Bihar: प्रशांत किशोर की राजनीति के मुरीद हुए चिराग पासवान! शराबबंदी पर सरकार को घेरा

केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने शनिवार को जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की राजनीति का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि किशोर धर्म और जाति के आधार पर लोगों को जोड़ने की कोशिश करने के बजाय विकास की बात करते हैं, इसलिए वह उनकी राजनीति से सहमत हैं। चिराग पासवान ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपनी पार्टी के कार्यालय में तिरंगा फहराया। इसके बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रशांत किशोर को लेकर अपनी राय रखी।

PK की राजनीति को चिराग का समर्थन!

इससे एक दिन पहले चिराग पासवान ने बिहार में लागू शराबबंदी कानून पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि मौजूदा रूप में यह कानून अपने मकसद को पूरा करने में सफल नहीं रहा है और इसकी समीक्षा की जरूरत है। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि शराबबंदी कानून राज्य में अवैध शराब के कारोबार को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। उन्होंने इसी वजह से कानून की समीक्षा किए जाने की बात कही।

शराबबंदी पर सरकार को घेरा

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने कहा, “शराबबंदी लागू होने के बाद भी शराब की खरीद-बिक्री और बनाने की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं। इनमें नकली शराब के मामले भी शामिल हैं। ऐसे में इस नीति का मकसद पूरा नहीं हो रहा है। इसलिए कानून की समीक्षा करके इसे और प्रभावी बनाने की जरूरत है।” उन्होंने बताया कि जब 2016 में बिहार में शराबबंदी कानून लागू किया गया था, तब उनकी पार्टी विपक्ष में थी, फिर भी उन्होंने इस फैसले का समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि अब लोगों को शराब पीने से होने वाले नुकसान के बारे में बड़े स्तर पर जागरूक करने की जरूरत है। इसके लिए सरकार और समाज, दोनों को मिलकर काम करना चाहिए।

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) बिहार और केंद्र, दोनों जगह एनडीए की सहयोगी पार्टी है। चिराग पासवान का यह बयान ऐसे समय आया है, जब हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी बिहार की शराबबंदी व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। मांझी ने कहा था कि राज्य में शराबबंदी कानून को सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। उन्होंने गुजरात की तरह बिहार में भी शराबबंदी कानून लागू करने की मांग की थी। मांझी के इन बयानों के कुछ दिनों बाद चिराग पासवान ने भी बिहार की शराबबंदी नीति की समीक्षा करने की जरूरत बताई है। इससे एनडीए के सहयोगी दलों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।

Bharat Tiwari : एनकाउंटर में मारे गए भारत तिवारी के परिवार को मिलेगी आर्थिक मदद और सरकारी नौकरी, बिहार सरकार का बड़ा फैसला

Bharat Tiwari : एनकाउंटर में मारे गए भारत तिवारी के परिवार को मिलेगी आर्थिक मदद और सरकारी नौकरी, बिहार सरकार का बड़ा फैसला

bharat tiwari encounter

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने गुरुवार को बड़ा ऐलान किया। राज्य सरकार भोजपुर जिले में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए 28 वर्षीय भारत तिवारी के परिवार को आर्थिक सहायता देगी। इसके साथ ही परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी। भारत तिवारी की 17 जून को पुलिस एनकाउंटर में मौत हुई थी। इस घटना के बाद बिहार की राजनीति में काफी विवाद हुआ था। पुलिस की ओर से बल प्रयोग को लेकर सवाल उठे थे और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग भी की गई थी।

 

न्यायिक जांच की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर फैसला

 

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बताया कि न्यायिक जांच की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार भारत तिवारी के परिवार को आर्थिक सहायता देगी। साथ ही परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया गया है।

 

उन्होंने कहा कि सरकार न्यायिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर परिवार को सहायता उपलब्ध कराएगी।

 

क्या है भारत तिवारी एनकाउंटर मामला?

 

भारत तिवारी भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव के रहने वाले थे। पुलिस के मुताबिक, 17 जून को उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस टीम पहुंची थी। पुलिस का आरोप है कि भारत तिवारी ने अवैध हथियार से पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी।

 

पुलिस के अनुसार, जवाबी कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई, जिसमें भारत तिवारी के पैर में गोली लगी। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

 

हालांकि, भारत तिवारी के परिवार ने पुलिस के दावे को खारिज किया। परिवार का आरोप है कि उन्होंने गोलीबारी से पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना हथियार भी फेंक दिया था।

 

सोशल मीडिया पर सामने आया कथित वीडियो

 

इस मामले में सोशल मीडिया पर एक कथित वीडियो भी सामने आया था। इसमें भारत तिवारी को एनकाउंटर से कुछ समय पहले अपना हथियार फेंकते हुए दिखाए जाने का दावा किया गया।

 

पुलिस का कहना था कि भारत तिवारी लगातार पुलिस पर गोली चला रहे थे, जिसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की। पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान उनके पैर में गोली लगी थी।

 

दूसरी ओर, परिवार और कई स्थानीय लोगों ने भारत तिवारी को सामाजिक कार्यकर्ता बताया। उनका कहना था कि वह नियमित रूप से स्थानीय समस्याओं और लोगों की शिकायतों को सरकारी अधिकारियों के सामने उठाते थे।

 

मामले में STF कांस्टेबल गिरफ्तार

 

घटना के बाद उठे सवालों के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए थे। इसी मामले में STF के कांस्टेबल अक्षय कुमार को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है।

 

जुलाई में भी भारत तिवारी एनकाउंटर मामले में एक पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई थी। गिरफ्तार पुलिसकर्मी की पहचान अक्षय के रूप में की गई थी।

 

