पानी की भारी किल्लत, पिछले साल के मुकाबले आधे रह गए जलाशय, क्या प्यासा रहेगा देश?

देश के कई राज्यों में कम बारिश का असर अब जलाशयों पर दिख रहा है। 1 अक्टूबर तक देश के प्रमुख जलाशयों में 71.84% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 90.31% था, जबकि सामान्य स्तर 81.79% है। यानी इस बार जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले काफी कम है।

पानी की कमी का असर महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान और तमिलनाडु में ज्यादा दिख रहा है। कई इलाकों में खेती के लिए पानी कम पड़ रहा है और फसलों को भी नुकसान हो रहा है।

आंध्र प्रदेश में तेजी से घटा पानी का लेवल

आंध्र प्रदेश में जलाशयों का पानी काफी कम हो गया है। 1 अक्टूबर तक यहां सिर्फ 35.14% पानी बचा था। पिछले साल इसी समय यह 88.60% था, जबकि सामान्य स्तर 71.85% है। कम बारिश और फसल खराब होने से राज्य के आधे से ज्यादा हिस्से में सूखा घोषित किया गया है।

कर्नाटक में सूखे जैसे हालात

1 अक्टूबर तक कर्नाटक के जलाशयों में 59.98% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 89.16% और सामान्य स्तर 80.42% था।

पानी का स्तर कम होने से राज्य में सिंचाई और खेती को लेकर चिंता बढ़ रही है। सूखे जैसे हालात का असर किसानों पर भी दिखाई दे रहा है।

महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और विदर्भ की हालत खराब

5 अक्टूबर तक महाराष्ट्र के जलाशयों में 74.29% पानी था। पिछले साल इसी तारीख को यह 89.22% था। मराठवाड़ा और विदर्भ में कई जलाशयों की स्थिति इससे भी ज्यादा खराब है।

• छत्रपति संभाजीनगर में पानी का भंडार 43.55% था, जबकि पिछले साल 82.96% था।

• अमरावती में इस बार 62.92% पानी रहा, जो पिछले साल 85.87% था।

• नागपुर में पानी का स्तर 72.02% रहा, जबकि पिछले साल यह 89.08% था।

कई इलाकों में फसलें खराब हुई हैं। अगर अगले फसल सीजन तक पानी की स्थिति नहीं सुधरी, तो किसानों और गांवों में रहने वाले परिवारों की मुश्किल बढ़ सकती है।

राजस्थान में कई इलाकों में सूखे का असर

5 अक्टूबर तक राजस्थान के जलाशयों में 61.93% पानी था। जोधपुर में हालात ज्यादा खराब हैं। यहां सिर्फ 15.72% पानी बचा है, जबकि पिछले साल इसी समय 80.25% पानी था।

पाली, जालौर और जैसलमेर में सूखे की स्थिति का जायजा लिया जा रहा है। जोधपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, बालोतरा, राजसमंद, उदयपुर और सिरोही भी प्रभावित इलाकों में शामिल हैं।

कम बारिश का असर बाजरा, मोठ, सोयाबीन, मूंग और दूसरी खरीफ फसलों पर भी पड़ा है। राज्य सरकार ने कुछ इलाकों में सूखे से राहत के लिए कदम उठाए हैं।

तेलंगाना में सूखा घोषित करने की मांग

तेलंगाना के जलाशयों में भी पानी काफी कम है। 1 अक्टूबर तक यहां 40.75% पानी था, जबकि पिछले साल इसी समय 86.10% था। सामान्य स्तर 78.95% है।

कम बारिश और फसल के नुकसान को देखते हुए विपक्षी दल सूखा घोषित करने की मांग कर रहे हैं। पानी का स्तर कम होने से आने वाले समय में खेती और पीने के पानी को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

तमिलनाडु में भी बड़ा अंतर

तमिलनाडु में 1 अक्टूबर तक जलाशयों में 37.27% पानी था। पिछले साल इसी समय यह 91.96% था। राज्य का सामान्य स्तर 66% है।

यानी इस बार पानी का भंडार पिछले साल के मुकाबले काफी नीचे है। इससे सिंचाई और आने वाले फसल सीजन को लेकर चिंता बढ़ सकती है।

केरल की स्थिति सामान्य से नीचे

केरल में जलाशयों का स्टोरेज 59.88% था। पिछले साल यह 76.06% और सामान्य स्तर 69.75% था। यहां भी पानी का भंडार पिछले साल और सामान्य स्तर दोनों से कम है।

कम पानी से बढ़ सकती है ये परेशानियां

• जलाशयों में पानी कम होने का सीधा असर सिंचाई और पीने के पानी पर पड़ सकता है। इसके साथ ही पनबिजली उत्पादन पर भी दबाव आ सकता है।

• सूखे की स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो किसानों की फसल और कमाई प्रभावित हो सकती है। ग्रामीण इलाकों में काम के मौके घटने से लोगों के दूसरे जगहों पर जाने का खतरा भी बढ़ सकता है।

• महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने यह भी चेतावनी दी है कि सूखे के दौरान बाल विवाह के मामले बढ़ सकते हैं।

आने वाले कुछ हफ्ते काफी अहम हैं। अच्छी बारिश हुई तो जलाशयों में पानी बढ़ सकता है और खेती की परेशानी कुछ कम हो सकती है। लेकिन बारिश कम हुई तो पानी की कमी और फसल के नुकसान से किसानों और ग्रामीण परिवारों की मुश्किल बढ़ सकती है।

El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

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अब बेबी फूड को लेकर तुकाराम मुंढे का बड़ा ऐक्शन, महाराष्ट्र FDA ने इन चीजों पर लगाया बैन

