कल का मौसम 20 अक्टूबर: अरब सागर में तेज हवाओं का अनुमान! MP, राजस्थान और महाराष्ट्र समेत इन 12 राज्यों में आंधी-लाइटनिंग का अलर्ट

IMD Weather Update: देश के मौसम में अलग-अलग मौसमी प्रणालियों के एक्टिव होने की वजह से एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा जारी ताजा और विस्तृत मौसम बुलेटिन के मुताबिक मंगलवार 20 को देश के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज काफी कड़ा रहने वाला है। मौसम विभाग ने दक्षिण प्रायद्वीप से लेकर पश्चिमी, मध्य और पूर्वी राज्यों तक करीब 12 राज्यों में मूसलाधार बारिश, आंधी-तूफान और आकाशीय बिजली चमकने का अलर्ट जारी किया है। इसके साथ ही दक्षिण-पश्चिम अरब सागर में तेज हवाओं के चलने की चेतावनी दी गई है।

आइए जानते हैं कल 20 अक्टूबर को देश के विभिन्न राज्यों में कैसा रहेगा मौसम का हाल:-

दक्षिण भारत में भारी से बहुत भारी बारिश का तांडव

दक्षिण प्रायद्वीप में उत्तर-पूर्वी मानसून और अन्य सक्रिय प्रणालियों के असर से बारिश का दौर पूरी तरह चरम पर है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक 20 अक्टूबर को तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराइकल के अलग-अलग हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की पूरी संभावना है।

इसके अलावा केरल और माहे संग तटीय आंध्र प्रदेश में भी भारी बारिश देखने को मिलेगी। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि इस दौरान तटीय आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराइकल के कुछ इलाकों में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे (झोंके 60 किमी/घंटे) की गति से तेज तूफानी हवाएं चलेंगी और गरज-चमक के साथ आकाशीय बिजली कड़केगी।

केरल, माहे, लक्षद्वीप, रायलसीमा और तेलंगाना के हिस्सों में भी 30 से 40 किमी/घंटे की रफ्तार से झोंकेदार हवाएं चल सकती हैं। तटीय आंध्र प्रदेश के मैदानी इलाकों में दिन भर तेज सतही हवाएं चलती रहेंगी जबकि तटीय और दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में भी आकाशीय बिजली चमकने के साथ छिटपुट बौछारें पड़ने का अनुमान है।

मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र समेत इन राज्यों में आंधी-लाइटनिंग का अलर्ट

दक्षिण भारत के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी चक्रवातों और मौसमी गतिविधियों की वजह से मौसम बिगड़ा रहेगा। मध्य प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, ओडिशा और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के अलग-अलग हिस्सों में 30 से 40 किमी/घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने और बादलों की गरज के साथ आकाशीय बिजली चमकने की गतिविधियां दर्ज की जाएंगी। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कुछ इलाकों में भारी बारिश होने की भी संभावना है।

इसके अलावा पश्चिम भारत के कोंकण व गोवा और मध्य महाराष्ट्र के क्षेत्रों में कल 40 से 50 किमी/घंटे की गति से तेज आंधी-तूफान और झोंकेदार हवाएं चलने का अनुमान जताया गया है, जिससे इन क्षेत्रों में भी मौसम प्रभावी बना रहेगा।

अरब सागर में स्क्वॉली वेदर और तेज हवाओं की चेतावनी

समुद्री और तटीय इलाकों में उठने वाली हलचल को देखते हुए मौसम विभाग ने विशेष चेतावनी जारी की है। दक्षिण-पश्चिम अरब सागर में स्क्वॉली वेदर के एक्टिव रहने की संभावना है, जिसके तहत वहां 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से लेकर 60 किमी/घंटे तक के तेज हवा के झोंके चल सकते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए मछुआरों और समुद्री गतिविधियों से जुड़े लोगों को सलाह दी गई है कि वे संबंधित समुद्री क्षेत्रों में सावधानी बरतें।

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Climate impact Alert: जलवायु परिवर्तन की मार से गेहूं में होगा बड़ा बदलाव! रोटी की गुणवत्ता पर मंडराया खतरा; सेहत पर भी पड़ सकता है असर

Climate impact ON wheat: जलवायु परिवर्तन का असर अब हमारी थाली तक पहुंच सकता है। जी हां, जिस गेहूं से हर दिन करोड़ों लोगों की रोटी बनती है, उसकी पोषण संबंधी गुणवत्ता और प्रोटीन संरचना भविष्य में बदल सकती है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी में सामने आया है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं के प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे और ब्रेड की क्वालिटी पर पड़ सकता है, बल्कि गेहूं से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है।

स्टडी में खुलासा हुआ है कि वातावरण में बढ़ती CO₂ गेहूं की प्रोटीन संरचना को बदल सकती है। इसका असर बेकिंग गुणवत्ता पर पड़ने के संकेत मिले हैं। जर्मनी के लीबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी और टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल फूड केमिस्ट्री (Food Chemistry) में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में गेहूं की खेती पर विचार करते समय केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। अनाज की गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रोटीन के प्रकारों को भी समझना जरूरी है।

हवा में बढ़ती CO₂ से गेहूं पर कितना असर?

