अनंत के बहाने ललन सिंह के वर्चस्व का दांव

देश में मुख्य चुनाव आयुक्त की कथित वोट चोरी और विपक्ष के प्रदर्शन की ज्यादा चर्चा हो रही है तो बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों पर चुनाव की गहमागहमी है। इसमें भी पटना स्नात्तक की सीट अखिल भारतीय दिलचस्पी वाली सीट बन गई है। इसका कारण यह है कि मोकामा से जनता दल यू के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने संकल्प किया है कि वे नीरज कुमार को हराएंगे। इसके लिए उन्होंने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के अनुज सिंह को अपना उम्मीदवार बना कर उनके लिए प्रचार शुरू किया है। जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा था कि केंद्रीय मंत्री ललन सिंह दोनों नेताओं के बीच सुलह कराएंगे लेकिन ललन सिंह ने इससे इनकार कर दिया है।

दूसरी ओर नीतीश कुमार ने अपने हाथ से नीरज कुमार को पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार बनाने का पत्र सौंपा तो उनके बेटे निशांत कुमार ने खुद जाकर नीरज कुमार का नामांकन कराया। सो, एक तरफ नीतीश और निशांत हैं और उनकी इच्छा से पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष का पद संभाल रहे संजय झा हैं तो दूसरी ओर अनंत सिंह हैं, जिनको ललन सिंह का समर्थन मिला हुआ है। यह एमएलसी की एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है, बल्कि जनता दल यू में वर्चस्व की लड़ाई बन गया है। अगर अनंत सिंह पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को हरा देते हैं तो इससे उनके राजनीतिक कद पर कोई बड़ा असर नहीं होगा लेकिन पार्टी के अंदर ललन सिंह का वर्चस्व बढ़ेगा। नीतीश कुमार के निष्क्रिय होने के बाद से हाशिए में जा रहे ललन सिंह फिर जदयू की राजनीति में मजबूत होंगे।

विधान परिषद की आठ सीट के लिए 164 उम्मीदवारों ने दाखिल किए नामांकन

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक चुनाव में कुल 164 उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किए हैं।

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, कुल 164 उम्मीदवारों में से 98 ने चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और 66 ने चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए नामांकन दाखिल किया है।

जिन आठ सीटों पर 23 अक्टूबर को चुनाव होना है, उनमें पटना स्नातक, दरभंगा स्नातक, तिरहुत स्नातक, कोसी स्नातक, पटना शिक्षक, दरभंगा शिक्षक, तिरहुत शिक्षक और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे अधिक 40 उम्मीदवारों ने दरभंगा से नामांकन दाखिल किया है। इसके बाद पटना से 22, तिरहुत से 20 और कोसी से 16 उम्मीदवार मैदान में हैं।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में पटना से सबसे अधिक 22 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है। सारण से 19, दरभंगा से 14 और तिरहुत से 11 उम्मीदवारों ने पर्चे भरे हैं।

नामांकन पत्रों की जांच सात अक्टूबर को होगी, जबकि उम्मीदवार नौ अक्टूबर तक अपना नामांकन वापस ले सकते हैं। मतदान 23 अक्टूबर को सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक होगा और मतगणना 27 अक्टूबर को की जाएगी।

मौजूदा विधान परिषद सदस्यों-पटना स्नातक से नीरज कुमार, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार, तिरहुत स्नातक से बंसीधर ब्रजवासी, कोसी स्नातक से एन.के. यादव, पटना शिक्षक से नवल किशोर यादव, दरभंगा शिक्षक से मदन मोहन झा, तिरहुत शिक्षक से संजय कुमार सिंह और सारण शिक्षक से अफाक अहमद का कार्यकाल 16 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है।

सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आठ में से चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें तीन मौजूदा विधान परिषद सदस्य फिर से चुनाव लड़ रहे हैं।

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भाजपा ने पटना शिक्षक सीट से मौजूदा विधान परिषद सदस्य नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक सीट से डॉ. एन.के. यादव और तिरहुत स्नातक सीट से सर्वेश कुमार को फिर से उम्मीदवार बनाया है। पार्टी ने तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नरेंद्र कुमार सिंह को मैदान में उतारा है। यह सीट फिलहाल विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के संजय कुमार सिंह के पास है।

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की पार्टी ने सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। पार्टी ने पटना स्नातक सीट से अनुज सिंह, तिरहुत स्नातक से विमोहन कुमार, तिरहुत शिक्षक से श्याम नंदन यादव, सारण शिक्षक से मौजूदा सदस्य अफाक अहमद, पटना शिक्षक से वकील एवं शिक्षाविद से राजनेता बनीं दिव्या ज्योति, दरभंगा शिक्षक से एस.पी. राय, दरभंगा स्नातक से मोहम्मद इम्तियाज (नूरानी) और कोसी स्नातक से रजनीश रंजन को उम्मीदवार बनाया है।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में ऐसे व्यक्ति मतदान कर सकते हैं, जिनके पास भारत के किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की स्नातक डिग्री कम से कम तीन वर्ष से हो और जो संबंधित स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निवास करते हों। इसके लिए मतदाताओं को विशेष रूप से तैयार की जाने वाली मतदाता सूची में अपना नाम पंजीकृत कराना होता है।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में राज्य के ऐसे शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत शिक्षक मतदान कर सकते हैं, जो माध्यमिक विद्यालय स्तर से नीचे के न हों। इनमें उच्च विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालय शामिल हैं। संबंधित शिक्षक के पास कम से कम तीन वर्ष का शिक्षण अनुभव होना चाहिए और पात्र शिक्षकों को भी संबंधित शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में अलग से पंजीकरण कराना होता है।

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चुनाव बहिष्कार से क्यों डरना?

संवैधानिक संस्थाएं चुनाव की पवित्रता की रक्षा करने में विफल साबित हुई हैं। इस बीच वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे कथानकों को खुद विपक्षी दलों ने प्रचारित किया है। उसके साथ उम्मीदवार और दल चोरी, तथा सांसद- विधायक खरीदारी के कथानकों को जोड़ दें, तो लोकतंत्र की बात एक भद्दा मजाक बनी दिखने लगती है। इन्हीं हालात ने जागरूक नागरिकों में लाचारी की भावना भरी है।  तो प्रश्न है कि क्या विपक्षी दलों की साथ-साथ प्रतिरोध एवं चुनाव लड़ने की सोच से इस भावना को दूर किया जा सकता है?

