‘मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने अपनी कंपनी से 4.7 करोड़ चुराए हैं’, टेक कर्मचारी ने 2 साल तक कुछ काम न करने पर कही बड़ी बात

एक टेक कर्मचारी ने यह दावा करके इंटरनेट यूजर्स को हैरान कर दिया है कि उसने लगभग दो साल तक काम पर लगभग कुछ भी न करते हुए 275,000 डॉलर (करीब 2.6 करोड़ रुपये) की सालाना सैलरी कमाई। कर्मचारी का अनुमान है कि इस दौरान उसे 500,000 डॉलर (लगभग 4.7 करोड़ रुपये) से ज्यादा का भुगतान किया गया, जबकि उसके पास लगभग कोई जिम्मेदारी नहीं थी।

रेडिट पोस्ट वायरल

रेडिट (Reddit) पर एक पोस्ट में उसने बताया कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों में से एक में एक बड़ा प्रमोशन कैसे एक अप्रत्याशित मोड़ पर आ गया। कंपनी में अचानक हुए पुनर्गठन (restructuring) के कारण उसके पास न तो कोई सार्थक काम बचा और न ही उसे मैनेजमेंट से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश मिले।

रेडिट के ‘r/corporate’ सबरेडिट पर अपना अनुभव साझा करते हुए कर्मचारी ने कहा- “मुझे ऐसा लगता है जैसे मैंने अपनी कंपनी से 500,000 डॉलर से ज्यादा चुरा लिए हैं।” उसने बताया कि उसने कंपनी में लगभग एक दशक बिताया और इस दौरान पांच अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। हालांकि 2025 की शुरुआत में जो उसके करियर का एक अहम पड़ाव होना चाहिए था, वह अनिश्चितता के एक लंबे दौर में बदल गया।

रेडिट यूजर के अनुसार- उसे एक नई टीम में शामिल होने का ऑफर मिला, जो उसके करियर में एक बड़ा कदम था। लेकिन जिस दिन उसने नई टीम जॉइन की उसी दिन कंपनी में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन हुआ, जिसके चलते वे मैनेजर और डायरेक्टर दोनों ही कंपनी छोड़कर चले गए, जिन्होंने उसे काम पर रखा था।

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इस मौके के लिए अपने परिवार को वेस्ट कोस्ट से न्यूयॉर्क शहर ले जाने के बाद उन्होंने एक-दो सप्ताह इंतजार करने का फैसला किया कि नई लीडरशिप के तहत टीम कैसे काम करेगी। हालांकि हालात वैसे नहीं सुधरे जैसी उन्होंने उम्मीद की थी। उन्होंने लिखा- “तो वहां मैं था। साल के लगभग 275,000 डॉलर कमा रहा था एक ऐसी टीम में जहां कोई जिम्मेदारी या मैनेजमेंट का कोई दिशा-निर्देश नहीं था। बस कुछ नहीं कर रहा था।”

ऑफिस के कैफे में बैठकर यूट्यूब और नेटफ्लिक्स देखते थे

कर्मचारी ने बताया कि उनका अनुभव सिर्फ कम काम या कभी-कभार होने वाली मीटिंग्स से कहीं बढ़कर था। उन्होंने बताया कि वे अपने काम के घंटों में ऑफिस के कैफे में बैठकर यूट्यूब और नेटफ्लिक्स देखते थे। न्यूयॉर्क शहर के मशहूर रेस्तरां ढूंढ़ते थे और मैनहट्टन में घूमते-फिरते थे। भले ही यह सुनने में एक बहुत ही शानदार स्थिति लगे, लेकिन उन्होंने कहा कि किसी उद्देश्य का न होना धीरे-धीरे उनके लिए निराशा का कारण बन गया।

रेडिट यूजर ने यह भी बताया कि शुरुआत में उन्होंने सार्थक काम पाने और बिजनेस को बेहतर ढंग से समझने के लिए कई कोशिशें कीं। हालांकि उनका कहना है कि नए मैनेजर की तरफ से कोई खास दिशा-निर्देश नहीं मिले, जिसकी वजह से वे अपने काम से पूरी तरह अलग-थलग महसूस करने लगे।

आखिरकार उसने काम खोजने की नियमित कोशिशें बंद कर दीं और ज्यादातर दिन घर पर ही रहने लगा। उसने बताया कि वह अपने अपार्टमेंट के जिम में समय बिताता था, तरह-तरह के नाश्ते तैयार करता था, बालकनी में बैठकर शहर के नजारे देखते हुए कॉफी पीता था और कॉर्पोरेट जीवन की बेतुकी बातों के बारे में सोचता रहता था।

इस अनुभव ने टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री के प्रति उसके नजरिए को भी बदल दिया। उसने कहा कि उसे इस बात से काफी हैरानी हुई कि कोई कर्मचारी इतने लंबे समय तक बिना किसी काम (बिना किसी असाइनमेंट) के रह सकता है और फिर भी उसे अच्छी-खासी सैलरी मिलती रहती है।

टेक कर्मचारी का कहना है कि आखिरकार उसे एक बेहतर रोल मिल गया

इन अजीब हालात के बावजूद कर्मचारी ने तय किया कि वह इस अनचाहे ब्रेक का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करेगा। कई महीनों तक इंटरव्यू देने के बाद उसे हाल ही में उसी कंपनी में एक और पद मिल गया, जिसे उसने अपने करियर में एक बड़ी तरक्की बताया। हालांकि वह इस नए मौके को लेकर उत्साहित था, लेकिन लगभग दो साल तक बिना किसी काम के रहने के बाद फिर से एक चुनौतीपूर्ण रोल में लौटना काफी मुश्किल साबित हुआ।

उन्होंने लिखा, “मुझे यहां आए अभी सिर्फ डेढ़ हफ्ता ही हुआ है और मुझे लगभग 2 साल तक कोई काम न करने का असर अभी से महसूस होने लगा है। मुझे लग रहा है कि मैं काफी पीछे छूट गया हूं और मेरी कार्यक्षमता भी काफी कम हो गई है।” फिर भी उन्होंने कहा कि वे खुश हैं कि उन्हें एक ऐसी भूमिका मिल गई है, जहां वे सार्थक योगदान दे सकते हैं और फिर से कुछ नया सीख सकते हैं।

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें बिना ज्यादा काम किए सैलरी लेने पर कोई गिल्ट महसूस हुआ तो उन्होंने माना कि शुरुआत में उन्हें लगा जैसे वे कंपनी पर एक ‘बेवजह का खर्च’ बन गए हैं। ऐसा इसलिए था क्योंकि इससे पहले एक सेल्सपर्सन के तौर पर वे कंपनी के लिए काफी रेवेन्यू (कमाई) लाते थे।

हालांकि समय के साथ उनका यह अपराधबोध गुस्से में बदल गया और फिर उन्होंने स्थिति को स्वीकार कर लिया। आखिरकार उन्होंने इस समय का भरपूर फायदा उठाने का फैसला किया—अपनी पत्नी के साथ अच्छा समय बिताया, न्यूयॉर्क के अलग-अलग रेस्तरां में खाना चखा और खुद को एक बहुत जरूरी मानसिक ब्रेक दिया।

उन्होंने आगे कहा कि इस अनुभव ने उन्हें कॉर्पोरेट टेक्नोलॉजी नौकरियों के बारे में एक अलग नजरिया दिया है। यहां कर्मचारी कभी-कभी कंपनी की व्यवस्था की कमियों के बीच ऐसे छिप सकते हैं कि किसी को पता ही नहीं चलता कि उनकी जिम्मेदारियां क्या हैं।

पोस्ट के अंत में उन्होंने पाठकों को अपने सवाल पूछने के लिए इनवाइट किया। बाद में एक एडिट में उन्होंने अपने जैसे अनुभव साझा करने वाले लोगों को धन्यवाद दिया और कहा कि उनकी कहानियां सुनकर उन्हें अपनी स्थिति के बारे में बेहतर महसूस हुआ।

रेडिट यूजर्स ने अपने मिलते-जुलते अनुभव साझा किए

इस कर्मचारी की कहानी पढ़ने के बाद कई रेडिट यूजर्स ने अपने विचार साझा किए। कुछ लोगों को इस स्थिति से जलन हुई तो कुछ ने इस बात पर चिंता जताई कि कोई सार्थक काम न होने से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। एक यूजर ने कहा, “न्यूयॉर्क में इधर-उधर घूमना किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन अगर मेरे हफ्ते में 2 दिन से ज्यादा समय खाली निकल जाए तो मैं पागल होने लगता हूं।”

