधन में श्री मैक्रों ने प्रदर्शनकारियों से स्थिति को और न बिगड़ने देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, “हम सभी गुस्सा और शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रदर्शनकारियों की ‘जायज मांगों’ और तोड़फोड़ व लूटपाट के जिम्मेदार उपद्रवियों के बीच स्पष्ट फर्क किया जाना चाहिए।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शनिवार को पूरे फ्रांस में 5,50,000 से अधिक लोग सड़कों पर उतरे। अधिकतर प्रदर्शन हालांकि शांतिपूर्ण रहे, लेकिन रात ढलते ही कई शहरों में हिंसा भड़क उठी। सप्ताहांत के दौरान पुलिस ने 2,000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया। वहीं गृह मंत्रालय ने यह संख्या लगभग 2,400 बताई है।

पेरिस, मार्सिले, ल्योन और लिमोगेस में नकाबपोश समूहों ने दुकानों में तोड़फोड़ की, गाड़ियों में आग लगा दी और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया। लिमोगेस में आग लगने के कारण 143 वर्ष पुराने टाउन हॉल का गुंबद ढह गया। रविवार को भी पेरिस के कुछ हिस्सों में झड़पें जारी रहने पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।

श्री मैक्रों ने इस हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ऐसी तबाही को ‘किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता’। उन्होंने वादा किया कि उपद्रवियों को सख्त सजा दी जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने जनता की शिकायतों के समाधान के लिए इस सप्ताह ठोस उपायों पर बैठकों की प्रतिबद्धता जताई।

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यह विरोध प्रदर्शन सितंबर में पेरिस के उपनगरीय इलाकों के विद्यालयों में शिक्षकों और छात्रों की हड़ताल से शुरू हुआ था, जो कर्मी बढ़ाने और बेहतर संसाधनों की मांग कर रहे थे। बाद में कक्षाओं में भीड़, कर्मचारियों की कमी, महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता को लेकर यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।

वायरल वीडियो में एक पुलिसकर्मी द्वारा छात्रा को प्रतिबंधित तरीके से गर्दन से दबोचने की घटना सामने आते ही जन आक्रोश और भड़क गया। पुलिस पर बेतहाशा बल प्रयोग का आरोप लगाते हुए बड़ी संख्या में लोग प्रदर्शन में कूद पड़े। इस अशांति ने मैक्रों सरकार को भारी राजनीतिक दबाव में ला खड़ा किया है। विरोधी सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रशासन प्रदर्शन के इतने बड़े पैमाने का अंदाजा लगाने में पूरी तरह नाकाम रहा। स्थिति पर चर्चा के लिए प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू सोमवार को कैबिनेट की आपात बैठक करने वाले थे।

घटनाक्रम पर राजनीतिक नेताओं की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आई हैं। दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने वामपंथियों पर जन आक्रोश का फायदा उठाने का आरोप लगाया, वहीं वामपंथी नेता ज्यां-ल्यूक मेलेनचोन ने छात्रों के विरोध प्रदर्शन के अधिकार का बचाव किया। आगे उपद्रव की आशंका के मद्देनजर मार्सिले प्रशासन ने सभाओं पर पाबंदी लगा दी है।

फ्रांस का यह आंदोलन बढ़ती महंगाई, मकानों की किल्लत और बदहाल सार्वजनिक सेवाओं को लेकर पूरे यूरोप में पनप रहे असंतोष का हिस्सा है। बेल्जियम, पुर्तगाल, इटली और अल्बानिया में भी ऐसे ही आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन दर्ज किए गए हैं।

इस स्थिति ने फ्रांस सरकार के लिए कानून-व्यवस्था बहाल करने के साथ-साथ प्रदर्शनों के पीछे की बुनियादी आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को सुलझाने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

Pic Credit : UNI

‘टिपिंग प्वाइंट’ से बच पाएगा भारत?

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। ..सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था।

कई ओर से खिंचाव और दबाव की शिकार हो रही भारत की संवैधानिक व्यवस्था का अंतिम खंभा भी इस परिघटना के दायरे में आ गया है। 12 अक्टूबर इस मायने में एक असाधारण दिन था, जब विपक्षी दलों के आह्वान पर हजारों लोगों के हुजूम ने सर्वोच्च न्यायालय पर जाकर मोर्चा लगाया। इसके साथ ही इस आम मान्यता पर विराम लग गया कि राजनीतिक दलों के लिए,

  • विरोध दर्ज कराने या अपना पक्ष रखने का उचित मंच संसद और विधानसभाएं हैं
  • अपना विरोध जताने के लिए जन अभियान, जन सभाएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस, अधिकारियों के घेराव आदि जैसे वैध माध्यम उन्हें उपलब्ध हैं।
  • राजनीतिक दल या संगठन अगर अदालत तक जुलूस निकालते हैं, तो इससे संदेश जाता है कि वे न्यायिक प्रक्रिया को सड़क के दबाव से प्रभावित करना चाहते हैं। न्यायपालिका को ऐसे विवादों से ऊपर समझा जाता रहा है।
  • इसीलिए अदालत तक जुलूस निकालना अब तक नाजुक और विवादास्पद मामला माना जाता था।
  • खुद सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि न्यायालय पर दबाव डालने वाले विरोध प्रदर्शन स्वीकार्य नहीं हैं।

लेकिन 12 अक्टूबर को ऐसा ही विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ। लोगों के हुजूम के साथ सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर विपक्ष के 11 नेताओं ने निर्वाचन आयोग के खिलाफ अपनी याचिका दायर कराई। याचिका दायर कराना एक वैधानिक प्रक्रिया है। लेकिन जिस रूप में उस रोज यह कराया गया, निर्विवाद रूप से उसे एक राजनीतिक वक्तव्य और सियासी कदम अधिक समझा जाएगा। कहा जा सकता है कि यह तरीका अपना कर विपक्ष ने खुद न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है।