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पर दो निर्वाचन आयुक्तों के दस महीने में कम-से-कम 14 बार गंभीर एतराज जताने की खबर सामने आने के बाद से भारत में हो रहे चुनावों पर संदेह का साया और गहराया है। इसी सिलसिले में यह बहस खड़ी हुई है कि क्या अब विपक्ष को चुनाव बहिष्कार का फैसला करना चाहिए? या इसे इस रूप में भी पूछा जा रहा है कि क्या अब विपक्षी दलों के सामने चुनाव बहिष्कार के अलावा भी कोई और विकल्प रह गया है?

वैसे तो यह सवाल काफी समय से आपसी चर्चाओं में उठता रहा है या दबी ज़ुबान में इसे सार्वजनिक रूप से भी इसे कहा गया, लेकिन अब यह राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है। संभवतः इसे सबसे सटीक और दो-टूक अभिव्यक्ति हाल में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजित दीपके ने दी। दरअसल, इस संबंध में उनके सोशल मीडिया पोस्ट के बाद ही इस पर खुलेआम सार्वजनिक बहस खड़ी हुई है। विपक्ष को संबोधित करते हुए दीपके ने कहा,

“हां, चुनावों में धांधली हो रही है। लेकिन जब आप धांधली वाले चुनावों में भाग लेना जारी रखते हैं, तो आप इन चुनावों को वैधता प्रदान करते हैं। आप यह भ्रम बनाए रखने में मददगार बनते हैं कि ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं।…

शायद आप चुनाव लड़ना जारी रखते हैं, क्योंकि आपको डर है कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे, तो आपका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। लेकिन जब वोट चुराए जा रहे हों, आपके विधायकों और सांसदों को खरीद लिया जा रहा हो, और आपकी पार्टियों को तोड़ा जा रहा हो, तो आप किस तरह से अपने अस्तित्व की रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं?….

यह राजनीतिक अस्तित्व को बचाना नहीं है। आप बस एक ऐसी व्यवस्था में जीवित रहने की कोशिश कर रहे हैं, जो जब चाहे आपको कमजोर कर सकती है, आपकी पार्टी को विभाजित कर सकती है या आपके निर्वाचित प्रतिनिधियों को आपसे छीन सकती है। इस तरह आप कब तक टिके रह सकते हैं?….

और आप चुनावों में धांधली के बारे में केवल तभी बात नहीं कर सकते, जब यह उन राज्यों में हो, जो आपके लिए मायने रखते हैं, और जब यह कहीं और हो तो आप चुप रहें! अगर चुनावों में धांधली हो रही है, तो इससे फर्क पड़ना चाहिए- चाहे राज्य कोई भी हो या कोई भी पार्टी प्रभावित हो रही हो…

आप खेल जारी रखते हुए यह नहीं कह सकते कि खेल में धांधली हुई है। आपकी भागीदारी ही एकमात्र ऐसी चीज है, जो इन धांधली वाले चुनावों को वैधता देती है।

अपने राजनीतिक अस्तित्व के बारे में सोचने से पहले देश और इसके लोकतंत्र के बारे में सोचें। एक रुख तय करें और धांधली वाले चुनावों में भाग लेना बंद करें।”

बेशक, भारत में मौजूदा परिस्थितियों के बीच चुनाव बहिष्कार की यह एक ठोस और बेलाग वकालत है। लेकिन यह बात संभवतः विपक्षी दलों को रास नहीं आई। चूंकि सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया इस स्तंभकार से पास नहीं है, इसलिए सबके बारे में कुछ कहना उचित नहीं होगा। लेकिन कम-से-कम दो दलों के रुख का अनुमान उनके प्रमुख नेताओं की टिप्पणी से लगाया जा सकता है। और उनमें एक पार्टी तृणमूल कांग्रेस है, जिसके बारे में समझा जाता है कि एसआईआर प्रक्रिया की गड़बड़ियों की वह सबसे बड़ी भुक्तभोगी है। दरअसल, वह उन सभी तौर-तरीकों की भुक्तभोगी है, जिसका जिक्र दीपके ने किया है।

उसके नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने कहाः

“विपक्ष का चुनावों का बहिष्कार करना = भाजपा का सभी सीटों पर जीत जाना। एक बार जब ऐसा हो जाएगा, तो वे अपने सभी अपराधों को कानूनी रूप देने के लिए संविधान में संशोधन कर देंगे…

इसके अलावा चुनाव ना लड़ने का अर्थ है जमीन पर मौजूद उन लाखों कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात, जो अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ रहे हैं।… इसीलिए लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए चुनाव लड़ना महत्त्वपूर्ण है, और इसके साथ ही स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए संघर्ष करना भी उतना ही आवश्यक है।”

इसी से मिलती-जुलती सोच कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी विशेष आमंत्रित सदस्य गुरदीप सिंह सप्पल ने अपने एक लेख में जताई। उन्होंने कहा,

“निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है और कुछ लोग अब कहने लगे हैं कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को चुनाव लड़ना ही बंद कर देना चाहिए। उनका सवाल है कि अगर रेफरी ही बेईमान है, तो मैच क्यों खेलें? उनका तर्क है कि चुनाव लड़ना सिर्फ एक धांधली ग्रस्त प्रक्रिया को वैधता देना है…

गुस्सा जायज है। लेकिन निष्कर्ष गलत है। बहिष्कार पलायन है, और पलायन प्रतिरोध नहीं है। चुनावों का बहिष्कार भारतीय लोकतंत्र की रक्षा नहीं करेगा। बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने के रास्ते खोल देगा।।।।।

अब सोचिए कि विपक्ष मैदान छोड़ दे। तब नई पार्टियां गढ़ी जाएंगी। झूठे प्रचार से असली विपक्ष को बदनाम कर एक नया, आज्ञाकारी विपक्ष तैयार किया जाएगा। लोकतांत्रिक असहमति की जगह कठपुतलियों से भर दी जाएगी। और जिन चुनावों का कुछ लोग बहिष्कार करना चाहते हैं, उन्हीं चुनावों से धांधली वाले चुनावों को वैधता दी जाएगी। सत्ता पर पकड़ पूरी हो जाएगी, और वह कानूनी भी दिखेगी…

