Food Safety : बिस्किट में भरा भूसा, दूध में डिटर्जेंट और यूरिया, उपभोक्ता अपने सेहत की कैसे करें सुरक्षा !

Food Safety : दूध और डेयरी प्रोडक्ट में डिटर्जेंट और यूरिया, घी में जानवर की चर्बी,लाल मिर्च पाउडर में लाल मिट्टी, धनिया पाउडर में लकड़ी का बुरादा, जीरा में घास के बीज और अब बिस्किट में जानवरों की खिलाने वाला भूसा!ये सब फूड रेगुलेटर के छापों पकड़ा गया और साबित हो चुका है, फिर भी भारत में मिलावट का खेल धड़ल्ले से जारी है आखिर क्यों? कैसे रुकेगा मिलावट का काला कारोबार? आज कंज्यूमर अड्डा में इसी पर बात की गई है।

सबसे पहले समझते हैं कि फसाई (FSSAI) के छापों में ताजा खुलासा क्या हुआ है। FSSAI ने कंज्यूर्स की शिकायत पर की जांच की तो पाया कि प्रिया गोल्ड बिस्किट में ‘फाइबर’ के सोर्स के रूप में जानवरों को खिलाने वाला चोकर का इस्तेमाल किया जा रहा था । जांच में मिली चोकर की बोरियों पर साफ लिखा था कि ये केवल मवेशियों के खाने के लिए है। इसके अलावा फूड प्रोसेसिंग प्लांट में साफ-सफाई और वेस्ट मैनेजमेंट के नियमों का भारी उल्लंघन भी पाया गया। FSSAI ने कंपनी का लाइसेंस निलंबित कर दिया है।

दूसरा मामला है दूध में डिटर्जेंट और कास्टिक सोडा मिलाने का। डोडला डेयरी (Dodla Dairy) के फुल क्रीम दूध के सैंपल स्टैंडर्ड टेस्टिंग में फेल हो गए। जब रेफरल लैब से जांच कराई गई तो दूध में डिटर्जेंट की पुष्टि हुई। इस दूध में फैट भी तय मात्रा से कम था और ये मानव शरीर के लिए असुरक्षित और हानिकारक घोषित किया गया।

तीसरा मामला है पीली किशमिश में जहरीला पेस्टिसाइड का। UEIR Organic Foods की पीली किशमिश के सैंपल में तय सीमा से ज्यादा कीटनाशक पाए गए। कंज्यूमर इस प्रोडक्ट को ‘ऑर्गेनिक’ और हेल्दी मानकर खा रहे हैं। जबकि इनमें मौजूद केमिकल अवशेष उल्टा सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हां अब तक तो आप यह जान ही गए होंगे की फसाई (FSSAI) भारत का फूड रेग्यूलेटर है।

मिलावट के तरीके

दूध और डेयरी उत्पाद में डिटर्जेंट, यूरिया, स्टार्च मिलाया जाता है। वहीं, घी और मक्खन में वेजीटेबल तेल, चर्बी, स्टार्च मिलाया जाता है। हल्दी पाउडर में लेड क्रोमेट और मेटानिल येलो मिला जाता है। लाल मिर्च पाउडर में ईंट का चूरा और लाल मिट्टी मिलाई जाती है। धनिया पाउडर में लकड़ी का बुरादा, गोबर और भूसी मिलाई जाती है। काली मिर्च में पपीते के बीज मिला दिए जाते हैं। जीरा में घास के बीज और झाड़ू के तिनके मिला दिए जाते हैं। हींग में स्टार्च, गोंद और राल मिलाए जाते हैं। वहीं, सरसों के तेल में आर्जिमोन तेल और सस्ता पाम ऑयल मिला दिया जाता है। शहद में चीनी की चाशनी, राइस सिरप गुड़ का घोल मिलाया जाता है। वहीं, चीनी और गुड़ में चाक पाउडर और वॉशिंग सोडा मिला दिया जाता है। हरी सब्जियों में मैलाकाइट ग्रीन की मिलावट की जाती है। वहीं, फल पकाने के लिए कैल्शियम कार्बाइड या एथिलीन गैस का इस्तेमाल होता है।