विचारणीय यह है कि आखिर ये नौबत क्यों आई? संवैधानिक मर्यादा के तहत राजनीतिक एवं तमाम विवादों से ऊपर मानी जाने वाली न्यायपालिका को लेकर ऐसी धारणा क्यों बनी कि उससे “इंसाफ पाने के लिए” यह जरूरी है कि राजनीतिक तरीके से उस पर दबाव डाला जाए? इस सवाल पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। इसलिए कि इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि न्यायपालिका को अब राजनीतिक विवादों से ऊपर नहीं समझा जा रहा है। यानी यह मान्यता कमजोर पड़ी कि अदालतें अपने फैसले विशुद्ध कानूनी आधार पर और संवैधानिक दायरों के अंदर रहते हुए देती हैं। अगर यह धारणा टूटती है, तो उसका मतलब यह भी होगा कि न्यायपालिका के निर्णयों का आदर के साथ स्वेच्छा से अनुपालन करने का चलन कमजोर हो जाएगा।

यह स्थिति क्यों आई? इस बात को समझने के लिए हाल के वर्षों में बनी पृष्ठभूमि पर गौर करना चाहिए। कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं की टिप्पणियों से इस पृष्ठभूमि को बेहतर समझा जा सकता हैः

  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने हाल में सार्वजनिक रूप से कहा कि उनका अदालती प्रक्रिया से विश्वास उठ गया है। उन्होंने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कोर्ट के पास जाने का उन्हें कोई खास औचित्य नजर नहीं आता।
  • सिब्बल ने कहा- मैं सुप्रीम कोर्ट बार-बार जाकर थक चुका हूं। मुझे नहीं लगता कि वहां जाने का कोई फायदा है। मुझे भारत के सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा उम्मीद नहीं बची है।
  • सिब्बल ने उल्लेख किया कि अदालत को मतदाताओं के नाम कथित रूप से गलत तरीके से हटाने और जोड़ने के बारे में बार-बार सूचित किया गया, फिर भी उसने कोई राहत नहीं दी, जबकि बाद के ट्रिब्यूनल डेटा से पता चला कि बहुत से नामों को हटाना गलत था। उन्होंने कहा कि हालांकि अभी भी संविधान को बचाने वाली एकमात्र संस्था सुप्रीम कोर्ट ही है, लेकिन कुछ मामलों में व्यक्तिगत रूप से उन्हें अब उससे बहुत उम्मीद नजर नहीं आती।

कपिल सिब्बल के अलावा कई अन्य वकीलों ने भी हाल में न्यायपालिका की सार्वजनिक रूप से कड़ी आलोचना की हैं। इनमें उनका आशय रहा है कि सुप्रीम कोर्ट लोगों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने में विफल या अप्रभावी साबित हो रहा है। मसलन,

  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर अक्टूबर के पहले हफ्ते में शुरू हुए कॉकरोच आंदोलन के क्रम दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों/ वकीलों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने चेतावनी दी कि अगर सुप्रीम कोर्ट शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और वकीलों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए हस्तक्षेप नहीं करता, तो “यह ना केवल अपनी प्रासंगिकता खो देगा, बल्कि देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपहास का पात्र भी बन जाएगा।”
  • इसके पहले भूषण ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट के नाकाम रहने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि लगभग आधे जज सरकार की कठपुतलियों की तरह काम कर रहे हैं। उन जजों के महत्त्वपूर्ण मामलों में सरकार के खिलाफ फैसला सुनाने की संभावना बहुत कम होती है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दुष्यंत दवे अदालत पर मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहने, इंसाफ देने से बचने, और नागरिकों को निराश करने का आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने ऐसे सवालों से सुप्रीम कोर्ट को कठघरे में खड़ा किया है कि क्या वह नागरिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में अपने संवैधानिक कर्त्तव्य को निभा रहा है?
  • मिहिर देसाई और गोपाल नारायण जैसे वरिष्ठ वकील भी इससे मिलती-जुलती बातें कह चुके हैं।
  • ये विचार आम तौर पर चुनावी मुद्दों, विरोध प्रदर्शनों, नागरिक स्वतंत्रता के मामलों, कड़े कानूनों के तहत जमानत ना मिलने, और वर्तमान सरकार के प्रति अत्यधिक नरमी के संदर्भ में जताए गए हैं।

भारत की संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य के लिए ये बातें बेहद अहम हैं। इसलिए कि भारत में सरकार (कार्यपालिका) और विधायिका को लेकर आम जन में पहले ही भरोसा काफी घट चुका है। इसकी वजह आम जन से किए गए वादों को पूरा ना किया जाना है। सरकारें लोगों को बेहतर जीवन स्तर देने में विफल रही हैं और विधायिकाएं उनकी प्रभावशाली ढंग से जवाबदेही तय करने की अपनी भूमिका नहीं निभा पा रही हैं। इस कारण लोगों का सब्र टूट रहा है।

इसके बीच न्यायपालिका एकमात्र संस्था है, जिससे लोगों को इंसाफ पाने तथा सरकार के अतिरेक कदमों को रोकने की आशा बची थी। लेकिन गुजरे वर्षों में जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह देखकर निराश होता चला गया है कि खास कर जिन मामलों में नरेंद्र मोदी सरकार के राजनीतिक हित जुड़े थे, उनमें न्यायपालिका संवैधानिक अपेक्षाओं के अनुरूप अवरोध एवं संतुलन की अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रही। इस भावना की अभिव्यक्ति ही हालिया प्रतिक्रियाओं और विपक्ष की राजनीतिक गतिविधियों के जरिए हुई है।