इसकी एक व्यावहारिक क़ीमत भी है। जो पार्टी चुनाव लड़ती है, उसके पोलिंग एजेंट हर बूथ पर होते हैं। उसके पास फॉर्म 17-C की कॉपियां होती हैं। उसके उम्मीदवार अदालत में नतीजों को चुनौती दे सकते हैं। वे पूरी मशीनरी को करीब से देखते हैं। राहुल गांधी ने देश के सामने जो भी सबूत रखे हैं, वे इसी प्रक्रिया के भीतर रह कर जुटाए गए। बहिष्कार चोरी को नहीं रोकता। वह गवाहों को ही हटा देता है।”

चुनाव बहिष्कार पलायन है या नहीं, इस प्रश्न पर हम बाद में आएंगे। लेकिन “बहिष्कार से गवाहों के हट जाने” के मुद्दे पर फिलहाल यह सवाल उठाना उचित होगा कि राहुल गांधी ने “जो सबूत रखे”, उसका परिणाम क्या हुआ है? उन “साक्ष्यों” का यह महत्त्व निर्विवाद है कि उनसे भारतीय चुनावों में हो रही धांधली का तर्क और मजबूत हुआ। यह जाहिर हुआ कि धांधली की शिकायत महज एक धारणा नहीं, बल्कि इसके ठोस और परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हैं। लेकिन सवाल है कि क्या “साक्ष्यों” से सुनियोजित धांधलियों को रोकने की कोई राह भी निकली है? दरअसल, कांग्रेस सहित कुछ दलों एवं संगठनों ने प्रतीकात्मक प्रतिरोध जरूर आयोजित किए हैं, लेकिन उनके अलावा क्या जमीनी या आम जन के स्तर पर किसी बड़ी हलचल की सूरत बनी है?

चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष नहीं रह गए हैं, इस धारणा की पृष्ठभूमि लंबी है। इस संबंध में जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर का यह आकलन गौरतलब हैः

     चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट से प्रभावित नहीं हुई है। ऐसा घटनाओं के एक लंबे सिलसिले के कारण हुआ है।

     दरअसल, देश भर में इस पर चर्चा होनी चाहिए कि एक पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त (राजीव कुमार) देश के सबसे बड़े निजी बैंक (एचडीएफसी) का चेयरमैन कैसे बन गया?

     पिछले कई वर्षों में चुनाव आयोग की कार्य शैली- विशेषकर चुनावों और अन्य मामलों में जिम्मेदारियों के निर्वहन के तरीकों- के कारण उसकी साख धूमिल हुई है। यह शिकायत पिछले 10 वर्ष से जारी है। इस दरम्यान चुनाव तारीखों के निर्धारण से लेकर चुनाव कितने चरणों में होंगे- हर चीज भाजपा की सुविधा से तय होती मालूम पड़ी है। (इस सिलसिले में आदर्श चुनाव आचार संहिता पर अमल में भेदभाव का उल्लेख भी किया जा सकता है।)

     चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति या चुनावों के व्यापक संचालन में विपक्ष की कोई भूमिका नहीं है। (इसे कानून बदल कर सरकार ने सुनिश्चित किया।)

     आज स्थिति यह है कि विपक्षी दल केवल वहीं चुनाव जीत पाते हैं, जहां भाजपा के खिलाफ आंधी चले। जहां जीत का अंतर थोड़ा हो, वहां विपक्षी उम्मीदवारों की हार तय कर दी जाती है।

यानी शिकायतों का सिलसिला लंबा है। एसआईआर में हुई गड़बड़ियां उस सिलसिले का ही हिस्सा बन कर सामने आई हैं। इस दौरान जिस पैमाने पर और जिस खुल्लमखुल्ला अंदाज में गड़बड़ियां की गईं, उसके बाद जनमत का एक बड़ा हिस्सा यह मानने लगा कि बात सिर्फ चुनावी धांधली की नहीं रह गई है, बल्कि अब चुनावों को नियंत्रित एवं नियोजित कर लिया गया है। इस धारणा ने लोगों में लाचारी की भावना भरी है। इस अहसास से ये भावना और गहरी हुई कि फरियाद का कोई मंच नहीं बचा है।

इसीलिए ये सवाल सबसे अहम हो गया है कि अब किया क्या जाए? इस सिलसिले में बहिष्कार, चुनाव लड़ने के साथ-साथ प्रतिरोध, और न्यायपालिका की शरण में जाने के विकल्प चर्चा में आए हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की गुजारिश करती कुछ याचिकाएं दायर भी की गई हैं।   इस पर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास की ये टिप्पणी महत्त्वपूर्ण हैः

“…। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछली बार जब नागरिकों ने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया, तब क्या हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने यह “सुनिश्चित” किया कि चुनाव से महज कुछ महीने पहले बंगाल में जैसे-तैसे एसआईआर हो जाए। जब बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के परिणामों को नजरअंदाज़ करना असंभव हो गया, तो उस पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने एक असाधारण टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा कि जो लोग “इस बार” वोट देने में असमर्थ हैं, वे “अगली बार” वोट दे सकते हैं…

उन्हें कौन बताए कि संभवतः चुराए जा चुके चुनाव के बाद कोई “अगली बार” नहीं होता? इसलिए, चूंकि अदालतें संवैधानिक संस्थाएं हैं, अतः ज्ञानेश कुमार के खिलाफ इन नई याचिकाओं पर वे जितनी बार चाहें, उन्हें सुनवाई करने दें। वे जो चाहें, आदेश पारित करने दें। लेकिन ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही तय करने की अपनी लोकतांत्रिक मांग को हम अदालतों को “आउटसोर्स” नहीं करेंगे।

यह जनता तय करेगी। क्योंकि आखिरकार, ना तो कोई चुनाव आयुक्त और न ही कोई न्यायाधीश भारतीय लोकतंत्र का मालिक है। इसके मालिक हम, भारत के लोग हैं।”

