थिएटर में नंगे पैर ‘हनुमान अंश’ देखते नजर आया मुस्लिम शख्स, सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम व्यक्ति का वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह सिनेमा हॉल में ‘हनुमान अंश’ फिल्म देख रहा है। कई लोगों का ध्यान इस बात पर गया कि फिल्म देखते समय वह बिना जूते-चप्पल के बैठा है। नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर भी खूब पसंद की जा रही है।

वीडियो में वह व्यक्ति सफेद कुर्ता-पायजामा और सफेद टोपी पहने हुए बिना जूते-चप्पल के थिएटर में बैठा दिखाई दे रहा है। वह फिल्म देखने में पूरी तरह मग्न है और उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि कोई उसका वीडियो बना रहा है।

वीडियो ऑनलाइन पोस्ट होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने इस पर प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी। एक यूज़र ने लिखा, “बिना राजनीति वाला भारत।” दूसरे ने लिखा, “वे दशकों से चल रहे राजनीतिक ध्रुवीकरण से उसके मन को दूषित करने में नाकाम रहे।”

नीम करोली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ को लेकर हो रही चर्चाओं के बीच यह वायरल क्लिप लोगों का ध्यान खींच रही है। हाल ही में मिराज सिनेमा ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि उन्होंने नीम करोली बाबा के लिए सीट नंबर 9 आरक्षित करने का फैसला किया है, क्योंकि उनका मानना ​​है कि बाबा अपने भक्तों के साथ फिल्म देखेंगे।

नंगे पैर फिल्म देखने आए एक व्यक्ति का वीडियो और उस पर ऑनलाइन मिली प्रतिक्रियाओं ने ‘हनुमान अंश’ फिल्म के बारे में चर्चा को और बढ़ा दिया है, क्योंकि यह फिल्म सिनेमाघरों में लगातार लोगों का ध्यान खींच रही है।

नीम करौली बाबा, जिनका जन्म 1900 के आसपास उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में लक्ष्मण नारायण शर्मा के रूप में हुआ था। वे हनुमान के परम भक्त थे। 1960 और 1970 के दशक में कैंची धाम और वृंदावन में अपने आश्रमों के माध्यम से उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उनकी शिक्षाओं ने पश्चिमी देशों के कई साधकों को आकर्षित किया, जिनमें हार्वर्ड के मनोवैज्ञानिक रिचर्ड अल्परट (राम दास) और आध्यात्मिक साधक भगवान दास प्रमुख थे।

उनकी शिक्षाओं में निस्वार्थ सेवा और भक्ति पर जोर दिया गया था, जिसे संक्षेप में “सब से प्रेम करो, सबकी सेवा करो, सबको भोजन कराओ” कहा जाता है। हालांकि उनके अनुयायियों द्वारा बताई गई बातों में उनके जीवन से जुड़ी कई चमत्कारी घटनाओं का जिक्र मिलता है, लेकिन ये कहानियाँ उनके आध्यात्मिक जीवन-वृत्तांत का हिस्सा हैं, न कि प्रमाणित इतिहास का।

11 सितंबर 1973 को वृंदावन में उनके निधन के बाद, उनकी विरासत दुनिया भर में फैली और स्टीव जॉब्स, मार्क जुकरबर्ग और जूलिया रॉबर्ट्स जैसी प्रमुख पश्चिमी हस्तियों को प्रभावित किया; इन सभी ने उनके कैंची धाम आश्रम का दौरा किया था।

खबरों के अनुसार, 1.8 करोड़ रुपये के कम बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ ने भारत में लगभग 10 लाख रुपये की शुरुआती कमाई की और 28वें दिन तक 62 करोड़ रुपये से अधिक की नेट कमाई कर ली। फिल्म निर्माताओं का मानना ​​है कि लोगों के बीच फिल्म की अच्छी चर्चा (वर्ड ऑफ माउथ) के कारण ही यह फिल्म इतने लंबे समय तक सिनेमाघरों में चल पाई।

‘हनुमान अंश’ देखकर भावुक हुए वीरेंद्र सहवाग, बोले- महाराज जी की कृपा को महसूस करना ही अपने आप में खास है [VIDEO]

महान संत बाबा नीम करौली के जीवन से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ इन दिनों लगातार चर्चा में है। करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 60 करोड़ रुपये की कमाई का आंकड़ा पार कर लिया है। शुरुआत में फिल्म को भले ही धीमी प्रतिक्रिया मिली हो, लेकिन सोशल मीडिया पर दर्शकों की तारीफ के बाद इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी।

 

अब भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग ने भी फिल्म देखने के बाद अपनी प्रतिक्रिया साझा की है। सहवाग ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर फिल्म की तारीफ की और बताया कि बाबा नीम करौली के प्रति उनकी आस्था करीब एक दशक पुरानी है।

 

करीब 10 साल से बाबा नीम करौली से जुड़ा है सहवाग का जुड़ाव

 

सहवाग ने अपने वीडियो की शुरुआत ‘सीता-राम’ के अभिवादन से की। उन्होंने बताया कि करीब 10 साल पहले एक दोस्त के जरिए उन्हें बाबा नीम करौली और उनकी लीलाओं के बारे में जानने का मौका मिला था। इसके बाद उन्होंने बाबा के बारे में पढ़ना और उनके बारे में सुनना शुरू किया।

 

