जनगणना-2027 की तैयारी तेज, पौड़ी में फील्ड ट्रेनर्स का प्रशिक्षण संपन्न

उत्तराखंड के पौडी में जनगणना-2027 के द्वितीय चरण यानी जनसंख्या गणना को व्यवस्थित और त्रुटिरहित ढंग से संपन्न कराने के लिए पौड़ी में फील्ड ट्रेनर्स का तीन दिवसीय प्रशिक्षण शनिवार को संपन्न हो गया। कलेक्ट्रेट सभागार में आयोजित प्रशिक्षण में जनगणना की प्रक्रिया, प्रश्नावली के अनुरूप जानकारी दर्ज करने और आंकड़ों की शुद्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया। प्रशिक्षण के बाद फील्ड ट्रेनर्स जिले के पर्यवेक्षकों और प्रगणकों को प्रशिक्षित करेंगे। इसके बाद प्रगणक घर-घर जाकर जनसंख्या गणना के लिए आवश्यक जानकारियां जुटाएंगे।

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मास्टर ट्रेनर एवं खंड शिक्षाधिकारी एकेश्वर गुंजन अमरोही ने कहा कि जनगणना के आंकड़े देश की सामाजिक और जनसांख्यिकीय स्थिति के आकलन का महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे में प्रत्येक स्तर पर जिम्मेदारी, पारदर्शिता और सटीकता बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने प्रशिक्षकों से प्रशिक्षण में प्राप्त जानकारी को आगे प्रभावी ढंग से साझा करने का आह्वान किया, ताकि गणना प्रक्रिया में एकरूपता बनी रहे।

जनगणना निदेशालय से आए मास्टर ट्रेनर कमल कर्नाटक ने प्रश्नावली के माध्यम से जानकारी जुटाने, सवाल पूछने की सही प्रक्रिया और उत्तरों को निर्धारित प्रारूप में दर्ज करने के तकनीकी पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने से संकलित आंकड़ों की विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सकेगी।

प्रशिक्षण के दौरान मास्टर ट्रेनर राकेश पोखरियाल, जिला प्रभारी जनगणना शिव कुमार एवं वीरेंद्र कुमार, फील्ड ट्रेनर प्रदीप बिष्ट सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

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पोप लियो को लंग कैंसर, सर्जरी के बाद पता चला:दाएं फेफड़े का निचला हिस्सा निकाला गया; गांठ के लिए हुई थी सर्जरी

पोप लियो XIV को लंग कैंसर होने की पुष्टि हुई है। वेटिकन ने मंगलवार को मेडिकल बुलेटिन जारी कर इसकी जानकारी दी। 71 साल के पोप के फेफड़े में गांठ मिली थी, जिसे निकालने के लिए रोम के एक अस्पताल में उनकी 90 मिनट तक सर्जरी की गई। सर्जरी के दौरान उनके दाएं फेफड़े का निचला हिस्सा निकाला गया। जांच में इसमें कैंसर होने की पुष्टि हुई। वेटिकन के मुताबिक, सर्जरी सफल रही और इस दौरान कोई परेशानी नहीं आई। सर्जरी के बाद पोप को होश भी आ गया था। ऑपरेशन से पहले भी कैंसर का शक था पोप लियो XIV ने रविवार को अपनी सर्जरी की जानकारी दी थी। उन्होंने रोम में सेंट पीटर्स स्क्वायर के सामने बालकनी से लोगों को संबोधित किया था। पोप ने बताया था कि उनके फेफड़े की गांठ सीमित है और शुरुआती चरण में ही इसका पता चल गया। डॉक्टरों ने उन्हें गांठ हटाने के लिए सर्जरी कराने की सलाह दी थी। फेफड़ों में बनने वाली छोटी गांठों को पल्मोनरी नोड्यूल कहा जाता है। ये गांठें आम होती हैं और जरूरी नहीं कि कैंसर वाली हों। वेटिकन ने बताया कि पोप के फेफड़े में गांठ मिलने के बाद हुई जांच में पल्मोनरी एडेनोकार्सिनोमा यानी कैंसर की पुष्टि हुई। ऑपरेशन से पहले की जांच में भी इसी तरह के कैंसर का शक था। कैंसर फैलने की जांच कर रहे डॉक्टर पोप के अस्पताल में भर्ती होने की खबर सुनकर बड़ी संख्या में लोग उनसे मिलने पहुंचे। लोगों ने घंटों इंतजार किया। पोप की कार पहुंचने पर उन्होंने उनका स्वागत किया। पोप ने भी कार की खिड़की से हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन किया।ट AFP के मुताबिक, उनकी सफल सर्जरी के बाद डॉक्टर अब जांच कर रहे हैं कि कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में तो नहीं फैला है। पोप को उनके स्वास्थ के चलते आराम करने की सलाह दी गई है। उनके सार्वजनिक कार्यक्रम भी 20 अक्टूबर तक रद्द कर दिया गया है। जानिए पोप कौन होते हैं और कैसे चुने जाते हैं… पोप कौन होते हैं? पोप कैथोलिक ईसाई धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरु होते हैं। उन्हें दुनिया भर के कैथोलिक ईसाइयों का आध्यात्मिक नेता माना जाता है। जिस तरह हिंदू धर्म में शंकराचार्य जैसे बड़े धार्मिक गुरु होते हैं, उसी तरह कैथोलिक ईसाई धर्म में पोप का बहुत अहम स्थान है। हालांकि, दोनों की भूमिका और अधिकार अलग-अलग हैं। पोप वेटिकन सिटी में रहते हैं। यह इटली की राजधानी रोम के अंदर बसा दुनिया का सबसे छोटा देश है। पोप कैथोलिक चर्च के प्रमुख होते हैं और दुनिया भर के चर्चों, पादरियों और बिशपों का मार्गदर्शन करते हैं। वे धार्मिक नियमों, ईसाई शिक्षाओं और नैतिक मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं। वे युद्ध, गरीबी और शांति जैसे वैश्विक मुद्दों पर भी लोगों से अपील करते हैं। पोप कैसे चुने जाते हैं? जब किसी पोप की मृत्यु हो जाती है या वे अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं, तब नए पोप को चुनने की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके लिए 80 साल से कम उम्र के कार्डिनल वेटिकन में इकट्ठा होते हैं और गुप्त मतदान करते हैं। इस प्रक्रिया को कॉन्क्लेव कहते हैं। दो-तिहाई वोट मिलने पर नए पोप का चुनाव होता है। चुनाव की खबर वेटिकन की सिस्टीन चैपल की चिमनी से निकलने वाले सफेद धुएं के जरिए दुनिया को दी जाती है। काला धुआं निकलने का मतलब है कि अभी नया पोप नहीं चुना गया है। पोप लियो को मई 2025 में चुना गया था पोप लियो XIV का असली नाम रॉबर्ट फ्रांसिस प्रेवोस्ट है। उनका जन्म 14 सितंबर 1955 को अमेरिका के शिकागो शहर में हुआ था। वे कैथोलिक ईसाई धर्म के सबसे बड़े धार्मिक पद पर हैं। 8 मई 2025 को उन्हें कैथोलिक चर्च का 267वां पोप चुना गया था। वे अमेरिका से आने वाले पहले पोप हैं। उनसे पहले पोप फ्रांसिस इस पद पर थे। पोप बनने से पहले लियो XIV ने कई साल तक पादरी, मिशनरी और बिशप के रूप में काम किया। उन्होंने अपनी जिंदगी का लंबा समय दक्षिण अमेरिका के पेरू में बिताया। वहां उन्होंने लोगों के बीच रहकर धार्मिक और सामाजिक काम किए। उन्होंने पेरू के चिक्लायो इलाके में बिशप के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। 2023 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें वेटिकन में बिशप चुनने से जुड़े अहम विभाग का प्रमुख बनाया था। बाद में उन्हें कार्डिनल भी बनाया गया। कार्डिनल कैथोलिक चर्च के वरिष्ठ धर्मगुरु होते हैं, जो नए पोप को चुनने में हिस्सा लेते हैं। ———————— यह खबर भी पढ़ें… अजरबैजान में 96% मुस्लिम, फिर भी हिजाब बैन हुआ मुस्लिम बहुल देश अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर विवाद शुरू हो गया है। सरकार ने स्कूलों के ड्रेस कोड में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत ऐसे कपड़े पहनने पर रोक लगाई गई है, जिन्हें सरकार धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मानती है। पूरी खबर पढ़ें…