इस सोशल मीडिया पोस्ट का सार है कि संवैधानिक संस्थाएं चुनाव की पवित्रता की रक्षा करने में विफल साबित हुई हैं। इस बीच वोट चोरी और चुनाव चोरी जैसे कथानकों को खुद विपक्षी दलों ने प्रचारित किया है। उसके साथ उम्मीदवार और दल चोरी, तथा सांसद- विधायक खरीदारी के कथानकों को जोड़ दें, तो लोकतंत्र की बात एक भद्दा मजाक बनी दिखने लगती है। इन्हीं हालात ने जागरूक नागरिकों में लाचारी की भावना भरी है।

तो प्रश्न है कि क्या विपक्षी दलों की साथ-साथ प्रतिरोध एवं चुनाव लड़ने की सोच से इस भावना को दूर किया जा सकता है? आखिर कितनी बार अपनी हार को ये दल वोट चोरी का परिणाम बताएंगे, कुछ रोज प्रतीकात्मक विरोध जताएंगे, और फिर अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाएंगे? इन्हीं सवालों के क्रम में चुनाव बहिष्कार का मुद्दा उठा है।

इस सुझाव को सहज स्वीकार करना सियासी पार्टियों के लिए आसान नहीं है। इसकी वजह उनका दायरा और ढांचा है। आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का सार यह रहा है कि (एक हद तक आरएसएस समर्थित भाजपा को छोड़ कर) तमाम दलों के लिए राजनीति का अर्थ ही चुनाव हो चुका है। वे चुनावी चक्र में सोचते हैं, उसी के मुताबिक मुद्दे और उम्मीदवार चुनते हैं, और उसी के इर्द-गिर्द उनकी तमाम गतिविधियां सीमित रहती हैं। उनके कथित कार्यकर्ता दरअसल इस उम्मीद में उनसे जुड़े लोग हैं कि कभी किसी स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका मिल जाएगा। उन्हें फंडिंग चुनाव जीत सकने की उनकी संभावना के आधार पर होती है। गुजरे वक्त के साथ पार्टी की टिकट बिक्री एक बड़ा धंधा- यानी पार्टियों या नेताओं के लिए आमदनी का जरिया बन गई है। स्वाभाविकतः चुनाव ना लड़ना उनके सोच के दायरे से बाहर की बात है। चुनाव उनके लिए किसी लक्ष्य को पाने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने आप में लक्ष्य हैं!

वैसे, राजनीति अगर किसी ऊंचे लक्ष्य और संकल्प से प्रेरित ना हो, तो चुनाव बहिष्कार सचमुच कोई समाधान नहीं है। यह निर्णय सिर्फ तब समाधान बन सकता है, जब राजनीति का अर्थ जनता के बीच जाना, उसकी अपेक्षाओं को समझना, उससे संवाद कायम करना, आम जन चेतना के विस्तार के प्रयास में जुटना और उस आधार पर जन गोलबंदी करना समझा जाए। इसी अर्थ में कहा जाता है कि भारत को आजादी चुनाव लड़ कर नहीं मिली थी। तब स्वतंत्रता सेनानियों ने राजनीति को व्यापक अर्थ में देखा था।

चुनाव में भाग लें या नहीं, इस बहस में उलझते हुए दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी ने ‘राज्य के साथ, राज्य के विरुद्ध, राज्य से आगे’ नाम की माकूल रणनीति तय की थी। इसका अर्थ था, चुनाव में शामिल होकर राज्य-तंत्र में अधिकतम भागीदारी बनाना, साथ-साथ अपनी मांगें पूरी कराने के लिए राज्य के खिलाफ लगातार संघर्षरत रहना, और आम जन को संगठित करते हुए उनकी शक्ति निर्मित करना, ताकि वे अपने उद्देश्य को हासिल करने के संघर्ष के लिए तैयार हो सकें। लेकिन ये सब बड़ी बातें हैं। फिलहाल, हम जिन राजनीतिक दलों के संबंध में बात कर रहे हैं, संभव है कि वे इसे बेकार की बातें कहें या यह भी संभव है कि यह उनके सिर के ऊपर से गुजर जाए।

इसीलिए फिलहाल, भारत में बात कहीं आगे बढ़ने की संभावना नहीं दिखती। फिलहाल, यही अनुमान लगाया जा सकता है कि विपक्षी दल चुनाव के मामले ‘तुम्हीं से मोहब्बत- तुम्हीं से लड़ाई’ जैसी सीमित सोच के दायरे में बंधे रहेंगे!

Priyanka Kakkar: पंजाब चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका, AAP प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ कांग्रेस में शामिल

Priyanka Kakkar joins Congress: पंजाब चुनाव से ठीक पहले आम आदमी पार्टी (आप) को बहुत ही बड़ा झटका लगा है। AAP की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ शनिवार (3 अक्तूबर) को कांग्रेस में शामिल हो गईं। इस दौरान उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व सदस्य श्याम सुंदर शर्मा और पत्रकार रजत टंडन ने भी कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला, पार्टी महासचिव सैयद नासिर हुसैन, कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र यादव की मौजूदगी में तीनों नेता पार्टी में शामिल हुए।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजीव शुक्ला ने कहा, “आज बहुत ख़ुशी का दिन है। हमारे साथ श्याम सुंदर शर्मा जी हैं, जो यूपी में काफी प्रभावशाली नेता हैं। शर्मा जी 8 बार के विधायक रहे हैं और पूर्व में मंत्री रह चुके हैं। प्रियंका कक्कड़ जी और रजत राकेश पांडेय जी भी कांग्रेस पार्टी से जुड़ रहे हैं। मेरा मानना है कि इन सभी के साथ आने से यूपी और देश की राजनीति पर बहुत प्रभाव पड़ेगा।”

कांग्रेस में क्यों शामिल हुईं?