एक दूसरे यूजर ने कहा, “मैं खुद टेक इंडस्ट्री में काम करता हूं और पूरे दिन व्यस्त रहता हूं, इसलिए आप मेरी ‘ड्रीम जॉब’ जी रहे हैं! बस फर्क इतना है कि अगर मैं आपकी जगह होता तो उस खाली समय का इस्तेमाल अपनी स्किल्स को बेहतर बनाने और नए सर्टिफिकेशन लेने में करता।”

एक तीसरे यूजर ने कहा, “मैं यहां कुछ पूछने नहीं आया हूं, बस इतना कहना चाहता हूं कि ‘मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है!’ कुछ समय तक तो मजा आता है, लेकिन फिर यह निराशाजनक लगने लगता है। मुझे अभी एक प्रमोशन मिला है और मैं थोड़ा घबराया हुआ हूं क्योंकि अब मुझे सच में काम करना पड़ेगा, लेकिन साथ ही मुझे कुछ नया सीखने और असली काम करने का मौका भी मिलेगा! और हां, अब यह पूरी तरह से रिमोट (घर से काम) नहीं है, बल्कि हाइब्रिड है, जिसे लेकर मैं काफी उत्साहित हूं! और सबसे अच्छी बात यह है कि मैं यूरोप जा रहा हूं।”

अमेरिका में पहली बार सजा-ए-मौत टीवी पर लाइव होगी:16 साल पहले जहां 13 लोगों की जान ली, दोषी को वहीं गोली मारी जाएगी

अमेरिका में पहली बार मौत की सजा को लाइव टीवी पर दिखाया जाएगा। पूर्व आर्मी मेजर निदाल हसन को गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि इस सजा का लाइव टेलिकास्ट किया जाएगा, ताकि आम लोग इसे देख सकें। BBC के मुताबिक, 100 साल में यह अमेरिका में पहली सार्वजनिक तौर पर दी गई मौत की सजा होगी। हसन ने 2009 में टेक्सास के सैन्य अड्डे पर धार्मिक नारा लगाते हुए गोलीबारी की थी, जिसमें 13 सैनिकों की मौत हो गई थी। अब 3 दिसंबर को यहीं मौत की सजा दी जाएगी। 65 साल बाद सैनिक को मौत की सजा का पहला ऐसा मामला 1961 के बाद अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था के तहत मौत की सजा पाने वाला निदाल हसन पहला व्यक्ति होगा। सैन्य व्यवस्था में आखिरी बार प्राइवेट जॉन ए. बेनेट को मौत की सजा दी गई थी। हेगसेथ ने एक इंटरव्यू में कहा कि हसन को सैनिकों की एक टुकड़ी गोली मारकर मौत की सजा देगी। हेगसेथ ने कहा, ‘हम यह सुनिश्चित करेंगे कि लोग इसे देख सकें और यह सार्वजनिक हो। लोगों को समझना चाहिए कि इस तरह के कामों के गंभीर नतीजे होते हैं।’ हमले के बाद माना था- जिहाद के लिए किया 5 नवंबर 2009 को सेना के मनोचिकित्सक मेजर निदाल हसन निजी पिस्तौल लेकर फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पहुंचा और सैनिकों व अन्य लोगों पर अचानक गोलीबारी कर दी। यह अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुई सबसे घातक सामूहिक गोलीबारी थी। उस समय अमेरिका अफगानिस्तान और इराक में युद्ध लड़ रहा था। हसन ने बाद में कहा कि वह इन युद्धों को गैरकानूनी और अनैतिक मानता था और जिहाद के लिए हमला किया था। गोलीबारी में हसन भी घायल हुआ और कमर के नीचे से लकवाग्रस्त हो गया। सैन्य अदालत में उसने हत्याओं की बात स्वीकार की। 2013 में उसे पहले से हत्या की योजना बनाने और हत्या की कोशिश के कुल 45 मामलों में दोषी ठहराया गया। हसन ने हमले पर कोई पछतावा नहीं जताया। सैन्य मानसिक स्वास्थ्य पैनल के सामने उसने कहा कि वह चाहता था कि हमले में उसकी भी मौत हो जाती, ताकि वह शहीद बन सके। उसका यह तक कहा कि मौत की सजा मिलने पर भी वह खुद को शहीद मानेगा। अदालत में अपील करने से सजा अब भी टल सकती है सैन्य व्यवस्था में किसी कैदी को तब तक मौत की सजा नहीं दी जा सकती, जब तक राष्ट्रपति खुद उस सजा की पुष्टि न करें। इसके बाद भी कानूनी अपील के कारण सजा पर रोक लग सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने मंगलवार को हसन को गोली मारकर मौत की सजा देने का आदेश मंजूर कर दिया था। वकील जॉन मिल्स के मुताबिक, हसन के मामले में अपील की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। हसन अपने दोषी ठहराए जाने और मौत की सजा के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है। ऐसी स्थिति में सजा पर रोक लगने की संभावना है। उन्होंने कहा, ‘गोली मारकर दी जाने वाली मौत की सजा का लाइव प्रसारण करने की कोशिश ट्रम्प प्रशासन का सिर्फ ध्यान खींचने का तरीका है। इसकी संभावना भी कम है कि सजा दी जा सकेगी, न्याय मिलना तो दूर की बात है।’ ——————– यह खबर भी पढ़ें… ओबामा के करीबी थे, अब ट्रम्प के खास बने जुकरबर्ग:राष्ट्रपति ने जेल भेजने की धमकी दी थी, अब साथ मिलकर AI के नियम बना रहे मेटा चीफ मार्क जुकरबर्ग कभी अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के करीबी थे। 2021 में फेसबुक और इंस्टाग्राम ने ट्रम्प का अकाउंट बंद कर दिए, तो उन्होंने जुकरबर्ग को जेल भेजने की धमकी दी थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। पूरी खबर पढ़ें…

सनातन चेतना में पुरुषार्थ और मनुष्य

‘पुरुषार्थ’ का अर्थ है— पुरुषेण अर्थ्यते इति पुरुषार्थः, अर्थात विवेकशील मनुष्य द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए किया गया श्रेष्ठ प्रयास। भारतीय वाङ्मय में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म नैतिक आधार है, अर्थ जीवन के लिए आवश्यक संसाधन है, काम इच्छाओं और आनंद का क्षेत्र है, जबकि मोक्ष आत्म-मुक्ति का सर्वोच्च लक्ष्य है।

वैदिक जीवन-दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक कल्याण को कभी एक-दूसरे का विरोधी नहीं माना। जहां पाश्चात्य दर्शन अक्सर या तो भौतिकवाद की ओर झुकता है या फिर पूर्ण वैराग्य की ओर, वहीं भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन की संपूर्णता के लिए एक संतुलित, व्यावहारिक और वैज्ञानिक व्यवस्था दी, जिसे चतुर्विध पुरुषार्थ कहा जाता है।

‘पुरुषार्थ’ का अर्थ है— पुरुषेण अर्थ्यते इति पुरुषार्थः, अर्थात विवेकशील मनुष्य द्वारा अपने जीवन को सार्थक बनाने के लिए किया गया श्रेष्ठ प्रयास। भारतीय वाङ्मय में मानव जीवन के चार प्रमुख पुरुषार्थ बताए गए हैं— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म नैतिक आधार है, अर्थ जीवन के लिए आवश्यक संसाधन है, काम इच्छाओं और आनंद का क्षेत्र है, जबकि मोक्ष आत्म-मुक्ति का सर्वोच्च लक्ष्य है। इन चारों का क्रम भी अत्यंत अर्थपूर्ण है। यह मानव चेतना के क्रमिक विकास का मार्ग दिखाता है।

इन चारों में धर्म सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण पुरुषार्थ है। महाभारत के कर्णपर्व में कहा गया है—

धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः।

अर्थात धर्म वही है, जो समाज को धारण करता है। यहां धर्म का अर्थ किसी संकीर्ण पूजा-पद्धति या संप्रदाय से नहीं है। धर्म वह नैतिक विवेक और आचार-संहिता है, जो मनुष्य के जीवन को संतुलित रखती है तथा अर्थ और काम को अनियंत्रित होकर विनाशकारी बनने से रोकती है।

