Gold Price Today: सोना हुआ और सस्ता, नवरात्रि के 7वें दिन नीचे आया भाव; 10 बड़े शहरों में इतना है रेट

देश में सोने की कीमत और नीचे आ गई है। 17 अक्टूबर की सुबह राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 147580 रुपये प्रति 10 ग्राम पर है। मुंबई में भाव 147430 रुपये प्रति 10 ग्राम है। हाजिर बाजार में इस सप्ताह सोने की कीमतों में 4,500 रुपये या 3 प्रतिशत की गिरावट आई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,165.12 डॉलर प्रति औंस पर है। इस सप्ताह सोने का वैश्विक भाव ​0.7 प्रतिशत कमजोर हुआ। सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 147580 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 135290 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 135140 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 147430 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 147430 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 135140 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 147430 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 135140 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली135290147580
मुंबई135140147430
अहमदाबाद135190147480
चेन्नई135140147430
कोलकाता135140147430
हैदराबाद135140147430
जयपुर135290147580
भोपाल135190147480
लखनऊ135290147580
चंडीगढ़135290147580

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चांदी की कीमत

दूसरी कीमती धातु चांदी में भी गिरावट कायम है। 17 अक्टूबर की सुबह चांदी 229900 रुपये प्रति किलोग्राम पर है। हाजिर बाजार में इस सप्ताह चांदी के दाम में 13,500 रुपये या 6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 57.05 डॉलर प्रति औंस है।

सोने का आयात लगातार दूसरे महीने घटा

भारत में सोने के आयात में लगातार दूसरे महीने गिरावट दर्ज की गई है। सितंबर में सोने का आयात 81.27 प्रतिशत घटकर 1.8 अरब डॉलर का रह गया। कीमती धातुओं पर सीमा शुल्क में भारी बढ़ोतरी के कारण आयात में यह गिरावट आई। चांदी का आयात भी सितंबर में लगातार दूसरे महीने घटा। यह 49.11 प्रतिशत गिरकर 66.50 करोड़ डॉलर का रह गया। सरकार ने 13 मई 2026 से सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है। अप्रैल-सितंबर 2026 की अवधि के दौरान सोने का आयात 27.32 प्रतिशत घटकर 19.27 अरब डॉलर रह गया। वहीं, चांदी का आयात 25.17 प्रतिशत गिरकर 2.4 अरब डॉलर का रह गया।

यूरोप ने रूस से 30 लाख करोड़ का तेल-गैस खरीदा:इस साल भी इम्पोर्ट जारी, 2025 में भारत की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे

रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव बनाने वाला यूरोप खुद भी उससे बड़े पैमाने पर तेल-गैस खरीद रहा है। 2022 से अब तक यूरोपीय देशों ने रूस से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने जुलाई 2025 में गुजरात स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे, जिसमें रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी रही है। 2026 के शुरुआती नौ महीनों में भी करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए की खरीद हुई। रूस के मुताबिक, जिन रास्तों से रूसी ऊर्जा खरीदने की छूट है, उनके जरिए यूरोप को तेल और गैस की सप्लाई जारी है। रूस से ईंधन छूट के नियम अलग-अलग यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। वहीं, भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त आयात शुल्क लगा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत पर दबाव और यूरोपीय देशों को मिली छूट के नियम अलग-अलग क्यों हैं। भास्कर एनालिसिस: खरीद रोकने से यूरोप को मंहगाई का डर तेल-गैस महंगी हो सकती है यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप में गैस और बिजली की कीमतें बढ़ी थीं। रिपोर्ट में गैस की कीमतों में 46% और बिजली की कीमतों में 21% तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है। रूस से सप्लाई पूरी तरह बंद होने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इससे आम लोगों के बिल और कंपनियों की लागत बढ़ने का डर है। 2026 में भी रूस से गैस खरीद बढ़ी यूरोपीय संघ की ऊर्जा नियामक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मई 2026 के बीच यूरोप में रूस से पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस की खरीद पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 7% बढ़ी। रूस से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की खरीद भी 11% बढ़ी। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद यूरोप की रूस पर ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरे देशों से गैस खरीदना भी आसान नहीं यूरोप अमेरिका और दूसरे देशों से भी गैस खरीदता है। लेकिन दूसरे देशों से गैस मंगाने के लिए अलग इंतजाम और खर्च की जरूरत होती है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भी ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में रूस से खरीद तुरंत बंद करना यूरोप के लिए आसान नहीं है। पहले से हुए समझौते भी बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों ने रूस के साथ लंबे समय के लिए गैस खरीदने के समझौते कर रखे हैं। यूरोप की ऊर्जा नियामक एजेंसी के मुताबिक, रूसी एलएनजी खरीदने के लिए कुछ कंपनियों के सालाना 20 से 32 अरब घनमीटर तक के अनुबंध हैं। इन समझौतों और दूसरी जगह से गैस लाने के इंतजाम में समय लगने के कारण आयात बंद करना मुश्किल है। रूस की एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार EU है ऊर्जा पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस से होने वाले एलएनजी निर्यात में यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 49% थी। चीन की हिस्सेदारी 24% रही। पाइपलाइन के जरिए भेजी जाने वाली रूसी गैस में भी यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 32% थी। चीन की हिस्सेदारी 31% और तुर्किये की 29% रही। यानी रूस से गैस खरीदने में यूरोप अब भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से एलएनजी खरीदने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन समेत नीदरलैंड्स भी शामिल है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई: रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