कांग्रेस में शामिल होने के बाद कक्कड़ ने कहा कि वह बहुत गर्व के साथ कांग्रेस में शामिल हो रही हैं क्योंकि वह उस दिल्ली को वापस पाना चाहती हैं, जिसमें वह बड़ी हुई हैं। उन्होंने कहा, “मैं ऐसी हरी-भरी, स्वच्छ, प्रगतिशील और सुरक्षित दिल्ली चाहती हूं, जो मेरे बचपन और मेरे बड़े होने के वर्षों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।” कक्कड़ ने कहा कि भारतीय राजनीति में एक दशक से अधिक समय के अनुभव के बाद उनका मानना है कि कांग्रेस ही ऐसा कर सकती है।

प्रियंका ने की राहुल गांधी की तारीफ

उन्होंने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की प्रशंसा करते हुए कहा, “अगर कोई एक नेता प्रामाणिक है, तो वह राहुल गांधी हैं। वह दृढ़ विश्वास वाले नेता हैं।” आम आदमी पार्टी छोड़ने के कारणों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि AAP ने जनता से कहा था कि वह बंगला और गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करेगी। लेकिन बाद में निजी यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल होने लगे।

केजरीवाल पर भड़कीं

प्रियंका ने आगे कहा, “मैं आम आदमी पार्टी छोड़ी, क्योंकि ये वही पार्टी है, जिसने जनता से कहा था- हम बंगला, गाड़ी नहीं लेंगे। लेकिन बाद में प्राइवेट ट्रैवल के लिए चॉपर इस्तेमाल होने लगे। राहुल गांधी जी आज ‘वोट चोरी’ के खिलाफ लड़ रहे हैं। उन्होंने हम सभी को बताया कि जनता का वोट चुराया जा रहा है। उन्होंने जनता को दिखाया कि ज्ञानेश कुमार ‘वोट चोरी’ कर नरेंद्र मोदी की झोली में डाल रहे हैं। आज इस मौके पर मैं सभी नेताओं का धन्यवाद करती हूं, जिन्होंने मुझे अपने परिवार का हिस्सा बनाया।”

उन्होंने कहा, “राहुल गांधी ने कभी कैमरे के लिए आंसू नहीं बहाए।” प्रियंका कक्कड़ कांग्रेस में शामिल होते ही केजरीवाल की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहा बंगला गाड़ी नहीं लेने की बात कही। लेकिन प्राइवेट हेलीकॉप्टर में घूमने लगे। ऐसी पार्टियों में देश हित पीछे रह जाता है और खुद आगे रहते हैं।

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पंजाब चुनाव से पहले प्रियंका कक्कड़ का कांग्रेस में शामिल होना आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा झटका है। जिस तरह से पार्टी के एक-एक नेता छोड़ रहे हैं और सीधे केजरीवाल की राजनीति पर सवाल उठा रहे हैं वह साफ दिख रहा है कि आम आदमी पार्टी के भीतर कितना असंतोष है।

Bihar: प्रशांत किशोर की राजनीति के मुरीद हुए चिराग पासवान! शराबबंदी पर सरकार को घेरा

केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने शनिवार को जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की राजनीति का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि किशोर धर्म और जाति के आधार पर लोगों को जोड़ने की कोशिश करने के बजाय विकास की बात करते हैं, इसलिए वह उनकी राजनीति से सहमत हैं। चिराग पासवान ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपनी पार्टी के कार्यालय में तिरंगा फहराया। इसके बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रशांत किशोर को लेकर अपनी राय रखी।

PK की राजनीति को चिराग का समर्थन!

इससे एक दिन पहले चिराग पासवान ने बिहार में लागू शराबबंदी कानून पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि मौजूदा रूप में यह कानून अपने मकसद को पूरा करने में सफल नहीं रहा है और इसकी समीक्षा की जरूरत है। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि शराबबंदी कानून राज्य में अवैध शराब के कारोबार को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। उन्होंने इसी वजह से कानून की समीक्षा किए जाने की बात कही।

शराबबंदी पर सरकार को घेरा

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने कहा, “शराबबंदी लागू होने के बाद भी शराब की खरीद-बिक्री और बनाने की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं। इनमें नकली शराब के मामले भी शामिल हैं। ऐसे में इस नीति का मकसद पूरा नहीं हो रहा है। इसलिए कानून की समीक्षा करके इसे और प्रभावी बनाने की जरूरत है।” उन्होंने बताया कि जब 2016 में बिहार में शराबबंदी कानून लागू किया गया था, तब उनकी पार्टी विपक्ष में थी, फिर भी उन्होंने इस फैसले का समर्थन किया था। उन्होंने कहा कि अब लोगों को शराब पीने से होने वाले नुकसान के बारे में बड़े स्तर पर जागरूक करने की जरूरत है। इसके लिए सरकार और समाज, दोनों को मिलकर काम करना चाहिए।

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) बिहार और केंद्र, दोनों जगह एनडीए की सहयोगी पार्टी है। चिराग पासवान का यह बयान ऐसे समय आया है, जब हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के नेता और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने भी बिहार की शराबबंदी व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। मांझी ने कहा था कि राज्य में शराबबंदी कानून को सही तरीके से लागू नहीं किया जा रहा है। उन्होंने गुजरात की तरह बिहार में भी शराबबंदी कानून लागू करने की मांग की थी। मांझी के इन बयानों के कुछ दिनों बाद चिराग पासवान ने भी बिहार की शराबबंदी नीति की समीक्षा करने की जरूरत बताई है। इससे एनडीए के सहयोगी दलों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।

Bharat Tiwari : एनकाउंटर में मारे गए भारत तिवारी के परिवार को मिलेगी आर्थिक मदद और सरकारी नौकरी, बिहार सरकार का बड़ा फैसला

Bharat Tiwari : एनकाउंटर में मारे गए भारत तिवारी के परिवार को मिलेगी आर्थिक मदद और सरकारी नौकरी, बिहार सरकार का बड़ा फैसला

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बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने गुरुवार को बड़ा ऐलान किया। राज्य सरकार भोजपुर जिले में पुलिस एनकाउंटर में मारे गए 28 वर्षीय भारत तिवारी के परिवार को आर्थिक सहायता देगी। इसके साथ ही परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी। भारत तिवारी की 17 जून को पुलिस एनकाउंटर में मौत हुई थी। इस घटना के बाद बिहार की राजनीति में काफी विवाद हुआ था। पुलिस की ओर से बल प्रयोग को लेकर सवाल उठे थे और मामले की स्वतंत्र जांच की मांग भी की गई थी।

 

न्यायिक जांच की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर फैसला

 

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर बताया कि न्यायिक जांच की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार भारत तिवारी के परिवार को आर्थिक सहायता देगी। साथ ही परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया गया है।

 

उन्होंने कहा कि सरकार न्यायिक जांच के निष्कर्षों के आधार पर परिवार को सहायता उपलब्ध कराएगी।

 

क्या है भारत तिवारी एनकाउंटर मामला?