स्टडी के अनुसार, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वर्ष 1980 में इसका स्तर लगभग 340 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) था, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 ppm तक पहुंच गया। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह स्तर 600 ppm तक जा सकता है। गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। ऐसे में वातावरण में CO₂ की बढ़ती मात्रा के बीच इसकी खेती और अनाज की क्वालिटी में होने वाले बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए गेहूं की अलग-अलग किस्मों पर प्रयोग किया।

10 किस्मों पर हुआ प्रयोग, सामने आए चौंकाने वाले बदलाव

शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 खेती की किस्मों को वास्तविक कृषि और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप उगाया। इनमें से कुछ पौधों को सामान्य परिस्थितियों में मौजूद CO₂ के स्तर पर रखा गया। जबकि अन्य पौधों को 546 ppm की बढ़ी हुई CO₂ में उगाया गया। फसल तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों ने गेहूं के दानों में मौजूद प्रोटीन का बारीकी से विश्लेषण किया। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

स्टडी में विशेष रूप से ग्लूटेन प्रोटीन, एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs), प्यूरोइंडोलिन और सीलिएक रोग से संबंधित कुछ पेप्टाइड्स पर ध्यान दिया गया। नतीजों से पता चला कि CO₂ कॉन्सेंट्रेशन का स्तर बढ़ने पर गेहूं के अलग-अलग प्रोटीन समूहों में एक जैसा बदलाव नहीं हुआ। कुछ प्रोटीन बढ़े। जबकि कुछ की मात्रा घट गई। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन गेहूं की प्रोटीन संरचना को प्रभावित कर सकता है।

बढ़ेगा एक तरह का प्रोटीन, घट सकता है ग्लूटेन

इस स्टडी में पाया गया कि बढ़ी हुई CO₂ कॉन्सेंट्रेशन में गेहूं के दानों में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs) की मात्रा बढ़ गई। दूसरी ओर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग से एक्टिव हो सकने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में कमी देखी गई। ATIs ऐसे प्रोटीन हैं जिनकी संभावित हेल्थ संबंधी भूमिका पर वैज्ञानिक अध्यन करते रहे हैं। इनकी मात्रा बढ़ने का असर मानव स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन इस स्टडी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बढ़ी हुई CO₂ में उगा गेहूं सीधे तौर पर लोगों को बीमार कर देगा। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्लूटेन प्रोटीन की मात्रा घटने के साथ गेहूं की बेकिंग गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। यानी प्रोटीन की संरचना में बदलाव का असर रोटी, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की निर्माण संबंधी विशेषताओं पर पड़ सकता है।

क्या गेहूं से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बदल सकता है?

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू गेहूं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि CO₂ बढ़ने के कारण ATIs और सीलिएक रोग से सक्रिय होने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में बदलाव हुआ। सीलिएक रोग एक प्रतिरक्षा सिस्टम से जुड़ी बीमारी है, जिसमें ग्लूटेन के सेवन से छोटी आंत को नुकसान पहुंच सकता है।

हालांकि, स्टडी में कुछ संबंधित पेप्टाइड्स की मात्रा घटने का संकेत मिला। जबकि ATIs की मात्रा बढ़ी। इसलिए इन बदलावों का कुल स्वास्थ्य प्रभाव क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह समझने के लिए आगे अध्ययन करना जरूरी है कि गेहूं में प्रोटीन संरचना के ये बदलाव वास्तव में मानव शरीर की जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस शोध को गेहूं से जुड़ी बीमारियों में निश्चित वृद्धि या कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हर गेहूं की किस्म पर एक जैसा असर नहीं

पीटीआई के मुताबिक, इस अध्ययन में एक और अहम बात सामने आई कि सभी गेहूं की किस्मों में बदलाव समान नहीं थे। प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज के अनुसार, प्रोटीन संरचना में परिवर्तन की सीमा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि गेहूं की कौन-सी किस्म उगाई गई है। यह निष्कर्ष भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि कुछ किस्में बढ़ी हुई CO₂ परिस्थितियों में अपनी गुणवत्ता बेहतर बनाए रखती हैं, तो उन किस्मों की पहचान और विकास पर ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और कृषि क्षेत्रों में और परीक्षण करने होंगे।

भविष्य की खेती के लिए क्या है सबक?

इस स्टडी से साफ संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि खेतों में कितना अनाज पैदा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि उस अनाज में किस तरह के प्रोटीन मौजूद हैं। उसकी बेकिंग गुणवत्ता कैसी है। उसके सेवन से जुड़े संभावित स्वास्थ्य पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में गेहूं की ऐसी किस्में विकसित करने की जरूरत होगी, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार के साथ बेहतर गुणवत्ता बनाए रख सकें।

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फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग

फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन:पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग

फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। अधिकारियों के मुताबिक शनिवार को देशभर में हुए प्रदर्शनों में करीब 5.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में करीब 1.10 लाख लोगों ने मार्च निकाला। कई जगह पुलिस से झड़प, दुकानों में लूटपाट और सरकारी इमारतों में आगजनी हुई। पेरिस और आसपास के इलाकों में 855 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इस आंदोलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि दुनिया के अमीर देशों में शामिल फ्रांस को लगातार आंदोलनों का सामना क्यों करना पड़ता है… 1. फ्रांस में प्रदर्शन करना लोगों की आदत नहीं, ताकत है फ्रांस में सरकार के फैसलों के खिलाफ सड़क पर उतरना कोई नई बात नहीं है। यहां छात्र, कर्मचारी और आम लोग अपनी मांगें मनवाने के लिए प्रदर्शन और हड़ताल करते रहे हैं। इसके पीछे फ्रांस का इतिहास भी एक बड़ी वजह है। 2. ट्रेड यूनियन और हड़तालें आंदोलन को बड़ा बनाती हैं फ्रांस में ट्रेड यूनियन कर्मचारियों को एकजुट कर बड़े पैमाने पर हड़तालें आयोजित करती हैं। इसका असर तब ज्यादा होता है, जब परिवहन, स्कूल और दूसरे सरकारी विभागों के कर्मचारी एक साथ काम बंद कर देते हैं। 1995 में इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री एलेन जुप्पे की सरकार ने पेंशन में बदलाव का प्रस्ताव रखा था। इसके विरोध में रेलवे समेत कई क्षेत्रों के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए। फ्रांस में रेल सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और पेरिस में लोगों को आने-जाने में परेशानी हुई। कई हफ्तों तक चले विरोध के बाद सरकार को अपनी प्रस्तावित योजना के अहम हिस्से वापस लेने पड़े। 3. फ्रांस में अमीर-गरीब की खाई भी विरोध की वजह फ्रांस में अमीर और गरीब के बीच आर्थिक असमानता लंबे समय से एक मुद्दा रही है। इसका असर सिर्फ लोगों की कमाई और जीवनशैली पर नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और आगे बढ़ने के अवसरों पर भी पड़ता है। फ्रांस की सरकारी संस्था INSEE के मुताबिक, देश के सबसे अमीर 10% परिवारों के पास कुल संपत्ति का करीब 47% हिस्सा है। वहीं, सबसे कम संपत्ति वाले 50% परिवारों के पास सिर्फ 8% संपत्ति है। यानी देश की आधी आबादी के मुकाबले अमीर परिवारों के पास कहीं ज्यादा संपत्ति है। आर्थिक असमानता का असर बच्चों की पढ़ाई में भी दिखाई देता है। OECD की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में अमीर परिवारों के बच्चों ने गणित में गरीब परिवारों के बच्चों के मुकाबले औसतन 113 अंक ज्यादा हासिल किए। 4. स्कूलों की खस्ता हालत भी 2026 में आंदोलन की वजह बनी फ्रांस स्कूलों की खराब हालत 2026 के आंदोनल की बड़ी वजह बनी। छात्रों की शिकायत है कि स्कूलों में शिक्षकों की कमी है, जरूरी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं और इसका असर पढ़ाई पर पड़ रहा है। इसके पीछे फ्रांस की आर्थिक तंगी और उस पर बढ़ते कर्ज को भी वजह बताया जा रहा है। फ्रांस का सरकारी कर्ज उसकी GDP के 119.3% के बराबर है। धीमी आर्थिक विकास दर और कर्ज पर बढ़ते ब्याज के कारण सरकार पर बजट संभालने का दबाव है। सरकार को रक्षा, अस्पताल, नई तकनीक और जलवायु परिवर्तन से निपटने जैसे क्षेत्रों पर भी खर्च करना है। ऐसे में शिक्षा सहित अलग-अलग क्षेत्रों के लिए बजट तय करना चुनौती बन गया है। 5. फ्रांस में आंदोलन का असर यूरोप पर क्यों पड़ सकता है? फ्रांस में हो रहे प्रदर्शनों का असर यूरोप के दूसरे देशों की राजनीति पर भी पड़ सकता है। महंगाई, प्रवासन और सरकार की नीतियों से पहले से नाराज लोगों के बीच फिलिस्तीन के झंडे दिखने और दुकानों में लूटपाट के आरोप राष्ट्रीय पहचान और कानून-व्यवस्था पर बहस तेज कर सकते हैं। यूरोप में आर्थिक असंतोष नया नहीं है। फ्रांस के येलो वेस्ट आंदोलन से लेकर जर्मनी और ब्रिटेन में महंगाई के खिलाफ हुए प्रदर्शनों तक, जीवन-यापन का बढ़ता खर्च लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह रहा है। वहीं, सीमा सुरक्षा और प्रवासन को लेकर भी कई देशों में बहस जारी है। ऐसे माहौल में फ्रांस में मरीन ले पेन की नेशनल रैली, जर्मनी में AfD और इटली में जॉर्जिया मेलोनी की पार्टी जैसे दक्षिणपंथी दलों को अपने मुद्दे उठाने का मौका मिल सकता है। फ्रांस में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता रहने से रक्षा, प्रवासन और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दों पर यूरोपीय देशों के बीच सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है। ————————— ये खबर भी पढ़ें…. फ्रांस में दुकानों से आईफोन लूटे, पुलिस को दौड़ाया:जोकर, कैप्टन अमेरिका बनकर पहुंचे प्रदर्शनकारी, 143 साल पुरानी इमारत में आग लगाई; 15 PHOTOS फ्रांस में महंगाई के खिलाफ शनिवार को 8 लाख लोग सड़कों पर उतर आए। कई जगह प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और पुलिसकर्मियों को दौड़ाया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अब गोवा जाने की जरूरत नहीं! बिहार में मिलेगा वाटर स्पोर्ट्स का रोमांच, जानिए कहां-कहां उठा सकेंगे मजा