अर्थ का संबंध धन, संपत्ति और संसाधनों से है। जीवन के निर्वाह, परिवार के पालन-पोषण, समाज की सेवा और अपने कर्तव्यों के निर्वहन के लिए अर्थ आवश्यक है। सनातन दर्शन धन या समृद्धि का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे जीवन का आवश्यक पुरुषार्थ मानता है।

इसी प्रकार काम केवल इंद्रिय-सुख का नाम नहीं है। इसमें मनुष्य की सभी स्वाभाविक इच्छाएं, भावनाएं, सौंदर्य-बोध, प्रेम, कला, सृजनशीलता और वंश की निरंतरता का भाव भी शामिल है। जीवन में आनंद, संवेदना और रचनात्मकता के लिए काम का संतुलित और मर्यादित होना आवश्यक है।

इन सबका अंतिम लक्ष्य मोक्ष है। यही मानव जीवन का परम पुरुषार्थ है। जब मनुष्य अपने सांसारिक कर्तव्यों का पालन करते हुए अज्ञान, मोह और बंधनों से मुक्त होकर आत्मानंद को प्राप्त करता है, तब वह मोक्ष की अवस्था तक पहुंचता है।

इस दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये चारों पुरुषार्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। शास्त्र स्पष्ट कहते हैं कि अर्थ और काम का उपभोग सदैव धर्म की मर्यादा के भीतर होना चाहिए। श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।।

अर्थात— हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और स्वार्थ से रहित बल हूं तथा प्राणियों में धर्म के अनुकूल, मर्यादित काम हूं।

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जब अर्थ और काम धर्म से अलग हो जाते हैं, तब वे समाज में विकृति, अपराध और पतन का कारण बनते हैं। अधर्म से कमाया गया धन शोषण का रूप ले लेता है और मर्यादा से मुक्त इच्छाएं अंततः हिंसा, स्वार्थ और क्रूरता में बदल जाती हैं। इसलिए धर्म इन दोनों को सही दिशा देने वाला नियंत्रण है।

प्राचीन ऋषियों ने पुरुषार्थ चतुष्टय को केवल दार्शनिक विचार के रूप में नहीं छोड़ा, बल्कि उसे आश्रम-व्यवस्था के सामाजिक ढांचे से भी जोड़ा।

ब्रह्मचर्य आश्रम अर्थात विद्यार्थी जीवन में मनुष्य का पूरा ध्यान धर्म पर रहता है। इस समय वह अनुशासन, कर्तव्य, ज्ञान और चरित्र का निर्माण करता है। यही उसके आगे के जीवन की नींव बनता है।

गृहस्थ आश्रम समाज का आधार है। इसी अवस्था में मनुष्य अर्थ अर्जित करता है, परिवार का पालन करता है और काम का मर्यादित उपभोग करता है। लेकिन इन दोनों का आधार ब्रह्मचर्य में सीखा गया धर्म ही होता है।

वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य धीरे-धीरे सांसारिक आसक्ति से ऊपर उठना शुरू करता है। वह अपने अनुभव समाज को समर्पित करता है और मन को मोक्ष की दिशा में तैयार करता है।

संन्यास आश्रम में मनुष्य लौकिक बंधनों का त्याग कर परम सत्य और आत्म-मुक्ति की साधना में प्रवृत्त होता है। इस अवस्था में मोक्ष ही उसका एकमात्र लक्ष्य होता है।

आज इक्कीसवीं सदी का विश्व मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और नैतिक संकट से जूझ रहा है। इसका एक बड़ा कारण यही है कि पुरुषार्थों का संतुलन बिगड़ गया है। आधुनिक सभ्यता ने धर्म और मोक्ष को लगभग भुला दिया है और अर्थ तथा काम को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया है। परिणाम हमारे सामने है। अपार धन होने पर भी मनुष्य अवसाद से घिरा है, परिवार टूट रहे हैं, समाज में असंतोष बढ़ रहा है और युद्धों की विभीषिका गहराती जा रही है। मनुष्य के पास भौतिक साधन तो हैं, लेकिन जीवन का नैतिक मार्गदर्शन और अंतिम उद्देश्य धुंधला पड़ गया है।

चतुर्विध पुरुषार्थ का यह शाश्वत सिद्धांत हमें बताता है कि जीवन केवल भोग के लिए नहीं है और न ही संसार से भाग जाने के लिए। जीवन का उद्देश्य संसार में रहते हुए, मर्यादा और कर्तव्य के साथ कर्म करना तथा अंततः परम सत्य की ओर बढ़ना है। इसलिए पुरुषार्थ चतुष्टय कोई काल्पनिक दर्शन नहीं, बल्कि मानव जीवन को संतुलन, दिशा और पूर्णता देने वाला कालजयी जीवन-दर्शन है।

जब मनुष्य का कर्म धर्म से प्रेरित होगा, उसका अर्थ लोककल्याण में लगेगा और उसकी कामनाएं मर्यादा तथा सृजनशीलता से जुड़ी होंगी, तब वह स्वाभाविक रूप से मोक्ष की दिशा में अग्रसर होगा। यही सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है।

उल्लेखनीय है कि सनातन दर्शन का एक मूल सिद्धांत यह भी है कि इस दिखाई देने वाले जगत में जो कुछ भी है, वह जड़ और चेतन के रहस्यमय संयोग का परिणाम है। सांख्य दर्शन और श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार प्रकृति निष्क्रिय या शून्य नहीं है। वह तीन मूल शक्तियों के संतुलन और असंतुलन से निरंतर संचालित होती रहती है। इन तीन शक्तियों को सत्त्व, रज और तम, अर्थात त्रिगुण, कहा गया है।

यहाँ ‘गुण’ का अर्थ किसी वस्तु के सामान्य गुण या विशेषता से नहीं है, बल्कि उन मूल प्रवृत्तियों से है, जो जीवात्मा को प्रकृति और संसार से बाँधे रखती हैं। संपूर्ण सृष्टि और मनुष्य का मन इन तीनों गुणों के अलग-अलग अनुपात से निर्मित है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण इन तीनों गुणों का अत्यंत सरल और गहन वर्णन करते हैं। ये हैं— सत्त्व (प्रकाश, ज्ञान और शांति), रज (गति, इच्छा और कर्म) तथा तम (अज्ञान, आलस्य और प्रमाद)।

सत्त्वगुण का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।

अर्थात सत्त्वगुण अत्यंत निर्मल, प्रकाश देने वाला और शांति प्रदान करने वाला है। यह मनुष्य के भीतर ज्ञान, संतोष, करुणा, विवेक और एकाग्रता का विकास करता है। जब मन शांत हो, बुद्धि स्पष्ट हो और सही-गलत का निर्णय सहज रूप से होने लगे, तब समझना चाहिए कि सत्त्वगुण प्रबल है।

रजोगुण के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं—

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।

अर्थात रजोगुण आसक्ति, इच्छा और तृष्णा को उत्पन्न करता है। यही मनुष्य को कर्म, परिश्रम, महत्वाकांक्षा और उपलब्धि की ओर प्रेरित करता है। संसार का अधिकांश निर्माण, व्यापार, उद्योग और आर्थिक उन्नति रजोगुण के कारण ही संभव होती है। लेकिन जब यही रजोगुण नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तब वही लोभ, बेचैनी और अंतहीन दौड़ का कारण बन जाता है।

तमोगुण के बारे में श्रीकृष्ण कहते हैं—

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्।

अर्थात तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और सभी प्राणियों को मोह में डाल देता है। यह आलस्य, प्रमाद, अज्ञान, भ्रम और अत्यधिक निद्रा को बढ़ाता है। तमोगुण चेतना की ऊँची अवस्थाओं को रोककर मनुष्य को जड़ता की ओर ले जाता है।

प्रकृति में ये तीनों गुण कभी अलग-अलग नहीं रहते। वे हमेशा साथ रहते हैं और निरंतर एक-दूसरे पर प्रभाव डालते रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं—

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा।।

अर्थात कभी सत्त्व, रज और तम पर प्रभावी हो जाता है, कभी रज सत्त्व और तम पर, और कभी तम सत्त्व तथा रज पर हावी हो जाता है।