 

भारत तिवारी भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव के रहने वाले थे। पुलिस के मुताबिक, 17 जून को उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पुलिस टीम पहुंची थी। पुलिस का आरोप है कि भारत तिवारी ने अवैध हथियार से पुलिस टीम पर फायरिंग शुरू कर दी।

 

पुलिस के अनुसार, जवाबी कार्रवाई आत्मरक्षा में की गई, जिसमें भारत तिवारी के पैर में गोली लगी। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

 

हालांकि, भारत तिवारी के परिवार ने पुलिस के दावे को खारिज किया। परिवार का आरोप है कि उन्होंने गोलीबारी से पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना हथियार भी फेंक दिया था।

 

सोशल मीडिया पर सामने आया कथित वीडियो

 

इस मामले में सोशल मीडिया पर एक कथित वीडियो भी सामने आया था। इसमें भारत तिवारी को एनकाउंटर से कुछ समय पहले अपना हथियार फेंकते हुए दिखाए जाने का दावा किया गया।

 

पुलिस का कहना था कि भारत तिवारी लगातार पुलिस पर गोली चला रहे थे, जिसके बाद पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की। पुलिस के मुताबिक, इसी दौरान उनके पैर में गोली लगी थी।

 

दूसरी ओर, परिवार और कई स्थानीय लोगों ने भारत तिवारी को सामाजिक कार्यकर्ता बताया। उनका कहना था कि वह नियमित रूप से स्थानीय समस्याओं और लोगों की शिकायतों को सरकारी अधिकारियों के सामने उठाते थे।

 

मामले में STF कांस्टेबल गिरफ्तार

 

घटना के बाद उठे सवालों के बीच मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए थे। इसी मामले में STF के कांस्टेबल अक्षय कुमार को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है।

 

जुलाई में भी भारत तिवारी एनकाउंटर मामले में एक पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी की जानकारी सामने आई थी। गिरफ्तार पुलिसकर्मी की पहचान अक्षय के रूप में की गई थी।

 

प्रशांत किशोर ने भी उठाए सवाल

 

इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं ने भी सरकार पर सवाल उठाए हैं। जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर समेत विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि मामले की जांच पटना हाईकोर्ट के किसी सेवारत न्यायाधीश से कराई जाए, न कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश से।

 

विपक्षी नेताओं ने मांग पूरी नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी थी।

 

भारत तिवारी की मौत को लेकर उठे विवाद के बीच अब राज्य सरकार की ओर से परिवार को आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया गया है।

सियासत ही नहीं, इन्वेस्टमेंट की पिच पर भी ‘ऑलराउंडर’ निकले प्रशांत किशोर! जानिए कहां-कहां लगाया है करोड़ों का दांव

Prashant Kishor Investment Portfolio: जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बंपर जीत हासिल की है। बीजेपी के गढ़ में सेंध लगाते हुए उन्होंने नीरज कुमार को 19,324 वोटों के बड़े अंतर से शिकस्त दी। इस सियासी जीत के साथ ही प्रशांत किशोर की संपत्ति और उनके इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो की चर्चा तेज हो गई है।

चुनावी हलफनामे के अनुसार, प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत संपत्ति ₹96.06 करोड़ है, जबकि उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास के पास ₹101.93 करोड़ की संपत्ति है। यानी परिवार की कुल कुल संपत्ति करीब ₹198 करोड़ रुपये से अधिक है।

अनलिस्टेड इक्विटी में बड़ा दांव: वेधास वेंचर्स में 100% हिस्सेदारी

प्रशांत किशोर के पर्सनल वेल्थ मॉडल का सबसे बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट शेयरहोल्डिंग से आता है। प्रशांत किशोर की कुल संपत्ति में सबसे बड़ा योगदान उनकी अनलिस्टेड कंपनी ‘वेधास वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड’ (Vedhas Ventures Pvt Ltd) का है। इस कंपनी में उनकी 100% कंट्रोलिंग हिस्सेदारी है, जिसकी बुक वैल्यू लगभग ₹95.26 करोड़ आंकी गई है। यह उनके कुल मूवेबल पोर्टफोलियो का सबसे बड़ा एसेट क्लास है।

₹7.36 करोड़ की कराई हुई है FD

शेयर बाजार की अनिश्चितताओं और उतार-चढ़ाव से बचने के लिए प्रशांत किशोर ने सेफ और फिक्स्ड-रिटर्न इंस्ट्रूमेंट्स में भारी निवेश कर रखा है:

HDFC बैंक में एफडी: प्रशांत किशोर के नाम पर एचडीएफसी बैंक में 5 मुख्य फिक्स्ड डिपॉजिट हैं, जिनकी कुल वैल्यू ₹7.36 करोड़ के करीब है।

पारिवारिक होल्डिंग: उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास के पास 4 एफडी हैं और उनके बेटे दैविक्ष भारद्वाज के नाम पर भी एचडीएफसी बैंक में 2 फिक्स्ड डिपॉजिट मौजूद हैं।

बाजार के जोखिम और भू-राजनीतिक तनावों के बीच एफडी जैसे सुरक्षित विकल्पों में फंड रखना पोर्टफोलियो को स्थिरता प्रदान करता है।

डायरेक्ट इक्विटी, म्यूचुअल फंड्स और बॉन्ड्स

अनलिस्टेड शेयर्स और एफडी के अलावा प्रशांत किशोर और उनके परिवार ने डाइवर्सिफाइड एसेट एलोकेशन अपनाया है। स्टॉक मार्केट व म्यूचुअल फंड: प्रशांत किशोर का मार्केट इन्वेस्टमेंट्स और बैंक एफडी मिलाकर कुल निवेश ₹8 करोड़ से अधिक का है। उनके हलफनामे में लिस्टेड कंपनियों के शेयर, डेट बॉन्ड्स और म्यूचुअल फंड स्कीम्स में भी बैलेंस्ड एक्सपोजर दर्ज किया गया है।