मिलावट की सजा

मानक पूरे ना करने पर लाइसेंस रद्द या निलंबित किया जा सकता है। सब-स्टैंडर्ड खाद्य पदार्थ के लिए 5 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। गलत ब्रांडिंग/भ्रामक प्रचार के लिए 3-10 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। असुरक्षित भोजन पर 6 महीने तक जेल और 1 लाख रुपए तक जुर्माना लगाया जा सकता है। भोजन से चोट या बीमारी होने पर 1 साल जेल की जेल और 3 लाख जुर्माना हो सकता है। भोजन से गंभीर बीमारी होने पर 6 साल जेल और 5 लाख रुपए जुर्माना हो सकता है। भोजन से मृत्यु होने पर आजीवन कारावास और 10 लाख जुर्माना लगाया जा सकता है।

यहां दर्ज करें शिकायत 

FSSAI के Food Safety Connect ऐप पर और FSSAI के टोल-फ्री नंबर पर मिलावट की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

खरीदारी के समय इन बातों पर ध्यान दें

पैकिंग पर FSSAI लाइसेंस नंबर होना चाहिए। एगमार्क (Agmark) / FSSAI लोगो होना चाहिए। अनचाही या असामान्य महक/स्वाद नहीं होना चाहिए। विश्वसनीय और सीलबंद पैकेट ही खरीदें।

 

 

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Climate impact Alert: जलवायु परिवर्तन की मार से गेहूं में होगा बड़ा बदलाव! रोटी की गुणवत्ता पर मंडराया खतरा; सेहत पर भी पड़ सकता है असर

Climate impact ON wheat: जलवायु परिवर्तन का असर अब हमारी थाली तक पहुंच सकता है। जी हां, जिस गेहूं से हर दिन करोड़ों लोगों की रोटी बनती है, उसकी पोषण संबंधी गुणवत्ता और प्रोटीन संरचना भविष्य में बदल सकती है। एक नई वैज्ञानिक स्टडी में सामने आया है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने से गेहूं के प्रोटीन की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं। इसका असर न केवल आटे और ब्रेड की क्वालिटी पर पड़ सकता है, बल्कि गेहूं से जुड़ी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के लिहाज से भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है।

स्टडी में खुलासा हुआ है कि वातावरण में बढ़ती CO₂ गेहूं की प्रोटीन संरचना को बदल सकती है। इसका असर बेकिंग गुणवत्ता पर पड़ने के संकेत मिले हैं। जर्मनी के लीबनिज इंस्टीट्यूट फॉर फूड सिस्टम्स बायोलॉजी और टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूनिख से जुड़े शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल फूड केमिस्ट्री (Food Chemistry) में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में गेहूं की खेती पर विचार करते समय केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। अनाज की गुणवत्ता और उसमें मौजूद प्रोटीन के प्रकारों को भी समझना जरूरी है।

हवा में बढ़ती CO₂ से गेहूं पर कितना असर?

स्टडी के अनुसार, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है। वर्ष 1980 में इसका स्तर लगभग 340 पार्ट्स पर मिलियन (ppm) था, जो 2024 में बढ़कर करीब 425 ppm तक पहुंच गया। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक यह स्तर 600 ppm तक जा सकता है। गेहूं दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। ऐसे में वातावरण में CO₂ की बढ़ती मात्रा के बीच इसकी खेती और अनाज की क्वालिटी में होने वाले बदलावों को समझना बेहद जरूरी है। वैज्ञानिकों ने इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए गेहूं की अलग-अलग किस्मों पर प्रयोग किया।

10 किस्मों पर हुआ प्रयोग, सामने आए चौंकाने वाले बदलाव

शोधकर्ताओं ने सर्दियों में उगाई जाने वाली गेहूं की 10 खेती की किस्मों को वास्तविक कृषि और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप उगाया। इनमें से कुछ पौधों को सामान्य परिस्थितियों में मौजूद CO₂ के स्तर पर रखा गया। जबकि अन्य पौधों को 546 ppm की बढ़ी हुई CO₂ में उगाया गया। फसल तैयार होने के बाद वैज्ञानिकों ने गेहूं के दानों में मौजूद प्रोटीन का बारीकी से विश्लेषण किया। इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

स्टडी में विशेष रूप से ग्लूटेन प्रोटीन, एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs), प्यूरोइंडोलिन और सीलिएक रोग से संबंधित कुछ पेप्टाइड्स पर ध्यान दिया गया। नतीजों से पता चला कि CO₂ कॉन्सेंट्रेशन का स्तर बढ़ने पर गेहूं के अलग-अलग प्रोटीन समूहों में एक जैसा बदलाव नहीं हुआ। कुछ प्रोटीन बढ़े। जबकि कुछ की मात्रा घट गई। इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन गेहूं की प्रोटीन संरचना को प्रभावित कर सकता है।

