Southwest monsoon: 12% कम बारिश के साथ पूरी तरह वापस लौटा दक्षिण पश्चिम मॉनसून, 21 अक्टूबर तक उत्तर पूर्व मॉनसून फिर लाएगा बारिश

Southwest monsoon: भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने गुरुवार को कहा कि देश से दक्षिण पश्चिम मॉनसून पूरी तरह वापस चला गया है। मौसम एजेंसी ने इसी दिन दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में उत्तर पूर्वी मॉनसून के आने का भी ऐलान किया। आईएमडी के मुताबिक, उत्तर पूर्व मॉनसून की वजह से तमिलनाडु, पुडुचेरी, कराईकल, कोस्टल आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, साउथ अंदरूनी कर्नाटक, केरल और माहे में बारिश हुई।

उत्तर पूर्व मॉनसून के आने के बाद 21 अक्टूबर तक दक्षिण प्रायद्वीप भारत के कई हिस्सों में भारी बारिश के साथ बारिश का अनुमान है। भारत में दो बड़े मॉनसून सिस्टम होते हैं, जून से सितंबर तक दक्षिण पश्चिम मॉनसून और अक्टूबर से दिसंबर तक उत्तर पूर्व मॉनसून रहता है, जिसे रिट्रीटिंग मॉनसून भी कहा जाता है।

दक्षिण पश्चिम मॉनसून को भारत की खेती और अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी माना जाता है क्योंकि यह सीधे खरीफ फसल के मौसम को प्रभावित करता है। वहीं, उत्तर पूर्व मॉनसून कम आक्रामक होता है, लेकिन यह रबी फसल की पैदावार को सहयोग करने में, खासकर दक्षिण के राज्यों में, एक अहम रोल निभाता है।

आईएमडी ने कहा कि इस साल दक्षिण पश्चिम मॉनसून 759.4 mm बारिश के साथ खत्म हुआ, जो सामान्य औसत 868.6 mm से 12.6% कम था। एजेंसी ने बारिश में कमी के लिए ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर में मौजूदा एल नीनो परिस्थिति को जिम्मेदार बताया। यह जून में सामने आया था और लगातार मजबूत होता जा रहा है।

एल नीनो मौसम का एक पैटर्न है जो पैसिफिक रीजन में समुद्र के तापमान और वातावरण परिस्थितियों में बदलाव से जुड़ा है। यह आमतौर पर भारत में मॉनसून की बारिश को कम करता है, जबकि इसका उल्टा फेज, ला नीना, अक्सर दुनिया का तापमान ठंडा करता है और बारिश के पैटर्न पर असर डाल सकता है।

वर्ल्ड मेटियोरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन (WMO) समेत वैश्विक मौसम एजेंसियों ने अनुमान लगाया है कि मौजूदा एल नीनो प्रभाव दिसंबर 2026 में शिखर पर हो सकता है। यह 1950 में ऑब्जर्वेशन शुरू होने के बाद से अब तक का सबसे मजबूत रिकॉर्ड बन सकता है। ये हालात फरवरी 2027 तक जारी रहने की उम्मीद है।

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76 साल में सबसे ज्यादा गर्म हुआ प्रशांत महासागर:सुपर अल नीनो से धरती पूरी लाल; 4.5 लाख मौतों की वजह बन सकता है