मनुष्य के दैनिक जीवन में भी यह क्रम स्पष्ट दिखाई देता है। प्रातःकाल ध्यान, प्रार्थना और स्वाध्याय के समय मन शांत रहता है, इसलिए सत्त्वगुण प्रमुख होता है। दिन में जब मनुष्य कार्य करता है, तब रजोगुण सक्रिय रहता है। रात में जब शरीर विश्राम की ओर जाता है, तब तमोगुण प्रभावी हो जाता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब गुण अपने उचित समय और स्थान से हट जाते हैं। यदि काम के समय आलस्य आ जाए, तो तमोगुण हावी है। यदि साधना या विश्राम के समय मन अत्यधिक चंचल रहे, तो रजोगुण बढ़ गया है। यही असंतुलन जीवन में अनेक कठिनाइयों का कारण बनता है।

यदि आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस की दृष्टि से देखें, तो त्रिगुण सिद्धांत आज भी अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है। जिसे आज अवसाद, मानसिक जड़ता और निराशा कहा जाता है, वह काफी हद तक तमोगुण की अधिकता का रूप है। इसी प्रकार अत्यधिक तनाव, अनिद्रा, बेचैनी और निरंतर प्रतिस्पर्धा रजोगुण के असंतुलन का परिणाम हैं, जहाँ मनुष्य कर्म के फल से इतना बँध जाता है कि उसे विश्राम नहीं मिल पाता।

आज आधुनिक चिकित्सा भी यह स्वीकार करने लगी है कि मानसिक संतुलन, सजगता (माइंडफुलनेस), करुणा और आंतरिक शांति मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। सनातन दर्शन इन्हीं गुणों को सत्त्वगुण का स्वरूप मानता है।

यद्यपि सनातन दर्शन तम से रज और रज से सत्त्व की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है, फिर भी उसका अंतिम लक्ष्य केवल सत्त्वगुण तक पहुँचना नहीं है। अंतिम लक्ष्य गुणातीत होना है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्त्व भी मनुष्य को सुख और ज्ञान के अहंकार से बाँध सकता है। वास्तविक मुक्ति तब मिलती है, जब मनुष्य इन तीनों गुणों को प्रकृति का स्वाभाविक खेल समझकर स्वयं को उनका साक्षी बना लेता है।

इस प्रकार त्रिगुण सिद्धांत केवल ब्रह्मांड की व्याख्या करने वाला दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि स्वयं को समझने और बदलने का एक व्यावहारिक विज्ञान है। मनुष्य को पहले तमोगुण पर विजय पाकर रजोगुण को जागृत करना चाहिए। फिर उसी रजोगुण को धर्म और लोककल्याण की दिशा देकर सत्त्वगुण में रूपांतरित करना चाहिए। अंततः सत्त्व से भी ऊपर उठकर गुणातीत अवस्था की ओर बढ़ना ही मानव चेतना की सर्वोच्च यात्रा है।

कब मनाया जाएगा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस? जानें कब हुई इसकी शुरुआत और क्‍या है उद्देश्‍य?

कब मनाया जाएगा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस? जानें कब हुई इसकी शुरुआत और क्‍या है उद्देश्‍य?

Why is World Mental Health Day observed, When did it begin and what is its objective

World Mental Health Day 2026: मनुष्य की शारीरिक सेहत की भांति ही उसका मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) भी संपूर्ण जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार है। इसी विचार को ध्येय बनाकर प्रति वर्ष 10 अक्टूबर को अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के नेतृत्व में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने और मानसिक देखभाल को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाता है। कब हुई विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की शुरुआत और क्‍या है इस दिवस को मनाने का उद्देश्‍य? आइए जानते हैं विस्‍तार से…

 

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का इतिहास

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1992 में हुई थी। दरअसल उस समय के संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव यूजीन ब्रॉडी ने दुनियाभर में इस दिवस को मनाए जाने की सलाह दी थी और स्वास्थ्य संघ की पहल पर ही पहली बार इस दिवस को मनाया गया था। तब से ही यह दिवस अब दुनियाभर में मनाया जाने लगा। 

 

इस अंतरराष्‍ट्रीय अभियान का नेतृत्व विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ‘वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ’ (WFMH) द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। यह केवल एक औपचारिक दिन नहीं, बल्कि 100 से अधिक देशों में चलाया जाने वाला एक व्यापक जनजागरूकता अभियान है।

 

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने का उद्देश्‍य

वर्तमान समय में भागदौड़ वाली जिंदगी में तनावरहित जीना बहुत ही मुश्किल हो गया है। हर साल विश्वभर में 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस या मानसिक दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य मेंटल हेल्थ या मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। 

 

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाने का उद्देश्‍य जनसामान्य को यह समझाना कि मन की बीमारियां और तनाव भी शरीर की अन्य बीमारियों की तरह स्वाभाविक हैं। साथ ही इस दिवस के जरिए समाज के हर वर्ग तक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और परामर्श की पहुंच सुनिश्चित करना है।

 

पीड़ित व्यक्तियों को सही समय पर अपनों का संबल और चिकित्सीय सहायता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना। मानसिक रोग से पीड़ित लोगों को प्रायः समाज की उपेक्षा या पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है। यह दिवस इस झिझक और रुढ़िवादिता को तोड़कर खुलकर बात करने का मंच प्रदान करता है।

 

समय पर लक्षणों की पहचान कर डिप्रेशन, एंग्जायटी (चिंता) और अत्यधिक तनाव जैसी समस्याओं को गंभीर रूप लेने से रोका जा सकता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि यदि हम स्वयं या हमारे आसपास कोई व्यक्ति मानसिक दबाव से गुजर रहा है, तो सहायता मांगना कमजोरी नहीं बल्कि बुद्धिमत्ता और साहस का लक्षण है।

 

मानसिक बीमारियों से बचाव के लिए क्या करें?

व्यस्तता भरे दिनचर्या से खुद के लिए समय निकालें।

पोषक तत्व वाले भोजन को जीवन का हिस्सा बनाएं।

प्रोफेशनल डॉक्टर का सहारा लें।

नकारात्मक लोगों से दूरी रखें।

तनाव को नियंत्रित करें।

मेडिटेशन को अपनाएं।

योग का सहारा लें।

हमेशा खुश रहें।

अकेले न रहें।

दिल्ली के पॉल्यूशन से लड़ने की नई पहल! मिरांडा हाउस में बना कार्बन गार्डन, जानिए कैसे काम करेगा यह ग्रीन मॉडल

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण और तापमान के बीच, हरियाली बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। इसी दिशा में, दिल्ली यूनिवर्सिटी के मिरांडा हाउस कॉलेज ने अपने कैंपस में एक ‘कार्बन गार्डन’ बनाया है। कॉलेज का कहना है कि कार्बन सोखने की क्षमता बढ़ाने और जैव-विविधता को बढ़ावा देने के साथ-साथ, यह गार्डन छात्रों को पर्यावरण से जुड़े मुद्दों की व्यावहारिक समझ हासिल करने में भी मदद करेगा।

50 अलग-अलग प्रजातियों के पौधे लगाए गए

मिरांडा हाउस के इस कार्बन गार्डन में लगभग 50 अलग-अलग तरह के पौधे लगाए गए हैं। इनमें अलग-अलग तरह के जीवन वाले पौधे शामिल हैं, जैसे कि हाइड्रोफाइट्स (पानी में उगने वाले), जेरोफाइट्स (सूखी जगह पर उगने वाले) और मेसोफाइट्स (सामान्य नमी वाली जगह पर उगने वाले)। अमरूद और सहजन जैसी देसी प्रजातियों को भी इस गार्डन में शामिल किया गया है। कॉलेज के अनुसार, इतने तरह के पौधे लगाने का मकसद सिर्फ हरियाली बढ़ाना नहीं है, बल्कि एक छोटा इकोसिस्टम बनाना है जहां छात्र पौधों, बायोडायवर्सिटी और पर्यावरण के आपसी संबंधों को बेहतर ढंग से समझ सकें।

छात्रों के लिए बनेगा लिविंग लैब

मिरांडा हाउस का यह कार्बन गार्डन छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला (living laboratory) के तौर पर काम करेगा। यहां छात्र कार्बन सोखने की प्रक्रिया (carbon sequestration), पौधों की विविधता, इकोसिस्टम और पर्यावरण के अनुकूल तौर-तरीकों जैसे विषयों की व्यावहारिक समझ हासिल कर सकेंगे।