बढ़ेगा एक तरह का प्रोटीन, घट सकता है ग्लूटेन

इस स्टडी में पाया गया कि बढ़ी हुई CO₂ कॉन्सेंट्रेशन में गेहूं के दानों में एमाइलेज/ट्रिप्सिन इनहिबिटर्स (ATIs) की मात्रा बढ़ गई। दूसरी ओर, प्यूरोइंडोलिन, ग्लूटेन प्रोटीन और सीलिएक रोग से एक्टिव हो सकने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में कमी देखी गई। ATIs ऐसे प्रोटीन हैं जिनकी संभावित हेल्थ संबंधी भूमिका पर वैज्ञानिक अध्यन करते रहे हैं। इनकी मात्रा बढ़ने का असर मानव स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।

लेकिन इस स्टडी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि बढ़ी हुई CO₂ में उगा गेहूं सीधे तौर पर लोगों को बीमार कर देगा। वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्लूटेन प्रोटीन की मात्रा घटने के साथ गेहूं की बेकिंग गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। यानी प्रोटीन की संरचना में बदलाव का असर रोटी, ब्रेड और गेहूं से बनने वाले दूसरे खाद्य पदार्थों की निर्माण संबंधी विशेषताओं पर पड़ सकता है।

क्या गेहूं से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बदल सकता है?

अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू गेहूं से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा है। शोधकर्ताओं ने पाया कि CO₂ बढ़ने के कारण ATIs और सीलिएक रोग से सक्रिय होने वाले कुछ पेप्टाइड्स की मात्रा में बदलाव हुआ। सीलिएक रोग एक प्रतिरक्षा सिस्टम से जुड़ी बीमारी है, जिसमें ग्लूटेन के सेवन से छोटी आंत को नुकसान पहुंच सकता है।

हालांकि, स्टडी में कुछ संबंधित पेप्टाइड्स की मात्रा घटने का संकेत मिला। जबकि ATIs की मात्रा बढ़ी। इसलिए इन बदलावों का कुल स्वास्थ्य प्रभाव क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह समझने के लिए आगे अध्ययन करना जरूरी है कि गेहूं में प्रोटीन संरचना के ये बदलाव वास्तव में मानव शरीर की जैविक और प्रतिरक्षा संबंधी प्रतिक्रियाओं को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिलहाल इस शोध को गेहूं से जुड़ी बीमारियों में निश्चित वृद्धि या कमी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

हर गेहूं की किस्म पर एक जैसा असर नहीं

पीटीआई के मुताबिक, इस अध्ययन में एक और अहम बात सामने आई कि सभी गेहूं की किस्मों में बदलाव समान नहीं थे। प्रमुख शोधकर्ता सबरीना गाइस्लिट्ज के अनुसार, प्रोटीन संरचना में परिवर्तन की सीमा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि गेहूं की कौन-सी किस्म उगाई गई है। यह निष्कर्ष भविष्य की खेती के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि कुछ किस्में बढ़ी हुई CO₂ परिस्थितियों में अपनी गुणवत्ता बेहतर बनाए रखती हैं, तो उन किस्मों की पहचान और विकास पर ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों और कृषि क्षेत्रों में और परीक्षण करने होंगे।

भविष्य की खेती के लिए क्या है सबक?

इस स्टडी से साफ संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तन का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि खेतों में कितना अनाज पैदा हो रहा है। यह भी देखना होगा कि उस अनाज में किस तरह के प्रोटीन मौजूद हैं। उसकी बेकिंग गुणवत्ता कैसी है। उसके सेवन से जुड़े संभावित स्वास्थ्य पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में गेहूं की ऐसी किस्में विकसित करने की जरूरत होगी, जो बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार के साथ बेहतर गुणवत्ता बनाए रख सकें।

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Government bars sugar-based ethanol in 2026-27 tender: Report

Government bars sugar-based ethanol in 2026-27 tender: Report
Car being refuelled with petrol

Sugar-based ethanol has been left out of India’s ethanol tender for the 2026-27 supply year, according to a Reuters report. Citing the tender issued on October 16, the report states that the government has instructed state-run oil marketing companies (OMCs) to ensure no sugar is diverted towards ethanol production for this period. No bids have therefore been invited for ethanol produced using sugarcane juice, sugar or sugar syrup, or B-heavy molasses, the report adds.