मुंबई। महाराष्ट्र में छोटे बच्चों के फॉर्मूला मिल्क और बेबी फूड को लेकर अब नियम सख्त हो गए हैं। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने मंगलवार को आदेश जारी किया। जिसका मकसद बच्चों के खाने की क्वालिटी बेहतर रखना और माता-पिता को सही जानकारी देना है। इसके लिए FDA ने बेबी फूड की पैकेजिंग, विज्ञापन और प्रमोशन को लेकर कई नियम बनाए हैं।

लेबल से लेकर खराब प्रोडक्ट तक जारी हुए नए नियम

  • पैकेट पर “जरूरी सूचना: मां का दूध बच्चे के लिए सबसे अच्छा है” लिखना होगा और छह महीने के बाद ही ऊपरी खाना देने की जानकारी देनी होगी।
  • पैकेट पर बच्चों या महिलाओं की तस्वीर नहीं लगा सकेंगे। साथ ही ‘ह्यूमनाइज्ड’, ‘मैटरनाइज्ड’, ‘कम्प्लीट फूड’ और ‘हेल्थ फूड’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी नहीं होगा।
  • पैकेट पर बच्चे को दूध पिलाने से जुड़ी जरूरी जानकारी भी साफ तौर पर देनी होगी।
  • बच्चे में साइड इफेक्ट दिखने पर हॉस्पिटल और डॉक्टरों को जानकारी देनी होगी और गंभीर मामले में कंपनी को 48 घंटे में रिपोर्ट करनी होगी।
  • कंपनियों को हर बैच का रिकॉर्ड रखना होगा और खराब प्रोडक्ट की पहचान कर उसे बाजार से वापस लेना होगा।

नए नियमों के तहत फॉर्मूला मिल्क और बेबी फूड के प्रमोशन पर रोक रहेगी। कंपनियां इनके विज्ञापन, फ्री सैंपल, गिफ्ट, कूपन या कैशबैक नहीं दे सकेंगी। सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर के जरिए भी प्रमोशन की परमिशन नहीं होगी। साथ ही मेडिकल कार्यक्रम या रिसर्च के नाम पर डॉक्टरों और हॉस्पिटल्स को स्पॉन्सरशिप, गिफ्ट या दूसरी सुविधाएं देने पर भी रोक रहेगी।

नियम तोड़ने पर भरना होगा इतना जुर्माना

  • गलत विज्ञापन या बिना लाइसेंस काम करने पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।
  • घटिया क्वालिटी का खाना बेचने पर 5 लाख रुपये तक और गलत जानकारी के साथ प्रोडक्ट बेचने पर 3 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
  • ‘नो एडेड शुगर’ जैसे दावों और प्रिजर्वेटिव, कलर व फ्लेवर के इस्तेमाल में भी तय नियमों का पालन करना होगा।

लागू होंगे नियम, नहीं माने तो कार्रवाई

FDA के नए नियम फॉर्मूला मिल्क, फॉलो-अप फॉर्मूला, बेबी फूड और फीडिंग बॉटल समेत बच्चों के कई प्रोडक्ट्स पर लागू होंगे। इन नियमों में कंपनियों के साथ इंपोर्टर, डिस्ट्रीब्यूटर, दुकानदार, फार्मेसी, अस्पताल सप्लायर और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी आएंगे। तुकाराम मुंढे ने कहा कि दो साल से कम उम्र के बच्चे बहुत संवेदनशील होते हैं। इसलिए माता-पिता को प्रोडक्ट की सही जानकारी और साफ लेबल मिलना जरूरी है।

महाराष्ट्र FDA ने फूड सेफ्टी को लेकर दूसरी कार्रवाई भी की है। बुलढाणा के खामगांव में करीब 3.51 करोड़ रुपये का रिफाइंड सोयाबीन तेल जब्त किया गया। वहीं मुंबई-नासिक रूट पर पालघर से कसारा घाट के बीच करीब 1.26 करोड़ रुपये का प्रतिबंधित गुटखा भी पकड़ा गया।

महाराष्ट्र में 1972 से भी ज्यादा गंभीर सूखे की आशंका, सोलापुर में सिर्फ 48.65% बारिश, किसानों पर कितना बड़ा संकट?

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले पर सूखे का बड़ा संकट मंडरा रहा है। जिले में इस बार औसत बारिश का सिर्फ 50% ही बरसा है, जिससे खेतों में दरारें पड़ गई हैं। हालात का जायजा लेने खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस 23 सितंबर को सोलापुर पहुंचे।

मुख्यमंत्री ने दौरा करने के बाद कहा कि मौजूदा हालात 1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं। सोलापुर इस समय राज्य का सबसे ज्यादा प्रभावित जिला बन गया है।

जिले में औसत बारिश का सिर्फ करीब 50 फीसदी पानी ही बरसा है। इसकी वजह से खरीफ की सभी फसलों को नुकसान हुआ है। बार्शी और धनोर इलाके में करीब 90 हजार हेक्टेयर में लगी सोयाबीन की फसल पूरी तरह खराब हो गई है, जबकि कई चीनी उत्पादक इलाकों में गन्ने की फसल रुक गई है।

किसानों के लिए सरकार ने की ये तैयारी

फडणवीस ने किसानों से हिम्मत बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि सरकार इस मुश्किल समय में उनके साथ है। सरकार की पहली प्राथमिकता पीने के पानी को बचाना है। इसके अलावा फसल नुकसान, पशुओं के चारे, फसल बीमा, आर्थिक मदद और अनाज की व्यवस्था को लेकर भी योजना बनाई जा रही है। सूखे को लेकर सरकार की ओर से जल्द नोटिफिकेशन या प्रस्ताव जारी करने की बात भी कही गई है।