कॉलेज का कहना है कि इस पहल से छात्रों को क्लासरूम से बाहर, प्रकृति के बीच सीखने और रिसर्च करने का मौका मिलेगा। साथ ही, इससे पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

प्रो. दीनबंधु साहू ने किया उद्घाटन

कार्बन गार्डन का उद्घाटन दिल्ली यूनिवर्सिटी के बॉटनी डिपार्टमेंट के हेड और रिसर्च, इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप काउंसिल के चेयरपर्सन प्रोफेसर दीनबंधु साहू ने किया। प्रोफेसर साहू भारत के पहले कार्बन गार्डन के संस्थापक भी हैं। प्रोफेसर साहू ने कहा कि प्रकृति से जुड़ाव लंबे समय से भारतीय संस्कृति और परंपराओं का अहम हिस्सा रहा है। उन्होंने आधुनिक विज्ञान और पर्यावरण की समझ को जोड़कर इस जुड़ाव को और आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया। दिल्ली जैसे शहरों में ग्रीन स्पेस की अहम भूमिका पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने पर्यावरण संरक्षण में युवाओं की भागीदारी के महत्व पर भी जोर दिया।

मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है गार्डन

कार्बन गार्डन के फायदे सिर्फ पर्यावरण तक ही सीमित नहीं माने जाते हैं। प्रोफेसर साहू के अनुसार, ऐसी हरी-भरी जगहें छात्रों को प्रकृति के करीब ला सकती हैं और साथ ही उनके मानसिक स्वास्थ्य और समग्र कल्याण में भी योगदान दे सकती हैं। मिरांडा हाउस की प्रिंसिपल प्रोफेसर बिजयालक्ष्मी नंदा ने कहा कि कॉलेज अपनी पर्यावरणीय जिम्मेदारी को गंभीरता से लेता है। उनका मानना है कि यह पहल छात्रों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में सक्रिय रूप से काम करने के लिए प्रेरित कर सकती है।

दिल्ली से शुभांगी तिवारी की रिपोर्ट

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अमेरिकी सैनिक को गोली मारकर मौत की सजा दी जाएगी:65 साल में पहला ऐसा मामला; धार्मिक नारा लगाकर 13 लोगों को मार दिया था

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पूर्व अमेरिकी सैनिक निदाल हसन को गोली मारकर मौत की सजा देने का आदेश दिया है। पेंटागन ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। अगर हसन की सजा लागू होती है तो वह 1961 के बाद अमेरिकी सैन्य न्याय व्यवस्था के तहत मौत की सजा पाने वाला पहला व्यक्ति होगा। सैन्य व्यवस्था में आखिरी बार प्राइवेट जॉन ए. बेनेट को मौत की सजा दी गई थी। हसन ने 2009 में टेक्सास के सैन्य अड्डे पर धार्मिक नारा लगाते हुए गोलीबारी की थी, जिसमें 13 लोगों की मौत हो गई थी। हमले के बाद माना- जिहाद के लिए किया 5 नवंबर 2009 को सेना के मनोचिकित्सक मेजर निदाल हसन निजी पिस्तौल लेकर फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पहुंचा और सैनिकों व अन्य लोगों पर अचानक गोलीबारी कर दी। यह अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुई सबसे घातक सामूहिक गोलीबारी थी। उस समय अमेरिका अफगानिस्तान और इराक में युद्ध लड़ रहा था। हसन ने बाद में कहा कि वह इन युद्धों को गैरकानूनी और अनैतिक मानता था और जिहाद के लिए हमला किया था। गोलीबारी में हसन भी घायल हुआ और कमर के नीचे से लकवाग्रस्त हो गया। सैन्य अदालत में उसने हत्याओं की बात स्वीकार की। 2013 में उसे पहले से हत्या की योजना बनाने और हत्या की कोशिश के कुल 45 मामलों में दोषी ठहराया गया। हसन ने हमले पर कोई पछतावा नहीं जताया। सैन्य मानसिक स्वास्थ्य पैनल के सामने उसने कहा कि वह चाहता था कि हमले में उसकी भी मौत हो जाती, ताकि वह शहीद बन सके। उसका यह तक कहा कि मौत की सजा मिलने पर भी वह खुद को शहीद मानेगा। हमले से पहले कट्टर हुए थे धार्मिक विचार मेजर हसन का जन्म वर्जीनिया के अर्लिंगटन में फिलिस्तीनी मूल के मुस्लिम माता-पिता के घर हुआ था। उसने वर्जीनिया टेक में पढ़ाई की और 1997 में सैन्य मेडिकल स्कूल की ट्रेनिंग शुरू की। हमले से पहले के कुछ सालों में इस्लाम को लेकर उसके विचार कट्टर होते गए थे। पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने अपने बयान में हसन के जिहादी मकसद का जिक्र करते हुए उसे आतंकवादी बताया। हालांकि, हसन पर आतंकवाद से जुड़ी धाराओं में मुकदमा नहीं चलाया गया था। राष्ट्रपति बुश ने भी सैन्य कैदी की मौत की सजा मंजूर की थी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने 2008 में प्राइवेट रोनाल्ड ए. ग्रे की मौत की सजा मंजूर की थी। ग्रे को 1980 के दशक में बलात्कार और हत्याओं की एक सीरीज में दोषी ठहराया गया था। लेकिन एक जज ने उसकी मौत की सजा पर रोक लगा दी थी। जज ने कहा था कि ग्रे को संघीय अदालत में अपील करने के लिए और समय मिलना चाहिए। 2026 तक ग्रे सैन्य डेथ रो में ही है। अमेरिकी सैन्य डेथ रो में फिलहाल चार कैदी मौत की सजा का इंतजार कर रहे हैं। सैन्य व्यवस्था में किसी कैदी को तब तक मौत की सजा नहीं दी जा सकती, जब तक राष्ट्रपति खुद उस सजा की पुष्टि न करें। हसन के मामले में ट्रम्प की मंजूरी के बाद अब सेना के सचिव को सजा की तारीख और जगह तय करनी है। इसके बाद भी कानूनी अपील के कारण सजा पर रोक लग सकती है। गोली मारकर अब तक सिर्फ 6 को मौत की सजा अमेरिका में मौत की सजा देने का सबसे आम तरीका इंजेक्शन है। 1976 में मौत की सजा दोबारा शुरू होने के बाद से अब तक 1488 लोगों को इंजेक्शन के जरिए मौत दी जा चुकी है। इसके मुकाबले गोली मारकर सिर्फ 6 लोगों को मौत की सजा दी गई है। यानी यह तरीका अमेरिका में बेहद रेयर है। ———————- यह खबर भी पढ़ें… अमेरिकी उपराष्ट्रपति बोले- हमलावर पायलट मुसीबत था: मालूम होने पर भी प्लेन क्यों उड़ाने दिया; ओमान बोला- किसी देश ने हमामी की जानकारी नहीं मांगी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने सोमवार को कहा कि फ्लाईदुबई का को-पायलट हमाम अल-हमामी पहले से मुसीबत था। इसके बावजूद उसे पैसेंजर विमान उड़ाने की अनुमति कैसे मिली, यह सवाल उठता है। पूरी खबर पढ़ें…

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?

shri shri ravishankar

– – गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना किसी कारण के नहीं रोता। वह तभी रोता है जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हिंसक है तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यदि किसी में करुणा का अभाव है तो उसके पीछे भी कोई कारण छिपा होता है। और यदि हम वास्तव में उसकी जड़ तक जाएँ, तो हमें वहाँ अकेलापन, भय, अस्वीकृति की भावना और अपनेपन का अभाव ही देखने को मिलेगा।

 

जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से बीमार होता है तो हम उसे अस्पताल भेजते हैं; वहीं जब उसके व्यवहार में विकृति आ जाती है तो हम उसे जेल भेज देते हैं। लेकिन जेल भेजने के बाद भी हम उसे ऐसे साधन और तकनीकें उपलब्ध नहीं कराते, जिनसे वह अपने व्यवहार में सुधार ला सके और अपनी भावनाओं को समझकर उन्हें बदल सके।

 