  1. Oil firms invited bids for 11 billion litres of ethanol for 2026-27
  2. Tender allows bids for ethanol made from corn, broken rice and surplus FCI rice
  3. Incentive for corn-based ethanol cut from Rs 5.79/litre to Rs 2.79/litre

Tender details

It seeks 11 billion litres for the supply year starting in November 2026

The tender comes from Indian Oil, Bharat Petroleum and Hindustan Petroleum. “The Government of India has issued directions that sugar diversion for ethanol be reduced to zero for ethanol supply year 2026-27,” the tender document said, according to the report.

The companies are looking to procure 11 billion litres of ethanol for the supply year, which kicks off in November 2026. Distillers can submit bids for ethanol produced from corn, broken rice and surplus FCI (Food Corporation of India) rice. Corn-based ethanol will also fetch less this time. Its incentive has dropped by Rs 3 per litre to Rs 2.79 per litre, taking the procurement price from Rs 71.86 per litre to Rs 68.86 per litre, as per the report.

Ethanol blending and sugar supply

India is trying to rein in high sugar prices

Surplus sugar has been a key contributor to India’s ethanol-blending programme for several years. India also consumes more sugar than any other country, and has been trying to increase local production while easing prices.

Reuters had reported in August 2026 that limits on the use of sugarcane for ethanol were being considered for the season starting October 2026. Weaker rains in Maharashtra and Karnataka had already cast doubt on this year’s sugar production at the time.

Ethanol blending is aims to reduce India’s oil imports. E20 petrol, which became compulsory nationwide earlier this year, was introduced to cut emissions as well as the country’s dependence on imported crude. However, diverting sugarcane juice, sugar syrup and B-heavy molasses towards ethanol can lead to a reduction in the amount of sugar produced.

Viral Video: मैक्लॉडगंज में हर तरफ कचरे का ढेर! वायरल वीडियो देख भड़के लोग, टूरिस्ट पर उठे सवाल

हिमाचल प्रदेश के मैक्लॉडगंज का एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इसके वायरल होने के बाद लोगों के सिविक सेंस को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। वीडियो में दिख रहा कि लोग कई पर्यटन स्थलों पर लोग घूमने के बाद प्लास्टिक की बोतलें, खाने के पैकेट और दूसरी चीजें वहीं फेंक दिए हैं। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पहाड़ी रास्ते पर जगह-जगह कचरा पड़ा दिखाई दे रहा है। इस घटना ने एक बार फिर लोगों को याद दिलाया है कि पर्यटन स्थलों को साफ रखना और कचरा सही जगह पर फेंकना सभी की जिम्मेदारी है।

वायरल हो रहा वीडियो

वीडियो में दिख रहे नजारे देखकर लोग नाराजगी जता रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं कि बार-बार जागरूक करने के बावजूद पर्यटन स्थलों पर लोग जिम्मेदारी से पेश क्यों नहीं आते। इस घटना ने एक बार फिर पर्यटकों के व्यवहार और सार्वजनिक जगहों पर नियमों का पालन करने की जरूरत को लेकर चर्चा शुरू कर दी है।

चारों तरफ फैला है कचरा

सस्टेनिफाई ने हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला के पास स्थित मैक्लॉडगंज का एक वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया था, जिसे बाद में X पर भी पोस्ट किया गया। वीडियो में पहाड़ी रास्ते पर जगह-जगह कचरा फैला दिखाई दे रहा है। वीडियो बनाने वाला व्यक्ति जैसे-जैसे सड़क पर आगे बढ़ता है, रास्ते के दोनों तरफ फैला कचरा साफ नजर आता है। वहां प्लास्टिक के रैपर, पुराने कपड़े और कागज समेत कई तरह की गंदगी पड़ी हुई थी। पर्यटकों की इस लापरवाही के कारण खूबसूरत पहाड़ी रास्ता कूड़े के ढेर में बदल गया, जिससे इलाके की सुंदरता खराब होती दिखाई दी।

पोस्ट में कही ये बातें

वीडियो शेयर करते हुए यूजर ने लिखा, “मैक्लॉडगंज की हालत देखिए। अगली बार जब कोई इसे स्विट्जरलैंड जैसा बताए, तो उसे यह वीडियो जरूर दिखाएं। हिमाचल को अब कचरा साफ करने वाले पर्यटन को बढ़ावा देना चाहिए, जहां लोग सफाई के लिए स्वयंसेवक बनें और बदले में उन्हें कुछ दिनों तक मुफ्त में रहने और खाने की सुविधा मिले।” वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने नाराजगी जताई और पहाड़ी इलाकों में कचरा फैलाने वाले पर्यटकों की आलोचना की।