यूरोप ने रूस से 30 लाख करोड़ का तेल-गैस खरीदा:इस साल भी इम्पोर्ट जारी, 2025 में भारत की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे

रूस से तेल खरीदने पर भारत पर दबाव बनाने वाला यूरोप खुद भी उससे बड़े पैमाने पर तेल-गैस खरीद रहा है। 2022 से अब तक यूरोपीय देशों ने रूस से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ ने जुलाई 2025 में गुजरात स्थित नायरा एनर्जी की रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए थे, जिसमें रूस की तेल कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी रही है। 2026 के शुरुआती नौ महीनों में भी करीब 2.03 लाख करोड़ रुपए की खरीद हुई। रूस के मुताबिक, जिन रास्तों से रूसी ऊर्जा खरीदने की छूट है, उनके जरिए यूरोप को तेल और गैस की सप्लाई जारी है। रूस से ईंधन छूट के नियम अलग-अलग यूरोप के सभी देशों की स्थिति एक जैसी नहीं है। वहीं, भारत की रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिकी प्रशासन अतिरिक्त आयात शुल्क लगा चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत पर दबाव और यूरोपीय देशों को मिली छूट के नियम अलग-अलग क्यों हैं। भास्कर एनालिसिस: खरीद रोकने से यूरोप को मंहगाई का डर तेल-गैस महंगी हो सकती है यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप में गैस और बिजली की कीमतें बढ़ी थीं। रिपोर्ट में गैस की कीमतों में 46% और बिजली की कीमतों में 21% तक बढ़ोतरी का दावा किया गया है। रूस से सप्लाई पूरी तरह बंद होने पर कीमतें फिर बढ़ सकती हैं। इससे आम लोगों के बिल और कंपनियों की लागत बढ़ने का डर है। 2026 में भी रूस से गैस खरीद बढ़ी यूरोपीय संघ की ऊर्जा नियामक एजेंसी के आंकड़ों के मुताबिक, जनवरी से मई 2026 के बीच यूरोप में रूस से पाइपलाइन के जरिए आने वाली गैस की खरीद पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 7% बढ़ी। रूस से तरल प्राकृतिक गैस यानी एलएनजी की खरीद भी 11% बढ़ी। इससे पता चलता है कि प्रतिबंधों के बावजूद यूरोप की रूस पर ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरे देशों से गैस खरीदना भी आसान नहीं यूरोप अमेरिका और दूसरे देशों से भी गैस खरीदता है। लेकिन दूसरे देशों से गैस मंगाने के लिए अलग इंतजाम और खर्च की जरूरत होती है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से भी ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है। ऐसे में रूस से खरीद तुरंत बंद करना यूरोप के लिए आसान नहीं है। पहले से हुए समझौते भी बड़ी वजह यूरोपीय कंपनियों ने रूस के साथ लंबे समय के लिए गैस खरीदने के समझौते कर रखे हैं। यूरोप की ऊर्जा नियामक एजेंसी के मुताबिक, रूसी एलएनजी खरीदने के लिए कुछ कंपनियों के सालाना 20 से 32 अरब घनमीटर तक के अनुबंध हैं। इन समझौतों और दूसरी जगह से गैस लाने के इंतजाम में समय लगने के कारण आयात बंद करना मुश्किल है। रूस की एलएनजी का सबसे बड़ा खरीदार EU है ऊर्जा पर नजर रखने वाली संस्था सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के मुताबिक, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस से होने वाले एलएनजी निर्यात में यूरोपीय संघ (EU) की हिस्सेदारी 49% थी। चीन की हिस्सेदारी 24% रही। पाइपलाइन के जरिए भेजी जाने वाली रूसी गैस में भी यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 32% थी। चीन की हिस्सेदारी 31% और तुर्किये की 29% रही। यानी रूस से गैस खरीदने में यूरोप अब भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से एलएनजी खरीदने वाले प्रमुख यूरोपीय देशों में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन समेत नीदरलैंड्स भी शामिल है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… मस्क ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड घटाई: रूस के खिलाफ सेना के ऑपरेशन पर असर अमेरिकी अरबपति इलॉन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने यूक्रेन में स्टारलिंक इंटरनेट की स्पीड पर लिमिट लगा दी है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के सलाहकार सेरही बेस्क्रेस्टनोव ने बुधवार को बताया कि इस फैसले से रूस के खिलाफ लड़ रही यूक्रेनी सेना के कई ऑपरेशन पर असर पड़ा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Gold Silver Outlook: शॉर्ट टर्म में इस कारण अहम रहेगी सोने-चांदी चाल, एक्सपर्ट्स से जानिए क्या त्योहारों में बढ़ेंगे दाम