सूखे से मछली पालन भी प्रभावित

बारिश की कमी का असर अब खेती के साथ मछली पालन पर भी दिखाई दे रहा है। कम पानी की वजह से तालाबों और जलाशयों में मछली पालन मुश्किल हो रहा है। इससे मछली उत्पादन के साथ मछुआरों की कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

सूखे की स्थिति को लेकर कैबिनेट सब-कमेटी की बैठक भी हुई। इसमें अधिकारियों से फसल नुकसान का सर्वे जल्द पूरा करने को कहा गया है, ताकि प्रभावित किसानों की स्थिति का सही पता चल सके। इसके अलावा जल संरक्षण के कामों में भी तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं।

LPG Price 24 September 2026: कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹600 तक हुआ सस्ता? जानें- घरेलू एलपीजी के ताजा रेट

LPG Price Update: घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतों में 24 सितंबर 2026 को देश के प्रमुख शहरों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। गुरुग्राम में आज 14.2 किलो के घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत ₹950.50 है। सरकारी तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और स्थानीय टैक्स समेत विभिन्न कारणों के आधार पर LPG की कीमतों की हर महीने समीक्षा करती हैं। जारी किए गए नए रेट के मुताबिक, इन शहरों में बेंगलुरु में घरेलू LPG सिलेंडर के रेट सबसे कम ₹914 और हैदराबाद में सबसे अधिक ₹994 है। जबकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में यही सिलेंडर ₹942 में मिल रहा है।

कमर्शियल LPG सिलेंडर का क्या है रेट?

अगर आपके पास घरेलू कनेक्शन की जगह 19 किलो का कमर्शियल LPG कनेक्शन है, तो NCR में इसकी कीमत करीब ₹2,747.50 बताई गई है। कमर्शियल सिलेंडर का इस्तेमाल मुख्य रूप से होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे, चाय की दुकान, मिठाई की दुकान और कैटरिंग जैसे कारोबार में किया जाता है।

सितंबर में कीमतें स्थिर

सितंबर 2026 के दौरान प्रमुख शहरों में घरेलू LPG सिलेंडर की कीमतें स्थिर रहने की बात कही गई है। हालांकि, LPG के दाम हर महीने संशोधित किए जा सकते हैं। इसलिए अगले महीने कीमतों में बदलाव संभव है। LPG की कीमत शहर, राज्य के टैक्स और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। इसलिए सिलेंडर बुक करने से पहले अपने क्षेत्र का ताजा रेट संबंधित अधिकृत LPG वितरक या तेल कंपनी के माध्यम से जांचना उचित है।

यूपी में कमर्शियल सिलेंडर हुआ सस्ता?

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ग्रामीण उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिल रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ ग्रामीण एजेंसियां 19 किलो के कमर्शियल गैस सिलेंडर को आधिकारिक कीमत से करीब ₹200 से ₹600 तक कम दाम में बेच रही हैं। हालांकि, यह किसी देशव्यापी कीमत कटौती का हिस्सा नहीं है। बल्कि कुछ चुनिंदा एजेंसियों और स्थानीय बाजारों में दी जा रही छूट बताई जा रही है।

कुशीनगर में ₹2,400 से ₹2,700 में मिल रहा सिलेंडर?

News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 19 किलो के कमर्शियल LPG सिलेंडर की आधिकारिक कीमत करीब ₹2,946 है। लेकिन कुछ एजेंसियों पर ग्राहकों को यही सिलेंडर ₹2,400 से ₹2,700 के बीच मिलने की बात सामने आई है। इस हिसाब से कुछ ग्राहकों को आधिकारिक कीमत की तुलना में ₹200 से ₹600 तक की बचत हो सकती है।

हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि तेल कंपनियों ने पूरे देश के लिए कमर्शियल LPG की कीमत में ऐसी कोई नई कटौती घोषित नहीं की है। कम कीमत पर सिलेंडर मिलने की खबर कुछ विशेष ग्रामीण बाजारों और एजेंसियों तक सीमित है।

आखिर कम दाम पर क्यों बिक रहा है कमर्शियल LPG?

ग्रामीण इलाकों में कई जगहों पर कमर्शियल गतिविधियां अपेक्षाकृत कम रहने से LPG की मांग भी कमजोर बताई जा रही है। ऐसे में कुछ गैस एजेंसियों के पास सामान्य से ज्यादा भरा हुआ स्टॉक बच सकता है। 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर का इस्तेमाल मुख्य रूप से रेस्टोरेंट, होटल, चाय-नाश्ते की दुकानों, मिठाई की दुकानों, ढाबों और कैटरिंग कारोबार में होता है। छोटे शहरों और ग्रामीण बाजारों में इन कारोबारों से मांग कम होने पर एजेंसियों के पास स्टॉक जमा हो सकता है। ऐसे में कुछ वितरक स्टॉक को तेजी से निकालने के लिए स्थानीय स्तर पर छूट दे सकते हैं।

घरेलू LPG सिलेंडर के दाम अलग

कमर्शियल सिलेंडर की कम कीमत को देखकर घरेलू LPG सिलेंडर के दाम भी कम होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। 14.2 किलो वाले घरेलू LPG सिलेंडर और 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर की कीमतें अलग होती हैं। कुशीनगर में घरेलू सिलेंडर की कीमत करीब ₹1,014 बताई गई है। जबकि कमर्शियल सिलेंडर का आधिकारिक रेट करीब ₹2,946 है। इसलिए कुशीनगर में ₹2,400 से ₹2,700 के बीच मिलने की खबर सिर्फ कमर्शियल 19 किलो LPG सिलेंडर से जुड़ी है।