यूजर ने किया ये कमेंट

लोगों ने पर्यटकों से अपील की कि वे कचरा पहाड़ों पर फेंकने के बजाय अपने साथ वापस ले जाएं। इस घटना ने हिमाचल में बढ़ते पर्यटन से पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर फिर चिंता बढ़ा दी है। एक यूजर ने नाराजगी जताते हुए लिखा, “यह बेहद शर्मनाक है। हर तरफ प्लास्टिक के कवर और बोतलें दिखाई दे रही हैं। तमिलनाडु के ऊटी और पूरे नीलगिरी जिले में सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध है। फिर हिमालयी राज्य भी ऐसा नियम क्यों नहीं लागू कर सकते?”

दूसरे यूजर ने लिखा, “यहां पर्यटकों की संख्या बहुत ज्यादा है और लोगों में नागरिक जिम्मेदारी की कमी है। इसके अलावा, नगर निगम की व्यवस्था भी बेहद कमजोर है। सफाई के लिए स्वयंसेवक मौजूद हैं, लेकिन इस खूबसूरत शहर को बचाने के लिए पर्यटकों पर जुर्माना लगाना और उनकी संख्या सीमित करना जरूरी है।” एक अन्य यूजर ने सहमति जताते हुए कहा, “मैं पूरी तरह सहमत हूं। यह सोचकर भी बहुत दुख होता है कि हमारे हिमाचली भाई-बहनों को इन हालात में किन परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा।”

दादी की एक रेसिपी ने बदल दी किस्मत! 5 लाख लगाकर दो बहनों ने खड़ा किया 10 करोड़ का बिजनेस

कहते हैं कि सफलता की सबसे खास कहानियां अक्सर घर की रसोई से शुरू होती हैं। बेंगलुरु की दो बहनों, राम्या रवि और श्वेता रवि ने इस बात को सच कर दिखाया है। बचपन में दादी के हाथों की पारंपरिक बिरयानी का स्वाद चखने वाली इन बहनों ने उसी रेसिपी को अपना बिजनेस आइडिया बनाया। साल 2020 में महज 5 लाख रुपये से शुरू हुआ उनका कारोबार आज करीब 10 करोड़ रुपये के टर्नओवर तक पहुंच चुका है। उनकी कहानी बताती है कि सही सोच, मेहनत और अपने काम पर भरोसा हो, तो छोटी शुरुआत भी बड़ी कामयाबी में बदल सकती है।

दादी की रेसिपी से आया बिजनेस का आइडिया

राम्या और श्वेता बचपन से ही अपनी दादी के हाथों की कर्नाटक स्टाइल डोन्ने बिरयानी खाती आई थीं। इस बिरयानी का स्वाद उनके लिए सिर्फ एक पसंदीदा डिश नहीं, बल्कि परिवार की यादों और परंपरा का हिस्सा था। बड़े होने के साथ दोनों बहनों को एहसास हुआ कि उनकी दादी की यह खास रेसिपी दूसरे लोगों को भी पसंद आ सकती है। यहीं से उन्होंने पारिवारिक स्वाद को बिजनेस में बदलने का फैसला किया। उनका मकसद बिरयानी के असली स्वाद को बरकरार रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना था।

5 लाख रुपये से शुरू किया कारोबार

नवंबर 2020 में कोरोना महामारी के दौरान दोनों बहनों ने RNR Donne Biryani नाम से अपना कारोबार शुरू किया। शुरुआत बेंगलुरु के महज 200 वर्ग फुट के क्लाउड किचन से हुई। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने 5 लाख रुपये लगाए और एक कुक तथा कुछ सहायकों की मदद से काम शुरू किया। छोटी-सी रसोई से शुरू हुआ यह सफर पहले ही महीने में चर्चा में आ गया। द बेटर इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में राम्या ने बताया कि कारोबार के पहले महीने में उन्हें 10,000 से ज्यादा ऑर्डर मिले। इस शुरुआती सफलता ने दोनों बहनों को आगे बढ़ने का हौसला दिया।

अनोखी पैकेजिंग ने बनाई अलग पहचान

दोनों बहनों ने शुरुआत में महंगे रेस्टोरेंट खोलने के बजाय डिलीवरी आधारित बिजनेस मॉडल अपनाया। इससे कम लागत में कारोबार शुरू करना और धीरे-धीरे उसका विस्तार करना आसान हुआ। उन्होंने अपने ब्रांड को अलग पहचान देने के लिए पैकेजिंग पर भी ध्यान दिया। उनकी बिरयानी केले के पत्ते में लपेटकर टिन के डिब्बे में रखी जाती है। इस अंदाज ने पारंपरिक स्वाद को खास प्रस्तुति के साथ जोड़ दिया।