Gold Silver Outlook: सोने और चांदी की कीमतों में 13 अक्टूबर को स्थिरता देखने को मिली। अमेरिका के महंगाई के अहम आंकड़ों से पहले अमेरिकी डॉलर, ब्याज दरों की उम्मीदों और कच्चे तेल की कीमतों पर बाजार की नजर है। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर, दिसंबर के सोने के वायदा (futures) का भाव ₹1.49 लाख प्रति 10 ग्राम था, जिसमें 0.01% की गिरावट आई। दिसंबर डिलीवरी के लिए चांदी के वायदा का कारोबार ₹2.22 लाख प्रति किलोग्राम पर हुआ, जिसमें 0.05% की गिरावट देखी गई।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, सोने और चांदी की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया है क्योंकि बाज़ार अमेरिकी ब्याज दरों के भविष्य पर फिर से विचार कर रहे हैं। हालांकि ब्याज दरों में तुरंत बढ़ोतरी की उम्मीदें कम होने से बुलियन (सोने-चांदी) को सहारा मिल सकता है, लेकिन बॉन्ड यील्ड का बढ़ना और डॉलर का मजबूत होना अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।

लेमन (Lemonn) में रिसर्च हेड गौरव गर्ग ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में सोने और चांदी की कीमतों में बढ़त हो रही है, हालांकि मजबूत अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता आगे की बढ़त को सीमित कर सकती है।

उन्होंने कहा कि निवेशक महंगाई और फेड के अगले नीतिगत कदमों के बारे में नए संकेतों के लिए अमेरिका के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) और प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) के आंकड़ों का इंतज़ार कर रहे हैं।

कीमतों में उतार-चढ़ाव क्यों?

सोने और चांदी से कोई ब्याज आय नहीं मिलती है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है या बाज़ार को उम्मीद होती है कि ब्याज दरें ऊंची बनी रहेंगी, तो निवेशक ब्याज देने वाली संपत्तियों को ज़्यादा आकर्षक मान सकते हैं, जिससे बुलियन की कीमतों पर दबाव पड़ता है। इसके विपरीत, डॉलर का कमजोर होना और ब्याज दरों के कम रहने की उम्मीदें कीमती धातुओं को सहारा दे सकती हैं।

वेंचुरा (Ventura) में कमोडिटी हेड एन एस रामास्वामी ने कहा कि सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, क्योंकि कमजोर पेरोल आंकड़ों के बाद बाज़ार में अक्टूबर में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की उम्मीदें कम हो गई हैं। उन्होंने कहा कि साल के आखिर में और 2027 की पहली छमाही में ऊंची ब्याज दरों की उम्मीदें कीमतों पर असर डाल सकती हैं।

जियोपॉलिटिकल तनाव भी ऊर्जा की कीमतों पर असर डालकर बुलियन को प्रभावित कर रहे हैं। रामास्वामी ने कहा कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतें महंगाई की चिंताओं और ऊंची ब्याज दरों की उम्मीदों को और बढ़ा सकती हैं, जिससे सोने के लिए निकट भविष्य में चुनौतीपूर्ण माहौल बन सकता है। ब्रिकवर्क रेटिंग्स में रिसर्च हेड, राजीव शरण ने कहा कि सोने की कीमतों पर सिर्फ़ जियोपॉलिटिकल घटनाओं के बजाय कच्चे तेल और अमेरिकी ब्याज दरों में बदलाव का ज़्यादा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि कीमतों में और गिरावट आने पर त्योहारों के मौसम से पहले खरीदारी बढ़ सकती है।

निवेशकों को आगे किस चीज़ पर नजर रखनी चाहिए?

अमेरिकी महंगाई के आंकड़े बुलियन (सोने-चांदी) की कीमतों के लिए निकट भविष्य में एक अहम कारक हैं। उम्मीद से ज़्यादा महंगाई से ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीदें मज़बूत हो सकती हैं, जबकि कम महंगाई के आंकड़े मॉनेटरी टाइटनिंग (मौद्रिक सख्ती) की चिंताओं को कम करके कीमतों को सहारा दे सकते हैं।

Giottus.com के CEO विक्रम सुब्बुराज ने कहा कि सोने और चांदी के लिए निकट भविष्य का आउटलुक सतर्कता वाला बना हुआ है। उन्होंने अमेरिकी डॉलर, बॉन्ड यील्ड और महंगाई के आंकड़ों को नज़र रखने के लिए अहम कारक बताया। साथ ही, उन्होंने कहा कि करेंसी में उतार-चढ़ाव भी घरेलू बुलियन की कीमतों पर असर डालते हैं क्योंकि भारत अपना ज़्यादातर सोना और चांदी आयात करता है।