ग्रामीण ग्राहकों के लिए LPG रिफिल बुकिंग में भी बदलाव

  • LPG की उपलब्धता में सुधार के बीच ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए रिफिल बुकिंग के नियम में भी बदलाव की जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण ग्राहक अब घरेलू LPG सिलेंडर की अगली रिफिल 25 दिन बाद बुक कर सकते हैं। जबकि पहले यह अंतराल 45 दिन था।
  • बताया गया है कि इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने ग्रामीण क्षेत्रों में इस संशोधित बुकिंग अवधि को अपनाया है। इस बदलाव का उद्देश्य ग्रामीण उपभोक्ताओं को शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध रिफिल चक्र के करीब लाना है। सप्लाई की स्थिति बेहतर होने और पुराने बैकलॉग में कमी आने के बाद बुकिंग अंतराल कम किया गया है।

छोटे कारोबारियों को मिल सकती है राहत

  • अगर किसी ग्रामीण बाजार में कमर्शियल LPG सिलेंडर आधिकारिक कीमत से ₹200 से ₹600 तक कम मिल रहा है, तो इसका सीधा फायदा छोटे कारोबारियों को हो सकता है। चाय की दुकान, ढाबा, मिठाई की दुकान, छोटा रेस्टोरेंट और कैटरिंग कारोबार जैसे व्यवसायों में LPG रोजमर्रा के संचालन का अहम खर्च होता है।
  • ऐसे में कम कीमत पर सिलेंडर मिलने से ईंधन लागत घट सकती है। हालांकि, यह फायदा हर जगह समान नहीं होगा। किसी एजेंसी पर मिलने वाली कीमत उसके स्टॉक, स्थानीय मांग और नई सप्लाई की स्थिति पर निर्भर कर सकती है।

दिल्ली-मुंबई समेत आज बड़े शहरों में कितना है सिलेंडर के दाम?

शहरघरेलू सिलेंडरकमर्शियल सिलेंडर
दिल्ली₹942₹2,747.50
मुंबई₹941.50₹2,701
कोलकाता₹968₹2,884
बेंगलुरु₹944.50₹2,831
हैदराबाद₹994₹2,996
चेन्नई₹957.50₹2,916.50
जयपुर₹945.50₹2,776
बीकानेर₹953.50₹2,798.50
रांची₹1,010.50₹2,925.50

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रिपोर्ट: ट्रम्प को भरोसा, जिनपिंग से अपनी बात मनवा लेंगे:चीनी राष्ट्रपति निजी रिश्तों से ज्यादा देशहित को देते हैं तरजीह