यह संवैधानिक व्यवस्था के लिए बढ़ती चुनौतियों के एक नए मुकाम पर पहुंच जाने का संकेत है। राजनीतिक अर्थशास्त्री राहुल मुखर्जी ने भारत में आर्थिक सुधारों को समझाने के लिए एक मॉडल विकसित किया था, जिसे ‘टिपिंग-प्वाइंट मॉडल’ (Tipping-Point Model) कहा जाता है। यह मॉडल भारत की संवैधानिक व्यवस्था के प्रति हो रही प्रतिक्रियाओं को समझने के लिहाज से भी सहायक हो सकता है। इसके मुताबिक किसी व्यवस्था के भीतर चुनौतियां इकट्ठी हो रही हों, तब भी वह व्यवस्था वर्षों तक दबाव को सहन कर सकती है। लेकिन जब ये चुनौतियां एक निश्चित सीमा को पार जाती हैं, तो एक छोटा-सा झटका भी बहुत बड़े बदलाव की राह खोल सकता है।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में मुखर्जी ने इस बात तो दो उदाहरणों से समझाने का प्रयास किया था। इसके मुताबिक किसी पुल पर वाहनों का बोझ बढ़ता चला जाए, तब भी पुल टिका रहता है। लेकिन एक हद के बात कोई आखिरी मोटर साइकिल आती है, तो पुल अपने ऊपर जमा हुए बोझ को सह पाने में नाकाम हो जाता है। वही क्षण टिपिंग प्वाइंट कहा जाता है। लेकिन टिपिंग प्वाइंट पुल ढहने का असल कारण नहीं होता। इसी तरह कोई भूकंप लंबे समय से धरती के नीचे टेक्टोनिक परतों की स्थिति में जारी अस्थिरता का परिणाम होता है। मगर किसी एक रोज कोई आखिरी परत खिसकती है, जिससे भूकंप आ जाता है।

भारतीय राजनीति भी शायद ऐसे ही किसी मोड़ की ओर बढ़ रही है। शिक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया कि लगातार जारी लामबंदी (प्रदर्शन) सरकारों को झुकने पर मजबूर कर सकती है। निर्वाचन आयोग से जुड़े विवाद ने अब इस दबाव को चुनावी राजनीति तक पहुंचा दिया है।

तो इस समय हमारे सामने यह महत्त्वपूर्ण सवाल उपस्थित है कि क्या देश किसी बड़ी उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है?

अथवा, फिलहाल देश में बिखरा हुआ गुस्सा किसी टिकाऊ राजनीतिक संगठन का रूप ले सकता है?

पहली सूरत भयावह है। इसलिए कि सिर्फ उथल-पुथल से कभी कुछ नहीं बनता। उलटे बहुसंख्यक जनता को इसकी पीड़ा से गुजरना पड़ता है, जबकि उससे हासिल कुछ नहीं होता। लेकिन, जैसे पुल के ढहने या भूकंप के आने का पूर्वानुमान संभव नहीं है, वैसे ही अगर स्थितियां बन रही हों, तो सामाजिक या राजनीतिक उथल-पुथल से बचना अक्सर मुमकिन नहीं रह जाता है।

असल बात है ऐसी स्थितियों का बनना। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नतीजों की बिना चिंता किए भारत में राजनीतिक ताकतों ने ऐसी स्थिति बनने दी है। वे यह समझने में नाकाम रहीं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था एक सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करती है, जिसमें लोगों का गुस्सा विस्फोट की स्थिति आने के पहले ही संस्थागत माध्यमों के जरिए निकल जाता है। अपनी बात कहने और प्रतिरोध जताने की इजाजत, विधि-सम्मत न्याय व्यवस्था और अंततः चुनाव के जरिए जवाबदेही तय करने का सिस्टम- इसी तरह के सेफ्टी वॉल्व समझे जाते हैं। भले इनसे असल में कुछ ना बदलता हो- लोगों की जिंदगी बेहतर ना होती हो, लेकिन इस सिस्टम के जरिए ऐसा होने का भ्रम बना रहता है, जिससे व्यवस्था सुरक्षित रहती है। यह साफ है, आज भारत की संवैधानिक व्यवस्था के बारे में ऐसा भरोसा रखना कठिन हो गया है।

वैसे, एक और सूरत होती है, जिससे टिपिंग प्वाइंट किसी नए निर्माण का बिंदु बन सकती है। ऐसा तब होता है, अगर ऐसी नई ताकतें उभरें, जो पुरानी व्यवस्था को चुनौती भर देने से आगे बढ़ें और अगली व्यवस्था का निर्माण करें। क्या भारत में इसकी संभावना है? फिलहाल, ये उम्मीद नहीं दिखती। इसलिए कि नई ताकतों का उदय नए विमर्श के साथ होता है। फिलहाल, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे किसी विमर्श का संकेत तक मौजूद नहीं है।

फिलहाल सूरत यह है कि एक तरफ सत्ता पक्ष है, जो अपने समर्थन आधार और चुनाव प्रबंधन की क्षमता के बूते अपनी सत्ता कायम रखने को लेकर आश्वस्त है। इसलिए उसे दूसरी तरफ उबल रहे “गुस्से” की कोई परवाह नहीं है। उसे वह पराजित एवं विफल ताकतों की निष्प्रभावी प्रतिक्रिया मानता है। उसे यकीन है कि राज्य के दमनकारी तंत्र के जरिए विरोधी ताकतों को वह नियंत्रित रखा जा सकता है।

दूसरी तरफ विपक्ष एवं वे समूह हैं, जो सही या गलत, लेकिन धीरे-धीरे यह मानने लगे हैं कि सत्ता पक्ष इसलिए सत्ता में नहीं है कि उसके साथ लोगों की बहुसंख्या है। बल्कि वह सत्ता में इसलिए बना हुआ है, क्योंकि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के धरातल को अनुचित तरीकों से अपनी तरफ झुका कर वह जनादेश गढ़ रहा है। इस स्थिति में निर्वाचित सरकार की वैधता (legitimacy) का सवाल खड़ा होता है, जिसे असल में इस समय उठाया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दावा कर चुके हैं कि 2024 से हुए सभी चुनावों में धांधली हुई और इस कारण उनसे चुनी गई सरकारें अवैध हैं। विपक्षी दलों और सिविल सोसायटी मे ऐसे बहुत से लोग हैं, जो खड़गे की राय से सहमत नजर आते हैं।