भारतीय खरीदारों के लिए, कमज़ोर रुपया आयातित बुलियन को महंगा बना सकता है, भले ही अंतरराष्ट्रीय कीमतें स्थिर हों या गिर रही हों। घरेलू कीमतें आयात शुल्क और स्थानीय मांग से भी प्रभावित होती हैं।

क्या त्योहारों का मौसम सोने को मिलेगा सहारा

धनतेरस और दिवाली से पहले गहनों की खरीदारी से घरेलू सोने की मांग को सहारा मिल सकता है, हालांकि रिटेल खरीदारी से कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी हो ज़रूरी नहीं है।

रामास्वामी को उम्मीद है कि दिवाली से पहले सोना ₹1.50 लाख से ₹1.65 लाख प्रति 10 ग्राम के दायरे में ट्रेड करेगा, और त्योहारों की मांग के पीक समय के बाद इसमें कंसोलिडेशन (स्थिरता) हो सकता है। यह बाज़ार का एक अनुमानित आउटलुक है, न कि कीमतों की गारंटी वाली रेंज।

VT मार्केट्स के प्रिंसिपल एनालिस्ट डैनियल मुंडे ने कहा कि गोल्ड एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स (ETFs) में साप्ताहिक निवेश से पता चलता है कि कुछ निवेशक कीमतों में गिरावट का इस्तेमाल अपनी पोजीशन बनाने और अनिश्चितता से बचाव (हेजिंग) के लिए कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि महंगाई के मज़बूत आंकड़े और ब्याज दरें बढ़ने की नई उम्मीदें रिकवरी को धीमा कर सकती हैं।

निवेशकों के लिए, शॉर्ट-टर्म रिबाउंड (अल्पकालिक उछाल) और दिशा में लगातार बदलाव के बीच का अंतर समझना ज़रूरी है। डॉलर, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, महंगाई के आंकड़े, कच्चा तेल और निवेश का प्रवाह यह तय करने में मदद करेंगे कि सोना और चांदी रिकवर कर सकते हैं या दबाव में रहेंगे।

 

Gold- Silver price: सोना ₹1.50 लाख के नीचे, चांदी हुई सस्ती, अब क्या होनी चाहिए निवेश रणनीति

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

मार्केट लाल, Sensex डे-हाई से टूट गया 750 प्वाइंट्स, Nifty आया 22400 के नीचे

Share Market Crash: 25 साल में लगातार आठ हफ्ते की सबसे लंबी गिरावट के बाद इस हफ्ते की शुरुआत सेंसेक्स और निफ्टी ने मजबूत की लेकिन फिर ये ढह गई। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि फिलहाल भारत और अमेरिका के बीच कारोबारी सौदे को लेकर बातचीत फिलहाल स्थिर हो गई है। इससे मार्केट को शॉक लगा और सेंसेक्स डे-हाई से 750 प्वाइंट्स से अधिक टूट गया तो निफ्टी भी फिसलकर 22400 के नीचे के आ गया।

शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 722.23 प्वाइंट्स चढ़कर 72,631.93 तक पहुंचा था, जिससे फिर यह 791.75 प्वाइंट्स टूटकर 71,840.18 और निफ्टी 199.85 प्वाइंट्स उछलकर 22,621.80 तक पहुंचा था, जिससे फिर यह 224.70 प्वाइंट्स गिरकर 22,397.10 तक आ गया।

क्या है वित्त मंत्री ने? 

मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक नई दिल्ली में एक इवेंट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि ट्रेड डील को लेकर भारत और अमेरिका के बीच बातचीत अभी भी चल रही है लेकिन दोनों पक्षों ने एक-दूसरे से काफी बातचीत और समझौते के बाद ऐसी स्थिति हासिल कर ली है, जहां आगे कुछ देना या लेना दोनों के लिए बहुत मुश्किल हो सकता है। उन्होंने कहा कि अगर दोनों पक्षों के लिए आगे बढ़ने की कोई गुंजाइश बची है, तो वे उसका इस्तेमाल जरूर करेंगे। उन्होंने कहा कि फिलहाल दोनों देशों के लिए अब आगे और समझौता करना बहुत ही ज्यादा मुश्किल होगा। इस पर मार्केट धड़ाम हो गया। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच ट्रेड बैलेंस अभी भारत के पक्ष में है अमेरिका का भारत के साथ व्यापार घाटा है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच सौदे को लेकर बातचीत अभी चल रही है।