सनातन धर्म में गिरावत, विकृति की वजह

मनुस्मृति 1/91 से यह विचार भी सामने आता है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा के अवसर सभी को मिलने चाहिए। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद समाज को व्यवस्थित करने वाली वर्ण व्यवस्था में बदलाव आने लगा। जो वर्ण व्यवस्था पहले योग्यता और कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी, वह धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था में बदलने लगी। वर्ण भी पैतृक संपत्ति की तरह पिता से पुत्र को मिलने लगा। इसी परिवर्तन ने समाज में ऊंच-नीच की भावना को बढ़ावा दिया।

द्वापर युग में महाभारत के युद्ध से पहले ही ब्राह्मणत्व का ह्रास शुरू हो गया था। ब्राह्मण अपने मूल कर्तव्यों से दूर होने लगे थे। वे गुरुकुलों को छोड़कर राजकुमारों को पढ़ाने के लिए राजमहलों और उनके घरों तक जाने लगे थे। दूसरी ओर राजाओं और राजकुमारों में उच्छृंखलता बढ़ रही थी। वे धर्म, राज्य और शासन की अपने ढंग से व्याख्या करने लगे थे। जरासंध जैसे राजा चक्रवर्ती सम्राट बनने की महत्वाकांक्षा में निर्दोष राजाओं और उनके राजवंशों को समाप्त करने के प्रयास में लगे हुए थे।

महाभारत के युद्ध के बाद केंद्रीय सत्ता के अभाव में इन प्रवृत्तियों को और बढ़ने का अवसर मिला। राजनीतिक अस्थिरता ने वैदिक धर्म के ह्रास और उसमें विकृतियां पैदा होने की परिस्थितियां बनाईं। महाभारत के युद्ध में केवल बड़ी संख्या में मनुष्यों का ही संहार नहीं हुआ, बल्कि अनेक विद्वानों और मनीषियों की मृत्यु के साथ ज्ञान-विज्ञान, कला और कौशल की परंपराओं को भी भारी क्षति पहुंची।

आपसी फूट के कारण कौरवों, पांडवों और यादवों का विनाश हुआ। लेकिन आपसी फूट का वही रोग आज भी भारतीय समाज में बना हुआ है। पता नहीं इस भयंकर रोग से कब मुक्ति मिलेगी या यह भारतीयों को सुख-शांति से वंचित कर दुख के सागर में डुबोता रहेगा। आज भी हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा आपसी फूट और संघर्ष के उसी रास्ते पर चलता दिखाई देता है, जिस पर दुर्योधन चला था। लोग अपने ही समाज और देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

भारतीय प्राचीन शास्त्रों के अध्येताओं के अनुसार स्वायंभुव मनु से लेकर पांडवों तक आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। इसके बाद आपसी विरोध और संघर्ष के कारण उनका पतन शुरू हुआ। दूसरे शब्दों में कहें तो इस देश को जितना नुकसान गृहकलह ने पहुंचाया, उतना शायद किसी एक अन्य कारण ने नहीं पहुंचाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि देश का पूरा वातावरण सनातन वैदिक जीवन मूल्यों के ह्रास और उनमें विकृतियां पैदा होने का कारण बनने लगा। राजनीतिक पराजय ने केवल क्षत्रियों के पराक्रम और शक्ति को ही कमजोर नहीं किया, बल्कि भारतीय चिंतन, आत्मगौरव, अस्मिता और आत्मसम्मान की भावना को भी गहरी चोट पहुंचाई।

चारों ओर से आक्रमणों और संकटों से घिरे भारतीय इतने भयभीत और असुरक्षित महसूस करने लगे कि उन्होंने अपने धर्म और समाज की रक्षा के लिए अपने चारों ओर एक सुरक्षा कवच बनाने का प्रयास किया। उद्देश्य था कि सनातन वैदिक धर्म सुरक्षित बना रहे। यह उपाय कुछ हद तक कारगर भी हुआ, लेकिन इसका एक दूसरा परिणाम निकला। भारतीय समाज धीरे-धीरे अपने धर्म के मूल स्रोत वेदों से ही दूर होता चला गया। वेदों का नाम तो लोगों को मालूम था, लेकिन उनके ज्ञान और शिक्षाओं से उनका संबंध कमजोर पड़ता गया।

स्थिति यहां तक पहुंची कि जो ब्राह्मण वर्ग कभी वेदों को अपना सर्वस्व मानता था, वह भी वेदों और उनके वास्तविक अर्थों से अपरिचित होने लगा। दुख की बात है कि आज भी वेदों के वास्तविक ज्ञाता विद्वानों की कमी बनी हुई है। यही देश की अवनति और पतन का एक प्रमुख कारण है।

वैदिक मान्यता के अनुसार ब्राह्मण वह है जो वेदों का ज्ञाता हो, स्वार्थ से मुक्त हो, परमात्मा के तत्व को समझता हो, विशाल हृदय वाला हो और सबके कल्याण की कामना करता हो। जो भेदभाव से ऊपर उठकर समाज का मार्गदर्शन करे, वही ब्राह्मण कहलाने का अधिकारी है।

लेकिन दुर्भाग्य से विद्या और ज्ञान के आधार पर ब्राह्मण कहलाने की परंपरा धीरे-धीरे जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने की व्यवस्था में बदल गई। कुछ लोगों ने केवल जन्म के आधार पर स्वयं को ब्राह्मण घोषित करना शुरू कर दिया। यह धारणा भी प्रचारित की गई कि ब्राह्मण के मुख से निकला वचन स्वयं भगवान का वचन है और जो ब्राह्मण से विरोध करता है, उसका नाश हो जाता है। ‘ब्रह्मवाक्यं जनार्दनः’ और ‘ब्रह्मद्रोही विनश्यति’ जैसे कथन इसी धारणा के प्रतीक हैं। इन कथनों का अपना धार्मिक संदर्भ हो सकता है, लेकिन जब इन्हें उनके मूल संदर्भ से अलग करके स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया गया तो इनसे समाज में अनेक बुराइयां पैदा हुईं।

इस प्रकार वैदिक ज्ञान से दूर हो चुके स्वार्थी और अशिक्षित तथाकथित ब्राह्मणों ने भारतीय समाज की सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर किया। उन्होंने ज्ञान पर अपना अधिकार बनाए रखने का प्रयास किया और दूसरे वर्गों को शिक्षा से वंचित रखा।

इसके पीछे उनका स्वार्थ था। अशिक्षित व्यक्ति को भ्रमित करना आसान होता है। उसे अपने हित में इस्तेमाल करना भी सरल होता है। इसलिए दूसरे वर्गों को शिक्षित होने से रोकने की प्रवृत्ति बढ़ी। इसका सबसे अधिक प्रभाव क्षत्रियों पर पड़ा, क्योंकि उस समय राजसत्ता उन्हीं के हाथों में थी। धर्म और ज्ञान के क्षेत्र में मर्यादाओं का इससे बड़ा उल्लंघन क्या हो सकता था?