सहवाग के मुताबिक, समय के साथ उनके मन में बाबा के प्रति गहरी श्रद्धा और आकर्षण पैदा हुआ। उन्होंने बाबा के व्यक्तित्व, उनकी करुणा और भक्तों के जीवन में आए बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी कृपा का प्रभाव आज भी लोगों के अनुभवों में देखने को मिलता है।



 

 ‘हनुमान अंश’ को बताया बाबा नीम करौली को खूबसूरत श्रद्धांजलि

 

फिल्म देखने के अपने अनुभव को साझा करते हुए सहवाग ने कहा कि बाबा नीम करौली जैसे संत के पूरे व्यक्तित्व और उनके प्रभाव को किसी एक फिल्म में समेटना आसान नहीं है। हालांकि, उन्हें लगा कि ‘हनुमान अंश’ ने बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा को खूबसूरती से पर्दे पर पेश करने की कोशिश की है।

 

उन्होंने फिल्म को बाबा नीम करौली के लिए एक सुंदर श्रद्धांजलि बताया। सहवाग का कहना था कि फिल्म के जरिए दर्शकों को बाबा के व्यक्तित्व और उनके प्रभाव की एक झलक जरूर मिलती है।

 

उन्होंने लोगों से फिल्म देखने की अपील करते हुए कहा कि अगर कोई बाबा नीम करौली को जानता है और उनके जीवन से जुड़ा रहा है, तो उसे यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए।

 

 फिल्म का सांप वाला सीन सहवाग के दिल को छू गया

 

सहवाग ने फिल्म के उस दृश्य का भी खास तौर पर जिक्र किया, जिसने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया। इस सीन में बाबा नीम करौली के शरीर पर सांप लिपटे हुए दिखाई देते हैं।

 

इस दौरान फिल्म में बाबा के संवाद को भी सहवाग ने याद किया। उन्होंने बताया कि जब एक भक्त उन्हें शिव का स्वरूप बताता है, तो बाबा की ओर से बेहद गहरी बात कही जाती है। सहवाग के मुताबिक, इस पूरे प्रसंग ने उन्हें भावुक कर दिया और फिल्म का यह हिस्सा उनके मन में बस गया।

 

सहवाग ने कहा कि बाबा नीम करौली को पूरी तरह समझ पाना शायद संभव नहीं है, लेकिन उनकी कृपा और प्रभाव को महसूस किया जा सकता है।

 

सोशल मीडिया पर लिखा- ‘महाराज जी की लीला बहुत निराली है’

 

फिल्म देखने के बाद सहवाग ने सोशल मीडिया पोस्ट में भी अपनी भावनाएं जाहिर कीं। उन्होंने लिखा कि महाराज जी की लीला को समझना शायद संभव नहीं, लेकिन उनकी कृपा को महसूस जरूर किया जा सकता है।

 

उन्होंने ‘हनुमान अंश’ को एक महान संत की अद्भुत यात्रा से जुड़ी फिल्म बताते हुए लोगों से इसे देखने की अपील की। सहवाग की इस प्रतिक्रिया के बाद फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा और तेज हो गई है।

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 अब विराट कोहली तक पहुंचाना चाहते हैं फिल्म

 

सहवाग की प्रतिक्रिया ने फिल्म के निर्माताओं के लिए इसे और खास बना दिया है। निर्माता ने बताया कि वह खुद सहवाग के बड़े प्रशंसक रहे हैं और क्रिकेट से सहवाग की विदाई के बाद उन्होंने क्रिकेट देखना तक छोड़ दिया था।

 

ऐसे में सहवाग का अपनी इच्छा से फिल्म देखना और फिर सार्वजनिक रूप से उसकी तारीफ करना उनके लिए बेहद भावुक पल बन गया। अब निर्माता की इच्छा है कि भारतीय क्रिकेट के एक और बड़े स्टार विराट कोहली भी ‘हनुमान अंश’ देखें।

 

विराट कोहली और अनुष्का शर्मा की बाबा नीम करौली के प्रति आस्था भी कई बार चर्चा में रही है। ऐसे में निर्माता दोनों को फिल्म दिखाना चाहते हैं। सहवाग के रिएक्शन के बाद उनकी यह इच्छा और भी खास हो गई है।

 

टेक दिग्गज अब ‘किसान’ बने; अमेरिका में कृषिभूमि की होड़:गेट्स-बेजोस 7 लाख एकड़ जमीन पर आलू-गाजर उगा रहे, जुकरबर्ग पाल रहे मवेशी