वाटर स्पोर्ट्स या वाटर एडवेंचर का नाम आते ही गोवा, केरल या दूसरे पर्यटन स्थलों का ख्याल आता है। लेकिन जल्द इसके लिए आपको दूर नहीं जाना पड़ेगा। बिहार में आप वाटर स्पोर्ट्स का आनंद उठा सकेंगे। राज्य के बड़े जलाशयों में वाटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा देने का प्लान है। इसके लिए बांका, जमुई, मुंगेर, लखीसराय और रोहतास के कई जलाशयों की पहचान की जा चुकी है। पटना में गंगा नदी में पहले से ही बोटिंग और वाटर स्पोर्ट्स जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

बिहार के पांच जिलों में वाटर स्पोर्ट्स शुरू करने की तैयारी

बिहार में पर्यटन को नया आयाम देने के उद्देश्य से नौ बड़े जलाशयों और एक बराज क्षेत्र में वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों की संभावनाएं तलाशी गई हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने इन जलाशयों के इस्तेमाल के लिए जल संसाधन विभाग से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) मांगा था। जल संसाधन विभाग ने निर्धारित शर्तों के साथ एनओसी दे दिया है। इससे इन स्थानों पर वाटर स्पोर्ट्स शुरू करने का रास्ता खुल गया है। अब दूसरे विभागों से मंजूरी हासिल करने की प्रक्रिया चल रही है।

वाटर स्पोर्ट्स के लिए इन जलाशयों की पहचान की गई है

बांका के बदुआ और ओढ़नी जलाशयों को वाटर स्पोर्ट्स के लिए बेस्ट माना गया है। इससे बांका में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जमुई में तीन जलाशयों को चिह्नित किया गया है। गड़ही, अपर किऊल और नागी-नकटी जलाशय आने वाले समय में वाटर स्पोर्ट्स के नए केंद्र बन सकते हैं। मुंगेर के खड़गपुर और आंजन-कुकुरझप जलाशयों को भी इस योजना में शामिल किया गया है। लखीसराय के मोरवे जलाशय को भी वाटर स्पोर्ट्स के लिए चिह्नित किया गया है। रोहतास जिले के इंद्रपुरी बराज क्षेत्र को भी वाटर स्पोर्ट्स गतिविधियों के लिए बेस्ट माना गया है।

पटना में पहले से उपलब्ध है गंगा में बोटिंग सुविधा

बिहार में वाटर स्पोर्ट्स की संभावनाएं केवल इन पांच जिलों तक सीमित नहीं हैं। पटना में गंगा नदी के दीघा घाट और गांधी घाट जैसे स्थानों पर बोटिंग तथा नौका विहार के ऑप्शन उपलब्ध हैं। इसके अलावा राजगीर की घोड़ा कटोरा झील और पांडु पोखर में भी बोटिंग जैसी गतिविधियों का अनुभव लिया जा सकता है। रोहतास के करमचट डैम में भी विकल्प मौजूद हैं।

सिर्फ पर्यटन नहीं, राज्य में नए रोजगार के भी खुलेंगे रास्ते

बिहार के जलाशयों में वाटर स्पोर्ट्स को बढ़ावा मिलने से राज्य में पर्यटन को  नई गति मिल सकती है। स्थानीय स्तर पर बोटिंग संचालन, पर्यटक सुविधाओं, खानपान, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही आसपास के छोटे व्यवसायों को भी फायदा मिलने की संभावना है।

(पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट)

अफ्रीकी देश जिबूती के पास नाव डूबी, 109 की मौत:116 लापता, 350 लोग सवार थे; इथियोपिया के 80 से ज्यादा नागरिक बचाए गए

अफ्रीकी देश जिबूती के तट के पास प्रवासियों से भरी नाव डूबने से 109 लोगों की मौत हो गई, जबकि 116 लोग लापता हैं। नाव में करीब 350 लोग सवार थे। हादसे में 80 से ज्यादा लोगों को बचा लिया गया है। संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संस्था (IOM) के मुताबिक, सभी जीवित बचे लोग इथियोपिया के नागरिक हैं। हादसा 8 और 9 अक्टूबर की दरमियानी रात जिबूती के ओबॉक शहर के उत्तर में हुआ। IOM के मुताबिक, हादसे के बाद अब तक 109 शव बरामद किए गए हैं। इनमें 52 पुरुष, 42 महिलाएं और 15 बच्चे शामिल हैं। बच्चों में 9 लड़कियां और 6 लड़के हैं। जिबूती से यमन से जा रही थी नाव हादसे में बचे लोगों ने बताया कि नाव जिबूती से यमन जा रही थी। इसी दौरान वह समुद्र में पलट गई। लापता लोगों की तलाश और प्रभावित परिवारों की मदद के लिए IOM की टीमें जिबूती के अधिकारियों के साथ काम कर रही हैं। जिबूती में IOM के मिशन प्रमुख एलेक्जेंडर कोइसाक ने कहा कि यह जानमाल का बेहद दुखद नुकसान है। उन्होंने कहा कि उनकी संवेदनाएं उन परिवारों के साथ हैं, जिन्होंने अपने लोगों को खोया है या अब भी उनकी खबर का इंतजार कर रहे हैं। बेहतर जिंदगी की तलाश में खतरनाक समुद्री रास्ता अपनाते हैं लोग IOM के मुताबिक, गरीबी, असुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर के कारण कई लोग रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में यह खतरनाक समुद्री रास्ता अपनाते हैं। प्रवासी जिबूती से बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट पार करके यमन पहुंचने की कोशिश करते हैं। इसके बाद उनका लक्ष्य खाड़ी देशों तक पहुंचना होता है। इस रास्ते पर समुद्र में नाव डूबने और जान जाने का खतरा बना रहता है। IOM ने कहा कि मध्य पूर्व में अस्थिरता के बावजूद लोग बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में यह जोखिम भरी यात्रा कर रहे हैं।