जिस समाज को कभी गुण, कर्म और योग्यता के आधार पर ब्राह्मणत्व प्राप्त करने वाले विद्वानों ने उन्नति के शिखर तक पहुंचाया था, उसी समाज को जन्म के आधार पर ब्राह्मण होने का दावा करने वालों ने संकट में डाल दिया।

दोनों में बुनियादी अंतर था। पहले ब्राह्मणत्व का आधार गुण, कर्म, ज्ञान और योग्यता थी। बाद में जन्म को ही उसका आधार बना दिया गया। पहले साधना और अध्ययन जरूरी थे, बाद में बिना साधना के भी जन्म के आधार पर श्रेष्ठता का दावा होने लगा।

किसी समाज को आगे बढ़ाने का मूल आधार साधना, परिश्रम और योग्यता है। लेकिन आज समाज को इस रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा और मार्गदर्शन देने वालों की कमी दिखाई देती है।

वैदिक काल में धर्म का एक प्रमुख आधार यज्ञ था। शतपथ ब्राह्मण 1/5/1/7 में कहा गया है, ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।’ अर्थात यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। यज्ञ का उद्देश्य एक ओर पर्यावरण की शुद्धि माना गया था तो दूसरी ओर वह व्यक्ति की आध्यात्मिक साधना का माध्यम भी था। लेकिन समय के साथ यज्ञ की परंपरा में भी विकृतियां पैदा होने लगीं।

वाममार्गियों ने यज्ञ में पशुबलि की प्रथा शुरू की। जबकि निरुक्त 2/11 के अनुसार यज्ञ को ‘अध्वर’ अर्थात अहिंसक कहा गया है। स्वार्थ और मांसाहार की इच्छा से प्रेरित लोगों ने वेद मंत्रों की अपने अनुकूल व्याख्या की। उन्होंने पशुबलि ही नहीं, बल्कि गौबलि और नरबलि जैसी प्रथाओं को भी धार्मिक कर्मकांड का हिस्सा बना दिया।

वैदिक ग्रंथों में गाय को ‘अघ्न्या’ कहा गया है। अर्थात जिसे मारा नहीं जाना चाहिए। ऋग्वेद 10/87/16 का उल्लेख करते हुए लेखक पशुबलि, गौबलि और नरबलि के निषेध की बात करता है।

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्वेन पशुना यातुधानः।

यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च।

समाज में शिक्षा और वैदिक ज्ञान की कमी के कारण लोगों को भ्रमित करना आसान हो गया था। इसका लाभ उन पुरोहितों ने उठाया जो अपनी इच्छाओं और स्वार्थ के अनुसार धार्मिक कर्मकांडों की व्याख्या करने लगे थे।

इस तरह यज्ञ जैसी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा पशुबलि जैसी प्रथाओं से विकृत होने लगी। पशुहिंसा को यज्ञ का आवश्यक हिस्सा बताने वाले लोग आज तक यह सिद्ध नहीं कर पाए कि किसी जीव की बलि देकर उसे स्वर्ग पहुंचाया जा सकता है। वे न तो अपने प्रियजनों को मारकर स्वर्ग भेज सके और न ही यज्ञ की वेदी पर किसी मृत व्यक्ति को फिर जीवित कर सके।

इससे लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि पशुबलि का औचित्य सिद्ध करने वाले विधान स्वार्थी पुरोहितों ने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए बनाए थे।

महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी यज्ञ में पशुबलि और पशुहत्या का पूरी तरह निषेध किया था। उनके अनुसार अश्वमेध, गोमेध और नरमेध का अर्थ घोड़े, गाय या मनुष्य की बलि देना नहीं है। उनकी व्याख्या में राष्ट्र की उन्नति और अभिवृद्धि के लिए किए जाने वाले कार्य अश्वमेध हैं। अन्न की अभिवृद्धि से जुड़े कार्य गोमेध हैं और मनुष्य का अंतिम संस्कार नरमेध है। लेकिन वैदिक ज्ञान से दूर होते जाने के कारण समय के साथ यज्ञ की मूल भावना विकृत होती गई।

महर्षि दयानंद की तरह गौतम बुद्ध ने भी सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने यज्ञ में पशुबलि और हिंसा की प्रथाओं को स्वीकार नहीं किया। जब पशुबलि को वेदों के अनुकूल बताया गया तो गौतम बुद्ध वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए।

वैदिक धर्म की एक प्रमुख विशेषता एकेश्वरवाद रही है। वेदों में एक परमेश्वर की महिमा का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद 1/164/46 के अनुसार इंद्र, मित्र, वरुण आदि उसी एक प्रकाशस्वरूप परमात्मा के नाम हैं। इसी मंत्र में कहा गया है कि सत्य एक है, लेकिन विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’

ऋग्वेद 10/114/5 में भी इसी विचार को व्यक्त किया गया है।

‘एकं सन्तं बहुधा कल्पयन्ति।’

अर्थात एक ही तत्व की अनेक रूपों में कल्पना की जाती है। कठोपनिषद में भी एक परमात्मा के अनेक रूपों में प्रकट होने का विचार मिलता है।

‘एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति।’

आचार्य यास्क ने भी इस विचार का समर्थन किया। उनके अनुसार एक ही देवता अपने ऐश्वर्य और गुणों के कारण अनेक रूपों में स्तुति का विषय बनता है।

‘महाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते।’ निरुक्त 7/4

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण 14/7/2/22 में कहा गया है।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।

मनसैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमेयं ध्रुवम्।

इसका आशय है कि जो परम सत्य को अनेक अलग-अलग रूपों में देखता है, वह जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है। परम तत्व को मन और आत्मज्ञान से समझना चाहिए, क्योंकि वह अत्यंत सूक्ष्म और स्थायी है।

इस प्रकार वैदिक ग्रंथों में ईश्वर की अवधारणा स्पष्ट रूप से प्रस्तुत की गई है। लेकिन समय के साथ यह धारणा मजबूत होती गई कि देवता एक नहीं, बल्कि अनेक हैं। इस विचार को बढ़ावा देने में वेदों की कर्मकांड आधारित व्याख्याओं की भी भूमिका रही। अलग-अलग देवताओं की स्तुति और उनके अलग नामों के कारण यह धारणा बनने लगी कि सभी देवता स्वतंत्र और अलग-अलग अस्तित्व रखते हैं।

आचार्य यास्क जैसे विद्वानों ने भी कुछ सीमा तक देवताओं के अलग-अलग स्वरूपों की व्याख्या स्वीकार की थी। लेकिन धीरे-धीरे विभिन्न देवताओं के स्वतंत्र व्यक्तित्व, चरित्र और धार्मिक परंपराएं विकसित होने लगीं। इससे वैदिक धर्म की एकेश्वरवाद की मूल भावना कमजोर हुई। इसका प्रभाव हिंदू समाज की एकता पर भी पड़ा।

जो समाज पहले एक परमात्मा की अवधारणा से जुड़ा हुआ था, उसमें अलग-अलग देवताओं और आस्थाओं के आधार पर समुदाय बनने लगे। विभिन्न समूहों के अपने-अपने आराध्य और धार्मिक केंद्र हो गए। परिणामस्वरूप समाज अनेक संप्रदायों में बंटता चला गया।

वैदिक ग्रंथों के अनुसार प्राचीन समाज में व्यक्ति का वर्ण उसके गुण और कर्म के आधार पर निर्धारित होता था। ‘वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति ‘वृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ वरण करना या चुनना है। इसका आशय यह है कि वर्ण जन्म से अपने आप प्राप्त नहीं होता था, बल्कि व्यक्ति को अपनी योग्यता और कर्म के आधार पर उसे प्राप्त करना पड़ता था।

वर्ण कोई पैतृक संपत्ति नहीं थी जो पिता से पुत्र को विरासत में मिल जाए। उसे विद्या की तरह अध्ययन, परिश्रम और साधना से प्राप्त करना होता था। जैसे किसी योग्य और विद्वान पिता का पुत्र केवल जन्म लेने से पिता की विद्या और योग्यता प्राप्त नहीं कर सकता, उसे स्वयं अध्ययन और परिश्रम करना पड़ता है। उसी प्रकार वर्ण की योग्यता भी व्यक्ति को स्वयं अर्जित करनी होती थी।