पटना से दिल्ली तक अचल संपत्ति

प्रशांत किशोर के पोर्टफोलियो में अचल संपत्तियों का भी बड़ा योगदान है। प्रशांत किशोर के पास कुल ₹73.87 करोड़ की अचल संपत्ति है। इसमें पटना के पाटलिपुत्र कॉलोनी का आवासीय मकान, गाजियाबाद और नई दिल्ली के वसंत विहार स्थित प्राइम प्रॉपर्टीज शामिल हैं। इसके अलावा रोहतास और बक्सर में पैतृक व कृषि भूमि भी दर्ज है। उनकी पत्नी के पास ₹12.42 करोड़ की अचल संपत्ति है, जिसमें असम (गुवाहाटी) और नोएडा (जेपी ग्रींस) में प्रॉपर्टीज शामिल हैं।

200 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं प्रशांत किशोर और उनकी पत्नी, देश के इन राज्यों में है प्रॉपर्टी

बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर ने आज नए चैप्टर की शुरुआत की है। 3 अगस्त 2026 को बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे सामने आए हैं। बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी हार तो प्रशांत किशोर को जीत हासिल हुई है। जन सुराज पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर 19,324 वोटों से जीते हैं। प्रशांत को 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार को 44,827 वोट मिले हैं। उनकी यह जीत इस लिहाज से अहम है कि बांकीपुर में बीते 31 साल से लगातार भाजपा का ही कब्जा था। इस जीत के बाद आइए जानते हैं प्रशांत किशोर की संपत्ति के बारे में।

200 करोड़ की संपत्ति के मालिक हैं प्रशांत किशोर और उनकी पत्नी

चुनाव आयोग में जमा किए गए हलफनामे के मुताबिक, उपचुनाव के जरिए राजनीति में कदम रखने वाले किशोर ने अपनी कुल संपत्ति 96 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई है। इनमें 22.19 करोड़ रुपये की चल संपत्ति (कैश, बैंक जमा, निवेश आदि) और 73.87 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति (जमीन और मकान) शामिल है। वहीं, उन पर करीब 5.78 करोड़ रुपये का कर्ज भी है। हलफनामे के अनुसार, उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास ने 101 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति घोषित की है। इसमें 89.51 करोड़ रुपये की चल संपत्ति और 12.42 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल है।

देश के इन राज्यों में संपत्ति

दोनों पति-पत्नी की घोषित कुल संपत्ति 198 करोड़ रुपये से ज्यादा है। वहीं, हलफनामे में दर्ज अन्य संपत्तियों और निवेश को जोड़ने पर उनकी संयुक्त संपत्ति 208 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। प्रशांत किशोर के पास पटना के पाटलिपुत्र में एक मकान, दिल्ली के वसंत विहार में एक घर है। यूपी के गाजियाबाद स्थित इंदिरापुरम में एक अपार्टमेंट में दो फ्लैट हैं। बिहार के रोहतास जिला स्थित कोनार गांव में पैतृक संपत्ति भी है।

चुनावी हलफनामे के मुताबिक, किशोर के पास 65,570 रुपये नकद हैं, जबकि उनकी पत्नी डॉ. जाह्नवी दास के पास 1.95 लाख रुपये नकद हैं। दस्तावेज में किशोर का पेशा राजनीतिक सलाहकार (पॉलिटिकल कंसल्टेंट) बताया गया है। वहीं, डॉ. जाह्नवी दास नई दिल्ली के अपोलो इंद्रप्रस्थ अस्पताल में सीनियर एडवाइजर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) के पद पर कार्यरत हैं। राजनीति में आने से पहले किशोर ने करीब आठ साल तक संयुक्त राष्ट्र (UN) के साथ पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट के रूप में काम किया। इस दौरान उन्होंने पहले भारत और बाद में अफ्रीका में स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े कई कार्यक्रमों पर काम किया।

2011 में छोड़ी थी नौकरी 

बता दें कि, साल 2011 में किशोर ने संयुक्त राष्ट्र (UN) की नौकरी छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने राजनीतिक सलाहकार (पॉलिटिकल कंसल्टिंग) के क्षेत्र में कदम रखा। अपनी रणनीति और चुनावी अनुभव के दम पर वह देश के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकारों में शामिल हो गए। जेडीयू (JD(U)) से अलग होने के बाद उन्होंने साल 2022 में ‘जन सुराज’ अभियान शुरू किया। फिर अक्टूबर 2024 में इसे एक राजनीतिक पार्टी का रूप दिया। अब बांकीपुर उपचुनाव जीतकर उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की पहली चुनावी जीत दर्ज की है।

बांकीपुर में क्यों हारी भाजपा? प्रशांत किशोर की जीत के 5 बड़े कारण

Bihar assembly bypoll results Bankipur

Bihar assembly bypoll results Bankipur: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बिहार राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। पटना की इस हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भाजपा (BJP) के 30 साल पुराने अभेद्य गढ़ में सेंध लगाते हुए 19 हजार 324 वोटों से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।

 

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की इस पारंपरिक सीट पर प्रशांत को मिली जीत ने बिहार के सियासी गणित को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। 1995 के बाद से कभी चुनाव न हारने वाली भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को पटखनी देकर प्रशांत किशोर न केवल जन सुराज के पहले विधायक बने हैं, बल्कि बिहार में एक नए 'तीसरे विकल्प' की नींव भी मजबूत कर दी है।  

क्या हैं भाजपा की हार के बड़े कारण?