दुनिया इस समय बेहद ताकतवर अल नीनो का सामना कर रही है। प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र का तापमान सामान्य से 3.4°C ज्यादा पहुंच गया है। यह 1950 के बाद का सबसे मजबूत अल नीनो बताया जा रहा है। मौसम विशेषज्ञ इसे ‘सुपर-डुपर अल नीनो’ कह रहे हैं। इससे दुनिया के कई हिस्सों में ज्यादा गर्मी, सूखा या भारी बारिश हो सकती है। शिकागो यूनिवर्सिटी के क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस अल नीनो से जून 2026 से फरवरी 2027 के बीच दुनियाभर में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। ज्यादा गर्मी से हीट स्ट्रोक और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। वहीं बारिश का पैटर्न बिगड़ने से कहीं पानी की कमी तो कहीं बाढ़ जैसी स्थिति बन सकती है। नक्शे में धरती का ज्यादातर हिस्सा लाल दिखा मौसम विज्ञानी रयान माउ ने पूरी दुनिया का एक जलवायु नक्शा सोशल मीडिया पर शेयर किया है। इसमें धरती का बड़ा हिस्सा लाल रंग में दिखाई दे रहा है, जो सामान्य से ज्यादा गर्म परिस्थितियों को दिखाता है। माउ के मुताबिक, अल नीनो सर्दियों में भी ‘अधिकतम ताकत’ के साथ बना रह सकता है। उन्होंने इसके फरवरी 2027 तक जारी रहने के WMO के अनुमान से भी सहमति जताई है। WMO ने जलवायु परिवर्तन को लेकर चेताया संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के मुताबिक, 2026 के आखिरी महीनों में दुनिया के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ऊपर रहने की बहुत ज्यादा संभावना है। जलवायु वैज्ञानिक जीक हाउसफादर ने कहा कि इस साल का अल नीनो ऐसे स्तर की ओर बढ़ रहा है, जो पहले दर्ज नहीं किया गया। वहीं मौसम विशेषज्ञ लियोन सिमंस ने इसे ‘सुपर-डुपर अल नीनो’ कहा है। अल नीनो क्या है अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) दुनिया के मौसम को प्रभावित करने वाला प्राकृतिक जलवायु चक्र है। अल नीनो इसका गर्म चरण है। इसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इस बदलाव का असर प्रशांत क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तापमान और बारिश का पैटर्न बदल सकता है। कहीं सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है। अल नीनो आमतौर पर 2 से 7 साल के अंतराल पर आता है। ————————- ये खबर भी पढ़ें… लखनऊ के मॉल में पानी घुसा, फर्रुखाबाद में ओले गिरे:यूपी के 42 जिलों में बारिश का अलर्ट; छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बिजली गिरने से 3 मौतें उत्तराखंड, हिमाचल, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ और झारखंड के आसपास बने ऊपरी हवा के साइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण कई क्षेत्रों में बनी ट्रफ के कारण मौसम एक बार फिर बदल गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

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बंगाल की खाड़ी में बना रहा ‘अर्नब’ चक्रवात? ओडिशा, आंध्र प्रदेश और बंगाल में भारी बारिश-तूफान का खतरा, IMD ने जारी किया रेड अलर्ट

Cyclone Arnab: बंगाल की खाड़ी के ऊपर बना मौसम सिस्टम जल्द ही तटीय इलाकों में अपना असर दिखा सकता है। IMD के मुताबिक, यह सिस्टम लगातार पश्चिम-उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसके जल्द ही और मजबूत होने की संभावना है। इसके बाद यह डीप डिप्रेशन (गहरा दबाव) में बदल सकता है और आंध्र प्रदेश-ओडिशा तट को पार कर सकता है।

इससे पहले सोमवार को मौसम विभाग ने बताया था कि पश्चिम-मध्य और उससे सटे उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के ऊपर बना डिप्रेशन ‘डीप डिप्रेशन’ में बदल सकता है।

IMD ने कहा, “पश्चिम-मध्य और उससे सटे उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के ऊपर बना डिप्रेशन पिछले 6 घंटों में 18 किमी/घंटा की रफ्तार से पश्चिम की ओर बढ़ा और आज, 22 सितंबर 2026 को सुबह 8:30 बजे (IST) उसी इलाके में 17.9°N अक्षांश और 86.0°E देशांतर के पास केंद्रित था। यह गोपालपुर (ओडिशा) से लगभग 200 किमी दक्षिण-पूर्व, कलिंगपटनम (आंध्र प्रदेश) से 200 किमी पूर्व-दक्षिण-पूर्व, पुरी (ओडिशा) से 210 किमी दक्षिण और विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) से 290 किमी पूर्व में स्थित था।”

IMD ने आगे कहा, “इसके अगले 12 घंटों के दौरान पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने और पश्चिम-मध्य व उससे सटे उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी के ऊपर एक गहरे डिप्रेशन (deep depression) में बदलने की बहुत संभावना है।” साथ ही, यह भी बताया गया कि इस सिस्टम के पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ते रहने का अनुमान है।

मौसम विभाग ने कहा कि इस सिस्टम के बुधवार रात और गुरुवार तड़के विशाखापत्तनम और गोपालपुर के बीच उत्तरी आंध्र प्रदेश-दक्षिणी ओडिशा तटों को ‘डीप डिप्रेशन’ के रूप में पार करने की संभावना है।

इसका नाम ‘अर्नब’ कब रखा जाएगा?