76 साल में सबसे ज्यादा गर्म हुआ प्रशांत महासागर:सुपर अल नीनो से धरती पूरी लाल; 4.5 लाख मौतों की वजह बन सकता है

दुनिया इस समय बेहद ताकतवर अल नीनो का सामना कर रही है। प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र का तापमान सामान्य से 3.4°C ज्यादा पहुंच गया है। यह 1950 के बाद का सबसे मजबूत अल नीनो बताया जा रहा है। मौसम विशेषज्ञ इसे ‘सुपर-डुपर अल नीनो’ कह रहे हैं। इससे दुनिया के कई हिस्सों में ज्यादा गर्मी, सूखा या भारी बारिश हो सकती है। शिकागो यूनिवर्सिटी के क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस अल नीनो से जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनियाभर में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। ज्यादा गर्मी से हीट स्ट्रोक और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। वहीं बारिश का पैटर्न बिगड़ने से कहीं पानी की कमी तो कहीं बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है। नक्शे में धरती का ज्यादातर हिस्सा लाल दिखा मौसम विज्ञानी रयान माउ ने पूरी दुनिया का एक जलवायु नक्शा सोशल मीडिया पर शेयर किया है। इसमें धरती का बड़ा हिस्सा लाल रंग में दिखाई दे रहा है, जो सामान्य से ज्यादा गर्म परिस्थितियों को दिखाता है। माउ के मुताबिक, अल नीनो सर्दियों में भी ‘अधिकतम ताकत’ के साथ बना रह सकता है। उन्होंने इसके फरवरी 2027 तक जारी रहने के WMO के अनुमान से भी सहमति जताई है। WMO ने जलवायु परिवर्तन को लेकर चेताया संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, 2026 के आखिरी महीनों में दुनिया के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ऊपर रहने की बहुत ज्यादा संभावना है। जलवायु वैज्ञानिक जीक हाउसफादर ने कहा कि इस साल का अल नीनो ऐसे स्तर की ओर बढ़ रहा है, जो पहले दर्ज नहीं किया गया। वहीं मौसम विशेषज्ञ लियोन सिमंस ने इसे ‘सुपर-डुपर अल नीनो’ कहा है। अल नीनो क्या है अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाला प्राकृतिक जलवायु चक्र है। अल नीनो इसका गर्म चरण है। इसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इस बदलाव का असर प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान और बारिश का पैटर्न बदल सकता है। कहीं सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है। अल नीनो आमतौर पर 2 से 7 साल के अंतराल पर आता है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… लखनऊ के मॉल में पानी घुसा, फर्रुखाबाद में ओले गिरे:यूपी के 42 जिलों में बारिश का अलर्ट; छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बिजली गिरने से 3 मौतें उत्तराखंड, हिमाचल, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और झारखंड के आसपास बने ऊपरी हवा के साइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण कई क्षेत्रों में बनी ट्रफ के कारण मौसम एक बार फिर बदल गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

2026 के साहित्य नोबेल का ऐलान आज:चीन की कैन श्वे सबसे आगे, भारत के अमिताव घोष भी दावेदार; सिर्फ 1 भारतीय के पास यह पुरस्कार