14 क्लाउड किचन तक पहुंचा कारोबार

रिपोर्ट के मुताबिक, RNR Donne Biryani का विस्तार अब 14 क्लाउड किचन और एक अलग रेस्टोरेंट तक हो चुका है। कंपनी का सालाना टर्नओवर करीब 10 करोड़ रुपये बताया गया है। बिरयानी के अलावा यहां ड्रमस्टिक चिली स्टार्टर, मटन बोन सूप और चिकन घी रोस्ट जैसे व्यंजन भी मिलते हैं। मिठाई में इलनेर पायसम यानी नारियल से बनी खीर भी मेन्यू का हिस्सा है। यहां वेज और चिकन बिरयानी की कीमत 269 से 349 रुपये के बीच है, जबकि मटन बिरयानी 419 रुपये में मिलती है।

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घर के स्वाद से मिली बड़ी सफलता

राम्या और श्वेता की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो अपने हुनर या पारिवारिक परंपरा को कारोबार में बदलना चाहते हैं। दोनों बहनों ने दादी की रेसिपी को आधुनिक बिजनेस मॉडल से जोड़ा और एक छोटे किचन को बड़े ब्रांड में बदल दिया। उनकी सफलता दिखाती है कि बिजनेस की शुरुआत के लिए हमेशा बड़ी पूंजी जरूरी नहीं होती। कई बार एक खास आइडिया और उसे पूरा करने का जुनून ही सफलता की असली नींव बन जाता है।

डेंटिस्ट बनने दुबई गईं भारतीय महिला, डांस फिटनेस से बदली किस्मत, अब हर महीने कमाती हैं 11 लाख रुपये

बेटे की याद में हर दिन 300 लोगों का भरते हैं 70 साल के बापू | Free Food | 70 YO Dada | Gondal

बेटे की याद में हर दिन 300 लोगों का भरते हैं 70 साल के बापू | Free Food | 70 YO Dada | Gondal

गुजरात के गोंडल में मुफ़्त टिफिन सेवा चलाने वाले 70 साल के चंदू बापू ने 20 साल पहले अपने बेटे को खोने के बाद एक संकल्प लिया था: “मैं किसी को भूखे पेट नहीं सोने दूँगा!”

आज बापू उन लोगों का पेट भरते हैं, जो देख नहीं सकते, बोल नहीं सकते, दिव्यांग हैं, शारीरिक रूप से असमर्थ हैं या बेसहारा हैं। उन्होंने सिर्फ़ 10 लोगों से इस सेवा की शुरुआत की थी, लेकिन आज 300 लोग बापू की गाड़ी का इंतज़ार करते हैं! जैसे ही बापू की गाड़ी पहुँचती है, उनके चेहरों पर मुस्कान आ जाती है।

बापू को आपके साथ की ज़रूरत है। यह कोई संस्था नहीं, बल्कि एक पिता का अपने बेटे के प्रति प्यार है और निःस्वार्थ सेवा है।

आपकी छोटी-सी मदद किसी की भूख मिटा सकती है।
संपर्क करें- 80000 83700

और इस वीडियो को ज़रूर शेयर करें, ताकि आपके एक शेयर से किसी को खाना मिल सके। :heart:
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[Chandu Bapu free food service Gondal Gujarat, 70-year-old man feeding 300 needy people daily, Free tiffin service for disabled people in Gujarat]

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न्यूज़रूम से वड़ा पाव के ठेले तक | Journalist Couple VadaPav Business | Patrakar Couple VadaPav Wale

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12 साल तक मीडिया में काम किया, लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब जसवीर सिंह जस्सी और पत्नी सुधा शाह की नौकरियाँ चली गईं। आर्थिक तंगी आई, लोगों ने ताने मारे और कई बार लगा कि अब आगे कोई रास्ता नहीं है।
फिर मुंबई में सिद्धिविनायक मंदिर गए और वहाँ पर खाए एक वड़ा पाव ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।
आज यही कपल नोएडा सेक्टर 19 में अपना वड़ा पाव स्टॉल चलाता है और मेहनत से अपनी नई पहचान बना रहा है।
उनकी कहानी याद दिलाती है कि कोई काम छोटा नहीं होता, अगर आप उसे ईमानदारी और हौसले से करते हैं।
आपके लिए सफलता का असली मतलब क्या है?
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बेंगलुरु में कुक को हर महीने देती हैं ₹8,000, खाना भी औसत! महिला ने बताया आखिर किस चीज के लिए देती हैं पैसे