उत्तरी हिंद महासागर में चक्रवाती तूफानों के नामों की सूची के अनुसार, इस क्षेत्र में बनने वाले अगले चक्रवात का नाम ‘अर्नब’ रखा जाएगा।

‘अर्नब’ का मतलब बंगाली भाषा में ‘समुद्र’ होता है। यह नाम बांग्लादेश ने दिया है। यह नाम विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ओर से तैयार की गई क्षेत्रीय उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की नामकरण सूची में शामिल है।

आंध्र प्रदेश में रेड अलर्ट

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम और विजयनगरम के लिए रेड अलर्ट जारी किया गया है। 22-23 सितंबर को इन दोनों जिलों और पार्वतीपुरम मन्यम में कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा बारिश होने की संभावना है।

इसके अलावा, अल्लूरी सीताराम राजू, अनाकापल्ली और विशाखापत्तनम जिलों में भी भारी से बहुत भारी बारिश होने की उम्मीद है, जबकि कई अन्य जिलों में मध्यम से भारी बारिश हो सकती है।

23 और 24 सितंबर को श्रीकाकुलम, विजयनगरम, पार्वतीपुरम मान्यम और अल्लूरी सीताराम राजू में कुछ जगहों पर बेहद भारी बारिश हो सकती है। वहीं, अनकापल्ली, विशाखापत्तनम, काकीनाडा, ईस्ट गोदावरी और एलुरु में भारी से बहुत भारी बारिश होने की उम्मीद है।

मौसम विभाग ने जारी की एडवाइजरी

मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि भारी बारिश के कारण कई जगहों पर जलभराव और ट्रैफिक जाम की समस्या हो सकती है। सड़कें फिसलन भरी हो सकती हैं। इसके अलावा पेड़ और बिजली के खंभे गिरने, बिजली-पानी की सप्लाई प्रभावित होने और नालियों के जाम होने का खतरा भी है। कुछ जगहों पर जलाशयों या बांधों के टूटने की आशंका भी जताई गई है।

प्रशासन ने लोगों को बेवजह बाहर निकलने से बचने की सलाह दी है। साथ ही सड़क, रेल और हवाई यातायात को जरूरत के हिसाब से नियंत्रित करने के निर्देश दिए गए हैं। राहत और बचाव दलों के साथ बिजली और पानी विभागों को भी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने को कहा गया है।

यह मौसम संबंधी एडवाइजरी 22 सितंबर 2026 को दोपहर 1 बजे जारी की गई।

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जापान बैकअप कैपिटल बनाने की तैयारी में, क्या भारत में भी दूसरी राजधानी की जरूरत है, दिल्ली के अलावा कौन से ऑप्शन चर्चा में रहे?

Japan second capital: जापान एक बड़े भूकंप जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा के दौरान सरकारी कामकाज को बिना किसी रुकावट के जारी रखने के लिए एक बैकअप राजधानी बनाने पर विचार कर रहा है। इसके बाद भारत में भी एक पुरानी बहस फिर से छिड़ गई है कि क्या भारत को भी अपनी एक दूसरी राजधानी की जरूरत है? जापान में जहां यह चर्चा पूरी तरह से आपदा प्रबंधन और आपदा की स्थिति से निपटने की तैयारियों पर केंद्रित है। वहीं भारत में दूसरी राजधानी की मांग ऐतिहासिक रूप से क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमती रही है।

यह विचार भारत के लिए नया नहीं है। संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ. बी.आर अंबेडकर से लेकर विभिन्न राजनीतिक नेताओं ने समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया है। उनका तर्क रहा है कि भारत का शासन आज भी काफी हद तक नई दिल्ली में ही केंद्रित है।

डॉ. बीआर. अंबेडकर चाहते थे हैदराबाद बने भारत की दूसरी राजधानी

भारत में दूसरी राजधानी के पक्ष में सबसे शुरुआती और मजबूत तर्कों में से एक डॉ बीआर अंबेडकर का था। अपनी 1955 में प्रकाशित पुस्तक थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स में उन्होंने तर्क दिया था कि नई दिल्ली भारत की एकमात्र राजधानी के लिए आदर्श जगह नहीं है। अंबेडकर ने तीन प्रमुख चिंताओं की ओर इशारा किया था।