दुनिया के सबसे अमीर और टेक दिग्गजों में अब पशु-पालन और खेती का शौक बढ़ रहा है। अमेरिका में खेती की जमीन अब सिर्फ किसान की जरूरत नहीं, अरबपतियों के लिए बड़ा निवेश और शौक बन चुकी है। कोई यहां मवेशी पाल रहा है, तो कोई जमीन खरीदकर भविष्य ज्यादा सुरक्षित कर रहा है। मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग हवाई के काउआई द्वीप पर करीब 2,871 करोड़ रु. के 4,000 एकड़ कोउलाउ रेंच पर वाग्यू और एंगस नस्ल के मवेशी पाल रहे हैं। वहीं, रेडिट के सह-संस्थापक एलेक्सिस ओहानियन फ्लोरिडा में अपने फार्म पर केले के बाग और मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। हालांकि, इन दिग्गजों के खेती-बारी का नया शौक अमेरिका में कृषि जमीनों को एक बेहद महंगे ‘एसेट क्लास’ में बदल दिया है। ‘ द लैंड रिपोर्ट’ के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के पास 2.75 लाख एकड़ कृषि भूमि है, जिससे वे अमेरिका के 44वें सबसे बड़े भूस्वामी बन गए हैं। अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस 4.62 लाख एकड़ और वॉलमार्ट घराने से जुड़े स्टेन क्रोनके 27 लाख एकड़ जमीन के मालिक हैं। क्रोनके ने 2025 में न्यू मैक्सिको में 9.38 लाख एकड़ जमीन खरीदी, जिसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी रैंच बिक्री बताया गया। अलग-अलग राज्यों में इन जमीनों पर आलू, गाजर, प्याज, सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी फसलें उगाई जाती हैं। कुछ किसानों को लीज पर भी दी जाती है। पीपुल्स कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में कृषि भूमि 411 लाख करोड़ की परिसंपत्ति बन चुकी है। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक, बीते वर्ष खेतों के मूल्य में 4.3% की बढ़ोतरी हुई। नेशनल यंग फार्मर्स कोएलिशन की पॉलिसी निदेशक एरिन फॉस्टर के अनुसार, जमीन की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि पहली बार खेती में उतरने वाले युवा या छोटे किसान प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। जमीन में निवेश क्यों? महंगाई के साथ बढ़ती है कीमत महंगाई से सुरक्षित बचाव – सीमित प्राकृतिक संसाधन होने के कारण जमीन की कीमतें हमेशा महंगाई के साथ बढ़ती हैं। एआई और डेटा सेंटर्स की मांग – टेक कंपनियों (एआई हाइपरस्केलर्स) को विशाल डेटा सेंटर बनाने के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है। लाइफस्टाइल और नॉन-फाइनेंशियल फायदे – कोरोना महामारी के बाद बड़े परिसरों में शिकार, मछली पकड़ने और खुद का ऑर्गेनिक अन्न उगाने का रुझान बढ़ा है।

हिमाचल प्रदेश में महंगा हुआ पेट्रोल-डीजल, कांग्रेस सरकार ने 60 पैसे प्रति लीटर अनाथ और विधवा सेस लगाया

Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश में पेट्रोल और डीजल आज से महंगा हो गया है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और हाई स्पीड डीजल पर 60 पैसे प्रति लीटर ऑर्फन एंड विडो यानी अनाथ और विधवा सेस (Orphan and Widow Cess) लगाने की घोषणा की है। यह सेस 11 अगस्त, 2026 की आधी रात से लागू हो गया है। राज्य के टैक्स और आबकारी विभाग ने 11 अगस्त को जारी एक नोटिफिकेशन में कहा कि यह सेस पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल दोनों पर ₹0.60 (60 पैसे) प्रति लीटर की दर से लगाया जाएगा।

नोटिफिकेशन के अनुसार, अनाथ और विधवा सेस हिमाचल प्रदेश में पहली बार बिक्री के समय लगाया जाएगा। यह सेस ‘हिमाचल प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट, 2005’ की धारा 6-A के तहत लागू किया गया है। इसे मंत्रिपरिषद की मंजूरी मिली हुई है। यह सेस मार्च में राज्य विधानसभा द्वारा ‘हिमाचल प्रदेश वैल्यू एडेड टैक्स (संशोधन) बिल, 2026’ पास किए जाने के बाद लगाया गया है।

अभी और महंगा होने की आशंका

इस संशोधन ने पेट्रोल और हाई-स्पीड डीज़ल पर ‘अनाथ और विधवा सेस’ लगाने के लिए कानूनी ढांचा तैयार किया। हमारे सहयोगी cnbctv18.com की एक रिपोर्ट के मुताबिक संशोधित कानून के तहत, सरकार ₹5 प्रति लीटर तक की दर से सेस लगा सकती है। अभी जो 60 पैसे का सेस लगाया गया है। वह कानून में तय अधिकतम सीमा से काफी कम है।

जब यह बिल पेश किया गया था, तो राज्य सरकार ने कहा था कि इस सेस का मकसद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की विधवाओं और अनाथों के कल्याणकारी कार्यों के लिए रेवेन्यू का एक खास और टिकाऊ जरिया बनाना है। राज्य सरकार ने पहले कहा था कि यह सेस हिमाचल प्रदेश के भीतर बिक्री के शुरुआती चरण पर वसूला जाएगा, न कि बिक्री के बाद के चरणों में। मार्च में बने कानून में मौजूदा VAT कानून के तहत पहले से लागू टैक्स के अलावा यह सेस लगाने का प्रावधान है।

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इस बीच, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा है कि राज्य में मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल के लिए कांग्रेस आलाकमान की अंतिम मंजूरी मिलने का इंतजार किया जा रहा है। सुक्खू ने डिया से बातचीत के दौरान कहा कि कुल्लू से कांग्रेस विधायक सुंदर सिंह ठाकुर जल्द होने वाली पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति (PAC) की बैठक से पहले या बाद में शपथ ले सकते हैं।

क्या AI तय करेगा अगली महाशक्ति? मार्क जुकरबर्ग ने चीन को लेकर ऐसा बता दिया जिसने उड़ाई दिग्गजों की नींद

AI Decide Global Superpower: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर दुनिया की दो बड़ी महाशक्तियों अमेरिका और चीन के बीच मुकाबला लगातार तेज हो रहा है। इसी बीच Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग ने अमेरिका को चेतावनी दी है कि अगर उसने AI के लिए जरूरी एनर्जी और डेटा सेंटर का इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से नहीं बढ़ाया, तो वह इस क्षेत्र में चीन से पिछड़ सकता है। एक नोट में जुकरबर्ग ने कहा कि जो देश एडवांस्ड AI के डेवलपमेंट और इस्तेमाल में आगे रहेंगे, उनका दुनिया में ताकत के संतुलन पर बड़ा असर होगा। इसका असर लोकतंत्र, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