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प 24 सितंबर को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलेंगे। ट्रम्प को भरोसा है कि शी के साथ उनके अच्छे निजी रिश्ते बातचीत में अमेरिका के काम आएंगे। लेकिन द अटलांटिक की रिपोर्ट के मुताबिक, शी निजी रिश्तों से ज्यादा चीन के हित को महत्व देते हैं। पिछले दो साल में इसके दो उदाहरण भी सामने आए। दोनों मामलों में चीन के जवाब के बाद अमेरिका को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। पहला मामला: टैरिफ अप्रैल 2025 में ट्रम्प ने चीन से आने वाले सामान पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगा दिया। मकसद था चीन पर दबाव बनाना, ताकि वह अमेरिका की शर्तें मान ले। चीन ने भी अमेरिका के सामान पर जवाबी टैरिफ लगा दिए। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार पर असर पड़ने लगा। आखिरकार ट्रम्प को अपने लगाए कुछ टैरिफ कम करने पड़े। दूसरा मामला: रेयर अर्थ इसके बाद चीन ने रेयर अर्थ के निर्यात पर नए नियम लगा दिए। रेयर अर्थ ऐसी धातुएं हैं, जिनका इस्तेमाल मोबाइल, इलेक्ट्रिक गाड़ियों, इलेक्ट्रॉनिक्स और हथियारों में होता है। चीन इन धातुओं का बड़ा उत्पादक है। इसलिए उसके निर्यात पर रोक से अमेरिका की कई कंपनियों के लिए कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हो सकती थी। चीन के इस कदम के बाद अमेरिका ने भी चीन पर लगाए कुछ निर्यात प्रतिबंधों में ढील दे दी। दोनों की बातचीत में फर्क ट्रम्प को लगता है कि शी के साथ उनके अच्छे रिश्ते बातचीत में काम आएंगे। इसलिए पिछले एक साल में चीन से जुड़े कई बड़े मामलों में उन्होंने खुद शी से बात की। लेकिन शी के फैसलों में निजी रिश्तों का असर कम दिखाई देता है। उनका ध्यान चीन के लंबे समय के हितों पर रहता है। इसी फर्क को समझाने के लिए रिपोर्ट में शी के पुराने सहयोगी जनरल झांग यूशिया का उदाहरण दिया गया है। शी और झांग के परिवारों के रिश्ते कई दशक पुराने थे। दोनों के पिता चीन के गृहयुद्ध के दौरान साथ रहे थे। चार साल पहले शी ने झांग की रिटायरमेंट भी टाल दी थी। इसके बावजूद जनवरी में शी ने झांग को चीन के शीर्ष सैन्य पद से हटा दिया। उन्हें हटाने की असली वजह सार्वजनिक नहीं हुई। यह उदाहरण बताता है कि शी राजनीतिक फैसलों में पुराने निजी रिश्तों को भी प्राथमिकता नहीं देते। ट्रम्प जल्दी नतीजा चाहते हैं, शी इंतजार करते हैं ट्रम्प बातचीत में जल्दी दबाव बनाकर समझौता कराने की कोशिश करते हैं। शी का तरीका अलग है। वे लंबे समय तक इंतजार कर सकते हैं और सही समय आने पर दबाव बढ़ाते हैं। इसी वजह से दोनों नेताओं के बीच दोस्ताना बातचीत के बावजूद बड़े मुद्दों पर समझौता करना आसान नहीं रहा है। ट्रम्प एयरबेस जाकर जिनपिंग का स्वागत करेंगे ट्रम्प 24 सितंबर को सिर्फ जिनपिंग से मुलाकात ही नहीं करेंगे, बल्कि उनके वॉशिंगटन पहुंचने पर एंड्रयूज एयर फोर्स बेस जाकर खुद उनका स्वागत भी करेंगे। पोलिटिको के मुताबिक, ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में यह पहली बार होगा जब वे किसी विदेशी नेता का स्वागत करने एयरबेस जाएंगे। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, इसका मकसद जिनपिंग को सम्मान देना और बातचीत का माहौल बेहतर बनाना है। चीन के लिए भी यह खास संकेत है, क्योंकि इससे जिनपिंग को अमेरिकी राष्ट्रपति के बराबर सम्मान दिए जाने का संदेश जाता है। ट्रम्प इसके अलावा जिनपिंग के लिए स्टेट डिनर भी रख रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, राष्ट्रपति बनने के बाद यह ट्रम्प का सिर्फ दूसरा स्टेट डिनर होगा। इससे पहले उन्होंने ब्रिटेन के किंग चार्ल्स और क्वीन कैमिला के लिए ऐसा डिनर रखा था। मुलाकात में ये 5 मुद्दे अहम होंगे 1. ताइवान
चीन लगातार ताइवान को लेकर अमेरिका पर दबाव बनाता रहा है। जिनपिंग ने ट्रम्प से बातचीत में अमेरिकी हथियारों की बिक्री का मुद्दा भी उठाया है। ट्रम्प ने ताइवान के लिए आगे होने वाली करीब 14 अरब डॉलर की हथियार बिक्री को बातचीत में इस्तेमाल होने वाले कार्ड के तौर पर बताया था। 2. टैरिफ और व्यापार
अमेरिका-चीन के बीच टैरिफ, बाजार में पहुंच और व्यापार का संतुलन बड़ा मुद्दा रहेगा। दोनों देश तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन व्यापार से जुड़े मतभेद अभी खत्म नहीं हुए हैं। 3. ईरान और होर्मुज स्ट्रेट
ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट बंद होने का मुद्दा भी दोनों नेताओं की बातचीत में आया था। ट्रम्प ने कहा था कि जिनपिंग ईरान से स्ट्रेट खोलने के लिए कहने पर सहमत हुए थे। हालांकि, चीन ने ऐसा कोई भरोसा देने की पुष्टि नहीं की थी। 4. AI की होड़
अब अमेरिका-चीन की प्रतिस्पर्धा सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। दोनों देश एआई और एडवांस्ड चिप्स में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका चीन को अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर और चिप बनाने वाली तकनीक देने पर रोक लगा रहा है। 5. सोयाबीन और व्यापारिक समझौते
जिनपिंग के दौरे से पहले चीन ने अमेरिका से करीब 10 लाख टन सोयाबीन खरीदा है। इससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश का संकेत मिलता है। ——————– यह खबर भी पढ़ें… रिपोर्ट- ट्रम्प-जिनपिंग की मुलाकात से पहले ताइवान में डर ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की 24 सितंबर को होने वाली मुलाकात से पहले ताइवान में डर बढ़ गया है। ताइवान को आशंका है कि चीन के साथ कोई बड़ा आर्थिक समझौता करने के लिए ट्रम्प उसके मुद्दे पर नरम रुख अपना सकते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

गुजरात विधानसभा में अत्याधुनिक पोर्टेबल अस्पताल ‘BHISHM Cube-R300’ की प्रदर्शनी, महज 12 मिनट में होता है तैयार

गुजरात विधानसभा में अत्याधुनिक पोर्टेबल अस्पताल 'BHISHM Cube-R300' की प्रदर्शनी, महज 12 मिनट में होता है तैयार

BHISM Cube R 300

गुजरात विधानसभा परिसर में अत्याधुनिक पोर्टेबल इमरजेंसी मेडिकल अस्पताल 'BHISHM Cube-R300' की विशेष प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया है। यह पोर्टेबल यूनिट 12 मिनट में तैनात होकर 300 मरीजों का इलाज करने में सक्षम है। ALSO READ: भूपेंद्र पटेल सरकार का बड़ा फैसला: मूंगफली, मूंग, उड़द और सोयाबीन की MSP पर खरीद के लिए पंजीकरण

 

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने गुजरात विधानसभा परिसर में ‘BHISHM Cube-R300’ की विशेष प्रदर्शनी का शुभारंभ किया। भारत सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) के मार्गदर्शन में ‘आरोग्य मैत्री पहल’ के तहत यह अत्याधुनिक यूनिट तैयार की गई है, जो आपदा के समय चिकित्सा सेवाओं में क्रांति लाएगी।

महानुभावों की उपस्थिति और डॉक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन

इस भव्य अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष शंकरभाई चौधरी, उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी और स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानशेरिया सहित मंत्रिमंडल के सदस्य एवं विधायक विशेष रूप से उपस्थित रहे। सभी महानुभावों ने इस दो दिवसीय प्रदर्शनी के तहत ‘भीष्म क्यूब’ की कार्यप्रणाली को दर्शाने वाली विशेष डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी देखी।