पहली ये कि दिल्ली दक्षिण भारत से काफी दूर है, जिससे दक्षिण के नागरिकों और अधिकारियों को यहां आने-जाने में भारी असुविधा होती है। दूसरा दिल्ली की भीषण गर्मी और अत्यधिक ठंड इसे एक आरामदायक प्रशासनिक केंद्र नहीं बनने देती। अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि दिल्ली की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से निकटता युद्ध के समय इसे बेहद संवेदनशील और असुरक्षित बनाती है।

इसके विकल्प के रूप में उन्होंने हैदराबाद को देश की दूसरी राजधानी बनाने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने हैदराबाद को एक केंद्रीय रूप से स्थित और कॉस्मोपॉलिटन शहर बताया, जो उत्तर और दक्षिण भारत के बीच एक स्थायी संतुलन स्थापित कर सकता है।

बेंगलुरु प्रस्ताव ने फिर ताजा की थी बहस

दूसरी राजधानी का यह मुद्दा साल 2018 में तब फिर से चर्चा में आया जब कर्नाटक के तत्कालिक आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी के रूप में मान्यता देने की मांग की।

इस प्रस्ताव में तर्क दिया गया था कि भारत के टेक्नोलॉजी हब के रूप में बेंगलुरु की स्थिति, वहां का अनुकूल मौसम और मजबूत आर्थिक आधार इसे दक्षिण भारत में एक आदर्श प्रशासनिक केंद्र बनाते हैं। समर्थकों का यह भी मानना था कि इस कदम से देश के शासन ढांचे में दक्षिणी राज्यों का एकीकरण और मजबूत होगा।

दुनिया के कई देशों में हैं एक से अधिक राजधानियां

अगर भारत अपनी प्रशासनिक संस्थाओं को अलग-अलग शहरों में बांटता है तो ऐसा करने वाला वह पहला देश नहीं होगा। दुनिया के कई देशों ने अपनी सरकारी शक्तियों को विभिन्न शहरों में बांट कर रखा हुआ है। दक्षिण अफ्रीका यह मल्टी-कैपिटल मॉडल का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। यहां प्रिटोरिया में कार्यपालिका, केप टाउनमें संसद और ब्लोएमफोनटेन में न्यायपालिका है। इसी तरह मलेशिया ने अपने प्रशासनिक कार्यालयों को पुत्राजया में ट्रांसफर कर दिया है जबकि संसद कुआलालंपुर से ही चलती है।

श्रीलंका की संसद श्री जयवर्धनेपुरा कोट्टे में बैठती है जबकि कोलंबो इसका वाणिज्यिक केंद्र और कई सरकारी संस्थानों का मुख्यालय बना हुआ है। नीदरलैंड एम्स्टर्डम को अपनी संवैधानिक राजधानी मानता है, लेकिन सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट द हेग में स्थित हैं। बोलीविया की भी दो राजधानियां हैं, जहां ला पाज प्रशासनिक राजधानी है और सुक्रे संवैधानिक राजधानी व न्यायपालिका का केंद्र है।

जापान का प्रस्ताव भारत की बहस से अलग क्यों है?

जापान का बैकअप कैपिटल का प्रस्ताव भारत में चल रही दूसरी राजधानी की बहस से एक बड़े मायने में अलग है। टोक्यो जापान की मुख्य राजधानी बना रहेगा। जापानी सरकार केवल एक आपातकालीन प्रशासनिक केंद्र की संभावनाओं की स्टडी कर रही है ताकि अगर कोई भीषण भूकंप या बड़ी आपदा राजधानी टोक्यो को प्रभावित करती है तो वहां से देश का शासन निर्बाध रूप से चलता रहे। जापान का मुख्य उद्देश्य सरकार का निरंतर संचालन है, न कि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व।

क्या भारत को वास्तव में दूसरी राजधानी की जरूरत है?

हालांकि समय-समय पर दूसरी राजधानी का विचार उभरता रहा है, लेकिन दिल्ली में किए गए भारी निवेश (जैसे सेंट्रल विस्टा का पुनर्विकास) को देखते हुए एक नई दूसरी राजधानी बनाना फिलहाल व्यावहारिक नजर नहीं आता। इसके बजाय विशेषज्ञों ने कुछ अधिक व्यावहारिक विकल्प सुझाए हैं। महाराष्ट्र विधानसभा के नागपुर में होने वाले शीतकालीन सत्र की तर्ज पर, हर साल संसद का कम से कम एक सत्र दक्षिण भारत के किसी शहर में आयोजित किया जा सकता है।