जुकरबर्ग के मुताबिक, आने वाले समय में जो देश अत्याधुनिक AI को विकसित करने और बड़े पैमाने पर अपनाने में सबसे आगे रहेंगे, वे दुनिया के शक्ति संतुलन को प्रभावित करने की स्थिति में होंगे। इसका असर सिर्फ टेक्नोलॉली सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। उन्होंने कहा, “जो देश एडवांस्ड AI के डेवलपमेंट और इस्तेमाल में आगे रहेंगे, वे एक नए जियोपॉलिटिकल पावर बैलेंस में योगदान देंगे। यही भविष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों, समृद्धि और सुरक्षा की स्थिति तय करेगा।”

क्या अमेरिका को चीन के AI बूम से टेंशन लेनी चाहिए?

सिलिकॉन पर अमेरिका के एक्सपोर्ट कंट्रोल का समर्थन करते हुए जुकरबर्ग ने कहा कि AI को सपोर्ट करने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में चीन की तेजी से हो रही तरक्की वॉशिंगटन के लिए खास चिंता का विषय है। उन्होंने माना कि सिलिकॉन डिजाइन में अमेरिका को बढ़त हासिल है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि एनर्जी कैपेसिटी बढ़ाने और AI के लिए जरूरी फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के मामले में वह पिछड़ रहा है। उन्होंने कहा, “चीन जैसे देश हर दूसरे हफ्ते 1GW से ज्यादा न्यूक्लियर कैपेसिटी शुरू कर रहे हैं। इसलिए कॉम्पिटिशन में बने रहने के लिए हमें एनर्जी और डेटा सेंटर बनाने की रफ़्तार बढ़ानी होगी।”

AI की दौड़ में चीन से क्यों चिंतित हैं जुकरबर्ग?

जुकरबर्ग ने अपने एक नोट में चीन की तेजी से बढ़ती AI इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमता को अमेरिका के लिए खास चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि AI मॉडल बनाने के लिए सिर्फ बेहतरीन चिप डिजाइन पर्याप्त नहीं है। इसके लिए भारी मात्रा में बिजली, बड़े डेटा सेंटर और मजबूत फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। उनके मुताबिक, अमेरिका के पास सिलिकॉन डिजाइन के क्षेत्र में बढ़त है। उनके मुताबिक ऊर्जा क्षमता बढ़ाने और AI के लिए जरूरी डेटा सेंटर बनाने में चीन की गति से अमेरिका पीछे रह रहा है। जुकरबर्ग ने कहा कि चीन हर कुछ हफ्तों में बड़ी मात्रा में नई परमाणु ऊर्जा क्षमता ऑनलाइन ला रहा है।

AI को लोग बना लेंगे हथियार!

जुकरबर्ग की चेतावनी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू AI को वैश्विक शक्ति संतुलन से जोड़ना है। उनका कहना है कि भविष्य में अत्याधुनिक AI के विकास और उसके इस्तेमाल में कौन से देश सबसे आगे रहते हैं, इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि दुनिया में लोकतांत्रिक मूल्य, समृद्धि और सुरक्षा किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।

यानी AI की दौड़ को केवल कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे बड़ी तस्वीर यह है कि AI में तकनीकी बढ़त हासिल करने वाला देश आर्थिक और रणनीतिक रूप से भी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है।

अमेरिका के लिए बिजली बड़ी चुनौती

अमेरिका ने AI से जुड़ी हाई टेक्नोलॉजी और चिप्स को लेकर चीन सहित कुछ देशों पर निर्यात करने पर प्रतिबंध लगाए हैं। जुकरबर्ग ने इन प्रतिबंधों को जारी रखने का समर्थन किया है। उनका मानना है कि इन प्रतिबंधों ने महत्वपूर्ण दौर में दूसरे देशों में AI के विकास की गति को धीमा किया है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि केवल चिप्स पर कंट्रोल रखना पर्याप्त नहीं होगा।

AI सिस्टम को चलाने और लोगों को ट्रेंड करने के लिए विशाल कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है। इसके लिए लगातार बिजली की आपूर्ति आवश्यक है। इसलिए अमेरिका को अपनी ऊर्जा क्षमता और डेटा सेंटर नेटवर्क का तेजी से विस्तार करना होगा।

AI इतिहास का सबसे कॉम्पिटिटिव इंडस्ट्री?

जुकरबर्ग ने AI को इतिहास के सबसे कॉम्पिटिटिव इंडस्ट्री में से एक बताया। उनके मुताबिक AI के सेक्टर में नई तकनीक और इनोवेशन बेहद तेजी से दूसरे खिलाड़ियों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में कुछ ही महीनों में उनकी नकल या उन्हें अपनाया जा सकता है। यही वजह है कि AI की इस दौड़ में छोटी-सी बढ़त भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

जुकरबर्ग का कहना है कि कभी-कभी सिर्फ दो महीने की बढ़त भी मायने रख सकती है। उन्होंने अमेरिका से ऐसी पॉलिसी बनाने की अपील की है, जो AI इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण को तेज करें। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि घरेलू AI मॉडल को बाजार में जारी करने में अनावश्यक देरी भी अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को नुकसान पहुंचा सकती है।

चीन की बढ़त से अमेरिका को खतरा?

