Climate impact Alert: जलवायु परिवर्तन की मार से गेहूं में होगा बड़ा बदलाव! रोटी की गुणवत्ता पर मंडराया खतरा; सेहत पर भी पड़ सकता है असर

Climate impact ON wheat: जलवायु परिवर्तन का असर अब हमारी थाली तक पहुंच सकता है। जी हां, जिस गेहूं से हर दिन करोड़ों लोगों की रोटी बनती है, उसकी पोषण संबंधी गुणवत्ता और प्रोटीन संरचना भविष्य में बदल सकती है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी में सामने आया है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं के प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे और ब्रेड की क्वालिटी पर पड़ सकता है, बल्कि गेहूं से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है।

स्टडी में खुलासा हुआ है कि वातावरण में बढ़ती CO₂ गेहूं की प्रोटीन संरचना को बदल सकती है। इसका असर बेकिंग गुणवत्ता पर पड़ने के संकेत मिले हैं। जर्मनी के लीबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी और टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल फूड केमिस्ट्री (Food Chemistry) में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में गेहूं की खेती पर विचार करते समय केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। अनाज की गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रोटीन के प्रकारों को भी समझना जरूरी है।

हवा में बढ़ती CO₂ से गेहूं पर कितना असर?

स्टडी के अनुसार, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वर्ष 1980 में इसका स्तर लगभग 340 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) था, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 ppm तक पहुंच गया। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह स्तर 600 ppm तक जा सकता है। गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। ऐसे में वातावरण में CO₂ की बढ़ती मात्रा के बीच इसकी खेती और अनाज की क्वालिटी में होने वाले बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए गेहूं की अलग-अलग किस्मों पर प्रयोग किया।

10 किस्मों पर हुआ प्रयोग, सामने आए चौंकाने वाले बदलाव

शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 खेती की किस्मों को वास्तविक कृषि और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप उगाया। इनमें से कुछ पौधों को सामान्य परिस्थितियों में मौजूद CO₂ के स्तर पर रखा गया। जबकि अन्य पौधों को 546 ppm की बढ़ी हुई CO₂ में उगाया गया। फसल तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों ने गेहूं के दानों में मौजूद प्रोटीन का बारीकी से विश्लेषण किया। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

स्टडी में विशेष रूप से ग्लूटेन प्रोटीन, एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs), प्यूरोइंडोलिन और सीलिएक रोग से संबंधित कुछ पेप्टाइड्स पर ध्यान दिया गया। नतीजों से पता चला कि CO₂ कॉन्सेंट्रेशन का स्तर बढ़ने पर गेहूं के अलग-अलग प्रोटीन समूहों में एक जैसा बदलाव नहीं हुआ। कुछ प्रोटीन बढ़े। जबकि कुछ की मात्रा घट गई। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन गेहूं की प्रोटीन संरचना को प्रभावित कर सकता है।

बढ़ेगा एक तरह का प्रोटीन, घट सकता है ग्लूटेन

इस स्टडी में पाया गया कि बढ़ी हुई CO₂ कॉन्सेंट्रेशन में गेहूं के दानों में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs) की मात्रा बढ़ गई। दूसरी ओर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग से एक्टिव हो सकने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में कमी देखी गई। ATIs ऐसे प्रोटीन हैं जिनकी संभावित हेल्थ संबंधी भूमिका पर वैज्ञानिक अध्यन करते रहे हैं। इनकी मात्रा बढ़ने का असर मानव स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन इस स्टडी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बढ़ी हुई CO₂ में उगा गेहूं सीधे तौर पर लोगों को बीमार कर देगा। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्लूटेन प्रोटीन की मात्रा घटने के साथ गेहूं की बेकिंग गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। यानी प्रोटीन की संरचना में बदलाव का असर रोटी, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की निर्माण संबंधी विशेषताओं पर पड़ सकता है।

क्या गेहूं से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बदल सकता है?

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू गेहूं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि CO₂ बढ़ने के कारण ATIs और सीलिएक रोग से सक्रिय होने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में बदलाव हुआ। सीलिएक रोग एक प्रतिरक्षा सिस्टम से जुड़ी बीमारी है, जिसमें ग्लूटेन के सेवन से छोटी आंत को नुकसान पहुंच सकता है।

हालांकि, स्टडी में कुछ संबंधित पेप्टाइड्स की मात्रा घटने का संकेत मिला। जबकि ATIs की मात्रा बढ़ी। इसलिए इन बदलावों का कुल स्वास्थ्य प्रभाव क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह समझने के लिए आगे अध्ययन करना जरूरी है कि गेहूं में प्रोटीन संरचना के ये बदलाव वास्तव में मानव शरीर की जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस शोध को गेहूं से जुड़ी बीमारियों में निश्चित वृद्धि या कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हर गेहूं की किस्म पर एक जैसा असर नहीं