 

12 मिनट में तैनाती और 300 मरीजों के इलाज की क्षमता

स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानशेरिया ने बताया कि इस पोर्टेबल अस्पताल को महज 12 मिनट से भी कम समय में किसी भी स्थान पर कार्यान्वित किया जा सकता है। इस सिंगल यूनिट द्वारा एक साथ लगभग 300 घायलों को आपातकालीन उपचार दिया जा सकता है। पूरी प्रणाली 72 मॉड्यूलर मिनी-क्यूब्स में विभाजित है, जिसमें प्रत्येक क्यूब का वजन 20 किलोग्राम से कम होने के कारण इसे लाना-ले जाना बेहद आसान है।

 

पूर्णतः अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और परिवहन क्षमता

इस अस्पताल में वेंटिलेटर, मल्टी-पैरामीटर मॉनिटर, मिनी-लैब, सर्जिकल उपकरण और ऑक्सीजन आपूर्ति सहित लगभग 400 चिकित्सा सामग्रियां उपलब्ध हैं। जमीन, हवाई या समुद्री मार्ग से कहीं भी भेजी जा सकने वाली यह प्रणाली स्वयं की बिजली उत्पादन क्षमता रखती है और दुर्गम क्षेत्रों में इसे विमान या हेलीकॉप्टर के माध्यम से एयरड्रॉप भी किया जा सकता है।

 

गुजरात के लिए महत्व और वैश्विक स्तर पर मानवीय सहायता

आपदा के जोखिमों और लंबे समुद्री तट वाले गुजरात के लिए इस अस्पताल की तैनाती राज्य की राहत एवं बचाव क्षमता को कई गुना बढ़ा देगी। इससे पहले भारत सरकार द्वारा इन क्यूब्स को यूक्रेन, मालदीव, जमैका और श्रीलंका जैसे देशों में मानवीय सहायता के रूप में भेजा जा चुका है। इस उद्घाटन समारोह में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी, GSDMA, SDRF के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे।

 

हमारे राज्य में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक मजबूत और त्वरित बनाने वाली इस अत्याधुनिक पोर्टेबल अस्पताल की पहल वास्तव में सराहनीय है। चिकित्सा क्षेत्र में तकनीक का यह समन्वय कठिन समय में कई नागरिकों की अमूल्य जान बचाने में मददगार साबित होगा।

 

भारत में एक दशक का सबसे असमान मानसून! CRISIL ने चेताया- फसलों की पैदावार, रबी बुआई पर भी खतरा

देश में इस साल मानसून की असमान चाल ने कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। हमारी सहयोगी सीएनबीसी टीवी 18 की एक रिपोर्ट में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि 2026 में भारत को पिछले एक दशक के सबसे अधिक असमान और विषमतापूर्ण मानसून का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मानसूनी बारिश में 14 प्रतिशत की कमी के बावजूद किसानों ने बुआई का रकबा घटने नहीं दिया लेकिन अब असली खतरा फसलों की पैदावार और आगामी रबी (सर्दियों की) फसल की बुआई पर मंडरा रहा है।

10 साल में सबसे असमान मानसून: बारिश में 14% की भारी कमी

क्रिसिल के रेनफॉल्स डिस्टॉर्शन इंडेक्स (RDI) के मुताबिक इस साल यह इंडेक्स 14.4 पर पहुंच गया है। ये बीते 10 वर्षों में मानसून की सबसे असमान चाल की ओर इशारा कर रहा है। 7 सितंबर तक देश में सामान्य के मुकाबले बारिश की कमी 14 प्रतिशत दर्ज की गई है। इसके अलावा सितंबर महीने में भी सामान्य से कम बारिश रहने का अनुमान है।

देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में बारिश की असमानता बेहद गंभीर रही है। दक्षिण प्रायद्वीप में सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसी तरह पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 24 प्रतिशत कम बारिश देखने को मिली है।

बुआई का रकबा तो बच गया पर कैसे?

रिपोर्ट के मुताबिक, बारिश की भारी कमी और देरी के बावजूद किसानों ने स्थानीय परिस्थितियों, रुक-रुक कर हुई बारिश और राज्य सरकारों की सलाह के मुताबिक अपनी बुआई योजनाओं में बदलाव किया है। 4 सितंबर तक कुल बुआई का स्तर सामान्य रकबे के 98 प्रतिशत और पिछले साल के स्तर के 96 प्रतिशत पर पहुंच गया है। चावल, तुअर (अरहर), मक्का, मूंगफली और गन्ना की बुआई सामान्य स्तर को पार कर चुकी है। कपास (कॉटन), बाजरा, ज्वार, मूंग, उड़द और सोयाबीन की बुआई का प्रदर्शन अभी भी कमजोर बना हुआ है।

जून के महीने में मूंगफली की बुआई पिछले साल से 42 प्रतिशत पीछे चल रही थी। लेकिन जुलाई और अगस्त में गुजरात में बारिश की स्थिति में हुए सुधार से इसका रकबा सुधरा और अंततः पिछले साल के आंकड़े को पार कर गया।

अब असली खतरा: फसलों की पैदावार पर संकट

क्रिसिल का कहना है कि फिलहाल कमजोर बारिश से पैदा होने वाले कृषि संकट की पहली कड़ी यानी कम बुआई तो टल गई है लेकिन अब सारा खतरा फसलों की पैदावार पर आ गया है। सीमित सिंचाई सुविधाओं वाली फसलें बारिश न होने पर सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। क्रिसिल के डेफिसिएंट रेनफॉल इम्पैक्ट पैरामीटर (DRIP) ने कपास, बाजरा, मक्का, तुअर, मूंगफली और सोयाबीन में बड़े जोखिम की ओर इशारा किया है।

इसे गुजरात की ही उदाहरण से समझा जा सकता है। यहां मूंगफली की बुआई तो अच्छी हुई है लेकिन 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक इसके कुल कृषि क्षेत्र का केवल 49.3 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है। अगस्त के अंत और सितंबर में बारिश सुस्त पड़ने से इस फसल की पैदावार पर असर पड़ सकता है। क्रिसिल के मुताबिक खरीफ फसलों से होने वाली किसानों की आय पर मध्यम असर पड़ेगा। हालांकि ग्रामीण मांग पर इसका तुरंत बड़ा झटका लगने की संभावना कम है।

क्या झटके को झेल पाएगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था?