यह एक न्यायसंगत व्यवस्था थी, क्योंकि इसमें जन्म के बजाय व्यक्ति की योग्यता और कर्म को महत्व दिया गया था।

मनुस्मृति में वर्णों के लिए बताए गए कर्म भी इसी विचार की पुष्टि करते हैं। मनुस्मृति के पहले अध्याय में चारों वर्णों के कार्यों का वर्णन मिलता है। मनुस्मृति 1/88 के अनुसार ब्राह्मण का प्रमुख कार्य अध्ययन और अध्यापन करना, यज्ञ करना और कराना तथा पूरे समाज को अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना था। समाज के कल्याण की चिंता करना भी उसका कर्तव्य था।

मनुस्मृति 1/89 के अनुसार क्षत्रिय का कार्य अध्ययन करने के साथ देश की बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से रक्षा करना तथा राज्य में शांति और व्यवस्था बनाए रखना था।

मनुस्मृति 1/90 के अनुसार वैश्य का कार्य अध्ययन के अलावा पशुपालन, कृषि, व्यापार, उद्योग और दूसरे आर्थिक कार्यों के माध्यम से संपत्ति अर्जित करना था।

शूद्र का कार्य अन्य तीन वर्णों की सेवा, सहायता और श्रम से जुड़े काम करना माना गया था।

मनुस्मृति 1/91 से यह विचार भी सामने आता है कि जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को ऊंचा या नीचा नहीं माना जाना चाहिए। शिक्षा के अवसर सभी को मिलने चाहिए। वेदों का ज्ञान और विद्या पूरे समाज के लिए उपलब्ध होने चाहिए। लेकिन महाभारत के युद्ध के बाद समाज को व्यवस्थित करने वाली वर्ण व्यवस्था में बदलाव आने लगा।

जो वर्ण व्यवस्था पहले योग्यता और कर्म के आधार पर निर्धारित होती थी, वह धीरे-धीरे जन्म आधारित व्यवस्था में बदलने लगी। अब व्यक्ति का वर्ण उसके गुण, कर्म और विद्या से तय होने के बजाय परिवार और जन्म से निर्धारित होने लगा। वर्ण भी पैतृक संपत्ति की तरह पिता से पुत्र को मिलने लगा।

इस परिवर्तन ने समाज में ऊंच-नीच की भावना को बढ़ावा दिया। जन्म के आधार पर श्रेष्ठता और हीनता की धारणाएं मजबूत होने लगीं। गौतम धर्मसूत्र जैसे ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि बाद के समय में शूद्रों को समाज में निम्न स्थान दिया जाने लगा था।

गौतम धर्मसूत्र 1/1 के अनुसार उन्हें वेद पढ़ने और यज्ञ करने के अधिकार से वंचित रखा गया। कई स्मृति और सूत्र ग्रंथों में शूद्रों के उपनयन संस्कार का विधान भी नहीं मिलता।

उस समय उपनयन संस्कार शिक्षा प्राप्त करने की एक महत्वपूर्ण शर्त माना जाता था। इसलिए उपनयन के अधिकार से वंचित होने का अर्थ शिक्षा के अवसरों से भी वंचित होना था। वर्णों के आधार पर दंड व्यवस्था में भी भेदभाव होने लगा। एक जैसा अपराध करने पर अलग-अलग वर्णों के लोगों को अलग-अलग दंड दिए जाते थे।

इस प्रकार समय के साथ न समाज में सभी वर्णों की स्थिति समान रही और न ही उनके लिए कानून और दंड की व्यवस्था समान रही। जो वर्ण व्यवस्था मूल रूप से समाज के संगठन, विभिन्न कार्यों के संचालन और सभी के विकास के उद्देश्य से बनाई गई थी, वह धीरे-धीरे ऊंच-नीच और जन्म आधारित भेदभाव की व्यवस्था में बदल गई। यही सनातन वैदिक धर्म में ह्रास और विकृति का एक बड़ा कारण बना।

UP board date sheet 2027: 5 फरवरी 2027 से शुरू होंगी यूपी बोर्ड की परीक्षाएं, 10-12वीं कक्षा की पूरी डेटशीट जारी

UP board date sheet 2027: उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (upmsp) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए 10वीं और 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा की तारीख घोषित कर दी है। इस साल यूपी बोर्ड की परीक्षाएं 05 फरवरी, 2027 से शुरू होंगे और 24 फरवरी को खत्म होंगी। इस साल बोर्ड परीक्षा देने वाले छात्र बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर परीक्षा का पूरा कार्यक्रम देख सकते हैं और अपने विषय के अनुसार डेटशीट डाउनलोड कर सकते हैं।

यूपी बोर्ड की परीक्षा पर रहेगा विधानसभा चुनावों का साया

उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसे देखते हुए बोर्ड की ओर से कहा गया है कि पूरा परीक्षा कार्यक्रम 20 दिन में ही संपन्न कराने की तैयारी है। इससे पहले चुनाव आयोग कई बार बोर्ड परीक्षाओं की तारीखों में बदलाव करवा चुका है। चुनावी वर्ष में परीक्षाओं का कार्यक्रम तय करने के लिए चुनाव आयोग की अनुमति लेनी भी अपेक्षित होती है।

दो पालियों में आयोजित होंगी परीक्षाएं

सुबह की पाली सुबह 8:30 बजे से 11:45 बजे तक

शाम की पाली दोपहर 2 बजे से शाम 5:15 बजे तक

कार्यक्रम के अनुसार, शुरुआती 15 मिनट प्रश्नपत्र पढ़ने के लिए निर्धारित हैं। सुबह की पाली में उत्तर लिखने का समय सुबह 8:45 बजे से 11:45 बजे तक, जबकि शाम की पाली में दोपहर 2:15 बजे से शाम 5:15 बजे तक बताया गया है।

UP Board 10th Date Sheet 2027: यूपी बोर्ड हाईस्कूल डेटशीट 2027

दिनांक एवं दिन पाली एवं समय विषय 

05 फरवरी 2027 (शुक्रवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) हिंदी, प्रारंभिक हिंदी

08 फरवरी 2027 (सोमवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) सामाजिक विज्ञान

09 फरवरी 2027 (मंगलवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) एन०सी०सी० शाम (2:00 PM – 5:15 PM) मानव विज्ञान

10 फरवरी 2027 (बुधवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) अंग्रेजी शाम (2:00 PM – 5:15 PM) इलेक्ट्रिशियन, हेल्थकेयर, ऑटोमोबाइल, सोलर सिस्टम रिपेयर, प्लम्बर, सुरक्षा, आई०टी०/आई०टी०ई०एस०, मोबाइल रिपेयर, आपदा प्रबन्ध, रिटेल ट्रेडिंग (खुदरा व्यापार)

12 फरवरी 2027 (शुक्रवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) गृह विज्ञान (केवल बालिकाओं के लिए / बालकों के लिए तथा उन बालिकाओं के लिए जिन्होंने इसे अनिवार्य विषय के रूप में नहीं लिया है)

13 फरवरी 2027 (शनिवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) गणित

15 फरवरी 2027 (सोमवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) संस्कृत

16 फरवरी 2027 (मंगलवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) गुजराती, पंजाबी, बंगला, मराठी, असामी, उड़िया, कन्नड़, कश्मीरी, सिन्धी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, नेपाली

17 फरवरी 2027 (बुधवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) विज्ञान शाम (2:00 PM – 5:15 PM) संगीत वादन

18 फरवरी 2027 (गुरुवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) कम्प्यूटर शाम (2:00 PM – 5:15 PM) सिलाई

19 फरवरी 2027 (शुक्रवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) वाणिज्य

20 फरवरी 2027 (शनिवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) उर्दू

22 फरवरी 2027 (सोमवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) चित्रकला, रंजनकला

23 फरवरी 2027 (मंगलवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) संगीत गायन शाम (2:00 PM – 5:15 PM) पालि, अरबी, फारसी