इन हालात ने भारत के राजनीतिक क्षितिज पर एक गतिरोध निर्मित कर दिया है। अगर न्यायपालिका से न्याय पाने की संभावना सभी पक्षों में बनी रहती, तो इस गतिरोध का समाधान संभव था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब खुद न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल गहरा गए हैं। इसी से उपजे विवाद की झलक 12 अक्टूबर को देखने को मिली। उस रोज जो हुआ, वह कई वर्षों से बनती स्थिति का परिणाम था। इस नई सूरत का क्या नतीजा होगा, उस बारे में सोचना भयभीत करता है, हालांकि उसका सही अनुमान लगाना फिलहाल संभव नहीं है।

शेयर बाजार में हेरफेर मामले में ED की बड़ी कार्रवाई, 6 शहरों में 29 ठिकानों पर की छापेमारी

केंद्रीय जांच एजेंसी ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मुंबई जोनल ऑफिस-I ने शेयर बाजार में कथित हेरफेर और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में बड़ी कार्रवाई की है। ED ने 16 अक्टूबर 2026 को महाराष्ट्र, गुजरात समेत 6 शहरों में 29 ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई मुंबई, नासिक, अहमदाबाद, गांधीनगर, सूरत और भावनगर में की गई।

ED के इस जांच का संबंध लिस्टेड कंपनियों M/s R M Drip and Sprinklers Systems Ltd और M/s R&B Denims Ltd के शेयरों में कथित हेरफेर से है। ED ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 के तहत यह कार्रवाई की है।

शेयरों के आवंटन से लेकर कीमत बढ़ाने तक की जांच

प्रवर्तन निदेशालय की जांच में सामने आया कि अप्रैल 2023 से मार्च 2024 के बीच दोनों कंपनियों ने चुनिंदा व्यक्तियों और संस्थाओं को 3.5 करोड़ से अधिक शेयर और कन्वर्टिबल वारंट जारी किए। जांच एजेंसी के मुताबिक, इन शेयरों के भुगतान में बड़ी रकम कुछ सीमित और आपस में जुड़े लोगों, कंपनियों और कर्जदाताओं के समूह से आई थी। इसके साथ ही आरोप है कि इसके बाद आने वाले महीनों में दोनों कंपनियों के शेयरों की कीमत लगातार बढ़ाई गई, जबकि अधिकांश शेयर उन्हीं लोगों के पास बने रहे।

‘Multibagger Stocks’ जैसे व्हाट्सऐप ग्रुप से निवेशकों को लुभाया

ED की जांच में यह भी सामने आया कि दिसंबर 2025 के अंत से फरवरी 2026 के बीच ‘Multibagger Stocks’ जैसे नामों वाले व्हाट्सऐप कम्युनिटी ग्रुप के जरिए इन दोनों शेयरों को खरीदने के लिए रोजाना टिप्स भेजे जा रहे थे। जांच एजेंसी के अनुसार, इन ग्रुपों के जरिए छोटे और खुदरा निवेशकों को शेयर खरीदने के लिए आकर्षित किया गया। इन ग्रुपों को चलाने के लिए हरियाणा और मुंबई में दूसरे लोगों के नाम पर लिए गए सिम कार्ड का इस्तेमाल किया गया, जबकि इनका संचालन गुजरात के भावनगर से किया जा रहा था।

ED के मुताबिक, इन संदेशों के बाद दोनों शेयरों में खरीदारों की संख्या करीब 3,400 से बढ़कर एक लाख से अधिक हो गई।

व्हाट्सऐप ग्रुप डिलीट होते ही शेयरों में भारी गिरावट

जांच के अनुसार, 25 फरवरी 2026 को इन व्हाट्सऐप ग्रुपों को अचानक डिलीट कर दिया गया। इसके बाद दोनों कंपनियों के शेयर लोअर सर्किट पर आ गए और कुछ ही दिनों में उनकी कीमत करीब 70 प्रतिशत तक गिर गई। इस घटनाक्रम के कारण एक लाख से अधिक छोटे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ। कई निवेशक ऐसे शेयरों के साथ फंस गए, जिन्हें वे गिरती कीमतों के बीच बेच नहीं पा रहे थे।

कंपनियों के दफ्तर, प्रमोटरों के घर और ब्रोकिंग फर्मों पर छापे

ED ने जिन ठिकानों की तलाशी ली, उनमें दोनों कंपनियों के कार्यालय, उनके प्रमोटरों के आवास, कम कीमत पर शेयर पाने वाले लोगों के ठिकाने, स्टॉक-ब्रोकिंग और फाइनेंस कंपनियों के कार्यालय तथा कथित तौर पर प्रचार के लिए इस्तेमाल किए गए व्हाट्सऐप ग्रुपों के संचालन से जुड़े लोगों के परिसर शामिल हैं। छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी ने कई आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस, शेयर लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड और संपत्तियों के दस्तावेज बरामद कर जब्त किए हैं।

ED मामले में मनी लॉन्ड्रिंग और शेयर बाजार में कथित हेरफेर से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच कर रही है। मामले में आगे की जांच जारी है।

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Gaon Chalo Andolan: गुजरात से यूपी-बिहार में वापस अपने घर लौट रहे हैं लाखों माइग्रेंट वर्कर, जानें सूरत के ‘गांव चलो आंदोलन’ का सच

गुजरात के बड़े टेक्सटाइल और डायमंड हब सूरत में काम कर रहे लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर में हाल के समय में बड़ा और अहम ट्रेंड देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार के यह प्रवासी कामगार अपने गृह नगर वापस लौट रहे हैं। स्थानीय खबरों में इसे ‘गांव चलो आंदोलन’ कहा जा रहा है। रेलवे प्लेटफॉर्म पर माइग्रेंट वर्कर्स की भीड़ और एम्ब्रॉयडरी और टेक्सटाइल यूनिट्स से वर्कर्स के जाने की खबरों में बड़े पैमाने पर पलायन का दावा किया जा रहा है। कुछ खबरों का कहना है कि इसमें 10 लाख तक वर्कर्स शामिल हो सकते हैं।

बताया जा रहा है कि ‘गांव चलो आंदोलन’ है एक कैंपेन है जो वर्कर्स को लंबे समय तक काम करने, साप्ताहिक अवकाश न मिलने, सैलरी में कटौती और नौकरी से निकाले जाने के आरोपों के बीच अपने गांवों में लौटने को बढ़ावा दे रही है। सीएनएन न्यूज 18 की खबर के मुताबिक मजदूर प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्कर्स उन काम करने के हालात को मानने को तैयार नहीं हैं जिन्हें वे सही नहीं मानते हैं। हालांकि, सूरत से मिली दूसरी रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई वर्कर्स दिवाली और छठ पूजा से पहले बस घर जा रहे हैं, जैसा कि वे हर साल करते हैं। तो, सूरत में असल में क्या हो रहा है? क्या माइग्रेंट वर्कर्स को गुजरात से बाहर जाने के लिए मजबूर किया जा रहा है, या यह रेगुलर सीजनल माइग्रेशन बढ़ते लेबर विवाद के साथ हुआ है?