वित्त मंत्री ने दिया चीन का उदाहरण

भारत के साथ सौदे को लेकर अमेरिका चाहता है कि दोनों देशों के बीच ट्रेड इनबैलेंस यानी कारोबारी अंसतुलन कम हो यानी कि भारत अधिक से अधिक चीजें अमेरिका से खरीदे। वित्त मंत्री ने चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत और चीन के बीच भी ऐसा ही असंतुलन है और 2014 के बाद से व्यापार घाटा लगातार बहुत तेजी से बढ़ा है लेकिन केवल व्यापार घाटे को कम करना ही अगर किसी समझौते की मुख्य शर्त बन जाए, तो सवाल यह है कि बातचीत के जरिए इसे किस हद तक कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि पहले कारोबारी बातचीत का उद्देश्य यह होता था कि दोनों देश अपनी समस्याएं और असमानताएं सामने रखते थे और फिर बातचीत के जरिए समाधान निकालते थे लेकिन अब व्यापार असंतुलन को दूर करने के लिए दूसरे तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पहले ऐसी बातचीत में किसी देश को अपने बाजार में कुछ चीजों की पहुंच बढ़ानी होती थी तो बदले में वह दूसरे देश की कुछ चीजों को अपने यहां अधिक पहुंच देता था यानी दोनों तरफ से कुछ देना और कुछ लेना होता था लेकिन अब टैरिफ बड़ा हथियार बन गया है। वित्त मंत्री ने कहा कि पहले टैरिफ यानी आयात शुल्क का इस्तेमाल कारोबारी बातचीत के दौरान एक ढांचे के तहत होता था लेकिन अब इसे दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

क्या कहना है अमेरिका का

भारत के साथ कारोबारी सौदे को लेकर अमेरिका के ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमीसन ग्रीर (Jamieson Greer) का कहना है कि ट्रंप सरकार इसे लेकर आखिरी दौर में है लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह समझौता जल्द होने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि G20 की बैठक के दौरान भारत के कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल के साथ अच्छी बातचीत हुई। ग्रीर के मुताबिक भारत और अमेरिका के बीच जिन मुद्दों को लेकर मतभेद है, उसकी पहचान कर ली गई है और अब उन्हें सुलझाने के लिए काम किया जा रहा है।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

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रूस पर ट्रंप का शिकंजा, 100% टैरिफ वाले बिल पर किया साइन, जानें भारत और चीन पर कैसे पड़ेगा असर

Russia Sanctions Bill: भारत और चीन जैसे देशों के लिए एक बड़ी और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले नए कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस बिल से उन्हें उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं।

Lindsey O. Graham Sanctioning Russia and Iran Act of 2026 के तहत रूस के एनर्जी सेक्टर, सीनियर अधिकारियों, वित्तीय संस्थानों और उन टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, जिन्हें पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इन टैंकरों को आमतौर पर ‘शैडो फ्लीट’ कहा जाता है।

भारत-चीन पर कैसे पड़ेगा असर?

बुधवार को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने यह कानून 262-159 के अंतर से पास कर दिया। इससे पहले इस बिल को सीनेट से मंजूरी मिल चुकी थी। नए कानून के तहत रूस से तेल या गैस खरीदने वाले पांच सबसे बड़े खरीदार देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत या चीन पर तुरंत 100% टैरिफ लगा दिया जाएगा। टैरिफ लगाना है या नहीं और अगर लगाना है तो किस दर पर, इसका फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, इस कानून का मकसद एनर्जी एक्सपोर्ट से मॉस्को की कमाई कम करना और यूक्रेन युद्ध को लेकर उस पर दबाव बढ़ाना है।

कब लागू हो सकता है टैरिफ?

यह कानून राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के 30 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा। इसके तहत, उन देशों से आयातित सामान पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाना जरूरी है, जो कानून बनने से पहले के 12 महीनों में कुल मात्रा के हिसाब से रूसी कच्चे तेल या प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच खरीदार रहे हों। अगर किसी देश का रूसी गैस आयात, लागू अवधि के दौरान रूस के कुल निर्यात का 15 प्रतिशत से कम रहा हो और उसने उस आयात को कम करने के लिए “महत्वपूर्ण कदम” उठाए हों, तो उसे गैस से जुड़े शुल्कों से छूट मिलती है।

भारत ने रिश्तों पर असर पड़ने की चेतावनी दी

भारत ने वॉशिंगटन को पहले ही चेतावनी दे दी है कि नए कदमों से दोनों देशों के रिश्तों पर असर पड़ सकता है। नई दिल्ली ने कहा है कि वह एनर्जी सिक्योरिटी के लिए प्रतिबद्ध है और मार्केट की स्थितियों के आधार पर अलग-अलग सप्लायर्स से तेल खरीदना जारी रखेगी।

बता दें कि भारत, रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में से एक है। जबकि चीन भी एक बड़ा खरीदार है, इसलिए नए कानून के तहत दोनों देशों पर असर पड़ सकता है।

वहीं, इस कानून से ट्रंप को टैरिफ के बारे में बड़े फैसले लेने की छूट मिलती है और कुछ खास स्थितियों में छूट देने का भी प्रावधान है।

भारत के लिए यह कानून ऐसे समय में आया है, जब नई दिल्ली, रूस से तेल खरीदने को लेकर वॉशिंगटन के बढ़ते दबाव और अपनी एनर्जी की जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