आज दुनिया में होने वाली आधी से अधिक हिंसा के पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ हैं। मानसिक स्वास्थ्य आज पूरे विश्व के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। चाहे देश विकासशील हो या विकसित, क्षेत्र युद्धग्रस्त हो या शांतिपूर्ण समाज—यह संकट हम सभी को प्रभावित करता है। यह अत्यंत चिंताजनक विषय है कि विश्व में हर 42 सेकंड में एक व्यक्ति अपना जीवन समाप्त कर रहा है। असंख्य युवा या तो आक्रामक और हिंसक होते जा रहे हैं या फिर अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। भारत अपनी समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा के माध्यम से इस वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने में दुनिया का मार्गदर्शन कर रहा है।

 

सामान्यतः न तो घर पर और न ही विद्यालय में हमें अपनी भावनाओं को संभालना सिखाया जाता है। कभी-कभी अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है; पर्याप्त धन, परिवार और मित्र होने पर भी व्यक्ति भीतर से उदास या अकेला अनुभव कर सकता है। आज मानसिक स्वास्थ्य के एक बड़े संकट के रूप में उभर रहा यह अकेलापन इसलिए है, क्योंकि हमने स्वयं के साथ समय बिताना और अपने भीतर शांत रहना सीखा ही नहीं है। यदि हम यह कला सीख लें, तो हमारे भीतर का आनंद हमारे आसपास के प्रत्येक व्यक्ति तक स्वतः पहुँचने लगेगा।

 

यहाँ हमारी ‘श्वास’ (साँस) एक स्वस्थ मन की कुंजी बनती है। एक स्वस्थ मन के लक्षण क्या हैं? आपके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जिसे कोई आपसे छीन न सके, और अपने भीतर एक ऐसा आत्मविश्वास कि आप किसी भी चुनौती का निर्भीकता से सामना कर सकें। स्वस्थ मन वह है जो रचनात्मक आलोचना को स्वीकार कर सके और स्वयं भी स्वस्थ व सकारात्मक आलोचना करने का साहस रखे। यह निर्भय होने के साथ-साथ विनम्र बने रहने की अद्भुत क्षमता है।

 

प्रत्येक भावना शरीर के किसी न किसी विशेष हिस्से में विशिष्ट संवेदनाएँ उत्पन्न करती है, और इसका सीधा संबंध हमारी श्वास से होता है। जब हम उदास होते हैं तब हमारी श्वास की गति व ढंग अलग होता है, और जब हम प्रसन्न होते हैं तब वह भिन्न होता है।

 


जब आप क्रोधित, निराश या ईर्ष्यालु होते हैं, तो प्रायः यह समझ नहीं आता कि उन नकारात्मक भावनाओं का क्या करें, और हम उन्हें अपने भीतर ही दबाकर रखते हैं। लेकिन आपकी श्वास मानो आपसे कह रही होती है— “मैं दिन-रात तुम्हारे भीतर प्रवाहित होती रहती हूँ। यदि तुम मुझ पर थोड़ा-सा ध्यान दे दो, तो मैं तुम्हें प्रसन्न रखूँगी, तुम्हारी आत्मा को ऊर्जावान व प्रफुल्लित रखूँगी और तुम्हारी जीवन-ऊर्जा को जीवंत बनाए रखूँगी।”

 

आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने सरल श्वास तकनीकों और ध्यान (Meditation) को अपनाया है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया है। उदाहरण के लिए, ‘सुदर्शन क्रिया’ ने अनेक लोगों को निराशा और चिंता से उबरने में सहायता की है। ये तकनीकें हमें अपने मन का स्वामी बनना सिखाती हैं, न कि अपने ही मन का शिकार बने रहना।

अमेरिकी-युद्धपोत लिंकन के 8 नौसैनिकों ने आत्महत्या की कोशिश की:एक समुद्र में कूदा; ईरान के खिलाफ 300 से ज्यादा दिन तैनात था

अमेरिकी युद्धपोत USS अब्राहम लिंकन के स्ट्राइक ग्रुप में शामिल 8 नौसैनिकों ने आत्महत्या की कोशिश की। इनमें एक नौसैनिक जहाज से समुद्र में कूद गया था, उसे नौसेना के रेस्क्यू हेलिकॉप्टर ने बचाया। एक दूसरे सैनिक ने भी समुद्र में कूदने की कोशिश की थी लेकिन उसके साथियों ने उसे कूदने से पहले रोक लिया। ये घटनाएं तब हुईं, जब USS लिंकन 300 दिन से ज्यादा समय से समुद्र में तैनात था और ईरान के खिलाफ अमेरिकी मिशन में शामिल था। अमेरिकी नौसेना के कार्यवाहक सचिव हंग काओ ने सीनेटर कर्स्टन गिलिब्रैंड को भेजे पत्र में इसकी जानकारी दी। लिंकन पर करीब 5,000 नौसैनिक तैनात USS अब्राहम लिंकन पर करीब 5,000 नौसैनिक तैनात हैं। यह जहाज 300 दिन से ज्यादा समय तक समुद्र में रहा। हाल ही में इसने बिना किसी बंदरगाह पर रुके सबसे लंबे समय तक समुद्र में रहने का अमेरिकी नौसेना का रिकॉर्ड बनाया। इस महीने की शुरुआत में USS अब्राहम लिंकन 5 दिन के लिए थाईलैंड के पटाया में रुका था। इसके बाद शनिवार को यह गुआम पहुंचा। सैनिकों की हालत पर जानकारी मांगी गई थी डेमोक्रेट सीनेटर कर्स्टन गिलिब्रैंड ने जहाज पर तैनात सैनिकों की स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर नौसेना से जानकारी मांगी थी। इसके जवाब में नौसेना ने उन्हें यह पत्र भेजा। गिलिब्रैंड ने कहा कि इन घटनाओं से पता चलता है कि USS लिंकन पर तैनात सैनिकों के हालात गंभीर थे। बढ़ते समय के साथ हालात और खराब हो रहे थे। लंबे समय तक समुद्र में रहना आसान नहीं अमेरिकी नौसेना के एडमिरल ब्रैड कूपर ने अगस्त में कहा था कि USS लिंकन पर मानसिक तनाव या मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों की संख्या नौसेना के दूसरे विमानवाहक पोतों की तुलना में कम थी। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि इसका मतलब यह नहीं है कि जहाज पर सब कुछ ठीक था। उनके मुताबिक, महीनों तक समुद्र में रहना आसान नहीं होता। इससे तनाव बढ़ता है और हर व्यक्ति उससे अलग तरीके से निपटता है। ट्रम्प बोले थे- तैनाती ज्यादा लंबी नहीं हुई पिछले महीने राष्ट्रपति ट्रम्प से USS लिंकन के सैनिकों की मानसिक स्थिति और लंबी तैनाती को लेकर सवाल पूछा गया था। जवाब में उन्होंने कहा था, ‘नहीं, ज्यादा लंबी नहीं हुई है।’ रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी जहाज पर खराब हालात की खबरों को खारिज करते हुए कहा था कि स्थिति को गलत तरीके से पेश किया गया है। सीनेटर गिलिब्रैंड ने ट्रम्प और हेगसेथ पर सैनिकों की चिंताओं को गंभीरता से नहीं लेने का आरोप लगाया। पूर्व नौसेना अधिकारी बोले- 8 मामले चिंता की बात अमेरिकी नौसेना के पूर्व शीर्ष कानूनी अधिकारी रियर एडमिरल डोनाल्ड जे. ग्यूटर ने 8 आत्महत्या की कोशिशों को ‘बेहद चिंताजनक’ बताया। उनके मुताबिक, इतने मामले सैनिकों के बीच गंभीर तनाव का संकेत देते हैं। ——————————- यह खबर भी पढ़ें… 5000 अमेरिकी सैनिक थाईलैंड पहुंचे, 5 दिन छुट्टियां मनाएंगे: देह व्यापार वाले इलाकों में जाने पर रोक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन थाईलैंड के लाम चाबांग पोर्ट पर पहुंचा। इस एयरक्राफ्ट पर पिछले 9 महीनों से 5 हजार सैनिक तैनात हैं। पूरी खबर यहां पढ़ें…