जुकरबर्ग की चिंता का मूल कारण यह है कि AI आने वाले सालों में अर्थव्यवस्था से लेकर रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा तक लगभग हर बड़े सेक्टर को प्रभावित कर सकता है। अगर चीन AI मॉडल, कंप्यूटिंग क्षमता, एनर्जी और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी से आगे बढ़ता है और अमेरिका पर्याप्त रफ्तार से अपनी क्षमता नहीं बढ़ाता, तो दोनों देशों के बीच तकनीकी अंतर कम हो सकता है। या फिर चीन कुछ क्षेत्रों में बढ़त हासिल कर सकता है।

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ऐसे में AI की मौजूदा दौड़ भविष्य में अमेरिका-चीन के बीच वैश्विक प्रभाव की बड़ी लड़ाई में बदल सकती है। आपको बता दें कि जिस देश के पास पर्याप्त चिप्स, बिजली, डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग क्षमता होगी, उसके पास AI को बड़े पैमाने पर विकसित और इस्तेमाल करने की क्षमता भी ज्यादा होगी।

न्यू मैक्सिको कोर्ट का मेटा पर ₹5,390 करोड़ का जुर्माना:कहा- बच्चों की सुरक्षा नहीं, एन्गेजमेंट और मुनाफा चुना, इससे उनकी मेंटल हेल्थ बिगड़ी

न्यू मैक्सिको की एक अदालत ने मेटा पर 567 मिलियन डॉलर यानी भारतीय रुपयों में 5000 करोड़ से ज्यादा का जुर्माना लगाया है। यह आदेश मेटा के प्लेटफॉर्म्स के कारण बच्चों की मेंटल हेल्थ पर हुए दुष्प्रभाव के खिलाफ जारी किया गया है। अदालत ने यह फैसला कंपनी की जवाबदेही तय करते हुए सुनाया है। यह पहली बार है जब किसी राज्य ने एक बड़ी टेक कंपनी के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की है। गुरुवार देर रात आए फैसले में जज ब्रायन बीडशेड ने कहा कि जुर्माने की रकम का बड़ा हिस्सा 420 मिलियन डॉलर युवाओं के इलाज में इस्तेमाल होगा। बाकी रकम अगले 5 साल तक अवेयरनेस, प्रिवेंशन, स्क्रीनिंग सर्विस पर खर्च की जाएगी। मेटा के प्लेटफॉर्म्स इंस्टाग्राम-फेसबुक पर बच्चों की सुरक्षा और मेंटल हेल्थ को लेकर लंबे समय से सवाल उठ रहे थे। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि कंपनी के प्लेटफॉर्म्स का बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ा है। Meta आगे क्या कदम उठा सकती है… मैक्सिको के अटॉर्नी जनरल सेन शुरू किया था मुकदमा यह मामला न्यू मैक्सिको के अटॉर्नी जनरल राउल टोरेस ने दायर किया था। आरोप था कि मेटा के इंस्टाग्राम-फेसबुक बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं हैं। कंपनी ने जानबूझकर इन खतरों को नजरअंदाज किया। कंपनी पर आरोप लगा कि एल्गोरिदम को ऐसे डिजाइन किया है कि वे बच्चों को ‘एडिक्टिव’ (लत लगाने वाले) बनाते हैं। इसके असर से बच्चों में डिप्रेशन, ईटिंग डिसऑर्डर और आत्महत्या जैसी समस्याओं में बढ़ोतरी हुई। मुकदमा केवल मेंटल हेल्थ तक सीमित नहीं था। इसमें यह भी आरोप लगाया गया था कि मेटा के प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल बाल यौन शोषण और बच्चों को फंसाने के लिए किया जा रहा था, और कंपनी ने इस खतरे के बारे में जानते हुए भी ठोस कदम नहीं उठाए। कोर्ट ने कहा- फेडरल कानून मेटा को बच्चों की एज वैरिफिकेशन से रोकता है अदालत ने कहा कि बच्चों की प्राइवेसी से जुड़े फेडरल कानून मेटा को 13 साल से कम उम्र के बच्चों पर एज वैरिफिकेशन इक्विपमेंट लागू करने से रोकते हैं। चाइल्ड ऑनलाइन प्राइवेसी प्रिवेंशन एक्ट (COPPA) का अर्थ है कि यह मेटा को बच्चों से व्यक्तिगत डेटा जमा करने का अनुरोध करने या एज वैरिफिकेशन उद्देश्यों के लिए भी ट्रैक किए जाने का आदेश नहीं दे सकता है। एक दिन पहले भारत सरकार से माफी मांगनी पड़ी Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग ने बुधवार को पीएम मोदी का फेसबुक पोस्ट हटाए जाने के मामले में भारत सरकार से माफी मांगी है। इसी दौरान कंपनी ने यह भी माना कि उसके प्लेटफॉर्म पर चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज मैटेरियल, डीपफेक और कंटेंट मॉडरेशन से जुड़ी चूक हुई हैं।

Meta CEO Mark Zuckerberg ने भारत से मांगी माफी, 5-6 घंटे तक Facebook से हटाया गया था PM Modi का वीडियो

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Meta के CEO मार्क जुकरबर्ग ने भारत में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर Child Sexual Abuse Material (CSEAM) और Deepfake Content की उपलब्धता को लेकर माफी मांगी है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सूत्रों के मुताबिक, Zuckerberg ने Meta के वरिष्ठ वैश्विक अधिकारियों की मंत्रालय के साथ हुई बैठक के दौरान इस मामले पर खेद जताया।  Meta, Facebook, Instagram और WhatsApp की पैरेंट कंपनी है।