शी जिनपिंग के दौरे से बढ़ सकती है टेंशन

सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप के इस कदम से ठीक पहले, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग 24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति से बातचीत के लिए वॉशिंगटन आने वाले हैं।

यह बैठक एक दशक में शी की पहली व्हाइट हाउस यात्रा होगी और इस साल दोनों नेताओं के बीच आमने-सामने की दूसरी मुलाकात होगी। इससे पहले उनकी मुलाकात मई में बीजिंग में हुई थी।

इस बैठक में व्यापार एक अहम मुद्दा हो सकता है। इसके अलावा ताइवान को लेकर तनाव, ईरान युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अमेरिका-चीन के बीच टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर बनी अस्थायी शांति को आगे बढ़ाने की कोशिशों पर भी चर्चा हो सकती है।

गौरतलब है कि रूस पर लगाए गए नए प्रतिबंधों वाला कानून दोनों देशों के बीच दबाव का एक और मुद्दा बन सकता है, क्योंकि चीन रूस से ऊर्जा खरीदने वाले दुनिया के सबसे बड़े देशों में शामिल है।

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अमेरिका को छोड़कर कनाडा अब यूरोप के साथ आएगा:यूरोपीय संघ का पहला एसोसिएट मेंबर बनेगा, ब्रिटेन-यूक्रेन के साथ मिलकर सुरक्षा मजबूत करेगा

अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच कनाडा अब यूरोप के करीब जाने की तैयारी में है। वह यूरोपीय संघ (EU) का पहला ‘एसोसिएट मेंबर’ बनने जा रहा है। एसोसिएट मेंबर के तौर पर कनाडा यूरोपीय संघ के 27 देशों में शामिल नहीं होगा और उसे वोटिंग का अधिकार भी नहीं मिलेगा, लेकिन रक्षा, AI, टेक्नोलॉजी, ऊर्जा, जरूरी खनिज और व्यापार जैसे मामलों में यूरोपीय संघ के साथ उसका सहयोग बढ़ेगा। इसके साथ ही कनाडा ब्रिटेन और यूक्रेन जैसे यूरोपीय संघ से बाहर के देशों के साथ यूरोप की सुरक्षा मजबूत करने के लिए एक नई सिक्योरिटी काउंसिल में भी शामिल हो सकता है। कनाडा के प्रधानमंत्री ने यूरोपीय संघ के साथ जुड़ने की इच्छा जताई थी

यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने बुधवार को कहा कि यूरोपीय संघ कनाडा के लिए अपने दरवाजे खोलना चाहता है। इस दौरान कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी भी मौजूद थे। कार्नी ने पिछले हफ्ते यूरोपीय संघ के साथ एक ‘गठबंधन’ बनाने की इच्छा जताई थी। कनाडा के लिए यूरोपीय संघ को नई व्यवस्था बनानी पड़ेगी यूरोपीय संघ के नियमों में अभी ‘एसोसिएट मेंबर’ जैसी कोई सदस्यता नहीं है। इसलिए अगर कनाडा को यह दर्जा देना है, तो यूरोपीय संघ को इसके लिए नए नियम बनाने होंगे और सदस्य देशों की सहमति लेनी होगी। इस तरह का विचार पहली बार इस साल जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने यूक्रेन के लिए रखा था। लेकिन यूक्रेन ने इसमें ज्यादा रुचि नहीं दिखाई, क्योंकि वह यूरोपीय संघ का पूरा सदस्य बनना चाहता है। उस योजना के तहत यूक्रेन को यूरोपीय संघ की बैठकों में हिस्सा लेने और कुछ संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का मौका मिल सकता था। उसे यूरोपीय संघ की कुछ योजनाओं और फंड का लाभ भी मिलता, लेकिन अन्य सदस्य देशों की तरह फैसलों पर वोट देने का अधिकार नहीं होता। यूरोपीय संघ और कनाडा के बीच व्यापार बढ़ा अमेरिका की ओर से लगाए गए टैरिफ और चीन से बढ़ती कारोबारी चुनौती के बीच यूरोपीय संघ और कनाडा पहले से ही एक-दूसरे के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। दोनों के बीच CETA नाम का व्यापार समझौता है, जिससे ज्यादातर सामानों पर लगने वाला आयात शुल्क खत्म हो चुका है। इसका असर यह हुआ कि 2016 के बाद से EU और कनाडा के बीच कारोबार 80% से ज्यादा बढ़ गया। इस साल कनाडा यूरोप के एक बड़े रक्षा फंड से जुड़ने वाला पहला गैर-यूरोपीय देश भी बना है। वॉन डेर लेयेन ने कहा कि दुनिया में ताकत सिर्फ बड़े या अमीर देशों के पास नहीं होनी चाहिए। लोकतांत्रिक देशों को यह हक होना चाहिए कि वे अपनी पसंद के साझेदार चुन सकें। उन्होंने कहा कि इसी सोच के तहत यूरोप और कनाडा अपने रिश्ते और मजबूत कर रहे हैं। अमेरिका और कनाडा के बीच ट्रेड वॉर जारी अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार विवाद करीब 18 महीने से जारी है। जुलाई में ट्रम्प ने कनाडा पर अमेरिकी उद्योगों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया था। इसके बाद ट्रम्प ने एक पुराने कानून का इस्तेमाल करते हुए चुनिंदा कनाडाई सामान पर 50% तक टैरिफ लगाने का फैसला किया। इसके बाद कनाडा ने कई अमेरिकी सामान पर 50% तक जवाबी टैरिफ लागू किया था। इसके पहले दोनों देशों के बीच कई महीनों तक बातचीत चली, लेकिन 21 अगस्त में यह बातचीत टूट गई। इसके बाद दोनों के बीच टैरिफ वॉर शुरू हो गई। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका का कनाडा के डेयरी प्रोडक्ट और शराब पर बैन: मोटरसाइकिलों पर भी रोक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा से आने वाले डेयरी प्रोडक्ट, शराब और मोटरसाइकिलों पर रोक लगाने का फैसला किया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Gold Price: 2026 के अंत तक कहां पहुंच सकता है सोना? Goldman Sachs ने $4900 का टारगेट दिया