प्रशांत किशोर ने भी उठाए सवाल

 

इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं ने भी सरकार पर सवाल उठाए हैं। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर समेत विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि मामले की जांच पटना हाईकोर्ट के किसी सेवारत न्यायाधीश से कराई जाए, न कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश से।

 

विपक्षी नेताओं ने मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी थी।

 

भारत तिवारी की मौत को लेकर उठे विवाद के बीच अब राज्य सरकार की ओर से परिवार को आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया गया है।

पूर्व राज्यपाल और शिक्षाविद डॉ. डीवाई पाटिल का निधन, 91 वर्ष की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

DY Patil dies

बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के पूर्व गवर्नर रहे और मशहूर शिक्षाविद डॉ. ज्ञानदेव यशवंतराव पाटिल (डीवाई पाटिल) का मंगलवार को कोल्हापुर के कस्बा बावड़ा स्थित घर पर निधन हो गया। वे 91 वर्ष के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे। ALSO READ: क्या है ‍बांकीपुर का जातीय गणित और किस जाति से आते हैं प्रशांत किशोर? कितने पढ़े-लिखे हैं PK

 

पूर्व कांग्रेस नेता डी वाई पाटिल को प्यार से दादा कहा जाता था। पाटिल के परिवार में उनके बेटे कांग्रेस एमएलसी सतेज पाटिल, संजय पाटिल और अजिंक्य पाटिल और बेटी नंदिता पालशेतकर हैं। उनके नेतृत्व में देशभर में 182 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों, 7 विश्वविद्यालयों और अत्याधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के विशाल नेटवर्क की स्थापना हुई।

 

पाटिल ने वर्ष 1957 से 1962 तक कोल्हापुर के महापौर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद वे 1967 से 1972 तक महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य रहे। कांग्रेस ने उन्हें बिहार, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल का गर्वनर बनाया। वर्ष 2018 में वे कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए। ALSO READ: 'कुत्ता या बिल्ली भी जीत जाएगा', क्या इसी ओवरकॉन्फिडेंस ने डुबो दी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट?

 

डी वाई पाटिल के निधन की जानकारी देते हुए पिंपरी की प्रो-वाइस चांसलर स्मिता जाधव ने कहा कि बहुत दुख और भारी मन से मैं आपको हमारे प्रिय संस्थापक, माननीय डॉ. डी वाई पाटिल सर के निधन की सूचना दे रही हूं। उनकी दूरदर्शी लीडरशिप, शिक्षा के प्रति अटूट समर्पण और असाधारण विरासत ने अनगिनत लोगों के जीवन और संस्थानों को संवारा है। उनका जाना पूरे डी वाई पाटिल परिवार के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

 

डी वाई पाटिल को सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1991 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उनका अंतिम संस्कार बुधवार, 5 अगस्त को कोल्हापुर के लाइन बाजार स्थित डॉ. डी वाई पाटील मेडिकल कॉलेज परिसर में किया जाएगा।

देशभर में मिले 1.19 करोड़ पांडुलिपियों के रिकॉर्ड! जानिए क्या है ज्ञान भारतम मिशन, क्यों इसपर हो रहा करोड़ों रुपये का खर्च?

Gyan Bharatam Mission: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को सहेजने की दिशा में केंद्र सरकार के ज्ञान भारतम मिशन को एक ऐतिहासिक सफलता मिली है। देशभर में चलाए गए राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण के दौरान 1.19 करोड़ से भी अधिक पांडुलिपियों (Manuscripts) के रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं। संस्कृति और पर्यटन केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए इस स्कीम से जुड़ी अहम जानकारियां शेयर की हैं। आपको बता दें कि संस्कृति मंत्रालय की यह पहल भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, पांडुलिपियों के संरक्षण, इनके डिजिटलाइजेशन और ग्लोबल रिसर्च कम्युनिटी के लिए इसे उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है।

क्या है ज्ञान भारतम मिशन और बजट 2025-26 में क्यों हुई थी घोषणा?

ज्ञान भारतम मिशन (GBM) भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का एक विशेष कार्यक्रम है। इसका ऐलान केंद्रीय बजट 2025-26 के दौरान पांडुलिपियों से जुड़ी गतिविधियों को गति देने के लिए की गई थी। इस पैन-इंडिया पहल का मुख्य उद्देश्य किसी भी लिपि, भाषा, ज्ञान परंपरा, क्षेत्र या समुदाय की संरक्षक परंपराओं से परे हटकर संपूर्ण भारत की पांडुलिपि विरासत का संरक्षण करना है। पांडुलिपियों के सर्वेक्षण, कैटलॉगिंग, डिजिटलाइजेशन और प्रिजर्वेशन को फाइनेंशियल और एडमिनिस्ट्रेटिव मजबूती देने के लिए स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी ने साल 2025 से 2031 के लिए 491।66 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट मंजूर किया है। इसी फंड का इस्तेमाल देश की बहुमूल्य प्राचीन धरोहरों को नष्ट होने से बचाने और आधुनिक तकनीक से जोड़ने में किया जा रहा है।

क्या हैं ज्ञान भारतम मिशन के मुख्य उद्देश्य?