रिपोर्ट के मुताबिक बीते वर्षों की तुलना में ग्रामीण भारत की स्थिति अब अधिक मजबूत हुई है। ग्रामीण परिवार अब सिर्फ फसल की आय पर निर्भर नहीं हैं। पशुपालन, मत्स्य पालन और वानिकी अब कृषि व संबद्ध क्षेत्र के कुल उत्पादन में 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान देते हैं। शुद्ध बोए गए क्षेत्र में सिंचाई का दायरा 2015-16 के 48.8 प्रतिशत के स्तर से बढ़कर 2024-25 में करीब 60 फीसदी हो गया है।

पिछले 4 वर्षों का बेहतर मानसून, अच्छा उत्पादन, कम महंगाई और सरकारी सहायता योजनाओं से ग्रामीणों की वित्तीय स्थिति सुधरी है। पीएम-किसानके तहत मिलने वाले 6000 रुपये, 17 राज्यों में जारी कैश-ट्रांसफर योजनाएं और खाद्यान्न सहायता इस दबाव को कम करने में मदद करेंगे।

रबी की फसल के लिए सबसे बड़ी चिंता क्यों?

दक्षिण-पश्चिम मानसून न सिर्फ खरीफ की फसल तय करता है, बल्कि यह मिट्टी की नमी, भूजल स्तर और जलाशयों को भरता है जो रबी (गेहूं, सरसों आदि) की बुआई के लिए बेहद जरूरी हैं। अब इससे जुड़े शुरुआती आंकड़े चिंता को और बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 7 सितंबर तक देश के करीब 45 फीसदी जिलों में बारिश की कमी दर्ज की गई है जबकि पिछले चार सालों में यह आंकड़ा 20-30 फीसदी के बीच था। अगस्त 1901 के बाद से इस साल का अगस्त महीना सबसे गर्म दर्ज किया गया और आईएमडी ने सितंबर में भी सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान जताया है।

आईआईटी गांधीनगर के कंबाइंड ड्रॉट इंडेक्स के मुताबिक देश में सूखा प्रभावित क्षेत्र जुलाई के अंत में 35.1 प्रतिशत से बढ़कर 2 सितंबर तक 42 प्रतिशत पर पहुंच गया है। 3 सितंबर तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण लॉन्ग-पीरियड एवरेज से 3 फीसदी और पिछले साल के मुकाबले 18 फीसदी कम था। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक जैसे प्रमुख रबी उत्पादक राज्यों में जलाशयों का स्तर विशेष रूप से कम है।

सितंबर महीना तय करेगा दिशा

रबी की फसल देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा होती है। इसमें अकेले गेहूं का योगदान रबी उत्पादन में करीब 70 फीसदी है। क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि अगर सितंबर में भी बारिश की कमी बनी रहती है और मौसम की यह विषमता सर्दियों के मौसम में फैलती है तो इसका दबाव ग्रामीण मांग, खाद्य पदार्थों की कीमतों और देश की कुल कृषि विकास दर पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

टेक दिग्गज अब ‘किसान’ बने; अमेरिका में कृषिभूमि की होड़:गेट्स-बेजोस 7 लाख एकड़ जमीन पर आलू-गाजर उगा रहे, जुकरबर्ग पाल रहे मवेशी

दुनिया के सबसे अमीर और टेक दिग्गजों में अब पशु-पालन और खेती का शौक बढ़ रहा है। अमेरिका में खेती की जमीन अब सिर्फ किसान की जरूरत नहीं, अरबपतियों के लिए बड़ा निवेश और शौक बन चुकी है। कोई यहां मवेशी पाल रहा है, तो कोई जमीन खरीदकर भविष्य ज्यादा सुरक्षित कर रहा है। मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग हवाई के काउआई द्वीप पर करीब 2,871 करोड़ रु. के 4,000 एकड़ कोउलाउ रेंच पर वाग्यू और एंगस नस्ल के मवेशी पाल रहे हैं। वहीं, रेडिट के सह-संस्थापक एलेक्सिस ओहानियन फ्लोरिडा में अपने फार्म पर केले के बाग और मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। हालांकि, इन दिग्गजों के खेती-बारी का नया शौक अमेरिका में कृषि जमीनों को एक बेहद महंगे ‘एसेट क्लास’ में बदल दिया है। ‘ द लैंड रिपोर्ट’ के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के पास 2.75 लाख एकड़ कृषि भूमि है, जिससे वे अमेरिका के 44वें सबसे बड़े भूस्वामी बन गए हैं। अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस 4.62 लाख एकड़ और वॉलमार्ट घराने से जुड़े स्टेन क्रोनके 27 लाख एकड़ जमीन के मालिक हैं। क्रोनके ने 2025 में न्यू मैक्सिको में 9.38 लाख एकड़ जमीन खरीदी, जिसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी रैंच बिक्री बताया गया। अलग-अलग राज्यों में इन जमीनों पर आलू, गाजर, प्याज, सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी फसलें उगाई जाती हैं। कुछ किसानों को लीज पर भी दी जाती है। पीपुल्स कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में कृषि भूमि 411 लाख करोड़ की परिसंपत्ति बन चुकी है। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक, बीते वर्ष खेतों के मूल्य में 4.3% की बढ़ोतरी हुई। नेशनल यंग फार्मर्स कोएलिशन की पॉलिसी निदेशक एरिन फॉस्टर के अनुसार, जमीन की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि पहली बार खेती में उतरने वाले युवा या छोटे किसान प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। जमीन में निवेश क्यों? महंगाई के साथ बढ़ती है कीमत महंगाई से सुरक्षित बचाव – सीमित प्राकृतिक संसाधन होने के कारण जमीन की कीमतें हमेशा महंगाई के साथ बढ़ती हैं। एआई और डेटा सेंटर्स की मांग – टेक कंपनियों (एआई हाइपरस्केलर्स) को विशाल डेटा सेंटर बनाने के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है। लाइफस्टाइल और नॉन-फाइनेंशियल फायदे – कोरोना महामारी के बाद बड़े परिसरों में शिकार, मछली पकड़ने और खुद का ऑर्गेनिक अन्न उगाने का रुझान बढ़ा है।