24 फरवरी 2027 (बुधवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) सुरक्षा

UP Board 12th Date Sheet 2027: यूपी बोर्ड इंटरमीडिएट डेटशीट 2027

दिनांक एवं दिन पाली एवं समय विषय एवं स्ट्रीम

05 फरवरी 2027 (शुक्रवार) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) हिंदी, सामान्य हिंदी

08 फरवरी 2027 (सोमवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) व्यावसायिक शिक्षा वर्ग ‘आई’ – प्रथम प्रश्नपत्र (सभी ट्रेड जैसे काष्ठ शिल्प, सिलाई, ऑटोमोबाइल, बैंकिंग, हेल्थ केयर आदि) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) अंग्रेजी

09 फरवरी 2027 (मंगलवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) कृषि शस्य विज्ञान (एग्रोनामी) – प्रथम प्रश्नपत्र (कृषि भाग-1) / षष्ठम् प्रश्नपत्र (कृषि भाग-2) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) नागरिक शास्त्र

10 फरवरी 2027 (बुधवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) व्यावसायिक शिक्षा वर्ग ‘आई’ – द्वितीय प्रश्नपत्र शाम (2:00 PM – 5:15 PM) इतिहास

12 फरवरी 2027 (शुक्रवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) व्यावसायिक शिक्षा वर्ग ‘आई’ – तृतीय प्रश्नपत्र शाम (2:00 PM – 5:15 PM) जीव विज्ञान, गणित

13 फरवरी 2027 (शनिवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) शस्य विज्ञान (व्यावसायिक), कृषि वनस्पति विज्ञान (द्वितीय प्रश्न पत्र – कृषि भाग-1), कृषि अर्थशास्त्र (सप्तम प्रश्न पत्र – कृषि भाग-2) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) अर्थशास्त्र

15 फरवरी 2027 (सोमवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) संगीत गायन, संगीत वादन, नृत्यकला शाम (2:00 PM – 5:15 PM) रसायन विज्ञान, समाज शास्त्र

16 फरवरी 2027 (मंगलवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) कृषि भौतिकी एवं जलवायु विज्ञान (तृतीय प्रश्नपत्र – कृषि भाग-1), कृषि जन्तु विज्ञान (अष्टम् प्रश्नपत्र – कृषि भाग-2) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) भूगोल

17 फरवरी 2027 (बुधवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) व्यावसायिक शिक्षा वर्ग ‘आई’ – चतुर्थ प्रश्नपत्र शाम (2:00 PM – 5:15 PM) भौतिक विज्ञान, सैन्य विज्ञान

18 फरवरी 2027 (गुरुवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) कृषि अभियांत्रण (चतुर्थ प्रश्नपत्र – कृषि भाग-1), कृषि पशुपालन तथा पशु चिकित्सा विज्ञान (नवम् प्रश्नपत्र – कृषि भाग-2) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) चित्रकला आलेखन, चित्रकला प्राविधिक, रंजनकला

19 फरवरी 2027 (शुक्रवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) व्यावसायिक शिक्षा वर्ग ‘आई’ – पंचम प्रश्नपत्र शाम (2:00 PM – 5:15 PM) मानव विज्ञान

20 फरवरी 2027 (शनिवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) भाषाएँ: उर्दू, गुजराती, पंजाबी (गुरुमुखी), बंगला, मराठी, असामी, उड़िया, कन्नड़, सिन्धी, तमिल, तेलुगू, मलयालम, नेपाली शाम (2:00 PM – 5:15 PM) मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र, तर्कशास्त्र

22 फरवरी 2027 (सोमवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) सामान्य आधारित विषय (व्यावसायिक वर्ग के लिये), कृषि गणित तथा प्रारम्भिक सांख्यिकी (पंचम प्रश्नपत्र – कृषि भाग-1), कृषि रसायन विज्ञान (दशम प्रश्नपत्र – कृषि भाग-2) शाम (2:00 PM – 5:15 PM) व्यवसाय अध्ययन (वाणिज्य वर्ग के लिये), गृह विज्ञान

23 फरवरी 2027 (मंगलवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) लेखाशास्त्र (वाणिज्य वर्ग के लिये), एन०सी०सी० शाम (2:00 PM – 5:15 PM) पालि, अरबी, फारसी

24 फरवरी 2027 (बुधवार) सुबह (8:30 AM – 11:45 AM) कम्प्यूटर शाम (2:00 PM – 5:15 PM) संस्कृत

युवा आंदोलन और सत्ता का दायित्व !

छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

एक बार फिर से देश में युवाओं ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा दी है। यह कोई नई बात नहीं है, जब-जब छात्र राजनैतिक व्यवस्था के विरूद्ध सड़क पर उतरते हैं, तब-तब ये सवाल उठता है कि क्या छात्रों को राजनीति करनी चाहिए? इस सवाल के उत्तर अपनी-अपनी दृष्टि से हर समुदाय देता है। जो राजनैतिक दल सत्ता में होते हैं, वे छात्र आन्दोलन की भर्त्सना करते हैं। उसे हतोत्साहित करते हैं और जब छात्र काबू में नहीं आते, तो उनका दमन भी करते हैं। फिर वो चाहे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों या 70 के दशक में गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन से शुरू होकर जयप्रकाश नारायण के संपूर्णं क्रांति के आव्हान पर कूंदने वाले छात्र हों, जिन्होने इंदिरा गांधी की सत्ता पलट दी थी या फिर अन्ना हजारे के आन्दोलन में कूंदने वाले छात्र हों। लेकिन देश में कॉक्रोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन और देश भर में चल रहे ताज़ा आंदोलन ने इस सवाल को दोबारा जगा दिया है युवा और सरकार के आंदोलन का हल कैसे निकले?

रोचक बात ये है कि जो दल सत्ता में आकर छात्रों का दमन करते हैं, वही दल जब विपक्ष में होते हैं, तो छात्र आन्दोलनों को हवा देकर ही अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते हैं। इसमें कोई दल अपवाद नहीं हैं। अगर शिक्षा संस्थानों और अभिभावकों की दृष्टि से देखा जाऐ, तो भी दो मत हैं। जो संस्थान या अभिभावक चाहते हैं कि उनके निर्देशन में युवा केवल पढ़ाई पर ध्यान दें, डिग्री हासिल करें और नौकरी करे, वे नहीं चाहते कि उनके छात्र किसी भी तरह की राजनीति में हिस्सा ले।

मगर एक दूसरा वर्ग उन शिक्षकों और अभिभावकों का है, जो अपने छात्रों में पूर्णं विश्वास रखते हैं और जानते हैं कि चाहे वे छात्र राजनीति में कितना ही हिस्सा क्यों न लें, उन्हें अपने भविष्य को लेकर पूरी स्पष्टता है। इसलिए वे पढ़ाई की कीमत पर आन्दोलन नहीं करेंगे। ऐसे संस्थान और अभिभावक छात्रों को रचनात्मक राजनीति करने से नहीं रोकते।

अगर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हम पाऐंगे कि जो छात्र केवल पढ़ाई पर ध्यान देते हैं और रट्टू तोते की तरह इम्तेहान पास करते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास नहीं होता। प्रायः ऐसे नौजवानों में समाजिक सारोकार भी नहीं होते। उनका व्यक्तित्व एकांगी हो जाता है और जीवन के संघर्षों में वे उतनी मजबूती से नहीं खड़े हो पाते, जितना कि वे छात्र खड़े होते हैं, जिन्होंने शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार को बनाऐ रखा हो। जो छात्र विज्ञान, शोध या तकनीकी के क्षेत्र में जाते हैं, उनकी बात दूसरी है। उनका ध्यान अपने विषय पर ही केंद्रित रहता है और वे अपने संपूर्णं अंगों को कछुऐ की तरह समेटकर एक ही दिशा में लगातार काम करते जाते हैं।