ज्ञान भारतम मिशन के तहत कई लक्ष्य तय किए गए हैं। इसमें मॉडर्न टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके पांडुलिपियों के डिजिटलाइजेशन और उनके डॉक्युमेंटशन की स्पीड को बढ़ाना है। देशभर में मौजूद पांडुलिपियों का सर्वे करने के साथ इसमें उनका ऑफिशियल रजिस्ट्रेशन भी कराया जा रहा है। भारतीय पांडुलिपियों की सटीक कैटलॉगिंग करने से लेकर उन्हें अप टू डेट बनाने का टास्क भी है। पांडुलिपियों सभी तक पहुंचें और ये किताब के साथ-साथ मशीन रीडेबल यानी डिजिटल फॉर्मेट में भी उपलब्ध हैं, ये भी इस मिशन का एक बड़ा लक्ष्य है।

पांडुलिपियों को बचाने के लिए ट्रेनिंग, जागरूकता अभियानों और फाइनेंशियल मदद देने की तैयारी है। इसके अलावा भारतीय भाषाओं और पांडुलिपिविज्ञान की स्डडी, स्कॉलपशिप और रिसर्च को बढ़ावा देने की भी तैयारी की गई है। सरकार का लक्ष्य है कि पांडुलिपियों की एक विशाल नेशनल डिजिटल रिपॉजिटरी भी तैयार की जाए।

मार्च 2026 में शुरू हुआ राष्ट्रीय सर्वेक्षण: 1.19 करोड़ से ज्यादा पांडुलिपियां रिपोर्ट की गईं

पांडुलिपियों के धारकों, संग्रहकर्ताओं और अलग अलग भाषाओं व लिपियों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्थाओं की पहचान करने के लिए मार्च 2026 में देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण शुरू किया गया था। इस सर्वे के दौरान देशभर से 1.19 करोड़ से अधिक पांडुलिपियों की मौजूदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई है। अभी देशभर में 8 लाख से अधिक डिजिटल पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। इनमें से 4.40 लाख से अधिक पांडुलिपियों को ज्ञान भारतम पोर्टल पर आम जनता के देखने के लिए उपलब्ध करा दिया गया है, जिन्हें राज्यवार आसानी से एक्सेस किया जा सकता है।

क्लस्टर सेंटर्स और राज्यों के साथ संस्थागत ढांचा

मिशन को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक मजबूत संस्थागत तंत्र स्थापित किया गया है। इसके तहत क्लस्टर सेंटर्स और इंडिपेंडेंट सेंटर्स बनाए गए हैं। इनमें यूनिवर्सिटी, रिसर्च इंस्टिट्यूट, पुस्तकालय, अभिलेखागार, निजी संरक्षक, धार्मिक संस्थान और दूसरे स्टेकहोल्डर्स शामिल हैं। इसके अलावा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने-अपने क्षेत्रों में ज्ञान भारतम के कार्यान्वयन के लिए नोडल कोआर्डिनेटिंग अथॉरिटी के रूप में जोड़ा गया है। उदाहरण के तौर पर, बिहार की कई प्रमुख संस्थाएं इस मिशन से जुड़ चुकी हैं, जिनमें नवा नालंदा महाविहार (नालंदा), खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी (पटना) और श्री बोधगया मठ (बोधगया) शामिल हैं।

कॉपीराइट और सुरक्षा का रखा जा रहा पूरा ध्यान

डिजिटल पांडुलिपियों तक एक्सेस देते समय इनके कस्टोडियनों और अधिकार धारकों के अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। जिन पांडुलिपियों पर कोई कानूनी या तकनीकी रोक नहीं है उन्हें राष्ट्रीय डिजिटल रिपॉजिटरी के माध्यम से सार्वजनिक और विद्वानों के शोध के लिए उपलब्ध कराया जाएगा। वहीं संवेदनशील, प्रतिबंधित या अधिकार-संरक्षित पांडुलिपियों तक पहुंच के लिए उचित शर्तें और नियम लागू किए जाएंगे।

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US New Tariffs Row: भारत समेत 60 देशों पर नए टैरिफ को लेकर डोनाल्ड ट्रंप का भारी विरोध, 25 अमेरिकी राज्यों ने ठोका मुकदमा

US New Tariffs Row: डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 25 अमेरिकी राज्यों के एक समूह ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस फैसले को अदालत में चुनौती दी है, जिसके तहत अमेरिका के कुल आयात में 99.4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली 60 अर्थव्यवस्थाओं पर नए आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए गए हैं। अमेरिका ने बंधुआ मजदूरी पर पर्याप्त कार्रवाई न होने का हवाला देते हुए पिछले महीने इन 60 देशों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक के नए आयात शुल्क लगाए थे।

ये शुल्क 24 जुलाई को समाप्त हो चुके 10 प्रतिशत के ग्लोबल इंपोर्ट ड्यूटी के स्थान पर लागू किए गए हैं। राज्यों का तर्क है कि व्हाइट हाउस जबरन मजदूरीसे जुड़ी चिंताओं का गलत इस्तेमाल करके एक बड़े टैरिफ सिस्टम को फिर से लागू करने की कोशिश कर रहा है। जबकि इस साल की शुरुआत में उसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हार का सामना करना पड़ा था।

इन 25 राज्यों ने कई देशों पर फिर से शुल्क लागू करने के ट्रंप प्रशासन के फैसले के खिलाफ सोमवार 3 अगस्त को अमेरिकी इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट का रुख किया। राज्यों का तर्क है कि इस कदम से पूरे देश में उपभोक्ताओं और कारोबारियों पर लागत का बोझ बढ़ेगा। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटीटिया जेम्स, गर्वनर कैथी होचुल और डेमोक्रेटिक राज्यों के इस समूह ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय से इन शुल्कों को अवैध घोषित करने का अनुरोध किया है।

जेम्स ने एक बयान में कहा, “सुप्रीम कोर्ट में हार के बाद भी प्रशासन (ट्रंप) एक बार फिर नए शुल्कों के जरिए परिवारों और कारोबारों पर अवैध रूप से अतिरिक्त कर का बोझ डालने की कोशिश कर रहा है।” भारत उन 17 देशों में शामिल है, जिन पर अमेरिका ने 10 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया है। इससे पहले भारत पर 12.5 प्रतिशत शुल्क निर्धारित करने का प्रस्ताव था। भारत को यह राहत 14 जून को अपनी विदेश व्यापार नीति में संशोधन कर बंधुआ मजदूरी से बने सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने के बाद मिली।