पीटीआई के मुताबिक, इस अध्ययन में एक और अहम बात सामने आई कि सभी गेहूं की किस्मों में बदलाव समान नहीं थे। प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज के अनुसार, प्रोटीन संरचना में परिवर्तन की सीमा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि गेहूं की कौन-सी किस्म उगाई गई है। यह निष्कर्ष भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि कुछ किस्में बढ़ी हुई CO₂ परिस्थितियों में अपनी गुणवत्ता बेहतर बनाए रखती हैं, तो उन किस्मों की पहचान और विकास पर ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और कृषि क्षेत्रों में और परीक्षण करने होंगे।

भविष्य की खेती के लिए क्या है सबक?

इस स्टडी से साफ संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि खेतों में कितना अनाज पैदा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि उस अनाज में किस तरह के प्रोटीन मौजूद हैं। उसकी बेकिंग गुणवत्ता कैसी है। उसके सेवन से जुड़े संभावित स्वास्थ्य पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में गेहूं की ऐसी किस्में विकसित करने की जरूरत होगी, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार के साथ बेहतर गुणवत्ता बनाए रख सकें।

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UN में नेपाल पीएम ने भारत-चीन को थैंक्यू कहा:बोले- हिमालय बचाने के लिए साथ आएं, भोटेकोशी की बाढ़ पूरी दुनिया को चेतावनी

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भोटेकोशी-त्रिशूली बाढ़ के बाद मदद के लिए भारत और चीन को धन्यवाद कहा। उन्होंने कहा कि हिमालय में बढ़ते खतरे से निपटने के लिए नेपाल, भारत और चीन को साथ आना होगा। शाह ने भोटेकोशी की बाढ़ को सिर्फ नेपाल की आपदा नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए जलवायु परिवर्तन की चेतावनी बताया। शाह ने कहा कि ग्लेशियर से आई इस बाढ़ ने सड़कें, पुल, स्कूल, घर और लोगों के काम-धंधे तबाह कर दिए। उन्होंने दुनिया से अपील की कि जलवायु आपदा से प्रभावित गरीब देशों को दोबारा खड़ा करने के लिए कर्ज नहीं, ग्रांट यानी ऐसी मदद दी जाए जिसे वापस न करना पड़े। भारत-चीन के साथ हिमालय के लिए साझा सिस्टम बनाने का प्रस्ताव शाह ने कहा कि हिमालय की निगरानी और आपदा से बचाव के लिए नेपाल, भारत और चीन को मिलकर काम करना चाहिए। उन्होंने एक साझा सिस्टम बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें: शाह ने कहा कि हिमालय को ऐसा क्षेत्र बनाना चाहिए जहां देश आपदा से जुड़ी जानकारी और विशेषज्ञता एक-दूसरे के साथ साझा करें। शाह बोले- भोटेकोशी की बाढ़ सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं नेपाल PM ने कहा कि भोटेकोशी-त्रिशूली की आपदा को सिर्फ एक देश की समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर पूरे हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है। शाह ने कहा, “यह सिर्फ नेपाल की निजी मुसीबत नहीं है। बांग्लादेश से पूछिए, भूटान से पूछिए, भारत से पूछिए, मालदीव से पूछिए, पाकिस्तान से पूछिए, श्रीलंका से पूछिए।” उन्होंने कहा कि इस आपदा से नेपाल के विकास का काम भी प्रभावित हुआ है। उनके मुताबिक, जलवायु आपदा अब सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि विकास और लोगों की जिंदगी से जुड़ा बड़ा संकट बन गई है। ग्लेशियर टूटने के बाद आई थी अचानक बाढ़ अगस्त के आखिर में नेपाल और चीन के तिब्बत इलाके की सीमा के पास एक ग्लेशियर टूट गया था। इसके बाद भूस्खलन हुआ और अचानक बाढ़ आ गई। पानी और मलबे ने नीचे की घाटियों में भारी तबाही मचाई। इस आपदा में कम से कम 1,450 लोगों की मौत हुई है। कई हफ्ते बाद भी राहत और लोगों की तलाश का काम जारी है। इलाके में 6,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। शाह ने कहा कि इनमें से कई लोग शायद कभी नहीं मिल पाएंगे। शाह बोले- जंग के लिए सिस्टम मजबूत, खाना पहुंचाने में कमजोर नेपाल PM ने दुनिया की प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा, “हमने युद्ध के लिए बेहतरीन लॉजिस्टिक्स वाला सिस्टम बना लिया है, लेकिन भोजन पहुंचाने के लिए हमारी व्यवस्था कमजोर है।” उन्होंने कहा कि जब जलवायु आपदा किसी गरीब देश में सड़कें, पुल और घर तबाह कर देती है, तो उसे दोबारा खड़ा करने के लिए सिर्फ कर्ज देना सही तरीका नहीं है। नेपाल को GDP के 10% के बराबर मदद की जरूरत शाह के मुताबिक, इस आपदा के बाद नेपाल को सड़क, पुल, घर और दूसरी जरूरी चीजें दोबारा बनाने के लिए अपनी GDP के करीब 10% के बराबर मदद की जरूरत है। उन्होंने दुनिया से ग्रांट आधारित मदद देने की अपील की। उनका कहना है कि गरीब देशों को आपदा से उबरने के लिए नया कर्ज लेने पर मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