क्या है ‘गांव चलो आंदोलन’?

‘गांव चलो आंदोलन’, सूरत की टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री में काम करने वाले प्रवासी मजदूरों से जुड़ा एक अभियान है। काम के घंटे, हर हफ्ते की छुट्टियां, सैलरी और मजदूर सुरक्षा लागू करने को लेकर कामगारों और फैक्ट्री मालिकों के बीच लंबे समय से चल रहे मतभेद के बीच इसने ध्यान खींचा है। अक्टूबर की शुरुआत में इस कैंपेन ने फिर से जोर पकड़ा, जब लेबर कोड के पालन से जुड़े भरोसे और श्रम विभाग के निर्देश के बाद पहले के विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए गए थे। इसके बाद वर्कर के प्रतिनिधि अजय दुबे ने वर्कर्स से कहा कि अगर उनकी चिंताओं का समाधान नहीं होता है तो वे कम से कम दो महीने के लिए अपने गांव लौटने पर विचार करें।

द टाइम्स ऑफ इंडिया की 3 अक्टूबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुबे ने वर्कर्स से कहा कि वे मालिकों से साफ जवाब की मांग करें, जहां जरूरी हो वहां लेबर अधिकारियों को अलग-अलग शिकायतें दें, और उन जगहों पर जाने पर विचार करें जो लेबर की जरूरतों का पालन करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हर हफ्ते की छुट्टियां देने से मना किया जाता रहा तो वर्कर्स रविवार को मशीनरी बंद कर दें।

इसलिए यह आंदोलन सिर्फ वर्कर्स के शहर छोड़ने के बारे में नहीं है। यह लेबर की कमी की संभावना का इस्तेमाल करके नियोक्ताओं पर लंबे समय से चली आ रही काम की जगह की शिकायतों को दूर करने का दबाव बनाने की भी एक कोशिश है।

वर्कर्स सूरत क्यों छोड़ रहे हैं? फैक्ट्री मालिकों पर आरोप

सूरत से मिली खबरों में इंटरव्यू किए गए कामगारों का कहना है कि उन्हें आराम करने के लिए बहुत कम समय मिलता है और उनके काम की अवधि पर उनका नियंत्रण कम होता है। कई वर्कर्स का आरोप है कि उनसे दिन में लगभग 12 घंटे और कुछ जगहों पर तो महीने में 30 दिन तक काम करने की उम्मीद की जाती है। उनका कहना है कि हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मांगने पर मैनेजमेंट के साथ झगड़े हो सकते हैं, जबकि छुट्टी मांगने पर सैलरी कट सकती है, पेमेंट रोका जा सकता है या नौकरी से निकाला जा सकता है।

मुख्य मांगों में से एक है काम के घंटे घटाकर दिन में आठ घंटे करना, साथ ही पेड वीकली छुट्टी, बेहतर होगा कि रविवार को दी जाए। मजदूरों ने समय पर वेतन देने और मज़दूरों की सुरक्षा को बेहतर तरीके से लागू करने की भी मांग की है, जिसमें प्रोविडेंट फंड, एम्प्लॉई स्टेट इंश्योरेंस (ESI) और जहां लागू हो, वहां ग्रेच्युटी बेनिफिट शामिल हैं।

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Vadodara Bullet Train Update: देश के सबसे बिजी रेल रूट पर सबसे मुश्किल काम पूरा, 8.3 KM के स्ट्रेच में लगी 14 विशाल बीम

वडोदरा। मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल यानी बुलेट ट्रेन परियोजना ने वडोदरा में अपनी सबसे बड़ी इंजीनियरिंग चुनौतियों में से एक को पार कर लिया है। दिल्ली-मुंबई राजधानी मेन लाइन के ऊपर सभी 14 पोर्टल बीम का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा हो गया है।

यह सिर्फ कंस्ट्रक्शन का एक पड़ाव नहीं है, बल्कि बुलेट ट्रेन कॉरिडोर को वडोदरा के मौजूदा रेलवे नेटवर्क से इंटीग्रेट करने की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है। खास बात यह है कि यह काम देश के सबसे व्यस्त रेलवे रूट पर बिना ट्रेनों की आवाजाही को बाधित किए किया गया है।

क्यों अहम है वडोदरा का ये 8.3 KM का हिस्सा?

वडोदरा का यह पूरा स्ट्रेच करीब 8.3 किलोमीटर लंबा है और यह घनी आबादी वाले शहरी और रेलवे इलाके से होकर गुजरता है। यहां बुलेट ट्रेन का रूट भारतीय रेलवे की पांच लाइनों को क्रॉस करता है, जिसमें दो मेन लाइनें शामिल हैं।

सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बुलेट ट्रेन का एलाइनमेंट दिल्ली-मुंबई राजधानी मेन लाइन को तिरछा यानी डायगोनली पार करता है। ऐसे में जरूरी क्लीयरेंस बनाए रखने और मौजूदा रेल सिस्टम के साथ सुरक्षित कनेक्टिविटी के लिए विशेष डिजाइन वाले पोर्टल स्ट्रक्चर की जरूरत थी।

14 पोर्टल बीम कहां लगी ?