अपने जीवन में मैंने भी अलग-अलग तरह माहौल में अनुभव प्राप्त किये हैं। जब तक मैं कॉलेज में पढ़तो था, तो मेरा व्यक्तित्व दो धुरियों में बटां था। मेरे पिता जो एक बड़े शिक्षाविद् थे, उनके विचार यही थे कि मैं पढ़ू और नौकरी करूं। जबकि मेरी मां जो कि संस्कृत की विद्वान थी और मथुरा के रमणरेती वाले महाराज श्रद्धेय गुरू शरणनानंद जी की लखनऊ विश्विद्यालय की सहपाठी थीं, वे छात्र जीवन से ही गांधीवादी विचारधारा और सामाजिक सरोकारों को लेकर बहुत सक्रिय रहीं थीं। उनका ही प्रभाव मुझ पर ज्यादा पड़ा और 18 वर्ष की आयु में एक स्वयंसेवक के रूप में पिछड़े गाँवों में सेवा कार्य करने घर छोड़कर चला गया।

1974 के उस दौर में मैंने गाँव की गरीबी और बदहाली में जीवन के अनूठे अनुभव प्राप्त किये। उसका ही परिणाम है कि आजतक मैं धन कमाने की दौड़ में न पड़कर समाज, राष्ट्र या सनातन धर्म के विषयों पर अपनी ऊर्जा पूरी निष्ठा से लगाता रहा हूं। अगर इसे अपने मुंह मियाँ मिट्ठू न माना जाऐ, तो देश में जो लोग मुझे जानते हैं, वो ये भी जानते हैं कि मैंने प्रभु कृपा भारत में कई बार इतिहास रचा है। ये निर्भीकता और समाज के प्रति समर्पण का ये भाव इसीलिए आया क्योंकि मैंने पढ़ाई के साथ समाज का भी अध्ययन जारी रखा। अन्यथा मैं आज किसी तंत्र की नौकरी में जीवन बिताकर खाली बैठा होता। जैसा आईसीएस रहे जेसी माथुर ने सेवानिवृत्त होने के बाद एक सुप्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका ‘दिनमान’ में एक श्रृंखला लिखी थी। जिसका मूल था कि ‘मैं आईसीएस में रहते हुए, एक मशीन का पुर्जा था, जिसका न दिल था, न दिमाग था’।

कल का आईसीएस ही आज का आईएएस है। पिछले 40 वर्षों में मैं सैंकड़ों आईएएस अधिकारियों से संपर्क रहा है और मैं दावे से कह सकता हूं कि, वही आईएसएस अधिकारी जीवन में कुछ ठोस और रचनात्मक कार्य कर पाते हैं, जो अपनी नौकरी के मायाजाल के बाहर, समाज से जुड़कर सहज जीवन जीते हैं और अपनी संवेदनशीलता को मरने नहीं देते। बाकी तो पूरी जिंदगी अच्छी पोस्टिंग और प्रमोशन के चक्कर में ही काट देते हैं। इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं। पर आमतौर पर यही अनुभव रहा है।

इसलिए मैं इस बात का समर्थक हूं कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। फिर वो चाहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हों, किसी समाजवादी आन्दोलन के सदस्य हों, किसी वामपंथी आन्दोलन के सदस्य हों या किसी गांधीवादी आन्दोलन के सदस्य हों या नए जन्में सीजेपी के समर्थक ही क्यों हों। जो भी हो उन्हें इस प्रक्रिया से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। प्रांतीय और केंद्र सरकार का ये दायित्व है कि वे छात्र राजनीति पर तब तक अंकुश न लगायें, जब तक कि वह हिंसात्मक या विध्वंसात्मक न हो। ऐसी छात्र राजनीति समाज की घुटन को ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में बाहर निकालती है और ये राज सत्ता के हित में ही होता है। इसलिए जब कभी देश का युवा सड़कों पर उतरे तो उसे गंभीरता से लिया जाए न कि दमनकारी रवैये से।

UP Shiksha Mitra: दिवाली से पहले यूपी के 1.27 लाख शिक्षामित्रों को बड़ा तोहफा, इस बार डबल से ज्यादा आएगी सैलरी

UP Shiksha Mitra Mandeya 2026: उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों के लिए दिवाली से पहले बड़ी खुशखबरी आई है। सीएम योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने बढ़े हुए मानदेय के भुगतान के लिए ₹460.23 करोड़ का बजट जारी कर दिया है। इसके बाद प्रदेश के 1,27,841 शिक्षामित्रों को सितंबर और अक्टूबर महीने का बढ़ा हुआ मानदेय मिलने का रास्ता साफ हो गया है। खास बात यह है कि दोनों महीनों की सैलरी एक साथ उनके बैंक खातों में भेजी जा सकती है।

₹10 हजार से बढ़कर ₹18 हजार हुआ मानदेय

सरकार ने शिक्षामित्रों के मानदेय को ₹10,000 से बढ़ाकर ₹18,000 प्रति माह करने की घोषणा की थी। अब सितंबर और अक्टूबर के बढ़े हुए मानदेय के भुगतान के लिए बजट जारी किया गया है। यानी पात्र शिक्षामित्रों को दो महीने के लिए कुल ₹36,000 तक का भुगतान मिल सकता है, जो पहले के दो महीने के ₹20,000 मानदेय से ₹16,000 अधिक है।

सभी जिलों को भेजा गया बजट

NDTV की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शिक्षा विभाग की ओर से जारी बजट सभी जिलों को भेज दिया गया है। महानिदेशक स्कूल शिक्षा मोनिका रानी ने बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) को भुगतान प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि शिक्षामित्रों के खातों में राशि भेजने में किसी तरह की लापरवाही न हो।

दूसरे कर्मचारियों को भी मिल सकता है दिवाली गिफ्ट

शिक्षामित्रों के बाद यूपी सरकार के अन्य कर्मचारियों को भी दिवाली से पहले राहत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) में बढ़ोतरी की जा सकती है। इसके अलावा कर्मचारियों को करीब ₹3,000 से 7,000 रुपये तक बोनस मिलने की भी संभावना है। इससे प्रदेश के लाखों कर्मचारी और पेंशनर्स राहत की सांस लेंगे।

स्थायी नौकरी की मांग अब भी जारी

मानदेय बढ़ने के बावजूद शिक्षामित्रों की स्थायी रोजगार की मांग खत्म नहीं हुई है। शिक्षामित्र लंबे समय से नियमितीकरण और शिक्षक भर्ती में उचित लाभ दिए जाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि वे वर्षों से सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। लेकिन उन्हें स्थायी नियुक्ति या विशेष TET में उचित अवसर नहीं दिया जा रहा।

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हालांकि, हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों को विशेष TET में शामिल होने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। शिक्षामित्रों का आरोप है कि सालों की सेवा के बावजूद उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। उन्हें नियुक्ति प्रक्रिया में पर्याप्त वेटेज या अवसर नहीं मिल रहा है। इस नाराजगी को देखते हुए योगी सरकार की तरफ से आगामी यूपी चुनाव से पहले शिक्षामित्रों को मनाने की कोशिश जारी है।

विधान परिषद की आठ सीट के लिए 164 उम्मीदवारों ने दाखिल किए नामांकन

बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक चुनाव में कुल 164 उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किए हैं।

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, कुल 164 उम्मीदवारों में से 98 ने चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों और 66 ने चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के लिए नामांकन दाखिल किया है।

जिन आठ सीटों पर 23 अक्टूबर को चुनाव होना है, उनमें पटना स्नातक, दरभंगा स्नातक, तिरहुत स्नातक, कोसी स्नातक, पटना शिक्षक, दरभंगा शिक्षक, तिरहुत शिक्षक और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे अधिक 40 उम्मीदवारों ने दरभंगा से नामांकन दाखिल किया है। इसके बाद पटना से 22, तिरहुत से 20 और कोसी से 16 उम्मीदवार मैदान में हैं।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में पटना से सबसे अधिक 22 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किया है। सारण से 19, दरभंगा से 14 और तिरहुत से 11 उम्मीदवारों ने पर्चे भरे हैं।