PK का खुद मैदान में उतरना : 2025 के चुनावों में विफलता के बाद प्रशांत किशोर ने किसी अन्य प्रत्याशी पर दांव लगाने के बजाय खुद बांकीपुर से मैदान संभाला। उनकी इस रणनीति ने मतदाताओं को संदेश दिया कि वे इस चुनाव को लेकर बेहद गंभीर हैं। यही कारण रहा कि लोगों ने उन पर भरोसा किया। 

 

पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी दरार : बांकीपुर में भाजपा के मुख्य कैडर वोट बैंक (सवर्ण और शहरी मध्यम वर्ग) में भारी बिखराव देखने को मिला। प्रशांत किशोर ने BJP के साथ-साथ RJD के भी मुस्लिम-यादव व पिछड़ा वोट बैंक में जबरदस्त सेंधमारी की, जिससे पक्ष और विपक्ष दोनों का ही समीकरण ध्वस्त हो गया।

 

मुद्दों पर आधारित अभियान : प्रशांत किशोर ने पारंपरिक जाति-धर्म की राजनीति के बजाय शिक्षा, रोजगार, जलजमाव, नागरिक सुविधाओं और बिहार के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया। उन्होंने बड़े मंचों के बजाय मोहल्ला बैठकों और सीधी जन-चौपालों पर ध्यान केंद्रित किया। इस चुनाव परिणाम पर दिल्ली के जंतर-मंतर प्रोटेस्ट का भी असर माना जा रहा है। युवा वोटर का एक बड़ा वर्ग भी प्रशांत के पक्ष में गया। 

 

अहंकार के खिलाफ जनआक्रोश : प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार के दौरान यह संदेश आक्रामक तरीके से फैलाया कि 'किला जनता बनाती है, कोई पार्टी नहीं'। भाजपा के कैडर द्वारा सीट को 'सुरक्षित' मान लेने के रवैये का फायदा उठाते हुए PK ने बदलाव की चाहत रखने वाले तटस्थ वोटरों को साध लिया। उपचुनाव के माध्यम से वोटरों ने भाजपा के 'अहंकार' पर भी प्रहार किया, जिसे हमेशा लगता है कि वह कोई चुनाव नहीं हार सकती। 

 

तीसरे विकल्प की तलाश : मुख्य विपक्षी दल RJD की प्रत्याशी रेखा कुमारी का कमजोर प्रदर्शन यह दिखाता है कि जो मतदाता भाजपा से तो नाराज थे ही, उन्होंने RJD पर भी विश्वास नहीं किया। वोटर ने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के 'जन सुराज' पर भरोसा जताया।  

कैसे ढहाया भाजपा का अभेद्य किला?

बांकीपुर (पूर्व में पटना पश्चिम) सीट 1995 से भाजपा का सबसे सुरक्षित किला मानी जाती थी। नितिन नवीन यहां से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं। लेकिन उनके राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने एक कम प्रोफाइल वाले युवा चेहरे को उतारा। प्रशांत किशोर ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने बांकीपुर के हर वार्ड और मोहल्ले का डेटा-संचालित तरीके से विश्लेषित किया और असंतुष्ट गुटों को जोड़ा। पटना शहर का पढ़ा-लिखा और मध्यम वर्ग जो भाजपा का बंधुआ वोटर माना जाता था, उसने बदलाव के नाम पर प्रशांत किशोर को वोट दिया। प्रशांत किशोर ने अकेले 49.2% वोट हासिल किए, जो BJP (34.4%) और RJD (10.9%) के कुल मिलाकर मिले वोटों से भी ज्यादा है।

बिहार में 'तीसरे विकल्प' का उदय

NDA और महागठबंधन के दोहरे धुव्रीकरण के बीच जन सुराज ने यह साबित कर दिया है कि राज्य में एक मजबूत और व्यावहारिक तीसरा विकल्प खड़ा हो चुका है। बांकीपुर के नतीजों ने सभी राजनीतिक दलों को यह कड़ा संदेश दिया है कि किसी भी सीट को 'टेकन फॉर ग्रांटेड' (जरूरी रूप से सुरक्षित) मानना चुनावी भूल साबित हो सकता है।

‘गंभीरता से करें विचार…’, बांकीपुर में जीत के बाद प्रशांत किशोर ने दी बीजेपी को बड़ी सलाह

Bankipur Bypoll Result 2026: बिहार की राजनीति में तीन अगस्त 2026 का दिन एक बड़े उलटफेर वाला साबित हुआ है। बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने सभी को हैरान कर दिया है। बांकीपुर में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा है तो वहीं जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपना खाता खोल लिया है। जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार प्रशांत किशोर ने बीजेपी को करारी शिकस्त देते हुए बांकीपुर सीट से जीत हासिल कर ली है। चुनाव आयोग (ECI) की वेबसाइट के अनुसार, 32वें राउंड तक चले मतगणना के बाद प्रशांत किशोर को 63,946 वोट मिले। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा से 19246 वोटों से मात दी है। वहीं इस जीत के बाद प्रशांत किशोर का पहला रिएक्शन सामने आया है।

उपचुनाव में जीत के बाद जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर ने कहा कि वह चुनाव हारने वाले सभी उम्मीदवारों को भी बधाई देते हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जीत और हार दोनों होती रहती हैं, इसलिए हर उम्मीदवार का सम्मान होना चाहिए। प्रशांत किशोर ने कहा कि बांकीपुर का यह चुनाव सिर्फ एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह बिहार में बीजेपी और एनडीए सरकार के कामकाज पर जनता का फैसला भी था। उनका कहना है कि बांकीपुर के लोगों ने अपने वोट के जरिए एक साफ संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को जनता के इस फैसले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और बिहार के हित में राज्य की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को सौंपनी चाहिए, जो ईमानदारी से बिहार के विकास के लिए काम कर सके।

भाजपा के लिए बड़ा झटका

बिहार के बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर 19,324 वोटों से जीते हैं। प्रशांत को 64,151 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार को 44,827 वोट मिले हैं। बांकीपुर सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की पारंपरिक सीट है। वे यहां से लगातार 5 बार विधायक रहे हैं। उनके राज्यसभा जाने के बाद इस सीट पर उपचुनाव कराया गया। काउंटिंग के दौरान चुनाव आयोग की वेबसाइट पर कुछ गड़बड़ देखने को मिली। सुबह से वेबसाइट पर 31 राउंड की काउंटिंग बताई जा रही थी। 31 राउंड पूरे होते ही पहले 36 राउंड काउंटिंग दिखाई जाने लगी। बाद में फिर 32 राउंड की काउंटिंग दिखा दी गई।