बयान में कहा गया कि प्रशासन दावा कर रहा है कि वह वैश्विक व्यापार में बंधुआ मजदूरी पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत कार्रवाई कर रहा है। याचिका में दलील दी गई कि यह वास्तव में उन व्यापक आयात शुल्कों को दोबारा लागू करने का एक बहाना भर है, जिन्हें लागू करने के प्रशासन के पूर्व प्रयास विफल हो चुके हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि ट्रंप प्रशासन ने धारा 301 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने कहा, “प्रशासन इसे किसी भी तरह उचित ठहराने की कोशिश करे। लेकिन कानून और हमारा संविधान स्पष्ट करता है कि राष्ट्रपति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देश पर व्यापक शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है।”

25 राज्यों में से 23 में डेमोक्रेटिक गवर्नर

न्यूज एजेंसी AFP की रिपोर्ट के अनुसार, मुकदमे में शामिल 25 राज्यों में से 23 में डेमोक्रेटिक गवर्नर हैं। जबकि नेवादा और वरमोंट में रिपब्लिकन गवर्नर हैं। कोर्ट में हार के बाद प्रशासन ने सेक्शन 301 का रास्ता अपनाया ट्रंप ने पहले ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ के तहत बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाए थे। उनका तर्क था कि अमेरिका का लगातार बना हुआ व्यापार घाटा एक राष्ट्रीय आपातकाल के बराबर है।

हालांकि, फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यह कानून राष्ट्रपति को ऐसे टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता है। इसके चलते प्रशासन को उस व्यवस्था के तहत वसूले गए शुल्क (ड्यूटी) वापस करने पड़े। इसके बाद व्हाइट हाउस ने कुछ समय के लिए 10% का ग्लोबल टैरिफ लगाया, जो 24 जुलाई को खत्म हो गया।

इसके बाद ‘ट्रेड एक्ट 1974’ के सेक्शन 301 के तहत मौजूदा शुल्क लागू किए गए। ट्रंप प्रशासन ने इन नए शुल्कों को सही ठहराने के लिए इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया। उनका तर्क था कि प्रभावित देश जबरन मजदूरी (forced labour) से बने सामान के आयात को रोकने में नाकाम रहे हैं।

व्हाइट हाउस ने टैरिफ का बचाव किया

ट्रंप प्रशासन ने इस मुकदमे को खारिज कर दिया है। उन्होंने जोर देकर कहा है कि ये टैरिफ कानूनी रूप से पूरी तरह सही हैं। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा, “अमेरिका अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल उन अनुचित कार्यों, नीतियों और प्रथाओं को खत्म करने के लिए कर रहा है जो अमेरिकी व्यापार पर बोझ डालते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “किसी विदेशी देश का जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक न लगाना और उसे प्रभावी ढंग से लागू न कर पाना अनुचित है। इससे अमेरिकी व्यापार और अमेरिकी श्रमिकों पर बोझ पड़ता है। इस समस्या का समाधान किया जाना चाहिए। राष्ट्रपति के पहले कार्यकाल से ही सेक्शन 301 के तहत लगाए गए टैरिफ कानूनी रूप से मजबूत हथियार साबित हुए हैं और अभी भी हैं।”

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ट्रंप ने ऊंचे टैरिफ का बचाव करते हुए इसे अपने आर्थिक एजेंडे का एक अहम हिस्सा बताया है। उनका तर्क है कि इससे अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग को फिर से बढ़ावा मिलेगा, घरेलू श्रमिकों की सुरक्षा होगी और व्यापार वार्ता में वाशिंगटन को बेहतर स्थिति मिलेगी।

सियासत ही नहीं, इन्वेस्टमेंट की पिच पर भी ‘ऑलराउंडर’ निकले प्रशांत किशोर! जानिए कहां-कहां लगाया है करोड़ों का दांव

Prashant Kishor Investment Portfolio: जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बंपर जीत हासिल की है। बीजेपी के गढ़ में सेंध लगाते हुए उन्होंने नीरज कुमार को 19,324 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। इस सियासी जीत के साथ ही प्रशांत किशोर की संपत्ति और उनके इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो की चर्चा तेज हो गई है।

चुनावी हलफनामे के अनुसार, प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत संपत्ति ₹96.06 करोड़ है, जबकि उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास के पास ₹101.93 करोड़ की संपत्ति है। यानी परिवार की कुल कुल संपत्ति करीब ₹198 करोड़ रुपये से अधिक है।

अनलिस्टेड इक्विटी में बड़ा दांव: वेधास वेंचर्स में 100% हिस्सेदारी

प्रशांत किशोर के पर्सनल वेल्थ मॉडल का सबसे बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट शेयरहोल्डिंग से आता है। प्रशांत किशोर की कुल संपत्ति में सबसे बड़ा योगदान उनकी अनलिस्टेड कंपनी ‘वेधास वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड’ (Vedhas Ventures Pvt Ltd) का है। इस कंपनी में उनकी 100% कंट्रोलिंग हिस्सेदारी है, जिसकी बुक वैल्यू लगभग ₹95.26 करोड़ आंकी गई है। यह उनके कुल मूवेबल पोर्टफोलियो का सबसे बड़ा एसेट क्लास है।

₹7.36 करोड़ की कराई हुई है FD

शेयर बाजार की अनिश्चितताओं और उतार-चढ़ाव से बचने के लिए प्रशांत किशोर ने सेफ और फिक्स्ड-रिटर्न इंस्ट्रूमेंट्स में भारी निवेश कर रखा है:

HDFC बैंक में एफडी: प्रशांत किशोर के नाम पर एचडीएफसी बैंक में 5 मुख्य फिक्स्ड डिपॉजिट हैं, जिनकी कुल वैल्यू ₹7.36 करोड़ के करीब है।

पारिवारिक होल्डिंग: उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास के पास 4 एफडी हैं और उनके बेटे दैविक्ष भारद्वाज के नाम पर भी एचडीएफसी बैंक में 2 फिक्स्ड डिपॉजिट मौजूद हैं।

बाजार के जोखिम और भू-राजनीतिक तनावों के बीच एफडी जैसे सुरक्षित विकल्पों में फंड रखना पोर्टफोलियो को स्थिरता प्रदान करता है।

डायरेक्ट इक्विटी, म्यूचुअल फंड्स और बॉन्ड्स

अनलिस्टेड शेयर्स और एफडी के अलावा प्रशांत किशोर और उनके परिवार ने डाइवर्सिफाइड एसेट एलोकेशन अपनाया है। स्टॉक मार्केट व म्यूचुअल फंड: प्रशांत किशोर का मार्केट इन्वेस्टमेंट्स और बैंक एफडी मिलाकर कुल निवेश ₹8 करोड़ से अधिक का है। उनके हलफनामे में लिस्टेड कंपनियों के शेयर, डेट बॉन्ड्स और म्यूचुअल फंड स्कीम्स में भी बैलेंस्ड एक्सपोजर दर्ज किया गया है।

पटना से दिल्ली तक अचल संपत्ति

प्रशांत किशोर के पोर्टफोलियो में अचल संपत्तियों का भी बड़ा योगदान है। प्रशांत किशोर के पास कुल ₹73.87 करोड़ की अचल संपत्ति है। इसमें पटना के पाटलिपुत्र कॉलोनी का आवासीय मकान, गाजियाबाद और नई दिल्ली के वसंत विहार स्थित प्राइम प्रॉपर्टीज शामिल हैं। इसके अलावा रोहतास और बक्सर में पैतृक व कृषि भूमि भी दर्ज है। उनकी पत्नी के पास ₹12.42 करोड़ की अचल संपत्ति है, जिसमें असम (गुवाहाटी) और नोएडा (जेपी ग्रींस) में प्रॉपर्टीज शामिल हैं।

बांकीपुर से प्रशांत किशोर की जीत के क्या हैं मायने

prashant kishor

मनीष कुमार

प्रशांत किशोर (पीके) की बिहार के उपचुनाव में जीत पर फिलहाल उन्हें गेम चेंजर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तो साफ है कि बिहार की राजनीति करवट लेना चाह रही है। ALSO READ: दक्षिण कोरिया में गर्मी ने तोड़ा 100 साल का रिकॉर्ड

 

इस जीत का साफ संदेश है कि कुछ वोटर सिर्फ जातिगत समीकरण नहीं देख रहे, बल्कि उनकी नजर में मुद्दों, गवर्नेंस व विकास के साथ-साथ विकल्प भी अहमियत रख रहा है। साथ ही, यह भी तय है कि बतौर विधायक अब अकेले ही प्रशांत किशोर विधानसभा में गवर्नेंस के मुद्दे पर दबाव बनाए रखेंगे। अगर सब कुछ ठीक रहा तो एनडीए को मजबूरी मान रहे लोगों को उनकी पार्टी भी विकल्प के रूप में दिखेगी। भारत की राजनीति ने एक बार फिर चौंकाया है। 

 

बीजेपी की पारंपरिक सीट

बांकीपुर उपचुनाव के लिए 30 जुलाई को मतदान हुआ था। इस बार 2025 के चुनाव की तुलना में यहां सात प्रतिशत कम वोटिंग हुई। पिछली बार यहां 41.39 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार 34.30 फीसदी वोटिंग हुई। 2010 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद मतदान का यह सबसे कम प्रतिशत है। एनडीए की तरफ से बीजेपी के नीरज सिन्हा और महागठबंधन की ओर से आरजेडी की रेखा गुप्ता सहित कुल 25 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे।

 

बांकीपुर की यह सीट बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई थी। यह बीजेपी की परंपरागत सीट मानी जाती रही है। 1995 से यहां बीजेपी जीतती रही है। पहले पिता नवीन कुमार सिन्हा और फिर पुत्र नितिन यहां से लगातार जीतते रहे।

 

यहां से पांच बार लगातार जीतने वाले नितिन को इस बार भी पार्टी की जीत का इतना अधिक भरोसा था कि उन्होंने यहां तक कहा था कि बांकीपुर की जनता इस चुनाव में बीजेपी की जीत के नए कीर्तिमान स्थापित करेगी। लेकिन अब, जब पीके ने बीजेपी के गढ़ में घुसकर सेंध लगा दी है।

 

राजनीतिक समीक्षक एके चौधरी कहते हैं, ‘‘बिहार में चुनाव में जाति ही जीत की गारंटी रही है। इसी समीकरण को देखकर पार्टियां टिकट भी देती रही हैं, यह इतनी जल्दी टूटने वाला नहीं है। हां, इतना जरूर है कि पीके की जीत से उन सुधारों की चर्चा अवश्य ही तेज होगी, जिससे संबंधित मुद्दे वे 2025 के चुनाव से उठा रहे। अब इन मुद्दों से अन्य पार्टियां भी मुंह नहीं मोड़ सकेंगी।'' ALSO READ: क्या हम फफूंद के खतरे को अब तक कम आंकते रहे हैं?