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हटाया था PM Modi का वीडियो

Zuckerberg की यह माफी ऐसे समय में सामने आई है जब इससे पहले बुधवार को एक संसदीय समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Facebook वीडियो को हटाए जाने के मामले में Meta प्रमुख को तीन दिन के भीतर माफी मांगने को कहा था। प्रधानमंत्री मोदी का छात्रों और Gen Z को संबोधित करने वाला वीडियो कुछ समय के लिए Facebook से हटाए जाने पर समिति ने गंभीर नाराजगी जताई थी।

समिति ने चेतावनी दी थी कि यदि माफी नहीं मांगी गई तो Meta को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा यानी Safe Harbour protection वापस लेने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में संबंधित मामलों में अभियोजन और FIR दर्ज होने का रास्ता खुल सकता है।

लोकसभा सचिवालय की ओर से इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव को भेजे गए पत्र में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का छात्रों और Gen Z को संबोधित करने वाला वीडियो Facebook से करीब 5-6 घंटे तक हटाया जाना समिति ने गंभीरता से लिया था। यह वीडियो परीक्षा से जुड़े विवादों और पेपर लीक के खिलाफ सरकार की कार्रवाई को लेकर प्रधानमंत्री के संदेश से संबंधित था। समिति ने इस घटना को लेकर Meta से स्पष्टीकरण और जवाबदेही की मांग की थी।

मेटा की टीम को सरकार ने बुलाया था 

सरकार पीएम मोदी का वीडियो फेसबुक से हटाने से भी नाराज थी। मोदी ने 23 जुलाई को यह वीडियो पोस्ट किया था। इसमें उन्होंने पेपर लीक को बड़ी समस्या बताया था। उन्होंने ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की भी बात कही थी। आईटी मंत्रालय और मेटा के अधिकारियों के बीच 2 दिन की बैठक चल रही है। सरकार ने मेटा की ग्लोबल टीम को दिल्ली बुलाया है। 5 अगस्त को बैठक का पहला दिन था।

मार्क जुकरबर्ग को दिया गया था 3 दिन का समय 

समिति की ओर से कहा गया था कि मेटा  प्रमुख मार्क जुकरबर्ग को मामले में माफी मांगनी चाहिए। अगर निर्धारित समय में माफी नहीं आती है, तो समिति भारत में उपलब्ध कानूनी संरक्षण को वापस लेने की दिशा में कदम उठाने पर विचार कर सकती है। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Safe Harbour protection इंटरनेट प्लेटफॉर्म को यूजर्स द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, बशर्ते वे लागू नियमों और कानूनी दायित्वों का पालन करें।

क्यों महत्वपूर्ण हुआ मामला

प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया पोस्ट को हटाए जाने की घटना ने भारत में Big Tech platforms, content moderation और social media accountability को लेकर बहस को तेज कर दिया था।  Meta की ओर से पहले इस वीडियो को गलती से हटाए जाने की बात सामने आई थी और वीडियो बाद में बहाल कर दिया गया था।

 

Zuckerberg ने अधिकारियों के जरिए भेजी माफी

 

MeitY के सूत्रों के अनुसार, Mark Zuckerberg ने प्लेटफॉर्म के संचालन में हुई गलतियों को लेकर शीर्ष अधिकारियों के माध्यम से अपनी माफी पहुंचाई। सूत्रों ने बताया कि बैठक के दौरान Meta ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ खास तरह के कंटेंट को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए बड़ी रकम का भुगतान किया गया था। सूत्र के मुताबिक, Meta ने गलती स्वीकार करते हुए माफी मांगी और इस पर अफसोस जताया। हालांकि, मंत्रालय की ओर से इस संबंध में अभी सार्वजनिक रूप से विस्तृत बयान सामने नहीं आया है।

CSEAM और महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक कंटेंट पर भी सख्ती

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता वाली सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने उन intermediary platforms के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, जहां CSEAM और महिलाओं के खिलाफ अपमानजनक सामग्री उपलब्ध होने का आरोप है। सूत्रों के मुताबिक, समिति की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि जो प्लेटफॉर्म खुद तय करते हैं कि किस यूजर को कौन-सा कंटेंट दिखाया जाएगा, उन्हें केवल intermediary की सामान्य परिभाषा के तहत सुरक्षा नहीं दी जा सकती। समिति ने कथित तौर पर कहा कि ऐसे मामलों में IT Act के तहत Safe Harbour protection लागू नहीं होगा।

Google India को लेकर भी समिति ने मांगी कार्रवाई

संसदीय समिति ने Google India से जुड़े एक कथित साइबर फ्रॉड मामले का भी उल्लेख किया है। समिति के अनुसार, शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि फर्जी ऐप्स के माध्यम से निवेश करने पर उन्हें 48 लाख रुपये से अधिक का नुकसान हुआ। पत्र में कहा गया कि Hyderabad Cyber Police की कार्रवाई में Google India के प्रमुख को कथित साइबर धोखाधड़ी से जुड़े मामले में सह-आरोपी के तौर पर शामिल किए जाने की बात सामने आई है। समिति ने इस मामले में भी भारत सरकार से Google India के खिलाफ इसी तरह की कार्रवाई करने की इच्छा जताई है।