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एक्सपर्ट्स के मुताबिक न्याय तक आम जनता की पहुंच आसान बनाने के लिए चेन्नई, मुंबई और कोलकाता जैसे प्रमुख शहरों में सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं। फिलहाल नई दिल्ली ही भारत की एकमात्र राजधानी बनी हुई है। लेकिन जैसे-जैसे दुनिया भर के देश अपने शासन को अधिक लचीला, सुरक्षित और सुलभ बनाने के रास्ते तलाश रहे हैं, भारत में भी कुछ संस्थानों के विकेंद्रीकरण का सवाल समय-समय पर उठता रहेगा।

El Nino Counter: अल-नीनो के खतरे के बीच आई बड़ी खुशखबरी! पॉजिटिव IOD लाएगा झमाझम बारिश, WMO की रिपोर्ट में दावा

India Mansoon Update: मानसून सत्र के दौरान जहां अल-नीनो के असर से सामान्य से कम बारिश का खतरा मंडरा रहा है। वहीं इस बीच एक बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पॉजिटिव इंडियन ओशन डिपोल (Positive IOD) बनने की संभावना जताई गई है। यह पॉजिटिव IOD अल-नीनो के निगेटिव इंपैक्ट को आंशिक रूप से बेअसर कर सकता है, जिससे देश भर में बारिश की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है।

क्या है अल-नीनो और पॉजिटिव IOD? समझिए मौसम का गणित

मौसम के इस चक्र और मानसून पर इसके प्रभाव को समझने के लिए दोनों स्थितियों का अंतर जानना जरूरी है। अल-नीनो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की सतह के पानी के गर्म होने का एक जलवायवीय पैटर्न है। भारत में इसका सीधा संबंध कमजोर मानसून और भीषण गर्मी से होता है। पॉजिटिव IOD उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर (Indian Ocean) के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों की समुद्री सतह के तापमान का अंतर है। जब पॉजिटिव IOD बनता है तो इससे मानसून की हवाएं मजबूत होती हैं जो देश में बेहतर और झमाझम बारिश में मदद करती हैं।

दक्षिण भारत को राहत की उम्मीद, 22% की कमी होगी पूरी

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमान से उन इलाकों को सबसे ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद है जहां अब तक बारिश की कमी रही है। 1 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बारिश की 22% कमी दर्ज की गई है। अब पॉजिटिव IOD के सक्रिय होने से न सिर्फ दक्षिण भारत, बल्कि देश के कई अन्य हिस्सों में भी मानसूनी बारिश की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है।

सुपर अल-नीनो जैसी कोई आधिकारिक कैटिगरी नहीं: सरकार

उधर पिछले दिनों केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में अल-नीनो से जुड़े भ्रम को दूर करते हुए स्थिति स्पष्ट की। डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि WMO या पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत आने वाले भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा आधिकारिक तौर पर सुपर अल-नीनो नाम की कोई कैटिगरी परिभाषित नहीं है। भूमध्यरेखीय मध्य प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान की विसंगतियों के आधार पर अल-नीनो घटनाओं को कमजोर, मध्यम, मजबूत या बहुत मजबूत श्रेणियों में बांटा जाता है।

जून में कमजोर, जुलाई में मध्यम हुआ अल-नीनो: IMD का अपडेट

राज्यसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून सीजन के दौरान अल-नीनो स्थितियां विकसित होने की भविष्यवाणी की थी। जून 2026 के दौरान अल-नीनो की स्थिति कमजोर थी, जो जुलाई 2026 में बढ़कर मध्यम स्तर तक पहुंच गई।

अक्टूबर से दिसंबर 2026 के सीजन के दौरान अल-नीनो के और मजबूत होने की संभावना है और यह बहुत मजबूत श्रेणी तक पहुंच सकता है। भारत पर इसका सटीक असर सिर्फ अल-नीनो ही नहीं बल्कि महासागर और वायुमंडल के संयुक्त संबंधों के क्रमिक विकास पर निर्भर करता है।

IMD जारी कर रहा है नियमित चेतावनियां और आईबीएफ रिपोर्ट

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अल-नीनो और अन्य जलवायु घटकों की लगातार निगरानी कर रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ दूसरे स्टेकहोल्डर्स को नियमित रूप से मौसमी, मासिक और विस्तारित सीमा के पूर्वानुमान जारी किए जा रहे हैं।