NHSRCL के मुताबिक, इन 14 पोर्टल बीम में से 10 बीम वडोदरा बुलेट ट्रेन स्टेशन और विश्वामित्री रेलवे स्टेशन के बीच सूरत की तरफ लगाए गए हैं। वहीं, 4 बीम वडोदरा रेलवे स्टेशन और छायापुरी रेलवे स्टेशन के बीच अहमदाबाद की तरफ हैं।

ये पोर्टल बीम एक मजबूत स्ट्रक्चरल फ्रेम का काम करेंगे, जिसके ऊपर बुलेट ट्रेन वायाडक्ट का सुपरस्ट्रक्चर बनाया जाएगा।

अब आगे क्या होगा? 

इन बीम के पूरा होने के साथ ही अब इस सेक्शन में वायाडक्ट के इंटीग्रेशन को गति मिलेगी।

– राजधानी मेन लाइन क्रॉसिंग वाले हिस्से पर इन 14 बीम के ऊपर लगभग 40 मीटर लंबे कम्पोजिट गर्डर लगाए जाएंगे।

– बाकी पोर्टल बीम वाली लोकेशंस पर स्पैन-बाय-स्पैन लॉन्चिंग तकनीक से काम आगे बढ़ेगा।

1500 टन वजन, मौके पर ही हुई ढलाई

इन बीम की इंजीनियरिंग भी बेहद खास है। हर पोर्टल बीम का वजन लगभग 1,500 टन है। जगह कम होने और चालू रेलवे लाइनों के बीच काम करने की मजबूरी के कारण इन्हें ‘कास्ट-इन-सीटू’ यानी मौके पर ही ढलाई करके बनाया गया है। पारंपरिक प्रीकास्ट लॉन्चिंग मेथड यहां संभव नहीं था।

हर बीम की लंबाई करीब 37 मीटर, चौड़ाई 4 मीटर और ऊंचाई 4 मीटर है। एक बीम को बनाने में लगभग 590 क्यूबिक मीटर कंक्रीट लगता है, जबकि सिर्फ इसके अंदर लगने वाले स्टील के रीइन्फोर्समेंट केज का वजन ही 55 टन है।

इसे बनाने के लिए हाई-कैपेसिटी क्रेन, हाइड्रोलिक जैक, लंबे बूम वाले कंक्रीट पंप और सटीक सर्वे इक्विपमेंट का इस्तेमाल किया गया। NHSRCL को इसके लिए भारतीय रेलवे के साथ मिलकर हर चरण की माइक्रो-प्लानिंग करनी पड़ी और कई बार रेलवे ब्लॉक भी लेना पड़ा।

365 दिन तक MrBeast से मिलने की कोशिश करती रही भारतीय लड़की, आखिरी दिन मिला ऐसा तोहफा कि चौंक गए लोग!

कभी-कभी किसी सपने को पूरा करने के लिए सिर्फ किस्मत नहीं, बल्कि लगातार कोशिश करने का हौसला भी चाहिए। गुजरात के सूरत की रहने वाली माया गुप्ता ने कुछ ऐसा ही कर दिखाया है। उन्होंने दुनिया के मशहूर YouTube क्रिएटर MrBeast से मिलने के लिए पूरे 365 दिन तक अभियान चलाया। हर दिन वह सोशल मीडिया पर अपनी कोशिशों का अपडेट देती रहीं और लोगों को अपनी यात्रा से जोड़ती गईं।

आखिरकार, चुनौती के आखिरी दिन उनका सपना पूरा हो गया। MrBeast से मुलाकात के दौरान उन्हें 10,000 डॉलर यानी करीब 9.57 लाख रुपये मिले, जिन्हें वह अपने समुदाय के लिए किए जा रहे कामों में इस्तेमाल कर सकती हैं।

एक साल तक नहीं मानी हार

माया गुप्ता ने MrBeast तक अपनी बात पहुंचाने के इरादे से यह अनोखी चुनौती शुरू की थी। उन्होंने अपने Instagram अकाउंट @mayaforbeast पर लगातार वीडियो और अपडेट साझा किए। शुरुआत में यह उनकी निजी कोशिश थी, लेकिन समय के साथ हजारों लोग उनके सफर को फॉलो करने लगे।

माया के लिए हर दिन एक नई उम्मीद लेकर आता था। उन्होंने इस अभियान को बीच में छोड़ने के बजाय पूरे एक साल तक जारी रखा। जैसे-जैसे 365 दिनों की समयसीमा करीब आती गई, उनके फॉलोअर्स की उत्सुकता भी बढ़ती गई। चुनौती के 361वें दिन उन्होंने बताया कि अब सिर्फ चार दिन बाकी हैं।

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MrBeast तक पहुंचा संदेश

माया की मेहनत का असर सितंबर में दिखाई दिया, जब उन्होंने बताया कि MrBeast की ओर से उनसे ईमेल एड्रेस और WhatsApp की जानकारी मांगी गई है। यह उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी, क्योंकि एक साल से जिस मुलाकात का इंतजार था, वह अब हकीकत बनती नजर आ रही थी। हालांकि, उस समय भी यह तय नहीं था कि मुलाकात कब और कैसे होगी। माया ने अपने फॉलोअर्स को अपडेट देना जारी रखा और आखिरी दिन तक अपनी कोशिशों पर कायम रहीं।

सिर्फ मिलने का सपना नहीं

माया की इस कहानी को खास बनाने वाली बात सिर्फ MrBeast से मिलने की चाहत नहीं थी। इस पूरे साल के दौरान उन्होंने अपने स्थानीय समुदाय में लोगों को खाना खिलाने जैसे कामों को भी सोशल मीडिया पर दिखाया।

इस तरह उनकी चुनौती एक व्यक्तिगत सपने से आगे बढ़कर समाज की मदद करने की पहल बन गई। MrBeast से मुलाकात के बाद मिले 10,000 डॉलर भी इसी सामुदायिक काम को आगे बढ़ाने के लिए दिए गए।