Gold Price: सोने की कीमत में हाल के दिनों में काफी उतार-चढ़ाव आया है। इस हफ्ते की शुरुआत में गोल्ड तीन महीने के ऊपरी स्तर पर पहुंच गया था। लेकिन इसके बाद तेज बिकवाली हुई। शुक्रवार को कीमत 3% से ज्यादा टूट गई।

अब सवाल है कि आगे सोना किस दिशा में जाएगा। Goldman Sachs का अनुमान है कि 2026 के अंत तक सोने की कीमत 4,900 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस तक पहुंच सकती है। यह मौजूदा करीब 4,550 डॉलर के स्तर से लगभग 8% ज्यादा है।

भारत में कितना महंगा हो सकता है सोना

भारत में सोने की मौजूदा कीमत ₹1.56 लाख प्रति 10 ग्राम के आसपास है। अंतरराष्ट्रीय कीमत में Goldman Sachs के अनुमान के मुताबिक करीब 8% बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में घरेलू कीमत भी मोटे तौर पर ₹1.69 लाख प्रति 10 ग्राम तक पहुंच सकती है।

हालांकि, भारत में सोने की कीमत सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार से तय नहीं होती। डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल, आयात शुल्क और टैक्स भी भाव को प्रभावित करेंगे।

केंद्रीय बैंकों की खरीद बड़ा सपोर्ट

Goldman Sachs को सोने की कीमत में आगे भी मजबूती की उम्मीद है। इसकी सबसे बड़ी वजह केंद्रीय बैंकों की खरीदारी है। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। Goldman Sachs Research के मुताबिक, केंद्रीय बैंक इस साल हर महीने औसतन 50 टन सोना खरीद सकते हैं। 2022 से पहले यह औसत सिर्फ 17 टन प्रति माह था।

जून 2026 में खरीदारी और तेज हुई। तीन महीने के सीजनली एडजस्टेड आधार पर यह आंकड़ा 100 टन प्रति माह तक पहुंच गया। इससे पहले यह 66 टन था। जून में चीन का केंद्रीय बैंक सबसे बड़ा पहचाना जा सकने वाला खरीदार रहा।

2026 में काफी उतार-चढ़ाव आया

इस साल सोने की चाल काफी उतार-चढ़ाव वाली रही है। 29 जनवरी को गोल्ड 5,600 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। जुलाई के मध्य में यह 4,000 डॉलर से नीचे फिसल गया।

हालांकि, जुलाई के निचले स्तर से सोना करीब 15% चढ़ चुका है। Goldman Sachs को बाकी बचे साल में भी तेजी की उम्मीद है।

ब्याज दरें तय करेंगी आगे की चाल

सोने की कीमत पर ब्याज दरों का बड़ा असर पड़ता है। ब्याज दरें बढ़ने की आशंका से सोने पर दबाव बनता है। यही वजह है कि अमेरिकी फेड प्रमुख केविन वॉर्श के बयान के बाद गोल्ड में तेज गिरावट आई।

Goldman Sachs का मानना है कि आगे फेड से जुड़ा दबाव कम हो सकता है। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि महंगाई में नरमी आने पर फेड इस साल ब्याज दरों को स्थिर रख सकता है। ऐसा हुआ तो सोने को सपोर्ट मिल सकता है।

Gold Price Today: ₹2890 सस्ता हुआ सात दिनों में गोल्ड; दिल्ली-मुंबई नहीं,10 शहरों में 18 कैरट वाला सबसे महंगा बिक रहा यहां

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सोना सस्ता होने वाला है! 15% से घटकर 6% हो सकती है इंपोर्ट ड्यूटी, जानिए कितनी गिरेंगी कीमतें

Gold Import Duty Cut Impact: भारतीय सर्राफा बाजार और सोना खरीदने वालों के लिए बड़ी खबर है। सरकार सोने पर लगने वाली कस्टम इंपोर्ट ड्यूटी को 15% से घटाकर 6% करने पर विचार कर रही है। अगर यह फैसला लागू होता है, तो देश में सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।

गौरतलब है कि मई 2026 में सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को देखते हुए सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15% कर दिया था। स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट के विश्लेषकों के अनुसार, इस ड्यूटी में कटौती का सीधा असर घरेलू बाजार में सोने के भाव, तस्करी और आगामी त्योहारी-शादियों के सीजन में ज्वेलरी की मांग पर पड़ेगा।

15% से 6% ड्यूटी हुई तो कितनी गिरेंगी कीमतें?