 

पीके पर भरोसा बढ़ेगा

प्रशांत किशोर की 'वोटकटवा' वाली छवि पर इसका असर पड़ेगा। 2025 के चुनाव में जनसुराज ने 238 सीट पर अपने प्रत्याशी खड़े थे, किंतु हालत इतनी खराब हुई कि 237 पर पार्टी के उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सके थे। चौधरी कहते हैं, ‘‘पीके को पिछली बार ही चुनाव लड़ना चाहिए था। राघोपुर सहित अन्य सीटों से उनके चुनाव लड़ने की बात पहले सामने आई, किंतु अंतत: वे शायद हिम्मत नहीं जुटा सके, या यूं कहिए कि अपनी जीत के प्रति आश्वस्त नहीं थे। पार्टी के मुखिया की यह अनिश्चितता लोगों को शायद रास नहीं आई।''

 

विश्लेषकों का कहना है कि इस जीत से उनका मनोबल तो बढ़ेगा ही, साथ ही उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। आखिरकार, उन्हें चुनौतीपूर्ण लंबी लड़ाई जो लडऩी है। हालांकि बीजेपी के एक नेता कहते हैं, “और कारण जो भी रहे हों, पीके की जीत में भितरघात की भी बड़ी भूमिका रही। अन्यथा इतना अधिक मार्जिन नहीं रहता। निशाने पर कौन और क्यों था, आप समझ सकते हैं।”

 

बीजेपी के गढ़ में मिली यह जीत प्रशांत किशोर के लिए संजीवनी का काम करेगी। राजनीति विज्ञान की अवकाश प्राप्त प्रोफेसर श्यामली घोष कहती हैं, ‘‘अब उनकी शख्सियत केवल एक पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट की नहीं रह जाएगी, बल्कि वह राजनेता के रूप में स्थापित हो जाएंगे। उनकी पार्टी के लिए अवसर बढ़ेंगे, लेकिन बहुत कुछ विधानसभा में उनके परफार्मेंस पर निर्भर करेगा, जिससे आम जनता को लगे कि उनकी बात दमदार तरीके से उठाने वाला कोई है, जिस पर कोई चर्चा नहीं होती।''

 

घोष के मुताबिक प्रशांत किशोर को सरकार के उन वादों को जोरदार तरीके से उछालना होगा, जिन पर काम नहीं हुआ या वे पूरे नहीं हुए। सरकार के आंकड़ों के खेल पर भी उन्हें सक्रिय रहना होगा। तभी उनकी पार्टी के प्रति लोगों का भरोसा बढ़ेगा, क्योंकि बिहार में जातिगत रूढ़िवादिता को तोड़ना इतना आसान नहीं है।

 

श्यामली घोष यह भी कहती हैं, ‘‘यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे एनडीए की पार्टियों का कोर वोटर शिफ्ट हो रहा। हां, यह इस बात का संकेत हो सकता है कि सवर्ण सहित इनका शहरी व मिडिल क्लास वोटर इनसे बिदक सकता है। मुझे नहीं लगता कि सम्राट सरकार पर कोई असर पड़ने वाला है।''

 

हालांकि, पीके एनडीए की हार का ठीकरा मुख्यमंत्री के सिर फोड़ने की कोशिश करते हुए उनसे नैतिक आधार पर इस्तीफे को लेकर तंज तो कसते रहेंगे। जनसुराज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज भारती ने इसे जनता की जीत और बीजेपी की हार बताते हुए कहा, ‘‘बिहार में लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए इस जीत के बड़े मायने हैं।'' ALSO READ: अमेरिका-चीन के बीच तनाव, अमेरिका ने लगाया चीनी रोबोट पर प्रतिबंध

 

गठबंधनों को करना होगा आत्ममंथन

बिहार में पिछले कई दशकों से कोई भी पार्टी अकेले सत्ता पर काबिज नहीं हो सकी है। जातिगत समीकरणों को देखते हुए गठबंधन उनकी मजबूरी बन जाती है। सत्ता पक्ष में बीजेपी, जेडीयू, चिराग पासवान की एलजेपी (लोक जनशक्ति पार्टी), उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चा) और जीतन राम मांझी की हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) है तो विपक्ष में आरजेडी, कांग्रेस और माले सहित सात पार्टियां हैं। पिछले 21 सालों के अधिकांश समय में एनडीए सत्ता और आरजेडी विपक्ष में है। यह परिणाम इन दोनों गठबंधनों के लिए झटका तो है ही, साथ यह एक अवसर भी है।

 

श्यामली घोष कहती हैं, ‘‘अब समय आ गया है कि दोनों ही पक्ष आत्ममंथन करें। किसी वर्ग विशेष को अपनी जागीर का हिस्सा नहीं समझें। अपनी नीतियों तथा रणनीति की समीक्षा करें। क्योंकि, अगर एनडीए से शहरी वोटरों का मोहभंग दिख रहा है तो आरजेडी का माइ (मुस्लिम-यादव) समीकरण भी कहीं न कहीं दरक रहा।''

 

जेडीयू-आरजेडी में भी नेतृत्व के प्रति चुनौती बढ़ेगी। कांग्रेस प्रवक्ता असितनाथ तिवारी तो पहले ही कह चुके हैं कि बिहार में महागठबंधन को चलाने की जिम्मेदारी आरजेडी पर है, लेकिन इस चुनाव में तेजस्वी यादव ने साथी दलों को साथ लेने की जरूरत ही नहीं समझी। हालांकि, आरजेडी प्रवक्ता एजाज अहमद ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया है।

 