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365वें दिन पूरा हुआ सपना

चुनौती के आखिरी दिन माया आखिरकार MrBeast से मिलीं और उन्हें 10,000 डॉलर की राशि मिली। उनकी इस उपलब्धि पर सोशल मीडिया यूजर्स ने खुशी जताई। कई लोगों ने उनकी मेहनत की तारीफ की और इसे सपने के सच होने जैसा पल बताया।

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लोकतंत्र का रण-क्षेत्र

यह सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि सभी हित-धारकों से संवाद कर वह अधिकतम सहमति बनाने का प्रयास करे, ताकि लोकतंत्र वोट के अलावा किसी अन्य तरह के शक्ति-प्रदर्शन का रण क्षेत्र ना बन जाए।

कॉकरोच प्रतिरोध को रोकने के लिए राष्ट्रीय राजधानी की किलेबंदी और आंदोलनकारियों पर सख्त कार्रवाई से ऐसा गतिरोध खड़ा हो रहा है, जिसके परिणाम के बारे में अभी अनुमान लगाना कठिन है। चूंकि इस जन आंदोलन के समानांतर विपक्षी दल भी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को रद्द करने, और हाल में हुए चुनावों को रद्द करने की मांग को लेकर आंदोलन चला रहे हैं, अतः राजनीतिक संकट अधिक गंभीर हो गया है। स्पष्टतः जनमत के एक बड़े हिस्से का चुनावों की पवित्रता पर यकीन नहीं रहा, नतीजतन उसके मन में निर्वाचित सरकारों की वैधता पर प्रश्न खड़े लगे हैं।

इसके खिलाफ हो रहे प्रतिरोध के दमन की कोशिशें इन सवालों को और गंभीर रूप देंगी। लोकतांत्रिक देशों में अक्सर ऐसी स्थितियां दीर्घकालिक अस्थिरता का कारण बनती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि नरेंद्र मोदी सरकार ऐसी आशंकाओं के प्रति लापरवाह बनी हुई है। इस सूरत में सुप्रीम कोर्ट सार्थक हस्तक्षेप कर सकता था, लेकिन एसआईआर के सवाल पर बार-बार गुजारिश लेकर वहां जाने वाले वरिष्ठ वकील अब यह कहने लगे हैं कि वहां से राहत की कोई उम्मीद नहीं बची। कुछ अधिवक्ताओं ने तो यह सवाल उठा दिया है कि क्या नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के नजरिए से न्यायपालिका प्रासंगिक रह गई है? इन संदेहों और सवालों के जल्द जवाब नहीं ढूंढे गए, तो संवैधानिक व्यवस्था के अवरोध-ग्रस्त हो जाने की स्थिति बन सकती है।

अतः उचित होगा कि सत्ता पक्ष अपने संसदीय बहुमत और चुनाव/ उप-चुनावों में मिल रही जीत के आधार पर अत्यधिक आश्वस्त ना रहे। उसे भारत में खड़े हो रहे संकट को वैश्विक स्तर पर जन आंदोलनों से स्थापित सत्ता ढांचों को मिल रही चुनौतियों के व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। सत्ता में होने के नाते यह उसकी जिम्मेदारी है कि सभी हित-धारकों से संवाद कर वह अधिकतम सहमति बनाने का प्रयास करे, ताकि लोकतंत्र वोट के अलावा किसी अन्य शक्ति-प्रदर्शन का रण क्षेत्र ना बन जाए। उसे याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में ना सिर्फ राजनीतिक दल, बल्कि नागरिक समाज एवं जन संगठन भी समान महत्त्व के हितधारक होते हैं।

विदेश में लुढ़कता रुपया पर भारत में महंगा!

सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने रेपो दर 5.25 से बढ़ा कर 5.50 प्रतिशत कर दी। मतलब भारतीयों के लिए ब्याज दर बढ़ाई। जबकि कल, गुरुवार को प्रति डॉलर, रुपया 96.78 पर था। मेरा मानना है साल के आखिर तक यह रेट सौ पार होगी। अंतर देखें, विडंबना समझें कि जिस रुपए को भारतीय नागरिक कर्ज़ लेकर इस्तेमाल करता है, वह महंगा हो रहा है। जबकि उसी रुपए की अंतरराष्ट्रीय ख़रीद-शक्ति लगातार घटती हुई है। बतौर उदाहरण समझें किसी परिवार ने 50 लाख रुपए का घर कर्ज़ 20 वर्ष के लिए लिया है। यदि ब्याज 8.5 से बढ़ कर 8.75 प्रतिशत हो जाए और शेष अवधि 20 वर्ष हो, तो मासिक किस्त लगभग 43,391 रुपए से बढ़ कर 44,186 रुपए होगी। यानी लगभग 795 रुपए हर महीने बढ़ेगी।

ठीक दूसरी तरफ उसी परिवार का बच्चा यदि विदेश में पढ़ रहा हो तो डॉलर के महंगे होने से उसकी पढ़ाई और रहन-सहन का खर्च भी बढ़ेगा। मतलब एक ही परिवार पर घरेलू ब्याज और विदेशी मुद्रा, दोनों का दोतरफा दबाव।

ऐसी इकोनॉमी का एक और सत्य कि एक तरफ़ सरकार विकास, निवेश और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की हवाबाजी कर रही है। वहीं रिज़र्व बैंक को रुपए को सहारा देने के लिए घरेलू ब्याज दर बढ़ानी पड़ रही है। इतना ही नहीं भागती विदेशी पूंजी से विदेशी मुद्रा कोष में घटते डॉलर या तेल आयात में डॉलर की आवश्यकता के तकाजे में भारत सरकार (रिज़र्व बैंक) ने प्रवासी भारतीयों से अधिक आकर्षक ब्याज दरों के साथ डॉलर का कलेक्शन किया है।

हां, यह फैसला इसी 2026 का है। इससे पहले ऐसा आपातकालीन निर्णय 1991 के भुगतान संकट में हुआ था। उसके बाद 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद तथा 2013 में रुपए पर दबाव बढ़ने की सूरत में एफसीएनआर (बी) जमा योजना के कदम से उठा था। जबकि आज सरकार का यह घर-घर पहुंचा नैरेटिव है कि भारत विकसित हो रहा है। दौड़ रहा है। सबको पछाड़ दिया केवल अमेरिका व चीन को पछाड़ना बाकी है, जिन्हें मोदीजी 2047 में पछाड़ देंगे।