India-Myanmar territory: क्या म्यांमार से भारत करेगा अनसुलझे जमीन की अदला-बदली? सीमा विवाद को सुलझाने पर MEA का बड़ा बयान

India-Myanmar territory: भारत और म्यांमार के बीच मणिपुर से लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा के एक अनसुलझे हिस्से को लेकर बातचीत जारी है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच सीमा के जिन क्षेत्रों का अभी तक सीमांकन नहीं हुआ है, उन्हें लेकर चर्चा चल रही है। हालांकि, भारत सरकार ने अनसुलझे जमीन की अदला-बदली की खबरों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। लेकिन सूत्रों ने बताया कि भारत और म्यांमार मणिपुर में अपनी साझा सीमा के एक ऐसे हिस्से को सुलझाने के लिए बातचीत कर रहे हैं जिसकी सीमा अभी तय नहीं हुई है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने नई दिल्ली में प्रेस वार्ता के दौरान इससे जुड़े सवाल पर कहा, “सीमा पर कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें अभी सुलझाया जाना बाकी है। उन क्षेत्रों पर बातचीत जारी है।” हालांकि, क्षेत्र के संभावित आदान-प्रदान की खबरों ने मणिपुर में नागरिक समाज समूहों के विरोध को जन्म दे दिया है, जिन्हें राज्य की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर चिंताएं हैं। चर्चा के तहत आने वाला यह हिस्सा लगभग 2.8 किलोमीटर लंबा है। ये मणिपुर के चंदेल जिले में आता है, जो म्यांमार के सगाइंग क्षेत्र की कबाव घाटी (Kabaw Valley) से सटा हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट में क्या दावा?

अमेरिका की मैगजीन ‘द डिप्लोमैट (The Diplomat)’ की 17 जुलाई की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत सरकार मणिपुर में भारत-म्यांमार सीमा के बॉर्डर पिलर 65 से 68 के बीच सीमांकन पूरा करने के लिए करीब 1.4 वर्ग मील जमीन के संभावित आदान-प्रदान के प्रस्ताव पर विचार कर रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 26 मई 2026 के एक आधिकारिक दस्तावेज का हवाला देते हुए कहा गया कि इस सीमांकन प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था। यह इलाका करीब 2.8 किलोमीटर लंबा है। ये मणिपुर के चंदेल जिले में स्थित है, जो म्यांमार की काबाव घाटी (Sagaing Region) से सटा हुआ है।

भारत-म्यांमार सीमा कितनी लंबी है?

भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी इंटरनेशनल बॉर्डर है। ये अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम से होकर गुजरती है। यह सीमा पहाड़ी और घने जंगलों वाले इलाकों से होकर निकलती है, जहां कई जनजातीय समुदायों के दोनों देशों में पारंपरिक सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध हैं।

गृह मंत्रालय के अनुसार, इस सीमा में से करीब 1,472 किलोमीटर हिस्से का सीमांकन सीमा स्तंभों (Boundary Pillars) के जरिए किया जा चुका है। जबकि लगभग 171 किलोमीटर हिस्सा अब भी अनसुलझा है। इनमें मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश के लोहित सेक्टर और मणिपुर की काबाव घाटी के कुछ हिस्से शामिल हैं।

सीमा पर बाड़ लगाने की योजना

रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित सीमांकन का उद्देश्य भारत-म्यांमार सीमा पर फेंसिंग (बाड़) का काम पूरा करना है। ताकि अवैध घुसपैठ, उग्रवादियों की आवाजाही और सीमा पार होने वाली आपराधिक गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जा सके।

साल 2024 में केंद्र सरकार ने पूरे 1,643 किलोमीटर लंबे भारत-म्यांमार सीमा क्षेत्र पर बाड़ लगाने और फ्री मूवमेंट रिजीम (FMR) को समाप्त करने की घोषणा की थी। 2018 में लागू इस व्यवस्था के तहत सीमा से लगे जनजातीय समुदायों को बिना वीजा 16 किलोमीटर तक एक-दूसरे के क्षेत्र में आने-जाने की अनुमति थी।

1967 के समझौते के बाद भी बाकी हैं कुछ विवादित हिस्से

भारत और म्यांमार के बीच वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमा 1967 के द्विपक्षीय समझौते के तहत तय की गई थी। इसके बावजूद कुछ हिस्सों का सीमांकन आज भी पूरा नहीं हो सका है। सरकार ने साल 2018 में संसद को बताया था कि शेष क्षेत्रों का समाधान द्विपक्षीय सीमा तंत्र के माध्यम से किया जाएगा और इसके तहत नौ नए सीमा स्तंभ स्थापित किए जाने हैं।

मणिपुर में मोलचाम सेक्टर (पिलर 64-68), मोरेह सेक्टर (75-79) और चोरो खुन्नौ सेक्टर (88-95) को संवेदनशील माना जाता है। भारत का कहना है कि म्यांमार के साथ कोई व्यापक सीमा विवाद नहीं है। केवल कुछ सीमा स्तंभों का अंतिम निर्धारण होना बाकी है।

मणिपुर में शुरू हुआ विरोध

जमीन अदला-बदली की खबरों के सामने आने के बाद मणिपुर के कई नागरिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (COCOMI) ने कहा कि यदि मीडिया रिपोर्ट सही साबित होती है और राज्य की जमीन का कोई हिस्सा म्यांमार को सौंपने की कोशिश की जाती है तो संगठन इसका कड़ा विरोध करेगा।