गाणपत्य मीमांसा और आधुनिक जीवनशैली

मुद्गल पुराण में गणेश के आठ अवतारों का वर्णन मिलता है, जो किसी असुर को मारने के लिए नहीं, बल्कि मानव मन के भीतर छिपे आठ मानसिक विकारों का शमन करने के लिए अवतरित हुए थे। वक्रतुण्ड, मत्सरासुर अर्थात मत्सर, ईर्ष्या के शमन हेतु अवतरित हुए थे, यह सोशल मीडिया पर दूसरों की प्रगति देखकर होने वाली हीनभावना के समान है।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का महापर्व केवल एक धार्मिक कर्मकांड या उत्सव नहीं है, यह मानव चेतना को विक्षेप से विवेकानंद की ओर ले जाने वाली एक अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक उपचार पद्धति है। महा गणपति का संपूर्ण विग्रह, उनके सम्मुख की जाने वाली साधना और उनसे जुड़े शास्त्र वचन मूलतः स्थिर प्रज्ञा और मानसिक स्वास्थ्य के वे कालजयी सूत्र हैं, जिनकी आज की खंडित जीवनशैली को सबसे अधिक आवश्यकता है। मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारी चित्त की वृत्तियों से है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के प्रारंभ में ही योग की परिभाषा देते हुए स्पष्ट किया है-

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

-पातंजल योगसूत्र, समाधिपाद, सूत्र 2

चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है, और इन वृत्तियों के नियमन के जो अधिष्ठाता देव हैं, वही गणपति हैं। उपनिषदों की दृष्टि में गणेश कोई बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर अवस्थित मूलाधार चक्र की नियामक ऊर्जा हैं। गणेश अथर्वशीर्ष, जो माण्डूक्य उपनिषद के अंतर्गत आता है, में ऋषि इस सत्य को निर्विवाद रूप से स्थापित करते हैं-

त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः।

त्वाम्योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्।।

-गणेशअथर्वशीर्ष, मंत्र 6

मनोविज्ञान की दृष्टि से मूलाधार चक्र मानव चेतना का वह आधारभूत केंद्र है, जो व्यक्ति को मानसिक सुरक्षा, जीवन के प्रति विश्वास और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। जब किसी व्यक्ति का मूलाधार चक्र विक्षुब्ध होता है, तभी उसके भीतर भय, असुरक्षा की भावना और अनिश्चितता का जन्म होता है, जो आगे चलकर गंभीर अवसाद का रूप ले लेता है। गणपति का नित्य मूलाधार में स्थित होना यह सिद्ध करता है कि वे मानव मस्तिष्क और स्नायु तंत्र को स्थिरता प्रदान करने वाले आदि तत्व हैं। जो साधक गणेश तत्व का अनुसंधान करता है, उसका चित्त स्वतः ही बाह्य झंझावातों से अप्रभावित रहकर तटस्थ हो जाता है।

प्राचीन ग्रन्थों में अंकित गजास्य विग्रह अर्थात शारीरिक प्रतीकों का समीचीन अध्ययन से वहां आधुनिक जीवन प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्निहित सूत्र प्रदीप्त हो उठते हैं। गणेश का मस्तक हाथी का है और धड़ मनुष्य का है, जो यह दर्शाता है कि श्रेष्ठ मानसिक स्वास्थ्य के लिए बौद्धिक विशालता और जैव संतुलन अनिवार्य हैं। आधुनिक युग की सबसे बड़ी मानसिक समस्या यह है कि लोग सुनना नहीं चाहते, हर व्यक्ति केवल अपनी बात थोपना चाहता है। इसके विपरीत, गणेश के सूप जैसे विशाल कान उत्कृष्ट श्रवण क्षमता के प्रतीक हैं। सनातन मनीषा कहती है कि ज्ञान और मानसिक शांति का प्रारंभ श्रवण से होता है। उपनिषदों में ऋषि प्रार्थना करते हैं-

भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।

अर्थात- हे देवों! हम कानों से सदा भद्र अर्थात कल्याणकारी वचन ही सुनें।

जो व्यक्ति दूसरों को धैर्यपूर्वक सुनता है, उसका आधा मानसिक तनाव स्वतः ही समाप्त हो जाता है क्योंकि वह प्रतिक्रिया देने में जल्दबाजी नहीं करता। हाथी की आंखें अत्यंत छोटी होती हैं, किंतु उनकी दृष्टि अत्यंत दूरगामी और एकाग्र होती है। यह प्रतीक आधुनिक मनुष्य को सूक्ष्म विश्लेषण की सीख देता है। आज सोशल मीडिया के स्क्रॉलिंग कल्चर ने हमारी एकाग्रता की अवधि को न्यूनतम कर दिया है। गणेश जी की आंखें हमें सिखाती हैं कि बाह्य चकाचौंध से हटकर भीतर की ओर देखना और किसी भी परिस्थिति का सतही नहीं, बल्कि गहरा और एकाग्र अवलोकन करना ही मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है।

गणेश की वक्रतुण्ड अर्थात लम्बी और लचीली सूंड अत्यंत संवेदनशील और शक्तिशाली होती है। वह इतनी सूक्ष्म है कि जमीन पर गिरे छोटे से सिक्के को भी उठा सकती है और इतनी बलशाली है कि विशाल वृक्ष को भी उखाड़ सकती है। मानसिक स्वास्थ्य की भाषा में इसे भावनात्मक लचीलापन कहा जाता है। आधुनिक जीवनशैली में जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाता, वह मानसिक रूप से टूट जाता है। गणेश की सूंड हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में कब कोमल होना है और संकट के समय कब सुदृढ़ और कठोर हो जाना है।

लम्बोदर अर्थात विशाल पेट इस बात का दार्शनिक संकेत है कि संसार में मिलने वाली प्रशंसा और आलोचना, सुख और दुःख, सूचना और अपवाह, इन सबको पचाने की क्षमता मनुष्य के भीतर होनी चाहिए। आज के दौर में लोग छोटी सी आलोचना या असफलता को पचा नहीं पाते और आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। लम्बोदर का संदेश है- जीवन के हर कड़वे और मीठे सच को अपने भीतर समाहित करो, विचलित मत हो।

मनुष्य के जीवन में आने वाले संकट, असफलताएं और मानसिक तनाव ही वस्तुतः विघ्न हैं। सनातन मनीषा ने इन विघ्नों को केवल बाह्य बाधाएं नहीं माना, बल्कि उन्हें आंतरिक अशुद्धियों का प्रकटीकरण स्वीकार किया है। मुद्गल पुराण में गणेश के आठ अवतारों का वर्णन मिलता है, जो किसी असुर को मारने के लिए नहीं, बल्कि मानव मन के भीतर छिपे आठ मानसिक विकारों का शमन करने के लिए अवतरित हुए थे।

वक्रतुण्ड, मत्सरासुर अर्थात मत्सर, ईर्ष्या के शमन हेतु अवतरित हुए थे, यह सोशल मीडिया पर दूसरों की प्रगति देखकर होने वाली हीनभावना के समान है।

एकदन्त, मदासुर, मद, अहंकार के मर्दन के लिए अवतरित हुए थे, अपनी उपलब्धियों या पद-प्रतिष्ठा का अतिअभिमान जो पतन का कारण बनता है।

महोदर, मोहासुर अर्थात मोह,आसक्ति के मर्दन हेतु अवतरित हुए थे, जो किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से अत्यधिक चिपकाव जो अवसाद लाता है।

गजानन, लोभासुर (लोभ, लालच) के शमन के लिए अवतरित हुए थे, जो अंतहीन भौतिक इच्छाएं और उपभोक्तावादी अंधी दौड़ है।

लम्बोदर, क्रोधासुर (क्रोध, गुस्सा) के दमन के लिए अवतरित हुए थे, यह है- आवेश में आकर विवेक खो देना और रिश्तों को नष्ट करना।

विकट का अवतरण कामासुर (काम, वासना) के दमन के लिए हुआ था, जो वासनाओं की अनियंत्रित ललक जो मानसिक एकाग्रता को भंग करती है।

विघ्नराज का अवतरण ममतसुर (ममता, मेरा-तेरा का भाव) के शसन के लिए हुआ था, जैसे- संकीर्ण दायरों में जीना और व्यापक समाज से कट जाना।

धूम्रवर्ण का अवतार अभिमानासुर (अभिमान, गर्व) आत्म मुग्धता के नाश के लिए हुआ था, जो व्यक्ति को सत्य से दूर ले जाती है।

गणेश चतुर्थी के अवसर पर विघ्नहर्ता की आराधना करते समय वास्तव में हम अपने भीतर के इन आठ असुरों को पहचानने और उनके शमन का संकल्प लेते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को मानसिक व्याधियों से मुक्ति का जो मार्ग बताते हैं, वही मार्ग साक्षात गणपति का स्वरूप है-