El Nino Impact: 2 दशकों में सबसे कमजोर मानसून का खतरा! अल नीनो ने बढ़ाई चिंता, जानिए अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर

El Nino Impact: भारत में इस साल करीब दो दशकों का सबसे कमजोर मानसून रह सकता है। मौसम विभाग के दो वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक, इस साल मानसून सीजन खत्म होने तक बारिश लंबी अवधि के औसत से करीब 15 फीसदी कम रहने का अनुमान है। अगर ऐसा होता है तो 2009 के बाद यह सबसे कम बारिश वाला मानसून होगा।

वहीं, कमजोर मानसून का सीधा असर देश की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फसलों की पैदावार घट सकती है, खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं और गांवों में लोगों की आमदनी पर भी दबाव पड़ सकता है। बता दें कि भारत में सालभर होने वाली कुल बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसून से ही मिलता है, इसलिए अच्छी बारिश खेती के लिए बेहद जरूरी है।

कपास-सोयाबीन की पैदावार पर पड़ेगा असर

अब अगर सितंबर के महत्वपूर्ण महीने में अच्छी बारिश नहीं हुई तो कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी ग्रीष्म ऋतु में बोई जाने वाली फसलों की पैदावार कम हो सकती है, साथ ही गेहूं और रेपसीड जैसी शीतकालीन ऋतु में बोई जाने वाली फसलों के लिए आवश्यक मिट्टी की नमी भी कम हो सकती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हम मानसून की बारिश पर अल नीनो का प्रभाव देख रहे हैं। सितंबर में यह प्रभाव गंभीर होने की संभावना है और बारिश में दो अंकों की कमी देखने को मिल सकती है।”

उन्होंने कहा कि जून-सितंबर के मौसम में भारत में औसत से 15% कम, यानी सामान्य से 85% कम बारिश हो सकती है, जो 2009 के बाद सबसे कम बारिश होगी। यह मौसम विभाग के शुरुआती पूर्वानुमान में अनुमानित 8% की कमी से लगभग दोगुनी होगी।

उन्होंने आगे कहा कि कुछ पूर्वी राज्यों को छोड़कर, देश के अधिकांश हिस्सों में सितंबर में औसत से कम बारिश होने की संभावना है, जिससे मौसमी कमी और बढ़ जाएगी।

हालांकि, IMD इस महीने के अंत तक सितंबर की बारिश को लेकर अपना आधिकारिक पूर्वानुमान जारी कर सकता है।

समय से पहले लौट सकता है मानसून

मौसम विभाग के एक अन्य सूत्र ने आधिकारिक नियमों के अनुसार नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यदि कोई नई मौसम प्रणाली विकसित नहीं होती है, तो इस साल मानसून अगले महीने देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से सामान्य से कुछ दिन पहले ही लौटना शुरू कर सकता है।

गौरतलब है कि आमतौर पर मानसून जून में दस्तक देता है और 17 सितंबर के आसपास उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से वापस लौटना शुरू करता है। इसके बाद अक्टूबर के मध्य तक पूरे देश से मानसून की विदाई हो जाती है।

उन्होंने बताया कि अल नीनो मजबूत हो रहा है और सितंबर में इसके और तीव्र होने की संभावना है, जिससे भारत में वर्षा कम हो सकती है।

अल नीनो क्या है?

अल नीनो एक जलवायु पैटर्न है जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म रहता है। यह वैश्विक मौसम पैटर्न को बाधित करता है और दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों में शुष्क परिस्थितियां ला सकता है।

पिछले वर्षों में भारत में अल नीनो वाले ज्यादातर सालों में सामान्य से कम बारिश हुई है। कई बार स्थिति इतनी गंभीर रही कि सूखे की वजह से फसलें बर्बाद हो गईं और सरकार को कुछ अनाज के निर्यात पर रोक या प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़े।

इस साल भी मानसून की शुरुआत से अब तक भारत में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश हुई है। 1 जून से शुरू हुए मानसून सीजन में जून में बारिश 35.4 फीसदी कम रही। इसके बाद जुलाई में बारिश सामान्य से 1 फीसदी ज्यादा हुई, जिससे थोड़ी राहत मिली। हालांकि अगस्त में मानसून एक बार फिर कमजोर पड़ गया और अब तक इस महीने में सामान्य से 15 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है।

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