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इसके अतिरिक्त, आपदा प्रबंधन अधिकारियों, राज्य सरकारों और जिला प्रशासनों की तैयारियों व त्वरित प्रतिक्रिया में सहायता के लिए IMD दैनिक आधार पर अगले 7 दिनों के लिए प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान और जोखिम-आधारित चेतावनियां दी जा रही हैं।

IMD की चेतावनी- अल-नीनो की वजह से अगस्त-सितंबर में बारिश को लेकर आया नया अनुमान, मौसम विभाग ने कही चिंता वाली बात

El Nino impact: दक्षिण-पश्चिम मानसून के दूसरे चरण यानी अगस्त और सितंबर महीने को लेकर भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक चिंताजनक पूर्वानुमान जारी किया है। मौसम विभाग ने बताया है कि अल-नीनो के मजबूत होने की वजह से देश में मानसून के दूसरे छमाही के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। मौसम विभाग ने अगस्त 2026 के लिए बारिश और तापमान के डिटेल अनुमान के साथ-साथ प्रशांत महासागर और हिंद महासागर की मौसमी स्थितियों पर भी अपनी रिपोर्ट साझा की है।

अगस्त-सितंबर में सामान्य से कम बारिश का अनुमान

IMD के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 के दूसरे चरण (अगस्त-सितंबर) के दौरान देश भर में कुल वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94 प्रतिशत से कम यानी सामान्य से कम रहने की संभावना है। इसी दौरान देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होगी।वैसे प्रायद्वीपीय भारत कुछ हिस्सों, मध्य भारत, उत्तर-पश्चिम भारत के उत्तरी क्षेत्रों और पूर्व व पूर्वोत्तर भारत के कुछ इलाकों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की जा सकती है।

अगस्त महीने में कैसा रहेगा बारिश का हाल?

अगस्त 2026 के लिए विशेष रूप से जारी पूर्वानुमान में IMD ने बताया कि इस महीने भी देश भर में कुल बारिश दीर्घकालिक औसत (LPA) के 94 प्रतिशत से कम यानी सामान्य से कम रहने की उम्मीद है। देश के बड़े हिस्से में सूखा या कम बारिश का सामना करना पड़ सकता है। इस महीने में भी पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कई क्षेत्रों, उत्तर-पश्चिम व मध्य भारत के कुछ हिस्सों और पूर्व व पूर्वोत्तर भारत के अलग-अलग इलाकों में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक बारिश होने का अनुमान जताया गया है।

अगस्त में तापमान का पूर्वानुमान: बढ़ेगी गर्मी और उमस

बारिश में कमी के साथ-साथ अगस्त महीने में देश के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहने वाला है। अगस्त 2026 के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में मासिक औसत अधिकतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। सिर्फ उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कुछ क्षेत्रों और उससे सटे दक्षिणी प्रायद्वीप के छिटपुट इलाकों में औसत अधिकतम तापमान सामान्य या सामान्य से कम रह सकता है। देश के अधिकांश हिस्सों में रात और सुबह का मासिक औसत न्यूनतम तापमान भी सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक दर्ज किए जाने की उम्मीद है।

अल-नीनो बना बड़ी चिंता, इसके और मजबूत होने के संकेत

मौसम विभाग ने मानसून के दूसरे चरण में बारिश की कमी की मुख्य वजह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में बने अल-नीनो असर को बताया है। अभी मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है। ऐसे में मॉडरेट अल-नीनो देखने को मिल रहा है। मानसून मिशन कपल्ड फॉरकास्ट सिस्टम (MMCFS) के पूर्वानुमान के मुताबिक दक्षिण-पश्चिम मानसून के बाकी सीजन के दौरान अल-नीनो की यह स्थिति और अधिक मजबूत होने की आशंका है, जो मानसूनी हवाओं और बारिश को प्रभावित कर सकती है।

हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) की क्या है स्थिति?

अभी हिंद महासागर में न्यूट्रल इंडियन ओशिनिक डिपोल (IOD) की स्थिति बनी हुई है। MMCFS के मॉडल संकेत देते हैं कि मानसून सीजन के बाकी बचे समय में यह तटस्थ स्थिति जारी रह सकती है। कुछ अंतरराष्ट्रीय पूर्वानुमान केंद्रों के जलवायु अनुमानों से संकेत मिलता है कि सितंबर 2026 के दौरान पॉजिटिव आईओडी स्थितियां भी बन सकती हैं। ये मानसून के लिए कुछ हद तक राहतकारी साबित हो सकती हैं।

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