भारत अपनी सोने की जरूरतों को पूरा करने के लिए सालाना 700 से 800 टन सोना विदेशों से आयात करता है। जब इंपोर्ट ड्यूटी 15% होती है, तो यह घरेलू बाजार में सोने के लिए एक न्यूनतम मूल्य तय कर देती है।

अगर ड्यूटी 9% घटकर 6% पर आती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार और भारतीय बाजार के बीच का अंतर काफी कम हो जाएगा। इससे स्थानीय सर्राफा बाजारों में सोने के लैंडेड कॉस्ट में सीधी कमी आएगी, जिसका फायदा सीधे रिटेल खरीदारों को मिलेगा।

दिल्ली में 24 कैरेट सोने की मौजूदा कीमत ₹1,63,890 प्रति 10 ग्राम पर अगर इंपोर्ट ड्यूटी 15% से घटकर 6% यानी 9% की सीधी कटौती होती है, तो इसके भाव में सीधे ₹14,750 की बड़ी गिरावट आएगी और यह घटकर लगभग ₹1,49,140 प्रति 10 ग्राम पर आ जाएगा। वहीं 22 कैरेट सोने का भाव ₹1,50,240 प्रति 10 ग्राम से ₹13,522 सस्ता होकर करीब ₹1,36,718 प्रति 10 ग्राम हो जाएगा।

(नोट: यह कटौती केवल सोने की बेस कीमत पर आधारित है, ज्वैलरी के कुल बिल में 3% जीएसटी और मेकिंग चार्ज के हिसाब से अतिरिक्त राहत भी मिलेगी।)

तस्करी पर लगेगी लगाम, वैध मार्केट को बढ़ावा

स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट की रिपोर्ट के अनुसार, हाई इंपोर्ट ड्यूटी (15%) का सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इससे सोने की तस्करी और अवैध रास्तों से आने वाले सोने को बढ़ावा मिलता है। ड्यूटी 6% होने से वैध तरीके से आयात किए गए सोने और अवैध सोने के बीच का रेट गैप खत्म हो जाएगा। इससे बुलियन ट्रेडर्स और ज्वेलर्स औपचारिक चैनलों के जरिए सोना खरीदने के लिए प्रोत्साहित होंगे, जिससे सरकार के राजस्व संग्रह में भी सुधार होगा।

शादियों के सीजन में ज्वेलरी डिमांड में आएगा उछाल

भारतीय संस्कृति में शादी-ब्याह और त्योहारों के दौरान सोने की खरीदारी सबसे ज्यादा होती है। सोने के दाम घटने से मध्यम वर्गीय परिवारों और रिटेल खरीदारों का बजट सुधरेगा, जिससे ज्वेलरी की मांग में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

सर्राफा कारोबारी और रिटेल ज्वेलर्स नई आयात लागत के हिसाब से अपने मेकिंग चार्जेस और फाइनल रिटेल प्राइस में तेजी से बदलाव करेंगे। विशेषकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में इसका असर सबसे तेज दिखेगा।

निवेशकों के लिए क्या है सलाह?

स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट के अनुसार, सोने में निवेश करने वाले रिटेल निवेशकों और ट्रेडर्स को इस नीतिगत बदलाव पर नजर रखनी चाहिए:

फिजिकल गोल्ड बनाम Gold ETF: ड्यूटी घटने से फिजिकल गोल्ड के प्रीमियम में कमी आएगी, जिससे Gold ETFs और गोल्ड फंड्स में निवेश करना अधिक फायदेमंद और सुरक्षित विकल्प बन सकता है।

ज्वेलरी और माइंडिंग स्टॉक्स: सोने के दाम घटने और बिक्री बढ़ने से प्रमुख ज्वेलरी कंपनियों और गोल्ड-लिंक्ड शेयरों के मार्जिन और प्रदर्शन में सुधार हो सकता है।

सरकार की ओर से आधिकारिक ऐलान होते ही सर्राफा बाजार में सोने की नई दरें लागू हो जाएंगी। अगर आप त्योहारी सीजन या शादियों के लिए सोने की खरीदारी या गोल्ड ETF में निवेश की योजना बना रहे हैं, तो ड्यूटी में संभावित कटौती के इस फैसले पर करीबी नजर बनाए रखना समझदारी होगी।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।