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।

सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।

-श्रीमद्भगवद्गीता 2/62-63

विषयों का निरंतर ध्यान करने से आसक्ति, काम, क्रोध और अंततः बुद्धि का नाश होता है। गणेश बुद्धि विधाता हैं, अर्थात वे बुद्धिनाश के इस चक्र को तोड़कर मनुष्य को व्यवसायात्मिका बुद्धि (निर्णयात्मक और स्थिर बुद्धि) प्रदान करते हैं।

ऋग्वेद का यह मंत्र चित्त की शुचिता और कल्याणकारी विचारों के आमंत्रण का उद्घोष करता है-

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।

-ऋग्वेद 1/89/1

अर्थात- हमारे पास चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आएं जो किसी से दबे न हों और जो उन्नति करने वाले हों। जब मनुष्य डिजिटल स्क्रीन की आभासी दुनिया से कटकर सामूहिक उत्सव, कीर्तन और ध्यान में लीन होता है, तो उसके मस्तिष्क को वह आवश्यक विश्राम मिलता है जिसकी खोज में वह मनोचिकित्सकों के चक्कर काटता रहता है। उत्सव का उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि मन का रंजन (परिशोधन) होना चाहिए।

गणेश का वाहन मूषक (चूहा) है। एक अत्यंत विशालकाय और बुद्धि के अधिष्ठाता देव का एक तुच्छ और छोटे से जीव को अपना वाहन चुनना, आधुनिक स्टेटस सिंबल और अहंकारवादी जीवनशैली पर सबसे करारा प्रहार है। आज के मनुष्य का मानसिक तनाव इस बात से तय होता है कि उसके पास कौन सी गाड़ी है, उसका मकान कितना बड़ा है और उसका समाज में क्या रूतबा है। वह अपनी पहचान बाह्य वस्तुओं से जोड़ लेता है, और यही उसकी मानसिक गुलामी की शुरुआत है। गणेश का मूषक वाहन सिखाता है कि विनम्रता ही मानसिक स्वास्थ्य का परम रक्षक है। जिसके भीतर अहंकार नहीं है, जो सबसे छोटे और उपेक्षित जीव को भी सम्मान देना जानता है, उसका मानसिक संतुलन कभी डगमगा नहीं सकता।

चूहा मूलतः मानव मन की चंचलता और इच्छाओं के कुतरने के स्वभाव का भी प्रतीक है। यदि मन की इस चंचलता को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो यह जीवन के सारे सुख, चैन को कुतर डालती है। गणेश (विवेक) का उस पर बैठना यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति के भीतर विवेक जाग्रत होता है, तो मन की चंचलता स्वतः ही उसके नियंत्रण में आ जाती है और वह उसका सही दिशा में उपयोग करना सीख जाता है।

गणेश चतुर्थी केवल बप्पा की मूर्ति लाकर नाच-गाकर विसर्जित कर देने का नाम मात्र नहीं है। यह अपने भीतर विघ्नहर्ता विवेक को स्थापित करने का महापर्व है। इस उत्सव पर समूचे वैश्विक समाज को अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए गणेश से सम्बंधित सूत्रों को जीवन में उतारना होगा। इसके लिए प्रतिदिन कम से कम कुछ समय अपनों को, परिवार को और मित्रों को बिना किसी पूर्वाग्रह के धैर्यपूर्वक सुनने के लिए समर्पित करें। प्रतिदिन कुछ क्षण शांत बैठकर गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ या ओंकार का ध्यान करें, ताकि सूचनाओं के बोझ से दबे मस्तिष्क को शांति मिल सके। मूर्ति विसर्जन के साथ-साथ अपने भीतर के कम से कम एक विकार अर्थात क्रोध, ईर्ष्या या सोशल मीडिया की लत को सदा के लिए विसर्जित करने का दृढ़ संकल्प लें।

समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और विनम्रता का भाव रखें, क्योंकि महा गणपति वहीं वास करते हैं। जब मनुष्य का मानस स्वस्थ होगा, तभी एक स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होगा। आइए, इस गणेश चतुर्थी पर हम अपनी बुद्धि और चित्त को महा गणपति के चरणों में अर्पित करते हुए प्रार्थना करें-सच्चिदानन्दरूपाय परब्रह्मणे नमः, सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलोगजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।।

त्योहारों में घर नहीं जा पा रहे तो करें ये 5 काम! दिल के साथ दिमाग भी रहेगा फ्रेश

त्योहार आते ही घरों में रौनक बढ़ जाती है, लेकिन हर किसी के लिए ये दिन एक जैसे खुशियों भरे नहीं होते। फैमिली से दूर रहना, दोस्तों का अपने काम में बिजी होना या अकेले त्योहार मनाना कई बार मन को भारी कर देता है। खासकर मेट्रो शहरों में रहने वाले लोगों को इस दौरान अपने घर, परिवार और पुराने दोस्तों की याद ज्यादा आ सकती है। सोशल मीडिया पर दूसरों को परिवार के साथ त्योहार मनाते देखकर भी अकेलापन और बढ़ सकता है। ऐसे में अपनी जिंदगी की तुलना दूसरों से करने के बजाय खुद के लिए कुछ अच्छा करना खुद को को बेहतर महसूस करा सकता है। कुछ छोटे-छोटे बदलाव इस दौरान मूड को हल्का रखने और त्योहारों के समय अकेलेपन से निपटने में मदद कर सकते हैं।

मेट्रो सिटी में अकेलेपन से निपटने के आसान तरीके

खुद को समय दें

त्योहारों पर जब भी आपको लगे कि आप अकेले है तो मेडिटेशन, योग, डायरी लिखने या अपनी पसंद का काम करने में मन लगाएं। अकेलेपन के बारे में बार-बार सोचने के बजाय इस समय को खुद को समझने और अपनी पसंद की छोटी-छोटी चीजें करने में बिताएं। इससे मन को सुकून मिलेगा और दिन भी बेहतर महसूस होगा।

अपने लिए कुछ हटके करें

घर से दूर हैं तो भी त्योहार को अपने तरीके से मना सकते हैं। अपनी पसंद का खाना बनाएं, घर को सजाएं, नए कपड़े पहनें या कोई ऐसी चीज करें जो आपको खुशी देती हो। हर साल इसी तरह कोई छोटा सा काम करने से आपकी अपनी त्योहार की परंपरा बन सकती है और अकेले होने पर भी त्योहार खास लगेगा।

लोगों के साथ जुड़ें

अकेले घर में रहने के बजाय अपने आसपास होने वाले त्योहार के कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं। सोसाइटी, मंदिर या स्थानीय जगहों पर होने वाले इवेंट्स में जाने से नए लोगों से मिलने और उनके साथ समय बिताने का मौका मिलेगा। इससे त्योहार में अकेलापन कम महसूस हो सकता है।

अपनों से बात करें

घर नहीं जा पा रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि परिवार और दोस्तों से दूर रहना जरूरी है। वीडियो कॉल करें, फोन पर बात करें या उन्हें त्योहार की शुभकामनाएं भेजें। पुराने किस्से और यादें शेयर करने से आपको अपने लोगों के पास होने जैसा महसूस हो सकता है।

किसी की मदद करें

त्योहारों के दौरान किसी जरूरतमंद की मदद करना भी मन को अच्छा महसूस करा सकता है। किसी संस्था के साथ जुड़कर खाना बांटने, लोगों की मदद करने या किसी दूसरे काम में अपना समय दे सकते हैं। इससे आपको नए लोगों से मिलने का मौका मिलेगा और त्योहार दूसरों के साथ खुशियां बांटते हुए बिताने का एक्सपीरियंस भी मिलेगा।

त्योहारों में घर से दूर रहना और अकेलापन महसूस करना आसान नहीं होता, यदि आप भी शहर से दूर रहकर त्योहार मना रहे हैं, तो खुद को खुश रखने के लिए इन छोटी-छोटी बातों को अपनाएं और इस समय को अपने लिए बेहतर बनाएं। इस दौरान खुद को खुश रखने के छोटे-छोटे तरीके अपनाए जा सकते हैं। दूसरों से जुड़े रहें, खुद को समय दें और त्योहार को अपने तरीके से मनाने की कोशिश करें। इससे ये दिन थोड़े हल्के और बेहतर महसूस हो सकते हैं।