संगठन ने कहा कि मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता किसी भी कीमत पर समझौते का विषय नहीं हो सकती। COCOMI का आरोप है कि 1949 में भारतीय संघ में विलय के बाद राज्य पहले ही अपने ऐतिहासिक क्षेत्र का कुछ हिस्सा खो चुका है। अब किसी भी नई कटौती को स्वीकार नहीं किया जाएगा। संगठन ने केंद्र सरकार से बिना राज्य की जनता की सहमति के कोई फैसला नहीं लेने की मांग की है।

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मामले में बड़ी बातें

  • विदेश मंत्रालय ने केवल सीमा के अनसुलझे हिस्सों पर बातचीत की पुष्टि की है।
  • जमीन की अदला-बदली को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
  • मीडिया रिपोर्ट में 1.4 वर्ग मील भूमि के संभावित आदान-प्रदान का दावा किया गया है।
  • प्रस्तावित इलाका मणिपुर के चंदेल जिले में भारत-म्यांमार सीमा पर स्थित है।
  • केंद्र सरकार सीमा पर फेंसिंग कर अवैध घुसपैठ और उग्रवादी गतिविधियों पर रोक लगाना चाहती है।
  • मणिपुर के नागरिक संगठनों ने किसी भी संभावित क्षेत्रीय हस्तांतरण का विरोध किया है।

PM मोदी का वीडियो हटाने पर Meta को 3 दिन का अल्टीमेटम, संसदीय समिति ने दी बड़ी चेतावनी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ घंटों के लिए फेसबुक से हटाए जाने के मामले में संसदीय समिति ने Meta को कड़ी चेतावनी दी है। समिति ने कहा है कि अगर कंपनी तीन दिनों के भीतर इस मामले पर उचित कार्रवाई नहीं करती है, तो भारत में उसे मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour) कानूनी सुरक्षा खत्म की जा सकती है।

Firstpost की रिपोर्ट के मुताबिक, यह चेतावनी तब दी गई जब कम्युनिकेशन और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने मेटा के प्रतिनिधियों से प्रधानमंत्री का वीडियो हटाए जाने के बारे में सवाल किए। यह वीडियो फेसबुक पर लगभग पांच घंटे तक उपलब्ध नहीं था। पैनल ने इस घटना के लिए मेटा के CEO मार्क जकरबर्ग से जवाबदेही और व्यक्तिगत माफी की मांग की है।

बता दें कि यह विवाद फेसबुक के एक वीडियो से शुरू हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने ‘नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट’ (NEET) का पेपर लीक होने के विरोध में हो रहे देशव्यापी प्रदर्शनों पर बात की थी और परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया था।

संसदीय समिति ने जवाबदेही की मांग की

समिति के चेयरमैन निशिकांत दुबे ने कहा कि जब तक इस चूक के लिए जिम्मेदारी तय नहीं की जाती, तब तक सिर्फ माफी मांगना काफी नहीं होगा। उन्होंने जकरबर्ग से व्यक्तिगत रूप से माफी मांगने को कहा और चेतावनी दी कि ऐसा न करने पर इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट की धारा 79 के तहत मेटा को मिलने वाले ‘सेफ हार्बर’ प्रोटेक्शन की समीक्षा की जा सकती है।

यह सुरक्षा ऑनलाइन मध्यस्थों (intermediaries) को थर्ड-पार्टी कंटेंट के लिए जिम्मेदारी से बचाती है, बशर्ते वे जरूरी सावधानी (due diligence) के नियमों का पालन करें।

समिति ने Meta को तीन दिनों के भीतर सुधारात्मक कदम उठाने का निर्देश दिया है। अगर कंपनी ऐसा नहीं करती है, तो समिति भारत में Meta की इंटरमीडियरी (मध्यस्थ) सुरक्षा खत्म करने की सिफारिश कर सकती है।

Meta से मुश्किल सवाल

बैठक के दौरान, कमेटी के सदस्यों ने Meta से पूछा कि प्रधानमंत्री का वीडियो हटाने का फ़ैसला किसने लिया और इसे क्यों हटाया गया, जबकि प्लेटफॉर्म पर दूसरे आपत्तिजनक कंटेंट मौजूद थे। सदस्यों ने एल्गोरिदम के पक्षपाती होने और आम यूजर्स की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि अगर प्रधानमंत्री का वीडियो भी हटाया जा सकता है, तो आम लोगों के कंटेंट की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी।

बैठक में Meta के प्रतिनिधियों ने इस घटना पर खेद जताया और संसदीय समिति से माफी मांगी। हालांकि, समिति के सदस्यों का कहना था कि केवल माफी काफी नहीं है। इस मामले में जवाबदेही तय होनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई पर भी विचार किया जाना चाहिए।

सरकार की जांच-पड़ताल तेज हुई

यह घटनाक्रम तब हुआ है जब MeitY ने Meta की ग्लोबल टीम को PM मोदी के वीडियो से जुड़े विवाद, कथित एल्गोरिदम बायस (पक्षपात), प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट (CSAM) और वेरिफाइड अकाउंट्स की सुरक्षा के उपायों पर चर्चा के लिए बुलाया है। सरकार सोशल मीडिया कंपनी की जांच-पड़ताल तेज कर रही है, इसलिए ये बैठकें दो दिनों तक चलेंगी।

संसदीय समिति की इस बैठक में Meta, Google, YouTube और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ MeitY और केंद्रीय गृह मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे। यह पूरी कवायद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, ऑनलाइन सुरक्षा और भारतीय कानूनों के पालन की समीक्षा के तहत की जा रही है।

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