आज के दौर में लोग पैसे देकर सिर्फ सुविधाएं नहीं, बल्कि अपना कीमती समय भी बचाना चाहते हैं। बेंगलुरु की एक महिला की पोस्ट ने इसी बदलती सोच को सामने ला दिया है। उन्होंने बताया कि दो लोगों के लिए घर पर खाना बनाने वाला कुक रखने का खर्च हर महीने 7 से 8 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। इसके बावजूद खाने का स्वाद हमेशा लाजवाब नहीं होता। फिर भी लोग यह खर्च उठाने को तैयार हैं।

आखिर जब खाने की क्वालिटी पर सवाल है, तो कुक रखने के लिए हर महीने इतनी बड़ी रकम क्यों दी जा रही है? महिला की बात ने शहरों में रहने वाले नौकरीपेशा लोगों की जिंदगी और उनकी प्राथमिकताओं पर दिलचस्प चर्चा छेड़ दी है।

दो लोगों के लिए कुक की फीस 8 हजार रुपये तक

बेंगलुरु में रहने वाली मेघा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बताया कि दो लोगों के घर में खाना बनाने वाले कुक की फीस लगभग 7,000 से 8,000 रुपये प्रति माह हो सकती है। कुक आमतौर पर दिन में दो बार घर आता है, सब्जियां काटता है, दो तरह के व्यंजन बनाता है और फिर दूसरे घर में काम करने निकल जाता है। रविवार को उसकी छुट्टी रहती है।

मेघा के मुताबिक, यह व्यवस्था शहर में रहने वाले उन लोगों के लिए आम है, जो नौकरी और दूसरी जिम्मेदारियों के कारण रोजाना खाना बनाने के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते।

प्रेशर कुकर में बनता है सबकुछ, स्वाद को लेकर भी शिकायत

मेघा ने अपनी पोस्ट में खाना बनाने के तरीके पर भी टिप्पणी की। उनके मुताबिक, दाल, आलू, सोया और यहां तक कि चिकन बनाने में भी प्रेशर कुकर का खूब इस्तेमाल होता है। ऐसे में खाने का स्वाद कई बार औसत रह जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि मनपसंद स्वाद पाने के लिए कुक को बार-बार अपनी पसंद समझानी पड़ सकती है। वहीं, स्वाद बढ़ाने के लिए ज्यादा तेल और मसालों का इस्तेमाल भी परेशानी बन सकता है।

हालांकि, मेघा की यह टिप्पणी उनके निजी अनुभव पर आधारित है। हर कुक का खाना बनाने का तरीका और स्वाद अलग हो सकता है।

जब खाना औसत है, तो लोग आखिर पैसे क्यों दे रहे हैं?

मेघा की पोस्ट का सबसे दिलचस्प पहलू यही है। उन्होंने महसूस किया कि लोग हर महीने हजारों रुपये सिर्फ स्वादिष्ट खाने के लिए नहीं देते, बल्कि दिन में दो बार खाना बनाने की चिंता से छुटकारा पाने के लिए भी खर्च करते हैं।

हर दिन क्या बनाना है, सब्जियां कब काटनी हैं, खाना कब तैयार करना है और रसोई की जिम्मेदारी कैसे संभालनी है इन सवालों से बचने के लिए लोग कुक पर निर्भर रहते हैं। यानी कई लोगों के लिए यह खर्च स्वाद से ज्यादा समय और सुविधा खरीदने जैसा है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी चर्चा, लोगों ने भी रखी अपनी राय

मेघा की पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ यूजर्स ने माना कि घरेलू मदद की कीमत चुकाना आसान नहीं, लेकिन कई बार परिस्थितियों के चलते ऐसा करना जरूरी हो जाता है।

एक यूजर ने कहा कि लोग रोजाना रसोई से जुड़े फैसलों से आजादी पाने के लिए पैसे खर्च करते हैं। वहीं, एक अन्य यूजर ने तर्क दिया कि घर का बना खाना स्वाद में भले ही हमेशा बेहतरीन न हो, लेकिन कई बार डिलीवरी ऐप से मंगाए गए खाने के मुकाबले बेहतर विकल्प हो सकता है।

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अमृतसर में बना मैगी का पहाड़! 1000 पैकेट से तैयार हुआ लंगर, देखें वायरल वीडियो