नामांकन पत्रों की जांच सात अक्टूबर को होगी, जबकि उम्मीदवार नौ अक्टूबर तक अपना नामांकन वापस ले सकते हैं। मतदान 23 अक्टूबर को सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक होगा और मतगणना 27 अक्टूबर को की जाएगी।

मौजूदा विधान परिषद सदस्यों-पटना स्नातक से नीरज कुमार, दरभंगा स्नातक से सर्वेश कुमार, तिरहुत स्नातक से बंसीधर ब्रजवासी, कोसी स्नातक से एन.के. यादव, पटना शिक्षक से नवल किशोर यादव, दरभंगा शिक्षक से मदन मोहन झा, तिरहुत शिक्षक से संजय कुमार सिंह और सारण शिक्षक से अफाक अहमद का कार्यकाल 16 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है।

सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने आठ में से चार सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें तीन मौजूदा विधान परिषद सदस्य फिर से चुनाव लड़ रहे हैं।

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भाजपा ने पटना शिक्षक सीट से मौजूदा विधान परिषद सदस्य नवल किशोर यादव, कोसी स्नातक सीट से डॉ. एन.के. यादव और तिरहुत स्नातक सीट से सर्वेश कुमार को फिर से उम्मीदवार बनाया है। पार्टी ने तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से नरेंद्र कुमार सिंह को मैदान में उतारा है। यह सीट फिलहाल विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के संजय कुमार सिंह के पास है।

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की पार्टी ने सभी आठ सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। पार्टी ने पटना स्नातक सीट से अनुज सिंह, तिरहुत स्नातक से विमोहन कुमार, तिरहुत शिक्षक से श्याम नंदन यादव, सारण शिक्षक से मौजूदा सदस्य अफाक अहमद, पटना शिक्षक से वकील एवं शिक्षाविद से राजनेता बनीं दिव्या ज्योति, दरभंगा शिक्षक से एस.पी. राय, दरभंगा स्नातक से मोहम्मद इम्तियाज (नूरानी) और कोसी स्नातक से रजनीश रंजन को उम्मीदवार बनाया है।

स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में ऐसे व्यक्ति मतदान कर सकते हैं, जिनके पास भारत के किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय की स्नातक डिग्री कम से कम तीन वर्ष से हो और जो संबंधित स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में निवास करते हों। इसके लिए मतदाताओं को विशेष रूप से तैयार की जाने वाली मतदाता सूची में अपना नाम पंजीकृत कराना होता है।

शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में राज्य के ऐसे शैक्षणिक संस्थानों में कार्यरत शिक्षक मतदान कर सकते हैं, जो माध्यमिक विद्यालय स्तर से नीचे के न हों। इनमें उच्च विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालय शामिल हैं। संबंधित शिक्षक के पास कम से कम तीन वर्ष का शिक्षण अनुभव होना चाहिए और पात्र शिक्षकों को भी संबंधित शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में अलग से पंजीकरण कराना होता है।

Pic Credit : UNI

महाराष्ट्र UCC पैनल में विवाद: सार्वजनिक फीडबैक पर मतभेद के बाद जस्टिस आरसी चव्हाण का इस्तीफा, प्रक्रिया पर उठाए सवाल

UCC Panel Shock In Maharashtra: महाराष्ट्र में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर गठित समिति में अब मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। समिति की दूसरी बैठक के दो दिन बाद बॉम्बे हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस आरसी चव्हाण ने समिति से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने आम लोगों से सुझाव और फीडबैक लेने की प्रक्रिया को लेकर असहमति जताई है। मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) के लिए नियम और सिफारिशें तैयार करने के लिए जुलाई 2026 में सात सदस्यीय समिति बनाई थी।

खास बात यह है कि इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज जस्टिस रंजना देसाई कर रही हैं। इस समिति को अपनी रिपोर्ट देने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। जस्टिस चव्हाण ने कमिटी की ऑनलाइन मीटिंग के कुछ घंटे बाद 19 सितंबर को अपना इस्तीफा भेज दिया। राज्य सरकार ने सोमवार 21 सितंबर को इसे मंजूरी दे दी।

क्या है पूरा विवाद?

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस आरसी चव्हाण ने इस्तीफे के पीछे मुख्य रूप से जनता से फीडबैक लेने की प्रक्रिया को लेकर मतभेद का हवाला दिया है। उनका कहना है कि समिति को पहले क्वेश्चनेयर (Questionnaire) को अंतिम रूप देना था। लेकिन समिति की अध्यक्ष जस्टिस रंजना देसाई की ओर से कथित तौर पर क्वेश्चनेयर पहले ही जारी कर दी गई। चव्हाण ने समिति की बैठक में एक ऐसे व्यक्ति की कथित मौजूदगी और भूमिका पर भी सवाल उठाया, जो समिति का सदस्य नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, चव्हाण ने इसके बाद 19 सितंबर को अपना इस्तीफा दिया।

समिति को भेजे अपने ईमेल में जस्टिस चव्हाण ने कहा कि मीटिंग के एजेंडा में से एक UCC पर लोगों की राय जानने के लिए क्वेश्चनेयर (questionnaire) को अंतिम रूप देना था। उन्होंने कहा, “तीन सदस्यों ने अपनी बात रखने की कोशिश की, जैसे कि जवाब देने वालों को सिर्फ ‘हां’ या ‘ना’ में जवाब देना हो, या फिर सदस्य डॉ. सुवर्णा रावल की देखरेख में प्रोफेसरों से क्वेश्चनेयर की जल्द और पेशेवर तरीके से जांच करवाई जाए।”

उन्होंने आगे लिखा, “माननीय चेयरपर्सन पहले ही अपने द्वारा तैयार की गई क्वेश्चनेयर सभी को भेज चुकी थीं और कहा था कि वेबसाइट तैयार होने पर इसे अपलोड कर दिया जाएगा। इस तरह, आज की मीटिंग के एजेंडा का तीसरा और आखिरी मुद्दा पूरा हो गया। इसलिए, समय और इंटरनेट बचाने के लिए मैंने लॉग-आउट कर दिया।”

सात सदस्यीय समिति में कौन-कौन?

महाराष्ट्र सरकार ने UCC का मसौदा तैयार करने और उसके क्रियान्वयन से जुड़ी सिफारिशें देने के लिए सात सदस्यीय समिति बनाई है। चव्हाण के इस्तीफे के बाद समिति की संरचना में बदलाव आया है। इसमें जस्टिस रंजना देसाई के अलावा ये लोग भी शामिल हैं:-

  • जस्टिस आरसी चव्हाण- पूर्व बॉम्बे हाई कोर्ट जज
  • जस्टिस एसजी मेहरे- पूर्व हाई कोर्ट जज
  • डीके जैन- महाराष्ट्र के पूर्व मुख्य सचिव
  • वीरेंद्र सराफ- पूर्व एडवोकेट जनरल
  • रमेश पतांगे- संवैधानिक विशेषज्ञ
  • सुवर्णा रावल- शिक्षाविद

UCC पर महाराष्ट्र सरकार की क्या प्लान है?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 14 सितंबर को कहा था कि समिति अपनी रिपोर्ट और सिफारिशें सौंपने के बाद सरकार UCC को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। सरकार ने संकेत दिया है कि UCC से जुड़ा विधेयक विधानसभा के नागपुर में होने वाले शीतकालीन सत्र में पेश किया जा सकता है। समिति को अपनी सिफारिशें तैयार करने के लिए छह महीने का समय दिया गया है।

जनता की राय लेने की प्रक्रिया क्यों अहम?