गौर करें तथ्यों पर। आठ जून 2026 को रिज़र्व बैंक ने विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विशेष एफसीएनआर (बी) स्वैप सुविधा शुरू की। कैसे एनआरआई भारतीयों को ललचाया? भारतीय बैंकों को प्रवासी भारतीयों से तीन से पांच वर्ष की विदेशी करेंसी, डॉलर जमा आकर्षित करने की स्कीम दी गई। ब्याज की सामान्य सीमा में छूट, ज्यादा ब्याज देने और रिज़र्व बैंक ने संबंधित विदेशी करेंसी जोखिम की हेजिंग लागत उठाने की व्यवस्था करके।

नतीजतन कुछ बैंकों ने तो डॉलर जमा कराने के लिए जमा दरें लगभग छह से सात प्रतिशत तक की। सरकार ने 24 अगस्त को घोषणा की कि लगभग ग्यारह सप्ताह में 73 अरब डॉलर भारतीय बैंकों ने जुटाए। इनमें 65.4 अरब डॉलर एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट एकत्र हुई। मतलब भारत का विदेशी मुद्रा कोष भरा। हिसाब से इससे भारत का रुपया मजबूत होना चाहिए। जब भारत के पास करेंसी रिजर्व है तब रुपया क्यों लुढ़के? विदेशी निवेशकों का भी भरोसा बनना या लौटना चाहिए था।

लेकिन विदेशियों ने याकि दुनिया ने भारत के शेयर बाजार (इकोनॉमी) को जस का तस भारी जोखिम का ठिकाना माने रखा। उनका पैसा निकालना थमा ही नहीं। परिणाम क्या है? कोई 133 अरब डॉलर के बड़े विदेशी मुद्रा जमा जुटाने के बाद भी रुपया अक्टूबर में 97 प्रति डॉलर के करीब है?

जाहिर है विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारत पर भरोसा लौट नहीं रहा। सरकार, रिज़र्व बैंक कितना ही दम लगा लें अपने आयात बिल, महंगा तेल, वैश्विक ब्याज दरें, दुनिया की दूसरी इकोनॉमी (भले वे भारत जैसे फुलाए विकास आंकड़े न दें) के ठोस विकास का जवाब नहीं दे सकते। भारत और भारतीय कंपनियों की कमाई को साल-डेढ़ साल से वैश्विक निवेशक तौलते-तौलते उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जिससे खोखलापन जगजाहिर है। तभी दुनिया के नंबर एक खरबपति (जिसकी बात, उत्पादकता, सनक का हर शब्द दुनिया सुनती है) इलॉन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कल भारत से पूछा, ‘क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत आए, ताकि उनका एकछत्र राज बना रहे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं…’। मस्क ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि यह भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है।

रांची के रेलवे स्टेशन की बदलने जा रही सूरत, यात्रियों के लिए उपलब्ध होंगी ये नई सुविधाएं

झारखंड की राजधानी रांची के रेलवे स्टेशन की सूरत बदलने जा रही है। इसे वर्ल्ड क्लास स्टेशन बनाने का 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है। इस पर करीब 447 करोड़ खर्च होने का अनुमान है। स्टेशन का काम पूरा होने पर यात्रियों को नई सुविधाएं मिलेंगी। नए स्टेशन को लेकर लोगों में काफी उत्साह है।

नई इमारत में 100 बेड की डॉरमेट्री

रांची रेलवे स्टेशन की नई इमारत में 100 बेड की डॉरमेट्री बनाई जा रही है। महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग दो डॉरमेट्री होंगी। प्रॉपर वॉशरूम से लेकर ब्रेस्टफीडिंग एरिया, कैंटीन, कैफेटेरिया जैसी सुविधाएं यात्रियों को मिलेंगी। बताया जा रहा है कि स्टेशन के साऊथ गेट के खुल जाने के बाद मुख्य गेट पर लोड घट जाएगा।

दुर्गा पूजा के बाद दो टिकट काउंटर होंगे शुरू

रांची रेल मंडल की सीनियर डीसीएम श्रेया सिंह ने कहा, “दुर्गा पूजा के बाद दो नए टिकट काउंटर भी खुल जाएंगे। दिसंबर में प्लेटफार्म नंबर 6 के ऑपरेशनल हो जाने की उम्मीद है। नई बिल्डिंग में भी कामकाज शुरू हो जाएगा। प्लेटफार्म नंबर 6 तैयार हो चुका है। यहां पर ट्रेन भी लूप में रुकती है। प्लेटफॉर्म पर एस्केलेटर का काम भी पूरा हो चुका है।”

मुख्य गेट पर यात्रियों का दबाव 50% घटेगा

लिफ्ट की फैसिलिटी शुरू होने से यात्रियों को काफी सुविधा होगी। साऊथ गेट खुलने से मुख्य गेट पर यात्रियों की भीड़ 50 फीसदी तक कम हो जाएगी। हटिया से आने वाले लोग डायरेक्ट साऊथ गेट आ सकेंगे। उनको घूम कर मेन गेट की तरफ आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यहां यात्रियों के बैठने की व्यापक व्यवस्था होगी।

2 महीनों में यात्रियों की नई सुविधाएं मिलने लगेंगी

श्रेया सिंह ने बताया, ” 2 महीने में यात्रियों को नई सुविधाएं मिलने लगेंगी। यात्रियों को नया एक्सपीरियंस होगा। यहां चार-पांच एटीवीएम (ऑटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीन) भी लगाए जाएंगे। इससे यात्रियों को टिकट के लिए टिकट काउंटर पर जाने की जरूरत नहीं रह जाएगी। इससे टिकट काउंटर पर भी लोड कम होगा।

(रांची से शिखा श्रेया की रिपोर्ट)