मैगी का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में तुरंत बनने वाला एक आसान और पसंदीदा स्नैक आता है। लेकिन अमृतसर में इसी आम मैगी को कुछ लोगों ने इतने बड़े स्तर पर तैयार किया कि देखने वाले भी हैरान रह गए। यहां 1000 पैकेट वेजिटेबल मैगी एक साथ बनाई गई और फिर इसे लोगों के बीच बांटा गया। बड़े बर्तन में पकती मैगी और उसे लेने के लिए जुटे लोगों का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ गया। इस आयोजन ने सिर्फ अपनी विशाल मात्रा की वजह से ध्यान नहीं खींचा, बल्कि लोगों के बीच इस बात पर भी बहस शुरू हो गई कि लंगर में किस तरह का भोजन परोसा जाना चाहिए।

कुछ लोगों ने इसे मिल-बांटकर खाना खिलाने की अच्छी पहल माना, जबकि कुछ ने मैगी की जगह पौष्टिक भोजन को बेहतर विकल्प बताया। यानी एक साधारण सी मैगी ने खाने से आगे बढ़कर परंपरा और पसंद पर चर्चा छेड़ दी।

बड़े भगोने में शुरू हुई हजार पैकेट की तैयारी

वीडियो की शुरुआत मैगी के ढेर सारे पैकेट खोलने से होती है। इसके बाद एक बड़े बर्तन को चूल्हे पर रखा गया और उसमें तेल व मक्खन डाला गया। फिर बारी-बारी से प्याज, शिमला मिर्च, गाजर, मटर, स्वीट कॉर्न, मशरूम और टमाटर जैसी कई सब्जियां डाली गईं। इतनी मात्रा में सामग्री देखकर ही अंदाजा लग जाता है कि खाना कितने लोगों के लिए तैयार किया जा रहा था।

मैगी में डाली गईं ढेर सारी सब्जियां और पनीर

सब्जियों को अच्छी तरह पकाने के बाद बड़े बर्तन में पानी और मैगी मसाला डाला गया। इसके बाद 1000 पैकेट की मैगी उसमें शामिल कर दी गई। जब मैगी पककर तैयार हुई तो इसमें पनीर के कई किलो टुकड़े भी डाले गए। आखिर में तैयार खाना लोगों को गर्मागर्म परोसा गया।

खाना लेने के लिए जुटे लोग

मैगी तैयार होने के बाद वितरण शुरू हुआ तो लोगों की कतार लग गई। रोजाना घरों और छोटी दुकानों में नजर आने वाली मैगी का इतना बड़ा रूप देखकर वहां मौजूद लोगों के लिए यह अनुभव खास रहा।

वीडियो में कई लोग खाना लेते दिखाई दे रहे हैं। आयोजन का सबसे मानवीय पहलू यही था कि एक आम पसंद के खाने ने अलग-अलग लोगों को एक जगह ला दिया।

तारीफ के साथ उठे सवाल भी

वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचा तो प्रतिक्रियाएं एक जैसी नहीं रहीं। कुछ लोगों ने इस प्रयास की सराहना की और कहा कि लोगों को खाना खिलाने की पहल अच्छी है। वहीं कुछ यूजर्स ने सवाल किया कि लंगर जैसे सामुदायिक भोजन में मैगी को शामिल करना कितना उचित है। कुछ लोगों ने इसकी जगह दाल, सब्जी या दूसरे पौष्टिक भोजन को बेहतर विकल्प बताया।

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क्या लंगर सिर्फ खाने का नाम है?

इस आयोजन ने एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा कर दिया क्या लंगर की पहचान सिर्फ इस बात से तय होनी चाहिए कि उसमें क्या खाना परोसा जा रहा है, या फिर लोगों को मिल-बांटकर भोजन कराना इसका बड़ा उद्देश्य है? सोशल मीडिया पर इसी बात को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिली। कुछ लोगों ने परंपरा पर जोर दिया, जबकि कुछ ने सेवा और लोगों को भोजन उपलब्ध कराने को ज्यादा महत्वपूर्ण माना।

एक साधारण मैगी ने शुरू कर दी बड़ी चर्चा

1000 पैकेट मैगी से तैयार यह आयोजन इसलिए चर्चा में आया क्योंकि इसमें एक बेहद आम चीज को बड़े सामुदायिक भोजन का रूप दिया गया। किसी के लिए यह लोगों को जोड़ने वाली अच्छी पहल थी, तो किसी के लिए लंगर की परंपरा और सेहत से जुड़ा सवाल।

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