इस खींचतान के बीच गठबंधन की पार्टियों में परिवर्तन के इच्छुक वोटर जनसुराज के प्रति आकर्षित तो हो ही सकते हैं। पटना के बोरिंग रोड निवासी वोटर राहुल कहते हैं, ‘‘परिवर्तन से ही बेहतर मिलता है। पहले विकल्प का अभाव था। लोग यह सोचते थे कि कहीं पहले वाली स्थिति ना लौट आए, इसलिए मजबूरी में वोट करते थे। स्वाभाविक है, जब विकल्प दिखेगा तो लोग आजमाएंगे ही। इसमें गलत क्या है।''

 

प्रशांत किशोर की जीत के फैक्टर अब चाहे जितने गिना लें, फिलहाल बीजेपी का यह भ्रम तो टूट ही गया कि वे बांकीपुर सीट से किसी को भी जीत दिला देंगे।

200 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं प्रशांत किशोर और उनकी पत्नी, देश के इन राज्यों में है प्रॉपर्टी

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर ने आज नए चैप्टर की शुरुआत की है। 3 अगस्त 2026 को बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे सामने आए हैं। बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी हार तो प्रशांत किशोर को जीत हासिल हुई है। जन सुराज पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर 19,324 वोटों से जीते हैं। प्रशांत को 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार को 44,827 वोट मिले हैं। उनकी यह जीत इस लिहाज से अहम है कि बांकीपुर में बीते 31 साल से लगातार भाजपा का ही कब्जा था। इस जीत के बाद आइए जानते हैं प्रशांत किशोर की संपत्ति के बारे में।

200 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं प्रशांत किशोर और उनकी पत्नी

चुनाव आयोग में जमा किए गए हलफनामे के मुताबिक, उपचुनाव के जरिए राजनीति में कदम रखने वाले किशोर ने अपनी कुल संपत्ति 96 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई है। इनमें 22.19 करोड़ रुपये की चल संपत्ति (कैश, बैंक जमा, निवेश आदि) और 73.87 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति (जमीन और मकान) शामिल है। वहीं, उन पर करीब 5.78 करोड़ रुपये का कर्ज भी है। हलफनामे के अनुसार, उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास ने 101 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति घोषित की है। इसमें 89.51 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 12.42 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल है।

देश के इन राज्यों में संपत्ति

दोनों पति-पत्नी की घोषित कुल संपत्ति 198 करोड़ रुपये से ज्यादा है। वहीं, हलफनामे में दर्ज अन्य संपत्तियों और निवेश को जोड़ने पर उनकी संयुक्त संपत्ति 208 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। प्रशांत किशोर के पास पटना के पाटलिपुत्र में एक मकान, दिल्ली के वसंत विहार में एक घर है। यूपी के गाजियाबाद स्थित इंदिरापुरम में एक अपार्टमेंट में दो फ्लैट हैं। बिहार के रोहतास जिला स्थित कोनार गांव में पैतृक संपत्ति भी है।

चुनावी हलफनामे के मुताबिक, किशोर के पास 65,570 रुपये नकद हैं, जबकि उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास के पास 1.95 लाख रुपये नकद हैं। दस्तावेज में किशोर का पेशा राजनीतिक सलाहकार (पॉलिटिकल कंसल्टेंट) बताया गया है। वहीं, डॉ. जाह्नवी दास नई दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ अस्पताल में सीनियर एडवाइजर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के पद पर कार्यरत हैं। राजनीति में आने से पहले किशोर ने करीब आठ साल तक संयुक्त राष्ट्र (UN) के साथ पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने पहले भारत और बाद में अफ्रीका में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कई कार्यक्रमों पर काम किया।

2011 में छोड़ी थी नौकरी 

बता दें कि, साल 2011 में किशोर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की नौकरी छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने राजनीतिक सलाहकार (पॉलिटिकल कंसल्टिंग) के क्षेत्र में कदम रखा। अपनी रणनीति और चुनावी अनुभव के दम पर वह देश के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकारों में शामिल हो गए। जेडीयू (JD(U)) से अलग होने के बाद उन्होंने साल 2022 में ‘जन सुराज’ अभियान शुरू किया। फिर अक्टूबर 2024 में इसे एक राजनीतिक पार्टी का रूप दिया। अब बांकीपुर उपचुनाव जीतकर उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की पहली चुनावी जीत दर्ज की है।

बांकीपुर में क्यों हारी भाजपा? प्रशांत किशोर की जीत के 5 बड़े कारण

Bihar assembly bypoll results Bankipur

Bihar assembly bypoll results Bankipur: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बिहार राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। पटना की इस हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा (BJP) के 30 साल पुराने अभेद्य गढ़ में सेंध लगाते हुए 19 हजार 324 वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।

 

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की इस पारंपरिक सीट पर प्रशांत को मिली जीत ने बिहार के सियासी गणित को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। 1995 के बाद से कभी चुनाव न हारने वाली भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को पटखनी देकर प्रशांत किशोर न केवल जन सुराज के पहले विधायक बने हैं, बल्कि बिहार में एक नए 'तीसरे विकल्प' की नींव भी मजबूत कर दी है।  

क्या हैं भाजपा की हार के बड़े कारण?