2026 के साहित्य नोबेल पुरस्कार का ऐलान आज किया जाएगा। स्वीडिश अकादमी भारतीय समय के मुताबिक शाम 4:30 बजे विजेता के नाम की घोषणा करेगी। ऐलान से पहले बुकमेकरों के अनुमान में चीन की प्रयोगधर्मी लेखिका कैन श्वे सबसे आगे चल रही हैं। भारत के लेखक अमिताव घोष का नाम भी संभावित विजेताओं में शामिल है। भारत से अब तक सिर्फ रवींद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। उन्हें 1913 में यह पुरस्कार दिया गया था। वह नोबेल जीतने वाले पहले एशियाई भी थे। नोबेल पुरस्कार के विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। उन्हें मेडल, डिप्लोमा और पुरस्कार राशि दी जाएगी। पुरस्कार राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर यानी करीब 11.5 करोड़ रुपए है। सपनों जैसी कहानियां लिखती हैं कैन श्वे चीन की 73 साल की लेखिका कैन श्वे इस बार साहित्य के नोबेल की सबसे मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं। उनका असली नाम डेंग शियाओहुआ है। कैन श्वे की कहानियां आम कहानियों से अलग होती हैं। इनमें सपने जैसे दृश्य होते हैं और कहानी से ज्यादा किरदारों के मन में चल रहे विचारों पर ध्यान दिया जाता है। उनके लेखन की तुलना मशहूर लेखकों फ्रांज काफ्का और जॉर्ज लुइस बोर्खेस से भी की गई है। उनकी चर्चित किताबों में ‘द लास्ट लवर’, ‘लव इन द न्यू मिलेनियम’ और ‘आई लिव इन द स्लम्स’ शामिल हैं। इंटरनेशनल बुकर की शॉर्टलिस्ट में पहुंचे थे अमिताव घोष भारत के लेखक अमिताव घोष की चर्चित किताब ‘सी ऑफ पॉपीज’ 2008 में इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार की शॉर्टलिस्ट में शामिल हुई थी। यह किताब उनके आइबिस ट्रिलॉजी का पहला हिस्सा है। घोष की किताबों में इतिहास, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनकी एक और चर्चित किताब ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ जलवायु परिवर्तन और इंसानों पर उसके असर के बारे में है। दक्षिण एशियाई मूल के दूसरे चर्चित लेखकों में सलमान रुश्दी, माइकल ओंडाट्जे और मॉरीशस की भारतीय मूल की लेखिका आनंदा देवी शामिल हैं। जापान-ऑस्ट्रेलिया समेत 10 देशों के लेखक भी नोबेल की रेस में जापान के मशहूर लेखक हारुकी मुराकामी लंबे समय से साहित्य के नोबेल के संभावित विजेताओं में शामिल हैं। ऑस्ट्रेलिया के जेराल्ड मर्नेन और अमेरिका के थॉमस पिंचन भी प्रमुख नामों में हैं। इसके अलावा मेक्सिको की क्रिस्टीना रिवेरा गार्सा, स्पेन के एनरिक विला-मातास, पुर्तगाल की लिडिया जॉर्ज, रूस की ल्यूडमिला उलित्स्काया, कनाडा की मार्गरेट एटवुड और फ्रांस के मिशेल ह्वेलेबेक के नाम भी चर्चा में हैं। हालांकि, ये आधिकारिक दावेदारों की सूची नहीं है। स्वीडिश अकादमी संभावित विजेताओं की शॉर्टलिस्ट सार्वजनिक नहीं करती। पिछले 10 साल में 4 महिलाओं को मिला साहित्य नोबेल पिछले 10 साल में साहित्य का नोबेल 10 लेखकों को मिला, जिनमें 4 महिलाएं थीं। इनमें 6 ने अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में लिखा, जबकि 6 विजेता यूरोप से रहे। 2024 में दक्षिण कोरिया की हान कांग एशिया से पुरस्कार जीतने वाली लेखिका थीं। इस दौरान दक्षिण एशिया से कोई लेखक नहीं जीता। हर साल स्वीडिश अकादमी नॉमिनेशन मंगाती है। इसमें अकादमी के सदस्य, साहित्य और भाषा के प्रोफेसर, पूर्व नोबेल विजेता और लेखक संगठनों के प्रमुख नाम भेज सकते हैं। लेखक खुद को नामांकित नहीं कर सकते। नोबेल कमेटी पहले 15 से 20 नाम चुनती है, फिर मई में इन्हें 5 उम्मीदवारों तक सीमित किया जाता है। इसके बाद स्वीडिश अकादमी के 18 सदस्य वोटिंग से विजेता चुनते हैं। 50 साल तक गोपनीय रहता है नॉमिनेशन स्वीडिश अकादमी नोबेल के नामांकित लेखकों की लॉन्गलिस्ट या शॉर्टलिस्ट जारी नहीं करती। नॉमिनेशन से जुड़ी जानकारी 50 साल तक गोपनीय रहती है। इसलिए 2026 में किन लेखकों को नामांकित किया गया, इसकी पूरी जानकारी 2076 में सामने आएगी। नोबेल रिकॉर्ड के मुताबिक, सरवपल्ली राधाकृष्णन, श्री अरविंद, ताराशंकर बंद्योपाध्याय और आरके नारायण जैसे भारतीय लेखकों को अलग-अलग वर्षों में साहित्य नोबेल के लिए नामांकित किया गया था। ———————————– ये खबर भी पढ़ें… 2026 का केमिस्ट्री नोबेल फ्रांस-जापान के वैज्ञानिकों को:अणुओं के मिरर इमेज की 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई; दवाएं बनाने में मदद मिली 2026 का केमिस्ट्री नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी. कागन और जापान के केन्सो सोआई को दिया गया है। दोनों वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान की करीब 100 साल पुरानी गुत्थी सुलझाई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दिल्ली के पॉल्यूशन से लड़ने की नई पहल! मिरांडा हाउस में बना कार्बन गार्डन, जानिए कैसे काम करेगा यह ग्रीन मॉडल

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण और तापमान के बीच, हरियाली बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी दिशा में, दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज ने अपने कैंपस में एक ‘कार्बन गार्डन’ बनाया है। कॉलेज का कहना है कि कार्बन सोखने की क्षमता बढ़ाने और जैव-विविधता को बढ़ावा देने के साथ-साथ, यह गार्डन छात्रों को पर्यावरण से जुड़े मुद्दों की व्यावहारिक समझ हासिल करने में भी मदद करेगा।