अल्फांसो आम की फसल को गर्मी ने दिया झटका, फिर भी रिकॉर्ड 34 देशों तक पहुंचा भारत का हापुस

Indian Alphonso Mango Crop: बेमौसम गर्मी और जलवायु परिवर्तन की मार के बावजूद भारतीय अल्फांसो आम (हापुस) ने ग्लोबल बाजार में अपनी मिठास का परचम लहराया है। महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में भीषण गर्मी और प्रतिकूल मौसम की वजह से अल्फांसो आम की पैदावार को भारी नुकसान हुआ लेकिन इसके बावजूद भारत ने चालू वित्त वर्ष में रिकॉर्ड 34 देशों तक हापुस आम का निर्यात करने में सफलता हासिल की है। वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने 21 जुलाई को लोकसभा में एक लिखित उत्तर के दौरान ये जानकारी दी है।

कोंकण में बेमौसम गर्मी की मार और लॉजिस्टिक्स का संकट

राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बताया कि महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र, विशेष रूप से रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों में अनियंत्रित और बेमौसम गर्मी और अनियमित जलवायु की वजह से अल्फांसो आम की फसल को काफी नुकसान पहुंचा है। इससे न सिर्फ उत्पादन प्रभावित हुआ बल्कि एक्सपोर्ट क्वॉलिटी वाले फलों की उपलब्धता पर भी असर पड़ा है। इसके अलावा निर्यातकों को कई अंतरराष्ट्रीय और लॉजिस्टिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। वेस्ट एशिया में जारी संकट की वजह से शिपमेंट में देरी हुई और बंदरगाहों पर भीड़ बढ़ गई। निर्यातकों को उच्च फ्रेट लागत, वॉर-रिस्क सरचार्ज और कंटेनरों की भारी किल्लत से जूझना पड़ा।

इसके बाद भी 24 से बढ़कर 34 देशों तक पहुंचा भारतीय हापुस

इन तमाम वैश्विक चुनौतियों, भाड़े में बढ़ोतरी और फसल के नुकसान के बावजूद भारत ने अल्फांसो आम के अंतरराष्ट्रीय बाजार का विस्तार जारी रखा है। वित्त वर्ष 2020-21 में जहां अल्फांसो आम सिर्फ 24 देशों में निर्यात होता था वहीं चालू वित्त वर्ष में यह दायरा बढ़कर 34 देशों तक पहुंच गया है। अमेरिका, बेल्जियम, संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी, आइसलैंड, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया और रूस सहित 15 से अधिक देशों में भारतीय आम को बढ़ावा देने के लिए प्रचार कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।

जापान और नेपाल निर्यात पर सरकार का स्पष्टीकरण

निर्यात से जुड़े अन्य मुद्दों पर मंत्री ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया। नेपाल को आम के निर्यात पर कोई प्रतिबंध नहीं है। नेपाल में जरूरी नियमों का पालन करते हुए आयात की अनुमति दी गई है। ‘नेशनल प्लांट प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन’ (NPPO) भारतीय निर्यात सुविधाओं के 2026 प्री-सीजन निरीक्षण के दौरान जापानी अधिकारियों द्वारा उठाए गए मुद्दों को हल करने के लिए लगातार उनके संपर्क में है।

प्रभावित निर्यातकों के लिए सरकार का राहत पैकेज

लॉजिस्टिक्स में आए व्यवधानों और माल भाड़े के बोझ से प्रभावित निर्यातकों को सहयोग देने के लिए केंद्र सरकार ने कई योजनाएं लागू की हैं। एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के तहत सरकार ने RELIEF पहल शुरू की है। इसके जरिए भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम के माध्यम से बीमाकृत निर्यातकों और पात्र MSMEs को सहायता दी जा रही है। ऐसा इसलिए ताकि उनके अतिरिक्त फ्रेट और बीमा बोझ को कम किया जा सके। वाणिज्य विभाग, एपीडा (APEDA) के माध्यम से अपनी वित्तीय सहायता योजना के तहत आम निर्यातकों को सहायता दे रहा है। इसका उद्देश्य एक्सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, गुणवत्ता अनुपालन और बाजार विकास को मजबूत करना है।

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