PK का खुद मैदान में उतरना : 2025 के चुनावों में विफलता के बाद प्रशांत किशोर ने किसी अन्य प्रत्याशी पर दांव लगाने के बजाय खुद बांकीपुर से मैदान संभाला। उनकी इस रणनीति ने मतदाताओं को संदेश दिया कि वे इस चुनाव को लेकर बेहद गंभीर हैं। यही कारण रहा कि लोगों ने उन पर भरोसा किया। 

 

पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी दरार : बांकीपुर में भाजपा के मुख्य कैडर वोट बैंक (सवर्ण और शहरी मध्यम वर्ग) में भारी बिखराव देखने को मिला। प्रशांत किशोर ने BJP के साथ-साथ RJD के भी मुस्लिम-यादव व पिछड़ा वोट बैंक में जबरदस्त सेंधमारी की, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों का ही समीकरण ध्वस्त हो गया।

 

मुद्दों पर आधारित अभियान : प्रशांत किशोर ने पारंपरिक जाति-धर्म की राजनीति के बजाय शिक्षा, रोजगार, जलजमाव, नागरिक सुविधाओं और बिहार के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने बड़े मंचों के बजाय मोहल्ला बैठकों और सीधी जन-चौपालों पर ध्यान केंद्रित किया। इस चुनाव परिणाम पर दिल्ली के जंतर-मंतर प्रोटेस्ट का भी असर माना जा रहा है। युवा वोटर का एक बड़ा वर्ग भी प्रशांत के पक्ष में गया। 

 

अहंकार के खिलाफ जनआक्रोश : प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार के दौरान यह संदेश आक्रामक तरीके से फैलाया कि 'किला जनता बनाती है, कोई पार्टी नहीं'। भाजपा के कैडर द्वारा सीट को 'सुरक्षित' मान लेने के रवैये का फायदा उठाते हुए PK ने बदलाव की चाहत रखने वाले तटस्थ वोटरों को साध लिया। उपचुनाव के माध्यम से वोटरों ने भाजपा के 'अहंकार' पर भी प्रहार किया, जिसे हमेशा लगता है कि वह कोई चुनाव नहीं हार सकती। 

 

तीसरे विकल्प की तलाश : मुख्य विपक्षी दल RJD की प्रत्याशी रेखा कुमारी का कमजोर प्रदर्शन यह दिखाता है कि जो मतदाता भाजपा से तो नाराज थे ही, उन्होंने RJD पर भी विश्वास नहीं किया। वोटर ने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के 'जन सुराज' पर भरोसा जताया।  

कैसे ढहाया भाजपा का अभेद्य किला?

बांकीपुर (पूर्व में पटना पश्चिम) सीट 1995 से भाजपा का सबसे सुरक्षित किला मानी जाती थी। नितिन नवीन यहां से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं। लेकिन उनके राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने एक कम प्रोफाइल वाले युवा चेहरे को उतारा। प्रशांत किशोर ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने बांकीपुर के हर वार्ड और मोहल्ले का डेटा-संचालित तरीके से विश्लेषित किया और असंतुष्ट गुटों को जोड़ा। पटना शहर का पढ़ा-लिखा और मध्यम वर्ग जो भाजपा का बंधुआ वोटर माना जाता था, उसने बदलाव के नाम पर प्रशांत किशोर को वोट दिया। प्रशांत किशोर ने अकेले 49.2% वोट हासिल किए, जो BJP (34.4%) और RJD (10.9%) के कुल मिलाकर मिले वोटों से भी ज्यादा है।

बिहार में 'तीसरे विकल्प' का उदय

NDA और महागठबंधन के दोहरे धुव्रीकरण के बीच जन सुराज ने यह साबित कर दिया है कि राज्य में एक मजबूत और व्यावहारिक तीसरा विकल्प खड़ा हो चुका है। बांकीपुर के नतीजों ने सभी राजनीतिक दलों को यह कड़ा संदेश दिया है कि किसी भी सीट को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (जरूरी रूप से सुरक्षित) मानना चुनावी भूल साबित हो सकता है।

‘गंभीरता से करें विचार…’, बांकीपुर में जीत के बाद प्रशांत किशोर ने दी बीजेपी को बड़ी सलाह

Bankipur Bypoll Result 2026: बिहार की राजनीति में तीन अगस्त 2026 का दिन एक बड़े उलटफेर वाला साबित हुआ है। बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने सभी को हैरान कर दिया है। बांकीपुर में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है तो वहीं जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपना खाता खोल लिया है। जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार प्रशांत किशोर ने बीजेपी को करारी शिकस्त देते हुए बांकीपुर सीट से जीत हासिल कर ली है। चुनाव आयोग (ECI) की वेबसाइट के अनुसार, 32वें राउंड तक चले मतगणना के बाद प्रशांत किशोर को 63,946 वोट मिले। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा से 19246 वोटों से मात दी है। वहीं इस जीत के बाद प्रशांत किशोर का पहला रिएक्शन सामने आया है।

उपचुनाव में जीत के बाद जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा कि वह चुनाव हारने वाले सभी उम्मीदवारों को भी बधाई देते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जीत और हार दोनों होती रहती हैं, इसलिए हर उम्मीदवार का सम्मान होना चाहिए। प्रशांत किशोर ने कहा कि बांकीपुर का यह चुनाव सिर्फ एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह बिहार में बीजेपी और एनडीए सरकार के कामकाज पर जनता का फैसला भी था। उनका कहना है कि बांकीपुर के लोगों ने अपने वोट के जरिए एक साफ संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को जनता के इस फैसले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और बिहार के हित में राज्य की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को सौंपनी चाहिए, जो ईमानदारी से बिहार के विकास के लिए काम कर सके।

भाजपा के लिए बड़ा झटका

बिहार के बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर 19,324 वोटों से जीते हैं। प्रशांत को 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार को 44,827 वोट मिले हैं। बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की पारंपरिक सीट है। वे यहां से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं। उनके राज्यसभा जाने के बाद इस सीट पर उपचुनाव कराया गया। काउंटिंग के दौरान चुनाव आयोग की वेबसाइट पर कुछ गड़बड़ देखने को मिली। सुबह से वेबसाइट पर 31 राउंड की काउंटिंग बताई जा रही थी। 31 राउंड पूरे होते ही पहले 36 राउंड काउंटिंग दिखाई जाने लगी। बाद में फिर 32 राउंड की काउंटिंग दिखा दी गई।