50 अलग-अलग प्रजातियों के पौधे लगाए गए

मिरांडा हाउस के इस कार्बन गार्डन में लगभग 50 अलग-अलग तरह के पौधे लगाए गए हैं। इनमें अलग-अलग तरह के जीवन वाले पौधे शामिल हैं, जैसे कि हाइड्रोफाइट्स (पानी में उगने वाले), जेरोफाइट्स (सूखी जगह पर उगने वाले) और मेसोफाइट्स (सामान्य नमी वाली जगह पर उगने वाले)। अमरूद और सहजन जैसी देसी प्रजातियों को भी इस गार्डन में शामिल किया गया है। कॉलेज के अनुसार, इतने तरह के पौधे लगाने का मकसद सिर्फ हरियाली बढ़ाना नहीं है, बल्कि एक छोटा इकोसिस्टम बनाना है जहां छात्र पौधों, बायोडायवर्सिटी और पर्यावरण के आपसी संबंधों को बेहतर ढंग से समझ सकें।

छात्रों के लिए बनेगा लिविंग लैब

मिरांडा हाउस का यह कार्बन गार्डन छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला (living laboratory) के तौर पर काम करेगा। यहां छात्र कार्बन सोखने की प्रक्रिया (carbon sequestration), पौधों की विविधता, इकोसिस्टम और पर्यावरण के अनुकूल तौर-तरीकों जैसे विषयों की व्यावहारिक समझ हासिल कर सकेंगे।

कॉलेज का कहना है कि इस पहल से छात्रों को क्लासरूम से बाहर, प्रकृति के बीच सीखने और रिसर्च करने का मौका मिलेगा। साथ ही, इससे पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

प्रो. दीनबंधु साहू ने किया उद्घाटन

कार्बन गार्डन का उद्घाटन दिल्ली यूनिवर्सिटी के बॉटनी डिपार्टमेंट के हेड और रिसर्च, इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल के चेयरपर्सन प्रोफेसर दीनबंधु साहू ने किया। प्रोफेसर साहू भारत के पहले कार्बन गार्डन के संस्थापक भी हैं। प्रोफेसर साहू ने कहा कि प्रकृति से जुड़ाव लंबे समय से भारतीय संस्कृति और परंपराओं का अहम हिस्सा रहा है। उन्होंने आधुनिक विज्ञान और पर्यावरण की समझ को जोड़कर इस जुड़ाव को और आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। दिल्ली जैसे शहरों में ग्रीन स्पेस की अहम भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने पर्यावरण संरक्षण में युवाओं की भागीदारी के महत्व पर भी जोर दिया।

मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है गार्डन

कार्बन गार्डन के फायदे सिर्फ पर्यावरण तक ही सीमित नहीं माने जाते हैं। प्रोफेसर साहू के अनुसार, ऐसी हरी-भरी जगहें छात्रों को प्रकृति के करीब ला सकती हैं और साथ ही उनके मानसिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण में भी योगदान दे सकती हैं। मिरांडा हाउस की प्रिंसिपल प्रोफेसर बिजयालक्ष्मी नंदा ने कहा कि कॉलेज अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारी को गंभीरता से लेता है। उनका मानना है कि यह पहल छात्रों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट

CUET UG 2027: एनटीए ने की सीयूईटी में बड़े बदलाव की तैयारी, ‘एक छात्र, एक दिन’ परीक्षा पैटर्न का प्रस्ताव

चंद्रमा ही नहीं, पृथ्वी की बदलती जलवायु भी ज्वार-भाटे पर डाल रही असर

दुनिया के कुछ हिस्सों में समुद्र का जल ज्वार-भाटे के दौरान बहुत कम ऊपर-नीचे होता है, जबकि कुछ जगहों पर उच्च और निम्न ज्वार के बीच का अंतर काफी अधिक होता है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के किम्बर्ली तट पर यह अंतर 10 मीटर से भी अधिक हो सकता है जो करीब तीन मंजिला इमारत की ऊंचाई के बराबर है।

समुद्री ज्वार-भाटा तटरेखाओं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को आकार देता है, तटीय समुदायों को प्रभावित करता है और यहां तक कि अंटार्कटिका की बर्फीली चट्टानों के पिघलने में भी भूमिका निभाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि कुछ स्थानों पर ज्वार इतना अधिक और कुछ जगहों पर इतना कम क्यों होता है और समुद्रों में बदलाव के साथ क्या ज्वार-भाटे में भी बदलाव आ रहा है ?

चंद्रमा और सूर्य का गुरुत्वाकर्षण –

चंद्रमा और सूर्य दोनों अपने गुरुत्वाकर्षण बल के जरिये पृथ्वी पर ज्वार पैदा करते हैं। सूर्य अधिक विशाल है, लेकिन चंद्रमा पृथ्वी के काफी करीब है, इसलिए समुद्री ज्वार पर उसका प्रभाव अधिक होता है।

चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण उसकी दूरी बढ़ने के साथ कम होता जाता है। पृथ्वी का जो हिस्सा चंद्रमा के सबसे करीब है, वहां इसका प्रभाव सबसे अधिक और दूर वाले हिस्से में सबसे कम होता है। यह अंतर पृथ्वी की ठोस सतह और महासागरों को खींचता है। पानी चट्टानों की तुलना में अधिक आसानी से गति करता है, इसलिए इसका प्रभाव समुद्र में ज्यादा दिखाई देता है।