UCC का उद्देश्य विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े मामलों के लिए एक समान कानूनी ढांचा तैयार करना है। ऐसे में समिति द्वारा आम लोगों और संबंधित पक्षों से सुझाव लेने की प्रक्रिया उसके मसौदे का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी प्रक्रिया को लेकर समिति के भीतर मतभेद सामने आने से महाराष्ट्र की UCC प्रक्रिया पर अब ध्यान और बढ़ गया है। हालांकि, इस्तीफा समिति की अंतिम सिफारिशों या प्रस्तावित UCC के अंतिम स्वरूप का संकेत नहीं है। ये चीजें समिति की आगे की कार्यवाही और रिपोर्ट से स्पष्ट होंगी।

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Hanuman Ansh Box Office Collection Day 43: ‘हनुमान अंश’ का सातवें शुक्रवार को भी जलवा कायम, 43वें दिन करोड़ों में कमाई, बॉक्स ऑफिस कलेक्शन हैरान कर देगा

Hanuman Ansh Box Office Collection Day 43: ‘हनुमान अंश’ का बॉक्स ऑफिस पर जलवा बरकरार है। यह लंबे समय से सिनेमाघरों में चल रही है। फिल्म ने अपनी जर्नी में एक और मुकाम हासिल किया है, जिसके तहत 43वें दिन के नए आंकड़े सामने आए हैं।

‘हनुमान अंश’ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 43वां दिन

43वें दिन, ‘हनुमान अंश’ ने 16.0% ऑक्यूपेंसी के साथ 5,220 शो से 5 करोड़ की कमाई की। Sacnilk की रिपोर्ट के अनुसार भारत में इसका कुल नेट कलेक्शन ₹248.38 करोड़ और ग्रॉस कलेक्शन ₹293.30 करोड़ है। नए आंकड़े अभी भी अपडेट किए जा रहे हैं।

फिल्म के हिंदी वर्शन ने 43वें दिन कुल 15.72% ऑक्यूपेंसी दर्ज की। मॉर्निंग शो में 8.00% ऑक्यूपेंसी रही, इसके बाद दोपहर में 16.38% और रात को 27.8% ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई। फिल्म लगातार बेहद अच्छा परफॉम कर रही है। वहीं वर्ल्डवाइड कलेक्शन की बात करें तो फिल्म का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन 316.30 करोड़ हो चुका है।

बीक वाइज कलेक्शन

Sacnilk के अनुसार ‘हनुमान अंश’ ने पहले दिन ₹10 लाख से शुरुआत की और पहला हफ्ता ₹1.08 करोड़ के कलेक्शन के साथ खत्म किया। इसने दूसरे वीक में ₹40 लाख और तीसरे वीक में ₹10.40 करोड़ जोड़े। फिल्म ने चौथे हफ्ते में ₹61 करोड़, पांचवें हफ्ते में ₹90.25 करोड़ और छठे हफ्ते में ₹80.25 करोड़ का कलेक्शन किया। सातवें हफ्ते में प्रवेश करते हुए, ‘हनुमान अंश’ ने अब तक 43वें दिन ₹2.60 करोड़ की कमाई की है।

‘हनुमान अंश’ के बारे में

विशाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित और निर्देशित, ‘हनुमान अंश’ एक आध्यात्मिक ड्रामा है जो नीम करौली बाबा (जिन्हें महाराज जी के नाम से भी जाना जाता है) के जीवन और शिक्षाओं से प्रेरित है। शोभिनव सत्या ने नीम करौली बाबा की भूमिका निभाई है, जबकि विहान शेडगे ने बचपन का किरदार निभाया है। फिल्म की कास्ट में चंदन आनंद, पूर्णिमा तिवारी, अनिल के. रस्तोगी और गुलशन पांडे भी शामिल हैं। यह फिल्म भारत में 7 अगस्त, 2026 को रिलीज हुई थी।

Hanuman Ansh Box Office Collection Day 37: नीम करौली बाबा पर बनी फिल्म की कमाई में आया उछाल, जल्द ही 250 करोड़ रुपये का आंकड़ा करेगी पार

Hanuman Ansh Box Office Collection Day 37: विशाल चतुर्वेदी की फिल्म ‘हनुमान अंश’ बॉक्स ऑफिस पर मजबूती से टिकी हुई है। सैक्निलक (Sacnilk) के अनुसार इस डिवोशनल ड्रामा फिल्म की इंडिया नेट कमाई में छठे शनिवार को जबरदस्त उछाल आया और इसने 37वें दिन 18.50 करोड़ रुपये कमाए।

फिल्म की यह नई कमाई छठे शुक्रवार को हुई 10.50 करोड़ रुपये की कमाई के मुकाबले 76.2% ज्यादा है। ‘हनुमान अंश’ के शनिवार को 7449 शो हुए, जबकि एक दिन पहले 5743 शो हुए थे। इसकी ओवरऑल ऑक्यूपेंसी भी शुक्रवार के 38% से बढ़कर शनिवार को 52% हो गई।

इस नई कमाई के साथ फिल्म का इंडिया नेट कलेक्शन 192.13 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसका इंडिया ग्रॉस कलेक्शन अभी 227 करोड़ रुपये है। फिल्म ने ओवरसीज मार्केट में भी 9.50 करोड़ रुपये कमाए हैं, जिससे इसका वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन 236.50 करोड़ रुपये हो गया है।

12 सितंबर को ‘हनुमान अंश’ के हिंदी 2D वर्शन की ओवरऑल ऑक्यूपेंसी 56.31% रही। मॉर्निंग शो में 29.77% ऑक्यूपेंसी रही, जबकि दोपहर के शो में यह 60.31% तक पहुंच गई। शाम की ऑक्यूपेंसी 66.46% रही और रात के शो में सबसे ज्यादा 68.69% ऑक्यूपेंसी दर्ज की गई।

‘हनुमान अंश’ की शुरुआत आसान नहीं रही थी। फिल्म के रिलीज होने के बाद, ‘बंटवारा 1947’ और ‘आवारापन 2’ जैसी फिल्मों के आने से इसके स्क्रीन की संख्या घटकर सिर्फ 25 रह गई थी। हालांकि ‘बंटवारा 1947’ के उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन न कर पाने के बाद, ‘हनुमान अंश’ के लिए स्क्रीन की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी।

दर्शकों का रिस्पॉन्स भी बेहतर हुआ और लोग फिल्म देखने के लिए सिनेमाघरों में बड़ी संख्या में पहुंचने लगे। लगातार चले प्रमोशन कैंपेन का असर डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की सेहत पर पड़ा है। वे अब मुंबई लौट रहे हैं। अपने प्लान के बारे में बात करते हुए विशाल ने कहा कि मुंबई में गणेश उत्सव शुरू हो रहा है और त्योहार के दौरान वे बप्पा का शुक्रिया अदा करने के लिए अलग-अलग पंडालों में जाएंगे।

विशाल चतुर्वेदी द्वारा लिखित और निर्देशित, ‘हनुमान अंश’ उत्तराखंड के सम्मानित संत बाबा नीम करौली (जिनका असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था) के जीवन की कहानी है। 1.75 करोड़ रुपये के बजट में बनी यह फिल्म लक्ष्मी नारायण नाम के एक युवा की कहानी है, जो अपनी मां की मौत के बाद भगवान की खोज में आध्यात्मिक यात्रा पर निकल पड़ता है।

जीवन, मृत्यु और इंसानी दुख-दर्द के सवालों के जवाब ढूंढते हुए उत्तर भारत की यात्रा के दौरान वह अंतत सम्मानित संत नीम करौली बाबा बन जाते हैं, जिनकी प्रेम, सेवा और करुणा की शिक्षाओं ने अनगिनत लोगों के जीवन को प्रभावित किया। इस फिल्म में शोभिनव सत्य मुख्य भूमिका में हैं, साथ ही विहान शेडगे, चंदन के आनंद, पूर्णिमा तिवारी, अनिल रस्तोगी, गुलशन पांडे और भगवानदास पटेल भी अहम भूमिकाओं में हैं।