सरल रूप में देखें तो इससे समुद्र में ज्वार के दो उभार बनते हैं—एक चंद्रमा की ओर वाले हिस्से में और दूसरा पृथ्वी के विपरीत हिस्से में। पृथ्वी के घूमने के साथ अलग-अलग स्थान इन उभारों के क्षेत्र में आते-जाते हैं। यही कारण है कि कई जगहों पर रोज दो बार उच्च ज्वार और दो बार निम्न ज्वार आता है।

सूर्य भी इसी तरह, हालांकि अपेक्षाकृत कमजोर, प्रभाव डालता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में होते हैं तो दोनों के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव मिल जाते हैं और ज्वार का अंतर सामान्य से अधिक हो जाता है। इसे ‘स्प्रिंग टाइड’ कहा जाता है। जब सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी से देखने पर समकोण पर होते हैं तो उनके प्रभाव आंशिक रूप से एक-दूसरे को कम करते हैं और ज्वार का अंतर घट जाता है, जिसे ‘नीप टाइड’ कहा जाता है।

केवल गुरुत्वाकर्षण ही जिम्मेदार नहीं –

तटीय क्षेत्रों में ज्वार मापने वाले उपकरणों और उपग्रहों से मिले आंकड़े ज्वार की सरल तस्वीर से काफी अलग हैं। महाद्वीप महासागरों को अलग-अलग बेसिन में बांट देते हैं, जिससे समुद्री जल इन बेसिनों के भीतर आगे-पीछे होता है।

कई महासागरीय बेसिन में ज्वार ऐसे बिंदुओं के आसपास घूमता है जहां जलस्तर में बदलाव लगभग नहीं होता। इन्हें ‘एम्फिड्रोमिक पॉइंट’ कहा जाता है। आम तौर पर इन बिंदुओं से दूरी बढ़ने के साथ ज्वार का अंतर बढ़ता जाता है।

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तटरेखा का आकार भी ज्वार को बढ़ा सकता है। इसे ‘रेजोनेंस’ कहा जाता है। प्रत्येक खाड़ी में पानी के आगे-पीछे हिलने की एक प्राकृतिक लय होती है, जो उसके आकार और गहराई पर निर्भर करती है। जब यह लय स्थानीय ज्वार की लय से मेल खाती है तो हर अगली हलचल पिछली हलचल को और मजबूत करती है।

इसी प्रक्रिया से किम्बर्ली तट और कनाडा की बे ऑफ फंडी में असाधारण रूप से बड़े ज्वार देखने को मिलते हैं। बे ऑफ फंडी में ज्वार का अंतर 16 मीटर तक पहुंच सकता है।

समुद्र के नीचे मौजूद पहाड़ और पर्वत श्रृंखलाएं भी ज्वार को प्रभावित करती हैं। जब ज्वार का पानी असमतल समुद्री तल के ऊपर से गुजरता है तो उसकी कुछ ऊर्जा समुद्र के भीतर बनने वाली तरंगों में बदल जाती है, जिन्हें ‘इंटरनल टाइड्स’ कहा जाता है।

इंडोनेशियाई द्वीपसमूह का जटिल समुद्री तल शक्तिशाली आंतरिक ज्वार पैदा करता है। जब ये आंतरिक ज्वार टूटते हैं तो घर्षण से समुद्र में हलचल तेज हो सकती है जिससे गर्मी और पोषक तत्वों के वितरण में मदद मिलती है।

वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, इन आंतरिक ज्वारों के प्रभाव को मॉडलों में शामिल करने से वास्तविक ज्वार का बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है और इसके लिए आंतरिक ज्वारों का सीधे अनुकरण करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे कंप्यूटिंग संसाधनों की बचत हो सकती है और अतीत तथा भविष्य के ज्वार के अधिक विश्वसनीय मॉडल तैयार किए जा सकते हैं।

बदलते महासागर में ज्वार भी बदल रहा है –

सर आइजैक न्यूटन ने 1687 में गुरुत्वाकर्षण के जरिये ज्वार-भाटे की व्याख्या की थी। तीन सदियों से अधिक समय बाद भी वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि बदलते महासागरों के साथ ज्वार कैसे बदल रहा है।

जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और तटरेखाएं बदल रही हैं। समुद्र की ऊपरी परत गर्म हो रही है और पानी में परतों के बीच अंतर भी बढ़ रहा है। इन बदलावों का ज्वार के आकार पर असर पड़ सकता है।

माप से पहले ही संकेत मिल रहे हैं कि ज्वार में बदलाव हो रहा है। समुद्र के स्तर में बदलाव और समुद्री जल के अधिक स्तरीकृत होने को इसके कुछ कारणों से जोड़ा जा रहा है। बेहतर महासागरीय मॉडल अब आंतरिक ज्वारों को अधिक विस्तार से दर्ज कर रहे हैं और नए उपग्रह जटिल तटीय क्षेत्रों में ज्वार को मापने में मदद कर रहे हैं।

तटीय समुदायों के लिए ज्वार में इन बदलावों को समझना महत्वपूर्ण होता जा रहा है। भविष्य में ज्वार में होने वाले बदलावों का बेहतर अनुमान लगाने से तटीय समुदायों को बाढ़ के लिए तैयारी करने, नुकसान कम करने और तटीय विकास की अधिक सुरक्षित योजना बनाने में मदद मिल सकती है।

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